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Friday, 21 September 2018

मंटो: तीखे सवाल, जरूरी फिल्म! [3.5/5]


सआदत हसन मंटो उर्दू अदब के सबसे सनसनीखेज अफसाना-निगार (लेखक) तो पहले से ही माने जाते रहे हैं, इधर कुछेक दशकों से उनकी शोहरत नयी पीढ़ी के पढ़ने-लिखने वालों में ख़ासी बढ़ी है. मंटों की जिंदगी पर बनी नंदिता दास की ताज़ातरीन फिल्म ‘मंटो देखते वक़्त, सिनेमाहॉल में मेरे ठीक पीछे एक महीन आवाज़ उभरती है, “ओह, आई लव मंटो.” मुझे नहीं पता, सासाब (उनकी बीवी सफिया उन्हें फिल्म में अक्सर इसी नाम से पुकारती हैं) के लिये इन मोहतरमा के इस ‘क्रेज की ज़मीन क्या है? असल जिंदगी में उनके बाग़ी तेवर, दुनिया को लेकर उनका अक्खड़ रवैया या फिर उनकी कहानियों में गाढ़े सच्चाई की डरावनी शक्ल? या कुछ और? खैर! वजह जो कुछ भी हो, मंटो की अहमियत जेहनी तौर पर आज भी उतनी ही पुख्ता है, जितनी तब, जबके वो खुद जिस्मानी तौर पर दुनिया में, दुनिया भर से लड़ने-भिड़ने को मौजूद रहे थे.

कम पैसे देकर कॉलम छापने वाला प्रिंटिंग-प्रेस का मालिक मंटो (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) को मशवरा दे रहा है, “घर जाईये, लिख कर कल ले आईयेगा.” मंटो बोतल से शराब गले में गटकते हुए फरमाते हैं, “20 रूपये के लिए मैं तुम्हारे दफ्तर के दो चक्कर लगाऊँगा?” जबान की हद साफगोई और तेवर में तलवार की धार लिए मंटो दोस्तों के बीच बैठे-बैठे साफ़ कर देते हैं, “अगर मेरे अफसाने आपको बर्दाश्त नहीं, तो फिर ये दुनिया ही नाक़ाबिल-ए-बर्दाश्त है”. मंटो से रूबरू कराने के लिए नंदिता उनकी जिंदगी का एक छोटा सा हिस्सा ही परदे पर जिंदा करती हैं. आज़ादी से कुछेक साल पहले की बम्बई, और आजादी के ठीक बाद का लाहौर. पहला हिस्सा वो दौर है, जब कहानी लिखने वाले अपने किरदारों की तलाश में जिंदगी के अंधेरों से टकराने में मशरूफ़ रहते थे. कृशन चंदर और इस्मत चुगताई (राजश्री देशपांडे) के साथ बम्बई में कॉफ़ी पीते हुए मंटो इस्मत आपा के ‘लिहाफ़’ के आखिरी हिस्से को ‘मामूली होने के लिए कोस रहे हैं. फ़िल्मी पार्टियों में ख़ास दोस्त श्याम (ताहिर राज भसीन) के साथ व्हिस्की के पैग टकराते हुए मज़ाक में के. आसिफ से उनकी नयी फिल्म स्क्रिप्ट पर राय देने की फीस मांग रहे हैं. वहीँ जद्दन बाई (इला अरुण) बेटी नर्गिस के साथ महफ़िल की शान में, अशोक कुमार (भानू उदय) के कहने पर नज़्म सुना रही हैं.  

...मगर जल्द ही मंटो साब का उनके अपने शहर मुंबई से नाता टूटने वाला है. चारों तरफ बस ‘हिन्दू-मुसलमान’ और ‘हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का शोर है. सासाब दो-दो टोपियाँ आजकल अपने साथ रखने लगे हैं, हिन्दू की अलग, मुसलमान की अलग. ‘जब मज़हब दिलों से निकल कर सिर पर चढ़ जाए, तो कोई कुछ और करे भी तो क्या?’. लाहौर की गलियाँ तो और संकरी हैं. उनकी कहानियों को कटघरे में खड़ा किया जा रहा है. उन्हें ‘अश्लील होने के इल्जामों से नवाज़ा जा रहा है. मंटो साब से लिखा नहीं जा रहा. लिखें तो भी क्या, खून-खराबा, क़त्ल-ओ-गैरत और इनके बीच घुटता इंसानियत का दम? शराब कम से कम शरीर तो गरम रखती है. एक कहानीकार के तौर अपनी जिम्मेदारियों और आस-पास की सड़ांध मारती दुनिया के दोगलेपन के बीच पिसते मंटो साब के तेवर मंद पड़ने लगे हैं, मगर कौन कह सकता था कि 70 साल बाद मंटो के सवाल आज भी उतने ही तीखे लगेंगे?  

नंदिता न सिर्फ 40 के दशक का बम्बई और लाहौर बड़ी ख़ूबसूरती से परदे पर रौशन करती हैं, बल्कि उतनी ही समझदारी से मंटो की असल जिंदगी और उनकी कुछ मशहूर कहानियों की दुनिया के बीच का फर्क मिटा देती हैं. ‘ठंडा गोश्त’, ‘खोल दो, ‘तोबा टेक सिंह’ और ‘दस रूपये जैसी कहानियों के बीच मंटो अपनी असल जिंदगी से चलते-चलते कुछ इस तरह दाखिल होते हैं, मानो उनकी भी जिंदगी उतना ही अफसाना हो, या फिर वो तमाम अफ़साने उन्हीं की जिंदगी के कुछ और सफहे. पाकिस्तान और भारत दोनों ही देशों में मंटो की ज़िन्दगी और उनकी कहानियों पर आधा दर्ज़न फिल्में बन चुकी हैं, पर नंदिता अपने ‘मंटो को जिस दिलचस्प और रोमांचक तरीके से परदे पर पेश करती हैं, हर दृश्य आपको बांधे रखने में कामयाब रहता है. इसमें कुछ हद तक नंदिता का वो प्रयोग भी शामिल है, जिसमें वो छोटे से छोटे किरदार के लिए भी जाने-पहचाने चेहरों का चुनाव करती हैं. यही वजह है कि फिल्म में आप जावेद अख्तर, दिव्या दत्ता, चन्दन रॉय सान्याल, तिलोत्तमा शोम, पूरब कोहली, रनवीर शौरी, नीरज कबी, परेश रावल, गुरदास मान, ऋषि कपूर, इला अरुण, विनोद नागपाल, शशांक अरोरा जैसे दर्जन भर कलाकारों को देख कर चौंक जाते हैं.

‘मंटो में नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी अपने उसी जाने-पहचाने अंदाज़ में हैं, जहां उनकी मौजूदगी किरदार पर हर पल हावी होती दिखाई देती है. उनके मंटो को याद करते वक़्त शायद आप के ज़ेहन में जो चेहरा उभरे, वो सिद्दीकी की पिछली फिल्मों के किरदारों के इर्द-गिर्द ही हो, पर इसका ये मतलब नहीं निकला जाना चाहिए कि उनसे ‘मंटो’ करते वक़्त किसी तरह की कोई गुंजाइश बाकी रह जाती है. फिल्म के आखिरी हिस्सों में वो थोड़ा उंचाई तक जाते ज़रूर हैं, पर मंजिल दूर ही रह जाती है. स्वेत/श्याम फिल्मों के मशहूर अदाकार सुन्दर श्याम के किरदार में ताहिर परदे पर अपना करिश्मा ख़ूब बिखेरते हैं. रसिका दुग्गल मंटो की पत्नी सफिया के किरदार में जान फूँक देती हैं. इस्मत चुगताई बनी राजश्री और अशोक कुमार बने भानू उदय पूरी तरह रोमांचित करते हैं.

आखिर में; ‘मंटो हालिया दौर में एक बेहद जरूरी फिल्म है, जो कुछ ऐसे चुभते सवालों के साथ आपका ध्यान खींचती है, जिनका सीधा सीधा लगाव देश, देश में रहने वाले लोगों, उनकी आवाज़, उनकी आज़ादी और साथ ही, देश और धर्म से जुड़े ढेर सारे कुचक्रों से है. सच्चाई क्यूँ न कही जाए, जैसी की तैसी? मंटो हिंदुस्तान-पाकिस्तान, हिन्दू-मुसलमान और श्लील-अश्लील जैसे दायरों में कैद हो सकने वालों में से नहीं थे. इस फिल्म को भी ऐसे किसी भी दायरों से अलग कर के देखे जाने की जरूरत है. [3.5/5]                      

Friday, 23 March 2018

हिचकी: रानी पास, फिल्म फ़ेल! [2/5]


यशराज फिल्म्स की ‘हिचकी’ में रानी मुखर्जी एक ऐसे टीचर के किरदार में परदे पर वापसी कर रही हैं, जो टूरेट्स’ सिंड्रोम (tourette’s syndrome) से जूझ रही है. उसके ही शब्दों में समझने की कोशिश करें तो जब दिमाग के कई सारे तार आपस में एक साथ नहीं जुड़ते, तो बिजली के झटकों जैसे लगते रहते हैं. रानी के किरदार की तकलीफ के प्रति संवेदनशील या असंवेदनशील होने की शर्त से परे होकर भी देखें, तो उसकी इस ख़ास हिचकी से ज्यादातर वक़्त आपके चेहरे पर मुस्कराहट ही फैलती है, और यकीन जानिये रानी का काबिल अभिनय फिल्म के ख़तम होने के बाद, आपसे उनके उस ख़ास हाव-भाव की नक़ल आपसे बरबस करा ही लेगा. हालाँकि फिल्म में कई बार दूसरे किरदारों से आप सुनते रहते हैं कि कैसे नैना माथुर (रानी मुखर्जी) ने सबको टूरेट्स’ सिंड्रोम के बारे में बता कर कुछ नया सिखाया है, पर जाने-अनजाने शायद फिल्म की सबसे बड़ी कामयाबी असल में भी यही है.

नैना अकेली नहीं है, जो किसी तरह के सिंड्रोम या डिसऑर्डर से जूझ रही है. पढ़ाने के लिए उसे मिली क्लास गरीब बस्ती के बाग़ी, बिगडैल और बदतमीज़ बच्चों की है, जिनके लिए गरीबी, अशिक्षा और मुख्यधारा का तिरस्कार ही सबसे बड़ा सिंड्रोम है, और बाकी स्कूल के लिए उनकी अपनी छोटी सोच. नैना इन सबसे अकेली लड़ रही है. कामयाब भी रहती है, पर फिल्म को जिस सिंड्रोम के हाथों नहीं बचा पाती, वो है ‘वाई आर ऍफ़ (YRF) सिंड्रोम’. ‘चक दे! इंडिया’ की सफलता के बाद यशराज फिल्म्स ने एक बार फिर उसी फार्मूले को अपनी चकाचक ‘हाई प्रोडक्शन-वैल्यू’ वाली प्रयोगशाला में दोहराने की कोशिश की है. एक काबिल लीडर, जिसे दुनिया के सामने अपनी पहचान बनानी है; एक नाकारा टीम जिसे कोई हाथ नहीं लगाना चाहता, एक मनबढ़-जिद्दी खिलाड़ी जो कभी भी खेल बिगाड़ सकता है, और एक मनचाहा अंत, जो सबको भला सा लगे. फार्मूला अचूक है, पर तभी तक जब तक सिंड्रोम अपना असर दिखाना शुरू नहीं करता.

नैना बस्तियों में अपनी क्लास के बच्चों के घर तलाश रही है. एक माँ पानी के लिए लम्बी लाइन में लगी है, पानी आते ही भगदड़ मच जाती है. नैना ने जैसे पहले ऐसा कुछ देखा ही नहीं हो. मीरा नायर की ‘सलाम बॉम्बे’ में भी नहीं, डैनी बॉयल की ‘स्लमडॉग मिलियनेयर’ में भी नहीं. उसके अन्दर के भाव ठीक वैसे ही नकली उबाल मारते हैं, जैसे सलमान खान ‘हम साथ-साथ हैं’ के एक दृश्य में महात्मा गाँधी के सद्विचार दोहराते हुए. अगले दृश्यों में, नैना बच्चों को साइकिल पंचर बनाते देख, गैराज में काम करते देख और सब्जी के ठेले पर ‘मुझे कटहल क्या होता है, नहीं पता?’ बोलते हुए भी ऐसे ही कुछ भाव परदे पर उछालती है. मुंबई के सबसे प्रतिष्ठित स्कूलों में शामिल, इस स्कूल के इस ख़ास एक क्लास के बच्चे शराब पीते हैं और जुआ खेलते हैं. खुलेआम. देश में एजुकेशन की हालत इस से भी बदतर है. फिल्म कहीं-कहीं भूल से उसकी बात भी कर ही डालती है, मगर ये ‘वाई आर ऍफ़ (YRF) सिंड्रोम’ है, जिसमें बदरंग दीवाल भी ‘प्लास्टिक कोटेड’ होती है और गरीबी भी ‘सुगर-कोटेड’.  

रानी मुखर्जी की ‘मर्दानी’ तकरीबन 4 साल पहले आई थी, इसलिए ‘हिचकी’ को उनकी वापसी के तौर पर देखे जाने की जरूरत नहीं है. हाँ, फिल्म में उनकी भारी-भरकम मौजूदगी और उनके किरदार में इस तरीके का नयापन रटे-रटाये फार्मूले पर गढ़ी गयी औसत कहानी में भी काफी हद तक जान फूँक देता है. रानी का जोश, उनके चेहरे की चमक और अदाकारी में उनकी बारीकियां जता देती है कि उन्हें परदे से दूर रखना सिनेमा और उनके खुद के लिए कितना मुश्किल और गलत निर्णय है. नीरज कबी एक ऐसे टीचर की भूमिका में, जिसे बस्ती के बच्चों की क्लास से बेहद चिढ़ और नफरत है, एकदम सटीक हैं. बच्चों के किरदारों में नए कलाकारों की खेप पूरी तरह सक्षम दिखाई देती है. अच्छा होता, अगर कहानी का सुस्त लेखन उन्हें ‘टाइपकास्ट’ करने से बचता. सचिन और सुप्रिया पिलगांवकर बस होने भर की शर्त पूरी करते नज़र आते हैं.

आखिर में; ‘हिचकी’ रानी मुखर्जी की फिल्म के तौर पर देखी जानी चाहिए. हालाँकि, फिल्म एक वक़्त के बाद उनके किरदार की हिचकी से कहीं ज्यादा क्लास और क्लास के बच्चों की हिचकियों में हिचकोले खाने लगती है. [2/5]         

Thursday, 1 October 2015

तलवार : साल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक ! [4.5/5]

सबूतों, गवाहों और उनके बयानों के मद्देनजर सच को तलाशने की जुगत में अपनी भावनाओं को अलग रख कर एक तटस्थ माध्यम बने रहना बहुत ही मुश्किल है. हम जो देखना चाहते हैं, जो सुनना चाहते हैं और जो मानना चाहते हैं, उसी के इर्द-गिर्द सच्चाई की परिकल्पना तैयार करने में लग जाते हैं. हैरत की बात नहीं, जब एक ही घटना से जुड़े तमाम लोगों का सच एक-दूसरे से एकदम अलग दिखाई और सुनाई देने लगते हैं. मेघना गुलज़ार की ‘तलवार’ हमारी पुलिस, कानून और न्याय व्यवस्था पर एक ऐसा तंज है, जो अपनी बात रखने के लिए सनसनीखेज तरीकों का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करती और सच्चाई के करीब रहने की एक भरपूर और कामयाब कोशिश करती है. सच्ची और रोमांचक आपराधिक कहानियों पर आपने बहुत सी फिल्में देखीं होंगी, अच्छी भी, बुरी भी पर ‘तलवार’ जिस ख़ामोशी और ईमानदारी से आपको डराने, सचेत करने और गुस्सा दिलाने में सक्षम साबित होती है, कोई और फिल्म उस ऊंचाई तक पहुँचने का साहस ही नहीं कर पाती.

नोएडा, उत्तर प्रदेश में आरुषि हत्याकांड के घटनाक्रमों से प्रेरित, मेघना गुलज़ार की ‘तलवार’ बिना किसी की तरफदारी किये आपके सामने घटना का सिलसिलेवार ब्यौरा कुछ इस तरह रखती है, जैसे अकीरा कुरोसावा की फिल्म ‘रशोमोन’. जैसे-जैसे घटनाक्रम अपने तौर-तरीके, रंग-रूप और हाव-भाव  बदलती है, हमारा नजरिया, हमारी सोच, किरदारों के प्रति हमारी वफादारी भी उतनी ही तेज़ी से पलटती दिखाई देती है. पेशे से डॉक्टर, टंडन दम्पति [नीरज कबी और कोंकणा सेन] की 14-वर्षीया एकलौती बेटी की लाश उसके ही कमरे में मिली है. शुरूआती जांच में लापरवाह पुलिस का शक घर के नौकर पर जाता है, जिसकी गैरमौजूदगी ही उसके मुजरिम होने का सबूत मान लिया जाता है. पुलिस की हडबडाहट तब बढ़ जाती है जब नौकर की लाश दो दिन बाद उसी घर की छत पर मिलती है. आनन-फानन में पुलिस अपने अधकचरे सबूतों के बल पर डॉक्टर-दम्पति को ही एक प्रेस-कांफ्रेंस के जरिये अपराधी घोषित कर देती है. टीवी में न्यूज़ पैनल पर बैठे दिग्गजों और सामने बैठे हम ड्रामा-पसंद भारतीयों को वैसे भी हमेशा से ऐसा ही सच भाता रहा है जिसमें कुछ सनसनीखेज हो, और फिर इस खुलासे में तो आंतरिक सम्बन्धों, रिश्तों में कालापन और भावुकता से लबरेज मसालों की कोई कमी ही नहीं थी. बहरहाल, जांच का जिम्मा अब CDI [क्रिमिनल डिपार्टमेंट ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन] के पास है, जिसकी बागडोर काबिल ऑफिसर कुमार [इरफ़ान खान] संभाल रहे हैं.

‘तलवार’ एक ऐसी धारदार थ्रिलर फिल्म है जो आपके यकीन, आपकी समझ को हर वक़्त टटोलती और तौलती रहती है. हालाँकि पुलिस की बेपरवाह जांच वाले दृश्य मज़ेदार हैं, आपको हंसी भी आती है पर एक डर भी आपके जेहन को जकड़े रहता है कि जहां व्यवस्था इतनी लचर, लापरवाह और पूर्वाग्रहों से ग्रसित है वहाँ इन्साफ की उम्मीद करना कितना मुश्किल है. हत्या जैसे बड़े अपराधों में पुलिस जिस बेरुखी और बेदिली से काम करती दिखाई देती है, और फिर कानून व्यवस्था जिस बेरहमी से उसके नतीजों के साथ खिलवाड़ करती है, आप बेचैन हुए बिना रह नहीं पाते. लगातार बदलते गवाह, सबूतों की अनदेखी, जन-मानस की भावनाओं को संतुष्ट करने की कवायद और समाज की सोच को न्याय का मापदंड बनाते हमारे न्याय-मंदिर, इस फिल्म में बहुत कुछ है जो आपके दिल को काफी वक़्त तक कचोटता रहेगा.

इतने सब के बावजूद, फिल्म आपके मनोरंजन में कोई कमी नहीं छोडती. ब्लैक ह्यूमर के कुछ बहुत ही सधे हुए प्रयोग आपको इस फिल्म में देखने मिलेंगे. घर के एक कमरे से दूसरे कमरे तक आवाज़ पहुँचने-न पहुँचने की जांच परख में एक सहायक अधिकारी का लोकगीत गाना और फिल्म के बेहतरीन अंतिम क्षणों में पहली टीम का दूसरी जांच टीम के हास्यास्पद नतीजों की खिल्ली उड़ाना, फिल्म के बहुत सारे मजेदार दृश्यों में से कुछ ख़ास हैं. फिल्म के एक नाटकीय प्रसंग में, तब्बू का होना फिल्म को देखने की एक और वजह दे जाता है. तब्बू इरफ़ान की बीवी की भूमिका में हैं, जिनके रिश्ते में अब अगर कुछ बचा है तो बस तलाक, हालाँकि कोर्ट में दोनों के पास कोई भी वजह नहीं है. इन दोनों के रिश्ते में गुलज़ार साब की फिल्म ‘इजाज़त’ की झलक और मौजूदगी बड़ी ख़ूबसूरती से पिरोई गयी है.  अभिनय की कहें तो इरफ़ान अपनी भूमिका में पूरी तरह रचे-बसे दिखाई देते हैं. ये उनकी कुछ बेहद जटिल भूमिकाओं में से एक है, जहां उनके किरदार के जज़्बाती उतार-चढ़ाव उन्हें अभिनय के लिए काफी बड़ा कैनवास दे जाते हैं. नीरज कबी और कोंकणा सेन [खास तौर पर ‘अभी रोना भी है’ वाले सीन में] उम्दा हैं. सोहम शाह, गजराज राव, अतुल कुमार अपनी भूमिकाओं में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते.

अंत में; मेघना गुलज़ार की ‘तलवार’ एक बेहद कसी हुई, सुलझी, समझदार और बहुत बढ़िया फिल्म है. एक ऐसी फिल्म, जो सच को सनसनीखेज नहीं बनाती, फिर भी आप पर अपनी पकड़ कभी ढीली नहीं पड़ने देती. साल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक, और थ्रिलर फिल्मों में शायद सबसे ऊपर! न देखने की कोई वजह ही नहीं! [4.5/5] 

Friday, 3 April 2015

DETECTIVE BYOMKESH BAKSHY: Splendid, spectacular & mesmeric! [4/5]

A man goes missing. The detective offering help doesn’t even blink or think before giving out his verdict that it is a possible case of murder. His one of many simplistic theories draws even the son in suspicion. As a viewer, you don’t need much time to realize that he is not your usual ‘unrealistically intellectual’ beast like Sherlock Holmes and is not at all a detective but a detective in making. Dibakar Banerjee’s splendid-spectacular & mesmeric murder-mystery thriller DETECTIVE BYOMKESH BAKSHY! may not be able to flabbergast you with terrific twists and reckless revelations but then, it also never ceases to engage with enticing visuals, imaginatively authentic art-design to recreate the nostalgic period, acquisitive music score, brilliantly written characters and some really well-directed sequences for a cinematic treat.

It is Calcutta of 1940s. Japanese are constantly trying to snatch the control over the city from the British. Chinese drug mafia wants to make it a world drug capitol. The young ones are fighting for freedom. The ‘newborn in business’ Byomkesh Bakshy [Sushant Singh Rajput] is trying to prove his theory of missing man’s murder for his forced client Ajit [Anand Tiwari]. He is the same who joins Bakshy later as his sidekick or subordinate. The connecting threads lead him to a powerful politician, his sultry & seductive mistress [Swastika Mukherjee], an intimidating dentist-cum-Japanese tutor and a kind and obliging [Neeraj Kabi of ‘SHIP OF THESEUS’]. For the most parts, Bakshy is only seen finding links between two loose ends. For times, when we all are modified to watch razor-sharp detectives seeing it from miles and acting against it in an electric-speed; there is hardly anything in the plot you would describe as ‘extremely surprising’ but the ambiguity in the air never goes missing.

DETECTIVE BYOMKESH BAKSHY! is stylishly shot gorgeous looking film where everything you see is fabricated, but how aesthetically and inventively! This is the world nowhere close to what we have seen in Doordarshan’s Byomkesh Bakshy series. The case-to-be solved here also doesn’t have limitations of being just another family affair. Dibakar Banerjee takes it on a bigger canvas to make Bakshy’s first case the biggest of what we have seen before. His Calcutta is nothing but a painting with brilliant art-design powered with nostalgic posters on wall, ‘approaching vintage status’ ambassador cars, man-pulling rickshaws on streets and Bata leather shoes for instance. In one momentous shot, we see camera following Bakshy-Bakshy bumping into a stranger-camera following stranger-stranger bumping into the man following Bakshy and then again camera getting back on track to follow the man; all this exercise through the windows of an ambassador car. See it, and you won’t miss it.

With subtle and deadpan humor, film is a delightful watch. When at a drug-making company’s office, Bakshy jokes about him providing blood-sample that it is a must for every candidate before the job-interview, we see the whole lot of young candidates disappearing like a Jeannie. In another just after the blood-bathed climax, Ajit instructs his home-servant to make some tea as the police can visit the crime-scene anytime soon. Though Sushant looks very much in skin of the character, it’s the supporting cast that excels in the performance-sheet. Anand Tiwari as Ajit is a spot-on. Neeraj Kabi makes his act a balanced yet exceedingly outshining one. One more significant contribution one can’t ignore is the outstanding music score by Sneha Khanwalkar. My first move after the movie got over was to put the album on my playlist.

At the end, Dibakar’s DETECTIVE BYOMKESH BAKSHY! is like a strong and effective opium intake once taken you will sure get addicted to it, sooner or later. Expect the unexpected while watching it but don’t forget, even Bakshy is a man with many drawbacks. Don’t expect him to beat goons single-handedly. Watch it for being one of the most magnificent looking films of simple nature and nostalgic feel. [4/5]