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Friday, 24 July 2015

मसान : थोड़ी मार्मिक-थोड़ी निष्ठुर पर सच्चाई के बिल्कुल करीब! (४/५)

बनारस सिर्फ गाँजा-भांग-चरस की चिलम चढ़ाये 'फोटो-फ्रेन्डली' बाबाजी लोगों या फिर टूटी-फूटी अंग्रेजी में 'अंग्रेजों' को लूट लेने की जुगत में दिमाग खपाते जुगाड़ियों का ही शहर नहीं है, बनारस में जिन्दगी का एक पहलू और भी है...थोड़ा मार्मिक-थोड़ा निष्ठुर पर सच्चाई के बिल्कुल करीब! नीरज घायवान की 'मसान' आपका परिचय एक बिल्कुल नये बनारस से कराती है, जिसे आपने देखा-सुना तो शायद जरुर होगा पर इस बार आप उसे रुंधे गले-भरे दिल और डबडबाई आँखों से महसूस भी कर पायेंगे। 

ये उन नौजवानों का बनारस है, जिनका प्रेम फेसबुक की दीवारों पर परवान चढ़ता है। जिनकी आशाएँ-आकांक्षाएँ जमीन से उखड़ी नहीं हैं, पर हर तरह के सामाजिक बन्धनों को तोड़ने का दम-खम रखती हैं। नायक (विकी कौशल) मसान (शमशान का अपभ्रंश) में चिताएं सजाने-जलाने वाले एक डोम परिवार से सम्बन्ध रखता है। स्थानीय कालेज से सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा लेने के बाद शायद वो इस पेशे से अलग भी हो जाए, पर आज उसे अपने परिवार का हाथ बँटाने में तनिक गुरेज़ नहीं। प्यार के मामले में भी नायक अपनी कमजोरियां बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेता है। 

नायिका (रिचा चढ्ढा) को अपने प्रेमी के साथ एक होटल के कमरे में सेक्स करते हुए पकड़े जाने का कोई मलाल नहीं, हालांकि इस पूरे मामले को सनसनीखेज बनाने की पुलिस की कोशिशों से अब उसकी जिंदगी इतनी आसान नहीं रही पर उसके वजूद को तोड़ना अब भी कोई हंसी खेल नहीं। 'मसान' जिन्दगी, मौत और उसके बीच की तमाम बातों का एक सीधा सा दिखने वाला पर जटिल लेखा-जोखा है। मसान में चिता जलाते किरदार जब मुर्दा शरीर के अंगों के साथ खेलते नजर आते हैं, मौत जिन्दगी से हलकी लगने लगती है। 'दु: खतम क्यों नहीं होता, रे?" कहकर जब नायक का सब्र पीड़ा के आगे घुटने टेक देता है, तब भी जिन्दगी ही हारती दिखती है, पर अभी सब कुछ खतम नहीं हुआ है। जिन्दगी अब भी बाकी है। 

'मसान' की खूबसूरती, 'मसान' का तिलिस्म वरुण ग्रोवर की काबिलियत का तानाबाना है। एक ऐसी कलम जो हिन्दी साहित्य-उर्दू शायरों के सहन में पली-बढ़ी है और उनका कर्ज़ उतारने की ईमानदार कोशिश करती है। दुष्यन्त कुमार की 'तू किसी रेल सी गुजरती है' से लेकर डा. बशीर बद्र और निदा फ़ाजली जैसे दिग्गजों का जिक्र भर फिल्म को एक अलग पहचान दे देता है। संवादों में बनारस साफ़ झलकता है। कर्मकांडी विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) हों या उनका चेला झोंटाकिरदार कहीं भी बनारसी होने की चीख-पुकार करते नहीं दिखते पर यकीनन जब आप अगली बार बनारस में होंगे, इन सभी को ढूंढते मिलेंगे। अभिनय में विकी कौशल अपने हाव भाव, लहज़े से पूरी तरह प्रभावित करते हैं। उनकी प्रेमिका की भूमिका में श्वेता स्क्रीन पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रही हैं। रिचा चढ्ढा अपने सधे अभिनय से हर दृश्य, हर भाव को खुद में आत्मसात कर लेती हैं। संजय मिश्रा तो हैं ही बेहतरीन।

अन्त में, 'मसान' नीरज घायवान को उन तमाम गिने चुने फिल्मकारों की श्रेणी में ला खड़ा करती है, जिनकी समझ जिन्दगी और सिनेमा के बारे में करीब करीब एक बराबर ही है, जो भली भाँति जानते हैं कि सिनेमा और जिन्दगी का संगम कब,कहाँ और कैसे होना चाहिए। 'मसान' अपनी संवेदनशीलता, समझ, साहित्यिक संदर्भों और सजीवता के साथ, बिना शक-बिना शर्त साल की सबसे अच्छी और सच्ची फिल्मों में से एक है। एक बार नहीं, एक बार और देखिए! (/)