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Friday, 21 December 2018

ज़ीरो: शाहरुख़ के करिश्मे और कद के सामने छोटी पड़ती फिल्म! [2/5]


ये साल हिंदी सिनेमा के महानायकों को औंधे मुंह गिरते हुए देखने का है. ख़ास तौर पर खानों (सलमान, आमिर, शाहरुख़) की तिकड़ी दर्शकों की कसौटी पर कतई खरी नहीं उतर रही. सलमान ‘रेस 3’ में अपने आपको बड़ी बेहयाई और दंभ से बार-बार दोहराने का खामियाज़ा भुगत चुके हैं. मनोरंजन के नाम पर भव्यता की चमकीली पन्नी में लपेट कर कुछ भी सस्ता और सड़ा-गला परोसने के लिए, ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ में आमिर नकारे जा चुके हैं; और अब अनोखी लेकिन बेतुकी और अजीब सी ‘ज़ीरो’ में शाहरुख़ अपने करिश्मे के बूते एक ऐसी फिल्म चलाने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं, जो जितनी जादुई और मनोरंजक है, उतनी ही थका देने वाली भी. हालाँकि बाकी दोनों मिसालों की बनिस्पत, ‘ज़ीरो कम से कम अपनी कमजोरियों और कमियों का ठीकरा अपने मुख्य नायक की क़ाबलियत पर तो नहीं ही फोड़ सकती! शाहरुख़ अपने पूरे शबाब पर हैं, और गनीमत है कि परदे पर उनका बौनापन सिर्फ उनके किरदार के कद तक ही सीमित रहता है, अभिनय पर तनिक भी हावी नहीं होता.

परदे पर छोटे शहरों के रोमांस में आनंद एल राय बड़ा नाम बन चुके हैं. ‘ज़ीरो की शुरुआत भी छोटे से शहर मेरठ से होती है, जहां शाहरुख़ जैसे बड़े नाम को कहानी में ‘फिट करने के लिए छोटा (बौना) बनने की शर्त से गुज़ारा जाता है. खेल बराबरी का होना चाहिए. बऊआ सिंह (खान) हिंदी में ‘अड़तीस’ और इंग्लिश में ‘थर्टी नाइन का हो चुका है, पर शादी की कोई सूरत नहीं बन रही. कद में छोटा बऊआ सपने में बड़ा बन जाता है. छोटे शहर का है, तो अमेरिका से लौटी, शराब-सिगरेट पीने वाली लड़की को शादी के बारे में सोचते देख झल्ला जाता है. ‘तू कहाँ से पड़ गयी इन चक्करों में?’. छोटे शहर का है, मर्द है तो जिद भी कि लड़की को बऊआ सिंह में इंटरेस्ट दिखाना ही होगा. बऊआ चंट है. मतलबी भी, और कोयल भी. खुद का घोंसला बनाने से चिढ़ मचती है. चाहे लड़की उसने खुद चुनी हो, अपने बराबरी की. व्हीलचेयर पर चिपकी, सेलेब्रल पल्सी से लड़ती, नासा की वैज्ञानिक (अनुष्का शर्मा).

फिल्म के लेखक हिमांशु शर्मा छोटे शहरों के चाल-चलन, ताव-तेवर और लय-लहज़ा का काफी कुछ भले ही पहले की फ़िल्मों में परोस चुके हों, ‘ज़ीरो में कहीं से भी उसके जायकों में कमी या बासीपन नहीं आने देते. उनके चुटीले संवादों में और बऊआ सिंह के बेशरम किरदार में आपकी दिलचस्पी अब भी बनी रहती है. दिक्कत पेश आती है, जब कहानी को बड़ी करने के लिए आनंद एल राय और हिमांशु बिना वजह तरकीबें लड़ाने लगते हैं. पतंगें उड़ाती ‘तनु वेड्स मनु की छत ‘ज़ीरो तक आते आते पैसों की बारिश कराने वाले छज्जे बन जाते हैं. रिक्शे पर घर लौटती तनु हो, या चौराहे पर पिटता कुंदन; गलियाँ-रस्ते अब ताज़ा-ताज़ा रंगे-पुते सेट बन गये हैं. भरोसेमंद किरदारों की भीड़ से अलग, कहानी में फ़िल्मी जगत के सितारों का बेरोक-टोक आना-जाना बढ़ गया है. एक सुपरस्टार (सलमान), दो कोरियोग्राफर (गणेश आचार्य, रेमो डिसूज़ा) और स्क्रीन पर करिश्माई मौजूदगी दर्ज कराने वाले दो काबिल अभिनेताओं (अभय देओल, आर माधवन) के साथ-साथ आधा दर्ज़न भर सिने-सुंदरियां (काजोल, रानी, दीपिका, जूही, श्रीदेवी, करिश्मा), मानो बऊआ के छोटे से कद में बखूबी घुसे शाहरुख़ अभी निकल कर ‘लक्स’ के बाथटब में छलांग मार देंगे.  

‘ज़ीरो अपनी कहानी में कुछेक अनोखे मोड़, अधूरेपन का जश्न मनाते किरदारों और उनकी सपनीली दुनिया के ज़रिये कई बार एक प्यारी सी, फंतासी रोमांस वाली ‘डिज्नी फिल्म होने का जोरदार आभास कराती है; खास कर अपने अंत की ओर बढ़ते हुए. इतना ही नहीं, हर वक़्त मनोरंजक होने की शर्त पूरी करने की ललक में फिल्म का पहला हिस्सा राजकुमार हिरानी की फिल्मों की भी याद ख़ूब दिला जाता है, लेकिन ये सारी उम्मीदें धीरे धीरे धुंआ होती जाती हैं. अभिनय में, अनुष्का की मेहनत साफ़ दिखती है. सेलेब्रल पल्सी और व्हीलचेयर के साथ भी, उनके चेहरे के भाव कितनी ही बार बरबस आपके चेहरे पर मुस्कान खींच देते हैं. ब्रेकअप के बाद बेपरवाह फिल्मस्टार की छोटी सी ही भूमिका में कटरीना कैफ़ अपनी सबसे रोमांचित कर देने वाली छाप छोड़ जाती हैं. तिग्मांशु धूलिया जमते हैं, और ज्यादा दिखाई देने की चाह पैदा करते हैं.

...लेकिन ‘ज़ीरो शाहरुख़ से अलग करके नहीं देखी जा सकती. बऊआ सिंह बनकर शाहरुख़ ना सिर्फ सुपरस्टार होने की उस अकड़ को तोड़ फेंकते हैं, जिसे हटाने की उम्मीद उनसे हाल-फिलहाल की जाने लगी थी; बल्कि ऐसा करते हुए वो अपने उस गुजरे हुए जादुई दौर को भी वापस जी लेते हैं, जहां उनका करिश्मा उनके किरदार की सच्चाइयों से पैदा होता था. बऊआ सिंह के सूरत और सीरत का हुलिया काफी हद तक ‘राजू बन गया जेंटलमैन’, ‘कभी हाँ कभी ना’ और ‘यस बॉस जैसी फिल्मों में उनके किरदारों से मेल खाता दिखता है. ‘जियरा चकनाचूर गाने में सलमान के चारो ओर जोश में नाचते बऊआ सिंह को देखना बरबस आपको शाहरुख़ की लगन, एनर्जी और सिनेमा को लेकर उनकी गंभीरता का मुरीद बना देगा. बऊआ सिंह को एक और मौका मिलना ही चाहिए.

आखिर में; ‘ज़ीरो फिल्म के तौर पर शाहरुख़ के करिश्मे और उनके मजेदार किरदार के कद के आगे बहुत छोटी पड़ जाती है. हालाँकि आनंद एल राय शाहरुख़ के कन्धों पर चढ़कर एक नया आसमान नापने की कोशिश पूरी करते हैं, पर तकरीबन पौने तीन घंटे की फिल्म में ज्यादातर वक़्त हवाबाजी में ही खर्च कर देते हैं. अगर सिर्फ फिल्म का पहला हिस्सा देखने की बात हो, तो मैं दो बार और देख सकता हूँ, पर शायद दूसरे हिस्से में फिल्म के बुरी तरह लड़खड़ाने का दर्द मुझे तब भी थिएटर से दूर ही रखेगा! [2/5]  

Friday, 12 October 2018

तुम्बाड़: हिंदी सिनेमा में हॉरर का एक नया अध्याय! [4/5]


लोककथाओं में सांस लेती भूत-प्रेतों, राक्षसों और शैतानों की कपोल-कल्पित कहानियाँ अक्सर काल से परे होती हैं. ‘बड़े दिनों की बात है या फिर ‘मेरी दादी-नानी ऐसा बताती थीं जैसे अप्रामाणिक प्रसंगों और तत्थ्यों से दूर हटते किस्सों को सुनते-सोचते वक़्त, हम अक्सर अपने डर को डराने के लिए ‘सिर्फ कहानी है जैसे कथनों का सहारा ले लेते हैं. राही अनिल बर्वे ‘तुम्बाड़’ के जरिये एक ऐसी ही मनगढ़ंत कहानी हमारे सामने रखते हैं, पर बड़ी चालाकी से अपने क़िस्से को जिस तरह समय और जगह (काल और स्थान) की बेड़ियों में बाँध कर रखते हैं, आप पूरी तरह यकीन नहीं भी कर रहे हों, तो भी करना चाहने लग जाते हैं. नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाली लोककथाएं भी परदे पर इतनी मायावी, सम्मोहक और रहस्यमयी लग सकती हैं, यकीन नहीं होता. ‘तुम्बाड़’ हॉरर फिल्मों के लिए हिंदी सिनेमा इतिहास में एक नए अध्याय की तरह है. कुछ ऐसा, जैसा आपने बचपन की कहानियों में सुना तो होगा, हिंदी सिनेमा के परदे देखा कभी नहीं होगा!

1918 का भारत है. महाराष्ट्र का एक छोटा सा गाँव, तुम्बाड़. सालों से जंजीरों में कैद दादी शापित हैं. लोभ से शापित. सिर्फ सोती हैं, खाती हैं. शायद बाड़े (किले नुमा हवेली) के खजाने का रहस्य जानती हैं. पोता अपनी माँ के साथ उन्हें वहीँ छोड़ आता है, मगर खजाने का लालच पोते विनायक (सोहम शाह) को 15 साल बाद वापस खींच लाता है. दादी के शरीर के ऊपर मोटी-मोटी जड़ों का जाल उग आया है. शरीर गल के मिट्टी हो चला है, पर दिल अभी भी धमनियों जैसी पेड़ों की जड़ों में जकड़ा धड़क रहा है. दादी अभी भी ज़िन्दा हैं, खजाने का राज़ बताने के लिए, जिसकी रक्षा करता है, लोभ का देवता, हस्तर. देवी की कोख से जन्मा पहला देवता, जिसने धरती का सारा सोना चुरा लिया था, और अब अपनी लालच की वजह से बाड़े में कैद है. विनायक लालच में हस्तर से कम नहीं. हस्तर को अब दुधारू गाय की तरह इस्तेमाल करने लगा है, मगर कब तक? 15 साल बाद, भारत आज़ाद हो चुका है, और विनायक पहले से कमज़ोर. अब उसे अपने बेटे को तैयार करना होगा. लोभ और लालच की दलदल में उतरने के लिए.

‘तुम्बाड़’ लालच और हवस जैसी मानवीय प्रकृति के डरावने पहलुओं को कुछ इस अंदाज़ से पेश करती है कि असली दानव आपको हस्तर से कहीं ज्यादा विनायक ही लगने लगता है. हस्तर तक पहुँचने की विनायक की ललक और खजाने को हथियाने की दिलचस्पी में चमकती उसकी आँखों का खौफ, असली राक्षस के चेहरे से भी ज्यादा घिनौना लगता है. कहानी में आप जिस तरह किरदारों की लालच को पीढ़ी-दर-पीढ़ी रगों में उतरते और आखिर तक आते-आते अपने ही बनाए जाल में फंसते देखते हैं, इतना रोमांचक और रहस्य से भरा है कि आप एक पल को भी अपनी आँखें परदे से हटाना नहीं चाहेंगे. ‘तुम्बाड़’ में राही अनिल बर्वे हॉरर के उस मिथक को तोड़ देते हैं, जिसे हॉलीवुड भी आज तक दोहराते आया है. दर्शकों को चौंकाने या डराने के लिए राही, कैमरा या साउंड के साथ किसी तरह का कोई झूठा प्रपंच नहीं रचते, बल्कि इसके विपरीत एक ऐसी तिलिस्मी दुनिया रंगते हैं, जो देखने में जितनी मोहक है, उतनी ही रहस्यमयी भी. पंकज कुमार का कैमरावर्क यहाँ अपने पूरे शबाब पर है. पूरी फिल्म में उनके औसत और आम फ्रेम भी किसी पेटिंग से कम नहीं दिखते. बाड़े में लगे झूले पर बैठा विनायक और बाद में वही टूटा हुआ खाली झूला. फिल्म के आखिरी दृश्यों में लाइट के साथ पंकज कुमार के प्रयोग रोंगटे भी खड़े करते हैं, और आँखों को सम्मोहित भी.

अभिनय में, सोहम शाह की अदाकारी को पहली बार एक बड़ा कैनवस मिला है, और ये उनकी अपनी क़ाबलियत ही है, जिसने फिल्म में उनके किरदार के भीतर के हैवान को महज़ आँखों और चेहरे के भावों से भी कई बार बखूबी ज़ाहिर किया है. उनकी मज़बूत कद-काठी भी विनायक के हठी, लालची और घमंडी किरदार को और उकेर के सामने ले आती है. अन्य कलाकार भी अच्छे हैं, मगर फिल्म के मज़बूत पक्षों में कतई साफ़-सुथरा विज़ुअल ग्राफ़िक्स, बेहतरीन सेट डिज़ाइन और काबिल मेकअप एंड प्रोस्थेटिक टीम सबसे ऊपर हैं.

हॉरर फिल्मों का एक दौर था, जब हमने फिल्मों में कहानी ढूँढनी छोड़ दी थी, और डरने के नाम पर पूरी फिल्म में सिर्फ दो-चार गिनती के हथकंडों का ही मुंह देखते थे. कभी कोई दरवाजे के पीछे खड़ा मिलता था, तो कभी कोई सिर्फ आईने में दिखता था. पिछले महीने ‘स्त्री ने हॉरर में समझदार कहानी के साथ साफ़-सुथरी कॉमेडी का तड़का परोसा था. इस बार ‘तुम्बाड़’ एक ऐसी पारम्परिक जायके वाली कहानी चुनता है, जो हमारी कल्पनाओं से एकदम परे तो नहीं हैं, पर जिसे परदे पर कहते वक़्त राही बर्वे और उनके लेखकों की टीम अपनी कल्पनाओं की उड़ान को आसमान कम पड़ने नहीं देती. हस्तर के पास सोना तो बहुत है, पर वो अनाज का भूखा है. अनाज ही उसकी कमजोरी है, और अनाज ही उसका शाप. शापितों के लिए एक मंत्र है, ‘सो जाओ, नहीं तो हस्तर आ जायेगा, और शापित तुरंत गिर कर खर्राटे मारने लगता/लगती है.

अंत में; ‘तुम्बाड़’ एक बेहतरीन हॉरर फिल्म है, जो हिंदी हॉरर फिल्मों को लेकर आपके खट्टे-मीठे अनुभवों को एक नया मुक़ाम देगी. एक ऐसा मुकाम, जो अपने आप में अनूठा है, बेहद रोमांचक है, खूबसूरत भी और जिसे आप सालों तक सराहेंगे. लालच अच्छी बात नहीं, पर ‘तुम्बाड़’ जाने का लोभ छोड़िये मत. [4/5]               

Friday, 14 September 2018

मनमर्ज़ियाँ: प्यार का लेटेस्ट वाला वर्जन! [3.5/5]


ये दौर है फेसबुक, व्हाट्स एप्प, टिंडर, ट्वीटर का, और इन जैसे तमाम एप्प्स को धड़ल्ले से इस्तेमाल करने वाली नई पीढ़ी का, जो अपने आप को लगातार बदलते रहने, अपडेट रखने में कतई कोताही नहीं बरतती. फिर प्यार क्यूँ अपने पुराने ढर्रे पर ही घिसटता रहे? फिर बॉलीवुड की प्रेम-कहानियों को भी क्यूँ कर ठोक-पीट उनके पुराने दड़बे में ही कैद रखा जाये? तो, अब प्यार का नया संस्करण बाज़ार में आ गया है. प्यार 2.0 यानी ‘फ़्यार’- सिमरनें अब राज से ‘शादी से पहले वो नहीं’ का वादा नहीं लेतीं, राज ‘हिन्दुस्तानी लड़की की इज्ज़त क्या होती है जानने का दम नहीं भरता. जबरदस्ती शादी के लिए माँ-बाप, परिवार की दुहाई देने पर लड़की भावुक होकर चुपचाप मेहंदी की डिज़ाइन पसंद करने नहीं बैठ जाती. मंडप तक जाने का फैसला अब सिर्फ उसका है, चाहे ऐसा करते उसकी अपने साथ ही, अपने अन्दर ही कितनी ज़ज्बाती लड़ाई क्यूँ न चल रही हो? समाज का रवैया भले नहीं बदल रहा हो, किरदार चुपके चुपके ही सही, बदल रहे हैं. उनकी कहानियाँ बदल रही हैं. और ‘मनमर्ज़ियाँ’ के साथ अनुराग कश्यप भी. ‘काले’ सैयां के इश्क़ का रंग अब ‘ग्रे’ हो गया है. बदलाव के नाम पर इतना बहुत है, अब पूरा सफ़ेद होने की उम्मीद मत लगा बैठियेगा. ज्यादा हो जायेगा.

‘मनमर्ज़ियाँ अपने आप में बहुत ढीठ लफ्ज़ है. गलत-सही सोचने और समझ आने से बहुत पहले मन जो कहे, कर जाना. रूमी (तापसी पन्नू) का किरदार इस लफ्ज़ के बिलकुल पास बैठता है. एकदम घेर के. ठीक सट के. ‘एक बार बोल दिया तो पीछे नहीं हटती के ग़रूर में अपने सच्चे प्यार विक्की (विक्की कौशल) को अल्टीमेटम दे आई है. ‘कल अगर घर पे हाथ मांगने नहीं आया, तो अगले दिन घर वाले जहां कहेंगे, शादी कर लूंगी. तैश में सोचती भी नहीं, पर ऐसा नहीं कि समझती भी नहीं. विक्की जिम्मेदारियों के नाम पर टें बोल जाता है. बनना तो ‘यो यो हनी सिंह है, पर अभी तक दूसरों के गानों का ही रीमिक्स बजाता रहता है. रूमी के कहने पर साथ भाग तो आया है, पर कोई ठोस प्लान नहीं. पहले भी कर चुका है, रूमी एबॉर्शन के बाद रिक्शे पर बैठ कर अकेले घर गयी थी. रॉबी (अभिषेक बच्चन) को कोई जल्दी नहीं. हनीमून के वक़्त भी, शादी के बाद भी. ‘रामजी टाइप का आदमी है. न कुछ पूछता है, न ही रूमी पर मर्दाना हक़ जताने की कोई तलब है उसको. तेज़ आवाज में बोलने को भी, उसको चार पैग लगते हैं. बैंकर है, तो जानता है कि इस इन्वेस्टमेंट में रीटर्न की कोई गारंटी नहीं.

‘मनमर्ज़ियाँ’ फिल्म की लेखिका कनिका ढिल्लों के अपने अनुभवों का साझा है, इसलिए गिनती के दो-चार दृश्यों को छोड़ कर, फिल्म की घटनाओं से जुड़ाव में किसी तरह की कोई फांस आड़े नहीं आती. रूमी का अक्खड़पन, विक्की का लापरवाह रवैया और रॉबी के किरदार में सुन्न कर देने वाला ठहराव; मनमर्ज़ियाँ’ अपने बनावट में ‘वो सात दिन, ‘धड़कन’, ‘हम दिल दे चुके सनम’ और ‘तनु वेड्स मनु जैसी तकरीबन आधी दर्जन हिंदी फिल्मों की याद जरूर दिला सकता है, पर फिल्म देखने के बाद आप जो नहीं भूलते, उनमें इन किरदारों को लिखने में कनिका की गहरी समझ शामिल है.  दृश्यों में नाटकीयता कलम से कहीं ज्यादा, किरदारों के अपने मिजाज़ से निकलती और बनती है. अमित त्रिवेदी का संगीत और शैलीजी के गीत फिल्म पर हमेशा और हर वक़्त छाये रहते हैं. कश्यप की दाद देनी होगी, जिस बाकमाल तरीके से म्यूजिक को वो अपने दृश्यों में, और दृश्यों को अपने म्यूजिक में पिरोते हैं.

‘मनमर्ज़ियाँ’ शर्तिया तौर पर अपने तीन ख़ास कलाकारों में पूरी की पूरी बंट जाती है. तापसी का रूमी होना ‘मनमर्ज़ियाँ’ के लिए किसी तोहफे से कम नहीं. परदे पर उसका छिटकना, बिगड़ना, गुस्से में तपना, भड़कना और टूटना; रूमी के अन्दर से तापसी एक पल को बाहर नहीं आती. विक्की को उसकी गैर-जिम्मेदाराना रवैये के लिए कोसते और डांटते हुए परदे पर जिस तरह वो फटती हैं, आवाक् कर देती हैं. फिल्म के आखिरी पलों में कैमरे की तरफ दौड़ते हुए उनके चेहरे की मुस्कुराती चमक में जैसे एक पल को पूरी फिल्म उनकी हो के रह जाती है. विक्की फिल्म दर फिल्म चौंका रहे हैं. ‘संजू के शराबी दृश्य के बाद, इस फिल्म में भी उनके हिस्से एक ऐसा ही दृश्य आया है. इस बार सिर्फ उनका चेहरा नहीं बोल रहा, पूरे का पूरा बॉडी लैंग्वेज प्रभावित करता है. गानों के डांस-स्टेप्स और लिप-सिंक में उनकी वो क़ाबलियत खुल कर सामने आती है, जो उन्हें अच्छे एक्टर से ‘स्टार मैटेरियल’ बनने की तरफ बढ़ने में मदद करेगी. विक्की में कॉमिक की संभावनायें भी और प्रबल हो रही हैं.

अभिषेक बच्चन दो साल बाद परदे पर हैं. एक ऐसे किरदार में, जिसे आप कतई मजेदार नहीं कह पायेंगे. जिसके साथ होते हुए शायद आप खिलखिलाएं नहीं, झूमें-गायें नहीं, पर ऐसा नहीं करते हुए भी परदे पर उसकी मौजूदगी बहुत ठोस है. उसकी शख्सीयत में इतनी परतें हैं, कि खोलते-खोलते फिल्म कम पड़ जाती है. उसकी नेकनीयती, उसकी संजीदगी कहीं भी उसे लाचार नहीं बनाती, बल्कि हर वक़्त पहाड़ की तरह अडिग और बर्फ की तरह ठंडा रखती है, और शायद यहीं, इसी पल में अभिषेक अपने सबसे मुश्किल किरदार में सबसे आसानी से ढल रहे होते हैं, पिघल रहे होते हैं.

आखिर में; ‘मनमर्ज़ियाँ’ लव और अरेंज्ड मैरिज के बीच हिचकोले खाती इस नई ‘ज़िम्मेदार, समझदार और तैयार’ पीढ़ी की उनकी अपनी एक ‘मेच्योर’ लव-स्टोरी है, जहाँ किरदार सपनों में जीने से कहीं ज्यादा, अपने आप को जानते-पहचानते हैं. अपनी खामियों का जश्न मनाते हैं. अपनी चाहतों के लिए लड़ते-भिड़ते हैं, और ‘डिस्कशन’ को अच्छा मानते हैं. प्यार का लेटेस्ट वाला वर्जन है, आप भी अपडेट कीजिये. [3.5/5]  

Friday, 12 January 2018

मुक्काबाज़: कश्यप की सबसे जिम्मेदार फिल्म! शायद साल की भी! [4/5]

मवेशी ले जा रहे कुछ लोगों पर 'गौरक्षकों' ने हमला कर दिया है. 'भारत माता की जय' के जोशीले नारों के बीच मोबाइल पर हिंसा के वीडियो बनाए जा रहे हैं. कोच साब के घर का गेंहू पिसवाने आया बॉक्सर श्रवण कुमार सिंह (विनीत सिंह) विडियो में मुंह बांधे एक तथाकथित गौरक्षक को तुरंत पहचान जाता है. वो उस जैसे तमाम कोच साब के बेरोजगार चेलों में से ही एक है. पूछने पर साफ़ मुकर जाता है, और श्रवण के लिए भी यह कोई हिला देने वाली बात नहीं है. इस एक वाकिये में ही देश की लगातार विकृत होती राजनीतिक प्रवृत्ति और गर्त में धकेली जा रही नयी पीढ़ी के सपनों का क्रूर मर्दन ज़ोरदार तरीके से सामने आता है. इस लिहाज़ से अनुराग कश्यप की 'मुक्काबाज़' शायद उनकी सबसे जिम्मेदार फिल्म मानी जा सकती है, जहाँ कुछ भी महज़ मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि सब कुछ सिनेमा के जरिये कुछ कहने की एक सशक्त कोशिश.  

...और फिर ये तो सिर्फ शुरुआत है, 'मुक्काबाज़' वास्तव में एक ही फिल्म में कई फिल्में एक साथ हैं. अगर उत्तर प्रदेश की संस्कृति में भी राजस्थानी थाली जैसी कोई परिकल्पना प्रचलित होती तो मैं कहता कि 'मुक्काबाज़' उत्तर प्रदेश की एक बड़ी सी सामाजिक, राजनीतिक और जातीय जायकों से लबरेज एक मनोरंजक थाली है. कुछ स्वाद अगर ज़बान मीठा कर जाते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो दिल खट्टा, मन कड़वा और आँखें नम. हो सकता है कि पहली नज़र में 'मुक्काबाज़' उत्तर प्रदेश की धमनियों में रचे-बसे, जाति के सामाजिक खेल और खेलों में जाति की राजनीति के उलझाव में फँसी एक सुलझी हुई प्रेम-कहानी ही लगे, जहां नायिका नायक को लड़ता देख मुग्ध हो जाती है, सामाजिक दुराव और जातिगत भेद के बावजूद दोनों में प्रेम पनपता है और फिर खलनायक की साज़िशों और जिंदगी की कठोर सच्चाईयों से हाथापाई करते दोनों आखिर में एक सुखद अंत की ओर बढ़ निकलते हैं. ऐसा है भी, पर इस बार कहानी के तेवर सीधे सीधे मुद्दों को निशाना बनाने से परहेज़ नहीं करते. 

स्टेट बॉक्सिंग फेडरेशन के शीर्ष पर काबिज़ कोच भगवान दास मिश्रा (जिम्मी शेरगिल) अपने ही साथी कोच से उसकी जाति पूछने का सिर्फ दुस्साहस ही नहीं करता, उसके हरिजन होने पर वेटर को अलग बर्तन में पानी पेश करने का आदेश भी पूरे गर्व से देता है. अपनी भतीजी से प्यार करने के खामियाज़े में अपने ही सबसे अच्छे बॉक्सर श्रवण को बॉक्सिंग रिंग से दूर रखने में पूरा दम ख़म झोंक देता है. उधर देश के लिए खेलने की आशायें पाले प्रतिभावान खिलाड़ी कोच साब की मालिश करने, उनके घर का राशन लाने और अपने अधिकारियों की बीवियों को 'मार्केटिंग' पर ले जाने में जाया हो रहे हैं.

'मुक्काबाज़' के ज़रिये, परदे पर अनुराग दो बेहद सशक्त किरदार परोसते हैं. वो भी एक-दूसरे के आमने-सामने. सुनयना (ज़ोया हुसैन) बोल नहीं सकती, पर उसे सुनने-समझने में आपको ज्यादा मुश्किल नहीं होगी. सुनयना का छिटकना, उसका गुस्सा, उसकी झुंझलाहट, उसकी दिलेरी, उसके ताव, उसके तेवर सब बेआवाज़ हैं, पर बेख़ौफ़ और बेरोक-टोक बोलते हैं. सुनयना के किरदार में ज़ोया कहीं भी कमतर नहीं दिखाई पड़तीं. ठीक वैसे ही, जैसे श्रवण के किरदार में विनीत. निराश, हताश और गुस्सैल श्रवण जैसे परदे पर हर वक़्त पटाखे की तरह फटता रहता है, और हर बार धमाका उतना ही बड़ा होता है, उतना ही जोरदार. 

विनीत का एक बॉक्सर के तौर पर, अपने किरदार श्रवण में ढल जाना बॉलीवुड के अभिनेताओं के लिए एक चुनौती बनकर उभरता है. सिर्फ कद-काठी तक ही नहीं, विनीत अपने अदाकारी में भी वो धार-वो चमक लेकर आते हैं, जिसे भुलाना आसान नहीं होगा. अपने पिता के साथ उनकी खीज़ भरी बहस का दृश्य हो, सुनयना के साथ 'साईन लैंग्वेज' में बात करने वाले दृश्य या फिर बॉक्सिंग रिंग में उनकी शानदार मौजूदगी; विनीत इस फिल्म को अपना सब कुछ बक्श देते हैं. फ़िल्मकार के तौर पर अनुराग कश्यप को तो सीमाएं लांघते आपने दसियों बार सराहा होगा, पर इस बार विनीत कुमार सिंह के अभिनय में वो लोहा दिखेगा कि तमाम खान, कपूर जैसे बॉलीवुड के दिग्गज़ धूल चाटते नज़र आयेंगे. मेरी लिए, साल की सबसे दमदार परफॉरमेंस.

'मुक्काबाज़' कोई 'स्पोर्ट्स' फिल्म नहीं है, जो खिलाड़ियों की जीत का रोमांच बेचने में यकीन रखती हो, पर जितनी देर भी परदे पर खेलों-खिलाड़ियों और उनके इर्द-गिर्द जाल की तरह फैले राजनीति के बारे में बोलती है, असल स्पोर्ट्स फिल्म ही लगती है. यूँ तो फिल्म में बॉक्सर श्रवण हैं, 'मुक्काबाज़' में सबसे जोरदार घूंसे और मुक्के अनुराग कश्यप की तरफ से ही आते हैं. कभी तीख़े व्यंग्य की शक्ल में, तो कभी मज़ेदार संवादों के ज़रिये. हालाँकि ढाई घंटे की इस लम्बी फिल्म पर दूसरे हिस्से में कई बार अपने आप को दोहराने का आरोप भी जड़ा जा सकता है, पर दिलचस्प संगीत, जबरदस्त अभिनय, मनोरंजक संवादों और कहानी में बखूबी पिरोये गए मुद्दों की अहमियत फिल्म को अलग ही मुकाम तक ले जा छोडती है. [4/5]     

Friday, 1 September 2017

शुभ मंगल सावधान: शर्तिया मनोरंजन! एक बार मिल तो लें!! [3.5/5]

'सेक्स-एजुकेशन' हम सबके 'कमरे का हाथी' है. देख के भी नज़रंदाज़ करने की परम्परा जाने कब से चली आ रही है? टीवी पर अचानक से दिख जाने वाला सेक्स-सीन हो, या कॉन्डोम का सरकारी विज्ञापन; बच्चों के सवाल आने से पहले ही बड़ों के हाथ रिमोट खोजने लग जाते हैं. और अगर कहीं भूले-भटके कोई बात करने की हिम्मत जुटा भी ले, तो ज्ञान की नदियों के समंदर हर तरफ से यूं हिलोरें मारने लगते हैं कि जैसे सब के सब डॉ. महेंद्र वत्स (मशहूर सेक्स-पर्ट) के ही बैचमेट हों. जो जितना कम जानता है, उतना ही ज्यादा यकीन से चटखारे ले लेकर अपने तजुर्बों की किताब सामने रख देता है. रेलवे लाइन से लगी शहर की हर दीवार किसी न किसी ऐसे 'गुप्त' क्लिनिक का पता जरूर आपको रटा मारती है. पुरानी सी खटारा वैन की छत पे कसा भोंपू चीख-चीख कर अच्छे-खासे मर्द में भी 'मर्दानगी की कमी' का एहसास करा देता है. बंगाली बाबाओं के नुस्खों से लेकर सड़क किनारे बिकती रंगीन शीशियों में बंद जड़ी-बूटियों की तलाश में; 'सेक्स एजुकेशन' का यह 'हाथी' अक्सर 'चूहे' की शकल लिए मायूस घूमता रहता है. हंसी तो आनी ही है. 

आर प्रसन्ना की 'शुभ मंगल सावधान' में हालाँकि कोई हाथी तो नहीं है, पर एक भालू जरूर है. सरे-बाज़ार मुदित (आयुष्मान खुराना) पर चढ़ गया था, और अब उतरने का नाम ही नहीं ले रहा. मुदित के गीले बिस्किट चाय में टूट-टूट कर गिर रहे हैं, और उसका अलीबाबा गुफा तक पहुँच ही नहीं पा रहा. दिक्कत तो है, सुगंधा (भूमि पेडणेकर) से उसकी शादी बस्स कुछ दिनों में होने ही वाली है. मुदित की परेशानी में सुगंधा हर पल उसके साथ है. बिना सबटाइटल्स वाली अंग्रेजी फिल्मों से सीख कर वो मुदित को 'कम ऑन, माय डैनी बॉय!' भी सुना रही है, हालाँकि ऐसा करते हुए उसके चेहरे पर दर्द ज्यादा है. तमाशा तब शुरू होता है, जब दोनों के परिवारों में ये किस्सा आम हो जाता है. बाप को गुमान है कि उसके बेटे का 'कुछ भी' छोटा नहीं हो सकता. माँ ने बड़े होने तक बेटे का अंडरवियर रगड़-रगड़ के साफ़ किया है, तो बेटे में 'खोट' होने की सूरत ही नहीं बचती. 

सगाई से लेकर शादी तक चलने वाली इस कहानी में 'डिसफंक्शनल' सिर्फ मुदित और सुगंधा की सेक्स-लाइफ ही नहीं है, बल्कि समाज, शादी और रीति-रिवाज़ भी इसके जबरदस्त शिकार हैं. मजेदार ये है कि सब कुछ हंसी-हंसी में आपके सामने आता है और वैसे ही चले भी जाता है. जहां आपकी फिल्म का विषय ही इतना वयस्क हो, इतना संवेदनशील हो, वहाँ (अच्छे) हास्य का सहारा लेकर अपनी बात कहना और उसे कहते वक़्त जरा भी अश्लील या भौंडा न होने पाना अपने आप में एक बड़ी कामयाबी की तरह देखी जानी चाहिए. इशारों-इशारों, मिसालों और कहानियों के ज़रिये यौन-संबंधों से जुड़ी समस्याओं पर बात करने की कोशिश करते वक़्त फिल्म के किरदारों की झिझक जिस तरह का कुदरती हास्य पैदा करती है, उसका ज़ायका हम पहले भी 'विक्की डोनर' में चख चुके हैं. 'शुभ मंगल सावधान' ठीक उसी जायके की फिल्म है. 

फिल्म में किरदारों का रूखापन, उनके खरे-खरे लहजे और उनके तीखे संवाद की तिकड़ी मनोरंजन में पूरा दखल रखती है. ताऊजी (ब्रजेंद्र काला) बात-बात पर बाबूजी के श्राद्ध पर खर्च हुए पैसों का एहसान गिनाना नहीं छोड़ते. ससुर को 'बहू दुपट्टा लेकर नहीं गयी' ज्यादा परेशान करता है. माँ (सीमा पाहवा) बेटी को शादी से जुड़े सब राज बताना भी चाहती है, मगर खुल के कैसे कहे? इन सभी किरदारों के अभिनय में आपको कोई भी कलाकार तनिक भी शिकायत का मौका नहीं देता. मुख्य भूमिकाओं में आयुष्मान अपनी पिछली कुछ 'एकरस' फिल्मों से जरूर आगे आये हैं. भूमि हालाँकि मिडिल-क्लास, घरेलू लड़की के इस दायरे में कैद जरूर होती जा रही हैं, पर जब तक कहानियों में धार रहेगी, उन्हें देखना कतई खलेगा नहीं. 

आखिर में; 'शुभ मंगल सावधान' एक पारिवारिक फिल्म है, जो मनोरंजन के सहारे ही सही एक ऐसे झिझक भरे माहौल में आपको उन समस्याओं पर हँसने को उकसाती है, जिसके बारे में बात करना भी आपके लिए 'सांस्कृतिक, सामाजिक और धार्मिक' बन्धनों की जकड़ में आता है. आज अगर नज़रें मिला कर, 'सेक्स' के मुद्दे पर खुल कर अपनों के साथ हंस पाये, तो क्या पता कल संजीदा होकर एक-दूसरे से बात करना भी सीख ही जाएँ? [3.5/5]       

Friday, 19 August 2016

हैप्पी भाग जायेगी: पाकिस्तानी ‘तनु वेड्स मनु’! [2/5]

हैप्पी करोड़ो में एक लड़की है. फिल्म में अली फज़ल का किरदार हैप्पी के किरदार को बयान करते हुए वैसी ही शिद्दत दिखाता है, जिस शिद्दत से शायद फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अज़ीज़ ने फिल्म के निर्माताओं के सामने हैप्पी का किरदार बढ़ा-चढ़ा के पेश किया होगा. पर सच तो ये है कि हैप्पी जैसी नायिकायें बॉलीवुड की पसंदीदा हमेशा से रही हैं. स्वभाव से दबंग, जबान से मुंहफट, दिल से साफ़, कद-काठी से बेहद खूबसूरत! अब सारा दारोमदार सिर्फ इस एक बात पर आकर टिक जाता है कि उसे गढ़ने में कितनी अच्छी और कितनी ‘वाटरटाइट’ स्क्रिप्ट का इस्तेमाल होता है. सब कुछ सही रहा तो वो ‘तनु वेड्स मनु’ की तनु भी बन सकती है, वरना थोड़ी सी भी झोल-झाल उसे वैसी ही ‘हैप्पी’ बना के छोड़ेगा, जैसी हम हर दूसरी-तीसरी रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में देखते सुनते आये हैं. हालाँकि फिल्म के साथ आनंद एल राय [निर्देशक, तनु वेड्स मनु और राँझणा] और हिमांशु शर्मा [संवाद लेखक, तनु वेड्स मनु और राँझणा] जैसे बेहतरीन नाम जुड़े है, पर ‘हैप्पी भाग जायेगी’ हैप्पी को ‘तनु’ बनने का मौका नहीं देती.

हैप्पी [डायना पेंटी] एक तेज-तर्रार लड़की है. उसके पैर कहीं रुकते नहीं. बाप की पसंद के लड़के बग्गा [जिम्मी शेरगिल] से शादी न करनी पड़े, इसलिए शादी के दिन ही घर से भाग जाती है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि वो अपने बॉयफ्रेंड गुड्डू [अली फज़ल] के पास न पहुँच कर अमृतसर से लाहौर पहुँच जाती है. लाहौर में उसकी मदद करने को तैयार बैठे हैं पाकिस्तानी सियासत के मुस्तकबिल बिलाल अहमद [अभय देओल]. बिलाल अपने वालिद की सियासी ख्वाहिशों को चुपचाप ख़ामोशी से पूरा करने में लगा है, जबकि उसकी अपनी मर्ज़ी कभी क्रिकेट के मैदान में झंडे गाड़ने की थी. कहने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि हैप्पी से मिलकर उसे अपनी खोई शख्सियत हैप्पी में दिखने लगती है. बहरहाल, घटनायें और फिल्म के लेखक-निर्देशक खींच-खांच के सारे ख़ास किरदारों को प्रियदर्शन की फिल्मों की तरह, उनके तमाम सह-कलाकारों के साथ हिन्दुस्तान से पाकिस्तान में ला पटकते हैं. शायद इसलिए भी कि स्क्रीन पर पाकिस्तान का ‘सब चलता है’ हिंदुस्तान के ‘सब चलता है’ से ज्यादा मजाकिया लगता हो.

फिल्म के मजेदार किरदार हों, उनके रसीले संवाद या फिर काफी हद तक कहानी में जिस तरह के हालातों का बनना और बुना जाना, ‘हैप्पी भाग जायेगी’ वास्तव में ‘तनु वेड्स मनु’ बनने की राह पर  ही भागती नज़र आती है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उन किरदारों में आपको बनावटीपन और घटनाओं में बेवजह की भागा-दौड़ी ज्यादा शामिल दिखाई देती है. हैप्पी लाहौर से वापस अमृतसर क्यूँ नहीं आना चाहती? हैप्पी अगर इतनी ही निडर और निर्भीक है कि पूरा लाहौर उससे परेशान हो जाए, वहाँ की पुलिस, वहाँ के गुंडे सब उसके सामने घुटने टेक दें तो उसे अपने बाप के सामने शादी की मुखालफत करने में क्या दिक्कत हो जाती है? कहानी की घिसी-पिटी सूरत यहाँ किरदारों की भली सी-भोली सी सीरत पर बुरी तरह हावी हो जाती है. नतीज़ा? फिल्म कुल मिलाकर एक औसत दर्जे की कोशिश भर दिखाई देती है.

जिम्मी शेरगिल यहाँ भी नाकाम प्रेमी की भूमिका को जीते नज़र आते हैं, जिसे फिल्म के अंत में ‘पति’ बनने का सुख नहीं मिलता, पर दर्शकों की ‘सिम्पैथी’ मिलने का हौसला ज़रूर दिया जाता है. फिल्म के असरदार पलों में पाकिस्तान पर गढ़े गए सीधे-सादे, साफ़-सुथरे जोक्स आपके चेहरे पे हर बार मुस्कान लाने में कामयाब रहते हैं. पीयूष मिश्रा साब का औघड़पन, उनकी अहमकाना हरकतें और खालिस उर्दू के इस्तेमाल से बनने वाला हास्य आपको थोड़ी तो राहत देते हैं. अली फज़ल और अभय देओल अपनी करिश्माई मौजूदगी भर से परदे को एक हद तक जिंदा रखते हैं. डायना काबिले-तारीफ हैं. जिस तरह की झिझक और झंझट उनके अभिनय में एक वक़्त दिखाई देता था, उससे वो काफी दूर निकल आई हैं.

आखिर में; मुदस्सर अज़ीज़ की ‘हैप्पी भाग जाएगी’ में एक किरदार कहता है, “काश! ऐसी लव-स्टोरीज़ पाकिस्तान में होतीं.” सच मानिए, कुछ मामलों में ये ‘तनु वेड्स मनु’ बनाने की चाह में भटकी हुई कोई अच्छे बजट की, पर सस्ती सी पाकिस्तानी फिल्म ही नज़र आती है. यहाँ सब कुछ मिलेगा, पर सब आधा-अधूरा, अधपका और जल्दबाजी से भरा हुआ! [2/5]         

Friday, 22 April 2016

निल बट्टे सन्नाटा: जिंदगी-कहानी-सिनेमा! [4/5]

सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है.

घरों, जूते की फैक्ट्री और मसाले की दुकानों पर काम करने वाली चंदा (स्वरा भास्कर) एक रात जब थक कर सोने से पहले अपनी 15 साल की बेटी अप्पू (रिया शुक्ला) से पूछती है कि वो बड़ी होकर क्या बनेगी? अप्पू खरी-खरी कह देती है, “मैं बाई बनूंगी. बाई की बेटी बाई ही तो बनेगी.” चंदा बहस में जीत नहीं सकती. 10वीं के बाद अप्पू को पढ़ाने के लिए पैसे कहाँ हैं चंदा के पास? वैसे भी, अप्पू मैथ्स में ‘निल बट्टा सन्नाटा’ है, मतलब ज़ीरो. पैसे तो बाद की बात हैं, पर इस मैथ्स का क्या करें? चंदा तो खुद मैट्रिक फ़ेल है. डॉ. दीवान (रत्ना पाठक शाह) के पास एक उपाय है. चंदा भी अप्पू का स्कूल ज्वाइन कर ले, खुद भी पढ़े और अप्पू की भी मदद करे. बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए माँ-बाप क्या कुछ नहीं करते, पर हम बच्चे कितना समझ पाते हैं? अप्पू के पास तो कोई सपना ही नहीं है, और चंदा के पास अप्पू से बड़ा कोई सपना नहीं!

अश्विनी अय्यर तिवारी अपनी पहली ही फिल्म में साफ़ कर देती हैं कि सिनेमा कहानी कहने का एक सशक्त माध्यम है, कहानी जिसका कहा जाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसका सही ढंग से कहा जाना. आगरा की तंगहाल बस्तियां हों या सरकारी स्कूलों का वही जाना-पहचाना बेढंगापन; तिवारी बड़ी खूबी से फिल्म को सच्चाई के बिलकुल करीब तक रखने में कामयाब रही हैं. उनके किरदार भी अपनी जड़ों से एक बार भी उखड़ते दिखाई नहीं देते. चंदा गुस्से में होती है तो अपनी बेटी को भी गाली देने से झिझकती नहीं.

अभिनय की दृष्टि से ‘निल बट्टे सन्नाटा’ एक जोरदार और जबरदस्त फिल्म है. स्वरा भास्कर एक पल को भी चन्दा से अलग नहीं दिखतीं. बेटी की हताशा में बेबस, गरीबी से जूझती, सपनों को जिंदा रखने में दौड़ती-भागती एक अकेली माँ का सारा खालीपन उनकी आँखों में हमेशा तैरता रहता है, ऐसा शायद ही कभी होता है कि वो पूरी तरह टूट जाएँ स्क्रीन पर, फिर भी आपकी आँखों को भिगोने में वो हर बार कामयाब होती हैं. अपनी पहली फिल्म में ही रिया एक मंजी हुई कलाकार की तरह आपको चौंका देती हैं, और इन दोनों के बीच फिल्म के सबसे मजेदार दृश्यों में नज़र आते हैं पंकज त्रिपाठी! अक्खड़, अकड़ू और निहायत ही अनुशासित मैथ्स टीचर की भूमिका में त्रिपाठी आपको अपने किसी न किसी पुराने टीचर की याद दिला ही देंगे.

अंत में; ‘निल बट्टे सन्नाटा’ सिनेमा के उस क्लासिक नियम की जोर-शोर से पैरवी करती है, जहां फिल्म के बड़ी होने से कहीं ज्यादा ‘कहानी’ का बड़ा होना मायने रखता है. फ़िल्म के एक दृश्य में चंदा कहती भी है, “कृष 3 नहीं है, जिंदगी है जिंदगी”. और जिंदगी से ज्यादा दिलचस्प, जिंदगी से ज्यादा जज्बाती, जिंदगी से ज्यादा सच्ची कहानी और क्या होगी! [4/5] 

Friday, 22 May 2015

TANU WEDS MANU RETURNS: Just for Laughs…and the ‘QUEEN’! [3.5/5]

A hushed & muted father in 40 years of marriage [K K Raina] is comforting his son [Madhavan] who’s on the edge of making the hardest decision to get out of his dysfunctional marriage; and you can clearly eavesdrop on the mother complaining hysterically about this late night discussion. Towards the end of the conversation, the agitated father gets up, picks up a floor-wiper and breaks the only lit tube light in the house. The marriages anywhere on earth can bring the same effect on any one who claims to be sane. But then, there is always a way to escape the complications. Paying no attention and enjoying your regular spell of drinking could be one, as suggested by the father in the film but divorce is just not so done. How can we not have Tanu and Manu in same frame if the film has already pictured them as a couple? We dare not.

Despite managing a wonderful plot for a sequel, TANU WEDS MANU RETURNS prefers to join the successful league of highly entertaining bollywood films that might go for a clumsy climax and a fake happy-ending just for the sake of audience’s approval. The best part is you have a pool of talents and the powerhouse herself at your side, Kangana Ranaut if you want to play straight; so definitely no one is gonna raise his eyebrows over this preferred choice of not going bold but staying regular.

Four years is a term looking too much to be in marriage for the temperamental Tanu [Kangana] and maddened Manu [Madhavan]. Their latest verbal spat has landed Manu in mental asylum and Tanu in killing loneliness. She returns to her zone, of ex-boyfriends, fewer limitations and an all flying high life with no strings attached. Manu meets a mirror image of Tanu and falls in love instantly. This new entrance [the overpowering double role of Kangana] is a Haryanvi athlete- a lot rough in her vocals but much more susceptible and sensitive within. Meanwhile, returns Pappi [Deepak Dobriyal]- the uproarious friend who never runs out of droll one-liners. Then, there is Raja Awasthy [Jimmy Shergil] adding the drama led by power, passion and attitude. Zeeshan Ayyub plays your regular mean and tricky one-sided lover who considers himself belonging to a certain ‘kandha’ type men known for offering their shoulders to broken girls to cry at.

TANU WEDS MANU RETURNS takes off from the base of its prequel and lands up in the territory of ‘RAANJHNAA’. Aanand L Rai being the powering team-lead and Himanshu Sharma the delectable writing force, it doesn’t fail as an experiment. Film guarantees uncontainable laughs especially in the first half before the ineptness in the screenplay starts bothering you soon. Be it the wedding-scene where Pappi kidnaps his ‘whats app’ female friend to marry just because she would reply on his even lamest jokes with ‘LOL’ text messages or where Swara Bhaskar sounds like she had done anything unethical in going medical way to conceive a child without telling her husband; the second half eventually becomes the rush-rush, hush-hush mission to meet the forged happy ending. When would we stop pretending that marriages are not done until the very last ‘phera’? When would we stop taking our climaxes to the ‘mundup’ at the very final moments?

Anyways, keeping my issues aside; it’s a film that establishes Kangana’s success in QUEEN wasn’t a fluke. She surfaces as a towering performer in both her roles. No matter what get up, what accent she’s into; Kangana is there to spellbind you. Her flawless performance gives you goose bump moments we rarely experience or expect from Bollywood films. Madhavan is equally competent. His charms never fade. His kind, compassionate and fragile Manu makes his own place in your hearts. The casting is superbly accomplished.

Overall, TANU WEDS MANU RETURNS is a film made for laughs! Frequent laughs! Fabulous laughs!! If only Aanand L Rai had not been so conservative about divorces, film would have been blessed with a much appreciative climax. Watch out for the ‘Queen’ whose vivacious presence alone makes every penny of yours a ‘worth it’ investment to gain super-sized entertainment! [3.5/5]