लोककथाओं में सांस लेती भूत-प्रेतों,
राक्षसों और शैतानों की कपोल-कल्पित कहानियाँ अक्सर काल से परे होती हैं. ‘बड़े
दिनों की बात है’ या फिर ‘मेरी दादी-नानी ऐसा बताती थीं’ जैसे अप्रामाणिक प्रसंगों और तत्थ्यों से दूर हटते किस्सों को सुनते-सोचते
वक़्त, हम अक्सर अपने डर को डराने के लिए ‘सिर्फ कहानी है’ जैसे
कथनों का सहारा ले लेते हैं. राही अनिल बर्वे ‘तुम्बाड़’ के जरिये एक ऐसी ही मनगढ़ंत
कहानी हमारे सामने रखते हैं, पर बड़ी चालाकी से अपने क़िस्से
को जिस तरह समय और जगह (काल और स्थान) की बेड़ियों में बाँध कर रखते हैं, आप पूरी तरह यकीन नहीं भी कर रहे हों, तो भी करना
चाहने लग जाते हैं. नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली लोककथाएं भी परदे पर इतनी मायावी, सम्मोहक और रहस्यमयी लग सकती हैं, यकीन नहीं होता. ‘तुम्बाड़’
हॉरर फिल्मों के लिए हिंदी सिनेमा इतिहास में एक नए अध्याय की तरह है. कुछ ऐसा, जैसा
आपने बचपन की कहानियों में सुना तो होगा, हिंदी सिनेमा के परदे देखा कभी नहीं
होगा!
1918 का भारत है. महाराष्ट्र का एक
छोटा सा गाँव, तुम्बाड़. सालों से जंजीरों में कैद दादी शापित हैं. लोभ से शापित. सिर्फ
सोती हैं, खाती हैं. शायद बाड़े (किले नुमा हवेली) के खजाने
का रहस्य जानती हैं. पोता अपनी माँ के साथ उन्हें वहीँ छोड़ आता है, मगर खजाने का
लालच पोते विनायक (सोहम शाह) को 15 साल बाद वापस खींच लाता है. दादी के शरीर के
ऊपर मोटी-मोटी जड़ों का जाल उग आया है. शरीर गल के मिट्टी हो चला है, पर दिल अभी भी धमनियों जैसी पेड़ों की जड़ों में जकड़ा धड़क रहा है. दादी अभी
भी ज़िन्दा हैं, खजाने का राज़ बताने के लिए, जिसकी रक्षा करता
है, लोभ का देवता, हस्तर. देवी की कोख से जन्मा पहला देवता, जिसने
धरती का सारा सोना चुरा लिया था, और अब अपनी लालच की वजह से
बाड़े में कैद है. विनायक लालच में हस्तर से कम नहीं. हस्तर को अब दुधारू गाय की
तरह इस्तेमाल करने लगा है, मगर कब तक? 15 साल बाद, भारत आज़ाद हो चुका है, और विनायक पहले से कमज़ोर. अब उसे अपने बेटे को
तैयार करना होगा. लोभ और लालच की दलदल में उतरने के लिए.
‘तुम्बाड़’ लालच और हवस जैसी मानवीय प्रकृति
के डरावने पहलुओं को कुछ इस अंदाज़ से पेश करती है कि असली दानव आपको हस्तर से कहीं
ज्यादा विनायक ही लगने लगता है. हस्तर तक पहुँचने की विनायक की ललक और खजाने को
हथियाने की दिलचस्पी में चमकती उसकी आँखों का खौफ, असली राक्षस के चेहरे से भी
ज्यादा घिनौना लगता है. कहानी में आप जिस तरह किरदारों की लालच को पीढ़ी-दर-पीढ़ी रगों
में उतरते और आखिर तक आते-आते अपने ही बनाए जाल में फंसते देखते हैं, इतना रोमांचक और रहस्य से भरा है कि आप एक पल को भी अपनी आँखें परदे से
हटाना नहीं चाहेंगे. ‘तुम्बाड़’ में राही अनिल बर्वे हॉरर के उस मिथक को तोड़ देते
हैं, जिसे हॉलीवुड भी आज तक दोहराते आया है. दर्शकों को चौंकाने या डराने के लिए राही,
कैमरा या साउंड के साथ किसी तरह का कोई झूठा प्रपंच नहीं रचते, बल्कि इसके विपरीत
एक ऐसी तिलिस्मी दुनिया रंगते हैं, जो देखने में जितनी मोहक है, उतनी ही रहस्यमयी
भी. पंकज कुमार का कैमरावर्क यहाँ अपने पूरे शबाब पर है. पूरी फिल्म में उनके औसत और
आम फ्रेम भी किसी पेटिंग से कम नहीं दिखते. बाड़े में लगे झूले पर बैठा विनायक और
बाद में वही टूटा हुआ खाली झूला. फिल्म के आखिरी दृश्यों में लाइट के साथ पंकज
कुमार के प्रयोग रोंगटे भी खड़े करते हैं, और आँखों को
सम्मोहित भी.
अभिनय में, सोहम
शाह की अदाकारी को पहली बार एक बड़ा कैनवस मिला है, और ये उनकी अपनी क़ाबलियत ही है, जिसने फिल्म में उनके किरदार के भीतर के हैवान को महज़ आँखों और चेहरे के
भावों से भी कई बार बखूबी ज़ाहिर किया है. उनकी मज़बूत कद-काठी भी विनायक के हठी, लालची और घमंडी किरदार को और उकेर के सामने ले आती है. अन्य कलाकार भी
अच्छे हैं, मगर फिल्म के मज़बूत पक्षों में कतई साफ़-सुथरा विज़ुअल
ग्राफ़िक्स, बेहतरीन सेट डिज़ाइन और काबिल मेकअप एंड प्रोस्थेटिक टीम सबसे ऊपर हैं.
हॉरर फिल्मों का एक दौर था, जब हमने फिल्मों
में कहानी ढूँढनी छोड़ दी थी, और डरने के नाम पर पूरी फिल्म
में सिर्फ दो-चार गिनती के हथकंडों का ही मुंह देखते थे. कभी कोई दरवाजे के पीछे
खड़ा मिलता था, तो कभी कोई सिर्फ आईने में दिखता था. पिछले
महीने ‘स्त्री’ ने हॉरर में समझदार कहानी के साथ साफ़-सुथरी कॉमेडी
का तड़का परोसा था. इस बार ‘तुम्बाड़’ एक ऐसी पारम्परिक जायके वाली कहानी चुनता है, जो हमारी कल्पनाओं से एकदम परे तो नहीं हैं, पर जिसे
परदे पर कहते वक़्त राही बर्वे और उनके लेखकों की टीम अपनी कल्पनाओं की उड़ान को
आसमान कम पड़ने नहीं देती. हस्तर के पास सोना तो बहुत है, पर
वो अनाज का भूखा है. अनाज ही उसकी कमजोरी है, और अनाज ही
उसका शाप. शापितों के लिए एक मंत्र है, ‘सो जाओ, नहीं तो हस्तर आ जायेगा’, और शापित तुरंत गिर कर
खर्राटे मारने लगता/लगती है.
अंत में; ‘तुम्बाड़’ एक बेहतरीन हॉरर
फिल्म है, जो हिंदी हॉरर फिल्मों को लेकर आपके खट्टे-मीठे अनुभवों
को एक नया मुक़ाम देगी. एक ऐसा मुकाम, जो अपने आप में अनूठा
है, बेहद रोमांचक है, खूबसूरत भी और जिसे
आप सालों तक सराहेंगे. लालच अच्छी बात नहीं, पर ‘तुम्बाड़’
जाने का लोभ छोड़िये मत. [4/5]