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Friday, 16 November 2018

पीहू: डरावनी, पर बेहद स्वार्थी और असंवेदनशील!


डरावनी फिल्में देखते वक़्त, अक्सर हम सब कभी न कभी अनजान डर की आहट सुनकर, डरने से बचने के लिए आँखें मींच बैठते हैं, या चेहरा ही परदे से दूर घुमा लेते हैं. अच्छी डरावनी फिल्मों में ऐसा ज्यादातर वक़्त होना चाहिए, सिनेमा का यही चलता-फिरता पैमाना है. आप नहीं चाहते कि आपके चहेते किरदार के साथ परदे पर कुछ भी बुरा हो, बल्कि कई बार तो आप खुद सिनेमाहाल में बैठे होने की हकीक़त से अलग, अपनी सीट से उचक कर उसे आने वाले खतरे से आगाह तक करने को तैयार हो जाते हैं. ऐसी फिल्मों में और ऐसे हालात में, फिल्म के किरदार के लिए दर्शकों का भावुक होना जायज़ भी है, और सामान्य भी. विनोद कापरी की ‘पीहू इस मुकाम से कहीं एक कदम आगे बढ़ जाती है, या यूँ कहें तो सिनेमा में कुछ उत्कृष्ट, कुछ अलग, कुछ अनोखा करने की अपनी ही सनक में नैतिक जिम्मेदारियों और मानवीय संवेदनाओं की एक अदृश्य सीमा-रेखा लांघ जाती है.

आखिर ऐसा कितनी बार होता है कि परदे पर बड़ी से बड़ी त्रासदी झेलते वक़्त मासूम किरदारों की मानसिक स्थिति से कहीं ज्यादा फ़िक्र, आपको कैमरे के सामने उन किरदारों को निभाने वाले काबिल कलाकारों की होने लगे? ‘द मशीनिस्ट में क्रिस्चियन बेल को तो आप सिनेमा की वेदी पर तपते हुए बेशक सराह सकते हैं, ‘पीहू में महज़ 2 साल की मायरा विश्वकर्मा को उन भयावह परिस्थितियों से गुजरते भला देख भी कैसे सकते हैं? इस धागे भर की समझ ही सिनेमा के प्रति आपकी जिम्मेदारियों का पूरा कच्चा-चिट्ठा है. ‘पीहू शायद हिंदी सिनेमा की सबसे विचलित कर देने वाली फिल्म होगी, खासकर पैरेंट्स के लिए, पर इसके साथ ही एक गैर-ज़िम्मेदार, असंवेदनशील और क्रूर फिल्म भी. कम से कम मेरे और मायरा के लिए तो रहेगी ही.

2 साल की पीहू (मायरा ‘पीहू’ विश्वकर्मा) घर में अकेली नहीं है. मम्मी हैं, सोयी हैं, पर उठ नहीं रहीं. पिछली रात को ही पीहू का बर्थडे था, गुब्बारे अभी भी रह-रह कर अपने आप फट रहे हैं. पापा ज़रूरी मीटिंग के सिलसिले में कोलकाता गये हैं. मम्मी से लड़-झगड़ कर, पर पीहू को नहीं पता. पीहू सोकर उठती है, खुद ब्रश करती है, दरवाजे के पास से अखबार उठाती है, गांधी जी की फोटो देखकर ‘बापू-बापू कह चहक उठती है. फ़ोन बज रहा है, पर पीहू की पहुँच से ऊपर है. पीहू सीढ़ियों से नीचे जा रही है, और अपने से बड़ा मोढ़ा (स्टूल) उठाकर खुद ऊपर ला रही है. आपकी सांस अटक जाती है, जब जब सीढ़ियों की एक एक पायदान पर पीहू ऊपर चढ़ रही है, लेकिन डर का ये माहौल तो अभी और गहराने वाला है. खाली दिखने वाले इस घर में भूत-प्रेत तो कहीं नहीं हैं, फिर भी दानवों की कमी नहीं. इस्तरी ऑन है, और ऑटोकट का बटन खराब. पीहू ने रोटी सेंकने के लिए गैस बर्नर जला तो दिये थे, बंद करना नहीं आ रहा. जगह-जगह घर में तारों का जंजाल फैला है. बालकनी का दरवाजा खुला है. गीज़र भी ‘बीप’ कर रहा है, और इन सबके बीच पीहू फ़िनायल को दूध समझ कर अपनी बोतल में भर रही है.

सिनेमा के नज़रिए से विनोद कापरी की हिम्मत और काबलियत पर कहीं से कोई ऊँगली नहीं उठाई जा सकती. पेशे से पत्रकार रहे कापरी को अखबार की सनसनीखेज सुर्ख़ियों में फिल्म की कहानी ढूँढने का हुनर बखूबी आता है. 90 मिनट से थोड़ी ज्यादा की पूरी फिल्म का दारोमदार 2 साल की बच्ची के किरदार पर डाल देने का माद्दा कम ही फ़िल्मकारों को फायदे का सौदा लगेगी. कापरी पूरी चतुराई से पीहू के इर्द-गिर्द उन सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों या इस्तेमाल की दूसरी घरेलू चीजों को ‘भयानक खतरे’ की तरह पेश करते हैं, जिनके साथ ‘बच्चों की पहुँच से दूर रखें’ जैसी हिदायत इतनी आम है कि अक्सर हम पढ़ने की ज़हमत भी नहीं उठाते. यही नहीं, मायरा विश्वकर्मा के रूप में उन्हें एक ऐसा बेपरवाह कलाकार नसीब हुआ है, जिसे एक पल को भी कमरे में कैमरे की मौजूदगी से न परहेज़ है, न चिढ़, ना ही कोई झिझक. फिल्म के हर फ़्रेम में मायरा स्वक्छंद हैं, आज़ाद तितली की तरह. न उसके ऊपर लिखे-लिखाये संवादों का कोई बोझ ही नज़र आता है, ना ही अभिनेता के तौर पर ‘अब क्या करूं’ की उलझन. मायरा बहती चली जाती है, और आप उसे रोकना भी नहीं चाहते.

...फिर आप कहेंगे, दिक्कत क्या है? सिनेमा में अक्सर बाल-कलाकारों के मासूम ज़ेहन को आंकने में फ़िल्मकार अपनी संवेदनशीलता खो बैठते हैं. परदे के लिए ‘परफॉर्म कराते वक़्त हम स्वार्थी होकर सोचते भी नहीं कि वो खुद किस ज़ज्बाती झंझावात से, और कितनी मुश्किल से लड़ रहे होंगे? बीते दौर के कितने ही बाल-कलाकारों ने अपनी दिमाग़ी लड़ाई बड़े होने तक लम्बी लड़ी है. सारिका उनमें से एक हैं. ‘पीहू सच्ची घटनाओं पर आधारित है. 2 साल की किसी बच्ची के साथ असलियत में इस तरह का जो भी हादसा हुआ होगा, दिल चीर देने वाली घटना है. यकीन मानिए, हम और आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते कि उसकी मानसिक हालत उस वक़्त क्या रही होगी, या उस वक़्त का सदमा अब उसे किस तरह झेलना पड़ रहा होगा? ‘पीहू एक कहानी है, जिसका कहा जाना जरूरी भी हो सकता है, आपको उस खतरे से आगाह करने के लिए, जो आपको खतरा लगता ही नहीं; पर इस प्रयास में, पूरी देखरेख और जागरूकता के बावज़ूद, मायरा को सिनेमा के नाम पर झोंक देने का जोखिम कतई प्रशंसनीय नहीं हो सकता. हालाँकि टेलीविज़न के रियलिटी शोज़ में हम ऐसा होते हुए हर हफ्ते देखते आये हैं, सिनेमा में इस तरह की सीनाजोरी पहली बार है.

आखिर में, ‘पीहू एक डरावनी फिल्म है. माँ-बाप के लिए ख़ास तौर पर, जो अपने मासूमों की देखरेख में अक्सर जाने-अनजाने लापरवाह हो बैठते हैं. साथ ही, एक बेशर्म, भयावह फिल्म भी जो सिनेमा से ऊपर उठकर, नैतिक और संवेदनशील होने की समझदारी दिखाने से आँखें मूँद लेती है. उम्मीद करता हूँ, मायरा जल्द ही ‘पीहू की गिरफ़्त से बाहर निकल आये...सही-सलामत.

पुनश्च: इस बार रेटिंग नहीं. कम आंक कर मायरा की लाज़वाब अदाकारी, और ज्यादा आंक कर फिल्म की असंवेदनशीलता को नकार नहीं सकता.   

Friday, 12 October 2018

तुम्बाड़: हिंदी सिनेमा में हॉरर का एक नया अध्याय! [4/5]


लोककथाओं में सांस लेती भूत-प्रेतों, राक्षसों और शैतानों की कपोल-कल्पित कहानियाँ अक्सर काल से परे होती हैं. ‘बड़े दिनों की बात है या फिर ‘मेरी दादी-नानी ऐसा बताती थीं जैसे अप्रामाणिक प्रसंगों और तत्थ्यों से दूर हटते किस्सों को सुनते-सोचते वक़्त, हम अक्सर अपने डर को डराने के लिए ‘सिर्फ कहानी है जैसे कथनों का सहारा ले लेते हैं. राही अनिल बर्वे ‘तुम्बाड़’ के जरिये एक ऐसी ही मनगढ़ंत कहानी हमारे सामने रखते हैं, पर बड़ी चालाकी से अपने क़िस्से को जिस तरह समय और जगह (काल और स्थान) की बेड़ियों में बाँध कर रखते हैं, आप पूरी तरह यकीन नहीं भी कर रहे हों, तो भी करना चाहने लग जाते हैं. नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली लोककथाएं भी परदे पर इतनी मायावी, सम्मोहक और रहस्यमयी लग सकती हैं, यकीन नहीं होता. ‘तुम्बाड़’ हॉरर फिल्मों के लिए हिंदी सिनेमा इतिहास में एक नए अध्याय की तरह है. कुछ ऐसा, जैसा आपने बचपन की कहानियों में सुना तो होगा, हिंदी सिनेमा के परदे देखा कभी नहीं होगा!

1918 का भारत है. महाराष्ट्र का एक छोटा सा गाँव, तुम्बाड़. सालों से जंजीरों में कैद दादी शापित हैं. लोभ से शापित. सिर्फ सोती हैं, खाती हैं. शायद बाड़े (किले नुमा हवेली) के खजाने का रहस्य जानती हैं. पोता अपनी माँ के साथ उन्हें वहीँ छोड़ आता है, मगर खजाने का लालच पोते विनायक (सोहम शाह) को 15 साल बाद वापस खींच लाता है. दादी के शरीर के ऊपर मोटी-मोटी जड़ों का जाल उग आया है. शरीर गल के मिट्टी हो चला है, पर दिल अभी भी धमनियों जैसी पेड़ों की जड़ों में जकड़ा धड़क रहा है. दादी अभी भी ज़िन्दा हैं, खजाने का राज़ बताने के लिए, जिसकी रक्षा करता है, लोभ का देवता, हस्तर. देवी की कोख से जन्मा पहला देवता, जिसने धरती का सारा सोना चुरा लिया था, और अब अपनी लालच की वजह से बाड़े में कैद है. विनायक लालच में हस्तर से कम नहीं. हस्तर को अब दुधारू गाय की तरह इस्तेमाल करने लगा है, मगर कब तक? 15 साल बाद, भारत आज़ाद हो चुका है, और विनायक पहले से कमज़ोर. अब उसे अपने बेटे को तैयार करना होगा. लोभ और लालच की दलदल में उतरने के लिए.

‘तुम्बाड़’ लालच और हवस जैसी मानवीय प्रकृति के डरावने पहलुओं को कुछ इस अंदाज़ से पेश करती है कि असली दानव आपको हस्तर से कहीं ज्यादा विनायक ही लगने लगता है. हस्तर तक पहुँचने की विनायक की ललक और खजाने को हथियाने की दिलचस्पी में चमकती उसकी आँखों का खौफ, असली राक्षस के चेहरे से भी ज्यादा घिनौना लगता है. कहानी में आप जिस तरह किरदारों की लालच को पीढ़ी-दर-पीढ़ी रगों में उतरते और आखिर तक आते-आते अपने ही बनाए जाल में फंसते देखते हैं, इतना रोमांचक और रहस्य से भरा है कि आप एक पल को भी अपनी आँखें परदे से हटाना नहीं चाहेंगे. ‘तुम्बाड़’ में राही अनिल बर्वे हॉरर के उस मिथक को तोड़ देते हैं, जिसे हॉलीवुड भी आज तक दोहराते आया है. दर्शकों को चौंकाने या डराने के लिए राही, कैमरा या साउंड के साथ किसी तरह का कोई झूठा प्रपंच नहीं रचते, बल्कि इसके विपरीत एक ऐसी तिलिस्मी दुनिया रंगते हैं, जो देखने में जितनी मोहक है, उतनी ही रहस्यमयी भी. पंकज कुमार का कैमरावर्क यहाँ अपने पूरे शबाब पर है. पूरी फिल्म में उनके औसत और आम फ्रेम भी किसी पेटिंग से कम नहीं दिखते. बाड़े में लगे झूले पर बैठा विनायक और बाद में वही टूटा हुआ खाली झूला. फिल्म के आखिरी दृश्यों में लाइट के साथ पंकज कुमार के प्रयोग रोंगटे भी खड़े करते हैं, और आँखों को सम्मोहित भी.

अभिनय में, सोहम शाह की अदाकारी को पहली बार एक बड़ा कैनवस मिला है, और ये उनकी अपनी क़ाबलियत ही है, जिसने फिल्म में उनके किरदार के भीतर के हैवान को महज़ आँखों और चेहरे के भावों से भी कई बार बखूबी ज़ाहिर किया है. उनकी मज़बूत कद-काठी भी विनायक के हठी, लालची और घमंडी किरदार को और उकेर के सामने ले आती है. अन्य कलाकार भी अच्छे हैं, मगर फिल्म के मज़बूत पक्षों में कतई साफ़-सुथरा विज़ुअल ग्राफ़िक्स, बेहतरीन सेट डिज़ाइन और काबिल मेकअप एंड प्रोस्थेटिक टीम सबसे ऊपर हैं.

हॉरर फिल्मों का एक दौर था, जब हमने फिल्मों में कहानी ढूँढनी छोड़ दी थी, और डरने के नाम पर पूरी फिल्म में सिर्फ दो-चार गिनती के हथकंडों का ही मुंह देखते थे. कभी कोई दरवाजे के पीछे खड़ा मिलता था, तो कभी कोई सिर्फ आईने में दिखता था. पिछले महीने ‘स्त्री ने हॉरर में समझदार कहानी के साथ साफ़-सुथरी कॉमेडी का तड़का परोसा था. इस बार ‘तुम्बाड़’ एक ऐसी पारम्परिक जायके वाली कहानी चुनता है, जो हमारी कल्पनाओं से एकदम परे तो नहीं हैं, पर जिसे परदे पर कहते वक़्त राही बर्वे और उनके लेखकों की टीम अपनी कल्पनाओं की उड़ान को आसमान कम पड़ने नहीं देती. हस्तर के पास सोना तो बहुत है, पर वो अनाज का भूखा है. अनाज ही उसकी कमजोरी है, और अनाज ही उसका शाप. शापितों के लिए एक मंत्र है, ‘सो जाओ, नहीं तो हस्तर आ जायेगा, और शापित तुरंत गिर कर खर्राटे मारने लगता/लगती है.

अंत में; ‘तुम्बाड़’ एक बेहतरीन हॉरर फिल्म है, जो हिंदी हॉरर फिल्मों को लेकर आपके खट्टे-मीठे अनुभवों को एक नया मुक़ाम देगी. एक ऐसा मुकाम, जो अपने आप में अनूठा है, बेहद रोमांचक है, खूबसूरत भी और जिसे आप सालों तक सराहेंगे. लालच अच्छी बात नहीं, पर ‘तुम्बाड़’ जाने का लोभ छोड़िये मत. [4/5]               

Friday, 2 March 2018

परी- नॉट अ फेयरीटेल: 'हॉरर' में कहानी की शुरुआत! [3/5]

हिंदी फिल्मों में 'हॉरर' अपने हर दौर में अक्सर किसी एक ख़ास नाम या बैनर के खूंटे से बंध कर रहा है. रामसे ब्रदर्स की भूतिया हवेलियों से रामगोपाल वर्मा के शहरी मकानों और भट्ट कैंप के इन्तेहाई खूबसूरत यूरोपियन मेंशन्स तक; 'हॉरर' के साथ सबने अपने-अपने लैब में जब भी चीर-फाड़ की, फ़ॉर्मूले हमेशा एक से ही रहे. यही वजह है कि '13B', 'एक थी डायन' और हाल-फिलहाल की 'द हाउस नेक्स्ट डोर' जैसी थोड़ी सी भी अलग और नये लिहाज़ की डरावनी फिल्में उम्मीदों का पहाड़ खुद ज्यादा ही बड़ा कर देती हैं. प्रोसित रॉय की 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' ऐसी ही एक हॉरर फिल्म है, जिस पे 'हॉरर' के किसी भी पुराने कारखानों की कोई मोहर या छाप नहीं दिखाई देती. हालाँकि खामियों की फेहरिस्त भी कुछ कम बड़ी नहीं, पर 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' अपने नए अंदाज़ से न सिर्फ आपको डराती है, ज्यादातर वक़्त चौंकाती भी है.

डरावनी फिल्मों में अंधविश्वास, लोक कथाओं और पुरानी मान्याताओं का बोलबाला रहता ही है. ऐसी फिल्मों में, ऐसी फिल्मों से तार्किक या वैज्ञानिक होने की उम्मीद करना अपने आप में एक भुलावे की स्थिति है. प्रोसित भी अपनी पहली फिल्म के तौर पे 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' में दकियानूसी होने से परहेज़ नहीं करते. डराने की मूलभूत जरूरत को पूरा करने के लिए, वक़्त-बेवक्त यहाँ भी बिजलियाँ कड़कती हैं, खिड़कियाँ खड़कती हैं, कंधे पे हाथ रखते ही डरावने चेहरे पलट कर आखों तक चले आते हैं और बैकग्राउंड में एक उदास आवाज़ धीमे-धीमे लोरियां सुनाती रहती है, पर इस बार की कहानी सतही तौर पर दकियानूसी होने के बावजूद, अपने आप में 'और भी' बहुत कुछ कहने की गुंजाईश बाकी रखती है. 

बांग्लादेश के एक ख़ास हिस्से में एक ख़ास नस्ल को मिटाने की मुहीम चल रही है. नहीं, इसका रोहिंग्या मुसलामानों से कोई लेना देना नहीं है. हालाँकि बात जिन्नों की है, और जिन्न भी इसी ख़ास महज़ब में अपनी पैठ ज्यादा रखते हैं. इफरित नाम का एक ख़ास जिन्न है, जो अपनी नस्ल बढ़ाने के लिए औरतों का सहारा लेता है. प्रो. कासिम अली (रजत कपूर) ढूंढ-ढूंढ के ऐसी औरतों का गर्भपात करते-कराते हैं. रुखसाना (अनुष्का शर्मा) ऐसी ही एक नाजायज़ पैदाइश है, जिसे पेरी या परी कहा जाता है. नानी की कहानियों वाली नेकदिल परी नहीं, बल्कि ऐसी जिसकी फ़ितरत ख़ूनी वैम्पायरों जैसी दिल दहलाने वाली हो. बहरहाल, एक एक्सीडेंट में अपनी माँ को खोने के बाद रुखसाना आजकल अरनब (परमब्रत चैटर्जी) के यहाँ पनाह ले रही है. 

ऐसे समाज में जहां औरतों को डायन कह कर मार दिया जाता हो, अनचाहे गर्भ को गिराने के लिए इंसानियत गिरा दी जाती हो; प्रोसित डर के बाज़ार को गर्म रखने के लिए ऐसे ही प्रतीकों का सहारा तो बखूबी लेते हैं, पर इनको लेकर किसी तरह की कोई ठोस या गहरी बात कहने में चूक जाते हैं. फिल्म के आखिर तक आते आते, रुखसाना के किरदार के साथ दर्शकों की सहानुभूति बनाने की जोर-आजमाईश में फिल्म थोड़ी भटकती जरूर नज़र आती है, और उलझती भी; लेकिन अपने बेहतर कैमरा-वर्क, खूबसूरत आर्ट-डायरेक्शन और अनदेखे अंदाज़ की वजह से 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' उन पलों में भी एक खूबसूरत फिल्म की तरह पेश आती है, जिन पलों में उसपे डराने का कोई बोझ या दबाव नहीं होता. पर्दों के पीछे सायों का लिपटना और चिपटना क्या ही बेहतर दृश्य है! 

...और अब जिक्र अनुष्का का. फिल्म की सबसे दमदार कड़ी. हिंदी फिल्मों में 'हॉरर' को आसान कमाई और कम खतरे वाला कदम माना जाता है. ऐसे में 'हॉरर' के साथ इस तरह का नया प्रयोग करने के लिए, अनुष्का (फिल्म की निर्माता के तौर पर) को बधाई मिलनी ही चाहिए. रही बात उनके अभिनय की, तो अनुष्का उन दृश्यों में ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं, जिनमें उन्हें संवादों के सहारे नहीं रहना होता. फिल्म में खून-खराबा भी खूब है, पर असल टीस आपको अनुष्का के किरदार के दर्द से ही उठती है. उनकी आँखों की चमक ही कितनी बार आपको सिहरा जाती है. रजत कपूर शानदार रूप से दिल की धडकनें बढ़ाते रहते हैं. परमब्रत 'कहानी' के अपने किरदार के आस-पास ही रह जाते हैं. उतने ही सजीले, शर्मीले और सधे हुए.

आखिर में, 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' डरावनी फिल्मों में कहानी पिरोने की एक कोशिश के तौर पर सराही जानी चाहिए. एक ऐसी फिल्म, जो जेहनी तौर पर थोड़ी और बेहतर, थोड़ी और काबिल हो सकती थी, पर डर के लिए एक कसा हुआ माहौल गढ़ने में जो कहीं से भी चूकती नहीं. [3/5]  

Friday, 20 October 2017

गोलमाल अगेन: न लॉजिक, न मैजिक! [1.5/5]

हिंदी फिल्मों में कॉमेडी का स्तर कुछ इस तलहटी तक जा पहुंचा है, कि रोहित शेट्टी की नयी फिल्म 'गोलमाल अगेन' देख कर सिनेमाहॉल से निकलते हुए ज्यादातर सिनेमा-प्रेमी एक बात की दुहाई तो ज़रूर देंगे, "कम से कम फिल्म में फूहड़ता तो कम है, हंसाने के लिए द्विअर्थी संवादों का इस्तेमाल भी तकरीबन ना के बराबर ही है". हालाँकि जो मिलता है, उसी से समझौता कर लेने और संतुष्ट हो जाने की, हम दर्शकों की यही प्रवृत्ति ही 'गोलमाल' की गिरती साख (जो पहली फिल्म से शर्तिया तौर पर बनी थी) और हंसी के लगातार बिगड़ते ज़ायके के लिए पूरी तरह जिम्मेदार है. सिर्फ अश्लीलता न होने भर की वजह से 'गोलमाल अगेन' को 'पारिवारिक' और 'मनोरंजक' कह देना महज़ एक बचकानी टिप्पणी नहीं होगी, बल्कि हमारी कमअक्ली का एक बेहतरीन नमूना भी. 

वैसे हंसी के लिए यहाँ भी कम सस्ते हथकंडे नहीं अपनाये जाते. गुस्सैल नायक के ऊपर उठने वाली ऊँगलियाँ करारी भिंडियों की तरह बार-बार तोड़ी जाती हैं. दुश्मन को 'धोने' के लिए उसे वाशिंग मशीन में डाल कर घुमाया जाता है. और तुर्रा ये कि ऐसा करते वक़्त दीवार पर चार्ली चैपलिन की तस्वीर तक दिखाई जाती है, मानो हालातों के मारे चैपलिन अभिनीत किरदारों के मुसीबत में घिरने से पैदा होती कॉमेडी की तुलना इन अधपके दृश्यों से की जा रही हो. थप्पड़ों की तो पूछिए ही मत! कब, किसने, किसको और कितनी बार मारा, दर्शकों के लिए एक रोचक जानकारी (फन फैक्ट) के तौर पर सवाल की तरह पेश किया जा सकता है; ठीक वैसे ही जैसे 'मैंने प्यार किया' फिल्म के 'कबूतर जा जा जा' गाने में 'जा' शब्द कितनी बार आया है? या फिर 'एक दूजे के लिए' फिल्म के एक ख़ास गाने में कितनी फिल्मों के नाम शामिल हैं? 

फ्रेंचाईज़ फिल्मों में पैर जमाये बैठे, रोहित शेट्टी 'गोलमाल' सीरीज की इस नयी फिल्म में हॉरर-कॉमेडी का तड़का लगाने के लिए एक अच्छी-खासी कहानी कहने की कोशिश करते हैं, जो अपने आप में और उनकी फिल्मों के लिए भी बड़ी हैरत और हैरानी की बात है. एक अच्छी सूरत और अच्छे दिल वाला भूत (मैं नहीं बता रहा, पर अंदाज़ा लगाना इतना मुश्किल भी नहीं है) अपनी मौत का बदला लेना चाहता है. खलनायकों की नज़र एक अनाथाश्रम की ज़मीन हडपने पर है. भूत को अपना बदला लेने और अनाथाश्रम बचाने के लिए अनाथ नायकों की टोली (अजय, अरशद, श्रेयस, तुषार, कुनाल) के मदद की जरूरत है, और इसमें उसका साथ दे रही हैं तब्बू.

फिल्म की खामियों में इस बार 'कहानी का न होना' शामिल नहीं है, बल्कि कमज़ोर कहानी की कमज़ोर बुनियाद पर स्क्रिप्ट की भारी-भरकम इमारत खड़ी करने का अति आत्म-विश्वास ही फिल्म को और डांवाडोल कर देता है. मकान में भूत है. अन्दर कुछ लोग कैद हैं, और बारी-बारी से एक के बाद एक तीन लोग, जिन्हें भूतों पर विश्वास नहीं अन्दर जाते हैं. फिल्म में यह दृश्य चलता ही रहता है, जैसे ख़त्म होने का नाम ही नहीं लेता. भूत आखिर में खलनायकों को अपने हाथों खुद ही अंजाम तक पहुंचाता है, तो फिर बेकार-बेरोजगार नायकों की टोली की जरूरत क्यूँ कर थी? जहां तक कॉमेडी की बात है, 'गोलमाल अगेन' उन फिल्मों में से है, जो जोक्स पर ज्यादा भरोसा दिखाती हैं, हास्यास्पद घटनाओं पर कम. फिर भी वो दृश्य, जिनमें अजय और परिणीति के उम्र के अंतर का बार बार मज़ाक उड़ाया जाता है, हर बार सटीक बैठता है. जॉनी लीवर का स्टैंड-अप एक्ट बढ़िया है. फिल्म का सबसे मज़बूत हिस्सा होते हुए भी, नाना पाटेकर की मेहमान और विशेष भूमिका के बारे में काश मैं यहाँ ज्यादा कुछ लिख पाता! फिल्म में उनको इतने मजेदार तरीके से पिरो पाना रोहित का सबसे कामयाब दांव है, हालाँकि शुरूआती दौर में रोहित की ये कामयाबी तब्बू के मामले में आई लगती थी.         

आखिर में; तब्बू का किरदार ही फिल्म की कहानी का सूत्रधार है. रोहित उनके मुंह से '...इसके बाद उनकी जिंदगी बदलने वाली थी' 'भगवान की मर्ज़ी हो, तो लॉजिक नहीं मैजिक चलता है' जैसे जुमले जी भर के उछालते हैं, और इसी बहाने अपनी फिल्म में 'लॉजिक' न ढूँढने का जैसे अल्टीमेटम भी दे ही डालते हैं. इसीलिए भूतियापे की इस बेहद सादी और बासी कहानी में ढूंढना हो तो बस्स हंसी ढूंढिए, मुझे तो 2 घंटे 30 मिनट की फिल्म में गिनती के 5-6 बार ही ऐसे मौके दिखे और मिले; क्या पता? आप शायद मुझसे ज्यादा खुशनसीब निकलें. [1.5/5]         

Friday, 16 September 2016

राज़ रीबूट (A): अंत हुआ, भला हुआ! [1/5]

विक्रम भट्ट की ‘राज़ रीबूट’ रिलीज़ से पहले ही आपको खुश कर जाती है. महेश भट्ट पहले ही बयान दे चुके हैं, ‘राज़’ सीरीज की ये आख़िरी फिल्म होगी. इसका मतलब ये है कि अब विक्रम भट्ट की वो घिसी-पिटी, वाहियात संवादों से भरी स्क्रिप्ट जो पिछले 7 सालों से ‘राज़ (2002)’ की कामयाबी को भुनाने के चक्कर में बार-बार एक अलग और नई फिल्म के तौर पर दर्शकों तक पहुंचाई जा रही थी, अब ये खेल बंद हुआ समझिये. अपने आप में ये एक बहुत राहत पहुंचाने वाली बात है, हालाँकि सीरीज की आख़िरी किश्त ‘राज़ रीबूट’ जाते-जाते भी आप पर कोई रहम नहीं करती.

डराने की हर कोशिश जब हंसाने लग जाए, समझिये विक्रम भट्ट फॉर्म में हैं. फिर भी मैं कहता हूँ, डायलाग-राइटिंग में हाथ आजमाने वाले हर नए-पुराने टैलेंट को इस फिल्म से सीखना चाहिए कि आखिर क्या नहीं लिखना है? हीरोइन को एक ऐसा कैमरा चाहिए, जो लाइट ऑफ होने के बाद भी कमरे में होने वाली सारी एक्टिविटी रिकॉर्ड कर सके. दुकानदार का जवाब सुनिए, “ओह, तो आपको नाईट विज़न कैमरा चाहिए?”. भूत-प्रेतों पर रिसर्च करने वाला एक दिव्यांग (नेत्रहीन) चाय का कप छू कर बता देता है, “इस कप पर दो लोगों के होंठ महसूस हो रहे हैं”. वाह, गुरुदेव! पति-पत्नी के शादीशुदा दोस्तों में से एक पूछती है, “मैंने नोटिस किया है, तुम्हारे बेडरूम के बिस्तर पर एक तरफ सिलवटें नहीं हैं. तुम लोग अलग-अलग सो रहे हो?” मैं पूछता हूँ, ये कौन है जो बेड पर बड़ी सफाई और सावधानी से एक ही तरफ सो लेने का टैलेंट रखता है?

शादी के बाद प्रेमी-जोड़ा [गौरव अरोरा, कृति खरबंदा] मुंबई से रोमानिया ताजा-ताजा शिफ्ट हुआ है. “बर्फ का शहर है, अगले 5 साल तक कहीं और नहीं जाना है, तो चलो ‘बच्चा’ कर लेते हैं”, बीवी ज़िद पे अड़ी है. पति को पैसे कमाने हैं. झगड़ा पहले ही दिन इस हद दर्जे का है, कि दोनों के बिस्तर अलग-अलग हो जाते हैं. साथ सोने भर से भी शायद ‘बच्चा’ हो जाता हो. खैर, कुछ ही वक़्त बाद बीवी को घर में ‘किसी और’ के होने का एहसास होने लगता है. सिंक में आँख दिखाई देने लगती है, लैपटॉप से खून की नदियाँ बह निकलती हैं, वगैरह, वगैरह! पति को जब इन बेकार की बातों में यकीन नहीं होता, बीवी को उसका पुराना आशिक़ [इमरान हाशमी] आकर सहारा देता है. फिर वही होता है, जिसका आपको भी पता था और इंतज़ार भी. दो-चार किसिंग सीन, उतने ही गाने और एक ‘राज़’ जिसके खुलने से पहले ये एक लफ्ज़ इतनी बार बोला-सुनाया जाता है कि आपको फर्क पड़ना ही बंद हो जाता है.

विक्रम भट्ट साब की एक ही परेशानी है कि वो अपनी फिल्म चाहे दुनिया के किसी भी कोने में या ब्रह्माण्ड के किसी भी ग्रह पर लेकर चले जाएँ, अपने साथ भारतीय हॉरर सिनेमा के कुछ अनमोल तत्व ले जाना नहीं भूलते, मसलन, मंगलसूत्र. मंगलसूत्र का खो जाना एक पतिव्रता नारी के लिए कितना कष्टप्रद हो सकता है, आपको फिल्म देखकर ही पता चलेगा. वहीँ, जब शादीशुदा होने के बावजूद गैर-मर्द से सम्बन्ध बनाने की बारी आती है, बड़ी सहूलियत से कपड़े उतारने से पहले मंगलसूत्र उतार देना सब कुछ जायज़ कर देता है. फिल्म में ‘द एक्सोर्सिस्ट’ की भी छाप हर बार की तरह इस बार भी भरपूर है. मजेदार बात ये है कि इस बार वाला भूत ‘एफ़-वर्ड’ इस्तेमाल करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाता, और दिल खोल के गालियाँ बरसाता है.

अभिनय की बात करें, तो गौरव अरोरा  का फिल्म में होना ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कामकाज के तरीकों पर सवालिया निशान खड़े कर देता है. विक्रम भट्ट की फिल्म में आफ़ताब और रजनीश दुग्गल जैसों का होना फिर भी चलता है, गौरव अरोरा के साथ तो ‘गुड लुक्स’ का भी चक्कर दूर-दूर तक नहीं दिखता. असल में इमरान हाश्मी ही हैं जो पूरी तरह से समर्पित दिखाई देते हैं. फिल्म से ज्यादा, भट्ट कैंप और अपनी ‘सीरियल किसर’ वाली इमेज के प्रति. कृति खरबंदा डराने वाले दृश्यों में कामयाब रहती हैं.

फिल्म के शुरूआती एक दृश्य में, एक कौवा रुकी हुई कार के सामने वाले शीशे से टकराकर आत्महत्या कर लेता है. जानवरों को आने वाले संकट और बुरे वक़्त का अंदेशा इंसानों से बहुत पहले ही हो जाता है. काश, उसके इस बलिदान को हम इंसान वक़्त रहते समझ पाते! कम से कम पूरी फिल्म झेलने से बच जाते! चलो, ‘राज़’ का अंत हुआ...और कभी-कभी अंत ही भला होता है. [1/5]      

Friday, 18 July 2014

PIZZA [3D]: Smells fresh, tastes regular and takes too long to deliver! [2/5]

While watching horror, most people laugh out of their nervousness as in mental uncertainty for how to react at the proceedings but at times, it just fails and becomes a funnier effort to generate giggles in rejection. Sadly, Akshay Akkineni’s PIZZA finds its place in the later category, for the most. Projected wrongly as a horror film, it is more of a psychological thriller that mocks at the Indian ghost stories and blind beliefs in favor of the same. Conceptually novel, least practiced before and refreshing in thoughts, PIZZA fails miserably in the execution and takes too much time to deliver its strongest portion i.e. the unexpectedly and relatively smarter climax. Bad service, huh!

An official remake of 2012 Tamil superhit, PIZZA revolves around a pizza-delivery boy [played by debutant Akshay Oberoi] who gets stuck in a haunting villa while delivering one of his orders. Things of strangest nature start taking place behind the closed doors and the delivery boy hardly has any clues about them. Though not sooner, he does manage to escape the playground of the bizarre but not without losing his wife [played by former Miss India Parvathy Omanakuttan] in the pit of darkness. The concluding part includes after-effects of the trauma he has experienced and how the ray of a new hope awaits at the other end of the tunnel.

From the very start, this slice of psychological thriller thrives to sound, look and be a not so regular horror flick chained in typical groaning-grunting, seductive and revengeful ghost stories Bollywood has been restricted till now (If one could sue someone for that, Bhatts would be the bunch of prime accused). It does show a promising image of change with smart writing taking over the topicalities but only at the start and the very end. In between, it only gets repetitive, immovable and trapped in its own mesh. There are times when you have to nothing but laugh at whatever goes on screen just to release your disappointment. It’s only the climax that saves a lot for your financial contribution at the box office. It’s widely unseen, satisfactory and fairly enjoyable. Still!

Akshay looks every part of his character and leaves nothing much to complain about his acting ability. He has it in him. And for a début, it is pretty impressive. Parvathy is good though she doesn’t get opportunity of equal level considering Akshay’s. In supporting cast, Rajesh Sharma and Arunoday Singh are good. Dipannita Sharma, Omkar Das Manikpuri [Nattha of PEEPLI LIVE] and D. Santosh are completely wasted. In other highlights of the film, the opening credits are one of the most impressive title sequences in recent. Done in the flavors of animated comic strips, it shows a dramatic graphical representation of the time-chasing delivery process in life of a delivery-boy.

At the end, PIZZA is a feast that smells fresh, looks extremely inventive but disappoints with its ‘run of the mill’ taste despite consoling your soul with its best of portions left to serve at the very end when you’re almost done with it. Avoid ordering this, instead go out with your family to the nearest and your favorite pizza-joint; that will be more fulfilling fun. [2/5]

Friday, 21 March 2014

RAGINI MMS 2: ‘Sunny’ side up! Horror gets low! [2/5]

So, how many more times exactly you want to see a possessed body [quite inviting in this case] tied in wooden chair-hanged in air, making screechy deafening sounds and one good Samaritan soul helping the needy with his/her own set of sacred chants tries to persuade the evil with, “Isse chhod do! Tum chali jao” (Leave her alone! Go away!!)? That too when we already have impactful exorcism scenes in numerous horror classics! With such plenty of ripped-off references from the past formulaic horror flicks; defined deliciously as ‘horrex’, RAGINI MMS 2 fails big time to chill your bones and ends up tickling your funny bones unintentionally with stupidity scattered allover and boredom that comes from the lack of originality in plot.

Taking clues from its previous part, RAGINI MMS 2 takes you back at the same haunted house where Uday [the Rajkumar Rao of now] has lost his life while implementing his sleazy idea to shoot his personal moments with his girlfriend Ragini [Kainaz]. Ragini is now in a mental asylum and an irritatingly over-excited filmmaker [Parvin Dabas hams like anything] wants to make a film on the same. In his explanation, this would be a well-balanced mishmash of horror and sex that will leave you in your best of confusion to either go to your mother in holy-scare or to your girlfriend to satisfy your urge for dirty pleasures. This is probably the most honest announcement for all the viewers as what to expect from it. Get confused and return unfulfilled with neither being a solid punch in the name of entertainment!

Film also has been written, as to rationalize and defend its main lead Sunny Leone’s past line of work and her way in to Bollywood. She interestingly plays herself in the film. And where everyone else in the cast & crew make comments on her real life (In one scene, the director of the film in the film reacts on her instinct to have some research before playing the character, “Research? Yeh Porno se Rituporno kabse bann gayi?”), she takes on everyone with an enactment of a fake-orgasm scene to make her point of it being all a part of one’s profession. For the rest, either she’s roaming around in her skimpy pieces of silken lingerie or being extremely physical with most (She was even made to kiss Sandhya Mridul for literally no reason to have enough justification). At best, it is a 2-hour long Sunny Leone showreel!

Talking about performances in such mediocre film would be wasting one’s time and effort but if anyone could really manage to pull it till the status of ‘likeability’, it is Sandhya Mridul. Cast as an animated starlet who adds an extra ‘s’ in each word she bound to speak, Mridul responsibly slips into the character and provides a couple of genuine laughs with her contagious flare of immense energy. Sunny looks astoundingly hot and does precisely what most would love to see her doing!

Overall, it is a bad follow-up to an impressively performed & directed first part which was again a rip-off from ‘THE BLAIR WITCH REPORT’ and ‘PARANORMAL ACTIVITY’. This one pays its tribute to ‘EXORCIST’ & ‘THE SHINING’ and many others in the most forgettable manner. Only for people with weak hearts and even weaker sense of entertainment! [2/5]

Saturday, 28 September 2013

PRISONERS: What ‘THE CONJURING’ did to horror, ‘PRISONERS’ does to thriller! [3.5/5]

In order to keep you glued to your seats, regular thrillers often try to bomb every trick mentioned in the rulebook on you, one after other. Exhaustively pacey narration, deliberately designed twists, in your face-jaw dropping action, over the top drama and what not…but it all looks so gimmick-so unreal-so unconvincing when you experience Denis Villeneuve’s PRISONERS.

PRISONERS belongs to the same genre but mainly to a minimal sub-part of it that doesn't believe in all those textbook rules and absorbs your soul in its atmospheric mood and the intensity of the actions. The complex human behavior itself plays so hard as an integral motivator that you don’t feel alienated to what is happening on the screen. It is dark, murky, intricate, violent, layered, riveting and a pure thriller to enjoy-indulge & invade!

When law enforcement agencies [Jake Gyllenhaal as an out-and-out dedicated police detective] find it hard to book a possible suspect in a child-abduction case lacking enough evidential proofs, father of one such girl [Huge Jackman, riding high on emotions rather than showing muscular strength] decides to take charge in his hands, illegally of course. But the density in the maze to track down the offender is so thick that even a far-sighted would need to think twice before guessing who’s behind all.

From the very first frame, film creates a perfect ambiance for a thriller with the suspenseful chilly-frosty-foggy woods of Pennsylvania as the base of events. Camera beautifully captures and extracts the mystical feel from those wooden houses to torch-lit shots used mostly for the dark places to explore and investigate. But as I have made it clear above, the focus is always on how human behavior gets adulterated by the heat of the situation and complexities take over. And to show it better, nothing but the performances emerge as the winner. 

Two towering infernos here are subtle at the most parts but when the break down happens, you should never miss a moment. The way Jake reproaches his supervisor for not being supportive is hilarious. The way Jackman as a helpless father shows his angst and aggravation while torturing the possible suspect in his illegal custody is disturbingly bone-chilling. His hard-to-break instinct to believe that the man in his charge is the culprit they all are looking out for is very contagious.

The name Denis Villeneuve is well-associated with the Oscar-nominated incest-thriller INCENDIES. That was a complete awe-striking movie that takes your breath away with its exceptional ending. This is not that but still a genre-defying effort. 

One or two not-so hard-to crack twists, a slow pace that might work in negative to lose your constant consideration and a little drawn out duration of the film [153 min is quite unseen-unexpected for recent Hollywood movies] could easily be avoided if you have an urge to watch good thriller with performances of first rate. This is definitely season’s best. What ‘THE CONJURING’ did to horror, ‘PRISONERS’ does to thriller! [3.5/5]

Thursday, 1 August 2013

THE CONJURING: picturesque horror that smells real & fresh [3/5]

The most impressive horror films are that don’t strive to trick you by gimmicks and visual stunts but the ones that make you succumbed to the indecisive ambiance of the happenings and the unsure serenity of the site....and, to your good luck, if it comes with the ‘based on true story’ tag, chances are on positive side that you are going to have a lethally overwhelming movie-viewing experience of a good horror film, just as I had with James Wan’s THE CONJURING!

Film wipes off the layers of dust from a super-natural case, successfully buried in the history by Ed and Lorraine Warren- famous professional paranormal researchers of 1970’s. It was the time when supernatural practices like exorcism were authorized by churches. In such circumstances, the Warrens are called off to investigate paranormal activities in the sweet home of a family having 5 young innocent daughters.

The fact that the incidents are as real as it could be and the riveting direction with all the earnestness and integrity to keep it equally simple & subtle, makes it much more than regular horror flicks. So, you might have to wait in length for your first encounter with the unknown as the film in first half intelligently does take its own time to set things up for you. But trust me, once you’re in, you will never find a way out without noticing drastic ups & downs in your pulse-rate and some awe-struck moments where heart comes in mouth. 

Watch out for the scene where one of the girls finds out some paranormal thing looking at her from the dark behind the door, you never see a thing but still you feel as scared as she is. In another, Lorraine the investigator bumps into a sheet of cloth in the air, taking shape of a human body and then disappearing into a woman in the window-glass.

The list is quite long with such acts but despite being a horror film, I don’t consider them the only biggest merits of the film. Others two are the picture-perfect cinematography and the performances. I don’t remember a horror film having such good pleasantly fascinating camera-work, especially in the day-light where narrative focuses on the emotional quotient of the story. Vera Farmiga as an intrepid investigator and an emotionally sensitive mother, switches on & off to both the parts very well. Patrick Wilson as a dedicated ghost-hunter plays it just right.

Overall, THE CONJURING is not a regular but well made-nicely cinematographed exhilarating ride that keeps you caught into your seats with a good number of scary moments. Do not miss it if you love to see yourself scared like anything.  [3/5]