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Friday, 24 November 2017

कड़वी हवा: एक जरूरी फिल्म, कड़वी दवा की तरह! [3.5/5]

किसानों की आत्महत्याएं अब अखबारों और समाचारों की सुर्खियाँ नहीं बटोर पातीं. खबर देने की गरज़ से किसी कोने-किनारे में जगह मिल भी जाती है, तो हम उसे पढ़ कर संवेदनाएं व्यक्त करने के नाम पर जीभ को उपरी तलुवे से तीन बार गिन कर चिपकाते हैं, छुड़ाते हैं और 'च्च, च्च, च्च' करने से ज़्यादे की ज़ेहमत भी नहीं उठाते. 'क्लाइमेट चेंज' की तो पूछिए ही मत! इस मुद्दे पर तो हमारा चिंतन, मनन और ज्ञान इतना सीमित है कि अप्रैल-मई में बेडरूम का एयर-कंडीशनर काम न करे, 'ग्लोबल वार्मिंग' के प्रभाव तभी याद आते हैं. इन दोनों ही लिहाज़ से नील माधव पंडा की 'कड़वी हवा' एक निहायत ही अच्छी और जरूरी फिल्म है. बंजर हो चले किसानों के रूंधे, सूखे गलों में घुटती चीखों, कराहों को सुन्न पड़ते कानों तक पहुंचाने में, 'कड़वी हवा' किसी कड़वी दवा की तरह ही पुरजोर असर करती है. 

बूढ़े बाबा (संजय मिश्रा) देख नहीं सकते, लेकिन हवा की खूब परख है उनको. कहते हैं, "आजकल हवा कुछ बीमार चल रही है". स्कूल में मास्टरजी पूछते हैं, "मौसम कितने होते हैं?"; बच्चे को दो ही पता हैं, सर्दी और गर्मी. बरसात तो वैसे भी कभी कभी ही होती है, कभी कभार सर्दी में, तो कभी गर्मी में. यहाँ खेतों में फसल कम उगती है, सरकारी कर्जों पर ब्याज़ अनचाही, मनमौजी बेल की तरह बढती ही रहती है. मोपेड पर बैंक का सरकारी एजेंट गन्नू (रनवीर शौरी) यमराज की तरह सबके हिसाब-किताब लेकर घूमता रहता है. बाबा के बेटे मुकुंद के सर का क़र्ज़ भी 25 हज़ार से बढ़कर 42 हज़ार तक पहुँच गया है. बाबा डरते हैं, कहीं रामसरन जैसे दूसरे किसानों की तरह ही उनका बेटा भी...!

सूखे, बंजर और रेतीले ज़मीनी समन्दर में लाठी टेकते-टेकते भटकते हुए बूढ़े बाबा के किरदार में संजय मिश्रा बहुत कम बोलते हैं, और सिर्फ जरूरत का ही बोलते हैं, पर उनके अन्दर की कराह, बदलते मौसम और कर्जे में डूबे परिवार की परवाह आपको हर वक़्त, हर फ्रेम में सुनाई देती है. बाप-बेटे में बातचीत नहीं होती, ऐसे में एक दिन बेटा बाबा को घर से बिना बताये बाहर जाने के लिए डांटता है, और बाप सिर्फ इतने से खुश कि इसी बहाने आज मुकुंद ने उनसे बात तो की. संजय मिश्रा इस भूमिका को कुछ इस हद तक परदे पर जीवंत रखते हैं कि आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं, आखिरकार एक नेत्रहीन किरदार के रूप में इतना सजीव अभिनय आपने आखिरी बार किसका, कब और कहाँ देखा था? 'चौरंगा' के धृतिमान चटर्जी मेरे ज़ेहन में तुरंत आ जाते हैं. 

कुछ ऐसा ही कमाल रनवीर शौरी भी कर गुजरते हैं. हालाँकि उनके किरदार की बोलचाल पहले पहल आपको अटपटी सी लगती है, पर धीरे-धीरे जब आप पर उनके उड़िया होने का खुलासा ज़ाहिर होता है, आप उनके किरदार के साथ बेपरवाह जुड़ने लगते हैं. तिलोत्तमा शोम चौंकाती हैं. कुछेक दृश्यों में उनका अभिनय चेहरे के भावों का मोहताज़ भी नहीं रहता और अपना लोहा बड़ी मजबूती से मनवा जाता है. 

'कड़वी हवा' जिस ठहराव के साथ आपको खेतिहर किसानों की जिंदगी में उठते-बनते झंझावातों की तरफ धकेलती है, आप चाह कर भी उन ज़ज्बातों से अछूते नहीं रह पायेंगे. दृश्यों को सच्चाई के एकदम आसपास तक लाकर छोड़ जाने में नील माधव पंडा बखूबी सफल रहते हैं. गर्मी से बदहाल सरकारी बैंक के कर्मचारी बनियान में ही अपना काम निपटा रहे हैं. पैसों की वसूली के लिए यमराज बने घूमते गन्नू पर भी दूधवाले का दो महीने से पैसा उधार है. इसी संजीदगी के साथ 'कड़वी हवा' पहले तो आपको किरदारों से जोड़ती है, फिर उनकी कहानी का हिस्सा बनने का पूरा-पूरा मौका देती है, ताकि अंत तक आते-आते जब एक नाटकीय मोड़ के सहारे आपको फिल्म और कहानी के मुख्य खलनायक (क्लाइमेट चेंज) से रूबरू होना पड़े, तो न सिर्फ आप सिहर उठें, बल्कि थिएटर छोड़ते-छोड़ते इस बेहद जरूरी मुद्दे को कम आंकने की भूल से भी बचें. [3.5/5]                

Friday, 22 September 2017

न्यूटन: लोकतंत्र का तमाशा! सिनेमा का जश्न! [4.5/5]

चुनावों के वक़्त टीवी चैनलों और अखबारों में, नाखूनों पे लगी स्याही दिखाते जोशीले चेहरों की तस्वीरें कितने फ़क्र से भारत में लोकतंत्र की बहाली, चुनावों की कामयाबी और जनता के प्रतिनिधित्व का सामूहिक जश्न बयाँ करतीं हैं. ऐसा ही एक दृश्य अमित मासुरकर की 'न्यूटन' में भी है, मगर जब तक फिल्म में ये दृश्य आता है, आँखों के आगे से सारे परदे गिर चुके होते हैं, आसमान से झूठ के बादल छंट चुके होते हैं और अब उन्हीं चेहरों से भारत में लोकतंत्र की खोखली इमारत का सच टुकुर-टुकुर झाँक रहा होता है. ठीक वैसे ही, जैसे किसी बच्चे को खिलौना दिखाकर उसके हाथ में सिर्फ खाली पैकेट थमा दिया गया हो. 'न्यूटन' बिना शक आज के राजनीतिक माहौल और सरकारी तंत्र की खामियों पर एक सही, सीधी और सटीक टिप्पणी है.  

सोते हुओं को जगाने के लिए, 'न्यूटन' छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र दंडकारण्य को अपनी प्रयोगशाला बनाती है. स्थानीय प्रत्याशी की हत्या के बाद क्षेत्र में दुबारा चुनाव कराये जा रहे हैं, सेना की देखरेख में. नौजवान चुनाव अधिकारी (राजकुमार राव) अपने नाम की तरह ही अजीब है, अजब है, अकडू है. अपना नाम न्यूटन उसने खुद ही रखा था, नूतन कुमार से बदल कर. 'आई वांट टू मेक अ डिफरेंस' वाली फैक्ट्री से निकला है, घोर ईमानदारी का पुतला है. सिर्फ 76 मतदाताओं वाले पोलिंग बूथ पे चुनाव कराना कौन सी बड़ी बात है, मगर आर्मी अफसर आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) का डरना-डराना भी जायज़ है. ये वो इलाका है, जहां के बारे में टीवी स्टूडियोज में बैठे सूट-बूट वाले न्यूज़ एंकर्स को ज्यादा पता है, और उनकी चीख-चिल्लाहट में हमने भी काफी कुछ सुन (ही) रखा है. "अपने ही लोग हैं, अपने ही लोगों के खिलाफ हैं", "देशद्रोही हैं स्साले, देश बांटने की मांग करते हैं", "चींटी की चटनी खाते हैं, बताओ!", वगैरह, वगैरह. 

खैर, 'न्यूटन' किसी भी तरह और तरीके से नक्सल की समस्या पर पक्ष-विपक्ष का पाला चुनकर बैठ जाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि फिल्म के समझदार और ईमानदार नजरिये की वजह से आप जरूर अपने आप को इस दुविधा में अक्सर लड़खड़ाते हुए पाते हैं. लोकल बूथ लेवल ऑफिसर मलको (अंजलि पाटिल) जब भी बातों-बातों में वहाँ के लोगों की बात सामने रखती है, आपके नजरिये को एक ठेस, एक धक्का जरूर लगता है. आत्मा सिंह जब बन्दूक न्यूटन के हाथ में थमा कर कहता है, 'ये देश का भार है, और हमारे कंधे पर है'; या फिर जब विदेशी रिपोर्टर पूछती है, 'चुनाव सुचारू रूप से चलाने के लिए आपको क्या चाहिए?" और उसका जवाब होता है, "मोर वेपन (और हथियार)!"; वो आपको खलनायक नहीं लगता, बल्कि आपको उसकी हालत और उसके हालात पर दया ज्यादा आती है. वो भी उसी सिस्टम का मारा है, और महंगा जैतून का तेल खरीदते वक़्त उसके माथे पर भी शिकन आती है.  

फिल्म के एक दृश्य में गाँवों से लोग मतदान के लिए जुटाए जा रहे हैं, और बराबर के दृश्य में एक महिला काटने-पकाने के लिए मुर्गियां पकड़ रही है. 'न्यूटन' इस तरह के संकेतों और ब्लैक ह्यूमर की दूसरी ढेर सारी मिसालों के जरिये आपका मनोरंजन भी खूब करती है, और आपको सोचने पे मजबूर भी. आत्मा सिंह नाश्ता करते हुए कहता है, "बड़ी इंटेंरोगेशन के बाद मुर्गियों ने अंडे दिये हैं". न्यूटन के पूछने पर कि क्या वो भी निराशावादी है?, मलको टन्न से बोल पड़ती है, "मैं आदिवासी हूँ'. खंडहर पड़े प्राइमरी स्कूल में बने बूथ में सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे-बैठे लोगों के आने का इंतज़ार कर रहे हैं, माहौल शांत है, पर धीरे-धीरे आपको सरकारी तंत्र और खोखले दावों की चरमराहट सुनाई देनी शुरू हो जाती है.

इतने सब उथल-पुथल और खामियों के बावज़ूद, 'न्यूटन' एक आशावादी फिल्म बने रहने का दम-ख़म दिखाने में सफल रहती है. न्यूटन की ईमानदारी, उसकी साफगोई, बदलाव के लिए उसकी ललक कहीं न कहीं आपको उसकी तरफ खींच कर ले जाती है. ऐसे न्यूटन अक्सर सरकारी दफ्तरों में किसी अनजाने टेबल के पीछे दफ़न भले ही हो जाते हों, उनकी कोशिशों का दायरा भले ही बहुत छोटा रह जाता है, पर समाज में बदलाव की जो थोड़ी बहुत रौशनी बाकी है, उन्हीं से है. ठीक 9 बजे ऑफिस आ जाने वालों पर हँसते तो हम सभी हैं, पर शायद ऐसे न्यूटन भी उन्हीं में से एक होते हैं. फिल्म में ट्रेनर की भूमिका में संजय मिश्रा फरमाते हैं, "ईमानदार होके आप कोई एहसान नहीं कर रहे, ऐसा आपसे एक्सपेक्टेड है'. कम से कम फिल्म इस कसौटी पर सौ फीसदी सही साबित होती है.

राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी की बेहतरीन अदाकारी, रघुवीर यादव, अंजलि पाटिल और संजय मिश्रा के सटीक अभिनय और मयंक तिवारी के मजेदार संवादों से लबालब भरी 'न्यूटन' साल की सबसे अच्छी फिल्म तो है ही, अपने विषय-वस्तु की वजह से बेहद जरूरी भी, और 'उड़ान', 'आँखों-देखी', 'मसान' जैसी नए भारत के नए सिनेमा की श्रेणी और शैली की मेरी पसंदीदा, चुनिन्दा फिल्मों में से एक. [4.5/5]       

Friday, 1 September 2017

बादशाहो: 'डिसअपॉइंटमेंट, डिसअपॉइंटमेंट, डिसअपॉइंटमेंट'! [1.5/5]

महीने भर के अंतर पर ही, 'बादशाहो' दूसरी ऐसी फिल्म है जो सन् 1975 में इंदिरा गांधी सरकार के आपातकाल को अपनी कहानी का आधार बनाती है. मधुर भंडारकर की 'इंदू सरकार' ने परदे पर जहां सिनेमा के शऊर, सिनेमा की तमीज को कठघरे में ला खड़ा कर दिया था; मिलन लूथरिया ने 'बादशाहो' के साथ तो जैसे मनोरंजन पर ही इमरजेंसी लागू कर दी. 'द डर्टी पिक्चर' से 'एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, और एंटरटेनमेंट' का जाप करने वाले मिलन अपने फिल्म-राइटर रजत अरोरा के साथ मिलकर मसालेदार मनोरंजन के नाम पर इस बार जो कुछ भी बासी, पुराना और सड़ा हुआ परोसते हैं, उसे सवा दो घंटे तक झेलना दर्शकों के लिए खुद किसी 'आपातकाल' से कम नहीं है. 

दिमाग़ी दिवालियेपन से निकली 'बादशाहो' की कहानी जयपुर की महारानी गायत्री देवी और उनसे जुड़े तमाम सुने-सुनाये किस्सों से उधार लेकर लिखी गयी है. संजय गांधी जैसी शक्ल और तेवर वाले नेता संजीव (प्रियांशु चैटर्जी) की बुरी नज़र पहले महारानी गीतांजली देवी (इलियाना डी'क्रूज़) और अब उनके इनकार के बाद, उनके पुश्तैनी खजाने पर है. सरकार, जब्त करने के बाद, सारा सोना एक आर्मी ट्रक में भर कर जयपुर से दिल्ली के लिए निकल पड़ी है. सरकार और सेना के हाथों से सोना वापस लूटने के लिए रानी साहिबा मदद लेती हैं अपने ही वफादार भवानी (अजय देवगन) और उसके साथियों (इमरान हाश्मी, संजय मिश्रा) की. उधर सोने की हिफाजत के लिए मुस्तैद है जाबांज अफसर सहर सिंह (विद्युत् जामवाल). इसके बाद शुरू होता है वो सब कुछ, जो दशकों पहले आप वीएचएस (VHS) के ज़माने में जरूर देख चुके होंगे. 

मिलन-रजत की जोड़ी पहले भी अपने आप को दोहराती आई है. तालियों की भूखी लाइनों और शोरगुल से भरे एक्शन दृश्यों वाली फिल्मों को औसत दर्जे के अभिनय से सजा-सजा के ऐसी कहानियों को परदे पर लाना, जिनकी सारी खामियों को 'मसाला' कह के आसानी से बॉक्स-ऑफिस पर चलाया जा सके. रजत की हर लाइन में 'पंच' रचने की कोशिश इस बार औंधे मुंह गिरती है, जब हर किरदार 70s के गंवई खलनायकों और हास्य-कलाकारों की तरह बार-बार एक ही लाइन 'तकियाकलाम' की शक्ल में बोलता रहता है. फिल्म की कहानी में लॉजिक या तर्क की रत्ती भर भी गुंजाईश नहीं दिखती. पूरे महल की तलाशी को महज़ कुछ पांच-सात लोगों से अंजाम दे दिया जाता है, सन् 75 के जमाने में 'वो उन्हें जरूर कॉल करेगी' जैसी गलतियां भर-भर के हैं, इमरजेंसी के दौर में भी आइटम-नंबर की जगह और इन सबसे ऊपर डकैती के कुछ बुनियादी उसूल. फिल्म में डकैती को अंजाम तक पहुंचाने में जितनी रुकावटें, जितनी बाधाएं बताई जा रही हों, सबको एक-एक करके पार करने की जद्दोजेहद. 

अभिनय में अजय देवगन सीधे विमल गुटखे के विज्ञापन से निकल कर राजस्थान लाये गए लगते हैं. हाँ, गंभीर अभिनय के नाम पर उनके किरदार में हंसी-ठिठोली की कमी भरपूर रखी गयी है. सेक्सिस्म का लबादा ओढ़े हाशमी अपनी पुरानी हरकतों के बदौलत ही फिल्म में रेंगते नज़र आते हैं. संजय मिश्रा ही हैं, जो इस डूबती फिल्म में पत्ते की तरह बहते हुए थोड़ा बहुत हास्य उत्पन्न कर पाते हैं. इलियाना और जामवाल परदे पर थोड़ा स्टाइल जरूर बिखेर पाते हैं. फिल्म में इस्तेमाल राजस्थानी बोली उतनी ही नकली लगती है, जितनी फिल्म की कहानी में इमरजेंसी का मुद्दा. अंत तक आते-आते फिल्म इतनी वाहियात हो जाती है कि टिकट पर खर्च किये 150-200 रूपये भी आपको बड़ी लूट की तरह झकझोर देती है.

आखिर में; जिस फिल्म का टाइटल ही बेमतलब, बकवास और सिर्फ बोलते वक़्त वजनी लगने की गैरत से रख दिया गया हो, फिल्म की कहानी से कुछ लेना-देना न हो, उस फिल्म से बनावटीपन और थकाऊ मनोरंजन के सिवा आप चाहते भी क्या थे? तकलीफ ये है कि लाखों (उस वक़्त के हिसाब से) के सोने की कीमत और अहमियत बार-बार बताने वाली 'बादशाहो', अपनी चीख-पुकार, चिल्लाहट से सोने के असली सुख से भी आपको वंचित रखती है. वरना सवा दो घंटे की नींद भी कम फायदे का सौदा नहीं होती! [1.5/5]

Friday, 24 March 2017

अनारकली ऑफ़ आरा (A): बेख़ौफ़, बेपरवाह, तेज़-तर्रार...फिल्म भी, स्वरा भी! [4/5]

‘नाच’ या इस तरह की और दूसरी लोकविधाएं, जिनमें लड़कियां मंच पर सैकड़ों की भीड़ के सामने द्विअर्थी गानों पे उत्तेजक लटके-झटके दिखाती हैं; राजस्थान, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार में काफी लोकप्रिय हैं. हमारी फिल्मों ने भी ‘आइटम सॉंग’ के तौर पर इस का पूरा पूरा दोहन किया है. ऐसे तमाम विडियो आपको इन्टरनेट पर देखने को मिल जायेंगे, जहां अक्सर ‘अश्लीलता’ का सारा नैतिक ठीकरा हम ऐसे ‘नचनियों’ पर फोड़ कर उनके ठीक सामने हवस में लिपटे, लार टपकाते मर्दों की जमात को भूल जाते हैं. चाहे मंच पर वो अपने आप को कितना भी ‘कलाकार’, ‘सिंगर’ या ‘डांसर’ मानने और मनवाने की कोशिश करते रहें, हममें से ज्यादातर के लिए हैं तो वो ‘रंडियां’ ही. और ‘रंडियों’ की मर्ज़ी कौन पूछता है? हम मर्द तो बस्स ‘कीमत’ लगाना जानते हैं, उनके जिस्म की कीमत, उनके वक़्त की कीमत, उनके वजूद की कीमत. एक घंटे का इतना, एक रात का इतना!

अनरकलिया (स्वरा भास्कर) आरा जिल्ला की सबसे मशहूर कलाकार है. शादी-बियाह के मौके पर उसका प्रोग्राम न हो, तो सब मज़ा किरकिरा. चाहने वालों में इलाके के थानेदार से लेकर स्थानीय यूनिवर्सिटी के दबंग वीसी (संजय मिश्रा) तक, सबके नाम शामिल हैं. ‘साटा’ पर नाचने-गाने वाली को सब अपनी ‘प्रॉपर्टी’ समझते हैं. वीसी साहब तो इतना ज्यादा कि मंच पर ही उसके साथ जबरदस्ती करने लगते हैं. अनरकलिया देती है एक रख के, वहीँ के वहीँ, उसी वक़्त! हालाँकि वो खुद कबूलती है कि वो कोई सती सावित्री नहीं है, पर मर्ज़ी पूछे जाने का हक़ सिर्फ सती सावित्रियों के ही हिस्से क्यूँ? अनारकली शायद हालिया हिंदी फिल्मों की सबसे सच्ची सशक्त महिला किरदार है. ‘नायिका’ बन कर उभरने के लिए, वो लेखक के पूर्व-नियोजित नाटकीय दृश्यों की मोहताज़ नहीं है, ना ही अविनाश उसे कभी इतना असहाय और कमज़ोर पड़ने ही देते हैं. गुंडों से भागते-भागते थककर, जब वो हाथ में टूटी चप्पल पकड़े रेलवे स्टेशन पर भटक रही होती है, तब भी उसे कहीं से भी कमज़ोर आंकने की गलती आप नहीं करते! उसके ताव बनावटी नहीं हैं, उसकी ताप ढुल-मुल नहीं है.

पिछले साल की ‘पिंक’ ने जिस ‘ना’ की आग को बड़ी बेबाकी से परदे पर हवा दी थी, अविनाश दास की ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ उसी आग को एक बार फिर धधका देती है, पर इस बार पहले से कहीं ज्यादा बेख़ौफ़, बेपरवाह और झन्नाटेदार तरीके से! अविनाश एक नयी धारदार आवाज़ की तरह अपने शब्दों, अपने चित्रों और अपने किरदारों के साथ आपको हर पल बेधते रहते हैं. फिल्म बनाते वक़्त अक्सर बड़े-बड़े नामचीन निर्देशक फ्रेम सजाने का मोह छोड़ नहीं पाते. ‘रियल’ गढ़ने के दबाव में, परदे पर कुछ बेतरतीब भी दिखाना हो, तो थोड़ा सलीके से. पर अविनाश इन बन्धनों से मुक्त दिखते हैं. उनका एक किरदार जब दूसरी महिला किरदार से बदतमीज़ी कर रहा होता है, जब कुछ इतना बेरोक-टोक होता है कि आप अन्दर से दहल जाते हैं. मुट्ठियाँ अपने आप भींच जाती हैं. मल्टीप्लेक्स के ज़माने में, ऐसा कभी-कभी ही होता है. इस एक फिल्म में कई बार होता है.

अनारकली ऑफ़ आरा’ में स्वरा भास्कर एक ज्वालामुखी की तरह परदे पर फटती हैं. अपने किरदार में जिस तरह की आग और जिस तरीके की बेपरवाही वो शामिल करती हैं, उसे देखकर आप उनके मुरीद हुए बिना रह नहीं सकते. ये उनका तेज़-तर्रार अभिनय ही है, जो इस फिल्म के ‘साल के सबसे पावरफुल क्लाइमेक्स’ में आपके रोंगटे खड़े कर देता है. अनारकली का ‘तांडव’, अभिनेत्री के तौर पर स्वरा भास्कर का ‘तांडव’ है. इसके बाद अब शायद ही आप उनके अभिनय-कौशल को शक की नज़र से देखने की भूल करें! स्वरा का अभिनय अगर ‘एक्टिंग’ के सिद्धांत को मज़बूत करता है, तो पंकज त्रिपाठी अपने तीखे और तेज़ प्रतिक्रियात्मक अभिनय से चौंकाते और गुद्गुदाते रहते हैं. नाच-नौटंकी में मसखरे सूत्रधार की भूमिका में उनका आत्म-विश्वास खुल के और खिल के सामने आता है. उन्हें परदे पर देखते हुए उनकी सामाजिक और पारिवारिक पृष्ठभूमि का ख्याल कर के, आप उनके प्रति आभार और सम्मान से भर उठते हैं. संजय मिश्रा का अभिनय इन सबमें सबसे नाटकीय लगता है, अपने ‘कैरीकेचर’ जैसे किरदार की वजह से!

आखिर में, ‘अनारकली ऑफ़ आरा’ तरह-तरह के (अच्छे, बुरे) मर्दों से भरी एक ऐसी गज़ब की फिल्म है, जिसमें एक औरत ‘नायिका’ बन के उभरने का इंतज़ार नहीं करती, और ना ही ‘नायिका’ बनने के तुरंत बाद वापस अपने ढर्रे, अपने सांचे, अपने घोंसले में लौट जाने का समझौता! अविनाश दास से शिकायत बस एक ही रहेगी कि काश, ये फिल्म, अपनी पृष्ठभूमि और बोल-चाल, लहजे की वजह से, भोजपुरी भाषा में बनी होती या बन पाती! कम से कम, उस डूबते जहाज़ के हिस्से एक तो मज़बूत हाथ आता, जो उसे अकेले किनारे तक खींच लाने का दमख़म रखता है! (4/5)

Friday, 15 July 2016

ग्रेट ग्रैंड मस्ती (A): एक बचकानी एडल्ट कॉमेडी, आपके ‘उस’ व्हाट्स ऐप ग्रुप के लिए! [1/5]

बॉलीवुड में फिल्म-प्रमोशन का दौर एक ऐसा जादुई वक़्त होता है, जब फिल्म से जुड़े तमाम लोगों में अचानक ‘दैवीय ज्ञान’ का संचार होने लगता है. अपनी फिल्म को अच्छी बताने और बता कर बेचने में मैंने अक्सर बड़े-बड़े ‘सिनेमा-विशेषज्ञों’ को गिरते देखा है. खैर, ‘इट्स ऑल पार्ट ऑफ़ द जॉब’. हालाँकि ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ को बेचते हुए निर्माता-निर्देशक इन्द्र कुमार काफी हद तक सच के साथ खड़े दिखते हैं. उनका कहना है, “अगर हम एडल्ट जोक्स आपस में कह-सुन सकते हैं तो परदे पर एडल्ट कॉमेडी क्यूँ नहीं”. दुरुस्त, पर दुर्भाग्य ये है कि इन्द्र कुमार साब एडल्ट कॉमेडी के नाम पर उन्हीं बासी, घिसे-पिटे एडल्ट जोक्स को बार-बार हमारे सामने परोसते हैं, जिन्हें हम और आप अपने ‘व्हाट्स ऐप ग्रुप’ में पढ़ते ही डिलीट कर देते हैं. सिनेमा डिलीट नहीं होता. और अगर ये सिनेमा है तो काश सिनेमा डिलीट हो सकता! ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ एक उबाऊ, पकाऊ और झेलाऊ फिल्म है, जहां हंसाने के नाम पर बद्तमीजियां ज्यादा होती हैं और फूहड़पन हर तरफ बिखरा पड़ा है.

मस्ती’ अगर बॉलीवुड में एडल्ट कॉमेडी के एक नए दौर की शुरुआत थी तो ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ को अंत मान लेना चाहिए, क्यूंकि इसके आगे अब बस ‘पोर्न’ ही बचता है. ऐसा नहीं है कि मैं पोर्न फिल्मों के खिलाफ़ हूँ पर तब वो खांटी तौर पर एक नया मुद्दा होगा बहसबाजी और अवलोकन के लिये. एडल्ट कॉमेडी में अक्सर द्विअर्थी कहावतों और ‘वन-लाइनर्स’ की भरमार होती है. ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ में द्विअर्थी कुछ भी नहीं. यहाँ सबका मतलब साफ़ और एक ही है. फिल्म में अगर ‘मेरा खड़ा है’, ‘इसका छोटा है’, ‘मुझे करना है’ जैसे संवाद बोले जाते हैं, तो दादा कोंडके साब की तरह उन संवादों के आगे-पीछे किसी तरह को कोई एक्सप्लेनेशन जोड़ कर आपको चौंकाया नहीं जाता, बल्कि उनका सीधा मतलब आपके शारीरिक अंगों और यौन-क्रियाकलापों की तरफ ही होता है. जाहिर है, इसमें हँसी आने की कहीं कोई गुंजाईश नहीं बचती. बात सिर्फ संवादों तक ही रुक जाती तो गनीमत होती, यहाँ तो लेखक और निर्देशक उन तमाम अंगों-प्रत्यंगों को ‘कुचलने, काटने, कूटने’ तक पर उतर आते हैं. और हम लोग अनुराग कश्यप को सबसे ‘हिंसक’ फिल्म-निर्देशक का तमगा देने पर आमादा है, कैसी विडंबना है!

अमर, प्रेम और मीत [रितेश, विवेक और आफ़ताब; मुझे फर्क नहीं पड़ा कि किसका क्या नाम है] अपने-अपने वैवाहिक जीवन में ‘सेक्स-सुख’ न मिलने की वजह से ‘बाहर की बिरयानी’ खाने का मन बना चुके हैं. प्लान के मुताबिक तीनों रितेश के गाँव उसके वीरान बंगले को बेचने की नीयत से आते हैं. इस वीरान बंगले में एक भूत का कब्ज़ा है, भूत वो भी हद्द खूबसूरत [उर्वशी रौतेला] और 50 साल से मर्दों के लिए प्यासी. आप सोच रहे होंगे, टेंशन क्या है? पर नहीं, पहले तो ये तीनों भूखे भेड़िये (उनकी एक्टिंग देख कर तो कम से कम ऐसा ही लगता है) आपस में ‘मे बेस्ट मैन विन’ की रेस लगाने लगते हैं और बाद में भूत की शर्त. कुल मिलाकर आपको 2 घंटे 10 मिनट तक बेवकूफ बनाये रखने का पूरा इंतज़ाम यहाँ मौजूद है. कहने की बात नहीं है कि अंत में सारे मर्द ‘लौट के बुद्धू घर को आये’ और ‘सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते’ जैसे कहावतों की बिला पर साफ़ बरी हो जाते हैं.

अभिनय की नज़र से ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ एक बहुत जरूरी फिल्म है, उन लोगों के लिए ख़ास जिन्हें परदे पर कभी न कभी इंसानों के पूर्वजों की भूमिका करने में दिलचस्पी रही हो. ‘फैरेक्स-बेबी’ आफ़ताब इस लिहाज़ से काफी मजबूत कलाकार हैं. उनकी उछल-कूद देखकर मन में कोई दुविधा नहीं रह जाती. विवेक थोड़े पीछे रह जाते हैं. रितेश इस तरह की भूमिकाओं में ‘पदमश्री’ लेकर ही मानेंगे. उर्वशी रौतेला गानों में अपना जौहर ज्यादा बखूबी से पेश करती हैं, अभिनय में उनका सफ़र अभी काफी लम्बा और काटों भरा है. उषा नाडकर्णी और संजय मिश्रा पर हँसी कम, तरस ज्यादा आता है. फिल्म का सबसे दमदार दृश्य मेहमान भूमिका में सुदेश लाहिरी के हिस्से आता है, जहां वो रामसे ब्रदर्स और उनकी तमाम भूतिया फिल्मों पर छींटाकशी करते नज़र आते हैं. दिलचस्प बात ये है कि वो खुद उन्हीं फिल्मों के ‘लालटेन वाले चौकीदार’ की भूमिका में हैं.

ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ के एक मार-धाड़ वाले दृश्य में एक आदमी उड़ता हुआ मशहूर पेंटर Vincent van Gogh की पेंटिंग के ऊपर आ गिरता है. कला और सिनेमा पर ये फिल्म उसी तरह का एक निर्मम प्रहार है. इनका बंद होना तो नाजायज़ और नामुमकिन है; उम्मीद करता हूँ इन पर हंसने वालों की तादात थोड़ी कम हो. बहरहाल, मस्ती के नाम पर ये है एक गन्दी, सस्ती और बचकानी फिल्म! [1/5]    

Friday, 29 April 2016

BAAGHI: Rebel with a Cause to Irritate! [1.5/5]

Change is constant but not for Indian Railways. In 1955, Sunil Dutt starrer RAILWAY PLATEFORM became an eyewitness to passengers of every kind being stranded at a deserted railway station for 24 hours when their train gets delayed due to some natural calamity. Decades later, it strikes again. This time, in Sabbir Khan’s BAAGHI! The train stops at a local station and declines to move ahead before the girl meets the boy, both show off their moves in a rain-dance, the villain gets introduced and even the lovebirds gets separated then and there to wrap up the chapter. All I can say is that things if not moving really hurt; be it the Indian railways or an emotionless story. BAAGHI is a romantic action-entertainer that irritates you more with regular romance, repetitive action and regrettable comedy track.

A vague mash-up of Telugu movie VARSHAM and the Indonesian path-breaking action thriller THE RAID: REDEMPTION; BAAGHI solely rests upon the all muscular, flexible and flashy shoulders of Tiger Shroff. Though limited in his talents on/for screen, Tiger is the only best thing happened to the film, apart from some of the magical visuals from southern India captured by ace-cinematographer Binod Pradhan.

BAAGHI has its own share of futility in romance and action both. Ronny [Tiger Shroff] falls in love with Siya [Shraddha Kapoor] instantly after watching her in a one-sided conversation with clouds. She loves rain, you know. And apparently whenever they meet, it starts raining. Who would not fall for such a phenomenal guy at such times when people in nation are dying while waiting for the rain? God must be really romantic, and carelessly crazy. Meanwhile, the villain also seems to have an eye for the girl loving rain. Raghav [Sudheer Babu] does everything in the villain’s textbook to get the girl, from killing his own father to kidnapping the girl and making various attempts to eliminate the boy.

Sabbir Khan makes an interesting and quite effective addition to the film in form of Kalaripayattu- a traditional martial art from Kerala. Till the time the film revolves around the institution Ronny has been placed in to learn the art, it never actually sees a dull moment but soon, Sabbir runs out of ideas and starts focusing on the tiring traditional concept of romance with all the dialoguebaazi and action. You can imagine the maker’s vision behind making this film when the opening credit roll reads ‘Chartered Accountant’ & ‘Financial Advisor’ slides way before the creative minds could get a mention.

Tiger gives it all when it comes to using his muscular strength, balance and will-power much-needed for some brilliantly choreographed action sequences but his trouble in moving facial muscles takes out all the empathy the boy earns for himself. Shraddha Kapoor too gets a few ass-kicking action-scenes on her part to impress. Sudheer Babu despite his effortless martial art moves, looks more like a slightly better version of Sachiin Joshi [Who?? Exactly]. Sunil Grover and Sanjai Mishra are a complete waste of talents. Sunil though gives you some quick chills as a scheming father to Shraddha’s character. Kalaripayattu Guru Grandmaster Shifu Shaurya Bhardwaj makes a fiery appearance on screen.

To sum up, BAAGHI comes out as a stale reproduction of 80’s/90’s idea of romance. A leech and lewd father ready to exploit his own daughter for financial profits, a powerful villain who stops at nothing and an obviously emotional hero who manages to rise up from the dust and hits back when the villain pushes him hard emotionally by disclosing the last hidden secret, “I killed him, you fool”! Good luck to you, if it suits your idea of entertainment! [1.5/5]

Friday, 18 December 2015

DILWALE: Guns and Roses, Jammed and Wilted! [2/5]

Imitation is the sincerest form of flattery. Pretending is ridiculous. I really wonder how could someone disregard this golden rule of comedy and still call himself a master of the same. Rohit Shetty’s DILWALE suffers heavily from this exact syndrome where almost everyone involved with the project pretends to be someone else. Rohit acts [behind the camera, as director] as if he’s none less than Late Mukul Anand. Varun Dhawan makes faces as if he’s his dad’s favorite Govinda. Kajol and Shahrukh pretend comfortably to be in a love-story within a comedy within an action thriller [Now you know why Varun compares it with INCEPTION. Yeah, he did. You heard it right!]. The film itself lives in a make-believe world to be a HUM (1991) in plot-construction and DDLJ (1995) in promotional gimmicks. And pretending is ridiculous, I tell you. So, the only two who don’t fall in the pit are Pankaj Tripathi and Sanjay Mishra; one plays a character [where mosts play their aura] and the other does a spick and span imitation of Jeevan Saab.

DILWALE settles its base in Asian Paints sponsored Buenos Aires, Venice and Charleston parts of Goa. Kids here if not driving modified multihued cars, sure would find themselves in a clash for ‘tera laal mere laal se jyada laal kaise?’. Raj [Shahrukh Khan] with his younger brother Veer [Varun Dhawan] runs a Dilip Chhabria inspired garage-cum-design factory and stays mostly as calm as Aloknath in any Barjatya film. Well, mostly. Soon, you find him throwing professional punches on 10-12 goons in a Shahenshah-like working module at nights to ensure audiences that the guy definitely has a dark past behind. Plot gets thicken when Veer meets Ishita [Kriti Sanon] and Raj discovers that the girl is the younger sister of his ex-flame Meera [Kajol]. The star-crossed lovers have many secrets to unravel including murders, betrayals and mix-ups.

So what if it belongs to an average formula of 90’s; DILWALE had a decent story to start with until Rohit Shetty starts promoting it as a great story. Bringing the best on-screen couple together after so long was alone a big pull for the film but Rohit couldn’t hold himself from polluting the same breezy idea of romance with his colossal caring for flying cars, blasting cars, drifting cars, toppling cars and the very dry and dreary sense of slapstick comedy. Since when and why do the charm of Shahrukh and the flair of Kajol need substantial comic sub-tracks having Boman Irani, Johnny Lever, Varun Sharma and Mukesh Tiwari? The film’s high points are mostly with Kajol where she looked, acted and ruled the screen in same potion of intensity, integrity and beauty she’s been always admired for. DILWALE also fails to recreate the chemistry between Kajol and Shahrukh. Rohit does ensure that they both look their best on-screen but it all comes out as a lifeless still postcard and not as a lively moment to cherish.

On the performances, Shahrukh does exactly what he’s been doing in CHENNAI EXPRESS & HAPPY NEW YEAR. He charms the ladies, woos the fans, promotes brands and guarantees a ‘No risk’ cover for his producers [He himself is the one]. Varun Dhawan becomes pathetic, irritating and unbearable at times. Kriti is good, balanced and doesn’t disappoint. Varun Sharma is wasted, especially in a girlfriend-bashing monologue inspired by Kartik Aryan’s in PYAAR KA PUNCHNAMA. Kajol is the only redeemer here but in those tiresome and trivial 2 hr 34 min of total duration, trust me, even her spark begins to fade.

At last, Rohit Shetty’s DILWALE is another product that highlights the demand and supply rule in Bollywood. Why to waste time and money on hunt for a concrete story if you can easily make hefty lot of money by just arranging some hit formula-bricks, without even considering the right order it should be in. The film sees around 100 brand tie-ups on opening graphic-plates; I missed brands for pain-relief tablets there. Take a pill, before you try to chill in the theatre! [2/5]

Saturday, 19 September 2015

‘मेरठिया गैंगस्टर्स’: हम किसी से कम नहीं, पर कहानी में दम नहीं! [2.5/5]

‘गैंगस्टर’ सुनते ही मुंबई के ‘भाई लोग’ बिना इजाज़त लिए जेहन में खलबली मचाने लगते हैं. ‘सत्या’ के भीखू म्हात्रे से लेकर ‘वास्तव’ के रग्घू तक, बॉलीवुड हमेशा से इन टपोरियों-मवालियों और पंटर लोगों में अपनी कहानी के हीरो ढूंढता रहा है. जीशान क़ादरी इस चलन को तोड़ने की, या यूँ कहें तो एक नया चेहरा देने की कोशिश करते हैं. उनकी फिल्म ‘मेरठिया गैंगस्टर्स’, जैसा कि नाम से ही ज़ाहिर है, उत्तर प्रदेश के मेरठ और दिल्ली से सटे नोएडा के आस-पास के इलाकों को ही अपना गढ़ बनाती है. यहाँ बाप की कम पेंशन और मिडल-क्लास का रोना रोने वाले टपोरी नहीं होते. यहाँ होते हैं यूनिवर्सिटी हॉस्टल में कुर्सी-टेबल की तरह सालों से जमे हुए मुंहफट-अक्खड़-लड़ाकू ‘लौंडे’! यहाँ जो कुछ नहीं कर रहे होते, वो ‘लॉ’ कर रहे होते हैं. जल्दी और ज्यादा पैसे कमाने के लिए, कैरियर के नाम पर जिनके सामने दो ही आसान तरीके नज़र आते हैं, एक तो रियल इस्टेट का बिज़नेस और दूसरा ‘अगवाई’ यानी ‘किडनैपिंग’. जीशान अपनी पहली फिल्म में किरदारों के हाव-भाव, चाल-चलन और बोली पर तो अच्छी-खासी पकड़ बनाते दिखते हैं, पर फिल्म को बांधे रखने वाली एक अच्छी और मज़बूत कहानी की कमी उनके इस सराहनीय प्रयास को खोखला कर देती है.

मेरठ के ६ बेरोजगार [जयदीप अहलावत, आकाश दहिया, शादाब कमल, वंश भारद्वाज़, चन्द्रचूड़ राय और जतिन सरना] छोटी-मोटी छिनैती में तो पहले भी शरीक रहे हैं, पर जब नौकरी दिलाने वाली एक कंपनी के झांसे में आकर ठगे जाते हैं तो जाने-अनजाने फिरौती के धंधे में भी बोहनी कर बैठते हैं. फिर तो पीछे मुड़ के क्या देखना? हालात उस वक़्त रंग बदलने लगते हैं, जब उनकी उड़ान कुछ ज्यादा जल्दी ही आसमान छूने के ख्वाब देखने लगती है. लाखों की फिरौती अब करोड़ों में बदल गयी है और इन सब के बीच है एक पागल पुलिसवाला [मुकुल देव], जो अपने ऊपर वालों को भी दो-टूक सुनाने का कोई मौका नहीं छोड़ता.

‘मेरठिया गैंगस्टर्स’ में अगर कुछ है, जो इसे देखने लायक बनाता है तो वो हैं इसके किरदार. कहानी हालाँकि अपना असर बिलकुल नहीं छोडती, किरदार ही हैं जो आप तक रह जाते हैं. उनकी आम बोल-चाल का लहज़ा, उनके तेवर, उनका अख्खड़पन! फिल्म के एक दृश्य में गैंग का एक मेम्बर संजय फ़ोरेनर [अपने मेहंदी रंगे बालों की वजह से उसे ये नाम मिला है] अपने ही दोस्तों से खुद को गोली मरवाने की जिद पकडे बैठा है, क्यूंकि लड़की के बाप ने उसके खिलाफ़ पुलिस केस दर्ज करा दिया है, पर गैंग का लीडर टीवी पे क्रिकेट वर्ल्ड कप का मैच छोड़ना नहीं चाहता. और अंत में जब घटना को अंजाम देना है, तयशुदा गैंग-मेंबर उसे .22 की कम नुकसान पहुंचाने वाली बुलेट के बदले 303 की जानलेवा गोली दाग आता है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश का झूठा पुरुष अहंवाद भी इन सब में कहीं-कहीं साफ़ झलकता है. अपने लीडर को उसकी प्रेमिका के नाखूनों पे रंग लगाते हुए देखना, गैंग में सबके लिए आसान नहीं होता. फिल्म के संवाद कहीं भी, एक पल के लिए भी किरदारों से छूटते दिखाई नहीं देते.

जीशान डायरेक्शन के अपने इस पहले प्रयास में कैमरे और अभिनेताओं के साथ कई सफल प्रयोगों के साथ प्रभावित करते हैं. मसलन, दोपहर से लेके रात तक चलने वाले एक शूटआउट सीन में उन्होंने गाने और स्टॉप-मोशन तकनीक का बखूबी इस्तेमाल किया है. इसी तरह फिल्म की शुरुआत में कॉलेज कैंटीन के और अंत में जेल के अन्दर के दृश्यों में वन-शॉट सीन का प्रयोग भी सराहनीय है. जयदीप [‘गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर’ के शाहिद खान] और आकाश [तनु वेड्स मनु रिटर्न्स] उम्दा हैं. शादाब कमल [‘बी ए पास’] निराश करते हैं. संजय मिश्रा, मुकुल देव, ब्रजेन्द्र काला ठीक-ठाक हैं.

अंत में; ‘मेरठिया गैंगस्टर्स’ की कहानी में जीशान की वो धार कहीं दिखाई नहीं देती जिसकी उम्मीद उन्होंने ‘गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर’ से जगाई थी पर एक नए उभरते डायरेक्टर के रूप में वो पूरी तरह असफल भी नहीं होते. मजेदार किरदार और उन्हें आत्मसात करते अभिनेता, इस फिल्म को काफी हद तक देखने लायक बनाये रखते हैं. फिल्म ख़तम होने के बाद भी ख़तम नहीं होती, और इसे वापस लौटने का एक इशारा भी समझा जा सकता है. इन किरदारों को एक बार और परदे पर देखने में मुझे तनिक हर्ज़ न होगा, अगर इस बार एक अच्छी-दमदार कहानी भी हाथ लग जाए! [2.5/5]

Friday, 24 July 2015

मसान : थोड़ी मार्मिक-थोड़ी निष्ठुर पर सच्चाई के बिल्कुल करीब! (४/५)

बनारस सिर्फ गाँजा-भांग-चरस की चिलम चढ़ाये 'फोटो-फ्रेन्डली' बाबाजी लोगों या फिर टूटी-फूटी अंग्रेजी में 'अंग्रेजों' को लूट लेने की जुगत में दिमाग खपाते जुगाड़ियों का ही शहर नहीं है, बनारस में जिन्दगी का एक पहलू और भी है...थोड़ा मार्मिक-थोड़ा निष्ठुर पर सच्चाई के बिल्कुल करीब! नीरज घायवान की 'मसान' आपका परिचय एक बिल्कुल नये बनारस से कराती है, जिसे आपने देखा-सुना तो शायद जरुर होगा पर इस बार आप उसे रुंधे गले-भरे दिल और डबडबाई आँखों से महसूस भी कर पायेंगे। 

ये उन नौजवानों का बनारस है, जिनका प्रेम फेसबुक की दीवारों पर परवान चढ़ता है। जिनकी आशाएँ-आकांक्षाएँ जमीन से उखड़ी नहीं हैं, पर हर तरह के सामाजिक बन्धनों को तोड़ने का दम-खम रखती हैं। नायक (विकी कौशल) मसान (शमशान का अपभ्रंश) में चिताएं सजाने-जलाने वाले एक डोम परिवार से सम्बन्ध रखता है। स्थानीय कालेज से सिविल इंजीनियरिंग का डिप्लोमा लेने के बाद शायद वो इस पेशे से अलग भी हो जाए, पर आज उसे अपने परिवार का हाथ बँटाने में तनिक गुरेज़ नहीं। प्यार के मामले में भी नायक अपनी कमजोरियां बड़ी सहजता से स्वीकार कर लेता है। 

नायिका (रिचा चढ्ढा) को अपने प्रेमी के साथ एक होटल के कमरे में सेक्स करते हुए पकड़े जाने का कोई मलाल नहीं, हालांकि इस पूरे मामले को सनसनीखेज बनाने की पुलिस की कोशिशों से अब उसकी जिंदगी इतनी आसान नहीं रही पर उसके वजूद को तोड़ना अब भी कोई हंसी खेल नहीं। 'मसान' जिन्दगी, मौत और उसके बीच की तमाम बातों का एक सीधा सा दिखने वाला पर जटिल लेखा-जोखा है। मसान में चिता जलाते किरदार जब मुर्दा शरीर के अंगों के साथ खेलते नजर आते हैं, मौत जिन्दगी से हलकी लगने लगती है। 'दु: खतम क्यों नहीं होता, रे?" कहकर जब नायक का सब्र पीड़ा के आगे घुटने टेक देता है, तब भी जिन्दगी ही हारती दिखती है, पर अभी सब कुछ खतम नहीं हुआ है। जिन्दगी अब भी बाकी है। 

'मसान' की खूबसूरती, 'मसान' का तिलिस्म वरुण ग्रोवर की काबिलियत का तानाबाना है। एक ऐसी कलम जो हिन्दी साहित्य-उर्दू शायरों के सहन में पली-बढ़ी है और उनका कर्ज़ उतारने की ईमानदार कोशिश करती है। दुष्यन्त कुमार की 'तू किसी रेल सी गुजरती है' से लेकर डा. बशीर बद्र और निदा फ़ाजली जैसे दिग्गजों का जिक्र भर फिल्म को एक अलग पहचान दे देता है। संवादों में बनारस साफ़ झलकता है। कर्मकांडी विद्याधर पाठक (संजय मिश्रा) हों या उनका चेला झोंटाकिरदार कहीं भी बनारसी होने की चीख-पुकार करते नहीं दिखते पर यकीनन जब आप अगली बार बनारस में होंगे, इन सभी को ढूंढते मिलेंगे। अभिनय में विकी कौशल अपने हाव भाव, लहज़े से पूरी तरह प्रभावित करते हैं। उनकी प्रेमिका की भूमिका में श्वेता स्क्रीन पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सफल रही हैं। रिचा चढ्ढा अपने सधे अभिनय से हर दृश्य, हर भाव को खुद में आत्मसात कर लेती हैं। संजय मिश्रा तो हैं ही बेहतरीन।

अन्त में, 'मसान' नीरज घायवान को उन तमाम गिने चुने फिल्मकारों की श्रेणी में ला खड़ा करती है, जिनकी समझ जिन्दगी और सिनेमा के बारे में करीब करीब एक बराबर ही है, जो भली भाँति जानते हैं कि सिनेमा और जिन्दगी का संगम कब,कहाँ और कैसे होना चाहिए। 'मसान' अपनी संवेदनशीलता, समझ, साहित्यिक संदर्भों और सजीवता के साथ, बिना शक-बिना शर्त साल की सबसे अच्छी और सच्ची फिल्मों में से एक है। एक बार नहीं, एक बार और देखिए! (/)