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Friday, 31 March 2017

पूर्णा: सिनेमा और समाज के बीच की ‘उम्मीद’...कायम रहे! [4/5]

एवरेस्ट सिर्फ इसलिए नहीं चढ़ना है, क्यूंकि एवरेस्ट बड़ा है, सबसे बड़ा. वजह बड़ी होनी चाहिए, उससे भी बड़ी. तेलंगाना के एक आदिवासी इलाके की पूर्णा महज़ 13 साल की है. भूख, गरीबी, अशिक्षा जैसी मुसीबतों का पहाड़ पहले भी लांघती आई है, पर एवरेस्ट-विजय करने की वो ‘बड़ी’ वजह अभी भी उसके पास नहीं है. वो वजह उसे मिलती है अपनी अक्का (बड़ी दीदी) की दम तोड़ती आँखों में; एक ऐसे चमकीले सपने की तरह, जिसमें पूर्णा ने एवरेस्ट फ़तेह कर ली है और अब उसके छोटे से गाँव को पूरी दुनिया जानती है. उम्मीद की एक चौड़ी सड़क उसके गाँव के बीच से होकर निकलने लगी है. पूर्णा को अब अपने लिए नहीं, अपनी अक्का, अपने गाँव और अपने जैसी हज़ारों दूसरी लड़कियों के लिए एवरेस्ट चढ़ना है. अब एवरेस्ट बड़ा नहीं रहा, वजह बड़ी हो गयी.

पूर्णा’ के साथ, निर्माता-निर्देशक और अभिनेता राहुल बोस सिनेमा के लिए भी कुछ ऐसी ही मिसाल पेश करते हैं. फिल्म बड़ी हो, न हो, उसके पीछे की वजह बड़ी होनी ही चाहिए. एवरेस्ट पर पहले भी आपने बहुत सारी फिल्में देखी होंगी (हिंदी में कुछ गिनती की, अंग्रेजी में ज्यादा); परदे पर एवरेस्ट को खलनायक की तरह अजेय, अभेद्य और विशालकाय दिखा कर, किरदारों को ‘नायक’ बनाने में लगभग सब की सब सफल भी रही हैं, पर राहुल जिस संजीदगी और समझदारी से अपना सारा ध्यान एवरेस्ट की उंचाईयों से हटाकर, तमाम सतही सामाजिक बुराइयों और गर्त में धंसते जा रहे समाज के कुछ ख़ास तबकों की तकलीफों पर केन्द्रित करते हैं, वो न सिर्फ काबिल-ऐ-तारीफ़ है, बल्कि उतना ही प्रेरक भी.

चचेरी बहनें प्रिया (एस मारिया) और पूर्णा (अदिति ईनामदार) सरकारी स्कूल में जाती तो हैं, पर उनका पूरा दिन झाड़ू लगाने में ही बीतता है. उनके पास फ़ीस के पैसे नहीं हैं. प्रिया गाँव से दूर एक ऐसे स्कूल में जाना चाहती है, जहां पढ़ाई के साथ-साथ खाना भी मिलता है. “अंडा मिलता है. कभी देखी भी हो?” पूर्णा नहीं में सर हिला देती है. फिल्म के एक दृश्य में, जहां लड़कियां आपस में ‘कौन कितना गरीब’ खेल खेल रही होतीं हैं, पूर्णा की मार्मिक दलील देखिये, “मेरे तो नाम में ही ‘पुअर’ (‘poor’na) है.” प्रिया की शादी हो गयी है, पर पूर्णा को प्रोत्साहित करना नहीं छोड़ती. पूर्णा अब उसी स्कूल में है, जहां उसे प्रवीण कुमार (राहुल बोस) के रूप में समाज कल्याण विभाग के कर्मठ, सशक्त और दूरदर्शी अधिकारी के शिक्षा के क्षेत्र में नए-नए सुधारों और सुझावों का साथ मिलता है.

सच्ची कहानी को उतने ही सच्चे तरीके से परदे पर लाने के लिए, राहुल फिल्म को वास्तविकता के इतने नज़दीक लेकर आते हैं कि कई बार आप सिनेमा और सच्चाई में फर्क ही महसूस नहीं कर पाते, ख़ास कर मुख्य कलाकारों (मारिया और अदिति) के अभिनय और बोल-चाल में. हालाँकि धृतिमान चैटर्जी, हीबा शाह, आरिफ़ जकारिया और खुद राहुल जैसे जाने-पहचाने चेहरों की मौजूदगी फिल्म को फिल्म समझ कर ही देखने के लिए बार-बार भटकाती रहती है, पर दूसरे कलाकार कुछ ज्यादा ही सहज रूप से कैमरे को नज़रअंदाज़ करने में सफल साबित होते हैं. राहुल निर्देशक के तौर पर भी खुद को बहुत संयमित रखते हैं. तकनीकी तौर पर बहुत ज्यादा उत्साहित होकर दर्शकों को चौंकाने या प्रभावित करने के लोभ से खुद को बचाए रखने में उनकी समझदारी साफ़ नज़र आती है. फिल्म के आखिरी हिस्से में वो सन्नाटे का जिस खूबी से इस्तेमाल करते हैं, परदे पर ही देखने की बात है.

देश में विकास का जो सारा ताना-बाना शहरों और गाँवों को जोड़ने की बात करता है, ‘पूर्णा’ काफी हद तक उसकी कड़वी सच्चाई आप तक पेश कर पाती है. ‘पूर्णा’ आपको कचोटती है, जब आप शादी के जंजाल में बाँध दी गयी प्रिया को पहली बार साड़ी में देखते हैं. ‘कुछ कर गुजरने’ की चाह लिए मोटी-मोटी आँखों वाली बच्ची को ‘सब कुछ करने-सहने वाली’ औरत बनाने पर हम कैसे और क्यूँ आमादा हो जाते हैं? ‘पूर्णा’ आपको अन्दर से तोड़ देती है, जब सिर्फ 13 साल की पूर्णा को आप हालातों से लड़ते-झगड़ते-बढ़ते देखते हैं. हालाँकि प्रवीण कुमार जैसे जज्बाती और जुझारू लोगों की ईमानदार कोशिशों पर रौशनी डालकर, ‘पूर्णा’ उम्मीदें भी बहुत जगाती है. सिनेमा के लिए भी, समाज के लिए भी.

मैले-कुचैले कपड़ों में, सिग्नल पर भीख मांगते बच्चों को तो हम अब भी डांट-डपट कर दुत्कार देंगे, सारा ठीकरा निकम्मी सरकारों के माथे फोड़ कर मुंह भी मोड़ लेंगे; पर ‘पूर्णा’ कम से कम अपने 105 मिनट के छोटे से वक़्त तक ही, आपको बेहतर इंसान बनाये रखने की एक कामयाब कोशिश तो करती ही है. 105 मिनट के बाद की जिम्मेदारी, समझदारी और ईमानदारी आपकी अपनी! [4/5]                            

Friday, 16 September 2016

पिंक: इसको ‘ना’ कहने का सवाल ही नहीं! [4/5]

पिंक’ कोई नई बात नहीं कह रही. ‘पिंक’ में हो रहा सब कुछ, खास कर लड़कियों के साथ कुछ बहुत नया नहीं है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं. गाँव के पुलियों पर बैठे, साइकिल चलाकर स्कूल जाती लड़कियों पर आँख गड़ाये आवारों के जमघट से लेकर बड़े शहरों की बड़ी इमारतों में ख़ूनी लाल रंग की लिपस्टिक लगाने वाली, अपनी ही ऑफिस की लड़की को ‘अवेलेबल’ समझने की समझदारी दिखाते पढ़े-लिखों तक, ‘पिंक’ किसी को नहीं छोड़ती.

अक्सर देर रात को घर लौटने वाली ‘प्रिया’ ज़रूर किसी ग़लत धंधे में होगी. सबसे हंस-हंस कर बातें करने वाली ‘अंजुम’ को बिस्तर तक लाना कोई मुश्किल काम नहीं. 30 से ऊपर की हो चली ‘रेशम’ के कमरे पर आने वाले लड़के सिर्फ दोस्त तो नहीं हो सकते. ‘कोमल’ तो शराब भी पीती है, और शॉर्ट स्कर्ट पहनती है. ये ‘नार्थ-ईस्ट’ वाले तो होते ही हैं ऐसे. हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. ‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है.

दिल्ली में अकेले रहने वाली तीन लड़कियां [तापसी पुन्नू, कीर्ति कुल्हारी, एंड्रिया] एक रॉक-शो में तीन लड़कों से मिलती हैं. थोड़ी सी जान-पहचान के बाद लड़के जब उनके ‘फ्रेंडली’ होने का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं, लड़कियों में से एक उनपे हमला कर देती है. राजवीर [अंगद बेदी] हमले में घायल हो जाता है. लड़कियां भाग निकलती हैं. चार दिन बाद भी, लड़कियां सदमे में हैं. राजवीर ऊँचे रसूख वाला है. पुलिस अब लड़कियों के ही पीछे पड़ी है. बचाने के लिए आगे भी कोई आया है, तो अपने बुढ़ापे और ‘बाइपोलर डिसऑर्डर’ से जूझता एक रिटायर्ड वकील [अमिताभ बच्चन].

अनिरुद्ध रॉय चौधरी की ‘पिंक’ शुरुआत से ही आपको झकझोरने लगती है. हालाँकि पहले भाग में फिल्म का पूरा फोकस लड़कियों के डरे-सहमे चेहरों और उनकी डांवाडोल होती हिम्मत और हौसलों पर ही टिका होता है, पर ये वो हिस्सा है जो आपको सोचने पर मजबूर करता है. अगले भाग में कोर्ट की जिरह में अमिताभ लड़कियों की सुरक्षा, उनकी पसंद-नापसंद, उनके अधिकारों जैसे हर मसले पर मर्दों की सोच पर मजबूती से प्रहार करते हैं. इस हिस्से में फिल्म कहीं-कहीं नाटकीय भी होने लगती है, पर अंत तक पहुँचते-पहुँचते ‘पिंक’ अपनी बात रखने-कहने में बिना हिचकिचाहट सफल होती है.

पहले ही दृश्य में, घबराई हुई मीनल [तापसी] कैब ड्राईवर को डांटते हुए पूछती है, “नींद आ रही है क्या? रुको, आगे बैठकर बातें करती हूँ”. मेरे लिए, तापसी के इस किरदार में धार उसी दम से महसूस होनी शुरू हो जाती है. उसके बाद, बच्चन साब को उसका पलट कर घूरना. निश्चित तौर पर, तापसी इस फिल्म की सबसे मज़बूत कड़ी हैं. अपने से बड़ी उम्र के आदमी के साथ कभी रिश्ते में रही, फलक के किरदार में कीर्ति और ‘नार्थ-ईस्ट’ से होने का दर्द चेहरे पे लिए एंड्रिया; फिल्म के अलग-अलग हिस्सों में अपनी मौजूदगी बार-बार और लगातार दर्ज कराती रहती हैं. अपने ही मुवक्किलों को कटघरे में सवाल दागते उम्रदराज़ वकील की भूमिका में अमिताभ बच्चन बेहतरीन हैं, ख़ास कर उन मौकों पर, जब वो बोलने की जेहमत भी नहीं उठा रहे होते.

अंत में; ‘पिंक’ उन सभी महिलाओं के लिए एक दमदार, जोरदार आवाज़ है, जो हर रोज चुपचाप घरों, दफ्तरों, बाजारों में मर्दों की दकियानूसी सोच, गन्दी नज़र और घिनौनी हवस का शिकार बनती रहती हैं. साथ ही, मर्दों के लिए भी ये उतनी ही जरूरी फिल्म है. देखिये और सोचिये. कहीं आप के अन्दर भी कुछ बहुत तेज़ी से सड़ तो नहीं रहा? [4/5] 

Friday, 8 January 2016

चौरंगा (A): नाटकीयता से परे, वास्तविकता का सिनेमा! [4/5]

जातिगत विसंगतियों के दुष्प्रभाव, छूत-अछूत के लाग-लपेट और धर्म के नाम पर विकलांग मानसिकता का परिचय देते भारतीय समाज को हमने पहले भी श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलाणी के सिनेमा में तार-तार होते देखा है. ‘चौरंगा’ भी काफी हद तक इसी दायरे में फैलती-सिमटती दिखाई देती है, इसीलिए एक मूल प्रश्न बार-बार दिमाग में कौंधता रहता है. ‘क्या कुछ भी नहीं बदला है?’ उत्तर फिल्म ख़तम होने के तुरंत बाद कुछ सरकारी तथ्यों के परदे पर उभरने के साथ ही मिलने शुरू हो जाते हैं. सच में, कुछ भी नहीं बदला है. और अगर नहीं बदला है तो सिर्फ सिनेमा में बदलाव दिखा देने भर से क्या सचमुच बदलाव आ जायेगा? ‘चौरंगा’ की पृष्ठभूमि, ‘चौरंगा’ के कथानक और ‘चौरंगा’ के पात्रों से पुराने होने की गंध भले ही आती हो, पर ‘चौरंगा’ के प्रासंगिकता की चमक पर कहीं कोई धूल जमी दिखाई नहीं देती. ‘चौरंगा’ एक सार्थक कोशिश है भारतीय समाज के उस एक वर्ग को टटोलने में, जिसे हम शहरी चकाचौंध के लिए कहीं अँधेरे में छोड़ आये हैं.

साहब (संजय सूरी) गाँव वालों के लिए हैंडपंप लगवा रहे हैं. पंचायत के पैसों से ही सही, लेकिन साहब ने आज पूरे गाँव के लिए भोज और सिनेमा का प्रबंध कराया है. साहब दलितों को लात मार सकते हैं पर दलित अगर साहब का पैर छूने जाएँ, तो साहब छिटक पड़ते हैं. रात के अँधेरे में तो साहब और भी दयालु हो उठते हैं, सूअर पालने वाली धनिया (तनिष्ठा चैटर्जी) से ऐसे लिपटते हैं जैसे चन्दन के पेड़ से सांप. धनिया भी क्या करे? मौका देख के साहब से बेटों की पढाई-लिखाई का इंतज़ाम करवा ही लेती है. बड़ा बेटा बजरंगिया (रिद्धि सेन) खप गया है. पढ़ाई के साथ साथ इस विकृत सामाजिक ढाँचे को जानने-समझने लगा है पर छोटा बेटा संतू (सोहम मैत्रा) अभी भी सवालों का टेपरिकॉर्डर लिए घूमता रहता है. साहब की बेटी से प्यार होने लगा है उसे, और उसकी मानें तो लड़की भी कभी-कभी देख लेती है उसकी ओर.

‘चौरंगा’ का संसार सिनेमा के प्रभाव में फंसने की गलती नहीं करता. वास्तविकता के चित्रण में नाटकीयता का थोड़ा भी दखल महसूस नहीं होने देता. बिकाश रंजन मिश्रा अपनी पहली ही फिल्म में इस उंचाई को बड़ी सहजता से छू जाते हैं, देख कर ख़ुशी भी होती है और हैरानी भी. बजरंगिया और संतू के बीच के दृश्य फिल्म को बांधे रखते हैं. ये वो दृश्य हैं जहां कच्ची उम्र की मासूमियत भी है, बन्धनों में जकड़े रहने की पीड़ा भी है और सब कुछ तोड़, भाग निकलने की उमंगें भी हैं. फिल्म के कुछ किरदार अँधेरे में बहुत भयावह लगने लगते हैं, जैसे यौन कुंठा से ग्रस्त अंधे पुजारी बाबा [धृतिमान चैटर्जी]. पर मिश्रा कहीं भी फिल्म को सनसनीखेज बना कर बेचने की भूल नहीं करते.

अभिनय की दृष्टि से संजय सूरी सबसे ज्यादा हैरान करते हैं. उन्हें इस तरह के ठेठ गंवई किरदार में देखने का तजुर्बा किसी को भी नहीं रहा है, और वो बखूबी जंचते हैं. ‘माय ब्रदर निखिल’ के बाद ये उनकी सबसे बेहतरीन अदाकारी है. तनिष्ठा को हम पहले भी इस तरह के किरदारों में देखते आये हैं. उन्हें तो एक तरह से महारत हासिल है. धृतिमान चैटर्जी का अभिनय किसी सपने जैसा है, आपको बार बार खुद को एहसास दिलाना पड़ता है कि आप सिनेमा ही देख रहे हैं. और अंत में दोनों बाल कलाकार, अभिनय में जिनकी सहजता और सरलता लाजवाब है.

‘चौरंगा’ उन सभी लोगों के लिए है, जिन्हें अक्सर शिकायत रहती है कि अच्छी फिल्में अब कहाँ बनती हैं? ‘आँखों देखी’, ‘मसान’, ‘अमरीका’ और ‘चौरंगा’ जैसी ‘भारतीय’ फिल्मों के साथ नए भारत का सिनेमा अब अपने मानक खुद तय करने लगा है. थोड़ी पहल आपको भी करनी होगी. जरूर देखिये! [4/5]