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Friday, 26 May 2017

सचिन- अ बिलियन ड्रीम्स: 'फील्ड' से 'फिल्म' तक, एंटरटेनर नंबर 1 ! [3.5/5]

हर खेल का एक भगवान होता है. मुक्केबाजी में जैसे मुहम्मद अली, बास्केटबॉल में जैसे माइकल जॉर्डन. क्रिकेट में ये रुतबा सचिन तेंदुलकर को हासिल है. बावजूद इसके, ‘सचिन- अ बिलियन ड्रीम्स’ इस लिविंग लीजेंड को परदे पर ख़ुदा बनाकर पेश करने की भूल नहीं करती. बल्कि फिल्म की सारी कवायद सचिन की जिंदगी में एक ‘फैन’ होने की गरज से झाँकने की रहती है. एक ऐसी फिल्म, जिनमें सचिन एक आम खिलाड़ी की तरह बुलंदियों का सफ़र तय कर रहे होते हैं, या फिर अपने पारिवारिक जीवन में सुकून की छाँव तलाशते नज़र आ रहे हैं. सचिन परदे पर ज्यादातर वक़्त अपनी कहानी खुद ही बयाँ करते दिखाई देते हैं. इसीलिए कहानी कहने की शैली कभी-कभी उन्हीं की तरह बहुत सीधी-सादी, फीकी और साधारण जरूर लगती है, पर आखिर में उनके चेहरे, उनकी शख्सियत, उनकी अदायगी में रची-बसी वही सादगी, वही अच्छाई आपको लुभाती भी रहती है.

क्रिकेट दौरे से लौटे सचिन अपनी बेटी सारा से पूछ रहे हैं, “शतक मारने के बाद पापा कैसे इशारा करते हैं?’, डेढ़-दो साल की सारा अपने दोनों हाथ हवा में उठा देती है. अपनी पत्नी अंजली से पहली बार मिलने की कहानी बताते हुए वो उतने ही ‘क्यूट’ दिखने की कोशिश करते हैं, जितने वो अंजलि को तब लगे थे. उनकी शादी के विडियो में भी वो ही ‘दिल के आकार’ वाली विंडो खुलती-बंद होती है, जो अब आपको अपनी शादी के विडियो में शर्मिंदा कर जाती है. बेटे अर्जुन को क्रिकेट सिखाते हुए उनके अन्दर भी वही ‘बाप’ दिखता है, जो बेटे की कोशिशों में हमेशा ‘और अच्छा करने’ की गुंजाईश ढूंढ रहा है. इन सब छोटे-छोटे खूबसूरत पलों के बीच, सचिन का क्रिकेट कैरियर, जो पाकिस्तान में अब्दुल कादिर जैसे दिग्गज के सामने खड़े हो पाने से लेकर शेन वार्न और शोएब अख्तर जैसों की धुनाई तक सबको रटा-रटाया है, बहुत सलीके से एक के बाद एक परदे पर आता है.  

‘सचिन- अ बिलियन ड्रीम्स’ खुद ‘नॉस्टैल्जिक’ होने और आपको करने की कोई कसर नहीं छोड़ती, पर साथ ही कहीं न कहीं आपकी उम्मीदों पर तब नाकामयाब साबित होती है, जब आप फिल्म से ‘थोड़ा और’ चाहने लगते हैं. थोड़ा और, जो आपने सुना न हो. थोड़ा और, जो आपने सुना हो, पर सचिन से नहीं. थोड़ा और, जिसे बयाँ करना सचिन के लिए भी आसान न हो. सचिन और फिल्म दोनों इस उबड़-खाबड़ रस्ते पर जाने से बचते हैं, और आपको उसी एक तय रास्ते और रफ़्तार पर हलके-हलके घुमाते रहते हैं. सचिन का ‘फैन’ होने के नजरिये से आपको अच्छा भी लगता है, पर एक जागरूक दर्शक के तौर पर आपका रोमांच कहीं बीच में ही छूट जाता है. ‘मैच-फिक्सिंग’ जैसे गंभीर मुद्दे पर सचिन सिर्फ इतना कह कर कन्नी काट लेते हैं कि, “मैं क्या बोलता, जब मुझे कुछ पता ही नहीं था”. सचिन की अच्छाई, जो उनके मासूम चेहरे से छलकती भी है, को अलग कर दें, तो उनके संवाद बहुत ही आम, बेअसर और कभी-कभी बहुत ज्यादा ‘स्ट्रक्चर्ड’ सुनाई देते हैं. एकरसता इस हद तक है कि कप्तानी से हटाये जाने पर बोलते हुए, ‘...और उन्होंने मुझे एक फ़ोन भी नहीं किया’ जैसा एक थोड़ा सा ही कड़ा बयान भी आपको वो ‘किक’ दे जाता है, जो आप फिल्म से उम्मीद लगाये बैठे थे.

फिल्म के एक दिलचस्प हिस्से में, लोग मशहूर और सीनियर क्रिकेटर मोहम्मद अज़हरुद्दीन को नज़रंदाज़ करके सचिन का ऑटोग्राफ लेते हुए दिखाई देते हैं. दूसरे हिस्से में, इंग्लॅण्ड के भूतपूर्व कप्तान नासिर हुसैन कहते हैं, “स्लेजिंग का सचिन पर असर भी क्या पड़ता, जब लाखों लोग स्टेडियम में एक साथ ‘सचिन-सचिन’ कर रहे हों’. सच्चे मायनों में सचिन के कैरियर में उतार-चढ़ाव के ऐसे अनकहे-अनसुने किस्से फिल्म में बहुत कम हैं. इसी तरह फिल्म में कपिल देव, सिद्धू, राहुल द्रविड़, सौरव गांगुली और धोनी का ‘न’ के बराबर दिखाई और सुनाई देना भी खलता है.

आखिर में, ये कोई डॉक्यूमेंटरी फिल्म नहीं है, जो पूरी तरह ‘फैक्ट एंड फुटेज’ हवाले से बनी हो. हालाँकि फिल्म में सचिन के बचपन का काफी हिस्सा अभिनेताओं के साथ दुबारा शूट किया गया है, पर ये कोई बायोपिक भी नहीं है. डोक्यू-ड्रामा जैसा कुछ कहना ही सही होगा, पर उससे कहीं ज्यादा ‘सचिन- अ बिलियन ड्रीम्स’ भारत में, और भारतीय क्रिकेट में सचिन के ‘होने’ का जश्न मनाने वाली एक बॉलीवुड मसाला फिल्म है, जहाँ सचिन हीरो हैं, और बस्स सचिन ही हैं. हर फ्रेम में. बॉलीवुड के किसी जाने-माने सुपरस्टार की नयी-ताज़ी फिल्म की तरह, इसमें फैमिली है, ड्रामा है, रोमांस है, इमोशन है, एक्शन है, और एक जबरदस्त क्लाइमेक्स भी. भरपूर मनोरंजन! [3.5/5]                  

Friday, 30 September 2016

एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी: औसत दर्जे की ‘धोनी-फ्रेंडली’ फिल्म! [2.5/5]

“धोनी रांची का रहने वाला है. स्कूल के दिनों में तो उसे क्रिकेट से कुछ लेना-देना भी नहीं था. फुटबॉल खेलता था, गोलकीपर अच्छा था. वो तो स्कूल के कोच सर ने क्रिकेट में खींच लिया. बाद में, रेलवे में टिकट कलेक्टर लग गया था, पर क्रिकेट का जूनून उतरा नहीं सर से. फिर जो एक बार इंडिया टीम में सेलेक्ट हुआ, सबकी छुट्टी कर दी. क्या सीनियर खिलाड़ी, क्या रिकॉर्ड-होल्डर्स! आज भी रांची आता है तो बाइक पर दोस्तों के साथ ‘कल्लू ढाबा’ की ओर निकल जाता है. बाइक का बड़ा शौक है भाई को. हर तरह की, महंगी से महंगी, सब मिल जायेंगी उसके गैराज़ में खड़ी. ज्यादा तो कुछ पता नहीं, पर साक्षी से पहले उसकी एक और भी गर्लफ्रेंड थी.” मुझे यकीन है, भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े सितारों में से एक महेंद्र सिंह धोनी के बारे में इतना सब तो उनके चाहने वालों की जबान की नोक पर रखा होगा. पर यहाँ सवाल कुछ और है, क्या महेंद्र सिंह धोनी पर बनने वाली फिल्म में भी आप यही सब देखना पसंद करेंगे? कामयाबी के पीछे संघर्ष ढूँढने की ललक हम सबमें रहती है, पर अपने चहेतों को ‘हीरो’ मान बैठने की जल्दबाजी में कहीं हम उस वजनदार नाम के पीछे की छोटी-छोटी ही सही तमाम गलतियों, खामियों को नज़रअंदाज़ करने की भूल तो नहीं कर बैठते? एक सच्ची और ईमानदार जीवनी इन सभी संदेहों और शंकाओं से लगातार परे रहने की कोशिश करती है.   

भारत में क्रिकेट और सिनेमा को ‘धर्म से परे एक और धर्म’ की नज़र से देखा जाता है. और अगर ऐसा है, तो नीरज पाण्डेय एकलौते ऐसे फ़िल्मकार के तौर पर उभर के आते हैं, जो अपनी इस नई फिल्म में इन दोनों धर्मों को बराबर तवज्जो देते हैं. नीरज की ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ एक सधी हुई ‘सेफ’ फिल्म है, जिसे हम एक ऐसे फैन की तरफ से अपने ‘हीरो’ को श्रद्धांजलि मान सकते हैं, जो अपने ‘हीरो’ को कहीं भी डगमगाने, लडखडाने या हिचकिचाने तक की छूट नहीं देता. हालाँकि फिल्म के पहले भाग में उनका पूरा ध्यान धोनी [सुशांत सिंह राजपूत] के अति-मध्यमवर्गीय परिवेश से उठने और उस माहौल की संवेदनाओं से उपजने वाले डर, झिझक और संयम से जूझने पर ही टिका रहता है, पर निश्चित तौर पर यही वो हिस्सा है जो साधारण, सहज और सरल होते हुए भी आपको बांधे रखने में कामयाबी हासिल करता है. पिता [अनुपम खेर] रांची के स्थानीय स्टेडियम में पंप चलाकर पानी से पिच गीली कर रहे हैं. बेटे की चाहत भी जानते हैं और पढ़ाई की जरूरत भी. हमेशा साथ खड़े रहने वाले दोस्तों की जमात को तो बस ‘माही मार रहा है’ सुनने की ललक है.

नीरज पाण्डेय अपनी फिल्मों में चौंकाने के लिए जाने जाते हैं. कभी कहानी को कोई सनसनीखेज मोड़ देकर, तो कभी अभिनेताओं के साथ किसी नए तरह के प्रयोग के साथ. ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ इस तरह की किसी लाग-लपेट में उलझने की कोशिश नहीं करती, बल्कि एक ही ढर्रे पर हलके-फुल्के उतार-चढ़ाव के साथ चलती रहती है. कुछेक बहुत रोचक और रोमांचक पलों में, युवराज सिंह [हैरी टंगरी] के साथ धोनी का पहला मैच, जहां दोनों एक-दूसरे के आमने सामने होते हैं, फिल्म के पहले भाग में सबसे उत्साहित करने वाला दृश्य बन पड़ता है. फिल्म के दूसरे भाग में, नीरज, धोनी के व्यक्तिगत जीवन और एक से अधिक प्रेम-प्रसंगों में झाँकने के साथ ही कहानी के ‘हीरो’ को फिल्म का ‘हीरो’ बना देने की गलती कर बैठते हैं. एक के बाद एक गानों की लड़ी लग जाती है और फिर अंत तक आते आते आप जिस धोनी को जानने-समझने की उम्मीद ले कर थिएटर आये थे, उसी धोनी की कामयाबी की चकाचौंध में गुम होकर रह जाते हैं.  

शुरुआत के दो-चार खराब ‘ग्राफ़िकली ट्रीटेड’ दृश्यों को छोड़ दें तो सुशांत सिंह राजपूत पूरी तरह से धोनी के किरदार में रचे-बसे नज़र आते हैं, खासकर परदे पर धोनी के चिर-परिचित शॉट्स को जिंदा रखने में. उन पर कभी धोनी जैसा दिखने का दबाव नहीं रहा, शायद इसलिए भी उनका आत्मविश्वास फिल्म में पूरी तरह कायम दिखता है. अनुपम खेर तो जैसे नीरज पाण्डेय की फिल्मों में एक ख़ास तरह की अभिनय-शैली अपना लेने भर तक ही सीमित दिखने लगे हैं. भूमिका चावला कहीं से भी सहज नहीं दिखतीं. हैरी टंगरी युवराज सिंह को बखूबी परदे पर उतार लाते हैं. धोनी के कोच की भूमिका में राजेश शर्मा शानदार अभिनय करते हैं. तमाम एतेहासिक मैचों में विज़ुअल ग्राफ़िक्स की मदद से सुशांत को धोनी बनाने में कहीं भी चूक नहीं होती.

आखिर में, नीरज पाण्डेय की ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ एक सामान्य फिल्म है जो मनोरंजक होने की शर्त पूरी करते-करते भूल जाती है कि किरदारों के गढ़ने में हथौड़ों की चोट भी उतनी ही जरूरी होती है, जितनी सहूलियत और नजाकत उसे सजाने-संवारने में. आखिर एक सफ़ेद कैनवास को आप कितने देर निहारते रहेंगे? कुछ स्याह भी हो, कुछ सीलन भी हो. 3 घंटे से भी थोड़ी लम्बी ये फ़िल्मी पारी, धोनी की क्रिकेट में सबसे यादगार पारियों के करीब भी नहीं पहुँचती, न रोमांच में, न ही इमोशन्स में! [2.5/5]