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Friday, 1 March 2019

सोनचिड़िया : मुक्ति के प्यासे, बीहड़ के पंछी! (3.5/5)


बीहड़ के बाग़ियों की सारी लड़ाईयां सरकारी फौज़ और जातियों में बंटे अलग-अलग गैंगों तक ही सीमित नहीं है. कुछ मुठभेड़ अंदरूनी भी हैं. खुद से खुद की लड़ाई. जिन बाग़ियों की बन्दूक दूसरी बार सवाल पूछने पर गोलियों से जवाब देना पसंद करती है, अब बार-बार खुद ही सवाल पूछने लगी है. ‘बाग़ी का धर्म क्या है?’. जवाब भी सबके अपने अपने हैं, कुछ अभी भी तलाश रहे हैं. आम तौर पर हिंदी फिल्मों में चम्बल के डाकू या तो खूंखार लुटेरे होते हैं, या सामाजिक अन्याय और सरकारी दमन से पीड़ित कमज़ोर नायकों के विरोध का प्रखर स्वर बनने की एक प्रयोगशाला. ‘बैंडिट क्वीन और ‘पान सिंह तोमर इसी खांचे-सांचे की फिल्में होते हुए भी उत्कृष्ट अपवाद हैं. अभिषेक चौबे की ‘सोनचिड़िया थोड़ी और गहरे उतरती है. ज़मीनी किरदारों के ज़ेहन तक पैठ बनाने वाली, बदले-छलावे, न्याय-अन्याय, सही-गलत, जाति-पांति और आदमी-औरत के भेदों के साथ-साथ मोक्ष, मुक्ति और पछतावे का पीछा करती फिल्म. 1972 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘समाधि’ के पहले हिस्से जैसा कुछ.

मान सिंह (मनोज बाजपेई) के कंधे झुकने लगे हैं. बढ़ती उम्र की वजह से नहीं, कंधे पर हर वक़्त टंगी दोनाली की वजह से नहीं, बल्कि कुछ है जो अतीत से बार बार बाहर निकल कर दबोच लेता है. गैंग के एक दूसरे नौजवान सदस्य लाखन सिंह (सुशांत सिंह राजपूत) को भी उस 5 साल की लड़की की चीख आज भी डराती रहती है, जो मान सिंह और लाखन के कुकर्मों की इकलौती चश्मदीद रही थी. दोनों अब मोक्ष और मुक्ति की तलाश में हैं, और दारोगा गुर्जर (आशुतोष राणा) इन्हें मौत तक पहुंचाने के फ़िराक में. गैंग धीरे-धीरे ख़तम हो रहा है. रेडियो पर इंदिरा गांधी के आपातकाल की घोषणा हो चुकी है. साथियों में ‘सरेंडर’ की भी सुगबुगाहट चल रही है. एक बाग़ी की चिंता है कि सरेंडर के बाद जेल में ‘मटन’ मिलेगा या नहीं? ऐसे में, इंदुमती तोमर (भूमि पेडणेकर) और आ टकराती है अपनी ‘सोनचिरैय्या को साथ लिए. साथी बाग़ी वकील सिंह (रनवीर शौरी) की मर्ज़ी के खिलाफ, लाखन के लिए यही सोनचिरैय्या (यौनशोषण की शिकार एक बच्ची) उसके अतीत के दाग को पश्चाताप की आग में तपाने का जरिया दिखने लगती है.

‘सोनचिड़िया में अभिषेक चौबे चम्बल को दिखाने के लिए जिस चश्मे का इस्तेमाल करते हैं, वो बेहद जाना-पहचाना है. शेखर कपूर वाला. हालाँकि अपने कथानक में वो जिस तरह डार्कनेस ले आते हैं, और रूखे-रूखे व्यंगों का प्रयोग करते हैं, वो उनका अपना ही ट्रेडमार्क है. फिल्म की शुरुआत आपको अंत का आभास कराती है. एक ऐसी शुरुआत जहां सब कुछ ख़तम हो रहा है. मानसिंह का गैंग अपना अच्छा खासा नाम कमा चुका है. खौफ़ के लिए उसे सिर्फ लाउडस्पीकर पर मुनादी ही करनी पड़ती है, गोलियों की बौछार नहीं. शादी लूटने पहुंचे डाकू दुल्हन को 101 रूपये का शगुन दे रहे हैं. नए हथियारों की जरूरत तो है, पर गैंग के पास पैसे ही नहीं हैं. गोली लगती है, तो मानसिंह हँसता है, “सरकार की गोली से कबहूँ कोऊ मरे है? अरे इनके तो वादन से मर जात है लोग.’. दारोगा गुर्जर जाति का है, और उसके नीचे काम करने वाले चाचा-भतीजा ठाकुर जाति के. चाचा (हरीश खन्ना) की समझ पुख्ता है. वर्दी से बड़ी है चमड़ी. चमड़ी पे कोई स्टार नहीं लगे होते, जैसी जिसको मिल गयी, मिल गयी. एक दृश्य में एक महिला बाग़ी का दर्द सामने निकल रहा है. ‘ठाकुर, बाभन मर्दों में होते हैं, औरतों की जात अलग ही होती है’. झूठ नहीं है, तभी तो 12-14 साल का बेटा बंदूक टाँगे माँ को खोज कर मारने के लिए डकैतों के बीच घूम रहा है. खुद में बाप से ज्यादा मर्दानगी महसूस करता है.

‘सोनचिड़िया एक डकैतों की फिल्म लगने के तौर पर आम दर्शकों में जितनी भी उम्मीदें जगाती है, सब पर तो खरी नहीं उतरती. मसलन, फिल्म का एक्शन मसालेदार होने का बिलकुल दावा नहीं करता, हालाँकि सच्चाई से दूर भी नहीं जाता. हट्टे-कट्टे 6 फुटिया पहलवान को दबोचने में 3-3 डाकू हांफने लगते हैं. फिल्म की रफ़्तार धीमी लगती है. गीत-संगीत भी किरदारों के मूड से ज्यादा बीहड़ की बड़ाई में रचे-बसे हैं. इतने सब के बावजूद, सिनेमा की नज़र से फिल्म किसी मास्टरक्लास से कम नहीं. स्क्रीनप्ले में अभिषेक की बारीकियां, खालिस बुन्देलखंडी बोली के संवाद, बेहतरीन कैमरावर्क और कलाकारों का शानदार अभिनय; ‘सोनचिड़िया डकैतों की फिल्म होने से कहीं ज्यादा कुछ है. मनोज बाजपेई कमाल हैं. ढलती उम्र को जिस तरह मनोज अपने किरदार में ढाल कर पेश करते हैं, आप उन्हें खलनायक से अलग, इंसानी तौर पर देखने से नहीं रोक पाते. सुशांत बिलकुल घुलमिल जाते हैं. उनकी पहली फिल्म होती तो शायद आप उन्हें ‘एनएसडी के लौंडों’ से अलग नहीं समझते! रनवीर शौरी फिर एक बार जता जाते हैं कि बॉलीवुड उन्हें कितना कमतर आंकता है? आशुतोष राणा अपने पुराने अवतार में हैं. उनकी कन्चई आँखें अब भी अपनी कुटिलता से आपके अन्दर सिहरन पैदा करने में कामयाब रहती हैं, इतने सालों बाद भी. भूमि गिनती के दृश्यों में ही आगे आती हैं, और उनमें सटीक हैं.  

आखिर में, ‘सोनचिड़िया चम्बल की घाटियों और रेतीली पहाड़ियों में आम से दिखने वाले डकैतों का एक नया सच है, जहां सब अपनी अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ रहे हैं. जाति, धर्म, समाज और सरकार से लड़ते-लड़ते एक बड़े अंत की तलाश में भटकते कुछ ऐसे बाग़ी, जिनकी जिंदगियों के मायने और मकसद एक बड़ा मतलब लिए हुए हैं. [3.5/5]      

Friday, 15 June 2018

लस्ट स्टोरीज़ (A): ‘लव’ से ज्यादा असल और अलग! [4/5]


प्यार की कहानियाँ सदियों से अनगिनत बार कही और सुनाई जाती रही हैं. वासना के हिस्से ऐसे मौके कम ही आये हैं. हालाँकि दोनों में फर्क बस सामाजिक बन्धनों और नैतिकता के सीमित दायरों का ही है. कितना आसान लगता है हमें, या फिर कुछ इस तरह के हालात बना दिए गये हैं हमारे लिए कि प्यार के नाम पर सब कुछ सही लगने लगता है, पाक-साफ़-पवित्र; और वासना का जिक्र आते ही सब का सब गलत, गंदा और अनैतिक. रिश्तों में वासना तो हम अक्सर अपनी सतही समझ से ढूंढ ही लेते हैं, वासना के धरातल पर पनपते कुछ अलग रिश्तों, कुछ अलग कहानियों को समझने-तलाशने की पहल नेटफ्लिक्स की फिल्म लस्ट स्टोरीज़ में दिखाई देती है, जो अपने आप में बेहद अनूठा प्रयास है. ख़ास कर तब, जब ऐसी कहानियों को परदे पर कहने का दारोमदार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के चार बड़े नामचीन फिल्मकारों (अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी, करण जौहर) के मजबूत और सक्षम कन्धों पर टिका हो.

चार छोटी-छोटी कहानियों से सजी लस्ट स्टोरीज़ अपने नाम की वजह से थोड़ी सनसनीखेज भले ही लगती हो, पर कहानी और किरदार के साथ अपनी संवेदनाओं और सिनेमा के लिए अपनी सशक्त जिम्मेदारियों में खुद को तनिक भी लचर या लाचार नहीं पड़ने देती. अनुराग की कहानी एक महिला प्रोफेसर के अपने ही एक स्टूडेंट के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने से शुरू होती है. कालिंदी (राधिका आप्टे) का डर, उसकी नर्वसनेस, तेजस (सैराट के आकाश ठोसर) पर जिस तरह वो अपना अधिकार जमाती है, सब कुछ एक सनक से भरा है. एक हिस्से में तो वो तेजस का बयान तक अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करने लगती है, जिसमें तेजस सब कुछ आपसी सहमति से हुआ था की हामी भर रहा है. हालांकि अपने एक से ज्यादा रिश्तों में कालिंदी की तड़प उन दृश्यों में साफ़ होने लगती है, जिनमें वो कैमरे से रूबरू होकर कुछ बेहद अहम् सवाल पुरुषों की तरफ उछालती है. राधिका अपने किरदार के पागलपन में हद डूबी हुई दिखाई देती हैं, पर फिल्म कई बार दोहराव से भी जूझती नज़र आती है, अपने 35 मिनट के तय वक़्त में भी लम्बी होने का एहसास दे जाती है.

सुधा (भूमि पेडणेकर) अजीत (नील भूपलम) के साथ कुछ देर पहले तक बिस्तर में थी. अब फर्श पर पोछा लगा रही है. पोहे की प्लेट और चाय का कप अजीत को दे आई है. अब बर्तन कर रही है. बिस्तर ठीक करते हुए ही दरवाजा बंद होने की आवाज़ आती है. अजीत ऑफिस जा चुका है. सुधा उसी बिस्तर पर निढाल होकर गिर गयी है. जोया अख्तर की इस कहानी में ऊंच-नीच का दुराव बड़ी संजीदगी से पिरोया गया है. सुधा एक काम करने वाली नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है, उसे भी पता है. अजीत के साथ शारीरिक सम्बन्धों के बावजूद, अपने ही सामने अजीत को लड़की वालों से मिलते-बतियाते देखते और उनके लिए चाय-नमकीन की तैयारी करते वक़्त भी उसे अपनी जगह मालूम है, फिर भी उसकी ख़ामोशी में उसके दबते-घुटते अरमानों और ख्वाहिशों की चीख आप बराबर सुन पाते हैं. भूमि को उनकी रंग-ओ-रंगत की वजह से भले ही आप इस भूमिका में सटीक मान बैठे हों, पर असली दम-ख़म उनकी जबरदस्त अदाकारी में है. गिनती के दो संवाद, पर पूरी फिल्म में क्या दमदार उपस्थिति. इस फिल्म में जोया का सिनेमा भी क्या खूब निखर कर सामने आता है. कैमरे के साथ उनके कुछ दिलचस्प प्रयोग मज़ा और दुगुना कर देते हैं.

दिबाकर बैनर्जी की कहानी एक बीचहाउस पर शाम होते ही गहराने लगती है. रीना (मनीषा कोईराला) साथ ही बिस्तर में है, जब सुधीर (जयदीप अहलावत) को सलमान (संजय कपूर) का फ़ोन आता है. सलमान को लगने लगा है कि उसकी बीवी रीना का कहीं किसी से अफेयर चल रहा है. शादी-शुदा होने का बोझ और बीवी होने से ज्यादा बच्चों की माँ बन कर रह जाने की कसक अब रीना की बर्दाश्त से बाहर है. सलमान को खुल कर सब सच-सच बता देने में ही सबकी भलाई है. वैसे भी तीनों कॉलेज के ज़माने से एक-दूसरे को जानते हैं. शादी से बाहर जाकर अवैध प्रेम-संबंधों और अपने पार्टनर से वफादारी के मुद्दे पर दिबाकर इन अधेड़ उम्र किरदारों के जरिये एक बेहद सुलझी हुई फिल्म पेश करते हैं, जहां एक-दूसरे की जरूरतों को बात-चीत के लहजे में समझने और समझ कर एक माकूल रास्ता तलाशने में सब के सब परिपक्व और समझदार बन कर सामने आते हैं. मनीषा और संजय को नब्बे के दशक में हम बहुत सारी मसाला फिल्मों में नॉन-एक्टर घोषित करते आये हैं, इस एक छोटी फिल्म में दोनों ही उन सारी फिल्मों में अपने किये-कराये पर मखमली चादर डाल देते हैं. जयदीप तो हैं ही बाकमाल.

आखिरी किश्त करण जौहर के हिस्से है, और शायद सबसे फ़िल्मी भी. कहानी पिछले साल की शुभ मंगल सावधान से बहुत अलग नहीं है. मेघा (कियारा आडवाणी) के लिए बिस्तर पर अपने पति पारस (विक्की कौशल) के साथ सुख के पल गिनती के ही रह जाते हैं (हर बार वो उँगलियों से गिनती रहती है), और उसके पति को कोई अंदाज़ा ही नहीं कि उसकी बीवी का सुख उसके सुख से अलग है, और कहीं ज्यादा है. मनचाही ख़ुशी के लिए बैटरी और रिमोट से चलने वाले खिलौने की दखल के साथ, करण कहानी को रोचक बनाने में ज्यादा उत्तेजित दिखते हैं, कुछ इस हद तक कि अपनी महान पारिवारिक फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम के गाने का मज़ाक उड़ाने में भी झिझकते नहीं. विक्की कौशल मजेदार हैं.

आखिर में, लस्ट स्टोरीज़ 2013 में आई अनुराग, ज़ोया, दिबाकर और करण की बॉम्बे टॉकीज वाले प्रयोग की ही अगली कड़ी है. फिल्म इस बार बड़े परदे पर नहीं दिखेगी, और सिर्फ नेटफ्लिक्स पर ही मौजूद रहेगी, इसलिए अपनी सहूलियत से कभी भी और कहीं भी देखने का लुत्फ़ आप उठा सकते हैं. ज़ोया और दिबाकर की कहानियों के बेहतर होने के दावे के साथ ही, एक बात की ज़मानत तो दी ही जा सकती है कि हिंदी सिनेमा के आज में इस तरह की समर्थ, सक्षम और असामान्य कहानियां कहने की कोशिशें कम ही होती हैं, खुद इन चारों फिल्मकारों को भी आप शायद ही इन मुद्दों पर एक बड़ी फिल्म बनाते देख पायें, तब तक एक ही फिल्म में चारों अलग-अलग ज़ायकों का मज़ा लीजिये. लव से ज्यादा मिलेगा, कुछ नया मिलेगा. [4/5]

Friday, 1 September 2017

शुभ मंगल सावधान: शर्तिया मनोरंजन! एक बार मिल तो लें!! [3.5/5]

'सेक्स-एजुकेशन' हम सबके 'कमरे का हाथी' है. देख के भी नज़रंदाज़ करने की परम्परा जाने कब से चली आ रही है? टीवी पर अचानक से दिख जाने वाला सेक्स-सीन हो, या कॉन्डोम का सरकारी विज्ञापन; बच्चों के सवाल आने से पहले ही बड़ों के हाथ रिमोट खोजने लग जाते हैं. और अगर कहीं भूले-भटके कोई बात करने की हिम्मत जुटा भी ले, तो ज्ञान की नदियों के समंदर हर तरफ से यूं हिलोरें मारने लगते हैं कि जैसे सब के सब डॉ. महेंद्र वत्स (मशहूर सेक्स-पर्ट) के ही बैचमेट हों. जो जितना कम जानता है, उतना ही ज्यादा यकीन से चटखारे ले लेकर अपने तजुर्बों की किताब सामने रख देता है. रेलवे लाइन से लगी शहर की हर दीवार किसी न किसी ऐसे 'गुप्त' क्लिनिक का पता जरूर आपको रटा मारती है. पुरानी सी खटारा वैन की छत पे कसा भोंपू चीख-चीख कर अच्छे-खासे मर्द में भी 'मर्दानगी की कमी' का एहसास करा देता है. बंगाली बाबाओं के नुस्खों से लेकर सड़क किनारे बिकती रंगीन शीशियों में बंद जड़ी-बूटियों की तलाश में; 'सेक्स एजुकेशन' का यह 'हाथी' अक्सर 'चूहे' की शकल लिए मायूस घूमता रहता है. हंसी तो आनी ही है. 

आर प्रसन्ना की 'शुभ मंगल सावधान' में हालाँकि कोई हाथी तो नहीं है, पर एक भालू जरूर है. सरे-बाज़ार मुदित (आयुष्मान खुराना) पर चढ़ गया था, और अब उतरने का नाम ही नहीं ले रहा. मुदित के गीले बिस्किट चाय में टूट-टूट कर गिर रहे हैं, और उसका अलीबाबा गुफा तक पहुँच ही नहीं पा रहा. दिक्कत तो है, सुगंधा (भूमि पेडणेकर) से उसकी शादी बस्स कुछ दिनों में होने ही वाली है. मुदित की परेशानी में सुगंधा हर पल उसके साथ है. बिना सबटाइटल्स वाली अंग्रेजी फिल्मों से सीख कर वो मुदित को 'कम ऑन, माय डैनी बॉय!' भी सुना रही है, हालाँकि ऐसा करते हुए उसके चेहरे पर दर्द ज्यादा है. तमाशा तब शुरू होता है, जब दोनों के परिवारों में ये किस्सा आम हो जाता है. बाप को गुमान है कि उसके बेटे का 'कुछ भी' छोटा नहीं हो सकता. माँ ने बड़े होने तक बेटे का अंडरवियर रगड़-रगड़ के साफ़ किया है, तो बेटे में 'खोट' होने की सूरत ही नहीं बचती. 

सगाई से लेकर शादी तक चलने वाली इस कहानी में 'डिसफंक्शनल' सिर्फ मुदित और सुगंधा की सेक्स-लाइफ ही नहीं है, बल्कि समाज, शादी और रीति-रिवाज़ भी इसके जबरदस्त शिकार हैं. मजेदार ये है कि सब कुछ हंसी-हंसी में आपके सामने आता है और वैसे ही चले भी जाता है. जहां आपकी फिल्म का विषय ही इतना वयस्क हो, इतना संवेदनशील हो, वहाँ (अच्छे) हास्य का सहारा लेकर अपनी बात कहना और उसे कहते वक़्त जरा भी अश्लील या भौंडा न होने पाना अपने आप में एक बड़ी कामयाबी की तरह देखी जानी चाहिए. इशारों-इशारों, मिसालों और कहानियों के ज़रिये यौन-संबंधों से जुड़ी समस्याओं पर बात करने की कोशिश करते वक़्त फिल्म के किरदारों की झिझक जिस तरह का कुदरती हास्य पैदा करती है, उसका ज़ायका हम पहले भी 'विक्की डोनर' में चख चुके हैं. 'शुभ मंगल सावधान' ठीक उसी जायके की फिल्म है. 

फिल्म में किरदारों का रूखापन, उनके खरे-खरे लहजे और उनके तीखे संवाद की तिकड़ी मनोरंजन में पूरा दखल रखती है. ताऊजी (ब्रजेंद्र काला) बात-बात पर बाबूजी के श्राद्ध पर खर्च हुए पैसों का एहसान गिनाना नहीं छोड़ते. ससुर को 'बहू दुपट्टा लेकर नहीं गयी' ज्यादा परेशान करता है. माँ (सीमा पाहवा) बेटी को शादी से जुड़े सब राज बताना भी चाहती है, मगर खुल के कैसे कहे? इन सभी किरदारों के अभिनय में आपको कोई भी कलाकार तनिक भी शिकायत का मौका नहीं देता. मुख्य भूमिकाओं में आयुष्मान अपनी पिछली कुछ 'एकरस' फिल्मों से जरूर आगे आये हैं. भूमि हालाँकि मिडिल-क्लास, घरेलू लड़की के इस दायरे में कैद जरूर होती जा रही हैं, पर जब तक कहानियों में धार रहेगी, उन्हें देखना कतई खलेगा नहीं. 

आखिर में; 'शुभ मंगल सावधान' एक पारिवारिक फिल्म है, जो मनोरंजन के सहारे ही सही एक ऐसे झिझक भरे माहौल में आपको उन समस्याओं पर हँसने को उकसाती है, जिसके बारे में बात करना भी आपके लिए 'सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक' बन्धनों की जकड़ में आता है. आज अगर नज़रें मिला कर, 'सेक्स' के मुद्दे पर खुल कर अपनों के साथ हंस पाये, तो क्या पता कल संजीदा होकर एक-दूसरे से बात करना भी सीख ही जाएँ? [3.5/5]       

Friday, 11 August 2017

टॉयलेट- एक प्रेम कथा: सामाजिक सोच की सफाई के लिए राजनीतिक शौच? [2/5]

प्रधानमंत्री जी के 'स्वच्छ भारत अभियान' के दौरान उनके मातहतों के फ़ोटो अक्सर आपने अखबारों में देखे होंगे. साफ़-सुथरी सड़कों पर पहले सूखे पत्ते, कूड़ा-करकट फैलाए जाते हैं, फिर मंत्रीजी खुद झाड़ू लेकर सफाई अभियान में जुट जाते हैं. राजनीति में प्रतीकों का अपना एक स्थान है, चलता है; मगर सामाजिक सन्देश के नाम पर एक जरूरी फिल्म में इसे बरदाश्त कर पाना बिलकुल बस के बाहर की बात है. श्री नारायण सिंह की 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' सफाई करने से पहले खुद ही गंदगी फैलाती है, और गंदगी फैलाने में ही अपना ज्यादा वक़्त जाया करती है. रूढ़िवादी सामाजिक सोच को तोड़ने के लिए राजनीतिक शौच का सहारा लेते हुए 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' एक अच्छी-भली, सच्ची कहानी को मनोरंजक बनाने में खूब लीपा-पोती करती है. 

36 साल के केशव (अक्षय कुमार) की शादी एक 'दूधवाली', 'दूध की डेरी' मल्लिका से हो रही है. मल्लिका एक भैंस है, इसीलिए आपको उसके शारीरिक रूप का बखान करते वक़्त इस तरह के विशेषण मजाकिया लग रहे होंगे, पर जिस द्विअर्थी ज़बान में उस पर सस्पेंस और व्यंग्य कसा जाता है, इंद्र कुमार की सेक्स-कॉमेडी 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती' की याद आनी वाजिब है. हद तो तब हो जाती है, जब एक महाशय ख्यालों में केशव को उसकी मल्लिका (भैंस) के साथ हनीमून मनाते हुए देखने लगते हैं, स्विट्ज़रलैंड की वादियों में एक-दूसरे के बदन से चिपके हुए. यकीनन, यहाँ जरूरत शौच में सफाई की नहीं, सोच में सफाई की है. बहरहाल, मांगलिक दोष से मुक्त होने के इस रिवाज़ के बाद केशव की जिंदगी में जया (भूमि पेडणेकर) आती है. ताड़ने, पीछा करने, छुप-छुप के मोबाइल से फोटो खींचने और दोस्तों के बीच जिक्र करके मज़ा लेने वाले आशिक़ों को जया खरी-खोटी सुनाने का कोई मौका नहीं छोडती, पर जैसे ही केशव से एक झिड़की मिली, उसे भी प्यार के नाम पर यही सब दोहराने में कोई झिझक-कोई शर्म नहीं होती.  

शादी की अगली ही सुबह जब जया को पड़ोस की औरतें 'लोटा पार्टी' ज्वाइन करने का निमंत्रण देतीं हैं, तब कहीं जा के फिल्म वापस पटरी पर आनी शुरू होती है. केशव के घर में टॉयलेट नहीं है. कहाँ तो इस एक बड़ी समस्या को गंभीरता से समझने की जरूरत थी, मगर यहाँ भी श्रीनारायण सिह अति-साधारण दर्जे के 'अक्षय कुमार' मार्का हास्य का कंधा तलाशने लगते हैं. वास्तविक घटना के विपरीत, असली मुद्दे से हटकर जया-केशव तरह-तरह के जुगाड़ों में लगे रहते हैं. कभी पास के रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का शौचालय इस्तेमाल करने की ट्रिक, तो कभी फिल्म-शूटिंग से मोबाइल-टॉयलेट चुराने का प्लान. और अंत में कहीं जाकर, जब अखबारों-न्यूज़ चैनलों के सहारे बात सरकार के कानों तक पहुँचती भी है, तो सब मामला इतनी आसानी से सुलझ जाता है, जैसे कोई बड़ी बात थी ही नहीं. 

पिछले महीने 'इंदु सरकार' और अब 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा'; फिल्मों में किसी एक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार साफ़ नज़र आ रहा है. फिल्म में बड़ी सफाई से बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश में जो ताज़ा 'टॉयलेट-घोटाला' है, वो चार साल पुराना है. नोटबंदी जैसे कड़े फैसले अगर प्रधानमंत्री ले सकते हैं, तो तत्कालीन उत्तर प्रदेश-मुख्यमंत्री क्यूँ पीछे रहें? अक्षय का किरदार भी प्रेस के सामने सरकार के बीच-बचाव की मुद्रा में तैनात नज़र आता है. इतने सब के बाद भी, फिल्म दो-तीन ख़ास मौकों पर 'घर-घर शौचालय' के मुद्दे पर अपना रवैया साफ़-साफ़ और कड़े शब्दों में रखने में कामयाब रहती है. अक्षय और भूमि के लम्बे भाषण भी ऐसे ही कामयाब मौकों का हिस्सा हैं. 

किसी 15-20 मिनट की शार्ट फिल्म में बेहतर कही जा सकने वाली कहानी और उससे जुड़ी सामाजिक-समस्या के तमाम पहलुओं को सामने रखने के लिये, 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' पौने तीन घंटे का समय ले लेती है. 'भारत कुमार' बनने की राह पर निकल पड़े अक्षय बड़ी चालाकी से फिल्मों का चयन तो कर रहे हैं, मगर लगता है कि ड्रामेबाजी से उभरने का कोई रास्ता अभी तक उन्हें सूझा नहीं है. भूमि को इस तरह की भूमिका में पहले भी देख चुके हैं हम. उनमें पूरी क़ाबलियत है आज के ज़माने की दीप्ति नवल बनने की, एक ऐसा अपना सा चेहरा जो घर के आस-पास ही रहता हो. सुधीर पाण्डेय साब को परदे पर बार-बार देखने की चाह एक बार फिर बनी रहती है. अपने वन-लाइनर और कॉमिक-टाइमिंग से दिव्येंदु गुदगुदाने में कामयाब साबित होते हैं. 

आखिर में; 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' किसी सरकारी पैम्फलेट की तरह रंग-बिरंगा भी है, जरूरी मुद्दे भी हैं, मतलब की बातें भी हैं और एक लुभावना चेहरा भी जिसे 'देश' से जोड़ कर देखने की आपको आदत है, पर इस सरकारी प्रचारपत्र को 'टॉयलेट-पेपर' तक  समझने की भूल मत कीजियेगा. अनुपम खेर फिल्म में सबसे समझदार और 'मॉडर्न' बुजुर्ग बने हैं, सनी लिओने के गाने टीवी पर इतरा-इतरा के देखते हैं. अख़बारों के बारे में उनकी एक राय है, "जो रद्दी है, उसे रद्दी में ही जाना चाहिए". 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' भी उन अख़बारों से कुछ ज्यादा अलग नहीं. [2/5]     

Friday, 27 February 2015

दम लगा के हईशा: 'बड़ी' सी ख़ुशी बिखेरती एक छोटी सी फिल्म! [3.5/5]

फिल्म शुरू हो रही है. यशराज फिल्म का चिर-परिचित 'लोगो' स्क्रीन पर बनने लगा है पर बैकग्राउंड से लता मंगेशकर का आलाप गायब है! कुमार सानू की दर्द भरी आवाज़ ने लता दीदी की जगह बखूबी हथिया ली है, और ये फिल्म के लिए सटीक भी है. जिन नौजवानों को इस नाम के बारे में तनिक भी शक--शुबहा हो, उन्हें बता दूँ, एक वक़्त था जब महबूब दिखे तो सानू, चिट्ठियां लिखें तो सानू, मुलाक़ात हो तो सानू और दिल टूटे तो भी सानू! 90 का दशक था ये, जब कुमार सानू के हर गाने में हम अपने लिए इमोशंस ढूंढ ही लेते थे! गानों की रिकॉर्डिंग के लिए ऑडियो कैसेट की दूकान के आगे-पीछे मंडराते रहते थे. शरत कटारिया की  'दम लगा के हईशा' उसी वक़्त और मूड की 'बड़ी' सी ख़ुशी बिखेरती एक छोटी सी फिल्म है, जो आपको जी भर के गुदगुदाती है और हंसी-हंसी में ही आँखें नम कर जाती है.

बेमेल की शादियां कोई नहीं बात तो है नहीं इंडिया में, पर बॉलीवुड इस मुद्दे पर भी ज्यादा कुछ हिम्मत दिखाने से बचता रहा है मसलन, नायिका का डील-डौल! पिछली बार कब आपने किसी मेनस्ट्रीम सिनेमा में दोहरे, भरे-पूरे बदन वाली लड़की को मुख्य किरदार में देखा है, वो भी यशराज फिल्म्स जैसे बड़े लेकिन बचते-संभलते बैनर की फिल्म में? ['गिप्पी' तो बहुतों को याद भी नहीं होगी]. 90's के हरिद्वार में, प्रेम प्रकाश तिवारी [आयुष्मान खुराना] का विवाह कु. संध्या वर्मा [भूमि पेडणेकर] के साथ संपन्न हुआ है. तिवारीजी [संजय मिश्रा] का लौंडा दसवीं फेल है, शाखा का रेगुलर सदस्य है और ऑडियो कैसेट की दूकान चलाता है! संध्या बी.एड. कर चुकी है और टीचर बनना चाहती है। सुनने में कोई हर्ज़ नहीं, पर देखने में है। संध्या को अक्सर उसके 'तंदरूस्त' व्यक्तित्व के लिए ताने सुनने पड़ते हैं, और कुमार सानू के परम भक्त प्रेम प्रकाश तिवारी को तो कोई जूही चावला चाहिए थी। नतीज़ा, दोनों परिवारों के लगातार दखल के बावज़ूद इस विवाह में प्रेम की जगह बनती नहीं दिखती। अंत में, ले दे कर इस डूबते रिश्ते को एक स्थानीय प्रतियोगिता का ही सहारा है जहां जीतने के लिए रिश्तों का बोझ उठाकर भागना है और जीत का एक ही मन्त्र है आपसी ताल-मेल!

फिल्म यशराज की भले ही हो, जब अनुपम खेर के 'कूल डैड' की जगह संजय मिश्रा का 'चप्पल से पीटने वाला बाप' हो, जब 'घिसी-पिटी' रीमा लागूओं और फरीदा जलालों की जगह अलका अमीन और सीमा पाहवा के 'सीधी-सादी' माओं ने ले रखी हो तो फिल्म से नए की उम्मीद रखना बेमानी और बेवजह नहीं है. हालाँकि फिल्म का कथानक कहीं-कहीं 'चमेली की शादी' की याद दिलाता है खासकर शाखा वाले प्रकरण, पर कहानी की साफगोई और किरदारों की सच्चाई फिल्म को शुरू से अंत तक मजेदार बनाये रखते हैं! माँ का बेटी को वीसीआर पर एडल्ट फिल्में देख कर पति को रिझाने का सुझाव हो या मन-मुटाव के वक़्त गुस्सा दिखाने के लिए बार-बार अपने-अपने पसंदीदा गाने बजाने की ज़िद, फिल्म ऐसे खुशनुमा पलों से पटी पड़ी है. गाने सुनते वक़्त वरुण ग्रोवर के गीतों  को नज़रअंदाज़ करना आसान नहीं होगा! उनके लफ़्ज़ों में एक सोंधापन तो है ही, रस भी बहुत है!

अभिनय की दृष्टि से, फिल्म में छोटे से छोटा किरदार भी निराश नहीं करता, संजय मिश्रा, अलका अमीन, सीमा पाहवा, शीबा चड्ढा तो फिर भी मंजे हुए कलाकारों की जमात है. फिल्म की कास्टिंग डायरेक्टर शानू शर्मा का प्रयास सराहनीय है. आयुष्मान खुराना को इस तरह के रोल की दरकार काफी वक़्त से थी जहां वे सिर्फ अपने किरदार को जीते हुए दिखाई देते हैं, एक नए रंग में अपने आपको पेश करते हैं. पर इन सबसे कहीं ज्यादा अलग और ऊपर नज़र आतीं हैं भूमि पेडणेकर! सही मायनों में अगर 'दम लगा के हईशा' में दम है तो भूमि उसकी एक बहुत 'बड़ी' वजह हैं. हाल के सालों में किसी नए कलाकार का ये सबसे प्रभावशाली अभिनय है. हालाँकि कि उनमें आम हीरोइनों जैसी कोई बात नहीं है, और यही उनकी ख़ास बात है. देखना बाकी रहेगा कि अब आगे बॉलीवुड के पास उनके लिए क्या है ?

आखिर में, 'दम लगा के हईशा' एक दिल छू लेने वाली फिल्म है, जो अपनी ईमानदारी, सच्चाई और साफ़दिली से आपको अपना बना लेती है! फिल्म के अंत में आयुष्मान और भूमि 90's के गानों की तर्ज़ पर नाचते-गाते दिखाई देते हैं, बिलकुल गोविंदा-शिल्पा शेट्टी या अजय देवगन- तब्बू की जोड़ी की तरह. उस गाने में अगर किसी को देखना है तो भूमि को देखिये...ये सपने सच होने जैसा ही है, सिर्फ भूमि के लिए नहीं, हर आम दिखने वाले दर्शक के लिए! बॉलीवुड ऐसी दरियादिली बहुत कम ही दिखाता है, तो पूरा मज़ा उठाईये! जरूर देखिये!! [3.5/5]