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Friday, 12 October 2018

तुम्बाड़: हिंदी सिनेमा में हॉरर का एक नया अध्याय! [4/5]


लोककथाओं में सांस लेती भूत-प्रेतों, राक्षसों और शैतानों की कपोल-कल्पित कहानियाँ अक्सर काल से परे होती हैं. ‘बड़े दिनों की बात है या फिर ‘मेरी दादी-नानी ऐसा बताती थीं जैसे अप्रामाणिक प्रसंगों और तत्थ्यों से दूर हटते किस्सों को सुनते-सोचते वक़्त, हम अक्सर अपने डर को डराने के लिए ‘सिर्फ कहानी है जैसे कथनों का सहारा ले लेते हैं. राही अनिल बर्वे ‘तुम्बाड़’ के जरिये एक ऐसी ही मनगढ़ंत कहानी हमारे सामने रखते हैं, पर बड़ी चालाकी से अपने क़िस्से को जिस तरह समय और जगह (काल और स्थान) की बेड़ियों में बाँध कर रखते हैं, आप पूरी तरह यकीन नहीं भी कर रहे हों, तो भी करना चाहने लग जाते हैं. नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली लोककथाएं भी परदे पर इतनी मायावी, सम्मोहक और रहस्यमयी लग सकती हैं, यकीन नहीं होता. ‘तुम्बाड़’ हॉरर फिल्मों के लिए हिंदी सिनेमा इतिहास में एक नए अध्याय की तरह है. कुछ ऐसा, जैसा आपने बचपन की कहानियों में सुना तो होगा, हिंदी सिनेमा के परदे देखा कभी नहीं होगा!

1918 का भारत है. महाराष्ट्र का एक छोटा सा गाँव, तुम्बाड़. सालों से जंजीरों में कैद दादी शापित हैं. लोभ से शापित. सिर्फ सोती हैं, खाती हैं. शायद बाड़े (किले नुमा हवेली) के खजाने का रहस्य जानती हैं. पोता अपनी माँ के साथ उन्हें वहीँ छोड़ आता है, मगर खजाने का लालच पोते विनायक (सोहम शाह) को 15 साल बाद वापस खींच लाता है. दादी के शरीर के ऊपर मोटी-मोटी जड़ों का जाल उग आया है. शरीर गल के मिट्टी हो चला है, पर दिल अभी भी धमनियों जैसी पेड़ों की जड़ों में जकड़ा धड़क रहा है. दादी अभी भी ज़िन्दा हैं, खजाने का राज़ बताने के लिए, जिसकी रक्षा करता है, लोभ का देवता, हस्तर. देवी की कोख से जन्मा पहला देवता, जिसने धरती का सारा सोना चुरा लिया था, और अब अपनी लालच की वजह से बाड़े में कैद है. विनायक लालच में हस्तर से कम नहीं. हस्तर को अब दुधारू गाय की तरह इस्तेमाल करने लगा है, मगर कब तक? 15 साल बाद, भारत आज़ाद हो चुका है, और विनायक पहले से कमज़ोर. अब उसे अपने बेटे को तैयार करना होगा. लोभ और लालच की दलदल में उतरने के लिए.

‘तुम्बाड़’ लालच और हवस जैसी मानवीय प्रकृति के डरावने पहलुओं को कुछ इस अंदाज़ से पेश करती है कि असली दानव आपको हस्तर से कहीं ज्यादा विनायक ही लगने लगता है. हस्तर तक पहुँचने की विनायक की ललक और खजाने को हथियाने की दिलचस्पी में चमकती उसकी आँखों का खौफ, असली राक्षस के चेहरे से भी ज्यादा घिनौना लगता है. कहानी में आप जिस तरह किरदारों की लालच को पीढ़ी-दर-पीढ़ी रगों में उतरते और आखिर तक आते-आते अपने ही बनाए जाल में फंसते देखते हैं, इतना रोमांचक और रहस्य से भरा है कि आप एक पल को भी अपनी आँखें परदे से हटाना नहीं चाहेंगे. ‘तुम्बाड़’ में राही अनिल बर्वे हॉरर के उस मिथक को तोड़ देते हैं, जिसे हॉलीवुड भी आज तक दोहराते आया है. दर्शकों को चौंकाने या डराने के लिए राही, कैमरा या साउंड के साथ किसी तरह का कोई झूठा प्रपंच नहीं रचते, बल्कि इसके विपरीत एक ऐसी तिलिस्मी दुनिया रंगते हैं, जो देखने में जितनी मोहक है, उतनी ही रहस्यमयी भी. पंकज कुमार का कैमरावर्क यहाँ अपने पूरे शबाब पर है. पूरी फिल्म में उनके औसत और आम फ्रेम भी किसी पेटिंग से कम नहीं दिखते. बाड़े में लगे झूले पर बैठा विनायक और बाद में वही टूटा हुआ खाली झूला. फिल्म के आखिरी दृश्यों में लाइट के साथ पंकज कुमार के प्रयोग रोंगटे भी खड़े करते हैं, और आँखों को सम्मोहित भी.

अभिनय में, सोहम शाह की अदाकारी को पहली बार एक बड़ा कैनवस मिला है, और ये उनकी अपनी क़ाबलियत ही है, जिसने फिल्म में उनके किरदार के भीतर के हैवान को महज़ आँखों और चेहरे के भावों से भी कई बार बखूबी ज़ाहिर किया है. उनकी मज़बूत कद-काठी भी विनायक के हठी, लालची और घमंडी किरदार को और उकेर के सामने ले आती है. अन्य कलाकार भी अच्छे हैं, मगर फिल्म के मज़बूत पक्षों में कतई साफ़-सुथरा विज़ुअल ग्राफ़िक्स, बेहतरीन सेट डिज़ाइन और काबिल मेकअप एंड प्रोस्थेटिक टीम सबसे ऊपर हैं.

हॉरर फिल्मों का एक दौर था, जब हमने फिल्मों में कहानी ढूँढनी छोड़ दी थी, और डरने के नाम पर पूरी फिल्म में सिर्फ दो-चार गिनती के हथकंडों का ही मुंह देखते थे. कभी कोई दरवाजे के पीछे खड़ा मिलता था, तो कभी कोई सिर्फ आईने में दिखता था. पिछले महीने ‘स्त्री ने हॉरर में समझदार कहानी के साथ साफ़-सुथरी कॉमेडी का तड़का परोसा था. इस बार ‘तुम्बाड़’ एक ऐसी पारम्परिक जायके वाली कहानी चुनता है, जो हमारी कल्पनाओं से एकदम परे तो नहीं हैं, पर जिसे परदे पर कहते वक़्त राही बर्वे और उनके लेखकों की टीम अपनी कल्पनाओं की उड़ान को आसमान कम पड़ने नहीं देती. हस्तर के पास सोना तो बहुत है, पर वो अनाज का भूखा है. अनाज ही उसकी कमजोरी है, और अनाज ही उसका शाप. शापितों के लिए एक मंत्र है, ‘सो जाओ, नहीं तो हस्तर आ जायेगा, और शापित तुरंत गिर कर खर्राटे मारने लगता/लगती है.

अंत में; ‘तुम्बाड़’ एक बेहतरीन हॉरर फिल्म है, जो हिंदी हॉरर फिल्मों को लेकर आपके खट्टे-मीठे अनुभवों को एक नया मुक़ाम देगी. एक ऐसा मुकाम, जो अपने आप में अनूठा है, बेहद रोमांचक है, खूबसूरत भी और जिसे आप सालों तक सराहेंगे. लालच अच्छी बात नहीं, पर ‘तुम्बाड़’ जाने का लोभ छोड़िये मत. [4/5]               

Friday, 25 August 2017

स्निफ़: बच्चों की बचकानी फिल्म! [2/5]

बच्चों की फिल्म बचकानी हो, वो भी अमोल गुप्ते जैसे संजीदा और काबिल फिल्ममेकर की कलम से निकली और उन्हीं के निर्देशन में बनी, तो हर छोटी गलती भी जैसे गुनाह लगने लगती है. बच्चों को लेकर उनका नजरिया, उनकी ईमानदारी, उनकी समझदारी पहले 'तारे ज़मीन पर', फिर 'स्टैनली का डब्बा' और 'हवा हवाई' में खूब निखर कर सामने आई है. भारत में वैसे ही बच्चों की फिल्में कम ही बनती हैं, और जो बनती भी हैं, दिमागी तौर पर बच्चों को हमेशा कम आंकने की भूल करती आई हैं. बच्चों की पसंद-नापसंद से ज्यादा, उनसे जुड़ी सामजिक समस्याओं को उनके ही नजरिये से पेश करने में, गुप्ते छोटी फ़िल्मों को भी बेहद बड़ी और जरूरी बना देते हैं. ऐसी ही एक छोटी फिल्म 'स्निफ़' गुप्ते की लाख कोशिशों के बाद भी, मनोरंजन और अहमियत दोनों में छोटी ही रह जाती है. 

सन्नी (खुशमीत गिल) के साथ एक दिक्कत है. वो सुन सकता है, देख सकता है, पर सूंघ नहीं सकता. मसालेदार अचार के बिज़नेस में पीढ़ियाँ खपा देने वाले परिवार का चिराग सूंघ ही नहीं पाए, तो दिक्कत और बड़ी लगने लगती. वो तो भला हो स्कूल के केमिकल लैब में हुई दुर्घटना का, जिसके बाद सन्नी न सिर्फ सब कुछ सूंघ सकता है, बल्कि दो-दो किलोमीटर तक की चीजें सूंघ सकता है. जल्द ही, उसकी ये 'सुपरपावर' उसे शहर में हो रही गाड़ियों की चोरी के मामले की तह तक पहुँचने को प्रेरित करती है और अब सन्नी का जासूसी दिमाग उसकी नाक की तरह की तेज़ी से काम करने लगा है.

भारत में ऐसी फिल्मों की भरमार है, जिसमें बच्चे अपनी उम्र से आगे और ऊपर बढ़ कर भरपूर बहादुरी का परिचय देते हुए किसी न किसी गिरोह का भंडाफोड़ करके 'हीरो' बन जाते हैं. अमोल गुप्ते ने अपनी पिछली तीनों फिल्मों में इस वाहियात ढर्रे को तोड़ते हुए नए तरह की समझदारी दिखाई और हर बार सफल भी रहे. 'स्निफ़' पता नहीं क्यूँ, किस दिमागी दिवालियेपन के चलते वापस इसी ढर्रे की तरफ मुड़ जाती है. सनी ढेर सारे मोबाइल फ़ोन के साथ सीसीटीवी सेटअप तैयार कर लेता है. चोरों को पकड़ने अकेला निकल पड़ता है. परदे पर चोरों का गिरोह शराब पीते हुए दिखाया जाता है, ताकि सन्नी को उनके चंगुल से निकलने का मौका मिल सके. सन्नी की सोसाइटी में हर भाषा, हर प्रान्त से कोई न कोई रहता है. बच्चों की फिल्म में एक बंगाली इंस्पेक्टर अपने पति पर ताबड़तोड़ थप्पड़ बरसाती है, क्यूंकि उसने चोरी से मिठाई खा ली थी और अब उसका शुगर लेवल बढ़ गया है. इस एक दृश्य को बड़े तक पचा नहीं सकते, बच्चे तो क्या ही मज़े लेंगे? हालाँकि फिल्म के देखे जाने लायक दृश्यों में भी गुप्ते की वही समझदारी दिखाई देती है, पर सिर्फ झलकियों में. स्कूल के कुछ दृश्य हों, या फिर सन्नी के किरदार में खुशमीत का अभिनय; बाल कलाकारों की पूरी मण्डली बड़ों से कहीं ज्यादा धीर-गंभीर दिखाई देती है और अपने स्तर पर पूरा मनोरंजन करती है. 

आखिर में; अमोल गुप्ते की 'स्निफ़' एक बेहद औसत दर्जे की फिल्म है, जो न तो किसी भी तरह बच्चों का भरपूर मनोरंजन करने में ही कामयाब साबित होती है, ना ही उनसे जुड़े किसी भावनात्मक मुद्दे को पेश कर बड़ों का ध्यान खींचने में. फिल्म में सन्नी जब तक सूंघ नहीं पाता, उसमें संभावनाओं और भावनाओं का एक पूरा समन्दर छिपा दिखाई देता है; सूंघ लेने की क्षमता आते ही, एक बार फिर अमोल गुप्ते उसे आम बच्चों में ही ला खड़ा कर देते हैं. मैं जानता हूँ जज्बाती तौर पर ऐसा कहना अमानवीय होगा, पर इससे अच्छा तो सन्नी ठीक ही न होता. फिल्म बेहतर हो जाती! [2/5]   

Friday, 19 August 2016

हैप्पी भाग जायेगी: पाकिस्तानी ‘तनु वेड्स मनु’! [2/5]

हैप्पी करोड़ो में एक लड़की है. फिल्म में अली फज़ल का किरदार हैप्पी के किरदार को बयान करते हुए वैसी ही शिद्दत दिखाता है, जिस शिद्दत से शायद फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अज़ीज़ ने फिल्म के निर्माताओं के सामने हैप्पी का किरदार बढ़ा-चढ़ा के पेश किया होगा. पर सच तो ये है कि हैप्पी जैसी नायिकायें बॉलीवुड की पसंदीदा हमेशा से रही हैं. स्वभाव से दबंग, जबान से मुंहफट, दिल से साफ़, कद-काठी से बेहद खूबसूरत! अब सारा दारोमदार सिर्फ इस एक बात पर आकर टिक जाता है कि उसे गढ़ने में कितनी अच्छी और कितनी ‘वाटरटाइट’ स्क्रिप्ट का इस्तेमाल होता है. सब कुछ सही रहा तो वो ‘तनु वेड्स मनु’ की तनु भी बन सकती है, वरना थोड़ी सी भी झोल-झाल उसे वैसी ही ‘हैप्पी’ बना के छोड़ेगा, जैसी हम हर दूसरी-तीसरी रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में देखते सुनते आये हैं. हालाँकि फिल्म के साथ आनंद एल राय [निर्देशक, तनु वेड्स मनु और राँझणा] और हिमांशु शर्मा [संवाद लेखक, तनु वेड्स मनु और राँझणा] जैसे बेहतरीन नाम जुड़े है, पर ‘हैप्पी भाग जायेगी’ हैप्पी को ‘तनु’ बनने का मौका नहीं देती.

हैप्पी [डायना पेंटी] एक तेज-तर्रार लड़की है. उसके पैर कहीं रुकते नहीं. बाप की पसंद के लड़के बग्गा [जिम्मी शेरगिल] से शादी न करनी पड़े, इसलिए शादी के दिन ही घर से भाग जाती है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि वो अपने बॉयफ्रेंड गुड्डू [अली फज़ल] के पास न पहुँच कर अमृतसर से लाहौर पहुँच जाती है. लाहौर में उसकी मदद करने को तैयार बैठे हैं पाकिस्तानी सियासत के मुस्तकबिल बिलाल अहमद [अभय देओल]. बिलाल अपने वालिद की सियासी ख्वाहिशों को चुपचाप ख़ामोशी से पूरा करने में लगा है, जबकि उसकी अपनी मर्ज़ी कभी क्रिकेट के मैदान में झंडे गाड़ने की थी. कहने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि हैप्पी से मिलकर उसे अपनी खोई शख्सियत हैप्पी में दिखने लगती है. बहरहाल, घटनायें और फिल्म के लेखक-निर्देशक खींच-खांच के सारे ख़ास किरदारों को प्रियदर्शन की फिल्मों की तरह, उनके तमाम सह-कलाकारों के साथ हिन्दुस्तान से पाकिस्तान में ला पटकते हैं. शायद इसलिए भी कि स्क्रीन पर पाकिस्तान का ‘सब चलता है’ हिंदुस्तान के ‘सब चलता है’ से ज्यादा मजाकिया लगता हो.

फिल्म के मजेदार किरदार हों, उनके रसीले संवाद या फिर काफी हद तक कहानी में जिस तरह के हालातों का बनना और बुना जाना, ‘हैप्पी भाग जायेगी’ वास्तव में ‘तनु वेड्स मनु’ बनने की राह पर  ही भागती नज़र आती है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उन किरदारों में आपको बनावटीपन और घटनाओं में बेवजह की भागा-दौड़ी ज्यादा शामिल दिखाई देती है. हैप्पी लाहौर से वापस अमृतसर क्यूँ नहीं आना चाहती? हैप्पी अगर इतनी ही निडर और निर्भीक है कि पूरा लाहौर उससे परेशान हो जाए, वहाँ की पुलिस, वहाँ के गुंडे सब उसके सामने घुटने टेक दें तो उसे अपने बाप के सामने शादी की मुखालफत करने में क्या दिक्कत हो जाती है? कहानी की घिसी-पिटी सूरत यहाँ किरदारों की भली सी-भोली सी सीरत पर बुरी तरह हावी हो जाती है. नतीज़ा? फिल्म कुल मिलाकर एक औसत दर्जे की कोशिश भर दिखाई देती है.

जिम्मी शेरगिल यहाँ भी नाकाम प्रेमी की भूमिका को जीते नज़र आते हैं, जिसे फिल्म के अंत में ‘पति’ बनने का सुख नहीं मिलता, पर दर्शकों की ‘सिम्पैथी’ मिलने का हौसला ज़रूर दिया जाता है. फिल्म के असरदार पलों में पाकिस्तान पर गढ़े गए सीधे-सादे, साफ़-सुथरे जोक्स आपके चेहरे पे हर बार मुस्कान लाने में कामयाब रहते हैं. पीयूष मिश्रा साब का औघड़पन, उनकी अहमकाना हरकतें और खालिस उर्दू के इस्तेमाल से बनने वाला हास्य आपको थोड़ी तो राहत देते हैं. अली फज़ल और अभय देओल अपनी करिश्माई मौजूदगी भर से परदे को एक हद तक जिंदा रखते हैं. डायना काबिले-तारीफ हैं. जिस तरह की झिझक और झंझट उनके अभिनय में एक वक़्त दिखाई देता था, उससे वो काफी दूर निकल आई हैं.

आखिर में; मुदस्सर अज़ीज़ की ‘हैप्पी भाग जाएगी’ में एक किरदार कहता है, “काश! ऐसी लव-स्टोरीज़ पाकिस्तान में होतीं.” सच मानिए, कुछ मामलों में ये ‘तनु वेड्स मनु’ बनाने की चाह में भटकी हुई कोई अच्छे बजट की, पर सस्ती सी पाकिस्तानी फिल्म ही नज़र आती है. यहाँ सब कुछ मिलेगा, पर सब आधा-अधूरा, अधपका और जल्दबाजी से भरा हुआ! [2/5]         

Friday, 22 April 2016

निल बट्टे सन्नाटा: जिंदगी-कहानी-सिनेमा! [4/5]

सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है.

घरों, जूते की फैक्ट्री और मसाले की दुकानों पर काम करने वाली चंदा (स्वरा भास्कर) एक रात जब थक कर सोने से पहले अपनी 15 साल की बेटी अप्पू (रिया शुक्ला) से पूछती है कि वो बड़ी होकर क्या बनेगी? अप्पू खरी-खरी कह देती है, “मैं बाई बनूंगी. बाई की बेटी बाई ही तो बनेगी.” चंदा बहस में जीत नहीं सकती. 10वीं के बाद अप्पू को पढ़ाने के लिए पैसे कहाँ हैं चंदा के पास? वैसे भी, अप्पू मैथ्स में ‘निल बट्टा सन्नाटा’ है, मतलब ज़ीरो. पैसे तो बाद की बात हैं, पर इस मैथ्स का क्या करें? चंदा तो खुद मैट्रिक फ़ेल है. डॉ. दीवान (रत्ना पाठक शाह) के पास एक उपाय है. चंदा भी अप्पू का स्कूल ज्वाइन कर ले, खुद भी पढ़े और अप्पू की भी मदद करे. बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए माँ-बाप क्या कुछ नहीं करते, पर हम बच्चे कितना समझ पाते हैं? अप्पू के पास तो कोई सपना ही नहीं है, और चंदा के पास अप्पू से बड़ा कोई सपना नहीं!

अश्विनी अय्यर तिवारी अपनी पहली ही फिल्म में साफ़ कर देती हैं कि सिनेमा कहानी कहने का एक सशक्त माध्यम है, कहानी जिसका कहा जाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसका सही ढंग से कहा जाना. आगरा की तंगहाल बस्तियां हों या सरकारी स्कूलों का वही जाना-पहचाना बेढंगापन; तिवारी बड़ी खूबी से फिल्म को सच्चाई के बिलकुल करीब तक रखने में कामयाब रही हैं. उनके किरदार भी अपनी जड़ों से एक बार भी उखड़ते दिखाई नहीं देते. चंदा गुस्से में होती है तो अपनी बेटी को भी गाली देने से झिझकती नहीं.

अभिनय की दृष्टि से ‘निल बट्टे सन्नाटा’ एक जोरदार और जबरदस्त फिल्म है. स्वरा भास्कर एक पल को भी चन्दा से अलग नहीं दिखतीं. बेटी की हताशा में बेबस, गरीबी से जूझती, सपनों को जिंदा रखने में दौड़ती-भागती एक अकेली माँ का सारा खालीपन उनकी आँखों में हमेशा तैरता रहता है, ऐसा शायद ही कभी होता है कि वो पूरी तरह टूट जाएँ स्क्रीन पर, फिर भी आपकी आँखों को भिगोने में वो हर बार कामयाब होती हैं. अपनी पहली फिल्म में ही रिया एक मंजी हुई कलाकार की तरह आपको चौंका देती हैं, और इन दोनों के बीच फिल्म के सबसे मजेदार दृश्यों में नज़र आते हैं पंकज त्रिपाठी! अक्खड़, अकड़ू और निहायत ही अनुशासित मैथ्स टीचर की भूमिका में त्रिपाठी आपको अपने किसी न किसी पुराने टीचर की याद दिला ही देंगे.

अंत में; ‘निल बट्टे सन्नाटा’ सिनेमा के उस क्लासिक नियम की जोर-शोर से पैरवी करती है, जहां फिल्म के बड़ी होने से कहीं ज्यादा ‘कहानी’ का बड़ा होना मायने रखता है. फ़िल्म के एक दृश्य में चंदा कहती भी है, “कृष 3 नहीं है, जिंदगी है जिंदगी”. और जिंदगी से ज्यादा दिलचस्प, जिंदगी से ज्यादा जज्बाती, जिंदगी से ज्यादा सच्ची कहानी और क्या होगी! [4/5] 

Friday, 18 December 2015

BAJIRAO MASTANI: In the League of Potential Classics! [4/5]

It is not 1960. Films don’t get tagged as ‘classics’ these days anymore. They are either judged by the sound of money they made at the box-office or the number of award-logos they managed to put in the opening graphic-slides before the actual film starts. Watching a 197-min long MUGHAL-E-AZAM, today in theatres, can in fact destroy the very idea of a ‘classic’ for a regular guy who’s not much into cinema, and has come out only to please his grandparents. In times of the shorter, darker and more realistic indie films, Sanjay Leela Bhansali shows the guts to bless Indian screens with the legacy that believed in telling stories from the historical past in the most decorous manner. Classics are made like that only. And to the expectations, Bhansali doesn’t falter in any of the art-forms used while making this motion-picture. Magnum-opus BAJIRAO MASTANI is mesmeric in every frame, mind-blowing in every performance and miraculously magical in depicting Bhansali’s perfectly designed yet tortured world of love chained in pain, angst and grief.

The great Maratha Warrior Peshwa Bajirao [Ranveer Singh] is rising as an invincible threat to the Mughal Empire and its supporting forces. He’s a rare and unbeatable combination of power, passion and mental strength. In his mission to build ‘Akhand Bharat’, he lends his help to his neighboring state Bundelkhand and the victory brings him close to the daughter of its king Chhatrasal. Fearless Mastani [Deepika Padukone] being half-Rajput, half-Muslim girl, is now destined to face the extreme dislike, heavy rejections and sharp protests from everyone around Peshwa. If Bajirao’s first wife Kashibai [Priyanka Chopra] uses her silence against the injustice to her love and loyalty, the religious bodies declare it in full vocal. Bajirao may have the honor to never taste a defeat in any of the battles he appears in but this conflict between love, loyalty, religion and political establishments will definitely put him on the spot. Despite being a 3-century old political love-story, BAJIRAO MASTANI speaks on various grounds that are still much in fashion. In one of the few ‘in your face’ scenes, Mastani encounters one religion-protector with, “religions might have chosen one particular color dedicated to represent them. But the colors never go for any religion.” The social elimination of second marriage and love outside marriage gets thrashed heartlessly despite the Peshwa himself being in it.

With BAJIRAO MASTANI, Sanjay Leela Bhansali pays his homage to MUGHAL-E-AZAM and it shows upfront. The plot-development itself vouches for the same. You don’t need a hint to find a reference in Mohe Panghat Pe Nandlal for Shreya Ghoshal’s Mohe Rang Do Lal. Bhansali also doesn’t hesitate to repeat himself in Pinga where both the leading actresses join the stage to recreate Madhuri-Aishwarya’s sensational faceoff in DEVDAS. Albela Sajan from HUM DIL DE CHUKE SANAM also gets a harmonious mention. Film’s extremely melodic numbers establish Bhansali’s another talent to look for [He’s the sole composer for the film]. The canvas of the film is richly done in visual effects, especially the battle-sequences and it succeeds in creating the era, setting and sight the story finds its root in. The excellence in camerawork, art-design and costumes make every frame a reason to celebrate the spirit of cinema.

On the performances, BAJIRAO MASTANI wholly rests and rises on Ranveer Singh’s prolific shoulders. Who can think of a regular looking guy in BAND BAAJA BARAAT taking on one of the most powerful characters in Indian history? And with such finesse? He is graceful, glorious and gifted. Deepika is another talent who’s constantly making fresh impressions with one electrifying performance after other. Her Mastani is tremendously bold, brave and bright. As devoted wife with pastoral looks and approach, Priyanka Chopra is in her finest form. Though her character-graph doesn’t allow her to go overboard beyond a point, she excels in her restricted skin. Tanvi Azmi as the mother and Milind Soman in a supporting role manage to hold your attention and admiration.

At the end, BAJIRAO MASTANI is not a classic. Not now. May be after a decade but not yet. It is 2 hr 38 min long. Most of us will find it dragged. Most of us will consider it outdated. But it successfully holds the fort of being in the league of films that have plenty potential to be referred as a ‘classic’. This is how one should dream his films and film his dreams. The master is at his best! [4/5]