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Friday, 21 September 2018

मंटो: तीखे सवाल, जरूरी फिल्म! [3.5/5]


सआदत हसन मंटो उर्दू अदब के सबसे सनसनीखेज अफसाना-निगार (लेखक) तो पहले से ही माने जाते रहे हैं, इधर कुछेक दशकों से उनकी शोहरत नयी पीढ़ी के पढ़ने-लिखने वालों में ख़ासी बढ़ी है. मंटों की जिंदगी पर बनी नंदिता दास की ताज़ातरीन फिल्म ‘मंटो देखते वक़्त, सिनेमाहॉल में मेरे ठीक पीछे एक महीन आवाज़ उभरती है, “ओह, आई लव मंटो.” मुझे नहीं पता, सासाब (उनकी बीवी सफिया उन्हें फिल्म में अक्सर इसी नाम से पुकारती हैं) के लिये इन मोहतरमा के इस ‘क्रेज की ज़मीन क्या है? असल जिंदगी में उनके बाग़ी तेवर, दुनिया को लेकर उनका अक्खड़ रवैया या फिर उनकी कहानियों में गाढ़े सच्चाई की डरावनी शक्ल? या कुछ और? खैर! वजह जो कुछ भी हो, मंटो की अहमियत जेहनी तौर पर आज भी उतनी ही पुख्ता है, जितनी तब, जबके वो खुद जिस्मानी तौर पर दुनिया में, दुनिया भर से लड़ने-भिड़ने को मौजूद रहे थे.

कम पैसे देकर कॉलम छापने वाला प्रिंटिंग-प्रेस का मालिक मंटो (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) को मशवरा दे रहा है, “घर जाईये, लिख कर कल ले आईयेगा.” मंटो बोतल से शराब गले में गटकते हुए फरमाते हैं, “20 रूपये के लिए मैं तुम्हारे दफ्तर के दो चक्कर लगाऊँगा?” जबान की हद साफगोई और तेवर में तलवार की धार लिए मंटो दोस्तों के बीच बैठे-बैठे साफ़ कर देते हैं, “अगर मेरे अफसाने आपको बर्दाश्त नहीं, तो फिर ये दुनिया ही नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है”. मंटो से रूबरू कराने के लिए नंदिता उनकी जिंदगी का एक छोटा सा हिस्सा ही परदे पर जिंदा करती हैं. आज़ादी से कुछेक साल पहले की बम्बई, और आजादी के ठीक बाद का लाहौर. पहला हिस्सा वो दौर है, जब कहानी लिखने वाले अपने किरदारों की तलाश में जिंदगी के अंधेरों से टकराने में मशरूफ़ रहते थे. कृशन चंदर और इस्मत चुगताई (राजश्री देशपांडे) के साथ बम्बई में कॉफ़ी पीते हुए मंटो इस्मत आपा के ‘लिहाफ़’ के आखिरी हिस्से को ‘मामूली होने के लिए कोस रहे हैं. फ़िल्मी पार्टियों में ख़ास दोस्त श्याम (ताहिर राज भसीन) के साथ व्हिस्की के पैग टकराते हुए मज़ाक में के. आसिफ से उनकी नयी फिल्म स्क्रिप्ट पर राय देने की फीस मांग रहे हैं. वहीँ जद्दन बाई (इला अरुण) बेटी नर्गिस के साथ महफ़िल की शान में, अशोक कुमार (भानू उदय) के कहने पर नज़्म सुना रही हैं.  

...मगर जल्द ही मंटो साब का उनके अपने शहर मुंबई से नाता टूटने वाला है. चारों तरफ बस ‘हिन्दू-मुसलमान’ और ‘हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का शोर है. सासाब दो-दो टोपियाँ आजकल अपने साथ रखने लगे हैं, हिन्दू की अलग, मुसलमान की अलग. ‘जब मज़हब दिलों से निकल कर सिर पर चढ़ जाए, तो कोई कुछ और करे भी तो क्या?’. लाहौर की गलियाँ तो और संकरी हैं. उनकी कहानियों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. उन्हें ‘अश्लील होने के इल्जामों से नवाज़ा जा रहा है. मंटो साब से लिखा नहीं जा रहा. लिखें तो भी क्या, खून-खराबा, क़त्ल-ओ-गैरत और इनके बीच घुटता इंसानियत का दम? शराब कम से कम शरीर तो गरम रखती है. एक कहानीकार के तौर अपनी जिम्मेदारियों और आस-पास की सड़ांध मारती दुनिया के दोगलेपन के बीच पिसते मंटो साब के तेवर मंद पड़ने लगे हैं, मगर कौन कह सकता था कि 70 साल बाद मंटो के सवाल आज भी उतने ही तीखे लगेंगे?  

नंदिता न सिर्फ 40 के दशक का बम्बई और लाहौर बड़ी ख़ूबसूरती से परदे पर रौशन करती हैं, बल्कि उतनी ही समझदारी से मंटो की असल जिंदगी और उनकी कुछ मशहूर कहानियों की दुनिया के बीच का फर्क मिटा देती हैं. ‘ठंडा गोश्त’, ‘खोल दो, ‘तोबा टेक सिंह’ और ‘दस रूपये जैसी कहानियों के बीच मंटो अपनी असल जिंदगी से चलते-चलते कुछ इस तरह दाखिल होते हैं, मानो उनकी भी जिंदगी उतना ही अफसाना हो, या फिर वो तमाम अफ़साने उन्हीं की जिंदगी के कुछ और सफहे. पाकिस्तान और भारत दोनों ही देशों में मंटो की ज़िन्दगी और उनकी कहानियों पर आधा दर्ज़न फिल्में बन चुकी हैं, पर नंदिता अपने ‘मंटो को जिस दिलचस्प और रोमांचक तरीके से परदे पर पेश करती हैं, हर दृश्य आपको बांधे रखने में कामयाब रहता है. इसमें कुछ हद तक नंदिता का वो प्रयोग भी शामिल है, जिसमें वो छोटे से छोटे किरदार के लिए भी जाने-पहचाने चेहरों का चुनाव करती हैं. यही वजह है कि फिल्म में आप जावेद अख्तर, दिव्या दत्ता, चन्दन रॉय सान्याल, तिलोत्तमा शोम, पूरब कोहली, रनवीर शौरी, नीरज कबी, परेश रावल, गुरदास मान, ऋषि कपूर, इला अरुण, विनोद नागपाल, शशांक अरोरा जैसे दर्जन भर कलाकारों को देख कर चौंक जाते हैं.

‘मंटो में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी अपने उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में हैं, जहां उनकी मौजूदगी किरदार पर हर पल हावी होती दिखाई देती है. उनके मंटो को याद करते वक़्त शायद आप के ज़ेहन में जो चेहरा उभरे, वो सिद्दीकी की पिछली फिल्मों के किरदारों के इर्द-गिर्द ही हो, पर इसका ये मतलब नहीं निकला जाना चाहिए कि उनसे ‘मंटो’ करते वक़्त किसी तरह की कोई गुंजाइश बाकी रह जाती है. फिल्म के आखिरी हिस्सों में वो थोड़ा उंचाई तक जाते ज़रूर हैं, पर मंजिल दूर ही रह जाती है. स्वेत/श्याम फिल्मों के मशहूर अदाकार सुन्दर श्याम के किरदार में ताहिर परदे पर अपना करिश्मा ख़ूब बिखेरते हैं. रसिका दुग्गल मंटो की पत्नी सफिया के किरदार में जान फूँक देती हैं. इस्मत चुगताई बनी राजश्री और अशोक कुमार बने भानू उदय पूरी तरह रोमांचित करते हैं.

आखिर में; ‘मंटो हालिया दौर में एक बेहद जरूरी फिल्म है, जो कुछ ऐसे चुभते सवालों के साथ आपका ध्यान खींचती है, जिनका सीधा सीधा लगाव देश, देश में रहने वाले लोगों, उनकी आवाज़, उनकी आज़ादी और साथ ही, देश और धर्म से जुड़े ढेर सारे कुचक्रों से है. सच्चाई क्यूँ न कही जाए, जैसी की तैसी? मंटो हिंदुस्तान-पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान और श्लील-अश्लील जैसे दायरों में कैद हो सकने वालों में से नहीं थे. इस फिल्म को भी ऐसे किसी भी दायरों से अलग कर के देखे जाने की जरूरत है. [3.5/5]                      

Friday, 6 April 2018

ब्लैकमेल: ब्लैक कॉमेडी या ब्लैक ट्रेजेडी! [1.5/5]


“एक पति अपनी बीवी को सरप्राइज करने के लिए जल्दी घर पहुँच जाता है. बेडरूम में क्या देखता है कि उसकी पत्नी किसी और आदमी के साथ बिस्तर पे सो रही है. उसके बाद पता है, पति क्या करता है?”.... “पति उस आदमी को ब्लैकमेल करने लगता है”. अभिनय देव की ‘ब्लैकमेल’ में फिल्म का ये मजेदार प्लॉट गिन के तीन बार अलग-अलग मौकों पर सुनाया जाता है. फिल्म की शुरुआत में पहली बार जब नायक खुद इसे ज़ोक के तौर पर सुनाता है, उसके दोस्त को जानने में तनिक देर नहीं लगती कि वो अपनी ही बात कर रहा है. ‘ट्रेजेडी में कॉमेडी’ की एक अच्छी पहल, एक अच्छी उम्मीद यहाँ तक तो साफ दिखाई दे रही है, पर अंत तक आते-आते फिल्म का यही प्लॉट जब पूरी संजीदगी के साथ बयान के तौर पर पुलिस के सामने रखा जाता है, वर्दी वाला साहब बिफर पड़ता है, “क्या बी-ग्रेड फिल्म की कहानी सुना रहा है?” एक मुस्तैद दर्शक होने के नाते, आपका भी रुख और रवैय्या अब फिल्म को लेकर ऐसा ही कुछ बनने लगा है.

देव (इरफ़ान खान) की शादीशुदा जिंदगी परफेक्ट नहीं है. ऑफिस में देर रात तक रुक कर वक़्त काटता है, और फिर घर जाने से पहले किसी भी डेस्क से किसी भी लड़की की फोटो लेकर चुपचाप ऑफिस के बाथरूम में घुस जाता है. एक रात सरप्राइज देने के चक्कर में जब उसे पता चलता है कि उसकी बीवी रीना (कीर्ति कुल्हारी) का किसी अमीर आदमी रंजीत (अरुणोदय सिंह) से चक्कर चल रहा है, वो अपनी मुश्किलें मिटाने के लिए उसे ब्लैकमेल करने का प्लान बनाता है. आसान लगने वाला ये प्लान तब और पेचीदा हो जाता है, जब सब अपनी-अपनी जान बचाने और पैसों के लिए एक-दूसरे को ही ब्लैकमेल करने लगते हैं. पति प्रेमी को, प्रेमी पत्नी को, पत्नी पति को, पति के साथ काम करने वाली एक राजदार पति को, यहाँ तक कि एक डिटेक्टिव भी.        

ब्लैक कॉमेडी बता कर खुद को पेश करने वाली ‘ब्लैकमेल’ एक उबाऊ चक्करघिन्नी से कम नहीं लगती. कुछ ऐसे जैसे आपकी कार इंडिया गेट के गोल-गोल चक्कर काट रही है, और बाहर निकलने वाला सही ‘कट’ आपको मिल ही नहीं रहा. वरना जिस फिल्म में इरफ़ान खान जैसा समझदार, काबिल और खूबसूरत अदाकार फिल्म की हर कमी को अपने कंधे पर उठा कर दौड़ पूरी करने का माद्दा रखता हो, वहां अज़ब और अजीब किरदारों और कहानी में ढेर सारे बेवजह के घुमावदार मोड़ों की जरूरत ही क्या बचती है? ‘ब्लैकमेल’ एक चालाक फिल्म होने के बजाय, तिकड़मी होना ज्यादा पसंद करती है. इसीलिए टॉयलेट पेपर बनाने वाली कंपनी के मालिक के किरदार में ओमी वैद्य अपने वाहियात और उजड्ड प्रयोगों से आपको बोर करने के लिए बार-बार फिल्म की अच्छी-भली कहानी में सेंध लगाने आ जाते हैं. देव के दोस्त के किरदार में प्रद्युमन सिंह मल्ल तो इतनी झुंझलाहट पैदा करते हैं कि एक वक़्त के बाद उन्हें देखने तक का मन नहीं करता. यकीन ही नहीं होता, ‘तेरे बिन लादेन’ में इसी कलाकार ने कभी हँसते-हँसते लोटपोट भी किया था. शराब में डूबी दिव्या दत्ता और प्राइवेट डिटेक्टिव की भूमिका में गजराज राव थोड़े ठीक लगते हैं.

‘ब्लैकमेल’ अभिनय देव की अपनी ही फिल्म ‘डेल्ही बेली’ जैसा दिखने, लगने और बनने की कोशिश भर में ही दम तोड़ देती है. ब्लैक कॉमेडी के नाम पर एडल्ट लगना या एडल्ट लगने को ही ब्लैक कॉमेडी बना कर पेश करने में ‘ब्लैकमेल’ उलझी रहती है. देव अपनी पहचान छुपाने के लिए जब एक पेपर बैग का सहारा लेता है, ब्रांड एक लड़कियों के अंडरगारमेंट का है. नाकारा रंजीत जब भी अपने अमीर ससुर के सामने हाथ बांधे खड़ा होता है, डाइनिंग टेबल पर बैठी उसकी सास कभी संतरे छिल रही होती है, तो कभी अंडे. इशारा रंजीत के (?) की तरफ है. हालाँकि कुछेक दृश्य इनसे अलग और बेहतर भी हैं, जैसे फ्रिज में रखी लाश के सामने बैठ कर फ़ोन पर उसकी सलामती के बारे में बात करना, पर गिनती में बेहद कम.

आखिर में, अभिनय देव ‘ब्लैकमेल’ के जरिये एक ऐसी सुस्त और थकाऊ फिल्म सामने रखते हैं, जहां अतरंगी किरदारों को बेवजह फिल्म की सीधी-सपाट कहानी में शामिल किया जाता है, और फिर बड़ी सहूलियत से फिल्म से गंदगी की तरह उन्हें साफ़ करने के लिए एक के बाद एक खून-खराबे के जरिये हटा दिया जाता है. बेहतर होता, अगर फिल्म अपने मुख्य कलाकार इरफ़ान खान की अभिनय क्षमता पर ज्यादा भरोसा दिखा पाती! सैफ अली खान की भूमिका वाली ‘कालाकांडी’ अपनी कहानी में इससे कहीं बेहतर फिल्म कही जा सकती है, जबकि उसे भी यादगार फिल्म मान लेने की भूल कतई नहीं करनी चाहिए. [1.5/5]  

Friday, 25 August 2017

बाबूमोशाय बन्दूकबाज़ (A): गैंग्स ऑफ़ यूपी! [3/5]

देसी कट्टेबाज़ों की जो कच्ची-पक्की दुनिया हमने देखी-सुनी है, अनुराग कश्यप, तिग्मांशु धूलिया और विशाल भारद्वाज की फिल्मों के बदौलत ही है. उत्तर प्रदेश और बिहार की उबड़-खाबड़ ज़मीन में कुकुरमुत्ते की तरह उगते, राजनीतिक सत्ता के हाथों कठपुतली की तरह नाचते और अपराध को 'शक्ति' की सीढ़ी बनाकर बात-बात पर खून की होली खेलते किरदारों में 'नायक' खोजने का दम अब तक इन्हीं चंद फ़िल्मकारों ने दिखाया था. कुशान नंदी की 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' भी परदे पर इन तमाम फ़िल्मकारों और उनकी चर्चित फ़िल्मों का जश्न एक श्रद्धांजलि की तरह पूरी शिद्दत से मनाती है. किरदारों के तेवर, उनका रूखापन, उनकी बेख़ौफ़ ज़बान, कहानी में जिस्मानी प्यार, बेहयाई, बेवफ़ाई और वार-पलटवार की अंधाधुंध रफ़्तार के बीच 'डार्क ह्यूमर' का भरपूर इस्तेमाल; 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' वो सब कर गुजरती है जिसे आप 'गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर' जैसी फिल्मों में कभी दिल खोल कर, तो कभी दबी जुबान में ही सही, सराह चुके हैं. खून का रंग बस्स उतना गाढ़ा नहीं लगता, कहानी में गहरे जज़्बातों से कहीं ज्यादा 'इरादतन' दांव-पेंच ज्यादा नज़र आते हैं और फिल्म दर्शकों के बीच अपनी अलग पहचान बनाने की कोशिश भी नहीं करती. 

बाबू (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) मौत का 'पोस्टमैन' है. कभी दीदी (दिव्या दत्ता) तो कभी दूबे (अनिल जॉर्ज) से पैसे लेकर लोगों का क़त्ल करता है. हद दर्जे का मर्द आदमी है. बेगैरत और पक्का हरामी. फुलवा (बिदिता बाग़) के साथ उसकी आसान जिंदगी में थोड़ी हलचल तब होती है, जब अपने ही एक जबरदस्त फैन बांके (जतिन गोस्वामी) के साथ उसकी होड़ लगती है कि दिये गये 3 चेहरों में से कौन कितने ज्यादा मारेगा? बाबू के लिए उसकी इज्ज़त, उसका नाम दांव पर है जबकि बांके के लिए एक मौका, अपने आप को अपने गुरु की नज़र में काबिल साबित करने का. मगर इन सब में बहुत कुछ और भी है, जो प्याज के छिलकों की तरह धीरे-धीरे उतरता रहता है. 

गालियाँ देने में मर्दों को टक्कर देने वाली लोकल पॉलिटिशियन दीदी हो, या अपनी ही बीवी को दूसरे मर्द से तेल-मालिश करवाते देखने का रसिया दूबे; 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' रंगीन किरदारों से भरी पड़ी है. लोकल थाने का इंस्पेक्टर (भगवान तिवारी) बेटी की चाह में 6-7 बेटे पैदा कर चुका है. फ़ोन पर लोगों के नंबर गालियों के नाम से रखता है. बीच शूटआउट के बीच बीवी का फ़ोन लेना नहीं भूलता, और फ़ोन रखने से पहले 'आया, तो ले आऊँगा' कहना. इस एक किरदार में ही आपको इतनी रंगीनियत मिलती है, कि परदे पर हर बार आते ही आप चौकन्ने हो जाते हैं. फिल्म का 'डार्क ह्यूमर' गज़ब है. आखिर के एक सीन में, एक महिला किरदार बियाबान में अपनी मौत का इंतज़ार कर रही है, और घर पर उसका बूढ़ा ससुर उसे खोजते हुए चिल्ला रहा है, "कहाँ मर गयी?". 

नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी की अदाकारी और इस तरह की भूमिकाओं में उनकी पूरी पकड़ होने के अलावा, फिल्म अपनी ज़मीन से जुड़े रहने की कोशिश में उभर कर सामने आती है. मोटरसाइकिल पर एक पुलिसवाला आ रहा है, मगर पीछे बैठा हुआ. चलाने वाला एक 12-14 साल का लड़का है. बाबू जब 'काम' पर नहीं होता है, खेतों के बीचोंबीच बने अपने घर के बाहर-भीतर लुंगी और शर्ट में घूम रहा होता है. हालाँकि फिल्म पर 'गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर' की छाप इस कदर है कि हर वक़्त आप दोनों फिल्मों के दृश्य मिला कर देखने में ही उलझे रहते हैं. चाहे वो हाथापाई, गुत्थमगुत्थी के रीयलिस्टिक फाइट-सीन हों, या 'तार बिजली से पतले हमारे पिया' की तर्ज़ पर टिन के कनस्तर बजाते-गाते लोकगीत की बनावट.   

आखिर में; 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' लव, सेक्स और धोखा के तमाम प्रसंगों के बीच ठेठ मर्द किरदारों की कहानी में पैरवी भले ही करता हो, अंत तक आते-आते सशक्त और चालाक औरतें ही फिल्म पर हावी रहती हैं. इनमें से ज्यादातर किरदार और प्रसंग फिल्म की कहानी में रहस्य का विषय हैं, इसलिए यहाँ विस्तार से लिखना थोड़ी ज्यादती होगी. 'बाबूमोशाय बन्दूकबाज़' में बहुत कुछ मनोरंजक है, बहुत कुछ 'गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर' जैसा. हाँ, बेहतर होता अगर थोड़ी गहराई भी होती, और थोड़ी बहुत अलग 'अपने' जैसी. [3/5]     

Friday, 6 May 2016

ट्रैफिक: बैठे रहिये, बाजपेयी हैं ना! [3/5]

दिवंगत राजेश पिल्लै की मलयालम सुपरहिट थ्रिलर ‘ट्रैफिक’ का हिंदी रीमेक आपको थिएटर की कुर्सी से बांधे रखने के लिए गिने-चुने विकल्प ही सामने रखता है, जिनमें से एक तो है फिल्म की हद इमोशनल स्टोरीलाइन, और मनोज बाजपेयी का बेहद सटीक, संजीदा और समर्पित अभिनय. तकनीकी दृष्टि से फिल्म के कमज़ोर पल हों या कथानक को रोमांचक बनाये रखने के लिए नाटकीयता भरे उतार-चढ़ाव, मनोज बड़ी मुस्तैदी, ख़ामोशी और शिद्दत से ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे पूरी फिल्म को अकेले खींच ले जाते हैं. हालाँकि अच्छे और नामचीन अभिनेताओं की एक पूरी जमात आपको इस फिल्म का हिस्सा बनते दिखाई देती है, पर एक मनोज ही हैं जिनसे, जिनके अभिनय से और जिनकी कोशिशों से आप लगातार जुड़े रहते हैं...हमेशा!

सच्ची घटनाओं को आधार बना कर, ‘ट्रैफिक’ मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत एक ऐसी दिलचस्प और रोमांचक कहानी आप तक पहुंचाती है, जहां जिंदगी तमाम मुश्किलों और मायूसियों के बावज़ूद आखिर में जीत ही जाती है. कभी न हार मानने वाले इसी इंसानी जज़्बे को सलाम करती है ‘ट्रैफिक’! फिल्मस्टार देव कपूर (प्रोसेनजीत चटर्जी] की बेटी को पुणे में जल्द से जल्द हार्ट ट्रांसप्लांट की दरकार है. पता चला है कि मुंबई के एक अस्पताल में एक ऐसा ‘पॉसिबल डोनर’ है जिसके जिंदा रहने की उम्मीद अब लगभग दम तोड़ चुकी है. माँ-बाप (किटू गिडवानी और सचिन खेड़ेकर) अपने बेटे को ‘दी बेस्ट गुडबाई गिफ्ट’ देने का मन बना चुके हैं पर मुंबई से पुणे तक १६० किलोमीटर की दूरी को ढाई घंटे में पूरा करने का बीड़ा कौन उठाये? ट्रैफिक हवलदार रामदास गोडबोले (मनोज बाजपेयी) के लिए ये सिर्फ ड्यूटी बजाने का मौका नहीं है. मिशन पर जाने से पहले वो अपनी बीवी से कहता है, “पता नहीं कर पायेगा या नहीं, पर घूसखोर का लांछन लेके नहीं जीना”.

फिल्म पहले हिस्से में कई बार अपनी ढीली पकड़ और सुस्त निर्देशन से आपको निराश करती है, खास कर जब किरदार एक-एक कर आपके सामने बड़ी जल्दी-जल्दी में परोस दिए जाते हैं. फिल्म को तेज़ रफ़्तार देने के लिए, घटनाओं को घड़ी की टिक-टिक के बीच बाँट कर दिखाने का चलन भी बहुत घिसा पिटा लगता है. हालाँकि इंटरवल आपको हल्का सा असहज महसूस कराने में कामयाब होता है. दूसरे हिस्से में फिल्म जैसे एकाएक सोते हुए जग जाती है और बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ने लगती है, पर फिर ड्रामा के नाम पर जिस तरह के उतार-चढ़ाव शामिल होने लगते हैं, उनमें गढ़े होने की बू दूर से ही नज़र आने लगती है. ऐसा लगता है मानो जिंदगी की ये दौड़ अब कोई सस्ती सी विडियो गेम बन कर रह गई है, जहाँ मुश्किलें जानबूझ के हर मोड़ पे और बड़ी होती जा रही हैं. मलयालम फिल्मों में वैसे भी ये कोई नया चलन नहीं.

पियूष मिश्रा जैसे वजनी नामों के बाद भी ‘ट्रैफिक’ के संवाद उतने ही फीके और उबाऊ हैं, जितने उसके नामचीन कलाकारों के बंधे-बंधे बासी अभिनय. प्रोसेनजीत दा का किरदार जाने-अनजाने अनिल कपूर के इतना इर्द-गिर्द बुना गया है कि उससे बाहर उन्हें देख पाना मुश्किल हो जाता है. दिव्या दत्ता, किटू गिडवानी, जिम्मी शेरगिल, सचिन खेड़ेकरपरमब्रता चटर्जी  सभी को हम पहले भी इस खूंटे से बंधे देख चुके हैं. सब अपने घेरे अच्छी तरह पहचानते हैं और उसे तोड़ने की पहल से बचते नज़र आते हैं.

इतने सब के बाद भी, ‘ट्रैफिक’ अपने जिंदा जज़्बे, सच्ची कहानी के तमगे, कुछेक गिनती के ही सही सचमुच के रोमांचक पलों और मनोज बाजपेयी के मजबूत कन्धों के सहारे एक अच्छी फिल्म कहलाने की खुशकिस्मती हासिल कर लेती है. मनोज मिसाल हैं, संवाद अभिनय का एक अभिन्न अंग है, मात्र एक अभिन्न अंग...पूरे का पूरा अभिनय नहीं. देखिये, अगर उनके जरिये अभिनय के बाकी रंग भी देखने हों! देखिये, अगर एक थ्रिलर देखनी हो जिसमें दिल हो, एकदम जिंदा ‘धक-धक’ धड़कता हुआ! [3/5] 

Friday, 20 February 2015

BADLAPUR: Good is good, bad is better! [4/5]

Finally! The age-long standard formula for a successful Bollywood revenge film gets thrashed, whipped and slashed heartlessly by Sriram Raghavan’s dark, bold and gutsy BADLAPUR. The happy & happening world of our hero is shattered while the evil trying to execute one of his unlawful acts and now, the traumatized victim is all gritty to punish the doers. Sounds household? Well, it does but don’t go easy on this as the road ahead from here is anything taken before in Bollywood. BADLAPUR is unconventional, exceptional and incomparable in its league.

It’s been 15 years; Raghu [the unforeseen shades of charming Varun Dhawan] once your regular boy next door is obstinately trying his luck to stumble on one of the murderers of his family. The other partner in crime Liak [the show-stealer Nawazuddin Siddiqui] is already serving 20-year term. An NGO activist informs Raghu that Laik is dying of cancer and needs his forgiveness to taste the free air for the rest of his life. Raghu is unlike our heroes with heart and is even more focused than villains in our films used to be. He doesn’t blow up hideouts of the villain. He hammers on their mental stature. In one of the incontestable situations, he forces his opponent [Vinay Pathak] to let him sleep with his wife [Radhika Apte]. The wife is made producing fake sexual sounds behind the doors and the husband is seen dying in humiliation.

BADLAPUR is an enjoyable and inventive mix of such brutal humor with amusing action but the film gets a new dimension in the climax. The villain ticks off the hero for cold-bloodedly killing his partner. ‘You have gone mad. Go, see a doctor’ he suggests sympathetically. Film also raises the question that how far one would go for revenge? And what after it’s done? The other astounding subplot is the heartfelt romantic track between Laik and his sex-worker girlfriend Jhumli [Huma Qureshi]; where the lover loves to hear ‘dirty talks’ his flame masters in.    

Sriram Raghavan takes forward all the expectations his ‘EK HASINA THI’ and ‘JOHNNY GADDAR’ has built in cinema-lovers all over India. BADLAPUR too constantly keeps you on the edge of your seat with the riveting drama taking a new turn every time you blink your eyes. The rawness in characters and in the characteristics of the scene never misses the opportunity to surprise you. Watch out for the brilliantly visualized and set first static shot of the film. It’s your regular dull day in apparently uncrowded market and as a viewer; you really don’t see it coming.

BADLAPUR is a film celebrated most for its casting and worthy performances from every one listed. Yami Gautam looks ravishing and does succeed in making your heart bleed in those ‘not many’ scenes. Ashwini Kalsekar as the private detective leaves an impression she’s known for. Pratima Kannan is remarkably good so is Vinay Pathak. Radhika Apte plays it effectively while playing a convinced wife who can go any extend to save her husband. I have always maintained that Kumud Mishra is an eye-candy treat to see that something really sparkling in him. Huma continues to entice the screen with her mystical looks and presence. Divya Dutta is another talent who never fails.  And last but not the least, the Varun Dhawan-Nawazuddin duo! Where the balanced-than-ever-before Varun surprises with his new find scheming eyes and calculated smile, Nawaz takes your breath away with his gifted chameleon-like ability to throw on you an all new shade in his character one after the other.

To rest my case, Raghavan’s BADLAPUR is a smartly bricked film that blurs the line between your regular perception about good and bad, and does it so beautifully you find yourself in a tight spot as which side you are and which side you should be at the end of day. Watch out for Nawazuddin’s deliciously evil performance and the unconventional route it dares to take! A must-watch!! [4/5] 

Sunday, 12 May 2013

GIPPI: A ‘coming of age’ teenage drama? not really-not entirely!!

When was the last time you saw a teenage girl, on the verge of attaining puberty, discussing the noticeable changes in physical appearance with a friend of same age...in a bold-intrepid manner, without being hesitant and apologetic about it at any minute?

I guess that never happened on Indian screen before…and solely for that very ‘I will talk what I feel’ attitude, Sonam Nair’s GIPPI is appreciative. But as they say in Bollywood, “a good start never ensures an equally better end”, GIPPI too falls short of expectations it creates in the very beginning.

Fat, clumsy, chubby, not-so-presentable but fun-loving, goodhearted, charming girl of 14 lives in a close bunch of friends like her (insultingly being called as losers by a green-tea addicted, hot body, heavily accented fellow student) and in an even predictably dreamy family of her single mother & an irritating younger brother, having bigger issues than his waist size.

Film constantly & comfortably comes up with a plenty of feel-good moments that bring smiles of your face but most of the times, not because of the situation but the lovely character GIPPI represents. The problem lies in the writing that becomes too convenient, predictable and dramatically regular at places.

To conclude, GIPPI is a sugar-coated, candy floss kind of effort that forcibly tries to overcome its flaws in order to be a ‘coming of age’ teenage drama. Watch out for the amazingly fresh presence of GIPPI on the screen and her warm-funny-inviting chemistry with the mother (Divya Dutta in her regular avatar) but sadly it's not good enough to make you fall in love for long. Do it one more time, I say. **[2/5]