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Sunday, 24 December 2017

हमें नाज़ है जिन पर...(2017's 10 Best Hindi Movies)


Trapped
ट्रैप्ड’ भारतीय सिनेमा में ‘सर्वाइवल ड्रामा’ का एक नया अध्याय बड़ी ईमानदारी और पूरी शिद्दत से लिखती है. किशोरावस्था की चुनौतियों से लड़ते ‘उड़ान’ और सिनेमाई परदे की क्लासिक प्रेम-कहानियों को श्रद्धांजलि देती ‘लुटेरा’ के बाद; विक्रमादित्य मोटवाने की ये छोटी सी फिल्म हिंदी सिनेमा के बड़े बदलाव का एक अहम् हिस्सा है. एक ऐसी फिल्म, जिस पर फ़िल्मी दर्शक के रूप में आपको भी नाज़ होगा. कुछ ऐसा जो आपने हिंदी सिनेमा में पहले कभी नहीं देखा.

Tu Hai Mera Sunday
'तू है मेरा सन्डे' हिंदी सिनेमा को एक नया विस्तार देने में बड़ी फिल्म साबित होने का पूरा माद्दा रखती है. 'पैरेलल सिनेमा मूवमेंट' और 'मेनस्ट्रीम मसाला' फिल्मों के बीच, याद कीजिये, कभी साफ़-सुथरी, सरल-सहज, सुगढ़ फिल्मों का एक और दौर दिलों में अपनी जगह बनाया करता था, टीवी पर आते हुए जो आज भी  सालों-साल आपके मनोरंजन की रंगत फीकी नहीं पड़ने देता; 'तू है मेरा सन्डे' उन्हीं तमाम अपनी सी लगने वाली फिल्मों में से एक है.

Poorna
देश में विकास का जो सारा ताना-बाना शहरों और गाँवों को जोड़ने की बात करता है, ‘पूर्णा’ काफी हद तक उसकी कड़वी सच्चाई आप तक पेश कर पाती है. ‘पूर्णा’ आपको कचोटती है, जब आप शादी के जंजाल में बाँध दी गयी प्रिया को पहली बार साड़ी में देखते हैं. ‘कुछ कर गुजरने’ की चाह लिए मोटी-मोटी आँखों वाली बच्ची को ‘सब कुछ करने-सहने वाली’ औरत बनाने पर हम कैसे और क्यूँ आमादा हो जाते हैं? ‘पूर्णा’ आपको अन्दर से तोड़ देती है, जब सिर्फ 13 साल की पूर्णा को आप हालातों से लड़ते-झगड़ते-बढ़ते देखते हैं. हालाँकि प्रवीण कुमार जैसे जज्बाती और जुझारू लोगों की ईमानदार कोशिशों पर रौशनी डालकर, ‘पूर्णा’ उम्मीदें भी बहुत जगाती है. सिनेमा के लिए भी, समाज के लिए भी.

Mukti Bhawan
मुक्ति-भवन’ जीवन-मृत्यु के घोर-चिंतन और रिश्तों की पेचीदगी को बड़ी परिपक्वता और पूरी संजीदगी से कुछ इस तरह परदे पर जिंदा करती है, कि आप जिंदगी से कहीं ज्यादा मौत के फ़लसफ़े का आनंद लेने में मग्न रहते हैं. फिल्म में मिश्राजी बिना बात राजीव को मशवरा देते हैं, “आप पान खाया कीजिये!”, ‘मुक्ति-भवन’ के लिए मैं भी कुछ ऐसा ही कहूँगा, “देख आईये! कुछ बातों के लिये वजहें खोजने की जरूरत नहीं. कुछ बातों को वजहों की दरकार नहीं.” सिनेमाई परदे पर जीवन-मृत्यु को लेकर दर्शन-चिंतन और मनोरंजन का इतना सटीक मेल-मिलाप पिछली बार रजत कपूर की ‘आँखों-देखी’ में ही दिखा था.

kadvi Hawa
'कड़वी हवा' जिस ठहराव के साथ आपको खेतिहर किसानों की जिंदगी में उठते-बनते झंझावातों की तरफ धकेलती है, आप चाह कर भी उन ज़ज्बातों से अछूते नहीं रह पायेंगे. दृश्यों को सच्चाई के एकदम आसपास तक लाकर छोड़ जाने में नील माधव पंडा बखूबी सफल रहते हैं. गर्मी से बदहाल सरकारी बैंक के कर्मचारी बनियान में ही अपना काम निपटा रहे हैं. पैसों की वसूली के लिए यमराज बने घूमते गन्नू पर भी दूधवाले का दो महीने से पैसा उधार है. इसी संजीदगी के साथ 'कड़वी हवा' पहले तो आपको किरदारों से जोड़ती है, फिर उनकी कहानी का हिस्सा बनने का पूरा-पूरा मौका देती है, ताकि अंत तक आते-आते जब एक नाटकीय मोड़ के सहारे आपको फिल्म और कहानी के मुख्य खलनायक (क्लाइमेट चेंज) से रूबरू होना पड़े, तो न सिर्फ आप सिहर उठें, बल्कि थिएटर छोड़ते-छोड़ते इस बेहद जरूरी मुद्दे को कम आंकने की भूल से भी बचें.

Anaarkali of Aarah
‘अनारकली ऑफ़ आरा’ तरह-तरह के (अच्छे, बुरे) मर्दों से भरी एक ऐसी गज़ब की फिल्म है, जिसमें एक औरत ‘नायिका’ बन के उभरने का इंतज़ार नहीं करती, और ना ही ‘नायिका’ बनने के तुरंत बाद वापस अपने ढर्रे, अपने सांचे, अपने घोंसले में लौट जाने का समझौता! अविनाश दास से शिकायत बस एक ही रहेगी कि काश, ये फिल्म, अपनी पृष्ठभूमि और बोल-चाल, लहजे की वजह से, भोजपुरी भाषा में बनी होती या बन पाती! कम से कम, उस डूबते जहाज़ के हिस्से एक तो मज़बूत हाथ आता, जो उसे अकेले किनारे तक खींच लाने का दमख़म रखता है!

Newton
न्यूटन की ईमानदारी, उसकी साफगोई, बदलाव के लिए उसकी ललक कहीं न कहीं आपको उसकी तरफ खींच कर ले जाती है. ऐसे न्यूटन अक्सर सरकारी दफ्तरों में किसी अनजाने टेबल के पीछे दफ़न भले ही हो जाते हों, उनकी कोशिशों का दायरा भले ही बहुत छोटा रह जाता है, पर समाज में बदलाव की जो थोड़ी बहुत रौशनी बाकी है, उन्हीं से है. ठीक 9 बजे ऑफिस आ जाने वालों पर हँसते तो हम सभी हैं, पर शायद ऐसे न्यूटन भी उन्हीं में से एक होते हैं. फिल्म में ट्रेनर की भूमिका में संजय मिश्रा फरमाते हैं, "ईमानदार होके आप कोई एहसान नहीं कर रहे, ऐसा आपसे एक्सपेक्टेड है'. कम से कम फिल्म इस कसौटी पर सौ फीसदी सही साबित होती है.

Gurgaon
'गुड़गांव' नए हिंदी सिनेमा आन्दोलन का एक अहम हिस्सा है. अपराध की फिल्मों का एक ऐसा अलग चेहरा, जो घटनाओं को ताबड़तोड़ खून से रंग देने की बजाय आपको उस अँधेरे माहौल में पहले धकेल देती है, जहां खेल रचने वाला है. हो सकता है, कई बार आप उकता जायें, या घुटन सी होने लगे; पर एक बार जो नशा चढ़ा, दिनों तक उतरेगा नहीं.

A Death in The Gunj
‘अ डेथ इन द गंज’ उन चंद रोमांचक बॉलीवुड फिल्मों में से है, जो आपके अन्दर सिहरन पैदा करने के लिए कोई झूठा खेल नहीं रचतीं, बल्कि आपको उस माहौल में हाथ पकड़ कर खींच ले जाती हैं, जहां आप हर वक़्त अपने दिल-ओ-दिमाग़ के साथ ‘जो हुआ, वो कैसे हुआ’, ‘जो हुआ, वो किसके साथ हुआ’ और ‘जो हुआ, वो कब होगा’ की लड़ाई लड़ते रहते हैं. ‘अ डेथ इन द गंज’ इस साल की ‘मसान’ है, उतनी ही ईमानदार, उतनी ही संजीदा, उतनी ही रोचक!

Lipstick under my Burkha
'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' एक कोशिश है कि आप औरतों की शख्सियत का वो पहलू भी देख पायें, जहां उनकी पहचान माँ, बेटी, बहन, बीवी से अलग हटकर सिर्फ और सिर्फ एक औरत होने की है. मर्दों के बदलने का इंतज़ार छोड़िये, अगर फिल्म देख कर औरतें भी अपने आप और अपनी ख्वाहिशों के लिए कदम बढ़ाने की हिम्मत जुटा पायें; समझिये लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' की कामयाबी वहीँ कहीं मिलेगी. फिल्म के आखिर में चारों अहम् किरदार (बुआजी, लीला, शीरीन, रिहाना) तमाम गहमा-गहमी के बीच एक कमरे में बैठ कर रोज़ी की कहानी का अंत पढ़ने में मशगूल हो जाते हैं; कोई क्रांति नहीं आती, कोई भूचाल नहीं आता. वो आपको करना है, और अगर आप पहलाज निहलानी नहीं हैं, तो ये ज्यादा मुश्किल भी नहीं है.

Friday, 31 March 2017

पूर्णा: सिनेमा और समाज के बीच की ‘उम्मीद’...कायम रहे! [4/5]

एवरेस्ट सिर्फ इसलिए नहीं चढ़ना है, क्यूंकि एवरेस्ट बड़ा है, सबसे बड़ा. वजह बड़ी होनी चाहिए, उससे भी बड़ी. तेलंगाना के एक आदिवासी इलाके की पूर्णा महज़ 13 साल की है. भूख, गरीबी, अशिक्षा जैसी मुसीबतों का पहाड़ पहले भी लांघती आई है, पर एवरेस्ट-विजय करने की वो ‘बड़ी’ वजह अभी भी उसके पास नहीं है. वो वजह उसे मिलती है अपनी अक्का (बड़ी दीदी) की दम तोड़ती आँखों में; एक ऐसे चमकीले सपने की तरह, जिसमें पूर्णा ने एवरेस्ट फ़तेह कर ली है और अब उसके छोटे से गाँव को पूरी दुनिया जानती है. उम्मीद की एक चौड़ी सड़क उसके गाँव के बीच से होकर निकलने लगी है. पूर्णा को अब अपने लिए नहीं, अपनी अक्का, अपने गाँव और अपने जैसी हज़ारों दूसरी लड़कियों के लिए एवरेस्ट चढ़ना है. अब एवरेस्ट बड़ा नहीं रहा, वजह बड़ी हो गयी.

पूर्णा’ के साथ, निर्माता-निर्देशक और अभिनेता राहुल बोस सिनेमा के लिए भी कुछ ऐसी ही मिसाल पेश करते हैं. फिल्म बड़ी हो, न हो, उसके पीछे की वजह बड़ी होनी ही चाहिए. एवरेस्ट पर पहले भी आपने बहुत सारी फिल्में देखी होंगी (हिंदी में कुछ गिनती की, अंग्रेजी में ज्यादा); परदे पर एवरेस्ट को खलनायक की तरह अजेय, अभेद्य और विशालकाय दिखा कर, किरदारों को ‘नायक’ बनाने में लगभग सब की सब सफल भी रही हैं, पर राहुल जिस संजीदगी और समझदारी से अपना सारा ध्यान एवरेस्ट की उंचाईयों से हटाकर, तमाम सतही सामाजिक बुराइयों और गर्त में धंसते जा रहे समाज के कुछ ख़ास तबकों की तकलीफों पर केन्द्रित करते हैं, वो न सिर्फ काबिल-ऐ-तारीफ़ है, बल्कि उतना ही प्रेरक भी.

चचेरी बहनें प्रिया (एस मारिया) और पूर्णा (अदिति ईनामदार) सरकारी स्कूल में जाती तो हैं, पर उनका पूरा दिन झाड़ू लगाने में ही बीतता है. उनके पास फ़ीस के पैसे नहीं हैं. प्रिया गाँव से दूर एक ऐसे स्कूल में जाना चाहती है, जहां पढ़ाई के साथ-साथ खाना भी मिलता है. “अंडा मिलता है. कभी देखी भी हो?” पूर्णा नहीं में सर हिला देती है. फिल्म के एक दृश्य में, जहां लड़कियां आपस में ‘कौन कितना गरीब’ खेल खेल रही होतीं हैं, पूर्णा की मार्मिक दलील देखिये, “मेरे तो नाम में ही ‘पुअर’ (‘poor’na) है.” प्रिया की शादी हो गयी है, पर पूर्णा को प्रोत्साहित करना नहीं छोड़ती. पूर्णा अब उसी स्कूल में है, जहां उसे प्रवीण कुमार (राहुल बोस) के रूप में समाज कल्याण विभाग के कर्मठ, सशक्त और दूरदर्शी अधिकारी के शिक्षा के क्षेत्र में नए-नए सुधारों और सुझावों का साथ मिलता है.

सच्ची कहानी को उतने ही सच्चे तरीके से परदे पर लाने के लिए, राहुल फिल्म को वास्तविकता के इतने नज़दीक लेकर आते हैं कि कई बार आप सिनेमा और सच्चाई में फर्क ही महसूस नहीं कर पाते, ख़ास कर मुख्य कलाकारों (मारिया और अदिति) के अभिनय और बोल-चाल में. हालाँकि धृतिमान चैटर्जी, हीबा शाह, आरिफ़ जकारिया और खुद राहुल जैसे जाने-पहचाने चेहरों की मौजूदगी फिल्म को फिल्म समझ कर ही देखने के लिए बार-बार भटकाती रहती है, पर दूसरे कलाकार कुछ ज्यादा ही सहज रूप से कैमरे को नज़रअंदाज़ करने में सफल साबित होते हैं. राहुल निर्देशक के तौर पर भी खुद को बहुत संयमित रखते हैं. तकनीकी तौर पर बहुत ज्यादा उत्साहित होकर दर्शकों को चौंकाने या प्रभावित करने के लोभ से खुद को बचाए रखने में उनकी समझदारी साफ़ नज़र आती है. फिल्म के आखिरी हिस्से में वो सन्नाटे का जिस खूबी से इस्तेमाल करते हैं, परदे पर ही देखने की बात है.

देश में विकास का जो सारा ताना-बाना शहरों और गाँवों को जोड़ने की बात करता है, ‘पूर्णा’ काफी हद तक उसकी कड़वी सच्चाई आप तक पेश कर पाती है. ‘पूर्णा’ आपको कचोटती है, जब आप शादी के जंजाल में बाँध दी गयी प्रिया को पहली बार साड़ी में देखते हैं. ‘कुछ कर गुजरने’ की चाह लिए मोटी-मोटी आँखों वाली बच्ची को ‘सब कुछ करने-सहने वाली’ औरत बनाने पर हम कैसे और क्यूँ आमादा हो जाते हैं? ‘पूर्णा’ आपको अन्दर से तोड़ देती है, जब सिर्फ 13 साल की पूर्णा को आप हालातों से लड़ते-झगड़ते-बढ़ते देखते हैं. हालाँकि प्रवीण कुमार जैसे जज्बाती और जुझारू लोगों की ईमानदार कोशिशों पर रौशनी डालकर, ‘पूर्णा’ उम्मीदें भी बहुत जगाती है. सिनेमा के लिए भी, समाज के लिए भी.

मैले-कुचैले कपड़ों में, सिग्नल पर भीख मांगते बच्चों को तो हम अब भी डांट-डपट कर दुत्कार देंगे, सारा ठीकरा निकम्मी सरकारों के माथे फोड़ कर मुंह भी मोड़ लेंगे; पर ‘पूर्णा’ कम से कम अपने 105 मिनट के छोटे से वक़्त तक ही, आपको बेहतर इंसान बनाये रखने की एक कामयाब कोशिश तो करती ही है. 105 मिनट के बाद की जिम्मेदारी, समझदारी और ईमानदारी आपकी अपनी! [4/5]