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Friday, 5 August 2016

चौथी कूट: नए सिनेमा की एक अलग भाषा! [4/5]

80 के दशक का पंजाब दहशत और अविश्वास के माहौल में दबी-दबी सांसें ले रहा है. पुलिसिया बूट पर पॉलिश चढ़ रही है. सरकारी वर्दी गेंहू और गन्ने के खेतों में उग्रवादी खोज रही है. दोनाली बंदूकों की बटों ने बेक़सूर पीठों पर अपने नीले निशान छोड़ने सीख लिए हैं. अपने ही कौम के काले चेहरों से रात और भी भयावह लगने लगी है. कौन किसपे ऐतबार करे? कौन अपनी हद में है, और कौन शक की ज़द में? किसे पता. गुरविंदर सिंह की पंजाबी फिल्म ‘चौथी कूट’ कहानी कह भर देने की जल्दबाजी नहीं दिखाती, बल्कि कहानी जीने का आपको पूरा-पूरा वक़्त और मौका देती है. आतंक यहाँ सुनसान गलियों के सन्नाटे में पलता है, डरे हुए चेहरों पे चढ़ता है और धीरे, बहुत धीरे, सहमे-सहमे क़दमों से आप तक पहुँचता है. ये एक अलग भाषा है. सिनेमा में एक अलग तरीके की भाषा, जो ठहराव से हलचल पैदा करना चाहती है, और इस बेजोड़ कोशिश में बखूबी कामयाब भी होती है.

पंजाबी के बड़े कहानीकार वरयाम सिंह संधू की कहानियों पर पैर जमाये, गुरविंदर सिंह की ‘चौथी कूट’ शुरू होती है फ़िरोजपुर छावनी रेलवे स्टेशन से. पुलिस की गश्त चप्पे-चप्पे पर है. चंडीगढ़ से अमृतसर लौट रहे दो हिन्दू सहयात्रियों की ट्रेन छूट गयी है. एक ट्रेन आई तो है पर उसे अमृतसर तक खाली ले जाने का आदेश है. इसी बीच एक सरदारजी भी उन दोनों की जरूरत में साझा करने आ गए हैं. तय हुआ कि गार्ड के डिब्बे में बैठकर जाया जा सकता है. गार्ड की आनाकानी के बावजूद, तीनों अब जबरदस्ती ट्रेन पर सवार हैं. डब्बे में पहले से और भी यात्री मौजूद हैं. सबके चेहरे सपाट हैं, सुन्न हैं, शून्य हैं. सब एक-दूसरे को पढ़ने की कोशिश कर रहे हैं. ‘नहीं जानने’ और ‘जान लेने’ के बीच अविश्वास की एक लम्बी-चौड़ी खाई है. ये डब्बा ‘डर’ का डब्बा है. इससे निकलने के बाद ही इससे ‘निकलना’ मुमकिन हो शायद!

इसी पंजाब के किसी दूसरे हिस्से में, कुछ सहमे कदम रास्ता भूल गए हैं. रात गहरी है. गाँव की लड़की पति और बच्ची के साथ घर आ रही है. सामने के खेतों में एक घर तो है. मदद माँगने का जोखिम लें? संशय और खौफ का दबदबा यहाँ भी काबिज़ है. दरवाजे के बाहर भी, दरवाजे के अन्दर भी. घर में एक कुत्ता है. अपनी कौम के लिए लड़ने वालों ने पहले ही चेताया है, कुत्ते को मारो या दूर छोड़ आओ. रातों में इसका भौंकना मुखबिरी से कम नहीं. रात को अपनी ‘कौम’ वाले तो दिन में बूट ठोकते जवान, पंजाब के लिए तय करना मुश्किल हो रहा है कि कौन कम वहशी है, कौन ज्यादा?

पिछले साल मुंबई फिल्म फेस्टिवल (MAMI) में कोलंबियन फिल्म ‘लैंड एंड शेड’ देखी थी. कैमरा और साउंड जिस ख़ूबसूरती से उस फिल्म के परिदृश्य में रची-बसी खुशबू, गीलापन और किरकिराहट आप तक छोड़ जाते हैं, ‘चौथी कूट’ उसी प्रयोग की एक बार और याद दिला देती है. काले बादलों घिर रहे हैं, तेज़ हवा फसलों को झकझोर रही है. खेत के बगल से गुजरने वाले रस्ते पर धूल का एक मनचला गुबार लोटते-पोटते कैमरे की ओर बढ़ रहा है. बारिश की बौछार आपके चेहरे तक पहुंच रही है. बारिश के बाद भी, शीशे जैसी साफ़ बूँदें पत्तों के किनारे पकड़ कर अभी भी लटकी हुई हैं. सत्या राय नागपाल कुछ तो ऐसे अप्रतिम दृश्य बनाते हैं, जिन्हें आपने परदे पर पहले कभी इतनी चाव से जिया नहीं होगा. हालाँकि कुछ एक बार उनके प्रयोग आपको चौंकाने में नाकामयाब रहते हैं, जैसे एक दृश्य में कैमरा अचानक जमीन चाटने लगता है तो आपको यह जानने में कोई बहुत दिक्कत नहीं होती कि अब किरदार गिरने वाला है.

आखिर में; ‘चौथी कूट’ आपको किसी तय मुकाम तक लेकर जाने का दावा पेश नहीं करती, बल्कि बड़ी सफाई से आपको उसी रास्ते पर छोड़ देती है, जहां से आपके लिए मंजिल तक पहुंचना मुश्किल नहीं रह जाता. बहुत कम फिल्में होती हैं, जिनकी जबान कम बोलते हुए भी बहुत कुछ कह जाती है. बहुत कम फिल्में मिलती हैं, जिनकी जबान में एक नया स्वाद होता है. ‘चौथी कूट’ उसी कड़ी में बड़ी मजबूती से खड़ी मिलती है. [4/5]               

Friday, 3 June 2016

तिथि [कन्नड़]: ...ये जो है ज़िन्दगी! [4.5/5]

जिन्दगी की कठोर, निर्मम, धीर-गंभीर सच्चाईयां जो हास्य उत्पन्न करती हैं, उनका कोई सानी नहीं. करीने से सजे-सजाये, चटख रंगों में रंगे-पुते, ठंडे-हवादार कमरों में बैठकर गढ़े गए चुटकुलों की शेल्फ़-लाइफ़ कुछ घंटों, कुछ दिनों से ज्यादा की कतई नहीं होती, पर असल जिन्दगी के दांव-पेंच कुछ अलग ही मिज़ाज के होते हैं. आपकी व्यथा, आपकी पीड़ा, आपका दुःख कब किसी दूसरे के लिए हास्य का सबब बन जाता है, आपको अंदाज़ा भी नहीं रहता. कुल मिला के 26 साल के हैं फ़िल्मकार राम रेड्डी, पर अपनी पहली ही कन्नड़ फिल्म ‘तिथि’ में जिस सफाई से ज़िन्दगी को उधेड़-उधेड़ कर आपके सामने फैलाते हैं और फिर उतनी ही बारीकी से उसे किरदारों के इर्द-गिर्द बुनते भी हैं, उसे देखकर अगर आप बड़े हैं तो हैरत और अगर बराबर उम्र के हैं तो जलन होना लाज़मी है.

कर्नाटक के दूर किसी एक छोटे से गाँव में, कच्चे रास्ते के उस पार बैठा एक बूढा आदमी [सिंगरी गौड़ा] आने-जाने वालों पर तीखी फब्तियां कस रहा है. बच्चे हंस रहे हैं. औरतें बिना कोई तवज्जो दिए आगे बढ़ जाती हैं. थोड़ी ही देर बाद गली के अगले मोड़ पर बूढ़ा आदमी लुढ़का हुआ मिलता है. शोर मच गया है, “सेंचुरी गौड़ा मर गए”. सेंचुरी नाम उन्हें सौ साल पूरे कर लेने पर मिला था. अंतिम-क्रिया के लिए जोह भेजा जा रहा है, पर बड़ा बेटा गडप्पा [चन्नेगौड़ा] निरा औघड़ है. एक नंबर का घुमक्कड़ और टाइगर ब्रांड लोकल व्हिस्की का पियक्कड़. 11 दिन बाद की ‘तिथि’ निकली है. आस-पास के गाँवों से कम से कम 500 लोगों को मांसाहारी भोज कराना होगा. सारे का सारा दारोमदार अब गडप्पा के बेटे तमना [थम्मेगौड़ा] के माथे है. जरूरी पैसों के लिए जमीन बेचना होगा, पर उस से पहले ज़मीन गडप्पा से अपने नाम लिखवानी पड़ेगी. गडप्पा माने तब ना?

फिल्म में बहुत कम मौके ऐसे आते हैं, जब आपको ‘तिथि’ के एक फिल्म होने का एहसास होता है, वरना तो लगता है जैसे आपको उठा कर कर्नाटक के उसी गाँव में रख दिया गया हो. रिश्तों में रस्साकशी हो, दुनियादारी का जंजाल हो, किरदारों का ठेठपन हो या फिर ज़िन्दगी जीने का पूरे का पूरा लहजा, फिल्म अपनी ईमानदारी से आपको भौंचक्का कर देती है. इतना वास्तविक, इतना कठोर होते हुए भी फिल्म आपको कभी भी उदासी के अंधेरों की ओर नहीं धकेलती, बल्कि एक हँसी की चमकार हमेशा आपके चेहरे पर बिखेरती रहती है. एक बानगी देखिये. चिता की आग ठंडी हो गयी है. राख में से अस्थियाँ खंगाली जा रही हैं. बातचीत सुनिए. “ये पसली है पसली...रख लो” “ये पैर की हड्डी है” “पैर? इतना छोटा??”.

राम रेड्डी की ‘तिथि’ कहानी कहने के लिए सांचे में कैद अभिनेताओं का सहारा नहीं लेती. फिल्म के सभी प्रमुख किरदार गाँव के आम लोग हैं, नॉन-एक्टर्स जिन्हें कैमरा की भाषा पढ़ने में भले ही दिक्कत आती हो, पर हर सीन को परदे पर जिंदा कर देने का हुनर खूब आता है. इनकी झिझक, इनका अनगढ़ रवैया ही फिल्म की जान बन जाता है. फिल्म कहीं कहीं बहुत क्रूर होने की भी कोशिश करती है, ख़ास कर उस एक दृश्य में जहां गडप्पा अपनी ज़िन्दगी की कहानी के कुछ पुराने पन्ने पलटने लगते हैं. हालाँकि फिल्म 2 घंटे 14 मिनट की अपनी पूरी अवधि में अक्सर छोटे-छोटे पलों में जीती और कुछ बहुत ही खूबसूरत चित्रों में सिमटती दिखाई देती है, पर अंततः इसके रसीले, मीठे, थोड़े मतलबी पर सच्चे किरदार ही है जो इसे एक जिंदा फिल्म बनाये रखने में कामयाब होते हैं.

तिथि’ देखना, न देखना सिर्फ इसी एक एहसास से जुड़ा है कि आप कितनी बेसब्री, कितनी चाहत से अपनी जड़ों की ओर लौटना चाहते हैं. मोटरसाइकिल पर तीन पहले से ही विराजमान है, पर चौथे के हाथ दे देने पर जगह बन ही जाती है. अब इतने थोक में ईमानदारी कहाँ मिलती है आजकल की बड़ी-बड़ी फिल्मों में? [4.5/5]        

Friday, 26 June 2015

किल्ला (मराठी): दोस्ती, ज़िन्दगी, और सिनेमा! [४/५]

उम्र का कोई निश्चित पड़ाव हो जहां पहुँच कर लगे कि अब आप बड़े हो गए हैं, ऐसा दावा कोई नहीं कर सकता! हालाँकि १८ साल की उम्र संवैधानिक रूप से आपको बालिग बना सकती है पर सच तो यह है कि ज़िंदगी ने हम सभी के लिए एक अलग चक्रव्यूह की रूपरेखा पहले ही सोच रखी है। कभी-कभी बारिश की चार औसत सी दिखने वाली बूँदें भी आपकी बेजान-बंजर रूह तर कर जाती है, तो कभी सरकंडे की आग पर भुनी मछली का पहला अधपका सा स्वाद ही काफी होता है आपको उम्र के उस दूसरी तरफ ठेलने के लिए! अविनाश अरुण की 'किल्ला' हम सभी 'बड़े हो चुके' बच्चों को किसी बहुत चमकदार तो नहीं पर असरदार टाइम-मशीन की तरह हमारे उस 'एक साल' में ले जा छोड़ती है, जिसकी धुंधली सी याद अब भी जेहन में किसी ढीठ किरायेदार की तरह जम के बैठी है।

११ साल के चिन्मय [अर्चित देवधर] के लिए कुछ भी आसान नहीं है. पिता को खोने का खालीपन बचपन को कुरेद-कुरेद कर खा ही रहा था कि अब माँ [अमृता सुभाष] के तबादले से उपजी नयी अजनबी-अनजान जगह की खीज़। चाहते न चाहते हुए भी चीनू को दोस्तों की एक दुकान मिल ही जाती है, उसके नए स्कूल में। बीच की बेंच पर बैठने वाला वो मस्तमौला-घुड़कीबाज़-शरारती बंड्या [पार्थ भालेराव], सबसे पीछे बाप के पैसों से सजा-सजाया युवराज और एक-दो 'हर बात में साथ' साथी। कोई याद आया? एक पुराना सा सीलन लिए नाम तो जरूर कौंधा होगा, आखिर हम सब हैं तो एक ही मिट्टी की पैदावार। 

'किल्ला' एक मासूम, पर उदास मन की संवेदनाओं का सहेजने योग्य दस्तावेज़ है। नए परिवेश से जुड़ने की मजबूरी और न जुड़ पाने की कसक चिन्मय के रवैये में जिस तरह नज़र आती है, खुद को टूटने से रोक पाना बड़ा मुश्किल हो जाता है। माँ की भी अपनी उलझनें कुछ कम नहीं हैं। नौकरी में बड़ी कुर्सियों पर बैठे लोगों के दबाव और अकेलेपन की कचोट के बीच पिसती अरुणा फिर भी अपनी पनीली आँखों में काफी कुछ बाँधे रखती है। दीवार पर गालियां लिखने और समंदर से केकड़े पकड़ कर बाजार में बेचने की शरारतों के बीच चिन्मय का अकेले पड़ जाने का डर तब खुलकर सामने आता है, जब मूसलाधार बारिश के बीच उसके दोस्त उसे एक भयानक से दिखने वाले सुनसान किले में अकेला छोड़ आते हैं। 'किल्ला' को 'किल्ला' होने की ऊपरी वजह शायद तभी मिलती है पर यह फिल्म उससे कहीं बढ़कर है. फिल्म खत्म होने से पहले कई बार अपना अंत तलाशती नज़र आती है, और अंत में जब खत्म होती है तो एक नयी शुरुआत की उम्मीद के साथ!

'किल्ला' मेरे लिए किरदारों से ज्यादा लम्हों की फिल्म है. छोटी-छोटी झलकियों में सिमटती-आसमान में खुलती खिड़कियों से झांकती एक बड़ी फिल्म। एक हलकी सी मुस्कान, एकटक तकती आँखों का रूखापन, लहरों के थपेड़े सहती एक बंद मोटरबोट, बारिश में दीवार से लगी एक साईकिल, एक भिगो देने वाला 'सॉरी' और पीछे छूटता बचपन, जो शायद ही कभी छूटता हो! अमृता सुभाष बेहतरीन हैं. अर्चित देवधर चिन्मय की बारीकियों को परदे पे एक सधे हुए अदाकार की तरह बखूबी उकेरते हैं. पार्थ भालेराव को 'भूतनाथ रिटर्न्स' में आप पहले भी देख चुके हैं, 'किल्ला' में एक बार फिर वो आपको गुदगुदा कर लोटपोट कर देंगे।

'साल की सबसे अच्छी मराठी फिल्म' के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार का तमगा लिए, अविनाश अरुण की 'किल्ला' ज़िंदगी की किताब का वो पन्ना है जिसे आप बार-बार पढ़ना चाहेंगे। वो भूली हुई डायरी, जो आज भी हाथ लग जाए तो आप सब कुछ छोड़-छाड़ के बैठ जाएंगे, उसके कुछ किरदारों से दुबारा उसी गर्मजोशी से मिलने के लिए! जरूर देखिये, सिनेमा के लिए-दोस्ती के लिए-ज़िंदगी के लिए! [४/५]

Friday, 17 April 2015

कोर्ट (मराठी): सिर्फ सच...और सिनेमा! सिनेमा और सच के सिवा कुछ नहीं!! [4.5/5]

अगर आप कभी असल ज़िंदगी में कोर्ट नहीं गए, तो प्रबल संभावना है कि आपके मन में कोर्ट की जो थोड़ी-बहुत परिकल्पना होगी, हिंदी फिल्मों से उधार ली हुई होगी। जहां वकील 'तू डाल-डाल, मैं पात-पात' की तर्ज़ पर गला-काट जिरह कर रहे होंगे, मुलज़िम कुशल कारीगरी से बनाये गए बड़े से कठघरे पे हाथ टिकाये बार-बार 'योर ऑनर, ये झूठ है' का जुमला फेंक रहा होगा और जज साहब भी इंसाफ का हथौड़ा 'ऑर्डर-ऑर्डर' की धुन पर बजाने में पूरी तरह मशगूल होंगे। भारत में जहां हज़ारों-लाखों मुकदमे सालों से 'तारीख़ पे तारीख़' का दर्द झेल रहे हैं, कोर्ट में इस तरह के अति-उत्साह, अप्रत्याशित जोश और अविश्वसनीय रोमांच की उम्मीद करना एक तरह से बेवकूफ़ी ही होगी। ऐसा ही कुछ चैतन्य तम्हाणे की राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता फिल्म 'कोर्ट' के बारे में भी कहा जा सकता है! यथार्थ के इतने करीब एक ऐसी फिल्म जिसमें बनावटीपन 'दाल में नमक' जितना है, वो भी एकदम सही मात्रा में, कम- ज्यादा!

मराठी के जुझारू लोक-गायक, गीतकार-लेखक और विचारक नारायण कांबले [वीरा साथीदार] पर पहले भी सरकार-विरोधी, जाति-संप्रदाय विरोधी और सामाजिक उत्तेजना भड़काने के आरोप लगते रहे हैं पर इस बार उन्हें एक मजदूर को आत्महत्या के लिए उकसाने के इल्ज़ाम में पुलिस ने गिरफ़्तार किया है! दो दिन पहले अपने एक जोशीले गीत में कांबले ने 'इस तरह जीने से तो गटर में डूब कर मर जाना अच्छा' का शंख फूँका था, और आज सफाई-कर्मचारी वासुदेव पवार गटर में मरा पाया गया. बहरहाल, मामला कोर्ट में पहुँच गया है! सरकारी पक्ष की वकील नूतन [गीतांजलि कुलकर्णी] ने दो-ढाई पेज का मुकदमानामा एक सांस में खत्म कर दिया। बचाव-पक्ष के वकील विनय [विवेक गोम्बर] जमानत लेने में असफल रहे. अगली तारीख मिल गई है. नूतन मुंबई की लोकल ट्रेन में पति की डायबिटीज़ और खाने में कम तेल इस्तेमाल करने फायदे बता रही हैं. विनय डाइनिंग टेबल पर अपने माँ-बाप से शादी करने के मुद्दे पर लड़ रहा है. अगली तारीख पर दोनों फिर आमने-सामने हैं, पर एक अहम गवाह की तबियत ख़राब है! एक और तारीख से यहां किसी को कोई तकलीफ़ नहीं, फैसले की किसी को कोई जल्दी भी नहीं।

गौरतलब हो कि इन सबके बीच मृणाल देसाई का कैमरा थोड़ी दूरी बनाकर, एकदम सांस रोके चुपचाप आपको वास्तविकता का स्वाद चखा रहा है, जैसे आप सिनेमाहॉल में नहीं, वहीँ कहीं एक कुर्सी पकड़ के बैठे हों. फिल्म के एक दृश्य में बचाव पक्ष के वकील एक रेस्टोरेंट से बाहर निकल रहे हैं, कैमरा सड़क के पार से उन्हें देख रहा है, एकदम स्थिर। एक ख़ास जाति के दो लोग वकील साब के मुंह पर कालिख पोतने लगते हैं, फ्रेम में सिर्फ रेस्टोरेंट का दरबान दिख रहा है और बाकी का पूरा घटनाक्रम आप सिर्फ आवाज़ों के जरिये देख पा रहे हैं. बेहतरीन प्रयोग!

फिल्म को सच्चाई का रंग देना हो तो कलाकारों का किरदारों में ढल जाना बहुत जरूरी है। 'कोर्ट' में पता लगाना मुश्किल हो जाता है कि कौन अभिनेता है? और कौन असली किरदार? अगर आप गीतांजलि कुलकर्णी को पहचानते नहीं तो पहले दो दृश्यों में आप उन्हें कोई असल ज़िंदगी की वकील समझने की भूल यकीनन कर बैठेंगे, जिसे नाटकीय अभिनय का '--' भी नहीं आता! हालाँकि उनके मुकाबले विवेक गोम्बर थोड़े ज्यादा सचेत नज़र आते हैं, पर 'शिप ऑफ़ थीसियस' के बाद ये एक ऐसी फिल्म है जिसमें अभिनय, अभिनय नहीं लगता, संवाद रटे-रटाये नहीं लगते और फिल्म कुल मिलाकर भारतीय सिनेमा को एक नए मुकाम पे ला खड़ा करती है!

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर सत्ता का पौरुष-प्रदर्शन देखना हो या सदियों पुराने तौर-तरीकों और सामाजिक मान्यताओं को आधार-स्तम्भ बनाये बैठी भारतीय न्याय व्यवस्था की जीर्ण-शीर्ण, जर्जर हालत की बानगी देखनी हो तो और किसी कोर्ट के दरवाजे खटखटाने की जरूरत नहीं, बेहिचक चैतन्य तम्हाणे की 'कोर्ट' देख लीजिये! साल की सबसे अच्छी फिल्म, अब तक की! [4.5/5]