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Friday, 12 May 2017

मेरी प्यारी बिंदू: बोर, बोर, बोरिंग [2/5]

बहुत कम फिल्में होती हैं, जो अपने पूरे वक़्त में औसत और सामान्य होने के बावजूद अंत तक आते-आते आपको चौंका दें. थ्रिलर और सस्पेंस फिल्मों में तो अक्सर होता है, पर रोमांटिक लव-स्टोरी में? बेहद कम. अक्षय रॉय की ‘मेरी प्यारी बिंदू’ ऐसी ही एक रोमांटिक कॉमेडी है, जो ख़त्म होने के 20 मिनट पहले तक तो अपनी बचकानी हरकतों से आपको खूब झेलाती है, पर उसके बाद के हिस्से में जिस ख़ूबसूरती से संजीदा हो लेती है, न सिर्फ आँख नम होती है, दिल पसीजता है, बल्कि एक कसक भी छोड़ जाती है कि काश, जज्बातों में यही साफगोई, यही संजीदगी पूरी फिल्म में दिखाई दी होती. अक्षय अपनी नायिका से एक जगह कहलवाते भी हैं, “लव-स्टोरी लिखते वक़्त आखिर कोई कितना अलग-कितना नया हो लेगा?” इस एक झिझक से बचने के लिए अक्षय फिल्म में बहुत कुछ अच्छा, बहुत कुछ खूबसूरत इतना ठूंस देते हैं कि उन्हें वक़्त देने में कहानी, किरदारों और उनके बीच के जज्बाती ताने-बाने को सुलझाने की जगह ही नहीं बचती.

अभिमन्यु रॉय चौधरी (आयुष्मान खुराना) एमबीए और बैंक की नौकरी करने के बाद, हिंदी में ‘चुड़ैल की चोली’ जैसा ‘‘मसाला साहित्य’ लिख लिख कर नाम बना चुका है. दिक्कत उसे एक लव-स्टोरी लिखने में आ रही है, जिसपे वो पिछले 3 साल से काम कर रहा है. ऐसे में एक दिन उसे एक ऑडियो कैसेट मिलता है, जो उसने अपने बचपन की दोस्त और इकलौते प्यार बिन्दू (परिणीति चोपड़ा) के साथ मिलकर रिकॉर्ड किया था. बिंदू अब अभिमन्यु की जिंदगी से दूर जा चुकी है. गुजरे ज़माने के उन पसंदीदा गानों के साथ ही, अभिमन्यु बिंदू के साथ अपने रिश्ते के तमाम पड़ावों को भी याद करते हुए उसे एक कहानी की शक्ल देने में जुट जाता है. फिल्म अब और तब के झूले में झूलने लगती है. बचपन की दोस्ती से, जवानी की मस्ती और फिर जिंदगी और प्यार की उलझनें, सब की यादें और उन सारी यादों से जुड़े कुछ गाने.

अक्षय फिल्म के लिए उम्मीदों से भरी एक ऐसी नींव तैयार करते हैं, जिसमें पसंद न आने लायक कुछ भी नहीं है, पर जब वक़्त आता है उस पर ईंटें रखने का, इमारत खड़ी करने का तो उनकी जल्दबाजी साफ़ दिखने लगती है. गानों से यादों तक और यादों से गानों तक पहुँचने का सफ़र हिचकोले खाने लगता है. कुछ गाने बड़ी समझदारी से पिरोये गए हैं, तो कुछ बस छू कर गुज़र जाते हैं. हर गाने के साथ जैसे एक चैप्टर शुरू होता है, फिल्म फ्लैशबैक का टिकट कटाती है, और फिर बीते ज़माने में उस गाने से जुड़ी यादें टटोलने के बाद वापस अभिमन्यु के टाइपराइटर की खटखट पर आके ख़त्म. इन सब के बीच, अभिमन्यु का नीरस तरीके से कहानी सुनाना, नतीजा? किरदारों से जुड़ना रह ही जाता है.

फिल्म में कुछ हद तक जो दिलचस्प और गुदगुदाने वाला है, वो है अभिमन्यु का बंगाली परिवार. हर बात में हंसी-मज़ाक तलाशने वाले बाबा, ‘नेचुरल ओवर-एक्टिंग’ करने वाली माँ, दिलफेंक ‘बूबी’ मासी और कैरम बोर्ड से चिपके ढेर सारे पड़ोसी-रिश्तेदार. कोलकाता के उस हिस्से से निकलते ही जैसे फिल्म बेदम होकर लड़खड़ाने लगती है. कमिटमेंट से बचने और कैरियर के पीछे भागने वाली दोस्त के प्यार में दिन-रात एक कर देने वाले आशिक़ की कहानी कोई नयी नहीं है, ‘कट्टी-बट्टी’ भी कुछ ऐसी ही ज़मीन तैयार करती है. पुराने फ़िल्मी गानों और अपने ऑथेंटिक लुक की वजह से ‘मेरी प्यारी बिंदू’ काफी हद तक ‘दम लगा के हईशा’ की तरफ बढ़ने का हौसला दिखाती है, पर एक ऐसी कहानी, जिसमें ठहराव हो, जिसमें लाग-लपेट और मिलावटें कम हों, ईमानदारी ज्यादा हो, ऐसी एक प्यारी कहानी की कमी फिल्म को उसके तयशुदा मंजिल तक पहुँचने से पहले ही रोक देती है. थोड़ी सी राहत की सांस फिल्म को क्लाइमेक्स में नसीब होती है, जब दोनों किरदारों को एक मुकम्मल अंत मिलता है.

जहां आयुष्मान अपने किरदार में पूरी तरह समाये हुए दिखते हैं, वहीँ परिणीति सहज तो हैं पर स्क्रिप्ट में बंधी-बंधाई अपनी हद से आगे निकलने की हिम्मत कतई नहीं जुटा पातीं. आखिर में, ‘मेरी प्यारी बिंदू’ आपके फेवरेट ऍफ़एम रेडियो स्टेशन का वो लेट-नाईट शो है, जहां आपको अपने बीते ज़माने के पसंदीदा गाने सुनाने का वादा तो मिलता है, मगर उन गानों के बीच का पूरा वक़्त, पूरा ताम-झाम इतना बोरिंग है कि न आपसे छोड़े बनता है, न सुनते! [2/5]   

Friday, 27 February 2015

दम लगा के हईशा: 'बड़ी' सी ख़ुशी बिखेरती एक छोटी सी फिल्म! [3.5/5]

फिल्म शुरू हो रही है. यशराज फिल्म का चिर-परिचित 'लोगो' स्क्रीन पर बनने लगा है पर बैकग्राउंड से लता मंगेशकर का आलाप गायब है! कुमार सानू की दर्द भरी आवाज़ ने लता दीदी की जगह बखूबी हथिया ली है, और ये फिल्म के लिए सटीक भी है. जिन नौजवानों को इस नाम के बारे में तनिक भी शक--शुबहा हो, उन्हें बता दूँ, एक वक़्त था जब महबूब दिखे तो सानू, चिट्ठियां लिखें तो सानू, मुलाक़ात हो तो सानू और दिल टूटे तो भी सानू! 90 का दशक था ये, जब कुमार सानू के हर गाने में हम अपने लिए इमोशंस ढूंढ ही लेते थे! गानों की रिकॉर्डिंग के लिए ऑडियो कैसेट की दूकान के आगे-पीछे मंडराते रहते थे. शरत कटारिया की  'दम लगा के हईशा' उसी वक़्त और मूड की 'बड़ी' सी ख़ुशी बिखेरती एक छोटी सी फिल्म है, जो आपको जी भर के गुदगुदाती है और हंसी-हंसी में ही आँखें नम कर जाती है.

बेमेल की शादियां कोई नहीं बात तो है नहीं इंडिया में, पर बॉलीवुड इस मुद्दे पर भी ज्यादा कुछ हिम्मत दिखाने से बचता रहा है मसलन, नायिका का डील-डौल! पिछली बार कब आपने किसी मेनस्ट्रीम सिनेमा में दोहरे, भरे-पूरे बदन वाली लड़की को मुख्य किरदार में देखा है, वो भी यशराज फिल्म्स जैसे बड़े लेकिन बचते-संभलते बैनर की फिल्म में? ['गिप्पी' तो बहुतों को याद भी नहीं होगी]. 90's के हरिद्वार में, प्रेम प्रकाश तिवारी [आयुष्मान खुराना] का विवाह कु. संध्या वर्मा [भूमि पेडणेकर] के साथ संपन्न हुआ है. तिवारीजी [संजय मिश्रा] का लौंडा दसवीं फेल है, शाखा का रेगुलर सदस्य है और ऑडियो कैसेट की दूकान चलाता है! संध्या बी.एड. कर चुकी है और टीचर बनना चाहती है। सुनने में कोई हर्ज़ नहीं, पर देखने में है। संध्या को अक्सर उसके 'तंदरूस्त' व्यक्तित्व के लिए ताने सुनने पड़ते हैं, और कुमार सानू के परम भक्त प्रेम प्रकाश तिवारी को तो कोई जूही चावला चाहिए थी। नतीज़ा, दोनों परिवारों के लगातार दखल के बावज़ूद इस विवाह में प्रेम की जगह बनती नहीं दिखती। अंत में, ले दे कर इस डूबते रिश्ते को एक स्थानीय प्रतियोगिता का ही सहारा है जहां जीतने के लिए रिश्तों का बोझ उठाकर भागना है और जीत का एक ही मन्त्र है आपसी ताल-मेल!

फिल्म यशराज की भले ही हो, जब अनुपम खेर के 'कूल डैड' की जगह संजय मिश्रा का 'चप्पल से पीटने वाला बाप' हो, जब 'घिसी-पिटी' रीमा लागूओं और फरीदा जलालों की जगह अलका अमीन और सीमा पाहवा के 'सीधी-सादी' माओं ने ले रखी हो तो फिल्म से नए की उम्मीद रखना बेमानी और बेवजह नहीं है. हालाँकि फिल्म का कथानक कहीं-कहीं 'चमेली की शादी' की याद दिलाता है खासकर शाखा वाले प्रकरण, पर कहानी की साफगोई और किरदारों की सच्चाई फिल्म को शुरू से अंत तक मजेदार बनाये रखते हैं! माँ का बेटी को वीसीआर पर एडल्ट फिल्में देख कर पति को रिझाने का सुझाव हो या मन-मुटाव के वक़्त गुस्सा दिखाने के लिए बार-बार अपने-अपने पसंदीदा गाने बजाने की ज़िद, फिल्म ऐसे खुशनुमा पलों से पटी पड़ी है. गाने सुनते वक़्त वरुण ग्रोवर के गीतों  को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा! उनके लफ़्ज़ों में एक सोंधापन तो है ही, रस भी बहुत है!

अभिनय की दृष्टि से, फिल्म में छोटे से छोटा किरदार भी निराश नहीं करता, संजय मिश्रा, अलका अमीन, सीमा पाहवा, शीबा चड्ढा तो फिर भी मंजे हुए कलाकारों की जमात है. फिल्म की कास्टिंग डायरेक्टर शानू शर्मा का प्रयास सराहनीय है. आयुष्मान खुराना को इस तरह के रोल की दरकार काफी वक़्त से थी जहां वे सिर्फ अपने किरदार को जीते हुए दिखाई देते हैं, एक नए रंग में अपने आपको पेश करते हैं. पर इन सबसे कहीं ज्यादा अलग और ऊपर नज़र आतीं हैं भूमि पेडणेकर! सही मायनों में अगर 'दम लगा के हईशा' में दम है तो भूमि उसकी एक बहुत 'बड़ी' वजह हैं. हाल के सालों में किसी नए कलाकार का ये सबसे प्रभावशाली अभिनय है. हालाँकि कि उनमें आम हीरोइनों जैसी कोई बात नहीं है, और यही उनकी ख़ास बात है. देखना बाकी रहेगा कि अब आगे बॉलीवुड के पास उनके लिए क्या है ?

आखिर में, 'दम लगा के हईशा' एक दिल छू लेने वाली फिल्म है, जो अपनी ईमानदारी, सच्चाई और साफ़दिली से आपको अपना बना लेती है! फिल्म के अंत में आयुष्मान और भूमि 90's के गानों की तर्ज़ पर नाचते-गाते दिखाई देते हैं, बिलकुल गोविंदा-शिल्पा शेट्टी या अजय देवगन- तब्बू की जोड़ी की तरह. उस गाने में अगर किसी को देखना है तो भूमि को देखिये...ये सपने सच होने जैसा ही है, सिर्फ भूमि के लिए नहीं, हर आम दिखने वाले दर्शक के लिए! बॉलीवुड ऐसी दरियादिली बहुत कम ही दिखाता है, तो पूरा मज़ा उठाईये! जरूर देखिये!! [3.5/5]