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Friday, 12 October 2018

तुम्बाड़: हिंदी सिनेमा में हॉरर का एक नया अध्याय! [4/5]


लोककथाओं में सांस लेती भूत-प्रेतों, राक्षसों और शैतानों की कपोल-कल्पित कहानियाँ अक्सर काल से परे होती हैं. ‘बड़े दिनों की बात है या फिर ‘मेरी दादी-नानी ऐसा बताती थीं जैसे अप्रामाणिक प्रसंगों और तत्थ्यों से दूर हटते किस्सों को सुनते-सोचते वक़्त, हम अक्सर अपने डर को डराने के लिए ‘सिर्फ कहानी है जैसे कथनों का सहारा ले लेते हैं. राही अनिल बर्वे ‘तुम्बाड़’ के जरिये एक ऐसी ही मनगढ़ंत कहानी हमारे सामने रखते हैं, पर बड़ी चालाकी से अपने क़िस्से को जिस तरह समय और जगह (काल और स्थान) की बेड़ियों में बाँध कर रखते हैं, आप पूरी तरह यकीन नहीं भी कर रहे हों, तो भी करना चाहने लग जाते हैं. नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली लोककथाएं भी परदे पर इतनी मायावी, सम्मोहक और रहस्यमयी लग सकती हैं, यकीन नहीं होता. ‘तुम्बाड़’ हॉरर फिल्मों के लिए हिंदी सिनेमा इतिहास में एक नए अध्याय की तरह है. कुछ ऐसा, जैसा आपने बचपन की कहानियों में सुना तो होगा, हिंदी सिनेमा के परदे देखा कभी नहीं होगा!

1918 का भारत है. महाराष्ट्र का एक छोटा सा गाँव, तुम्बाड़. सालों से जंजीरों में कैद दादी शापित हैं. लोभ से शापित. सिर्फ सोती हैं, खाती हैं. शायद बाड़े (किले नुमा हवेली) के खजाने का रहस्य जानती हैं. पोता अपनी माँ के साथ उन्हें वहीँ छोड़ आता है, मगर खजाने का लालच पोते विनायक (सोहम शाह) को 15 साल बाद वापस खींच लाता है. दादी के शरीर के ऊपर मोटी-मोटी जड़ों का जाल उग आया है. शरीर गल के मिट्टी हो चला है, पर दिल अभी भी धमनियों जैसी पेड़ों की जड़ों में जकड़ा धड़क रहा है. दादी अभी भी ज़िन्दा हैं, खजाने का राज़ बताने के लिए, जिसकी रक्षा करता है, लोभ का देवता, हस्तर. देवी की कोख से जन्मा पहला देवता, जिसने धरती का सारा सोना चुरा लिया था, और अब अपनी लालच की वजह से बाड़े में कैद है. विनायक लालच में हस्तर से कम नहीं. हस्तर को अब दुधारू गाय की तरह इस्तेमाल करने लगा है, मगर कब तक? 15 साल बाद, भारत आज़ाद हो चुका है, और विनायक पहले से कमज़ोर. अब उसे अपने बेटे को तैयार करना होगा. लोभ और लालच की दलदल में उतरने के लिए.

‘तुम्बाड़’ लालच और हवस जैसी मानवीय प्रकृति के डरावने पहलुओं को कुछ इस अंदाज़ से पेश करती है कि असली दानव आपको हस्तर से कहीं ज्यादा विनायक ही लगने लगता है. हस्तर तक पहुँचने की विनायक की ललक और खजाने को हथियाने की दिलचस्पी में चमकती उसकी आँखों का खौफ, असली राक्षस के चेहरे से भी ज्यादा घिनौना लगता है. कहानी में आप जिस तरह किरदारों की लालच को पीढ़ी-दर-पीढ़ी रगों में उतरते और आखिर तक आते-आते अपने ही बनाए जाल में फंसते देखते हैं, इतना रोमांचक और रहस्य से भरा है कि आप एक पल को भी अपनी आँखें परदे से हटाना नहीं चाहेंगे. ‘तुम्बाड़’ में राही अनिल बर्वे हॉरर के उस मिथक को तोड़ देते हैं, जिसे हॉलीवुड भी आज तक दोहराते आया है. दर्शकों को चौंकाने या डराने के लिए राही, कैमरा या साउंड के साथ किसी तरह का कोई झूठा प्रपंच नहीं रचते, बल्कि इसके विपरीत एक ऐसी तिलिस्मी दुनिया रंगते हैं, जो देखने में जितनी मोहक है, उतनी ही रहस्यमयी भी. पंकज कुमार का कैमरावर्क यहाँ अपने पूरे शबाब पर है. पूरी फिल्म में उनके औसत और आम फ्रेम भी किसी पेटिंग से कम नहीं दिखते. बाड़े में लगे झूले पर बैठा विनायक और बाद में वही टूटा हुआ खाली झूला. फिल्म के आखिरी दृश्यों में लाइट के साथ पंकज कुमार के प्रयोग रोंगटे भी खड़े करते हैं, और आँखों को सम्मोहित भी.

अभिनय में, सोहम शाह की अदाकारी को पहली बार एक बड़ा कैनवस मिला है, और ये उनकी अपनी क़ाबलियत ही है, जिसने फिल्म में उनके किरदार के भीतर के हैवान को महज़ आँखों और चेहरे के भावों से भी कई बार बखूबी ज़ाहिर किया है. उनकी मज़बूत कद-काठी भी विनायक के हठी, लालची और घमंडी किरदार को और उकेर के सामने ले आती है. अन्य कलाकार भी अच्छे हैं, मगर फिल्म के मज़बूत पक्षों में कतई साफ़-सुथरा विज़ुअल ग्राफ़िक्स, बेहतरीन सेट डिज़ाइन और काबिल मेकअप एंड प्रोस्थेटिक टीम सबसे ऊपर हैं.

हॉरर फिल्मों का एक दौर था, जब हमने फिल्मों में कहानी ढूँढनी छोड़ दी थी, और डरने के नाम पर पूरी फिल्म में सिर्फ दो-चार गिनती के हथकंडों का ही मुंह देखते थे. कभी कोई दरवाजे के पीछे खड़ा मिलता था, तो कभी कोई सिर्फ आईने में दिखता था. पिछले महीने ‘स्त्री ने हॉरर में समझदार कहानी के साथ साफ़-सुथरी कॉमेडी का तड़का परोसा था. इस बार ‘तुम्बाड़’ एक ऐसी पारम्परिक जायके वाली कहानी चुनता है, जो हमारी कल्पनाओं से एकदम परे तो नहीं हैं, पर जिसे परदे पर कहते वक़्त राही बर्वे और उनके लेखकों की टीम अपनी कल्पनाओं की उड़ान को आसमान कम पड़ने नहीं देती. हस्तर के पास सोना तो बहुत है, पर वो अनाज का भूखा है. अनाज ही उसकी कमजोरी है, और अनाज ही उसका शाप. शापितों के लिए एक मंत्र है, ‘सो जाओ, नहीं तो हस्तर आ जायेगा, और शापित तुरंत गिर कर खर्राटे मारने लगता/लगती है.

अंत में; ‘तुम्बाड़’ एक बेहतरीन हॉरर फिल्म है, जो हिंदी हॉरर फिल्मों को लेकर आपके खट्टे-मीठे अनुभवों को एक नया मुक़ाम देगी. एक ऐसा मुकाम, जो अपने आप में अनूठा है, बेहद रोमांचक है, खूबसूरत भी और जिसे आप सालों तक सराहेंगे. लालच अच्छी बात नहीं, पर ‘तुम्बाड़’ जाने का लोभ छोड़िये मत. [4/5]               

Sunday, 23 February 2014

GULABI GANG: Deeply disturbing, shocking yet entertaining! Recommended!! [4/5]

More than 3 hours and I am still feeling suffocated with an utterly devastating insight about how inhuman, ruthless and cold-blooded our society can be. Wooden faced impassive men are shamelessly trying to cover up a planned murder of a young girl to avoid legal consequences for the family in question; quoting a Ramayana stanza that reads it’s all written in the destiny and we are no one to change. There is also a mother who doesn’t blink in doubts while confessing that she would totally understand the intensity of the crime if their sons could kill their own sister for dishonoring the family by marrying a man of her own choice. If this all looks or sounds an exaggerated dramatized plot of some thriller, let me pinch, punch and shake you up to the harsh reality we are in.

Nishtha Jain’s shockingly real GULABI GANG is packed with such shameful episodes and each one makes me feel like crying out loud over our dying empathy for humanity but that’s not all. There is a ray of hope too and in the courageous name of Sampat Pal, the founder lady of a pink clad women group aka the Gulabi Gang.

In the Bundelkhand Region, Sampat Pal runs an organization at her own to help women fight against crime. We all have seen her in a reality show on Indian television. We all, at some point have laughed at her overtly simple behavior but here, she beats us all and emerges as one of most determined, powerful and extremely concerned social worker. She can smell the fishy. She can make things in process. She can talk unhesitantly for the right. With her gang of 15000+ members, she does ‘dharna’ and ‘hunger strike’ against the powerful and corrupts. She leads, guides, educates and empowers the suppressed women around her. She shows us to be the voice for a change in this conservative, regressive and thoroughly patriarchy ruling power of men.

Nishtha Jain brilliantly documents the workings of the gang. From capturing the all burnt into ashes body of the girl murdered to questioning the local police in charge for their inactivity in filing the case, she actively participates as an earnest investigative partaker. Watch out for a shot where camera shows villagers of all ages gathered to witness the event but don’t really want to be vocal about and start moving out to leave the frame empty at the end.

Documentaries are known to be dead factual and less entertaining but GULABI GANG is sure an exception. If it makes you cringe with deeply disturbing truth of our society, fuming over your helplessness to bring some change and feel extremely sensitive about the sufferings women are facing in some part of our country not very far from where we are, it also fills you with its sheer proportion of entertainment. For instance; in an incident, as Sampat Pal recollects, one uninformed lady was told to give her vote on the symbol ‘Chair’ of course on the ballot paper but she ended up putting stamp over a wooden chair nearby and the mistake got repeated for more than 50 times for the women next in line. Ironic but entertaining!

Overall, there can never be a pretext why one should not watch it. We may not have time to spare from our ‘comforted’ life schedules. We may have our own priorities in life to make it better but trust me; this is bigger than yours and definitely not something out of this world. A little concern and some acknowledgement will do much in restoring the humanity in us. A must-watch! [4/5]                       

Friday, 19 July 2013

SHIP OF THESEUS: rarest of the rare, one-of a- kind cinema [4.5/5]

It is not always for a filmmaker to be evolved as an utter example of great artisan-ship in creating stories that impress you with beautiful amalgamation of moving visuals & sounds but sometimes, even a viewer would require to contribute a good amount of active participation bodily & mentally both…& no one can deny that it is rarest of rare case when it comes to Indian cinema [Considering Bollywood just being a small part of the whole].

Debutante Anand Gandhi’s thought-provoking, soul-stirring, brain-stimulating philosophical drama SHIP OF THESEUS is one of a kind cinema. It not only fuels your senses, mainly the thinking bones but also questions rationally the very existence of your beliefs, philosophy & ideas about life…that too, in the most impressive way ever in the history!

Founded on a paradox popularly known as ‘ship of theseus’ which, in simple words, can be put as ‘if a ship gets all its parts replaced with new ones, will the ship be same as it was before or it will be a changed one?’. It intriguingly weaves three razor-sharp stories that not only are sensitive to the care but intelligently coherent, entirely relevant, very much real and surprisingly entertaining too. So, its not one of those ‘lackluster, all pseudo-intellectual long monologues- no entertainment’ arty farty!

Aliya, after losing her eye-sight from a corneal infection, develops a unique ability to photograph people & things around her by just monitoring the sound they make. Thanks to the medical science, she is now ready for a corneal transplant. Will the senses rebel to work normal or she will find a new route to enjoy life?

Maitreya, a cultured monk involved religiously in a fight against drug making multi-nationals to ban animal testing, is diagnosed with advanced stage of liver cirrhosis that would enforce him to inhale medicines he always was in opposition to. Will he be able to overcome his inner conflicts for the sake of saving his own life?

Navin, a money-driven stockbroker stumbles on the truth about illegal kidney selling rackets in the city just after he’s done with his kidney transplantation. Now in the piercingly painful guilt of being an accused of same sin, will he , for a change, rise up for the right leaving his fascination for worldly possession aside?

All these questions will sure have a definite answer to conclude things but not without overwhelming you with an irresistibly confident & competent cast that delivers a flawless textbook performance. Aida-El-Kashif sweetly slips into the character of a blind girl and even for once, you will not bring her proficiency into matter. She is poised, comfortable, convinced & aptly natural. Neeraj Kabi gives his blood & flesh to the character of monk, in literal sense. Watch his physical transformation during his infirmity days and you’ll know how far an actor can go to make it all believable. Sohum Shah is extremely likeable and comes out as the most alluring performer of the lot. Even the co-artistes mark their presence with a sheer honesty and total dedication to their respective jobs.

Pankaj Kumar’s breathtaking cinematography does not need words to express its brilliance. When was the last time you saw something so absorbing that you never want it to end? From capturing the vivaciously sound of nature and the silence crowded lanes in metros can produce, you’ll never find a single frame that is not imaginative, that is not impressive. Great job done!

To sum up things, Anand Gandhi boldly sails through the changing times in Indian cinema, leaving all his contemporary filmmakers behind and setting up new promises of a better Bollywood, surely not bigger in budgets but greater in concepts and more ardent in execution  He’s one hell of the best things happen to Indian cinema in recent times. And, for the film? Well, do not call yourself a cinema-lover or a film-fanatic, if you haven’t watch it twice, at least. [4.5/5]