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Sunday, 23 December 2018

साल 2018 के नगीने!

साल काफ़ी चौंकाने वाला रहा. उम्मीदों पर खरा न उतरना हिंदी सिनेमा के लिए कोई नयी बात नहीं है, पर बॉक्स-ऑफिस पर सफलता की गारंटी समझे जाने वाले बड़े-बड़े नामों को दर्शकों ने जिस बेरूखी से नकारने का जिम्मा उठाया, वो ज़रूर एक नयी उम्मीद जगाता है. यह साल वो रहा, जब सिनेमा में भाषाई प्रयोग ख़ूब हुए भी, चले भी. हॉरर को ख़ूब तवज्जो मिली. पहले ‘परी’, फिर ‘स्त्री और आखिर तक आते-आते ‘तुम्बाड’; कभी हास्य में डुबो कर, तो कभी खालिस कहानी कहने की पुरानी परम्पराओं में पिरो कर.  

वक़्त है, एक बार फिर मुड़के देखने का. पूरे का पूरा साल अच्छे, बुरे के खांचे में. 


सर्वश्रेष्ठ 5 फ़िल्में

  1. अक्टूबर
अक्टूबर’ जूही चतुर्वेदी के निडर लेखनशूजित सरकार के काबिल निर्देशन और वरुण धवन के सहजसरल और सजीव अभिनय का मिला-जुला इत्र हैजो फिल्म ख़तम होने के बाद तक आपको महकता रहेगामहकाता रहेगा. बॉक्स-ऑफिस पर सौ करोड़ करने की दौड़ चल रही होऔर ऐसे आप सिनेमा के लिए अक्टूबर’ जैसा कुछ बेहद खुशबूदारखूबसूरत और ख़ास लिख रहे होंकिसी बड़े मजे-मंजाये फिल्म-लेखक के लिए भी इतनी हिम्मत जुटाना हिंदी सिनेमा में आसान नहीं है. ऐसा होते हुए भी हमने कम ही देखा है. जूही चतुर्वेदी इस नक्षत्र का एकलौता ऐसा सितारा हैं.

  1. तुम्बाड
हॉरर फिल्मों का एक दौर थाजब हमने फिल्मों में कहानी ढूँढनी छोड़ दी थीऔर डरने के नाम पर पूरी फिल्म में सिर्फ दो-चार गिनती के हथकंडों का ही मुंह देखते थे. कभी कोई दरवाजे के पीछे खड़ा मिलता थातो कभी कोई सिर्फ आईने में दिखता था. पिछले महीने ‘स्त्री’ ने हॉरर में समझदार कहानी के साथ साफ़-सुथरी कॉमेडी का तड़का परोसा था. इस बार ‘तुम्बाड़’ एक ऐसी पारम्परिक जायके वाली कहानी चुनता हैजो हमारी कल्पनाओं से एकदम परे तो नहीं हैंपर जिसे परदे पर कहते वक़्त राही बर्वे और उनके लेखकों की टीम अपनी कल्पनाओं की उड़ान को आसमान कम पड़ने नहीं देती.

  1. मुक्काबाज़
'मुक्काबाज़कोई 'स्पोर्ट्सफिल्म नहीं हैजो खिलाड़ियों की जीत का रोमांच बेचने में यकीन रखती होपर जितनी देर भी परदे पर खेलों-खिलाड़ियों और उनके इर्द-गिर्द जाल की तरह फैले राजनीति के बारे में बोलती हैअसल स्पोर्ट्स फिल्म ही लगती है. यूँ तो फिल्म में बॉक्सर श्रवण हैं, 'मुक्काबाज़में सबसे जोरदार घूंसे और मुक्के अनुराग कश्यप की तरफ से ही आते हैं. कभी तीख़े व्यंग्य की शक्ल मेंतो कभी मज़ेदार संवादों के ज़रिये.

  1. मुल्क
अनुभव सिन्हा की मुल्क’ देश में बढ़ते धार्मिक उन्मादसाम्प्रदायिकता और आम जन के मन में पल-बढ़ रहे पूर्वाग्रहोंकुतार्किक अवधारणाओं और आपसी भेदभाव को कटघरे में खड़े करते हुएकुछ बेहद जरूरी और कड़े सवाल सामने रखती है. हालाँकि अपनी बनावट में फिल्म थोड़ी पुराने ज़माने और ढर्रे की जरूर जान पड़ती हैपर मुल्क’ अपनी बात जोरदार तरीके से कहने में ना ही कमज़ोर पड़ती हैना ही डरती-सहमती है.

  1. अन्धाधुन
सरकारी बस स्टेशनों और रेलवे प्लेटफार्म पर सरकते ठेलों पर बिकने वाले सस्ते उपन्यासों की शकल याद हैजिनके मुख्यपृष्ठ हाथ से पेंट किये गये 80 के दशक के मसाला फिल्मों का पोस्टर ज्यादा लगते थेऔर हिंदी साहित्य का हिस्सा कमजिनकी कीमत रूपये में भले ही कम रही होकीमत के स्टीकर हिंदी में अनुवादित जेम्स हेडली चेज़ के साथ-साथ वेद प्रकाश शर्मा और सुरेन्द्र मोहन पाठक जैसे अपने मशहूर लेखकों के नामों से हमेशा बड़े दिखते थेआम जनता के सस्ते मनोरंजन के लिए ऐसे मसालेदार साहित्य अंग्रेज़ी में ‘पल्प फिक्शनऔर हिंदी में ‘लुगदी साहित्य’ के नाम से जाने जाते हैं. श्रीराम राघवन सिनेमाई तौर पर हिंदी की इसी ‘लुगदी’ को सिनेमा की उस धारा (फ्रेंच में NOIR या ‘नुआं’ के नाम से विख्यात) से जोड़ देते हैंजहां किरदार हर मोड़ पर स्वार्थी होकर किसी बड़े उद्देश्य के लिए अपनी भलमनसाहत गिरवी रखने को हमेशा तैयार मिलते हैं.


योग्य 10 फ़िल्में

  1. स्त्री
स्त्री’ एक ऐसी फिल्म हैजो आपको डराती भी हैहंसाती भी हैऔर ये सब करते हुए आपसे बात भी बहुत करती है. कुछ बेहद ख़ास बातेंफेमिनिज्म की बातेंजिन्हें सुनना और सुन कर समझना आपकी अपनी समझ के दायरे को परिभाषित करती हैं.

  1. बधाई हो
‘बधाई हो’ एक बेहद मनोरंजक पारिवारिक फिल्म हैजो कम से कम उस वक़्त तक तो आपको अपने माँ-बाप के बीच के रिश्तों को समझने की मोहलत देती हैजितने वक़्त तक आप परदे के सामने हैं. पति-पत्नी से माँ-बाप बनने तक के सफ़र में जिम्मेदारियों के बोझ तले दम तोड़ते अपने रोमांस को वापस जिलाना होया उनके गुपचुप रोमांस का जश्न मनाने की हिम्मत जुटानी हो‘बधाई होजवान बच्चों से लेकर बूढ़े माँ-बाप तक सबके लिए है!

  1. राज़ी
मेघना गुलज़ार की राज़ी अतिवादी देशप्रेम के फलते-फूलते-फैलते सिनेमाई फ़ॉर्मूले को कुछ इस मजबूती और ठोस तरीके से नकारने का बीड़ा उठाती है कि भारत-पाकिस्तान के बीच झूलती कहानी  होने के बावजूद परदे पर एक बार भी तिरंगे तक को किसी भी अनुपात में दिखाने की पहल नहीं करती. यहाँ तक कि वतन के आगे कुछ नहींखुद भी नहीं’ जैसे वजनी संवाद का ज़िक्र भी आपको तालियाँ पीटने के लिए उकसाता या बरगलाता नहींबल्कि आपको ज़ज्बाती तौर पर किरदारों को समझने और उनके जेहनी हाल-ओ-हालात से वाकिफ होने में ज्यादा मददगार साबित होता है.

  1. परी
डरावनी फिल्मों में अंधविश्वासलोक कथाओं और पुरानी मान्याताओं का बोलबाला रहता ही है. ऐसी फिल्मों मेंऐसी फिल्मों से तार्किक या वैज्ञानिक होने की उम्मीद करना अपने आप में एक भुलावे की स्थिति है. प्रोसित भी अपनी पहली फिल्म के तौर पे 'परी- नॉट अ फेयरीटेलमें दकियानूसी होने से परहेज़ नहीं करतेपर इस बार की कहानी सतही तौर पर दकियानूसी होने के बावजूदअपने आप में 'और भीबहुत कुछ कहने की गुंजाईश बाकी रखती है. 

  1. मंटो
‘मंटो’ हालिया दौर में एक बेहद जरूरी फिल्म हैजो कुछ ऐसे चुभते सवालों के साथ आपका ध्यान खींचती हैजिनका सीधा सीधा लगाव देशदेश में रहने वाले लोगोंउनकी आवाज़उनकी आज़ादी और साथ हीदेश और धर्म से जुड़े ढेर सारे कुचक्रों से है. सच्चाई क्यूँ न कही जाएजैसी की तैसीमंटो हिंदुस्तान-पाकिस्तानहिन्दू-मुसलमान और श्लील-अश्लील जैसे दायरों में कैद हो सकने वालों में से नहीं थे. इस फिल्म को भी ऐसे किसी भी दायरों से अलग कर के देखे जाने की जरूरत है.

  1. पटाखा
विशाल भारद्वाज की ‘पटाखा’ अपनी गंवई पृष्ठभूमिरोचक किरदारों और उनके बीच घटने वाली मजेदार घटनाओं के साथ हिंदी कहानी की चिर-परिचित शैली को परदे पर उकेरने की एक बेहद सफल कोशिश है. विशाल इससे पहले शेक्सपियर और रस्किन बॉन्ड के साहित्य को सिनेमाई रूप दे चुके हैं. इस बार भीजब वो दर्शकों के लिये चरण सिंह पथिक की एक छोटी कहानी ‘दो बहनें’ को चुनते हैंमनोरंजन की कसौटी पर कोई चूक नहीं करते.

  1. ओमार्ता
हम अल्लाह के बन्दे हैं’, ‘अल्लाह हमारे साथ है’, जैसे घिसे-पिटे संवादों से भरे दो-चार मौलानाओं की दकियानूसी और फ़िल्मी बर्गालाहट भरे दृश्यों को नज़रंदाज़ कर देंतो किसी आतंकवादी की एकलौती बायोपिक होने के साथ-साथ ओमार्ता’ एक जरूरी और बेहद मुश्किल फिल्म हैदेखने के लिए भी और बनाने के तौर पर भी. फिल्म किसी तरह का कोई सन्देश देने की या फिर एक मुकम्मल अंत देने की जिद से बचती हैइसलिए और भी सच्ची लगती है.

  1. मनमर्ज़ियाँ
सिमरनें अब राज से ‘शादी से पहले वो नहीं’ का वादा नहीं लेतींराज ‘हिन्दुस्तानी लड़की की इज्ज़त क्या होती है’ जानने का दम नहीं भरता. जबरदस्ती शादी के लिए माँ-बापपरिवार की दुहाई देने पर लड़की भावुक होकर चुपचाप मेहंदी की डिज़ाइन पसंद करने नहीं बैठ जाती. मंडप तक जाने का फैसला अब सिर्फ उसका हैचाहे ऐसा करते उसकी अपने साथ हीअपने अन्दर ही कितनी ज़ज्बाती लड़ाई क्यूँ न चल रही होसमाज का रवैया भले नहीं बदल रहा होकिरदार चुपके चुपके ही सहीबदल रहे हैं. उनकी कहानियाँ बदल रही हैं. और ‘मनमर्ज़ियाँ’ के साथ अनुराग कश्यप भी.

  1. रेड
‘रेड एक बेहद कसी हुई फिल्म है, तकनीकी तौर पर भी और अभिनय की नज़र से भी. महज़ दो घंटे की फिल्म में, बंधी-बंधाई लोकेशन परबिना किसी तड़क-भड़क वाले ड्रामा केलगातार मनोरंजक बने रहनावो भी ऐसे कथानक के साथ जो किसी को भी आसानी से नाराज़ या अपमानित न करता होअपने आप में ही सफल होने के काफी आयाम छू लेता है. ये फिल्म सबूत है कि सौरभ शुक्ला कितने काबिल अदाकार हैं...और अजय देवगन कितने अच्छे हो सकते हैंअगर गोलमाल जैसी फिल्मों के प्रभाव से दूर रह पाने का लोभ-संवरण कर पायें तो.  

  1. लैला मजनू

बॉलीवुड ने एक अरसे तक लैलाओं को बार-गर्ल’ और आइटम-गर्ल’ बना रख छोड़ा थासमाज और सरकारों ने मजनुओं को वैसे ही बदनाम कर रखा हैऐसे में साजिद अली की लैला मजनू’ मुकम्मल तौर पर प्रेम-कहानियों की गिरती साख को ऊपर उठाती है. नाकाम इश्क़ग़मगीन अंजाम और जूनूनी आशिक़ये कहानी पुरानी ही सहीआज भी उतनी ही असर रखती हैबशर्ते आप दिली तौर पर तैयार हों.



सबसे सफल 5

  1. वरुण धवन (अक्टूबर, सुई धागा)
अक्टूबर में वरुण को दानिश बनते देखना बेहद सुकून भरा है. यकीन मानिए, ‘जुड़वा 2’ की शिकायतें आपको याद भी नहीं आतीं. रंग बदलनाढंग बदलना और अपने किरदार में तह तक उतरते चले जानाताज्जुब नहींवरुण अभिनय-प्रयोगों में अपने समकालीन अभिनेताओं से काफी आगे निकल गये हैं.

  1. रणबीर कपूर (संजू)
संजू’ पूरी तरह रनबीर में ढली-रची-बसी फिल्म है. सोनम कपूर के साथ बाथरूम वाला दृश्य होया फिर परेश रावल के साथ इमोशनल सीन्सरनबीर संजय दत्त की तरह सिर्फ चलनेबोलने या दिखने से परे लगते हैं. परदे पर उनके होते हुए कुछ और देखने-सुनने की चाह भी नहीं रहती.

  1. आलिया भट्ट (राज़ी)
राज़ी’ की सफलता में आलिया भट्ट की बाकमाल अदाकारी की हिस्सेदारी काफी बड़ी है. लिंगभेद के चक्कर में न पड़ेंतो फिल्म का नायक वहीँ हैं. महज़ 25 साल की उमर में इस तरह का परिपक्व अभिनय बेहद कम अभिनेताओं के हिस्से आया होगा. ये उनके किरदार की मासूमियत और उनके खुद के बारीक अभिनय का नतीजा ही है कि आप दर्शक के तौर परखुफ़िया गतिविधियों में हर वक़्त उनकी सलामती के लिए फिक्रमंद महसूस करते हैं.

  1. आयुष्मान खुराना (अंधाधुन, बधाई हो)
‘अन्धाधुन’ आयुष्मान की सबसे मुश्किल फिल्म है. कलाकार के तौर पर उनकी मेहनत और शिद्दत साफ़ नज़र आती है. फिल्म की कहानी में छलावे कितने भी होंपियानो पर उनकी उंगलियाँ पूरी सटीक गिरतीउठतीफ़िसलती हैं. कुछ न देख पाने और कुछ न देख पाने को जताने की कोशिश में उनकी क़ाबलियत निखर कर सामने आती है.

  1. राजकुमार राव (ओमार्ता, स्त्री)

ओमार्ता’ राजकुमार राव के कद्दावर अभिनय में एक और तमगा है. जिस ख़ामोशी और ठहराव से वो उमर के किरदार में दाखिल होते हैंऔर फिर वक़्त-बेवक्त उसके गुस्सेउसकी सनक और उसकी नफरत को बराबर मात्रा में नाप-जोख के परदे पर निकालते हैंदेखने लायक है.



सबसे चहेते 15 अदाकार 

  1. गजराज राव (बधाई हो)
  2. विनीत कुमार सिंह (मुक्काबाज़)
  3. नीना गुप्ता (बधाई हो)
  4. रजत कपूर (परी)
  5. नारी सिंह (कालाकांडी)
  6. जिम सरभ (पद्मावत)
  7. जयदीप अहलावत (राज़ी)
  8. सौरभ शुक्ला (रेड)
  9. प्रियांशु पेन्यूली (भावेश जोशी सुपरहीरो)
  10. विक्की कौशल (संजू, मनमर्ज़ियाँ)
  11. पंकज त्रिपाठी (स्त्री)
  12. अविनाश तिवारी (लैला मजनू)
  13. राधिका मदान (पटाखा)
  14. गीतांजलि राव (अक्टूबर)
  15. यामिनी दास (सुई धागा)

Friday, 21 September 2018

मंटो: तीखे सवाल, जरूरी फिल्म! [3.5/5]


सआदत हसन मंटो उर्दू अदब के सबसे सनसनीखेज अफसाना-निगार (लेखक) तो पहले से ही माने जाते रहे हैं, इधर कुछेक दशकों से उनकी शोहरत नयी पीढ़ी के पढ़ने-लिखने वालों में ख़ासी बढ़ी है. मंटों की जिंदगी पर बनी नंदिता दास की ताज़ातरीन फिल्म ‘मंटो देखते वक़्त, सिनेमाहॉल में मेरे ठीक पीछे एक महीन आवाज़ उभरती है, “ओह, आई लव मंटो.” मुझे नहीं पता, सासाब (उनकी बीवी सफिया उन्हें फिल्म में अक्सर इसी नाम से पुकारती हैं) के लिये इन मोहतरमा के इस ‘क्रेज की ज़मीन क्या है? असल जिंदगी में उनके बाग़ी तेवर, दुनिया को लेकर उनका अक्खड़ रवैया या फिर उनकी कहानियों में गाढ़े सच्चाई की डरावनी शक्ल? या कुछ और? खैर! वजह जो कुछ भी हो, मंटो की अहमियत जेहनी तौर पर आज भी उतनी ही पुख्ता है, जितनी तब, जबके वो खुद जिस्मानी तौर पर दुनिया में, दुनिया भर से लड़ने-भिड़ने को मौजूद रहे थे.

कम पैसे देकर कॉलम छापने वाला प्रिंटिंग-प्रेस का मालिक मंटो (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) को मशवरा दे रहा है, “घर जाईये, लिख कर कल ले आईयेगा.” मंटो बोतल से शराब गले में गटकते हुए फरमाते हैं, “20 रूपये के लिए मैं तुम्हारे दफ्तर के दो चक्कर लगाऊँगा?” जबान की हद साफगोई और तेवर में तलवार की धार लिए मंटो दोस्तों के बीच बैठे-बैठे साफ़ कर देते हैं, “अगर मेरे अफसाने आपको बर्दाश्त नहीं, तो फिर ये दुनिया ही नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है”. मंटो से रूबरू कराने के लिए नंदिता उनकी जिंदगी का एक छोटा सा हिस्सा ही परदे पर जिंदा करती हैं. आज़ादी से कुछेक साल पहले की बम्बई, और आजादी के ठीक बाद का लाहौर. पहला हिस्सा वो दौर है, जब कहानी लिखने वाले अपने किरदारों की तलाश में जिंदगी के अंधेरों से टकराने में मशरूफ़ रहते थे. कृशन चंदर और इस्मत चुगताई (राजश्री देशपांडे) के साथ बम्बई में कॉफ़ी पीते हुए मंटो इस्मत आपा के ‘लिहाफ़’ के आखिरी हिस्से को ‘मामूली होने के लिए कोस रहे हैं. फ़िल्मी पार्टियों में ख़ास दोस्त श्याम (ताहिर राज भसीन) के साथ व्हिस्की के पैग टकराते हुए मज़ाक में के. आसिफ से उनकी नयी फिल्म स्क्रिप्ट पर राय देने की फीस मांग रहे हैं. वहीँ जद्दन बाई (इला अरुण) बेटी नर्गिस के साथ महफ़िल की शान में, अशोक कुमार (भानू उदय) के कहने पर नज़्म सुना रही हैं.  

...मगर जल्द ही मंटो साब का उनके अपने शहर मुंबई से नाता टूटने वाला है. चारों तरफ बस ‘हिन्दू-मुसलमान’ और ‘हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का शोर है. सासाब दो-दो टोपियाँ आजकल अपने साथ रखने लगे हैं, हिन्दू की अलग, मुसलमान की अलग. ‘जब मज़हब दिलों से निकल कर सिर पर चढ़ जाए, तो कोई कुछ और करे भी तो क्या?’. लाहौर की गलियाँ तो और संकरी हैं. उनकी कहानियों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. उन्हें ‘अश्लील होने के इल्जामों से नवाज़ा जा रहा है. मंटो साब से लिखा नहीं जा रहा. लिखें तो भी क्या, खून-खराबा, क़त्ल-ओ-गैरत और इनके बीच घुटता इंसानियत का दम? शराब कम से कम शरीर तो गरम रखती है. एक कहानीकार के तौर अपनी जिम्मेदारियों और आस-पास की सड़ांध मारती दुनिया के दोगलेपन के बीच पिसते मंटो साब के तेवर मंद पड़ने लगे हैं, मगर कौन कह सकता था कि 70 साल बाद मंटो के सवाल आज भी उतने ही तीखे लगेंगे?  

नंदिता न सिर्फ 40 के दशक का बम्बई और लाहौर बड़ी ख़ूबसूरती से परदे पर रौशन करती हैं, बल्कि उतनी ही समझदारी से मंटो की असल जिंदगी और उनकी कुछ मशहूर कहानियों की दुनिया के बीच का फर्क मिटा देती हैं. ‘ठंडा गोश्त’, ‘खोल दो, ‘तोबा टेक सिंह’ और ‘दस रूपये जैसी कहानियों के बीच मंटो अपनी असल जिंदगी से चलते-चलते कुछ इस तरह दाखिल होते हैं, मानो उनकी भी जिंदगी उतना ही अफसाना हो, या फिर वो तमाम अफ़साने उन्हीं की जिंदगी के कुछ और सफहे. पाकिस्तान और भारत दोनों ही देशों में मंटो की ज़िन्दगी और उनकी कहानियों पर आधा दर्ज़न फिल्में बन चुकी हैं, पर नंदिता अपने ‘मंटो को जिस दिलचस्प और रोमांचक तरीके से परदे पर पेश करती हैं, हर दृश्य आपको बांधे रखने में कामयाब रहता है. इसमें कुछ हद तक नंदिता का वो प्रयोग भी शामिल है, जिसमें वो छोटे से छोटे किरदार के लिए भी जाने-पहचाने चेहरों का चुनाव करती हैं. यही वजह है कि फिल्म में आप जावेद अख्तर, दिव्या दत्ता, चन्दन रॉय सान्याल, तिलोत्तमा शोम, पूरब कोहली, रनवीर शौरी, नीरज कबी, परेश रावल, गुरदास मान, ऋषि कपूर, इला अरुण, विनोद नागपाल, शशांक अरोरा जैसे दर्जन भर कलाकारों को देख कर चौंक जाते हैं.

‘मंटो में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी अपने उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में हैं, जहां उनकी मौजूदगी किरदार पर हर पल हावी होती दिखाई देती है. उनके मंटो को याद करते वक़्त शायद आप के ज़ेहन में जो चेहरा उभरे, वो सिद्दीकी की पिछली फिल्मों के किरदारों के इर्द-गिर्द ही हो, पर इसका ये मतलब नहीं निकला जाना चाहिए कि उनसे ‘मंटो’ करते वक़्त किसी तरह की कोई गुंजाइश बाकी रह जाती है. फिल्म के आखिरी हिस्सों में वो थोड़ा उंचाई तक जाते ज़रूर हैं, पर मंजिल दूर ही रह जाती है. स्वेत/श्याम फिल्मों के मशहूर अदाकार सुन्दर श्याम के किरदार में ताहिर परदे पर अपना करिश्मा ख़ूब बिखेरते हैं. रसिका दुग्गल मंटो की पत्नी सफिया के किरदार में जान फूँक देती हैं. इस्मत चुगताई बनी राजश्री और अशोक कुमार बने भानू उदय पूरी तरह रोमांचित करते हैं.

आखिर में; ‘मंटो हालिया दौर में एक बेहद जरूरी फिल्म है, जो कुछ ऐसे चुभते सवालों के साथ आपका ध्यान खींचती है, जिनका सीधा सीधा लगाव देश, देश में रहने वाले लोगों, उनकी आवाज़, उनकी आज़ादी और साथ ही, देश और धर्म से जुड़े ढेर सारे कुचक्रों से है. सच्चाई क्यूँ न कही जाए, जैसी की तैसी? मंटो हिंदुस्तान-पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान और श्लील-अश्लील जैसे दायरों में कैद हो सकने वालों में से नहीं थे. इस फिल्म को भी ऐसे किसी भी दायरों से अलग कर के देखे जाने की जरूरत है. [3.5/5]