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Friday, 8 December 2017

फ़ुकरे रिटर्न्स: व्हाट द फ़* रे! [1.5/5]

4 साल बहुत होते हैं बनने-बिगड़ने के लिए. 2013 में मृगदीप सिंह लाम्बा की 'फुकरे' ने दिल्ली के ख़ालिस लापरवाह लौंडों, उनकी छोटी-छोटी तिकड़मों और उनके बेबाक 'दिल्ली-पने' से आपको खूब गुदगुदाया होगा, तब उंगलियाँ नर्म थीं उनकी, चेहरे मासूम और कोशिशें ईमानदार. 4 साल बाद, 'फुकरे रिटर्न्स' में गुदगुदाने की कोशिश करने वाली वही उंगलियाँ अब चुभने लगी हैं. कोशिशें औंधें मुंह गिर पड़ती हैं और फिल्म में मासूमियत की जगह अब भौंडेपन ने ले ली है. नंगे पिछवाड़ों पर सांप डंस रहे हैं, और किरदार चूस-चूस कर उनका ज़हर निकाल रहे हैं. ऐसे दृश्य 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती' जैसों में तो बड़ी बेशर्मी से फिट हो ही जाते हैं, यहाँ क्या कर रहे हैं? समझ से परे है. गनीमत की बात सिर्फ इतनी है कि चूचा (वरुण शर्मा) तनिक भी बड़ा नहीं हुआ, और तब पंडित जी का छोटा सा किरदार करने वाले, पंकज त्रिपाठी की पहचान कलाकार के तौर पर अब अच्छी खासी बड़ी हो गयी है. इन दोनों के ही भरोसे फिल्म जितनी भी देर झेली जा सकती है, झेली जाती है.

बेईमान मंत्री बाबूलाल (राजीव गुप्ता) की मदद से भोली पंजाबन (रिचा चड्ढा) जेल से बाहर आ गयी है, और अब फुकरों की टोली से अपनी आज़ादी के लिए खर्च किये पैसों की भरपाई उनसे चाहती है. प्लान वही है, चूचा सपने देखेगा और हन्नी (पुलकित सम्राट) उसके सपने से लॉटरी का नंबर निकालेगा. ज़फर (अली फज़ल) और लाली (मनजोत सिंह) भी रहेंगे, पर क्यों? न कहानी में इसकी कोई बहुत ख़ास वजह मिलती है, ना ही फिल्म में. बहरहाल, प्लान फेल हो जाता है, ठीक वैसे ही जैसे फिल्म के बहुत सारे दोहराव वाले जोक्स. खैर, मदद को इस बार चूचे का एक नया टैलेंट सामने आता है. उसे भविष्य दिखाई देने लगा है. एक गुफ़ा, एक टाइगर, उसका बच्चा, दो राक्षस और एक गुप्त खज़ाना.

जहाँ अपनी पहली फिल्म में, मृगदीप कहानी में हास्य पिरोने का सफल प्रयोग करते हुए दिखाई दिये थे, 'फुकरे रिटर्न्स' में हास्य के अन्दर कहानी डालने की नाकाम कोशिशें करते हैं, और लगातार करते रहते हैं. बीफ़ बैन, इंडिया गेट पर योग करते राजनेता, जानवरों और अंगों की तस्करी जैसे मुद्दों का भी इस्तेमाल करते हैं, पर आखिर में एक काबिल और भरोसेमंद कहानी का अभाव इन सारी कोशिशों को मटियामेट कर देता है. इस बात का अंदाजा आप इसी से लगा सकते हैं कि फिल्म के सबसे मनोरंजक दृश्यों में ज्यादातर फिल्म के सह-कलाकारों के हिस्से आये दृश्य ही शामिल हैं. यमुना नदी के काले गंदे पानी में डुबकी मार कर सिक्के बटोरने वाला आदमी हो, या भोली पंजाबन के बेरोजगार, लाचार, हिंदी बोलने वाले अफ़्रीकी गुर्गे. इनकी संगत और रंगत में आपको ज्यादा मज़ा आता है. 

अली फज़ल को फिल्म में यूँ खर्च होते देखना खलता है. पूरी फिल्म में वो जैसे 'फुकरे' करने का खामियाज़ा भुगत रहे हों. फिल्म की पटकथा मनजोत के साथ भी ऐसी ही कुछ नाइंसाफी बरतती है. पुलकित सम्राट अपनी पिछली कुछ फिल्मों से बेहतर नज़र आते हैं. मुंहफट, लड़ाकू, खूंखार भोली पंजाबन की भूमिका में रिचा चड्ढा इस बार थोड़ी कमज़ोर दिखती हैं. ऐसा इसलिए भी मुमकिन है क्योंकि फिल्म उनके किरदार से कॉमेडी की उम्मीदें लगा बैठती है. आखिर में, बच-बचा के वरुण शर्मा और पंकज त्रिपाठी ही रह जाते हैं. पंकज अपनी चिर-परिचित भाव-भंगिमाओं से ही दर्शकों के चेहरे पर मुस्कान ले आते हैं, ऊपर से हर संवाद के बाद उनका एक 'फाइनल कमेंट'. इस एक अदाकार को आप घंटों एकटक देख सकते हैं, और बोर नहीं होंगे. वरुण के अभिनय की मासूमियत भी कुछ ऐसी ही है, लेकिन उनका अपने आप को बार-बार दोहराना थोड़ा निराश करता है. वरना तो 'फुकरे रिटर्न्स' के असली फुकरे वही हैं. 

अंत में; लाम्बा ने यमुना पार की तंग गलियों से लेकर गुडगाँव की रेव पार्टियों तक का जिक्र और इत्र जिस चालाकी से 'फुकरे' में पेश किया था, 'फुकरे रिटर्न्स' सतही तौर ही दिल्ली को फिल्म में ढाल पाती है. गौर करने वाली एक नयी बात सिर्फ इतनी सी है कि दिल्ली का मुख्यमंत्री 'स्कैम'-विरोधी है, पैंट-शर्ट पहनता है और सिर्फ एक फ़ोन पर किसी से भी मिल सकता है. काश, फिल्म थोड़ी और दिल्ली की हो पाती, और अपने आपको कम दोहराती! [1.5/5]

Friday, 20 May 2016

सरबजीत: बहना, ओ बहना! [2/5]

मुख्य भूमिकायें सितारों की किस्मत होती हैं, चमचमाती थाली में रख कर ड्राइंग रूम में परोस दी जाती हैं. सहायक भूमिकायें अक्सर अभिनेताओं की झोली में उनकी मेहनत का नजराना समझकर डाल दी जाती हैं. कम से कम बॉलीवुड में बॉक्स-ऑफिस के इर्द-गिर्द मंडराती रहने वाली ‘बड़ी’ फिल्मों का तो यही लब्बो-लुबाब है. ओमंग कुमार की ‘सरबजीत’ उन्ही चंद फिल्मों में से एक है.

सरबजीत [रणदीप हुडा] सालों से पाकिस्तानी जेल में हिन्दुस्तानी जासूस होने के शक़ में कैद है. बहन दलबीर कौर [ऐश्वर्या राय बच्चन] की लगातार कोशिशों का दम-ख़म देखिये कि आज सरबजीत का पूरा परिवार उस से मिलने पाकिस्तान की जेल में आया है. बीवी [रिचा चड्ढा] भर्राए गले से पूछ बैठती है, “ठीक हो?” सरबजीत [हुडा] अपनी सारी टूटती सांसें बटोर कर कहता है, “अब हूँ!” मेरे ख़याल से पूरी फिल्म का ये सबसे कामयाब, सबसे कारगर सीन है. यहाँ आपको फिल्म से शिकायतें कम रहती हैं, पर कुछ है जो अचानक आपके जेहन में बिजली की तरह कौंध गया है. सीन में मौजूद सितारे [राय बच्चन] की चकाचौंध धीमी पड़ गयी है. दोनों अभिनेताओं को [चड्ढा और हुडा] बहुत थोड़ा ही सही, फैलने का एक मौका मिल गया है और वे उसमें इस कदर कामयाब रहते हैं कि आप सोच में पड़ जाते हैं, आखिर क्यूँ हर ‘मैरी कॉम’ को जरूरत होती है ‘प्रियंका चोपड़ा’ की?

जब ऐश्वर्या अपने चीखने-चिल्लाने के प्रतिभा-प्रदर्शन में कैमरे को लताड़ने में मशगूल रहतीं हैं, अक्सर बैकग्राउंड में रिचा चड्ढा या तो भैसें नहलाने या ढहती दीवाल की ईंटें हटाने में चुपचाप लगी रहती हैं. उन्हें पता है, उन्हें सिर्फ फिल्म चलाने के लिए शामिल नहीं किया गया है. हालाँकि ओमंग कुमार उनका भी इस्तेमाल अरिजीत सिंह के गाने पर बखूबी करते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वो रणदीप को फिल्म के शुरुआत में ही ‘बैंड बाजा बारात’ का रणवीर सिंह बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ते. सरबजीत की बहन के रोल में ऐश्वर्या को एक माकूल ज़मीन देने में ओमंग इतनी शिद्दत दिखाते हैं कि फिल्म में हर बूढा-बच्चा-जवान ऐश्वर्या को ‘बहनजी’ ही कह के बुलाता है. उस पर डॉयलागबाजी का आलम कुछ यूँ कि ‘ग़दर’ का सनी देओल भी तौबा कर ले!

ग़ालिब अपने एक शे’र में कहते हैं, “मुश्किलें पड़ीं मुझपे इतनी कि आसां हो गयीं”. ओमंग कुमार भी ‘सरबजीत’ की कहानी में मुश्किलों को पहले तो यूँ सामने ला पटकते हैं मानो अब कुछ भी हल मुमकिन नहीं, फिर अगले ही पल उन्हें कुछ इस अंदाज़ से दुरुस्त कर देते हैं, जैसे पहले उनका कोई नाम-ओ-निशाँ ही न रहा हो. फिल्म अपने इसी लचर रवैये की वजह से अक्सर सच्चाई से परे झाँकने लगती है. सरबजीत का पाकिस्तानी जेल में लगातार अपने परिवार के साथ चिट्ठियों से जुड़े रहना, दलबीर कौर का बार-बार पाकिस्तान आना-जाना, वहाँ के लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना; सब कुछ एक बॉलीवुड फिल्म के दायरे में बड़ी आसानी से समा जाता है.   

आखिर में, ओमंग कुमार की ‘सरबजीत’ रणदीप हुडा, रिचा चड्ढा और अपने छोटे से मजेदार रोल में दर्शन कुमार [मैरी कॉम, एनएच 10 वाले] के अच्छे अभिनय के बावजूद, ऐश्वर्या के उकता देने वाले अभिनय [???], धीमी गति और कहानी में बनावटीपन के पुट की वजह से आपके दिल तक शायद ही पहुँच पाए. [2/5]     

Friday, 24 July 2015

मसान : थोड़ी मार्मिक-थोड़ी निष्ठुर पर सच्चाई के बिल्कुल करीब! (४/५)

बनारस सिर्फ गाँजा-भांग-चरस की चिलम चढ़ाये 'फोटो-फ्रेन्डली' बाबाजी लोगों या फिर टूटी-फूटी अंग्रेजी में 'अंग्रेजों' को लूट लेने की जुगत में दिमाग खपाते जुगाड़ियों का ही शहर नहीं है, बनारस में जिन्दगी का एक पहलू और भी है...थोड़ा मार्मिक-थोड़ा निष्ठुर पर सच्चाई के बिल्कुल करीब! नीरज घायवान की 'मसान' आपका परिचय एक बिल्कुल नये बनारस से कराती है, जिसे आपने देखा-सुना तो शायद जरुर होगा पर इस बार आप उसे रुंधे गले-भरे दिल और डबडबाई आँखों से महसूस भी कर पायेंगे। 

ये उन नौजवानों का बनारस है, जिनका प्रेम फेसबुक की दीवारों पर परवान चढ़ता है। जिनकी आशाएँ-आकांक्षाएँ जमीन से उखड़ी नहीं हैं, पर हर तरह के सामाजिक बन्धनों को तोड़ने का दम-खम रखती हैं। नायक (विकी कौशल) मसान (शमशान का अपभ्रंश) में चिताएं सजाने-जलाने वाले एक डोम परिवार से सम्बन्ध रखता है। स्थानीय कालेज से सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा लेने के बाद शायद वो इस पेशे से अलग भी हो जाए, पर आज उसे अपने परिवार का हाथ बँटाने में तनिक गुरेज़ नहीं। प्यार के मामले में भी नायक अपनी कमजोरियां बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेता है। 

नायिका (रिचा चढ्ढा) को अपने प्रेमी के साथ एक होटल के कमरे में सेक्स करते हुए पकड़े जाने का कोई मलाल नहीं, हालांकि इस पूरे मामले को सनसनीखेज बनाने की पुलिस की कोशिशों से अब उसकी जिंदगी इतनी आसान नहीं रही पर उसके वजूद को तोड़ना अब भी कोई हंसी खेल नहीं। 'मसान' जिन्दगी, मौत और उसके बीच की तमाम बातों का एक सीधा सा दिखने वाला पर जटिल लेखा-जोखा है। मसान में चिता जलाते किरदार जब मुर्दा शरीर के अंगों के साथ खेलते नजर आते हैं, मौत जिन्दगी से हलकी लगने लगती है। 'दु: खतम क्यों नहीं होता, रे?" कहकर जब नायक का सब्र पीड़ा के आगे घुटने टेक देता है, तब भी जिन्दगी ही हारती दिखती है, पर अभी सब कुछ खतम नहीं हुआ है। जिन्दगी अब भी बाकी है। 

'मसान' की खूबसूरती, 'मसान' का तिलिस्म वरुण ग्रोवर की काबिलियत का तानाबाना है। एक ऐसी कलम जो हिन्दी साहित्य-उर्दू शायरों के सहन में पली-बढ़ी है और उनका कर्ज़ उतारने की ईमानदार कोशिश करती है। दुष्यन्त कुमार की 'तू किसी रेल सी गुजरती है' से लेकर डा. बशीर बद्र और निदा फ़ाजली जैसे दिग्गजों का जिक्र भर फिल्म को एक अलग पहचान दे देता है। संवादों में बनारस साफ़ झलकता है। कर्मकांडी विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) हों या उनका चेला झोंटाकिरदार कहीं भी बनारसी होने की चीख-पुकार करते नहीं दिखते पर यकीनन जब आप अगली बार बनारस में होंगे, इन सभी को ढूंढते मिलेंगे। अभिनय में विकी कौशल अपने हाव भाव, लहज़े से पूरी तरह प्रभावित करते हैं। उनकी प्रेमिका की भूमिका में श्वेता स्क्रीन पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रही हैं। रिचा चढ्ढा अपने सधे अभिनय से हर दृश्य, हर भाव को खुद में आत्मसात कर लेती हैं। संजय मिश्रा तो हैं ही बेहतरीन।

अन्त में, 'मसान' नीरज घायवान को उन तमाम गिने चुने फिल्मकारों की श्रेणी में ला खड़ा करती है, जिनकी समझ जिन्दगी और सिनेमा के बारे में करीब करीब एक बराबर ही है, जो भली भाँति जानते हैं कि सिनेमा और जिन्दगी का संगम कब,कहाँ और कैसे होना चाहिए। 'मसान' अपनी संवेदनशीलता, समझ, साहित्यिक संदर्भों और सजीवता के साथ, बिना शक-बिना शर्त साल की सबसे अच्छी और सच्ची फिल्मों में से एक है। एक बार नहीं, एक बार और देखिए! (/)