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Friday, 26 July 2019

जजमेंटल है क्या: कुछ नया, कुछ रोमांचक...और थोड़ी सी कसर! [3/5]

आम जिंदगी की बात करें, तो किसी को भी बात-बात पर हंसी-मज़ाक में ‘पागल करार देने और वास्तव में किसी गंभीर मनोरोग से जूझते व्यक्ति को ‘मेंटल कह कर संबोधित करने में हम किसी तरह का कोई फ़र्क या अपराध-बोध महसूस भी नहीं करते. इसका काफी दारोमदार हमारी फिल्मों के सर भी जाना चाहिए. दिमाग़ी रूप से असंतुलित व्यक्ति को ‘दुनिया तबाह करने पर तुला हुआ खलनायक साबित करने के सिवा हमारी समझ कुछ और देखना या दिखाना ही नहीं चाहती. ‘जजमेंटल है क्या इस लकीर से बंध कर नहीं रहती, और अपने दायरे बढ़ाने की हर मुमकिन कोशिश करती है.

फिल्म की मुख्य किरदार एक्यूट सायकोसिस नाम के मनोरोग से ग्रस्त है, पूरी फिल्म में उसकी मन:स्थिति सत्य और भ्रम के झूले में हिचकोले खाती रहती है. उसे दिन के उजाले में वो लोग भी दिखाई और सुनाई देते हैं, जो असल में हैं ही नहीं और सिर्फ और सिर्फ उसके दिमाग का खलल हैं. 80 और 90 के दशक की दर्जनों फिल्मों में ‘पागलखाना खलनायक द्वारा नायक को रास्ते से हटाने के लिए महज़ एक जरिया बना कर दर्शाया जाता रहा है. सलाखों के पीछे ऊल-जलूल बकते और अतरंगी हरकतें करते लोगों को देखकर आप बस हंस ही सकते थे, या फिर इस इंतज़ार में रहते थे कि कब नायक वहाँ से भगे और देश को खलनायक के घातक इरादों से बचाये.  

बॉबी (कंगना रानौत) सलाखों के पीछे नहीं रहती. वो मुंबई के एक इलाके में आपकी अजीब-ओ-गरीब पड़ोसी हो सकती है. अकेले रहती है. फिल्मों में डबिंग आर्टिस्ट का काम करती है. पूरी फिल्म में दवाइयां खाती है, और जब नहीं खाती, उसे कॉकरोच दिखने लगते हैं- मतलब हालत बिगड़ रही है. बचपन में माँ-बाप के बीच रोज़ाना के झगड़े के दौरान उनकी दुर्घटनावश मौत की ज़िम्मेदार ठहरा दिए जाने के बाद, अब बॉबी के ज़ेहन में वही किरदार लुका-छिपी खेलते रहते हैं, जिनको बॉबी परदे पर अपनी आवाज़ दे रही होती है. ऐसे में, एक दिन किरायेदार बन कर आते हैं केशव (राजकुमार राव) और उसकी पत्नी रीमा (अमायरा दस्तूर). शुरू-शुरू में तो बॉबी का झुकाव केशव की तरफ होने लगता है, पर बाद में उसे लगने लगता है कि केशव अपनी बीवी को मारना चाहता है. एक दिन रीमा का क़त्ल हो भी जाता है, लेकिन बॉबी केशव को क़ातिल साबित नहीं कर पाती, उलटे अपने मनोरोग की वजह से खुद शक के घेरे में आ जाती है.

‘जजमेंटल है क्या अपने टीज़र-ट्रेलर और पोस्टर्स से एक ऐसी थ्रिलर फिल्म होने का अनुमान पैदा करती है, जहां एक क़त्ल के दो आरोपी हैं और आरोप-प्रत्यारोप में दोनों की अपनी-अपनी दलीलें, जो केस का रुख बार-बार एक-दूसरे की तरफ मोड़ती रहती हैं. फिल्म में इस तरह का रोमांच बस कुछ पलों के लिए ही बना रहता है, बाक़ी के वक़्त में फिल्म कंगना के किरदार की अतरंगी खामियों और कमियों को हास्यास्पद बना कर पेश करने में, या फिर कंगना की मनोदशा को प्रभावित करते मनगढ़ंत किरदारों के इर्द-गिर्द घूमती रहती है. फिल्म कुल मिलाकर जिन दो निष्कर्षों पर अपने होने की ज़मीन तय करती है- एक, ‘सीता-हरण रावण की चाल न होकर, सीता की सोची-समझी रणनीति भी तो हो सकती है’ और दूसरा- मनोरोग से ग्रस्त लोगों को समझने की ज़रूरत; दोनों फिल्म में उस दम आते हैं, जब तक दर्शक और लेखक-निर्देशक अंत का मुंह ताकते-ताकते थक चुके हैं.

बॉबी कॉकरोच के एक ख़ास तस्वीर पर जाकर बैठ जाने को क़त्ल के सबूत के तौर पर पुलिस के सामने पेश कर रही है, और दर्शक उसकी मानसिक अवस्था पर सहानुभूति दिखाने के बजाय हंस रहे हैं. लेखक-निर्देशक मौन हैं, क्यूंकि सारा ज्ञान अंत के लिए बचा के रखा है. और अंत भी इतना जाना-पहचाना कि जो बिलकुल मखमल में टाट के पैबंद की तरह खटकता हो. कनिका ढिल्लों की कहानी और स्क्रीनप्ले में एक महिला मनोरोगी को मुख्य किरदार बनाने की हिम्मत तो दिखा लेती है, पर जब उस किरदार के साथ दर्शकों का जुड़ाव बनाये रखने की बारी आती है तो थ्रिलर के नाम हथकंडे आजमाने लगती हैं. हालाँकि संवादों में धारदार हास्य और तेवर की कमी नहीं होती.      

‘जजमेंटल है क्या में नयेपन की झलक ख़ूब है, आखिर तक बांधे रखने वाला रोमांच भी है, गुदगुदाने वाला मनोरंजन भी. मगर फिल्म जहां दो ऐसे मज़बूत लोगों को, जो एक-दूसरे को अपनी-अपनी मनोस्थितियों से बार-बार चकमा देते हैं, आमने-सामने खड़ा करके और रोचक बना सकती थी, सिर्फ एक किरदार (बॉबी) के प्रचलित हाव-भाव और तीखे तेवरों पर अपना पूरा भरोसा झोंक देती है. कंगना ऐसी भूमिकाओं में आम सी हो गयी हैं, ख़ास कर जबकि असल जिंदगी में भी उनका व्यक्तित्व कुछ इसी खांचे-ढाँचे का नज़र आता है- बेबाक, मुंहफट, तेज़ तर्रार. हालाँकि बॉबी के किरदार में वो पूरी तरह फिट हैं, उनसे कोई शिकायत नहीं रहती, फिर भी बार-बार ख्याल उठता है कि आखिर इस किरदार में राधिका आप्टे क्यूँ नहीं हैं? राजकुमार राव उन दृश्यों में खासा कमाल हैं, जिनमें वो अपने किरदार का बना-बनाया भ्रम तोड़ते हुए दिखते हैं.

आखिर में; ‘जजमेंटल है क्या श्रीराम राघवन की रंगीन आपराधिक दुनिया में ही पली बढ़ी नज़र आती है. कुछ उसी तरीके का रोमांच, कुछ उसी मिट्टी के बने किरदार, पुराने हिंदी फ़िल्मी गानों का इस्तेमाल; लेकिन इन सबके बाद भी फिल्म एक स्तर के बाद न सिर्फ ऊपर उठने से इनकार कर देती है, बल्कि आखिर तक आते-आते अपनी बनी-बनायी साख को भी नीचे लुढ़कने से बचा नहीं पाती. एक अच्छी प्रयोगधर्मी फिल्म को मुख्यधारा में मिलने की कीमत चुकानी पड़ जाती है. फिर भी, फिल्म में बहुत कुछ है, जो नया है. [3/5]

Friday, 31 August 2018

स्त्री: हॉरर, कॉमेडी और फेमिनिज्म! [3.5/5]


बॉलीवुड में मसाला फिल्मों के स्वघोषित जानकार भलीभांति जानते हैं कि हॉरर का मतलब है डराना, और कॉमेडी का मतलब हँसाना. न इससे कम कुछ, न इससे छटांक भर ज्यादा कुछ. अब बड़ी दिक्कत ये है कि ऐसा करने के लिए उनके पास जो फ़ॉर्मूला है, उसके हिसाब से डराने के लिये दो-चार जाने-पहचाने पैंतरे, एक भूतिया हवेली, एक प्यासी चुड़ैल (खून, हवस या कभी कभी दोनों की) और हंसाने के लिए दो अदद हंसोड़ किरदार या किलो भर चुटकुले ही बहुत हैं. इनमें अगर सेक्स का तड़का लग जाए, तो फिर कहने ही क्या! अमर कौशिक की स्त्री में भी यही सब है, और एकदम नपा-तुला बराबर मात्रा में. मगर यहाँ कुछ और भी है, जो स्त्री को आम हॉरर या कॉमेडी फिल्मों से अलग करता है और मनोरंजन की हर शर्त पूरी करते हुए भी, अपनी समझदारी को कभी ताक पर नहीं रखता. स्त्री एक ऐसी फिल्म है, जो आपको डराती भी है, हंसाती भी है, और ये सब करते हुए आपसे बात भी बहुत करती है. कुछ बेहद ख़ास बातें, फेमिनिज्म की बातें, जिन्हें सुनना और सुन कर समझना आपकी अपनी समझ के दायरे को परिभाषित करती हैं.  

हालाँकि फिल्म का कथानक मध्य प्रदेश का चंदेरी शहर है, पर जिस तरह का सामाजिक ताना-बाना परदे पर दिखता है, इसे आप भारत का कोई भी गाँव, कोई भी शहर या मानने को पूरे का पूरा देश भी मान सकते हैं. ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा. चंदेरी में हर साल, चार दिन पुरुषों पर बड़े भारी पड़ते हैं. इन चार दिनों में हर रात एक स्त्री बाहर निकलती है, और मर्दों को अपना निशाना बनाकर ले जाती. छोड़ जाती है तो बस उनके कपड़े. बचने का एक ही रास्ता है, घरों पर लिख कर रखिये, “ओ स्त्री! कल आना’’. पुस्तक भण्डार के मालिक रूद्र भईया (पंकज त्रिपाठी) ने पूरी रिसर्च की है इस स्त्री पर. “ये स्त्री नए भारत की स्त्री है. पढ़ी-लिखी है. मर्दों की तरह जबरदस्ती नहीं करती. तीन बार आवाज़ देगी, पलट कर देखोगे तो समझ लेगी कि यस है, और यस मीन्स यस.” दोस्तों (अपारशक्ति खुराना और अभिषेक बैनर्जी) को लगता है, उनका बांका जवान दोस्त (राजकुमार राव) भी आजकल ऐसी किसी भूतिया स्त्री (श्रद्धा कपूर) के चंगुल में फंस रहा है, पर उसपे तो प्यार का भूत चढ़ा है. समझाए कौन?

राज और डीके (शोर इन द सिटी, गो गोवा गॉन) अपनी कहानी में बड़े संतुलित तरीके से हॉरर और कॉमेडी का तालमेल बैठाते हैं. फिल्म का पहला हिस्सा हालाँकि चंदेरी जैसे छोटे शहरों की आबो-हवा में घुलने और वहाँ के किरदारों से जुड़ने में ज्यादा खर्च होता है, पर अपने दूसरे हिस्से में सुमीत अरोरा के दिलचस्प और व्यंग्यात्मक संवादों के जरिये फिल्म अपने उस मुकाम तक पहुँचने में कामयाब होती है, जहां उसके होने की वजह सिर्फ मनोरंजन नहीं रह जाती. पहले हिस्से में फ़िज़ूल  के ताबड़तोड़ गानों से बचा जा सकता था. इस हिस्से में फिल्म टुकड़ों में ही आपको याद रह पाती है, और वो भी ज्यादातर उन दृश्यों में अभिनेताओं की क़ाबलियत की वजह से. एक दृश्य में बाप (अतुल श्रीवास्तव) बेटे को जवानी में गलत संगत में न पड़ने की और स्वयंसेवी बनने की सलाह दे रहा है. छोटे शहरों में पारिवारिक सेक्स-एजुकेशन कितना हास्यास्पद हो सकता है, उसकी एक झलक तो इस दृश्य में मिल ही जाती है.

फिल्म का दूसरा हिस्सा पूरी तरह पुरुषवादी विचारधारा का मजाकिये लहजे में मखौल उड़ाता है. स्त्री का प्रकोप इस हद तक है कि अब शहर की औरतें खुलेआम रातों को घर से बाहर जा रही हैं, और पति दरवाजा बंद करते हुए कहता है, “जल्दी आ जाना, रात को अकेले डर लगता है”. स्त्री से बचने का नुस्खा कामसूत्र की किताब के बीचोबीच छिपा कर रखा हुआ है. वासना से आगे बढ़ोगे, तब कहीं जाके मिलेगा मुक्ति का मार्ग. मर्दों को बिना कपड़ों के ले जाना, उनको उनकी छोटी सोच से भी नंगा कर देना समझ लेना चाहिए, जो एक वेश्या को उसकी पसंद से बड़ी बेरहमी से अलग कर देती हो. प्यास यहाँ सिर्फ बदले की या खून की नहीं है, तलब और जिद है प्यार और इज्ज़त मिलने की. रूद्र भईया सुनते ही बिफर पड़ते हैं, “बड़े जाहिल लोग हैं आप!”. आखिरकार ये वो समाज है, जहाँ नौजवानों में लड़कियों से फ्रेंडशिप का मतलब सीधा सीधा सेक्स होता है, और कुछ नहीं.

स्त्री अगर शोर-शराबे वाले बैकग्राउंड म्यूजिक और संवादों में धागे भर की शालीनता बरत पाती तो बेहद अच्छी हो सकती थी. गनीमत है कि राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी का होना सब कुछ जैसे लीपपोत कर चिकना कर देता है. अभिषेक और अपारशक्ति के साथ राव की तिकड़ी वाले दृश्य गुदगुदाते हैं, भले लगते हैं जैसे अपन ही चाय की टपरी पे शाम बिता रहे हों. अपारशक्ति और अभिषेक दोनों के हिस्से कुछ बेहद मनोरंजक पल आये हैं. पंकज त्रिपाठी दृश्यों में अपनी जगह आप खोज लेते हैं, बना लेते हैं. उनकी बॉडी लैंग्वेज ही उनके किरदार की जान बन जाती है, और कॉमेडी के इस दौर में ये खूबी उनसे बेहतर संजय मिश्रा को ही आती है. श्रद्धा सटीक हैं, और शायद अपनी अदाकारी में पहली बार इतनी कारगर भी.

आखिर में; स्त्री हॉरर कॉमेडी के तौर पर एक अच्छी कोशिश है. हॉरर के नाम पर कॉमेडी और हॉरर के साथ सेक्स का घालमेल करके उलजलूल परोसने में बॉलीवुड ने कोई कमी नहीं छोड़ी है. “स्त्री इक नये, बेहतर रास्ते की तरफ बढ़ती है. चिल्लाते हुए भूत को डांट कर शांत कराने जैसे बचकाने और बेवकूफ़ी भरे हंसी-मज़ाक के साथ साथ, अगर समझदारी से कहानी में फेमिनिज्म जैसे जरूरी सामाजिक चेतना के विमर्श पर भी हंसने के मौके मिलने लग जाएं, तो कोई नीरस, बेशर्म और बेहया सेक्स का भौंडापन क्यूँ ले भला? ये न ले...[3.5/5]  

Friday, 4 May 2018

ओमार्ता (A): राजकुमार राव के अभिनय में एक और तमगा! [3.5/5]


सिनेमाई खलनायकों में अक्सर हमें मानवीय संवेदनाएं ढूँढने की आदत है. उनके अतीत में सेंध लगाकर जानने की कोशिश कि आखिर वो जैसे हैं, वैसे क्यूँ हैं? समाज या फिर सिस्टम से चोट खाए, बदले की आग में सब कुछ जला देने की सनक लिए ऐसे ढेर सारे एंटी-हीरोज को हमने सालों तक सर बिठाया है. और फिर आते हैं कुछ वो क्रूर, निर्दयी लेकिन रंग-बिरंगे, अजीब-ओ-गरीब खलनायक (मोगैम्बो, सर जूडा, शाकाल) जिनका पागलपन एकदम समझ से परे है. दुनिया पर कब्ज़ा करने की सनक में अंधे, अलग ही किस्म के हंसोड़ विलेन. हंसल मेहता की ओमार्ता का नायक भी खलनायक ही है, असल जिंदगी का है, पर इन दोनों किस्मों के खलनायकों से बिलकुल अलग. उसका अड्डा किसी काली पहाड़ी के पीछे की गुफा नहीं है. उसका पहनावा किसी सर्कस के रिंगमास्टर की याद नहीं दिलाता. किसी ने उसके माँ-बाप की हत्या बचपन में उसकी आँखों के सामने नहीं की थी. उसकी जमीन भी किसी साहूकार के हाथों बंधक नहीं पड़ी. पर फिर भी उसकी सनक, उसका पागलपन, उसका शैतानी दिमाग आपकी हड्डियों तक को कंपा देने में कहीं से भी कम नहीं पड़ता.

पुरानी दिल्ली के एक छोटे से मकान में 4 विदेशियों को बंधक रखा गया है. पाकिस्तानी मूल के ब्रिटिश आतंकवादी अहमद उमर सईद शेख़ (राजकुमार राव) का शायद पहला ही मिशन है ये. उमर पकड़ा जाता है. बोस्निया में उसके अपने भाइयों पर हो रहे ज़ुल्म के चलते उसने अपने लिए ज़ेहाद का रास्ता चुना है. उसे छुडाने के लिए कंधहार में इंडियन एयरलाइन्स का जहाज़ तक अगवा कर लिया गया है. ये उमर ही है, जिसके तार आगे चलकर अमेरिका में 9/11 अटैक और वॉल स्ट्रीट जर्नल के पत्रकार डेनियल पर्ल की निर्मम हत्या से जुड़े. मुंबई में 26/11 हमले के वक़्त, इसी शैतानी दिमाग ने भारत और पाकिस्तान को अलग-अलग फ़ोन करके युद्ध की स्थिति तक ला खड़ा किया था. धार्मिक उन्माद किस तरह पढ़े-लिखे जहीन दिमाग नौजवानों को हैवानियत की हद तक ला फेंकता है, ओमार्ता इसका बेहद करीबी और एकदम सटीक तस्वीर पेश करती है. वो भी असलियत के एकदम आसपास रहते हुए.

किसी खोजी रिपोर्ट या काबिल डाक्यूमेंट्री ड्रामा की तर्ज़ पर बनी ओमार्ता एक डार्क क्राइम थ्रिलर है, जहां निर्देशक हंसल मेहता आपके रोंगटे खड़े करने के लिए अख़बारों की असल सुर्ख़ियों, समाचारों के फुटेज और रूह कंपा देने वाली भयावह तस्वीरों का बेझिझक और बेख़ौफ़ इस्तेमाल करते हैं. ये तब और भी जरूरी लगने लगता है, जब हंसल उमर सईद शेख़ के आतंकवादी बनने की तरफ बढ़ने की आग को किसी और इमोशनल ईंधन से भड़काने की कोई होशियारी नहीं दिखाते, और तब भी जब उसके वहशियाना शख्सीयत को उधेड़ कर सामने रख देना चाहते हैं. अनुज राकेश धवन की बाकमाल सिनेमेटोग्राफी के साथ, हंसल फिल्म के दृश्यों को पूरी तरह आप पर ज़ाहिर होने देने में कोई जल्दबाजी नहीं दिखाते. यहाँ तक कि फिल्म के सबसे नाटकीय दृश्य (डेनियल पर्ल की हत्या) में भी आपको सब कुछ होते हुए साफ़-साफ़ नहीं दिखता, कैमरा उमर के चेहरे तक ही सीमित रहता है, पर घृणा, डर और दर्द से आपका दिल बैठा देने में नाकाम नहीं होता. इससे भयावह कुछ हिंदी सिनेमा में कम ही देखा है मैंने.

ओमार्ता राजकुमार राव के कद्दावर अभिनय में एक और तमगा है. जिस ख़ामोशी और ठहराव से वो उमर के किरदार में दाखिल होते हैं, और फिर वक़्त-बेवक्त उसके गुस्से, उसकी सनक और उसकी नफरत को बराबर मात्रा में नाप-जोख के परदे पर निकालते हैं, देखने लायक है. चेहरे पर कोई पछतावा नहीं, दिल में कोई मलाल नहीं, और वो हलकी सी शैतानी मुस्कराहट (रावण का अट्टहास नहीं); राजकुमार राव का यह किरदार हालिया खलनायकों की लिस्ट में बड़ी आसानी से, बहुत वक़्त तक याद रखा जाने लायक है. अगर याद हो, शाहिद में हंसल ने जेल के दृश्य में शाहिद आज़मी (राजकुमार राव) की मुलाक़ात कुछेक दृश्यों में उमर सईद शेख़ (तब, प्रबल पंजाबी) से कराई थी. अपने भाइयों पर हो रहे जुल्म से लड़ने के लिए दोनों अलग-अलग रास्ते चुनते हैं. इसे महज़ एक रोचक तत्थ्य मानने से हटकर देखें, तो हंसल इस तरह इस्लामिक आतंकवाद और धार्मिक भेदभाव के सन्दर्भ में अपना घेरा पूरा कर लेते हैं.  
             
हम अल्लाह के बन्दे हैं’, अल्लाह हमारे साथ है’, जैसे घिसे-पिटे संवादों से भरे दो-चार मौलानाओं की दकियानूसी और फ़िल्मी बर्गालाहट भरे दृश्यों को नज़रंदाज़ कर दें, तो किसी आतंकवादी की एकलौती बायोपिक होने के साथ-साथ ओमार्ता एक जरूरी और बेहद मुश्किल फिल्म है, देखने के लिए भी और बनाने के तौर पर भी. फिल्म किसी तरह का कोई सन्देश देने की या फिर एक मुकम्मल अंत देने की जिद से बचती है, इसलिए और भी सच्ची लगती है. [3.5/5]

Sunday, 24 December 2017

हमें नाज़ है जिन पर...(2017's 10 Best Hindi Movies)


Trapped
ट्रैप्ड’ भारतीय सिनेमा में ‘सर्वाइवल ड्रामा’ का एक नया अध्याय बड़ी ईमानदारी और पूरी शिद्दत से लिखती है. किशोरावस्था की चुनौतियों से लड़ते ‘उड़ान’ और सिनेमाई परदे की क्लासिक प्रेम-कहानियों को श्रद्धांजलि देती ‘लुटेरा’ के बाद; विक्रमादित्य मोटवाने की ये छोटी सी फिल्म हिंदी सिनेमा के बड़े बदलाव का एक अहम् हिस्सा है. एक ऐसी फिल्म, जिस पर फ़िल्मी दर्शक के रूप में आपको भी नाज़ होगा. कुछ ऐसा जो आपने हिंदी सिनेमा में पहले कभी नहीं देखा.

Tu Hai Mera Sunday
'तू है मेरा सन्डे' हिंदी सिनेमा को एक नया विस्तार देने में बड़ी फिल्म साबित होने का पूरा माद्दा रखती है. 'पैरेलल सिनेमा मूवमेंट' और 'मेनस्ट्रीम मसाला' फिल्मों के बीच, याद कीजिये, कभी साफ़-सुथरी, सरल-सहज, सुगढ़ फिल्मों का एक और दौर दिलों में अपनी जगह बनाया करता था, टीवी पर आते हुए जो आज भी  सालों-साल आपके मनोरंजन की रंगत फीकी नहीं पड़ने देता; 'तू है मेरा सन्डे' उन्हीं तमाम अपनी सी लगने वाली फिल्मों में से एक है.

Poorna
देश में विकास का जो सारा ताना-बाना शहरों और गाँवों को जोड़ने की बात करता है, ‘पूर्णा’ काफी हद तक उसकी कड़वी सच्चाई आप तक पेश कर पाती है. ‘पूर्णा’ आपको कचोटती है, जब आप शादी के जंजाल में बाँध दी गयी प्रिया को पहली बार साड़ी में देखते हैं. ‘कुछ कर गुजरने’ की चाह लिए मोटी-मोटी आँखों वाली बच्ची को ‘सब कुछ करने-सहने वाली’ औरत बनाने पर हम कैसे और क्यूँ आमादा हो जाते हैं? ‘पूर्णा’ आपको अन्दर से तोड़ देती है, जब सिर्फ 13 साल की पूर्णा को आप हालातों से लड़ते-झगड़ते-बढ़ते देखते हैं. हालाँकि प्रवीण कुमार जैसे जज्बाती और जुझारू लोगों की ईमानदार कोशिशों पर रौशनी डालकर, ‘पूर्णा’ उम्मीदें भी बहुत जगाती है. सिनेमा के लिए भी, समाज के लिए भी.

Mukti Bhawan
मुक्ति-भवन’ जीवन-मृत्यु के घोर-चिंतन और रिश्तों की पेचीदगी को बड़ी परिपक्वता और पूरी संजीदगी से कुछ इस तरह परदे पर जिंदा करती है, कि आप जिंदगी से कहीं ज्यादा मौत के फ़लसफ़े का आनंद लेने में मग्न रहते हैं. फिल्म में मिश्राजी बिना बात राजीव को मशवरा देते हैं, “आप पान खाया कीजिये!”, ‘मुक्ति-भवन’ के लिए मैं भी कुछ ऐसा ही कहूँगा, “देख आईये! कुछ बातों के लिये वजहें खोजने की जरूरत नहीं. कुछ बातों को वजहों की दरकार नहीं.” सिनेमाई परदे पर जीवन-मृत्यु को लेकर दर्शन-चिंतन और मनोरंजन का इतना सटीक मेल-मिलाप पिछली बार रजत कपूर की ‘आँखों-देखी’ में ही दिखा था.

kadvi Hawa
'कड़वी हवा' जिस ठहराव के साथ आपको खेतिहर किसानों की जिंदगी में उठते-बनते झंझावातों की तरफ धकेलती है, आप चाह कर भी उन ज़ज्बातों से अछूते नहीं रह पायेंगे. दृश्यों को सच्चाई के एकदम आसपास तक लाकर छोड़ जाने में नील माधव पंडा बखूबी सफल रहते हैं. गर्मी से बदहाल सरकारी बैंक के कर्मचारी बनियान में ही अपना काम निपटा रहे हैं. पैसों की वसूली के लिए यमराज बने घूमते गन्नू पर भी दूधवाले का दो महीने से पैसा उधार है. इसी संजीदगी के साथ 'कड़वी हवा' पहले तो आपको किरदारों से जोड़ती है, फिर उनकी कहानी का हिस्सा बनने का पूरा-पूरा मौका देती है, ताकि अंत तक आते-आते जब एक नाटकीय मोड़ के सहारे आपको फिल्म और कहानी के मुख्य खलनायक (क्लाइमेट चेंज) से रूबरू होना पड़े, तो न सिर्फ आप सिहर उठें, बल्कि थिएटर छोड़ते-छोड़ते इस बेहद जरूरी मुद्दे को कम आंकने की भूल से भी बचें.

Anaarkali of Aarah
‘अनारकली ऑफ़ आरा’ तरह-तरह के (अच्छे, बुरे) मर्दों से भरी एक ऐसी गज़ब की फिल्म है, जिसमें एक औरत ‘नायिका’ बन के उभरने का इंतज़ार नहीं करती, और ना ही ‘नायिका’ बनने के तुरंत बाद वापस अपने ढर्रे, अपने सांचे, अपने घोंसले में लौट जाने का समझौता! अविनाश दास से शिकायत बस एक ही रहेगी कि काश, ये फिल्म, अपनी पृष्ठभूमि और बोल-चाल, लहजे की वजह से, भोजपुरी भाषा में बनी होती या बन पाती! कम से कम, उस डूबते जहाज़ के हिस्से एक तो मज़बूत हाथ आता, जो उसे अकेले किनारे तक खींच लाने का दमख़म रखता है!

Newton
न्यूटन की ईमानदारी, उसकी साफगोई, बदलाव के लिए उसकी ललक कहीं न कहीं आपको उसकी तरफ खींच कर ले जाती है. ऐसे न्यूटन अक्सर सरकारी दफ्तरों में किसी अनजाने टेबल के पीछे दफ़न भले ही हो जाते हों, उनकी कोशिशों का दायरा भले ही बहुत छोटा रह जाता है, पर समाज में बदलाव की जो थोड़ी बहुत रौशनी बाकी है, उन्हीं से है. ठीक 9 बजे ऑफिस आ जाने वालों पर हँसते तो हम सभी हैं, पर शायद ऐसे न्यूटन भी उन्हीं में से एक होते हैं. फिल्म में ट्रेनर की भूमिका में संजय मिश्रा फरमाते हैं, "ईमानदार होके आप कोई एहसान नहीं कर रहे, ऐसा आपसे एक्सपेक्टेड है'. कम से कम फिल्म इस कसौटी पर सौ फीसदी सही साबित होती है.

Gurgaon
'गुड़गांव' नए हिंदी सिनेमा आन्दोलन का एक अहम हिस्सा है. अपराध की फिल्मों का एक ऐसा अलग चेहरा, जो घटनाओं को ताबड़तोड़ खून से रंग देने की बजाय आपको उस अँधेरे माहौल में पहले धकेल देती है, जहां खेल रचने वाला है. हो सकता है, कई बार आप उकता जायें, या घुटन सी होने लगे; पर एक बार जो नशा चढ़ा, दिनों तक उतरेगा नहीं.

A Death in The Gunj
‘अ डेथ इन द गंज’ उन चंद रोमांचक बॉलीवुड फिल्मों में से है, जो आपके अन्दर सिहरन पैदा करने के लिए कोई झूठा खेल नहीं रचतीं, बल्कि आपको उस माहौल में हाथ पकड़ कर खींच ले जाती हैं, जहां आप हर वक़्त अपने दिल-ओ-दिमाग़ के साथ ‘जो हुआ, वो कैसे हुआ’, ‘जो हुआ, वो किसके साथ हुआ’ और ‘जो हुआ, वो कब होगा’ की लड़ाई लड़ते रहते हैं. ‘अ डेथ इन द गंज’ इस साल की ‘मसान’ है, उतनी ही ईमानदार, उतनी ही संजीदा, उतनी ही रोचक!

Lipstick under my Burkha
'लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' एक कोशिश है कि आप औरतों की शख्सियत का वो पहलू भी देख पायें, जहां उनकी पहचान माँ, बेटी, बहन, बीवी से अलग हटकर सिर्फ और सिर्फ एक औरत होने की है. मर्दों के बदलने का इंतज़ार छोड़िये, अगर फिल्म देख कर औरतें भी अपने आप और अपनी ख्वाहिशों के लिए कदम बढ़ाने की हिम्मत जुटा पायें; समझिये लिपस्टिक अंडर माय बुर्का' की कामयाबी वहीँ कहीं मिलेगी. फिल्म के आखिर में चारों अहम् किरदार (बुआजी, लीला, शीरीन, रिहाना) तमाम गहमा-गहमी के बीच एक कमरे में बैठ कर रोज़ी की कहानी का अंत पढ़ने में मशगूल हो जाते हैं; कोई क्रांति नहीं आती, कोई भूचाल नहीं आता. वो आपको करना है, और अगर आप पहलाज निहलानी नहीं हैं, तो ये ज्यादा मुश्किल भी नहीं है.

Friday, 22 September 2017

न्यूटन: लोकतंत्र का तमाशा! सिनेमा का जश्न! [4.5/5]

चुनावों के वक़्त टीवी चैनलों और अखबारों में, नाखूनों पे लगी स्याही दिखाते जोशीले चेहरों की तस्वीरें कितने फ़क्र से भारत में लोकतंत्र की बहाली, चुनावों की कामयाबी और जनता के प्रतिनिधित्व का सामूहिक जश्न बयाँ करतीं हैं. ऐसा ही एक दृश्य अमित मासुरकर की 'न्यूटन' में भी है, मगर जब तक फिल्म में ये दृश्य आता है, आँखों के आगे से सारे परदे गिर चुके होते हैं, आसमान से झूठ के बादल छंट चुके होते हैं और अब उन्हीं चेहरों से भारत में लोकतंत्र की खोखली इमारत का सच टुकुर-टुकुर झाँक रहा होता है. ठीक वैसे ही, जैसे किसी बच्चे को खिलौना दिखाकर उसके हाथ में सिर्फ खाली पैकेट थमा दिया गया हो. 'न्यूटन' बिना शक आज के राजनीतिक माहौल और सरकारी तंत्र की खामियों पर एक सही, सीधी और सटीक टिप्पणी है.  

सोते हुओं को जगाने के लिए, 'न्यूटन' छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र दंडकारण्य को अपनी प्रयोगशाला बनाती है. स्थानीय प्रत्याशी की हत्या के बाद क्षेत्र में दुबारा चुनाव कराये जा रहे हैं, सेना की देखरेख में. नौजवान चुनाव अधिकारी (राजकुमार राव) अपने नाम की तरह ही अजीब है, अजब है, अकडू है. अपना नाम न्यूटन उसने खुद ही रखा था, नूतन कुमार से बदल कर. 'आई वांट टू मेक अ डिफरेंस' वाली फैक्ट्री से निकला है, घोर ईमानदारी का पुतला है. सिर्फ 76 मतदाताओं वाले पोलिंग बूथ पे चुनाव कराना कौन सी बड़ी बात है, मगर आर्मी अफसर आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) का डरना-डराना भी जायज़ है. ये वो इलाका है, जहां के बारे में टीवी स्टूडियोज में बैठे सूट-बूट वाले न्यूज़ एंकर्स को ज्यादा पता है, और उनकी चीख-चिल्लाहट में हमने भी काफी कुछ सुन (ही) रखा है. "अपने ही लोग हैं, अपने ही लोगों के खिलाफ हैं", "देशद्रोही हैं स्साले, देश बांटने की मांग करते हैं", "चींटी की चटनी खाते हैं, बताओ!", वगैरह, वगैरह. 

खैर, 'न्यूटन' किसी भी तरह और तरीके से नक्सल की समस्या पर पक्ष-विपक्ष का पाला चुनकर बैठ जाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि फिल्म के समझदार और ईमानदार नजरिये की वजह से आप जरूर अपने आप को इस दुविधा में अक्सर लड़खड़ाते हुए पाते हैं. लोकल बूथ लेवल ऑफिसर मलको (अंजलि पाटिल) जब भी बातों-बातों में वहाँ के लोगों की बात सामने रखती है, आपके नजरिये को एक ठेस, एक धक्का जरूर लगता है. आत्मा सिंह जब बन्दूक न्यूटन के हाथ में थमा कर कहता है, 'ये देश का भार है, और हमारे कंधे पर है'; या फिर जब विदेशी रिपोर्टर पूछती है, 'चुनाव सुचारू रूप से चलाने के लिए आपको क्या चाहिए?" और उसका जवाब होता है, "मोर वेपन (और हथियार)!"; वो आपको खलनायक नहीं लगता, बल्कि आपको उसकी हालत और उसके हालात पर दया ज्यादा आती है. वो भी उसी सिस्टम का मारा है, और महंगा जैतून का तेल खरीदते वक़्त उसके माथे पर भी शिकन आती है.  

फिल्म के एक दृश्य में गाँवों से लोग मतदान के लिए जुटाए जा रहे हैं, और बराबर के दृश्य में एक महिला काटने-पकाने के लिए मुर्गियां पकड़ रही है. 'न्यूटन' इस तरह के संकेतों और ब्लैक ह्यूमर की दूसरी ढेर सारी मिसालों के जरिये आपका मनोरंजन भी खूब करती है, और आपको सोचने पे मजबूर भी. आत्मा सिंह नाश्ता करते हुए कहता है, "बड़ी इंटेंरोगेशन के बाद मुर्गियों ने अंडे दिये हैं". न्यूटन के पूछने पर कि क्या वो भी निराशावादी है?, मलको टन्न से बोल पड़ती है, "मैं आदिवासी हूँ'. खंडहर पड़े प्राइमरी स्कूल में बने बूथ में सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे-बैठे लोगों के आने का इंतज़ार कर रहे हैं, माहौल शांत है, पर धीरे-धीरे आपको सरकारी तंत्र और खोखले दावों की चरमराहट सुनाई देनी शुरू हो जाती है.

इतने सब उथल-पुथल और खामियों के बावज़ूद, 'न्यूटन' एक आशावादी फिल्म बने रहने का दम-ख़म दिखाने में सफल रहती है. न्यूटन की ईमानदारी, उसकी साफगोई, बदलाव के लिए उसकी ललक कहीं न कहीं आपको उसकी तरफ खींच कर ले जाती है. ऐसे न्यूटन अक्सर सरकारी दफ्तरों में किसी अनजाने टेबल के पीछे दफ़न भले ही हो जाते हों, उनकी कोशिशों का दायरा भले ही बहुत छोटा रह जाता है, पर समाज में बदलाव की जो थोड़ी बहुत रौशनी बाकी है, उन्हीं से है. ठीक 9 बजे ऑफिस आ जाने वालों पर हँसते तो हम सभी हैं, पर शायद ऐसे न्यूटन भी उन्हीं में से एक होते हैं. फिल्म में ट्रेनर की भूमिका में संजय मिश्रा फरमाते हैं, "ईमानदार होके आप कोई एहसान नहीं कर रहे, ऐसा आपसे एक्सपेक्टेड है'. कम से कम फिल्म इस कसौटी पर सौ फीसदी सही साबित होती है.

राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी की बेहतरीन अदाकारी, रघुवीर यादव, अंजलि पाटिल और संजय मिश्रा के सटीक अभिनय और मयंक तिवारी के मजेदार संवादों से लबालब भरी 'न्यूटन' साल की सबसे अच्छी फिल्म तो है ही, अपने विषय-वस्तु की वजह से बेहद जरूरी भी, और 'उड़ान', 'आँखों-देखी', 'मसान' जैसी नए भारत के नए सिनेमा की श्रेणी और शैली की मेरी पसंदीदा, चुनिन्दा फिल्मों में से एक. [4.5/5]       

Friday, 18 August 2017

बरेली की बर्फ़ी: प्रेम-त्रिकोण की पारिवारिक मिठाई! अहा, मीठी-मीठी! [3/5]

'मोहल्ले का प्यार अक्सर डॉक्टर-इंजीनियर ले जाते हैं', 'राँझना' में कुंदन को मुरारी का ये दिलचस्प ज्ञान आपको भी मुंह-जुबानी याद होगा. छोटे शहरों का ऐसा वाला प्यार, अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के साथ, परदे पर 'राँझना' से ज्यादा मजेदार हाल-फिलहाल में नहीं दिखा. लड़की एक दोस्त को पसंद आते ही दूसरे के लिए फ़ौरन 'भाभी' बन जाती है. लड़का हर मुमकिन कोशिश में रहता है कि कैसे लड़की के साथ-साथ उसके माँ-बाप की नज़रों में भी 'अच्छा' बनके पूरे नंबर कमाये जाएँ? और इन सब चक्करों के बीच, खतरा ये भी कि आप खुद अपनी शादी की मिठाई खाने के बजाय, उसी घर में, उसी लड़की की सगाई की तैय्यारी में, मेहमानों के लिए खुद लड्डू बाँध रहे हों. हालाँकि पिछले कुछ सालों में 'दम लगा के हईशा', 'तनु वेड्स मनु' और 'बहन होगी तेरी' जैसी तमाम सफल-असफल फिल्मों में इन मोहल्लों, इन गलियों और इन किरदारों को आपने खूब अच्छी तरह देखा-भाला है, तो अश्विनी अय्यर तिवारी की फिल्म 'बरेली की बर्फी' में नयेपन के नाम पर बहुत कुछ ज्यादा आपको रिझाने के लिये है नहीं, पर आखिर में हम सब हैं तो हिन्दुस्तानी ही, मीठा जब मिले, जहां मिले, जैसा मिले, खुशियाँ अपने आप चेहरे पर अनायास तैर जाती हैं. 'बरेली की बर्फी' ऐसी ही एक प्यार भरी मिठास दिल खोल कर बांटती है. 

बाप (पंकज त्रिपाठी) सुबह-सुबह 'प्रेशर' बनाने के लिये सिगरेट खोज रहा है. माँ (सीमा पाहवा) बेटी (कृति सैनन) को जगा कर पूछ रही है, 'है क्या?, एक दे दे, अर्जेंट है'. बेटी बिट्टी मिश्रा में और भी 'ऐब' हैं, इंग्लिश फिल्में देखती है, रातों को देर से घर लौटती है. तेजतर्रार माँ के डर से, बाप यूँ तो रात को उठकर चुपके से दरवाज़ा खोल देता है, पर एक गुजारिश उसकी भी है, "बाइक पर दोनों पैर एक तरफ करके बैठा कर!". जाहिर तौर पर शादी के लिये रिश्ते हर बार सिर्फ चाय-समोसे तक ही सीमित रह जाते हैं. आखिरी लड़के ने तो पूछ लिया था, "आर यू वर्जिन?" और बिट्टी ने भी जो रख के दिया था, "क्यूँ? आप हैं?"...पर कोई तो है जो बिट्टी को करीब से जानता है, और उसकी कमियों के साथ उसे चाहता है. प्रीतम विद्रोही (राजकुमार राव) के किताब में नायिका बबली एकदम बिट्टी जैसी ही है. बिट्टी को प्रीतम से मिलना है, पर उस अनजान लेखक को शहर में अगर कोई जानता है तो सिर्फ चिराग दूबे (आयुष्मान खुराना) जिसने असलियत में अपनी पूर्व-प्रेमिका बबली के लिये लिखी कहानी, प्रीतम के नाम से खुद अपनी ही प्रिंटिंग-प्रेस में छापी थी. अब जब बिट्टी में चिराग को बबली दिखने लगी है, तो दब्बू और डरपोक प्रीतम को बिट्टी की नज़रों से गिराने में उसे तिकड़मी बनने के अलावा कुछ और नहीं सूझता.   

प्यार में चालबाजी कब उलटी पड़ जाती है, और रंगबाजी कब उस पर हावी हो जाती है; 'बरेली की बर्फी' कहानी के इन उतार-चढ़ावों में बेहद मजेदार है. जहां फिल्म का पहला भाग आपको बरेली जैसे छोटे शहरों की आब-ओ-हवा के साथ घुलने-मिलने पर ज्यादा तवज्जो देता है, दूसरे हिस्से में राजकुमार राव अपनी बेहतरीन अदाकारी और अपने गिरगिटिया किरदार से आपको बार-बार खुल कर हंसने का मौका देते हैं. जावेद अख्तर साब की आवाज़ में सुनाई जा रही इस कहानी में ठेठ किरदार, सधी अदाकारी और आम बोल-चाल की भाषा का इस्तेमाल ज्यादातर मौकों पर एक साथ खड़े दिखते हैं. अपने अनुभवी और योग्य सह-कलाकारों (खास कर पंकज और सीमा जी) के साथ, अश्विनी परदे पर पूरी कामयाबी से हर दृश्य को देखने लायक बना ही देती हैं. हालाँकि मुख्य कलाकारों में कृति और आयुष्मान हर वक़्त उस माहौल में खपने की पूरी कोशिश करते नज़र आते हैं, पर जो सहजता और सरलता राजकुमार राव दिखा और निभा जाते हैं, कृति और आयुष्मान उस स्तर तक पहुँचने से रह ही जाते हैं. राव जैसे किसी ठहरी हुई फिल्म में आंधी की तरह आते हैं, और हर किसी को जिन्दा कर जाते हैं. दोपहर की गर्मी में निम्बू-पानी तो पी ही रहे थे आप, उसमें जलजीरा जैसे और घोल दिया हो किसी ने. 

सीमा पाहवा और पंकज त्रिपाठी के बीच के दृश्य बाकमाल हैं. ट्रेलर में सीमा जी का बिट्टी के भाग जाने का ख़त पढ़ने वाला दृश्य तो सभी ने देखा है, अदाकारी में जिस तरह की पैनी नज़र सीमा जी रखती हैं, और जिस तरीके के हाव-भाव बड़े करीने से अपने अभिनय में ले आती हैं, आप दंग रह जाते हैं. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पंकज त्रिपाठी फिल्म में ज्यादातर 'फ़िलर' की तरह परोसे गए हैं. हर दृश्य में उनके होने की वजह भले ही न हो, उनके संवाद भले ही दृश्य की जटिलता में कोई इज़ाफा न करते हों, फिर भी उनके सटीक और सहज एक्शन-रिएक्शन आपका मन मोह लेते हैं. 

आखिर में; अश्विनी अय्यर तिवारी की फिल्म 'बरेली की बर्फी' बॉलीवुड के चिर-परिचित प्रेम-त्रिकोण को एक ऐसी चाशनी में भिगो कर पेश करती है, जिसमें मनोरंजन के लिए किसी भी तरह का कोई बाजारू रंग नहीं मिला है. आपके अपने चहेते दुकान की शुद्ध देसी मिठाई, जिसे आप जब भी खाते हैं, अपने अपनों के लिए भी पैक कराना नहीं भूलते. [3/5] 

Friday, 9 June 2017

राब्ता: पुरानी 'पुनर्जन्म' वाली फ़िल्मों का बासी 'रायता'! [1/5]

एक धूमकेतु है, 'लव जॉय' नाम का. 800 साल में एक बार पृथ्वी के पास से होकर गुजरता है. अगले हफ्ते ये कुदरती करिश्मा फिर होने वाला है, और इसी के साथ कुछ और भी होने वाला है, जो पहले भी हो चुका है. ठीक इसी वक़्त पर, ठीक इसी मुहूर्त में. तकलीफ़ ये है कि चौसर की इस बाज़ी में सारे के सारे अहम् खिलाड़ी दुनिया के अलग-अलग कोनों में हैं. कहानी का राजकुमार (सुशांत सिंह राजपूत) पंजाब में गिन-गिन कर लड़कियां पटाने में व्यस्त है, अनाथ राजकुमारी (कृति सैनन) लन्दन में चॉकलेट शॉप चलाती हैं, और दुष्ट राजा (जिम सरभ) जाने कहाँ समन्दर के बीचो-बीच बने अपने महल में, एक काली-सफ़ेद तस्वीर में बने चेहरे के होठों पर लाल रंग पोत रहा है. 

अब कुदरत, लेखक (गरिमा-सिद्धार्थ) और निर्देशक दिनेश विजान की जिम्मेदारी बनती है, कि कैसे इस एक हफ्ते में तीनों को एक-दूसरे के सामने ला खड़ा करें? रास्ता कठिन है; पहले तो राजकुमार का लन्दन आना, मुलाक़ात के दूसरे दिन ही उनका राजकुमारी के बिस्तर से अंगड़ाईयां लेते हुए बाहर निकलना, दुष्ट राजा साहब का इत्तेफ़ाकन लन्दन आ टपकना, फिर धीरे-धीरे सबको पिछले जनम की याद दिलाना. किसी के आम फ़िल्मकार के बस की कहाँ ये माथापच्ची? फिल्मों में पहले कभी देखा-सुना हो, तो भी थोड़ी मदद हो जाती. खैर...राजकुमारी को सपने आते हैं, अजीब डरावने सपने. अपने 'करन-अर्जुन' की तरह, फोटो-नेगेटिव इफ़ेक्ट में. पानी से डर भी लगता है. राजकुमार के पीठ पर चोट की निशान जैसा बर्थ-मार्क भी है, जैसा शाहरुख़ को था 'ओम शांति ओम' में. राजा साहब से कोई पूछने की हिम्मत भी नहीं करता कि इस जनम में उन्हें सब कुछ याद कैसे आया? ना ही वो बताने की जरूरत भी समझते हैं, पर इन सबमें जो ढाई घंटे (पूरी की पूरी फिल्म) बर्बाद होते हैं, उसे बचाने का एक उपाय तो मैं ही दिनेश विजान साब को सुझा सकता था. अच्छा होता, अगर फिल्म की शुरुआत में ही सारे किरदारों को 'राज़ पिछले जनम का' के एक-दो एपिसोड दिखा दिये जाते. इसी बहाने रवि किशन से अभिनय के गुर भी सीखने को मिल जाते, और सबका दिमाग भी चलने लगता. 'आग से डर लगता है? आप पिछले जनम में जल के मरे थे' ' गले पे निशान है? आप रस्सी से लटक के मरे थे' और सबके सब पिछले जनम में राजा-रानी-सैनिक. कोई गरीब किसान नहीं, किसी की सामान्य मृत्यु नहीं. जाओ, ऐश करो और अपनी मौत का बदला लो.    

'राब्ता' देखते हुए एक ख्याल बार-बार दिमाग में हथौड़े की तरह बजता है कि आखिर कोई भी समझदार इस तरह की बेवकूफ़ी भरी, घिसी-पिटी, वाहियात कहानी पर फिल्म बनाने और उसमें काम करने के लिए राजी क्यूँ, और क्यूँ होगा? फिर याद आये इस फिल्म से निर्देशन में कदम रख रहे दिनेश विजान साब, जो खुद 'बीइंग सायरस', 'लव आज कल', 'कॉकटेल', 'बदलापुर' और 'हिंदी मीडियम' के प्रोड्यूसर रह चुके हैं, और फिर अचानक ही मन की सारी शंकायें, दुविधाएं झट काफ़ूर हो गयीं. 'बॉस हमेशा सही होता है' की तर्ज़ पर एक कहावत फिल्म इंडस्ट्री में भी बहुत मशहूर है, 'मेरा पैसा, मेरा तमाशा'. पैसों की गड्डियों के नीचे दबी डेढ़ सौ पेज की स्क्रिप्ट में खामियां किसे दिखतीं भला. 

बहरहाल, फिल्म में अगर कुछ ठीक-ठाक है, तो वो हैं फिल्म के संवाद. हालाँकि उनका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं और कई बार तो इतने पीछे चले जाते हैं, जैसे राजकुमार-वहीदा रहमान-मनोज कुमार के 'नीलकमल' की बची-खुची खुरचन हों; पर अपने नए ज़माने के तौर-तरीकों और लहजों से एक वही हैं जो थोड़ा बहुत मनोरंजन करते रहते हैं. अभिनय में कृति कम निराश करती हैं, और शिकायत के मौके भी कम ही देतीं हैं. सुशांत कोशिश तो बहुत करते हैं, पर चाह के भी आप उनको सराहने का ज़ोखिम नहीं ले पाते. जिम सरभ इस तरह की मेनस्ट्रीम मसाला फिल्मों के लिए बने नहीं दिखते. उनका अभिनय 'नीरजा' में चौंका देने वाला था. यहाँ वो आपके भरोसे को डगमगा देते हैं. मेहमान भूमिका में न तो राजकुमार राव खुद पहचाने जाते हैं, न ही उनके अभिनय की वो चिर-परिचित छाप. हाँ, उनके मेक-अप की जितनी तारीफ़ करनी हो, भले ही कर लीजिये. 

आखिर में, 'राब्ता' देखने की वजह तो छोड़ ही दीजिये, मुझे इस फिल्म के बनने की वजह भी दूर-दूर तक समझ नहीं आती. इस ढाई घंटे की एक भयंकर भूल को भुलाने में मुझे कोई ख़ास दिक्कत नहीं होगी, पर दिनेश विजान साब से एक शिकायत तो रहेगी. "ज़नाब, इतने ही बजट में चार छोटे-छोटे 'मसान' 'अ डेथ इन द गंज', 'बीइंग सायरस' आराम से आ जाते, इतनी क्या हाय-तौबा मची थी 'राब्ता' परोसने की?' पर मुझे क्या, पैसा आपका, तो तमाशा भी आपका'! [1/5]            

Friday, 17 March 2017

ट्रैप्ड: हिंदी सिनेमा का एक नया अध्याय! [4/5]

दो दुनिया है यहीं कहीं, इक अदृश्य रेखा से बंटी-कटी. जब आप इधर नहीं होते, तो उधर होते हैं; उधर नहीं तो पक्का इधर. एक दुनिया, जहां बहरे होते जा रहे हैं हम. जरूरतों के पीछे की अंधाधुंध दौड़ में, मानवीय संवेदनाओं को सुनने-समझने-देखने की ताकत खोते जा रहे हैं. भीड़ का शोर दूसरी दुनिया से आ रही उस एक अदद आवाज़ को हमारे कानों तक पहुँचने ही नहीं देता, जिस से जुड़ कर हम खुद को ही खोने से बचा सकते हैं. इस दुनिया में, कानों पे एक अलग ही किस्म का रेडियो चिपका रक्खा है हम सभी ने, फरमाईशी फ़िल्मी संगीत का छलावा जिसमें जोरों से थाप दे रहा है. यहाँ अपनी अपनी छतों पे चढ़ कर आसमान में आँखें बोने का चस्का तो सभी को है, पर मदद की गुहार में ज़मीनी सतह से उठते दूसरी दुनिया के हाथ चाह कर भी हमें दिखाई नहीं देते.

मजेदार है कि दूसरी तरफ भी हमीं हैं. इस भीड़ भरी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाने का डर पाले, बंद कमरे के अन्दर से दरवाजे पीटने, खिड़कियों की सलाखें पकड़ के ‘बचाओ-बचाओ’ चीखने को मजबूर. जाल और जंजाल तो दोनों ही तरफ हैं, मगर इस दुनिया का संघर्ष तोड़ कर रख देता है. सामाजिक मान्यताओं के खंडन से लेकर व्यक्तिगत पराक्रम की पराकाष्ठा तक, सब कुछ अपने चरम पर. विक्रमादित्य मोटवाने की ‘ट्रैप्ड’ एक ऐसी ही सशक्त फिल्म है, जो एक बंद कमरे के सीमित दायरे में घुटती, लड़ती, जूझती और अंततः जीतती जिन्दगी के हौसले का सम्पूर्ण सम्मान और सत्कार करती है. हॉलीवुड में भले ही आपने ‘127 आवर्स’ या ‘बरी’ड’ जैसी फिल्में बहुत देखी हों, हिंदी सिनेमा में इस तरह का प्रयास अपनी तरह का एकलौता है, और बेहतरीन भी.

मुंबई जैसे महानगर में शौर्य (राजकुमार राव) जैसे नौकरी-शुदा प्रेमियों के लिए शादी की पहली शर्त, रहने का एक अच्छा ठिकाना ही होती है. नूरी (गीतांजलि थापा) अब उसके दोस्तों की जमात वाले एक कमरे के फ्लैट में तो रहने से रही. खैर, जुगाड़ काम आया और शौर्य को 35वें फ्लोर पर एक सही फ्लैट मिल गया है. भीड़-भाड़ वाला इलाका है, पर बिल्डिंग एकदम सुनसान. कानूनी मामलों में फँसी ऐसी बियाबान इमारतें मुंबई जैसे महानगरों में हैरत की बात नहीं, पर किसे अंदाज़ा था कि अगली ही सुबह जब शौर्य गलती से अपने ही फ्लैट में कैद हो जाएगा, तो उसके लिए वहाँ से निकलने में दो-चार घंटे, या एक-दो दिन नहीं, पूरे 21 दिन लग जायेंगे? मैं जानता हूँ, आप इस एक लाइन के ख़त्म होते-होते तक अपने उपायों, सवालों और सुझावों की लम्बी फेहरिस्त के साथ तैयार हो जायेंगे कि ऐसा होना किस हद तक नामुमकिन है, खास कर मुंबई जैसे शहर और आजकल के प्रबल तकनीकी दौर में? पर विक्रमादित्य मोटवाने जैसे ठान कर बैठे हों कि आपको मनवा के ही छोड़ेंगे. और उनकी इस कोशिश में उनका पूरा-पूरा साथ देते हैं राजकुमार राव. उनकी झल्लाहट हो, डर हो, खीझ हो, विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की जिद हो या फिर नाउम्मीदी में टूट कर बिखरने और फिर खुद को समेट कर उठ खड़े होने का दम; राव अविश्वसनीय तरीके से पूरी फिल्म को अपने मज़बूत कंधे पर ढोते रहते हैं. फिल्म की दमदार कहानी, अपने सामान्य से दिखने वाले डील-डौल की वजह से राव पर हमेशा हावी दिखाई देती है, जिससे दर्शकों के मन में राव के किरदार के प्रति सहानुभूति का एक भाव लगातार बना रहता है, पर धीरे-धीरे जब राव अपने ताव बदलते हैं, फिल्म उनकी अभिनय-क्षमता के आगे दबती और झुकती चली जाती है.

ट्रैप्ड’ की सबसे बड़ी खासियत है, एक ही लोकेशन पर सिमटे रहने के बावजूद आपको घुटन महसूस नहीं होने देती. आप खुद भी उस एक कमरे से बाहर निकलने की राह जोहते रहते हैं, पर ऐसा सिर्फ उस किरदार से जुड़ाव की वजह से होता है. बहरी बाहरी दुनिया का ध्यान खींचने के लिए, जब जब शौर्य कोई नयी जुगत लगाता है, आप उसके लिए तालियाँ पीटते हैं, पर जब कुछ भी काम नहीं आता, आप ही उसके साथ झल्लाते भी हैं. मोटवाने अपने लेखकों के साथ मिलकर इतनी मुस्तैदी से सारा ताना-बाना बुनते हैं कि शिकायत करने को ज्यादा कुछ रह नहीं जाता. घर को आग के हवाले कर देने से लेकर, खून से तख्तियां लिख-लिख कर बाहर फेंकने, यहाँ तक कि टीवी को खिड़की से नीचे गिराने तक की सारी जद्दो-जेहद आपको इस ‘बिना इंटरवल की फिल्म’ में शुरू से लेकर अंत तक कुर्सी से बांधे रखती है.

आखिर में; ‘ट्रैप्ड’ भारतीय सिनेमा में ‘सर्वाइवल ड्रामा’ का एक नया अध्याय बड़ी ईमानदारी और पूरी शिद्दत से लिखती है. किशोरावस्था की चुनौतियों से लड़ते ‘उड़ान’ और सिनेमाई परदे की क्लासिक प्रेम-कहानियों को श्रद्धांजलि देती ‘लुटेरा’ के बाद; विक्रमादित्य मोटवाने की ये छोटी सी फिल्म हिंदी सिनेमा के बड़े बदलाव का एक अहम् हिस्सा है. एक ऐसी फिल्म, जिस पर फ़िल्मी दर्शक के रूप में आपको भी नाज़ होगा. कुछ ऐसा जो आपने हिंदी सिनेमा में पहले कभी नहीं देखा; तो जाईये, देख आईये! [4/5]

Friday, 26 February 2016

अलीगढ़ (A): अब नहीं तो कब? [3.5/5]

दो-चार-दस गिनती की फिल्में को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने समलैंगिकों और समलैंगिकता को जिस बेरुखी, जिस छिछले तरीके से परदे पर अपने मतलब (...और भौंडे मनोरंजन) के लिए इस्तेमाल किया है, उसे साफ़ और पाक करने के लिए कोई एक फिल्म काफी साबित नहीं हो सकती, ये एक शर्मनाक सच है...पर इसी के साथ एक सच और भी है, कोशिशों ने हौसलों का दामन अभी छोड़ा नहीं है. हंसल मेहता की बेहद सुलझी हुई, संजीदगी और सादगी से भरी हुई ईमानदार फिल्म ‘अलीगढ़’ ऐसी ही एक बेहतरीन कोशिश है, जो समलैंगिकता को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बेहयाई नहीं करती बल्कि उसे ‘निजता के अधिकार’ के साथ मिलाकर एक ऐसा मुहीम छेड़ देती है जिससे बचना-मुंह मोड़ना और अनदेखा कर देना किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए आसान नहीं रह जाता!

प्रोफेसर सिरास [परदे पर मनोज वाजपेयी] अलीगढ़ यूनिवर्सिटी में मराठी पढ़ाते हैं. तलाकशुदा हैं, सो अपने छोटे से कमरे में अकेले रहते हैं. अकेलेपन के दर्द से जूझते प्रोफेसर सिरास को लता मंगेशकर का ‘आपकी नज़रों ने समझा’ सुनना और सुनते-गुनगुनाते व्हिस्की के हलके-हलके घूंट गले से उतारना अच्छा लगता है. उनकी खाली शामें अक्सर ऐसे ही गुजरती हैं, बंद कमरे में! ऐसी ही एक रात अचानक कुछ रिपोर्टर उनके घर में घुस कर उन्हें एक दूसरे आदमी के साथ अन्तरंग स्थिति में होते हुए कैमरे में कैद कर लेते हैं. उनके साथ मारपीट भी होती है पर कड़ी मुश्किलें तब शुरू होती हैं जब समाज उन्हें इस पूरे वाकये के बाद एक अलग संकीर्ण नजरिये से देखना शुरू कर देता है. यूनिवर्सिटी से उन्हें ‘नैतिकता’ की दुहाई देकर निकाल दिया जाता है. इन सबके बावजूद प्रोफेसर लगातार हालातों से समझौते करने में जुटे रहते हैं. आखिरकार, उनकी ख़ामोशी को आवाज़ देता है एक नौजवान रिपोर्टर दीपू [राजकुमार राव] और तब, प्रोफेसर सिरास अपने अधिकारों, अपने सम्मान की लड़ाई के लिए खुल कर सामने आते हैं.

सच्ची घटनाओं से प्रेरित ‘अलीगढ़’ आपको बड़े धीरे-धीरे प्रोफेसर सिरास के करीब ले जाती है, जहां उनकी व्यक्तिगत पसंद-नापसंद से अलग एक ऐसा मासूम किरदार आपके सामने आ खड़ा होता है जो बड़ी समझदारी से प्यार को समझता है और उतनी ही सरलता से समझाता भी है. जैसे-जैसे आप प्रोफेसर को जानने लगते हैं, उनका समलैंगिक होना आपके जेहन से दूरी बनाने लगता है. उनकी कविताओं में आप प्रेम की नई परिभाषाएं तलाशने लगते हैं. उनकी आँखों का खालीपन धीरे-धीरे आपके दिल को कचोटने लगता है, और ये सब अगर मुमकिन होता है तो उसके पीछे है अपूर्व असरानी की दिल छू लेने वाली कहानी और मनोज बाजपेयी का शानदार अभिनय. मनोज का अभिनय बोलने से ज्यादा कहने में यकीन रखता है. प्रोफेसर सिरास को वो जिस संजीदगी से और नजाकत से दर्शकों तक पहुंचाते हैं, एक वक़्त आता है जब आप दोनों को [मनोज और प्रोफेसर सिरास] अलग-अलग करके देखना भूल ही जाते हैं. अदालत की उबाऊ कार्यवाई में बोर होते हुए, ‘हैंडसम’ बोलने पर शर्माते हुए, ‘आपकी नज़रों ने समझा’ गुनगुनाते वक़्त लय छोड़ते-तोड़ते हुए और संगम पर दीपू के साथ खिलते-मुस्कुराते हुए; मनोज एक ऐसी छाप छोड़ जाते हैं जो आपको बार-बार अभिनय में उनके कद की याद दिलाता रहेगा. सधे और नपे-तुले अभिनय से, राजकुमार राव अपने किरदार के साथ बड़ी मजबूती से खड़े दिखाई पड़ते हैं और फिल्म को आगे ले जाने में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते.

इतने सब के बावजूद, ‘अलीगढ़’ में अगर (मुझे) थोड़ी बहुत शिकायत रह जाती है, तो वो है इसका ‘शाहिद’ की तरह का धारदार न होना. ‘अलीगढ़’ आपको सोचने पर मजबूर तो करती है, आपको प्रोफेसर सिरास की शख्सियत से बखूबी रूबरू भी कराती है पर पूरी तरह झकझोर देने में कहीं न कहीं कमज़ोर रह जाती है. फिल्म में दीपू सेबास्टियन का प्रेम-प्रसंग भी फिल्म में किसी तरह का कुछ ठोस, जरूरी और जायज़ इज़ाफा नहीं करता. पर इन चंद शिकायतों से परे, हंसल मेहता की ‘अलीगढ़’ एक बेहद जरूरी फिल्म है जो समलैंगिकता को कठघरे में खड़ा नहीं करती बल्कि उसे आपके ड्राइंग रूम में जगह देती है, आपकी बातचीत का हिस्सा बनती है और बेहतर समाज की तरफ एक अहम कदम बढ़ाती है. आखिर अब नहीं तो कब? जरूर देखिये! [3.5/5]

Friday, 12 June 2015

HAMARI ADHURI KAHANI: A sob-sob dated story! [1.5/5]

Despite being screamed at, threatened and controlled by her egoist, rough and aggressive husband, an Indian wife can’t gather enough guts to throw away her ‘Mangalsutra’. As the matter of fact, she tries to shut her ears melodramatically with both the hands when is suggested for the same from an old lady happened to be her own mother-in-law. And when the unwanted husband makes an unexpected visit in last 5 years, she doesn’t mind giving him a warm welcome with all the comforts he can wish for. And, if overwhelmed by someone’s goodwill for her miserable life, she can easily entitle him ‘God’. And, she cries all the time. Well, this is not an overview on the condition of women in prehistoric India. This is Mohit Suri’s regressively depressing and awfully hopeless film HAMARI ADHURI KAHANI written by one of the most ‘ahead of his times’ filmmakers in India, Mr Mahesh Bhatt.

Vasudha [Vidya Balan] is a single mother working as a florist in an established hotel and waiting for her gone husband Hari [Rajkumar Rao] - a prime suspect in a terrorist-act. Impressed by her dedication at work, her new boss Aarav [Emran Hashmi] offers her a better job opportunity but soon, falls in love with the lady. He loves to help the needy. And he has a very convincing justification too, for his compassion; as if no man on this earth can show empathy towards any woman around without having a proper, emotional and dramatic back-story. Aarav’s mother too has been a single-parent for the most of her life.

Hari returns. Incidentally, he is innocent and is framed. The Indian wife has turned now in a ‘Savitri’ mode to save her husband’s life. Meanwhile, the crying has been accelerated in fourth gear. The lover has to sacrifice all to play the kind-hearted matchmaker between two poor souls. Poor not because of their misfortune but the bad regressive writing! I bet, pick any old Hindi film of 60’s titled on its main female lead and it will have more liberal, sympathetic and progressive plot than this. If the plot doesn’t engage you at all, dialogues also don’t do any better. Everyone seems to be in the race to mouth lines soaked in grave philosophy about life, marriage, man-woman relationship and what not. It’s exactly like listening to Bhatt Saab’s dreadful life-lessons at any social-forum. Melodrama is another abysmal addition that creates an unbearable situation equivalent to any Balaji TV soaps. The background score actually travels the same crescendo once when Hari gets violent over Vasudha’s love confession.  

HAMARI ADHURI KAHANI has three bankable actors in its kitty. Emran Hashmi being the crowd-puller tries his luck as a serious performer here. He took it in a literal sense, I fear. Still, he is not unbearable at all but Vidya is. She constantly posses as either the most unfortunate girl on earth or the most undeserving for all the good things life has to offer her. In both conditions, one thing remains same and unvarying; the crying. Rajkumar Rao is good. His portrayal of a sadistic, male-chauvinist and solipsist husband could have more shades but the length hardly allows him to open the wings. Narendra Jha (of HAIDER fame) reminds me of Irrfan Khan getting wasted in his earlier acting-sting in Bhatt camp. Actor of such caliber deserves more and better.

Overall, Mohit Suri’s HAMARI ADHURI KAHANI is meant to have intent to get you sunk in deep, dead world of an uncompleted-unfinished love saga but turns out to be a sob-sob dated story where nothing makes a connect, neither the pain nor the love. I know a couple of single-mothers who don’t need to put fake cards on her son’s birthday gifts in the name of separated fathers; they are the fathers. Appreciate them if you get a chance! [1.5/5]

Sunday, 25 January 2015

DOLLY KI DOLI: An enjoyable ride! Short & sweet!! [2.5/5]

Marriage is a box full of surprises. You never know what comes next and in what shape, each & everyday. Sometimes, you keep waiting for one all your life and it never happens. But few are really the luckiest to have it experienced the very first morning. At least, for the on-screen grooms and their families in Abhishek Dogra’s con-comedy DOLLY KI DOLI!

A fake, cheat and single-minded bride is on loose to con filthy rich grooms. She [Sonam Kapoor, too fragile for a con artist] makes the target fall in love with her, marries him, drugs the whole family on her very last of the ‘first nights’ and runs away with all their shitloads of money and jewellery. In her victims, there is Sonu Sehrawat [Rajkummar Rao] a Haryanvi flashy boy and a desperate mumma’s boy from Delhi [Varun Sharma of FUKREY fame]. Picture this; when they meet each other appreciating the fact that Dolly is the one married to both, Varun asks naively, “bhai, iss hisaab se humara rishta kya hua? (Bro, what kind of relationship we are in now?”. Giggles come with guarantee at such cases and there are many in DOLLY KI DOLI, no doubt on that.

Based on a real chain of events and a crime-story of ‘Looteri Dulhan’ in northern India, Abhishek Dogra’s DOLLY KI DOLI works because of the humor in the script that comes easy like one after the other and the characters who despite being the typical ones, charm you endlessly. Rajkummar Rao is in top form. Watching him dancing like there’s no one to care in an item number with Malaika, is a treat. His Haryanvi is perfectly portrayed and wins your heart by the simplicity in the character and the sincerity in the performance. Sonam plays Dolly with total ease yet she doesn’t look very convincing as a con artiste. Varun is cute, indeed. He, in a sense continues his FUKREY performance. So, if you had liked him earlier, have another slice of the same. Pulkit Samrat as the cop after Dolly’s capture definitely had Salman Khan’s Chulbul Pandey in DABANGG as his acting reference. Taking cues from Salman’s dialogue, “hum yahaan ke robin hood hain”, he even possesses the name Robin.

And then, my favorite track in the film. Mohammed Zeeshan Ayyub [of RAANJHANAA] plays the fake brother to Sonam’s Dolly and at one point; he declines to play her brother anymore as he has romantic feelings for her. This alone has so much potential in creating comedy and drama both. Alas, it wasn’t treated well. Film’s biggest strength is the length. In its crisper than masala papad 107 mins of total duration, film could have been a laugh-riot but it comprises with being just an enjoyable watch; and the culprit here is the uneven screenplay lacking the power to convince. Film hurriedly tries to justify Dolly’s reasons to go for fake marriages after she fails in one. In today’s times, can you imagine a courtship of more than a couple of months and there is no ‘kiss’ happening between the two because of the stupidest of all ‘yeh sab shaadi ke baad’ excuse? All because, we can’t show our bad girl being so bad! Black is here not so dark. I wish writing in Bollywood gets mature soon.

At the end, DOLLY KI DOLI is an enjoyable ride you won’t regret much after leaving theatre. Rajkummar Rao ensures most of it. It’s short & sweet unlike Indian marriages. [2.5/5] 

Friday, 30 May 2014

CITYLIGHTS: Tragic tale of shattered dreams…and viewer’s disappointment! [2.5/5]

Remakes are not alien to the ‘Bhatt’ camp but when this giant movie production company selected one small but beautiful British indie film ‘METRO MANILA’ to bring on the table and later on, decided to rope in Hansal Mehta & Rajkumar Rao of last year’s most confident social-biographical film SHAHID to helm the responsibility to recreate; it looked like another feather in the hat and a sure-shot winner all the way. But Bollywood never ceases to surprise; or to disappoint in this case.

CITYLIGHTS sadly remains an average thriller with some promising scenes that make your heart bleed in depression, bloom in well-captured moments of togetherness and a savior in competent shoes of Rajkumar Rao- one of the few best things about the film.

After losing his shop in local market to the loan sharks, Deepak Singh [Rajkumar Rao] with his family is forced to migrate from Rajasthan to the city of dreams Mumbai. The search for a better lifestyle and a good prospect of earning his livelihood soon throw them in the gloomy, dark and depressing world of reality. Poverty is the biggest curse one carries and one should get it off the shoulder by any means and with all the efforts; guides his colleague at work [Maanav Kaul in a terrific presence] in a security agency. Together they seek the impossible looking road to redemption.

A tragic tale of dreams getting shattered and compromises taking over the hopes, CITYLIGHTS officially borrows the plot and the screenplay for the most parts from METRO MANILA. Kudos to the makers for giving the due credit in the said department upfront, loud & clear! This is something you don’t see often from the ‘Bhatts’. Even then, though Hansal Mehta does leave his mark in adopting it according to the Indian sensibilities and emotional connectivity in a complete manner, he certainly couldn’t refrain himself from falling into a much-comforted zone filled with standard ingredients for a Bollywood film. The songs that keep coming in chunks and bits, the gratuitously put love-making scenes with ongoing smooches as if we were in another ‘Bhatt-Emran Hashmi’ association and a completely messy-clumsy climax scene are enough to ruin the possibilities of coming up with a deserving descendant of SHAHID.

On the positive side, it is only and only the performances that stand out at a respectable position. Rajkumar Rao is in top form. He successfully inherits the mannerism, dialect and the vulnerability of a small town simpleton. His presence on screen alone is very fulfilling. Patralekha as his wife shines in her début role. This plain Jane has the sparks of a confident performer. The veteran theatre icon Maanav Kaul is a pleasant addition to the cast. A flawless performance is something he would never miss to deliver. Special mention to Rashmi Singh for her contribution in the consequential lyrics that gel well with the emotions characters carry on screen.

SHAHID being the benchmark for Mehta, CITYLIGHTS fails to triumph over the expectations one would have. A less honest effort to bring out deeply depressing reality of today’s times! Glimpse can be seen but is it good enough to even compromise? I won’t, may be because I have seen the original. Disappointed! [2.5/5]

Friday, 21 March 2014

RAGINI MMS 2: ‘Sunny’ side up! Horror gets low! [2/5]

So, how many more times exactly you want to see a possessed body [quite inviting in this case] tied in wooden chair-hanged in air, making screechy deafening sounds and one good Samaritan soul helping the needy with his/her own set of sacred chants tries to persuade the evil with, “Isse chhod do! Tum chali jao” (Leave her alone! Go away!!)? That too when we already have impactful exorcism scenes in numerous horror classics! With such plenty of ripped-off references from the past formulaic horror flicks; defined deliciously as ‘horrex’, RAGINI MMS 2 fails big time to chill your bones and ends up tickling your funny bones unintentionally with stupidity scattered allover and boredom that comes from the lack of originality in plot.

Taking clues from its previous part, RAGINI MMS 2 takes you back at the same haunted house where Uday [the Rajkumar Rao of now] has lost his life while implementing his sleazy idea to shoot his personal moments with his girlfriend Ragini [Kainaz]. Ragini is now in a mental asylum and an irritatingly over-excited filmmaker [Parvin Dabas hams like anything] wants to make a film on the same. In his explanation, this would be a well-balanced mishmash of horror and sex that will leave you in your best of confusion to either go to your mother in holy-scare or to your girlfriend to satisfy your urge for dirty pleasures. This is probably the most honest announcement for all the viewers as what to expect from it. Get confused and return unfulfilled with neither being a solid punch in the name of entertainment!

Film also has been written, as to rationalize and defend its main lead Sunny Leone’s past line of work and her way in to Bollywood. She interestingly plays herself in the film. And where everyone else in the cast & crew make comments on her real life (In one scene, the director of the film in the film reacts on her instinct to have some research before playing the character, “Research? Yeh Porno se Rituporno kabse bann gayi?”), she takes on everyone with an enactment of a fake-orgasm scene to make her point of it being all a part of one’s profession. For the rest, either she’s roaming around in her skimpy pieces of silken lingerie or being extremely physical with most (She was even made to kiss Sandhya Mridul for literally no reason to have enough justification). At best, it is a 2-hour long Sunny Leone showreel!

Talking about performances in such mediocre film would be wasting one’s time and effort but if anyone could really manage to pull it till the status of ‘likeability’, it is Sandhya Mridul. Cast as an animated starlet who adds an extra ‘s’ in each word she bound to speak, Mridul responsibly slips into the character and provides a couple of genuine laughs with her contagious flare of immense energy. Sunny looks astoundingly hot and does precisely what most would love to see her doing!

Overall, it is a bad follow-up to an impressively performed & directed first part which was again a rip-off from ‘THE BLAIR WITCH REPORT’ and ‘PARANORMAL ACTIVITY’. This one pays its tribute to ‘EXORCIST’ & ‘THE SHINING’ and many others in the most forgettable manner. Only for people with weak hearts and even weaker sense of entertainment! [2/5]

Friday, 7 March 2014

QUEEN: Kangana arrives…and how!...in this deliciously delightful film of the season! [4/5]

When everyone else is busy discussing the issue on news panels as 2014 supposedly being the year of Women Empowerment, Producer-turned-director Vikas Bahl has done his bit full-heartedly, loud and clear with his second and the most delightful film of the year, crowned already in its name. ‘QUEEN’ powerfully belongs to the genre called ‘slice of life’ movies where every ounce of emotions, every piece in the settings and each shade of events is authentic, appropriate, raw & relatable. And then, there is Kangana Ranaut- the gifted conductor without any baton who single-handedly orchestrates all of it to create a magnificently charming film. Make a nice cozy room for this in your hearts. It’s not going to leave any soon.

Rani [Kangana as a surprising revelation] is a typical ‘Rajauri’ girl of West Delhi who’s all excited to loose her ‘virginity ka vrat’ since it’s just a couple of days more for her to get married with his prince charming Vijay [Rajkumar Rao in a comparatively smaller but significant role]. While good things are in wait for its turn, bad knocks the door first. She’s been dumped for not being modern enough to match the status of the London-retuned eligible groom. Rani is shattered but doesn’t want to miss her last chance to taste freedom as the pre-planned honeymoon package in Paris is still on. And then, begins a fascinating yet simple journey starting with a maze of ambiguity, resistance, conflicts and winding up in the unfastened ends of independence, liberty and freedom to live happily ever after.

Sounding similar to ENGLISH-VINGLISH, ‘QUEEN’ is not more than a distant relative who never actually has met with the other. Rani here is more spirited and progressively more opened up soul than anyone you have seen on screen. Her first reactions to anything inventive towards her are immediate, simple and carefree. Her tricky tactics to deal with any unseen, enforced situation might have its own logic behind but are totally entertaining to have you in splits. So, she can be apprehensively charmed by people doing ‘lip-to-lip’ kisses. She can also recount the state of women in India where they aren’t allowed to even burp in public and that too without making it a loud protest. Well-written!!

QUEEN belongs to Kangana. She owns it as much as any legendary actresses do to their lifetime roles. She succeeds to make your heart somber in pain but does an outstanding job to bring tons of smiles on your face. Every actor needs a character he could slip into to make it alive. For Kangana, this is it.  Rajkumar Rao makes his presence felt. Lisa Haydon is good as Rani’s confidante in Paris. Actors as her friends-cum-roomies are perfectly cast.

Director’s sweet remembrance audio-visual to film’s late cinematographer Bobby Singh, Amit Trivedi’s uplifting songs & background score, delicious dialogues co-written by Kangana herself and a total breezy-fresh and funny tone to the film are added features that don’t allow you to miss it at any cost. Include it in your to-do list for this weekend, soon after finishing this review. Others can wait! QUEEN shouldn’t!! [4/5]