Showing posts with label kumud mishra. Show all posts
Showing posts with label kumud mishra. Show all posts

Friday, 28 June 2019

आर्टिकल 15: नये भारत का एक काला सच! [4/5]


भारतीय समाज का 2000 साल पुराना ढांचा अब गहरा दलदल बन चुका है. जात-पात की गंदगी से भरा एक ऐसा बजबजाता दलदल, जिसे ‘सामाजिक संतुलन का नाम देकर सबने अपने-अपने नाक पर रुमाल रख ली है. सबको अपनी-अपनी जात की ‘औकात मालूम है, और जिसे नहीं मालूम उसे भी उसकी जात और औकात याद दिला दी जाएगी, इस पहल में भी कोई पीछे नहीं रहना चाहता. अनुभव सिन्हा की ‘आर्टिकल 15 एक ऐसे भारत की बदरंग तस्वीर है, जहां लोग जातियों को तमगे की तरह सीने पे लटकाये फिरते हैं. एक ऐसा भारत, जहां संविधान भी उतना ही अछूत है, जितना उसके निर्माताओं में से एक बाबा भीमराव अम्बेडकर को मानने वाले लोग. बाभन, ठाकुर, कायस्थ, चमार; सब के सब एक-दूसरे के ऊपर प्याज के छिलकों की तरह चढ़े हुए हैं, और जो जितना नीचे है, उतना ही दबा हुआ, उतना ही शोषित.

उत्तर प्रदेश के लालगांव में नए अफसर आये हैं. अयान रंजन (आयुष्मान खुराना) को चेताया जा रहा है कि वो रस्ते में पड़ने वाले एक ख़ास गाँव से पानी की बोतल न खरीदें क्योंकि वो गाँव छोटी जाति के लोगों का है. उसी शाम को उन्हीं के स्वागत-समारोह में उनके नीचे काम करने वाले जाटव (कुमुद मिश्रा) ने उनके आगे से अपने खाने की प्लेट झट से खींच ली, ताकि साहब उसकी प्लेट से कुछ खाने का पाप न कर बैठें. जाहिर है, अयान बाहरी है. उसे इस व्यवस्था का ओर-छोर नहीं पता; और जब पता चलता है, तो झल्लाहट के अलावा उसके पास और कोई चारा बचता नहीं. पास के गाँव से 3 दलित लड़कियां गायब हैं. उनमें से दो की लाश पेड़ से लटकती हुई मिली है. तीसरी लड़की का अब भी कुछ अता-पता नहीं. अपराध के पीछे ऊँची जाति के कुछ दबंगों का हाथ है. अयान को न्याय और कानून की परवाह है, जबकि उसके नीचे काम करने वाले ब्रह्मदत्त (मनोज पाहवा) को अयान की. हाथ जोड़ कर गुहार कर रहा है कि वो इस दलदल से दूर रहे, मगर किसी को तो सफाई के लिए इस गंदगी में उतरना होगा.

बदायूं में दो बहनों से गैंगरेप और हत्या की सच्ची घटना को अपनी कहानी का आधार बनाकर और ऊना में दलित लड़कों की सरेआम पिटाई जैसे न भुलाये जाने वाले दृश्यों को परदे पर एक बार फिर जीवंत करके, अनुभव ‘आर्टिकल 15 को हकीकत के इतना करीब ले आते हैं कि जैसे इन मुरझाती ख़बरों को एक नई सशक्त आवाज़ मिल गयी हो. जहां अनुभव की पिछली फिल्म ‘मुल्क मुसलमानों को एक ख़ास नज़र से देखने के हमारे रवैये को बड़ी ईमानदारी और मजबूती से कटघरे में खड़ा करती है, ‘आर्टिकल 15 दलितों के खिलाफ होने वाले अपराधों को दस्तावेज बनाकर भारतीय समाज के दकियानूसी जात-पात व्यवस्था पर एक ठोस प्रहार करती है. अनुभव सिन्हा और गौरव सोलंकी अपनी कहानी की मिट्टी, उसकी बनावट, उसका खुरदुरापन, उसके तेवर, उसकी तबियत, उसकी रंगत, सब भली-भांति जानते-पहचानते हैं. ‘आर्टिकल 15 की दुनिया दिल्ली-मुंबई जैसे महानगरों से बहुत दूर नहीं है. परदे पर कहानी उत्तर प्रदेश की भले ही हो, उसे देखते वक़्त पूरा भारत नज़र के सामने घूम जाता है- कभी किसी अखबार की खबर बनकर तो कभी किसी समाचार चैनल में बहस का मुद्दा बनकर. प्रतीकों को माध्यम बनाकर बात कहने में फिल्म ख़ासी समझदारी दिखाती है, और पूरी बारीक़ी के साथ. लालगांव में कुछ भी सही नहीं है. ऑफिस का पंखा आवाज़ करता है. शिकायत के बाद, ठीक कराने के आश्वासन के बाद भी कुछ बदलता नहीं. सीवर का पानी बिगड़ते हालातों के साथ जैसे जुड़ा हुआ है, ज़मीन से ऊपर आ कर बहने लगा है. कहानी के मूल का विषय जातिगत भेदभाव होते हुए भी, फिल्म किसी एक विशेष जाति को निशाना नहीं बनाती; बल्कि पूरी जाति व्यवस्था को सवालों के घेरे के खड़ी करती है.

फिल्म हाशिये पर धकेल दिए गये दलितों के अधिकारों और उनके खिलाफ़ हो रहे अपराधों के बारे में बात तो करती है, मगर एक पल के लिए भी उपदेशक बनने की भूल नहीं करती. एक अपराध-फिल्म होने के तौर पर भी, ‘आर्टिकल 15 अपने कसे हुए निर्देशन, सधे हुए लेखन और बेहतरीन कैमरावर्क के साथ पूरे नंबर कमाती है. धुंध से छन कर आते दृश्य हों या रात की कालिख में डूबे हुए दृश्य; रोमांच आपको हर वक़्त उत्साहित रखता है. फिल्म के संवाद किरदारों की खाल बन जाते हैं. ब्रह्मदत्त नीची जात की डॉक्टर पर तंज कसते हुए कोटा और पब्लिक टैक्स की बात करता है. एक दृश्य में सब के सब चुनावों में अपने अपने राजनीतिक रुझानों के बारे में बात कर रहे हैं- राजनीतिक दलों के साथ उनके बनते-बिगड़ते भरोसों को लेकर एक ऐसी खांटी बातचीत, जो अक्सर चाय की दुकानों का हिस्सा होती हैं.

अभिनय में, कुमुद मिश्रा और मनोज पाहवा एक-दूसरे के पूरक माने जा सकते हैं. दोनों एक ऐसी जोड़ी के तौर पर उभर कर आते हैं, जिन्हें एक पूरी की पूरी अलग फिल्म बक्श दी जानी चाहिए. आयुष्मान उतनी ही सहजता से अपने किरदार में उतरते हैं, जितनी आसानी से उनका किरदार फिल्म में गंदे दलदल में बेख़ौफ़ उतरता चला जाता है. सबसे धीर-गंभीर और सटीक पुलिस अधिकारी की भूमिका वाली लिस्ट में ‘मनोरमा सिक्स फ़ीट अंडर वाले अभय देओल के बाद शायद आयुष्मान ही आते हैं. भीम आर्मी के चंद्रशेखर रावण से प्रेरित किरदार में मोहम्मद जीशान अय्यूब बेहतरीन हैं. सयानी गुप्ता काबिल हैं, कामयाब हैं. ईशा तलवार भी निराश नहीं करतीं.

आखिर में, ‘आर्टिकल 15 एक बेहद जरूरी फिल्म है. अयान एक दृश्य में बोल पड़ता है, ‘बहुत mess है, unmess करना पड़ेगा.’ उसकी महिला-मित्र उसे ठीक करते हुए कहती है,unmess जैसा कोई शब्द होता भी है?”. अयान का जवाब ही फिल्म के होने की वजह बन जाता है. ‘नहीं, पर नए शब्द तलाशने होंगे, नए तरीके खोजने होंगे.’’ फिल्म के एक दृश्य में एक सफाईकर्मी सीवर के काले गंदे कीचड़ से निकल कर स्लो-मोशन में बाहर आता है. बड़ी-बड़ी फिल्मों में आपने नायकों को महिमामंडित करने वाले तमाम दृश्यों पर तालियाँ-सीटियाँ बजाई होंगी, इस एक दृश्य से बेहतर और रोमांचक मैंने हाल-फिलहाल कुछ नहीं देखा. नए भारत का एक सच ये भी है, थोड़ा काला-थोड़ा भयावह, पर सच तो सच है! [4/5]                                

Thursday, 6 June 2019

भारत: भाई की ‘ईदी’ और सिनेमा के ‘घाव’ (2/5)

परदे पर नायक की इमेज़ को भुनाना या दोहराना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए कोई नयी बात नहीं. दिलीप कुमार ‘ट्रेजेडी किंग, मीना कुमारी ‘ट्रेजेडी क्वीन या अमिताभ बच्चन ‘एंग्री यंग मैन’ यूं ही नहीं बन जाते. सलमान खान इस मामले में इन सब से कई कदम आगे निकल चुके हैं. रोमांटिक हीरो (हम आपके हैं कौन, हम दिल दे चुके सनम) से मनोरंजक एक्शन स्टार (वांटेड, दबंग) के बाद, अपने सफ़र के अगले पड़ाव में सलमान अब अपनी बेपरवाह ‘दिल में आता हूँ, समझ में नहीं वाले तेवर से निकलने की छटपटाहट ख़ूब दिखा रहे हैं. उनकी फिल्मों का नायक अब वो शख्स नहीं रहा, सलमान के चाहने वाले जिसे असल जिंदगी के सलमान से जोड़ कर देख लेते थे. आज के परदे का सलमान अपने आपको एक ऐसे नए चोगे में पेश करना चाहता है, जिसकी स्वीकार्यता महज़ टिक-टॉक वाली पीढ़ी तक सीमित न हो, बल्कि बड़े स्तर पर हो, देश स्तर पर हो. अली अब्बास ज़फर की ‘भारत एक ऐसी ही करोड़ों रुपयों वाली विज्ञापन फिल्म है, जिसके केंद्र में सलमान को ‘देश का नमक-टाटा नमक’ की तरह बेचने की कोशिश लगातार चलती रहती है; वरना ‘जन गण मन सुनाकर नौकरी हथियाने वाले नाकारा और नाक़ाबिल लोगों की टीम के लिए सिनेमाहॉल में कोई भी समझदार दर्शक 52 सेकंड्स के लिए भी क्यूँ खड़ा होगा?

‘भारत कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फ़ादर’ पर आधिकारिक रूप से आधारित है. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में 10 साल का भारत (सलमान खान) अपने पिता (जैकी श्रॉफ) और छोटी बहन से बिछड़ कर पुरानी दिल्ली आ गया है, और अब अपने पिता को दिए वादे के साथ बाकी परिवार को एकजुट रखने में मेहनत-मशक्कत कर रहा है, इस उम्मीद में कि एक दिन उसके पिता लौटेंगे. 70 साल की उम्र में राशन की दुकान चलाने से पहले, भारत ‘द ग्रेट इंडियन सर्कस में मौत का कुआं जैसे करतब भी दिखा चुका है, अरब देशों में तेल के खदानों में काम भी कर चुका है, और समंदर में माल ढोने वाले जहाज़ों पर रहते हुए सोमालियाई समुद्री लुटेरों का सामना भी. फिल्म पहले ही जता चुकी है कि 70 साल के बूढ़े आदमी की जिंदगी में काफी कुछ वाकये ऐसे हुए हैं, जिन पर भरोसा करना आसान नहीं होगा. विडम्बना ये है कि फिल्म मनोरंजन के लिए खुद इन तमाम घटनाओं को इतनी लापरवाही और हलके ढंग से पेश करती है कि हंसी तो छोड़िये, आप परेशान होकर अपना सर धुनने बैठ जाते हैं. ख़तरनाक सोमालियाई लुटेरे अमिताभ बच्चन के फैन निकलते हैं, सलमान और उसके दोस्तों को एक-दो हिंदी गानों पर नचा कर छोड़ देते हैं. तेल के खदान में फंसा हुआ भारत जैसे स्क्रीनप्ले के वो चार पन्ने ही खा जाता है, जिसमें उसे खदान से बाहर निकलने की मेहनत करनी पड़ती. बजाय इसके भारत बने सलमान सिर्फ अपनी शर्ट उतारता है, और अगले दृश्य में खदान से बाहर. सलमान थोड़ी कोशिश करते, तो ‘काला पत्थर की स्क्रिप्ट के कुछ पन्ने सलीम खान साब के कमरे से चुराए तो जा ही सकते थे.

बहरहाल, फिल्म भारत को किरदार और देश के तौर पर अलग-अलग देखते हुए भी दोनों के सफ़र को एक-दूसरे से जोड़े रखने की नाकामयाब तरकीब भी लड़ाती है. भारत की जिंदगी के खास ख़ास पलों को जोड़ने में देश के तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक हालातों पर की गयी टिप्पणी जैसे एक भूली-भटकी एक्सरसाइज लगती है- कभी याद आ गयी तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं. नेहरु जी की मृत्यु से लेकर, साठ के दशक में बेरोजगारी और फिर नब्बे के दशक की अर्थव्यवस्था में डॉ. मनमोहन सिंह के योगदान का उल्लेख इसी कड़ी का हिस्सा हैं.

‘भारत में मनोरंजन का अच्छा-खासा दारोमदार फिल्म के सह-कलाकारों के काबिल कन्धों पर रख छोड़ा गया है. कलाकारों की क़ाबलियत जहां इस बात का मज़बूत पक्ष है, स्क्रिप्ट में जिस तरह की सस्ती कॉमेडी उनके हिस्से मढ़ दी गयी है, उतनी ही शर्मनाक और वाहियात. पूरी फिल्म में आसिफ शेख़ और सुनील ग्रोवर दो ही ऐसे अभिनेता हैं, जो अपने किरदार से एक पल के लिए भी अलग नहीं होते. आसिफ शेख के हिस्से जहां नब्बे के दौर के उनके अपने ही मजाकिया हाव-भाव हाथ लगे हैं, और वो उनमें काफी हद तक कामयाब भी रहते हैं; सुनील अपनी मौज़ूदगी तकरीबन हर दृश्य में ज़ाहिर तो करते हैं, मगर ‘चड्डी वाले दोयम दर्जे के मजाकिया दृश्यों से वो भी बच नहीं पाते. यहाँ तक कि एक दृश्य में उन्हें औरत बनने का सुख भी हासिल कराया जाता है. सतीश कौशिक एक फिल्म के साथ परदे पर एक बेहरतीन अभिनेता के तौर पर लौटते ज़रूर हैं, मगर उन्हें भी ‘तुतलाने और तेज़ बोलने वाले किरदार तक ही बाँध कर रख दिया जाता है, मानो उनका वो हिस्सा सीधे-सीधे किसी डेविड धवन फिल्म से उठा लिया गया हो.

कैटरीना कैफ़ बहुत मेहनत करते हुए नज़र आती हैं- ‘भारतीय’ लगने और सुनाई देने की कोशिश करते हुए. साड़ियों और सादे सलवार सूट में हिंदी साफ़-साफ़ बोलने में इस बार उनके नंबर कम ही कटते हैं, और ऐसा तब और जरूरी हो जाता है, जबकि उनके किरदार का नाम ‘कुमुद’ हो, ना कि ‘जोया’, ‘लैला या ‘जैज़’. फिर भी दो मौकों पर उनका ‘स्टोर को ‘स्तोर बोलना खलता है. कहानी और मनोरंजन के बाद, फिल्म अगर सबसे ज्यादा नाइंसाफ़ी किसी से करती है तो वो हैं, सलमान के माँ की भूमिका में सोनाली कुलकर्णी. असल जिंदगी में सोनाली सलमान से 10 साल छोटी हैं, और परदे पर और ज्यादा छोटी दिखती हैं. हालाँकि फिल्म शुरुआत में ही एलान करती है कि पिता हीरो होते हैं, और माएं सुपर हीरो, मगर फिल्म में सोनाली का किरदार महज़ एक प्रॉप से ज्यादा कुछ नहीं. इस माँ को सुपर हीरो बनने का न तो मौका हासिल होता है, न ही न बन पाने की सहानुभूति. बेटा सलमान है आख़िर! और सलमान के लिए? पूरी फिल्म में अभिनय के नाम पर हैं, उनकी पुरानी फिल्मों से मिलते-जुलते गेटअप्स, बूढ़ा दिखाने वाला मेकअप और आंसू बहाने वाले दो दृश्य! अली अब्बास ज़फर की ही फिल्म ‘सुलतान में सलमान ने वजन बढ़े हुए पहलवान के किरदार को आईने के सामने नंगा खड़ा कर देने की जो हिम्मत दिखाई थी, 70 साल के बूढ़े के किरदार यहाँ ऐसी कोई साहसिक कोशिश करने में आलस दिखा जाते हैं.

आखिर में; ‘भारत एक अति-साधारण कोशिश है साधारण से दिखने वाले एक बूढ़े की असाधारण कहानी को परदे पर उकेरने की. ओरिजिनल कोरियाई फिल्म में इस्तेमाल मानवीय संवेदनाओं और गहरे ज़ज्बातों को ताक पर रख कर, मनोरंजन के लिए सस्ते हथकंडों का प्रयोग लेखन-निर्देशन का खोखलापन खुले-आम ज़ाहिर करता है. बंटवारे की त्रासदी पर फिल्म देखनी हो, तो देखिये ‘पिंजर, खदानों में फंसे मजदूरों की जिजीविषा देखनी हो, तो देखिये ‘काला पत्थर, समुद्री लुटेरों से जूझते नायक की कहानी देखनी हो, तो देखिये ‘कैप्टेन फिलिप्स’. हाँ, अगर ‘भाई’ को ईदी देने की रस्म-अदायगी ज़रूरी है आपके लिए, तो एक राहत-कोष बना लीजिये. कम से कम हर साल सिनेमा को घाव तो नहीं सहने पड़ेंगे. [2/5] 

Friday, 3 August 2018

मुल्क: ‘इस्लामोफ़ोबिया’ से ग्रस्त हैं? आज ही देखें. [3.5/5]


तेज़-तर्रार पुलिस ऑफिसर दानिश जावेद (रजत कपूर) शहर के मुस्लिम-बहुल इलाके में छिपे एक आतंकवादी को मार गिराने की नीयत से अपनी टीम के साथ आगे बढ़ रहा है. साथ ही, मुस्लिमों की आबादी पर तंज कस रहा है, “इतने बच्चे क्यूँ पैदा कर लेते हो?”. उसी रौ में बहते हुए एक सिपाही बोल पड़ता है, “अरे, साहब! इन लोगों का ऐसा ही रहता है.”, ये भूलते हुए कि उसके साहब खुद भी एक मुसलमान हैं. ऐसे ही एक पूर्वाग्रह से ग्रस्त दानिश खुद भी है, जब बात आतंकवाद को मुस्लिमों से जोड़ कर देखने की आती है. अनुभव सिन्हा की मुल्क देश में बढ़ते धार्मिक उन्माद, साम्प्रदायिकता और आम जन के मन में पल-बढ़ रहे पूर्वाग्रहों, कुतार्किक अवधारणाओं और आपसी भेदभाव को कटघरे में खड़े करते हुए, कुछ बेहद जरूरी और कड़े सवाल सामने रखती है. हालाँकि अपनी बनावट में फिल्म थोड़ी पुराने ज़माने और ढर्रे की जरूर जान पड़ती है, पर मुल्क अपनी बात जोरदार तरीके से कहने में ना ही कमज़ोर पड़ती है, ना ही डरती-सहमती है.

कैसे साबित करेंगे आप, अपने मुल्क के प्रति अपनी वफ़ादारी? खास तौर पर, जब आपका नाम मुराद अली (ऋषि कपूर) हो, या फिर बिलाल अली (मनोज पाहवा), जिसका बेटा शाहिद (प्रतीक स्मिता बब्बर) आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाया गया है. कैसे साबित करेंगे कि 1927 में बना मुराद-मंजिल आपका घर नहीं, देश-विरोधी गतिविधियों का अड्डा है? ...और ये और भी मुश्किल हो जाता है, जब आप की देशभक्ति पर सवाल उठाने वालों की आँखों पर पहले से ही धर्म-विरोधी काला चश्मा चढ़ा हो. हम ऐसे हैं और वो ऐसे; अलगाव की इस गन्दी राजनीति का हिस्सा धीरे-धीरे ही सही हम सब बनते जा रहे हैं. मुल्क कम से कम हमें झकझोर कर जगाने की कोशिश तो करती ही है.

मुल्क अपने पहले हिस्से में बहुत सारा वक़्त बनारस की जानी-पहचानी गलियों में धार्मिक सहिष्णुता के ठहाके लगाने में बिताती है, जहां वकील मुराद अली अपनी 65वीं सालगिरह पर परिवार और दोस्तों के लिए खुद मटन-कोरमा बना रहे हैं. पड़ोसियों में शामिल घोर शाकाहारी मित्र भी कबाब चख रहे हैं, हालाँकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि ये सारा सेट-अप जल्द ही टूटने वाला है और तनाव का माहौल पलक झपकते ही सारे रिश्ते चकनाचूर कर जाएगा. हम और वो की न दिखने वाली खाई जल्द दिखाई भी देगी, साथ ही और गहरी भी होती जायेगी. पाकिस्तान भेजने की पेशकश दीवारों पे इश्तेहार की तरह छपेगी और माता के जागरण का लाऊडस्पीकर जानबूझकर मुराद-मंजिल की ओर ही मोड़ दिया जाएगा.

एक लिहाज़ से पुराने ढर्रे का ये ड्रामा फिल्म के हक में ही काम करता है, क्यूंकि दूसरे हिस्से में आप को कोर्ट की उस अहम कार्यवाही का गवाह बनना है, जहां किरदारों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच अक्सर आप खुद को, इन तमाम सवालों पर अपनी सोच के साथ कटघरे में खड़ा पायेंगे. मुराद अली की बहू (तापसी पन्नू) का नाम लेने में खुद जज साब (कुमुद मिश्रा) एक बार को अचकचा जाते हैं, मोहम्मद आरती या आरती मोहम्मद’? हिन्दू है, और मुराद अली की वकील भी. सरकारी वकील संतोष आनंद (आशुतोष राणा) जनमानस को संतुष्ट और खुश करने वाली मुस्लिम-विरोधी दलीलों से खेलना ख़ूब अच्छी तरह जानता है. उकसाने, भड़काने और तालियाँ बटोरने में माहिर है.

मुख्य किरदारों के तौर पर ऋषि कपूर और तापसी पन्नू की अच्छी अदाकारी के साथ, फिल्म में उनकी मौजूदगी भले ही ज्यादा वक़्त के लिए हो, पर अपनी छोटी सी भूमिका में ही आपको मन भर द्रवित कर देते हैं अभिनेता मनोज पाहवा. फिल्म के आधे हिस्से तक तो लगता है, मानो पूरी की पूरी फिल्म उनकी ही हो, उनपे ही हो. बड़े भाई मुराद अली के सामने अपनी गलतियां बयान करते वक़्त, पुलिस स्टेशन में ज्यादतियां सहते वक़्त, शाम की दावत के लिए 10 किलो और मटन को लेकर भाई से मोल-भाव करते वक़्त, मनोज अपने पूरे शबाब पर होते हैं. रजत कपूर, कुमुद मिश्रा और आशुतोष राणा अपने किरदारों के साथ बखूबी इन्साफ करते हैं. राणा अपनी भाषाशैली के दम पर एक अति-राष्ट्रवादी वकील की भूमिका में आपकी नफरत हासिल करने में खासे कामयाब रहते हैं.

अंत में, मुल्क के जरिये अनुभव सिन्हा आतंकवाद, साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता जैसे मुद्दों पर खुल कर बोलते हैं. कुछ इस बेबाकी से कि फिल्म के आखिर में निर्णय सुनाते वक़्त जज साब की आवाज़ में उनकी अपनी बेचैनी, तल्खी और विचारधारा साफ़ सुनाई देती है. मुराद अली को सलाह देते वक़्त जज साब कहते हैं,अगली बार कोई अगर आपको आपकी दाढ़ी के लिए सवालों के घेरे में खड़ा करे, तो उन्हें चुप कराने के लिए भारत के संविधान का पहला ही पन्ना ज़ेरॉक्स करा कर रख लीजिये, काफी है.” अगर आप भी इस्लामोफ़ोबिया जैसी बीमारी से ग्रस्त हैं, तो आपको मुल्क हफ्ते में कम से कम दो बार देखनी चाहिए. दवा थोड़ी महंगी जरूर है, पर घोर असरदार!  

Friday, 16 February 2018

अय्यारी: लम्बी, उबाऊ, नीरस! [2/5]

गनीमत है कि हिंदी फिल्मों के सीक्रेट सर्विस एजेंट्स अपने 'टारगेट' पर नज़र बनाये रखने की गरज से, आजकल सड़कों पर गाना गाते हुए दिखाई नहीं देते. रामानंद सागर की 'आँखें' याद हैं ना? हालाँकि भिखारियों का गेटअप अभी भी उनका पसंदीदा है. नीरज पांडे ने पिछले कुछ सालों में राष्ट्रीय सुरक्षा और देशप्रेम के सवालों से सीधे-सीधे तौर पर जुड़ी कहानियों के ज़रिये इतना तो किया ही है. इंटेलिजेंस के लोग अब लाल, पीले, हरे बल्बों से सजी दीवारों और पैनलों के आगे बैठे, रेडियो पर जोर जोर से 'ओवर एंड आउट' नहीं बोलते, बल्कि हफ़्तों तक बिना किसी हलचल एक कमरे में कैद रहते हैं, भीड़ भरी गलियों में, मौके की तलाश में 'टारगेट' के पीछे-पीछे चुपचाप चलते रहते हैं और काम निपटा कर वापस भीड़ में खो जाते हैं. 'अय्यारी' करीब करीब इतनी ही लम्बी, उबाऊ और नीरस फिल्म है. 

मोटी दलाली की लालच में, सेना का रिटायर्ड अधिकारी गुरिंदर सिंह (कुमुद मिश्रा) चौगुनी कीमतों पर सेना को अपने खास लोगों से ही हथियार खरीदने की पेशकश करता है. मना करने पर सेना के एक गुप्त गैरकानूनी संगठन का मीडिया में भंडाफोड़ करने की उसकी धमकी के बाद अब सेना की साख दांव पर है. खुफिया जानकारी मुहैया कराने वाला गद्दार उसी संगठन से है, मेजर जय बक्शी (सिद्दार्थ मल्होत्रा). और उसे रोकने की जिम्मेदारी है, संगठन के सबसे काबिल अफसर और मुखिया कर्नल अभय सिंह (मनोज बाजपेयी) पर. गुरु-शिष्य आमने-सामने हैं. दोनों की अपनी जायज़ वजहें हैं. दोनों के अपने-अपने दांव-पेंच. हालाँकि कहानी में ना ही जय की बग़ावत का कोई ठोस इरादा पता चलता है, ना ही अभय की कथातथित 'अय्यारी' का कोई बहुत दिलचस्प नमूना देखने को मिलता है.      

सेना का मनोबल न घटे, अक्सर इस वजह से सेना में भ्रष्टाचार की सुगबुगाहट को सिरे से नकारा जाता रहा है. नीरज पांडे जब 'अय्यारी' में सैनिक हथियारों की खरीद-फरोख्त में भ्रष्टाचार के मामले के इर्द-गिर्द अपनी कहानी बुनना शुरू करते हैं, तो लगता है कि उनके जरिये परदे पर कुछ हिम्मत दिखेगी, पर जल्द ही वो भी सेना के प्रति अपना सम्मान व्यक्त करने की कवायद में कहानी के साथ जबरदस्त छेड़छाड़ करने लगते हैं. नतीजा, कहानी के सिरे इतने कटे-फटे और बेमतलब हो जाते हैं कि कहने को कोई मुद्दा बचता ही नहीं. तभी तो जहां सेना पर मीडिया द्वारा उनके गुप्त संगठन का खुलासा कर दिये जाने की तलवार लटक रही होती है, 'आदर्श हाउसिंग सोसाइटी' से मिलते-जुलते एक घोटाले की खबर के साथ उसे बदल देने में ही कर्नल अभय सिंह अपनी जीत मनवा लेता है. जय का रुख और रवैया भ्रष्टाचार को लेकर बहुत ही बचकाना लगता है, खास तौर पर तब जब वो भी उन्ही लोगों के साथ सौदेबाजी में जुट जाता है. यकीन मानिए, इसमें उसकी कोई सोची-समझी रणनीति भी नहीं है, जो फिल्म के आखिर में जाकर आपको चौंका दे. 

नीरज को एक बात की दाद तो मिलनी ही चाहिए. अपने लम्बे-लम्बे दृश्यों में जिस ठहराव के साथ वो आपको लिप्त कर लेते हैं, परदे पर सस्पेंस थ्रिलर का पूरा पूरा माहौल बन जाता है. दिक्कत तब पेश आती है, जब इन लम्बे-लम्बे दृश्यों का अंत और उद्देश्य फिल्म की कहानी में कोई बहुत बड़ा योगदान नहीं दे पाता. 'अय्यारी' कुछ बेहद जाने-पहचाने चेहरों (कुमुद मिश्रा, निवेदिता भट्टाचार्या, जूही बब्बर, राजेश तैलंग और आदिल हुसैन) और गिनती के बेहतरीन अभिनय (मनोज बाजपेयी, नसीर साब) से ही थोड़ी बहुत उम्मीद बचा पाती है. मनोज जहाँ अपनी ईमानदारी से पूरी फिल्म में छाए रखते हैं, नसीर साब मेहमान भूमिका में भी कमाल कर जाते हैं. सिद्धार्थ अभिनय में बहुत संयमित हैं, पर नीरज उन्हें फिल्म में 'स्टाइल' का पुट लाने के लिए ही ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. रकूल प्रीत बस फिल्म में होने के लिए ही हैं. 

आखिर में; 'अय्यारी' अपने विषय-वस्तु की वजह से रोचक तो लगती है, मगर नीरज पांडे की दूसरी फिल्मों (स्पेशल 26, बेबी) की तरह तनिक भी रोमांचक नहीं है. अभिनय में मनोज बाजपेयी की आसानी देखनी हो, तो भी उनकी अच्छी फिल्मों की लिस्ट बहुत बड़ी है. यहाँ तो मनोज सिर्फ आपको उकताहट से बचाने के लिए मौजूद रहते हैं. कहानी में धार न होने के बावजूद, अगर 'जय हिन्द', 'गद्दार' और 'देश', जैसे शब्द कहीं न कहीं आपमें बेमतलब की ऊर्जा भर देते हैं, तभी देखने जाईये. [2/5] 

Friday, 22 December 2017

टाइगर ज़िंदा है: ...पर कहानी का क्या? [2.5/5]

क्या आपको पता है, सी पी प्लस ('ऊपर वाला सब देख  रहा है' की टैगलाइन वाले)ब्रांड के सीसीटीवी कैमरा इराक में भी बिकते हैं? क्या आपको पता है, रॉ अपने सीक्रेट मिशन के कोडवर्ड के तौर पर हिंदी गानों का इस्तेमाल करती है? तूतू तू, तूतू तारा, आ गया दोस्त हमारा? क्या आपको पता है, आखिरी मिनटों में टाइम बम रोकने के लिए 'लाल' तार ही काटना होता है? और अगर लाल तार हो ही नहीं, तो पूरा बम निकाल फेंक देने में ही समझदारी है? क्या आपको पता है, रॉ की ही तरह पाकिस्तान की आईएसआई एजेंसी भी 'शांति' चाहती है? क्या आपको पता है, भारत और पाकिस्तान लोग जब भी मिलते हैं 'ग़दर', सानिया-शोएब और क्रिकेट की ही बातें करते हैं? 

अली अब्बास ज़फर की 'टाइगर ज़िंदा है' आपके ऐसे ढेर सारे वाहियात सवालों का गिन गिन के पूरा जवाब देती है. बस भूल जाती है तो एक अहम सवाल, "कहानी का क्या हो रहा है, भाई?". ये सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्यूंकि फिल्म में एक अदद अच्छी कहानी की झलक कभी-कभी ही सही, साफ़ तौर पर दिखती है. तकलीफ ये है कि फिल्म ज्यादातर वक़्त (सलमान) भाई के स्लो-मोशन शॉट्स और गोला-बारूद के बीच फिल्माए गए एक्शन दृश्यों में ही खुले हाथों खर्च होती रहती है.  

ईराक के एक अस्पताल में आतंकवादियों ने 25 भारतीय और 15 पाकिस्तानी नर्सों को बंधक बना रखा है. भारत की ओर से एजेंट टाइगर (सलमान खान) ही है, जो इस मिशन को अंजाम दे सकता है. पाकिस्तान की ओर से एजेंट ज़ोया (कटरीना कैफ़) को ये इज्ज़त बख्शी जाती है, जो इत्तेफ़ाक से टाइगर की बीवी भी हैं. इस बीच आतंकवादी संगठन के प्रमुख अबू उस्मान (सज्जाद देलाफरूज़) पर अमेरिका की भी नज़र बनी हुई है, हवाई हमला कभी भी हो सकता है. टाइगर और ज़ोया के पास सिर्फ 7 दिन हैं इस मिशन को पूरा करने के लिए. 

इसी साल की मलयालम फिल्म 'टेक ऑफ' इसी विषय पर बनी एक बेहतरीन फिल्म है. इससे उबरें, तो कभी उधर भी तशरीफ़ ले जाईये. फ़िलहाल, बात 'टाइगर ज़िंदा है' की. सलमान की फिल्मों से अक्सर शिकायत रहती है, कहानी के नदारद होने की. इस फिल्म के बाद ये शिकायत बंद कर देनी चाहिए. आख़िरकार, किसी भी अच्छी-भली कहानी को सलमान की क्या जरूरत? फिल्म देखते वक़्त आप बड़ी आसानी से तय कर पायेंगे कि फिल्म दो सतहों पर चलती नज़र आती है. एक, जहाँ बंधक नर्सों की कहानी आपको हर बार बांधे रखना चाहती है, मगर उसे तयशुदा वक़्त नहीं मिलता. और दूसरा, जहां सलमान अपनी हरकतों पर वक़्त जाया करने से बाज़ नहीं आते. भला हो, फिल्म के बड़े कैनवास का, कुछ बेहद कसे हुए रोमांचक एक्शन दृश्यों का, जो बेवजह ही सही, मजेदार लगते हैं.

बंद घड़ी भी दिन में दो बार सही वक़्त बताती है. फिल्म भी लगभग इतनी ही बार ईमानदार दिखती है. मिशन पर एक नौजवान एजेंट अपने साथ तिरंगा लेकर आया है, और मिशन ख़त्म होने पर उसे लहराने-फहराने का मौका छोड़ना नहीं चाहता. एक अंडर-कवर एजेंट के लिए तिरंगा साथ रखना मिशन के लिए खतरनाक हो सकता है, इसलिए टाइगर उसे समझाता है, 'ज़ज्बा रखना ठीक है, ज़ज्बाती होना नहीं'. ठीक ऐसे ही, फिल्म भारत-पाकिस्तान के बीच सुलह, शांति और अमन की बात कई मौकों पर बड़ी दिलेरी से सामने रखती है. हालाँकि ज्यादातर वक़्त ये सब आपको प्रवचन से ज्यादा और कुछ नहीं लगता. 

जहाँ तक मुझे लगता है, कुदरती रूप से रॉ एजेंट जासूस ही होते हैं, पर 'टाइगर ज़िंदा है' एक औसत जासूसी-थ्रिलर होने के करीब भी नहीं पहुँचती और एक ठीक-ठाक एक्शन-एंटरटेनर होके ही रह जाती है. हालाँकि फिल्म में सलमान ताबड़तोड़ आतंकवादियों पर गोलियां बरसाते हैं, गोले दागते हैं, और अंत तक सबको बचाने में कामयाब भी साबित होते हैं, पर वहीँ किसी एक कोने में दम तोड़ती एक रोमांचक कहानी को देर तक जिंदा नहीं रख पाते. क्या फर्क पड़ता है, और फ़िक्र भी क्यूँ? जब तक एक अदद नाम का ही जलवा काफी है, कारगर है, बरक़रार है. [2.5/5]  

Friday, 1 December 2017

फिरंगी: बोर, ढीली और लम्बी! [2/5]

फ़िल्म और कहानी के तौर पर 'फिरंगी' से ज्यादा उम्मीदें न रखने का एक फायदा तो होता है; अपने खर्चीले प्रॉडक्शन डिजाईन, बेहतर कैमरावर्क और कसे हुए स्क्रीनप्ले से फिल्म के पहले 15-20 मिनट आपको इतना उत्साहित कर देते हैं कि आप 'कपिल शर्मा की फिल्म' को एक अलग ही नजरिये से देखने लगते हैं. यकीन मानिए, शुरूआती रुझानों से इन पहले 15-20 मिनटों की फिल्म को 'लगान' जैसी क्लासिक फिल्म से तौल कर देखने की भूल कोई भी बड़ी आसानी से कर लेगा, पर असली इम्तिहान की घड़ी तो उसके कहीं बाद शुरू होती है. 'फिरंगी' अभी भी ढाई घंटे बची रहती है, और कुल मिला कर अपने 2 घंटे 40 मिनट के लम्बे सिनेमाई वक़्त में आपको पूरे तबियत से झेलाती है. 

अपनी पहली फिल्म 'किस किसको प्यार करूं?' में अपने ख़ास कॉमेडी अंदाज़ को भुनाने के असफल प्रयास के बाद, कपिल शर्मा इस बार 'फिरंगी' में थोड़े संजीदा दिखने और लगने की कोशिश करते हैं. फिल्म देश की आजादी से 26 साल पहले के साल में घूमती है, जहां एक तरफ लोग गांधीजी की आवाज़ पर अंग्रेजों से असहयोग की लड़ाई लड़ रहे हैं, वहीँ एक सीधा सादा नौजवान ऐसा भी है, जो अंग्रेजों को इतना बुरा भी नहीं मानता. आख़िरकार इस निठल्ले मंगा (कपिल शर्मा) को अँगरेज़ अफसर के यहाँ नौकरी जो मिली है, वर्दी वाली. मंगा का भरम तब टूटता है, जब अय्याश राजा साब (कुमुद मिश्रा) के साथ मिलकर उसके अपने डेनिएल्स साब (एडवर्ड सोननब्लिक) गाँव की जमीन हथियाने के लिए धोखे से मंगा का ही इस्तेमाल कर लेते हैं. मंगा के हिस्से सिर्फ गाँव वालों का विश्वास तोड़ने का इलज़ाम ही नहीं है, सरगी (इशिता दत्ता) के साथ उसकी शादी भी अब होने से रही.

'फिरंगी' अपने किरदारों के बातचीत, लहजों और 1920 के ज़माने के गंवई रहन-सहन को यकीनी तौर पर सामने रखने में काफी हद तक कामयाब रहती है. हालाँकि 'लगान' के साथ उसका मेल-जोल सिर्फ दृश्यों की बनावट, रंगत और सूरत तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि धीरे-धीरे आपको पूरी फिल्म ही 'लगान' की नक़ल लगने लगती है. कहानी कहने के लिए बच्चन साब की आवाज़ का इस्तेमाल हो या अँगरेज़ अफसर के हाथों कठपुतली बनते राजा साब के फर्ज़ी तेवर; 'फिरंगी' हर दृश्य गढ़ने के लिए जैसे 'लगान' की ओर ही ताकती नज़र आती है. अफ़सोस की बात ये है कि न ही 'फिरंगी' के मंगा में 'लगान' के भुवन जितनी भूख, आग और तड़प है, ना ही 'फिरंगी' की कहानी में उतनी ईमानदारी, सच्चाई और चतुराई. ऊपर से देशप्रेम का तड़का भी नाममात्र का. 

मंगा के किरदार में कपिल उस हिसाब से तो फिट दिखते हैं, जहाँ दोनों की शख्सियतों में साझा हंसी, ख़ुशी और पंजाबियत परदे पर दिखानी होती है, पर कपिल से फिल्म के नाज़ुक और संजीदा हिस्सों में अदाकारी के जौहर की उम्मीद करना फ़िज़ूल ही है. इशिता दत्ता खूबसूरत लगती हैं, और शायद उनके किरदार से फिल्म की उम्मीदें भी इतनी ही रही होंगी. एडवर्ड सोननब्लिक अच्छे लगते हैं. लन्दन में पढ़ी-लिखी राजकुमारी के किरदार में मोनिका गिल जैसे सिर्फ और सिर्फ 'लगान' की एलिजाबेथ मैडम की कमी पूरी करने के लिए हैं. कुमुद मिश्रा बेहतरीन हैं. फिल्म के दूसरे सह-कलाकारों में राजेश शर्मा, ज़मील खान, इनामुलहक और अंजन श्रीवास्तव जैसे बड़े और काबिल नाम निराश नहीं करते.

आखिर में; 'फिरंगी' एक फिल्म के लिहाज़ से उतना निराश नहीं करती, जितना कपिल शर्मा एक अदाकार के तौर पर करते हैं. कहानी फिल्म की लम्बाई के लिए छोटी पड़ जाती है, बेहतरीन प्रॉडक्शन डिजाईन लाख कोशिशों के बाद भी आपको मनोरंजन के सूखे से उबार नहीं पाता, और ख़तम होते-होते तक फिल्म को 'लगान' समझने की आपकी भूल, अब जैसे कोई जुर्म कर बैठने का एहसास कराने लगती है. [2/5]               

Friday, 11 November 2016

रॉक ऑन 2: बैंड बज गया! [2/5]

अभिषेक कपूर की ‘रॉक ऑन’ कुछ आठ साल पहले आई थी. यारी, दोस्ती, मस्ती और म्यूजिक के बीच रिश्तों में उतार-चढ़ाव और हाथ-धो कर सपनों के पीछे पड़ जाने की जिद लिए कुछ मनमौजी दोस्तों की कहानी, जहां कभी खुदगर्ज़ी और खुद्दारी दूरियाँ बढ़ा देती थी तो म्यूजिक के लिए उनका साझा ज़ज्बा नाराज दोस्तों के हाथ खींच कर गले भी मिला देती थी. शुजात सौदागर की ‘रॉक ऑन 2’ ने आने में थोड़ी देर ज़रूर लगायी है, पर ‘देर आयद दुरुस्त आयद’ के साथ इन्साफ बिलकुल नहीं करती. ‘रॉक ऑन’ अगर पुराने लव लैटर की तरह है, जिसके गुलाबी पन्ने अभी भी उनको छूने वाली नरम मुलायम उँगलियों का एहसास कराते हैं, जिसकी सियाही अब भी बंद लिफाफे से ही एक जानी-पहचानी खुशबू बिखेरती रहती है, तो ‘रॉक ऑन 2’ उसी पुराने लव लैटर की एक ज़ेरॉक्स कॉपी भर है. देखने में कमोबेश वैसा ही, पर रंग बासी और खुशबू बेअसर.

सालों बीत गए हैं. इतने कि आपको फ्लैशबैक में बार-बार ले जाया जा सके. केडी (पूरब कोहली) क्लाइंट्स के इशारों पर म्यूजिक बनाते-बनाते थक गया है. जो (अर्जुन रामपाल) एक रेस्टो-बार चलाता है और साथ ही, म्यूजिक रियलिटी शोज़ में टीआरपी दिलाने वाले बेहूदा कलाकारों को जज करता है. आदी (फरहान अख्तर) अब मेघालय के किसी गाँव में लोगों की सेवा में लगा रहता है. ‘मैजिक’ का कहीं कोई अता-पता नहीं. मैजिक की जगह अब ‘ट्रैजिक’ ने ले ली है. कहने को तो सारे दोस्त (बीवियों को गिनते हुए) आपस में मिलते-जुलते हैं, पर अन्दर ही अन्दर म्यूजिक छूट जाने का ग़म पाले बैठे हैं. तीनों के लिए उम्मीद की थोड़ी बहुत रौशनी लेकर आते हैं उदय (शशांक अरोरा, तितली वाले) और जिया (श्रद्धा कपूर), पर अभी बहुत कुछ कहानी फ्लैशबैक के काले दरवाजे के पीछे आपका इंतज़ार कर रही है.

रॉक ऑन 2’ एक बेहद उदास फिल्म लगती है, अपने किरदारों की उदासियों, मुश्किलों और परेशानियों की वजह से नहीं, बल्कि अपने थकाऊ गीतों, कहानी और परफॉरमेंस में उस ‘जादू’ के न होने से, जो ‘रॉक ऑन’ में हम पहले ही जी चुके हैं. ‘रॉक संगीत’ को पूरी तरह अपनाने वाले ‘मेरी लांड्री का एक बिल’ जैसे गानों की ताजगी को अब ज़िन्दगी के भारी-भरकम फलसफों वाली लाइनों ने कब्ज़े में ले लिया है. सहज, स्वाभाविक और कुदरती अभिनय को छोड़कर अब ड्रामेबाजी पर ज्यादा भरोसा दिखाया जाने लगा है. आठ साल पहले, दोस्ती के जिन मजेदार और निजी पलों को आप परदे पर महसूस करने में कामयाब रहे थे, अब वैसे पल फिल्म में न के बराबर हैं. उनकी जगह नए किरदारों की पेशोपेश अब आपको ज्यादा तंग करती है. फिल्म में संवाद, खासकर उन हिस्सों में जहां बार-बार केडी दर्शकों को कहानी सुनाने-समझाने की जिम्मेदारी ले लेता है, बेहद नाटकीय और फीके लगते हैं.

कहते हैं, संगीत सब दर्द भुला देता है. फिल्म में ऐसा सिर्फ एक या दो ही बार होता है. श्रद्धा की आवाज़ में गाये गीत और फिल्म के अंतिम क्षणों में म्यूजिक कॉन्सर्ट का पूरा हिस्सा (ऊषा उत्थुप  वाला गीत) ऐसे ही कुछ गिने-चुने पल हैं, जब फिल्म का संगीत आपको पूरी तरह बांधे रखने में कामयाब रहता है. अभिनय की दृष्टि से लगभग सभी मुख्य कलाकार एकदम से निराश तो नहीं करते, पर अपने आपको बेहिचक दोहरा रहते हैं. पूरब और अर्जुन अच्छे हैं. फरहान औसत हैं. श्रद्धा अपनी दूसरी फिल्मों से काफी बेहतर हैं. फिल्म में श्रद्धा के भाई और कुमुद मिश्रा के बेटे की भूमिका में प्रियांशु पैन्यूली काफी उम्मीद जगाते हैं.

आखिर में, ‘रॉक ऑन 2’ एक ऐसा सीक्वल है, जिसके न होने की वजहें बहुत सारी हो सकती थीं, और होने के बहाने बहुत कम. इसे देखना या झेलना किसी ऐसे कॉन्सर्ट से कम नहीं, जिसमें आपके पसंदीदा कलाकार तो हैं, पर उन्हें गाते हुए सुनने से ज्यादा आप उन्हें उदास चेहरे लिए घूमते देख रहे हैं. [2/5]             

Friday, 30 September 2016

एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी: औसत दर्जे की ‘धोनी-फ्रेंडली’ फिल्म! [2.5/5]

“धोनी रांची का रहने वाला है. स्कूल के दिनों में तो उसे क्रिकेट से कुछ लेना-देना भी नहीं था. फुटबॉल खेलता था, गोलकीपर अच्छा था. वो तो स्कूल के कोच सर ने क्रिकेट में खींच लिया. बाद में, रेलवे में टिकट कलेक्टर लग गया था, पर क्रिकेट का जूनून उतरा नहीं सर से. फिर जो एक बार इंडिया टीम में सेलेक्ट हुआ, सबकी छुट्टी कर दी. क्या सीनियर खिलाड़ी, क्या रिकॉर्ड-होल्डर्स! आज भी रांची आता है तो बाइक पर दोस्तों के साथ ‘कल्लू ढाबा’ की ओर निकल जाता है. बाइक का बड़ा शौक है भाई को. हर तरह की, महंगी से महंगी, सब मिल जायेंगी उसके गैराज़ में खड़ी. ज्यादा तो कुछ पता नहीं, पर साक्षी से पहले उसकी एक और भी गर्लफ्रेंड थी.” मुझे यकीन है, भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े सितारों में से एक महेंद्र सिंह धोनी के बारे में इतना सब तो उनके चाहने वालों की जबान की नोक पर रखा होगा. पर यहाँ सवाल कुछ और है, क्या महेंद्र सिंह धोनी पर बनने वाली फिल्म में भी आप यही सब देखना पसंद करेंगे? कामयाबी के पीछे संघर्ष ढूँढने की ललक हम सबमें रहती है, पर अपने चहेतों को ‘हीरो’ मान बैठने की जल्दबाजी में कहीं हम उस वजनदार नाम के पीछे की छोटी-छोटी ही सही तमाम गलतियों, खामियों को नज़रअंदाज़ करने की भूल तो नहीं कर बैठते? एक सच्ची और ईमानदार जीवनी इन सभी संदेहों और शंकाओं से लगातार परे रहने की कोशिश करती है.   

भारत में क्रिकेट और सिनेमा को ‘धर्म से परे एक और धर्म’ की नज़र से देखा जाता है. और अगर ऐसा है, तो नीरज पाण्डेय एकलौते ऐसे फ़िल्मकार के तौर पर उभर के आते हैं, जो अपनी इस नई फिल्म में इन दोनों धर्मों को बराबर तवज्जो देते हैं. नीरज की ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ एक सधी हुई ‘सेफ’ फिल्म है, जिसे हम एक ऐसे फैन की तरफ से अपने ‘हीरो’ को श्रद्धांजलि मान सकते हैं, जो अपने ‘हीरो’ को कहीं भी डगमगाने, लडखडाने या हिचकिचाने तक की छूट नहीं देता. हालाँकि फिल्म के पहले भाग में उनका पूरा ध्यान धोनी [सुशांत सिंह राजपूत] के अति-मध्यमवर्गीय परिवेश से उठने और उस माहौल की संवेदनाओं से उपजने वाले डर, झिझक और संयम से जूझने पर ही टिका रहता है, पर निश्चित तौर पर यही वो हिस्सा है जो साधारण, सहज और सरल होते हुए भी आपको बांधे रखने में कामयाबी हासिल करता है. पिता [अनुपम खेर] रांची के स्थानीय स्टेडियम में पंप चलाकर पानी से पिच गीली कर रहे हैं. बेटे की चाहत भी जानते हैं और पढ़ाई की जरूरत भी. हमेशा साथ खड़े रहने वाले दोस्तों की जमात को तो बस ‘माही मार रहा है’ सुनने की ललक है.

नीरज पाण्डेय अपनी फिल्मों में चौंकाने के लिए जाने जाते हैं. कभी कहानी को कोई सनसनीखेज मोड़ देकर, तो कभी अभिनेताओं के साथ किसी नए तरह के प्रयोग के साथ. ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ इस तरह की किसी लाग-लपेट में उलझने की कोशिश नहीं करती, बल्कि एक ही ढर्रे पर हलके-फुल्के उतार-चढ़ाव के साथ चलती रहती है. कुछेक बहुत रोचक और रोमांचक पलों में, युवराज सिंह [हैरी टंगरी] के साथ धोनी का पहला मैच, जहां दोनों एक-दूसरे के आमने सामने होते हैं, फिल्म के पहले भाग में सबसे उत्साहित करने वाला दृश्य बन पड़ता है. फिल्म के दूसरे भाग में, नीरज, धोनी के व्यक्तिगत जीवन और एक से अधिक प्रेम-प्रसंगों में झाँकने के साथ ही कहानी के ‘हीरो’ को फिल्म का ‘हीरो’ बना देने की गलती कर बैठते हैं. एक के बाद एक गानों की लड़ी लग जाती है और फिर अंत तक आते आते आप जिस धोनी को जानने-समझने की उम्मीद ले कर थिएटर आये थे, उसी धोनी की कामयाबी की चकाचौंध में गुम होकर रह जाते हैं.  

शुरुआत के दो-चार खराब ‘ग्राफ़िकली ट्रीटेड’ दृश्यों को छोड़ दें तो सुशांत सिंह राजपूत पूरी तरह से धोनी के किरदार में रचे-बसे नज़र आते हैं, खासकर परदे पर धोनी के चिर-परिचित शॉट्स को जिंदा रखने में. उन पर कभी धोनी जैसा दिखने का दबाव नहीं रहा, शायद इसलिए भी उनका आत्मविश्वास फिल्म में पूरी तरह कायम दिखता है. अनुपम खेर तो जैसे नीरज पाण्डेय की फिल्मों में एक ख़ास तरह की अभिनय-शैली अपना लेने भर तक ही सीमित दिखने लगे हैं. भूमिका चावला कहीं से भी सहज नहीं दिखतीं. हैरी टंगरी युवराज सिंह को बखूबी परदे पर उतार लाते हैं. धोनी के कोच की भूमिका में राजेश शर्मा शानदार अभिनय करते हैं. तमाम एतेहासिक मैचों में विज़ुअल ग्राफ़िक्स की मदद से सुशांत को धोनी बनाने में कहीं भी चूक नहीं होती.

आखिर में, नीरज पाण्डेय की ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ एक सामान्य फिल्म है जो मनोरंजक होने की शर्त पूरी करते-करते भूल जाती है कि किरदारों के गढ़ने में हथौड़ों की चोट भी उतनी ही जरूरी होती है, जितनी सहूलियत और नजाकत उसे सजाने-संवारने में. आखिर एक सफ़ेद कैनवास को आप कितने देर निहारते रहेंगे? कुछ स्याह भी हो, कुछ सीलन भी हो. 3 घंटे से भी थोड़ी लम्बी ये फ़िल्मी पारी, धोनी की क्रिकेट में सबसे यादगार पारियों के करीब भी नहीं पहुँचती, न रोमांच में, न ही इमोशन्स में! [2.5/5]                     

Friday, 12 August 2016

रुस्तम: सुस्तम, सुस्तम!! [1.5/5]

बॉलीवुड को कुछ चीजों में खासा मज़ा आता है. सच्ची घटनाओं को उठाओ, उनके जुड़े जमीनी किरदारों को कार्टून की तरह लम्बे, चौड़े, भद्दे बना दो, और फिर उन्हें इस शान से परोसो जैसे आपने कितना बड़ा एहसान किया हो हिंदी सिनेमा और देश के दर्शकों पर. 1959 के मशहूर और ऐतिहासिक नानावटी केस पर आधारित, टीनू सुरेश देसाई की ‘रुस्तम’ एक ऐसी ही बेशरम और ढीठ फिल्म है, जिसकी हिम्मत पर आपको सिर्फ गुस्सा और झुंझलाहट आती है, खासकर तब जब आप जानते हैं कि इसके निर्माताओं ने ‘ वेडनेसडे’, ‘स्पेशल छब्बीस’ और ‘बेबी’ जैसी समझदार फिल्मों से बॉलीवुड का एक नया चेहरा गढ़ा है. ‘रुस्तम’ न सिर्फ नानावटी केस की अहमियत और संजीदगी का मज़ाक बनाती है, बल्कि हिंदी सिनेमा में अब तक का सबसे वाहियात ‘कोर्टरूम’ ड्रामा दिखाने का सौभाग्य भी हासिल करती है.

फिल्मों में देशभक्ति का नया ‘पोस्टर-बॉय’ बनते जा रहे अक्षय कुमार यहाँ भारतीय नौसेना के कमांडर बने हैं, कमांडर रुस्तम पावरी, जिनकी एंट्री तिरंगे के सामने सफ़ेद यूनिफार्म में कदमताल करते हुए होती है. बीवी सिंथिया [इलियाना डी’क्रूज़] का अवैध सम्बन्ध अमीर दिलफेंक विक्रम मखीजा [अर्जन बाजवा] के साथ है. पता चलते ही, रुस्तम विक्रम के सीने में 3 गोलियों उतार कर उसकी हत्या कर देता है, और फिर खुद पुलिस स्टेशन में जाकर सरेंडर. आपकी जानकारी के लिए बता दूं, मुंबई का नानावटी केस भारतीय न्याय व्यवस्था का वो मशहूर मामला है, जिसमें फैसले तक पहुँचने के लिए आख़िरी बार ज्यूरी का इस्तेमाल हुआ था. एक ऐसा सनसनीखेज मामला, जब पूरी पब्लिक एक खूनी की रिहाई के लिए सड़कों पर उतर आई थी. असली मामले में भले ही सारा फोकस इस बात पे रहा हो कि खून तैश में आकर किया गया था, या ठंडे दिमाग से सोचकर; यहाँ फिल्म अक्षय कुमार के स्टारडम को ही सजाने-संजोने में लगी रहती है. फिल्म में देशभक्ति का तड़का भी इसी इमेज को और चमकाने की एक सस्ती कोशिश है.

90 के दशक की फिल्मों में अक्सर आपने नायक को कोर्ट में लकड़ी के कठघरे को उखाड़ कर विरोधी पक्ष के वकील या गवाहों की तरफ दौड़ते देखा होगा (अक्षय खुद भी ऐसी फिल्मों का हिस्सा रहे हैं). राहत की बात है यहाँ ऐसा कुछ नहीं होता, पर यहाँ जो होता है वो भी कुछ कम नहीं. दलीलों के नाम पर बचकानी जिरहें, हँसी के लिए ओछे मज़ाक, कोर्ट में मौजूद पब्लिक की बेमौसम तालियों और ’एक रुका हुआ फैसला’ की तर्ज़ पर ज्यूरी की अधपकी कशमकश; ‘रुस्तम’ हर तरफ अपने दिमागी दिवालियेपन की नुमाईश करती नज़र आती है.

परदे पर खूबसूरत फ्रेम को पेटिंग्स कहकर आपने कई फिल्मों के आर्ट डायरेक्शन और कैमरावर्क की दिल खोल कर सराहना की होगी. इस फिल्म में भी इस तरह के तारीफ़ की पूरी गुंजाइश है, अगर आपको अपने 5 साल के बच्चे की ‘माइक्रोसॉफ्ट पेंट’ में की गई हरकतें भी पेंटिंग लग्रती हों तो. इतने सारे चटख रंगों को एक साथ इससे पहले शायद मैंने ‘एशियन पेंट्स’ के शेड कार्ड में ही देखे होंगे. फिल्म का कानफाडू बैकग्राउंड स्कोर जज साहब के हथोड़े की तरह सर पे बजता ही रहता है. और उसपे, एक्टिंग में परफॉरमेंस का अकाल. कोई न कोई इंडस्ट्री में है, जो ‘सीरियस एक्टिंग’ का मतलब कैमरे के सामने सीरियस रहना समझता है और दूसरों को समझाता भी है. वैसे ‘रुस्तम’ में कुमुद मिश्रा साब एकलौते ऐसे कलाकार हैं, जिनकी एक्टिंग के रंग फिल्म के दूसरे कलाकारों से कहीं ज्यादा और बेहतर तरीके से खिल के और खुल के सामने आते हैं. पवन मल्होत्रा और कंवलजीत सिंह उनके बाद आते हैं.

अंत में; ‘रुस्तम’ एक बहुत ही थकी हुई फिल्म है, जो सिर्फ अक्षय कुमार की उस एक छवि का भरपूर फायदा उठाने के लिए बनाई गयी है, जिसमें वो अपने सस्ती, बेसिर-पैर की कॉमेडी से अलग कुछ संजीदा देने का दम भरते हैं. नायक कहानी में बड़ा हो, चलेगा! कहानी से बड़ा हो जाए? ये खतरनाक संकेत हैं. आखिर, एक और सलमान किसे चाहिए? [1.5/5]        

Wednesday, 6 July 2016

सुल्तान: भाई मुबारक!! [3/5]

ईद आ गयी है. सिर्फ इसलिए नहीं क्यूंकि रमज़ान का महीना ख़त्म होने को आया बल्कि इसलिए भी क्यूंकि ‘भाई’ की फिल्म सिनेमाघरों में आ गयी है. लोग अपनों में ईद मनाने ‘अन्दरुने मुल्क’ तो जा ही रहे होंगे, सिनेमाघरों में भी भीड़ गज़ब की उमड़ने लगी है. ये अप्रत्याशित नहीं है. इसी की उम्मीद थी, और ये उम्मीद बड़ी सोची-समझी उम्मीद है. इस उम्मीद का सिनेमा से उतना लेना-देना नहीं है, जितना कि फिल्मों के व्यावसायिक पक्ष से. अली अब्बास ज़फर की ‘सुल्तान’ जिस दिमागी कसरत से उपजती है, वहां स्टार की डेट्स और रिलीज़ का दिन पहले मुकर्रर हो जाता है; कहानी, निर्देशन और अभिनय से जुड़े दूसरे पहलू इसके बाद धीरे-धीरे अपने तय क्रम में जुड़ते चले जाते हैं.

‘भाई’ की कोई भी फिल्म ‘भाई’ की ही फिल्म होती है. ‘सुल्तान’ कुछ अलग नहीं है. हाँ, कुछ मामलों में थोड़ी बेहतर ज़रूर है. बड़े कसमसाते हुए ही सही, ‘भाई’ यहाँ 30 की उम्र से सफ़र करते हुए 40 की दहलीज़ तक पहुँचने का दम-ख़म दिखाते हैं, पहली बार. हालाँकि ‘भाई’ पहले भी स्क्रीन पर शर्ट उतारते नज़र आये हैं, पर इस बार जब वो ऐसा करते हैं, अन्दर से उनके गठीले बदन के खांचे नज़र नहीं आते बल्कि एक थुलथुली सी तोंद सामने छलक पड़ती है. जाने-अनजाने ही सही, ‘भाई’ ने किरदार में ढलने की ओर एक सफल कोशिश तो कर ही दी है. रही-सही कोर-कसर पूरी कर देते हैं ‘मस्तराम’ और ‘मिस टनकपुर हाज़िर हों’ के अभिनेता राहुल बग्गा, जो इस फिल्म में ‘भाई’ के हरियाणवी लहजे पे नज़र रखने वाले मास्टरजी बनकर परदे के पीछे ही डटे रहते हैं. इतने सब के बावजूद भी, ‘भाई’ अपने एक उसूल से पीछे नहीं हटते. ‘भाई’ एहसान लेते नहीं, एहसान करते हैं. चाहे वो अकेले हल चलाकर खेत जोतना ही क्यूँ न हो. वैसे अगर हल को पीछे से जमीन में जोतना वाला कोई न हो तो ये काम काम रह ही नहीं जाता. फिर तो आप दौड़ते रहिये हल सर पे उठाये.

सुल्तान’ में पहलवानी और मुक्केबाजी भरपूर है, पर इसे एक ‘स्पोर्ट्स फिल्म’ कहना उतना ही बचकाना होगा जितना साजिद खान की फिल्मों को कॉमेडी कहना. असलियत में ‘सुल्तान’ दो कुश्तिबाज़ों की प्रेम-कहानी है. आरफ़ा [अनुष्का शर्मा] और सुल्तान [सलमान खान]. आरफ़ा ओलंपिक्स में भारत के लिए गोल्ड मेडल हासिल करने का सपना देख रही है. गाँव का निठल्ला-नालायक सुल्तान जब उसे पहली बार मिलता है, आरफ़ा के मन में कोई दो राय नहीं है. उसके लिए उसका सपना ही सब कुछ है. आपको लगता है ये है हरियाणे की लड़की. बाद में, 30 साल का सुल्तान उसके प्यार में पहलवान तक बन जाता है. अचानक आरफ़ा को निकाह पढ़वाना है. अचानक आरफ़ा को माँ बनने से भी कोई दिक्कत नहीं. अचानक आरफ़ा को अपना सपना सुल्तान के सपने में दिखने लगता है. और ये सब सिर्फ इसलिए क्यूंकि ‘सुल्तान’ ‘भाई’ की फिल्म है. और चूँकि ‘सुल्तान’ ‘भाई’ की फिल्म है तो ‘भाईगिरी’ तो रहेगी ही; ‘बीइंग ह्यूमन’ का तड़का भी होगा, कभी न कम पड़ने वाला ‘स्वाग’ भी होगा, थोड़ी उल-जलूल हरकतें भी होंगीं, इमोशंस का बहाव भी होगा और होगा ढेर सारा एक्शन. सब है. अगर कुछ नहीं है, तो ये सब होने की कोई ख़ास, कोई मुक्कमल वजह!

तकरीबन 3 घंटे के अपने पूरे वक़्त में, ‘सुल्तान’ बेहतरीन कैमरावर्क, शानदार प्रोडक्शन-डिज़ाइन, जोशीले साउंडट्रैक और कुछ बहुत अच्छे फाइटिंग सीक्वेंस के साथ आपको बांधे रखने की पूरी कोशिश करती है. अभिनय में कुमुद मिश्रा, अमित साढ और सुल्तान की दोस्त की भूमिका करने वाला कलाकार पूरी तरह प्रभावित करते हैं. रणदीप हुडा मेहमान कलाकार की हैसियत से थोड़े ही वक़्त स्क्रीन पर नज़र आते हैं. अनुष्का के किरदार के साथ फिल्म की कहानी भले ही पूरी तरह न्याय करती न दिखती हो, पर अनुष्का कहीं भी कमज़ोर नहीं पड़तीं. ‘भाई’ की फिल्म न होती तो शायद हम और फिल्म के लेखक इस किरदार की पेचीदगी को और समझने की कोशिश ज़रूर करते.

अंत में; ‘सुल्तान’ में सलमान बहुत हद तक फिल्म के किरदार को अपनाने की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं. फिल्म में कई बार अपने हाव-भाव, अपने लहजे-लिहाज़ और अपने पहनावे से सलमान आपको चौंका देते हैं, और ये हिंदी सिनेमा के लिए काफी अच्छे संकेत हैं हालाँकि उनके अभिनय के बारे में अब भी बहस की जा सकती है, पर सबसे ज्यादा निराश करती है फिल्म की औसत कहानी और उसके घिसे-पिटे डायलाग. ज़िन्दगी के थपेड़ों से लड़ते-जूझते बॉक्सर जिनको अंततः मोक्ष, मंजिल, मुक्ति मिलती है बॉक्सिंग रिंग के अन्दर ही; ऐसी कितनी ही कहानियाँ हम पहले भी परदे पर देखते आये हैं, और इससे कहीं बेहतर ढंग से कही गयी, पर ‘सुल्तान’ की बात अलग है. ये ‘भाई’ की फिल्म है, तो ईद के मौके पर आप सबको...‘भाई मुबारक’! [3/5]          

Friday, 22 January 2016

AIRLIFT: Feelings in. Fake Jingoism out. [4/5]

It’s August, 1990. Kuwait is hit by Iraq’s invasion helmed by Saddam Hussein. More than 1,70,000 Indians are stuck in the war-zone with no hope left to see their motherland again. Even India as their country merely has any clue or clarity on how to evacuate them all from the Iraqi-invaded Kuwait city. And then rises a Hero!

To disappoint the classic star-driven, formula-forced, clap-causing Bollywood, he is not some Sunny Deol roaring his guts out to intimidate enemies in their own den or just another muscular giant showing-off his well-marketed humanity label to set things right. In fact, Raja Krishna Menon doesn’t even consider it to go explore that territory. AIRLIFT gets lifted up in that very moment. The merit also lies in casting Akshay Kumar who deliberately decides to underplay his unapologetically self-interested image for a while and gives us a character that’s more human than just feeding off someone’s unchallenging starry ego. He’s not new to the flavor though. BABY and SPECIAL 26 have done quite well for him in the past. AIRLIFT is a greater addition to the list.

Ranjit Katyal [Akshay Kumar] is a downright capitalist of Indian-origin all the rage in Kuwait’s political circle. He doesn’t leave a chance to proclaim himself a ‘Kuwaiti’ until Iraq’s unfortunate invasion shatters his power, position and well-established prospects in Kuwait. Before he could sense it, he’s caught in a situation with as much as 1,70,000 more Indians. First to rescue his family, then his people and finally to his countrymen; Ranjit goes every extra mile beyond his caliber, control and concern. AIRLIFT in that sense, is more of a human story than a patriotic political thriller. The patriotism portrayed here is never too pushy, preached or purposefully painted. No matter how millionth of times you have seen a tricolor being hoisted up from soil to sky, you’re tend to feel the ‘get-up-and-go’ force within you but Raja Menon gives it all a reason, more unadulterated and uncontaminated.

The writing makes sure you sink your teeth into the uncontrolled situation of a ticking time bomb in as real atmospheric manner as it could be. Leave a ‘chot lagti hai toh maa hi yaad aati hai’ expression alone, and you will never find an over the top jingoistic dialogues in your way. It is a relief, trust me. Even so, AIRLIFT does bother you more than a couple of times when it falls in its own trap. Inaamulhaq, an accepted capable actor plays an Iraqi Major with a strained accent that can get in your head like most of the caricature-ish villains have succeeded with in past. It is as misfit as Akshay Kumar playing a ‘Bollywood’ hero in a song where he could play any musical instrument he just picked up and sings exactly in the same voice a professional singer has been performing in at the very start. Nimrat Kaur playing Akshay’s not-so-selfless wife takes the stage for an opponent-beating monologue and though it may have been intentional, I wish she had been more ‘less’ into it.

AIRLIFT also carries the first worthy nomination for the year’s best supporting/surprising/underrated performances in Purab Kohli. He’s unbelievably good and the orchestrator in one of the scenes that leaves you with moist eyes and a lump in the throat. Kumud Mishra’s as the sensitive, sympathetic and supportive Indian government official is a spotless performance. Prakash Belawadi as a nagging and way too alert citizen does have some funnily irksome dialogues but I fear, the shoes he’s in are an old pair. Ajay Kumar marks his presence as Akshay’s subordinate.

At the end, AIRLIFT is a nice, well-intended break from loud and fake jingoism in Hindi cinema. It works well as a fine thriller and as a human drama too. Watch out for Akshay’s growing proficiency in playing characters that have less to speak but lots to converse! A story is told in a way it should be. Well, mostly. Do not miss it! [4/5]       

Friday, 7 August 2015

BANGISTAN: Satire turns sad, silly and superficial! [1.5/5]

Handling satire on current social, political and religious sentiments is never an easy job, at least not as easy as reviewing (bashing; in other word) other’s films. With BANGISTAN, noted film critic Karan Anshuman sneaks into the other side of the business now where he’s all open to face the shots he’s been taking at till now. And I stand in full salutation for him choosing a subject which is more than relevant in today’s times. We desperately need to develop our abilities to laugh at some of the most serious issues in our lives. Satires act like catalysts in trial of that exercise. Sadly, BANGISTAN promises a lot on that front but misses the target by large. Some serious smart writing, sincere efforts and unambiguous intention are all you need and not a buffoonery plot, chaotic climax and pretentious performances to save the day. Here Mr Critic disregards what he’s been preaching all his life.

The film finds its base in a fictional land where two religious radical groups are at warfare to gain supremacy. You don’t need those visible hints to guess that we are looking at our popular Hindu-Muslim extremists. Smartly, both the group-heads are being played on screen by the same actor [the dependable Kumud Mishra in double role]. Two sides of the same coin? Get it? Meanwhile, there are Shankaracharya [Shiv Subramanium] and Imam Saab [Tom Alter] secretly working towards peace, love and harmony between the two communities. Now, the radicals are planning to make a big shout at the international religious summit to be held in somewhere in Poland. The hardcore halfwits chosen to bomb the Peace convention are Praveen Chaturvedi [Pulkit Samrat] and Hafiz Bin Ali [Riteish Deshmukh].

BANGISTAN starts with a bang and showers hints of satire in almost every scene, dialogue and frame but runs out of impressive ideas and additions soon after the successful take-off. The Islamic extremists are seen cursing America’s policies against them sitting in an American fast food joint named FcDonalds. Well and good! The two chosen activists with switched religious identities and orientations for a fool-proof operation fights for each-other’s religious convictions is too quite exciting but soon, it gets stretched over its limits. And then comes, the all preachy, pretentious and predictable climax where all this ‘laugh and think, and laugh again’ satirical efforts ends in the melodramatic way of finishing it off so that you can go home and not die there.

Another big letdowns are the performances; Riteish Deshmukh is some relief and considerably ‘at it’ for the most parts. Pulkit Samrat doesn’t even try to get out of the impression that he is acting only to impress or imitate Salman Khan. Jacqueline Fernandez is credited here as ‘in a special appearance’ and that doesn’t mean she is doing anything special to the film. Chandan Roy Sanyal is good. Aarya Babbar is funny at places. Veterans Kumud Mishra, Shiv Subramanium and Tom Alter don’t disappoint, though are there only for few scenes.

At best, BANGISTAN is one of those incalculable films in which good cinematography, better production-design and scenic locations lure you to stay idle in your seats till the lights go on. Otherwise; even in its 2 hours of modest duration, there are times when you start questioning your sense of judgment about the film, and not about the extreme religious sentiments the film supposed to hit on. Sad, silly and superficial! [1.5/5] 

Friday, 20 February 2015

BADLAPUR: Good is good, bad is better! [4/5]

Finally! The age-long standard formula for a successful Bollywood revenge film gets thrashed, whipped and slashed heartlessly by Sriram Raghavan’s dark, bold and gutsy BADLAPUR. The happy & happening world of our hero is shattered while the evil trying to execute one of his unlawful acts and now, the traumatized victim is all gritty to punish the doers. Sounds household? Well, it does but don’t go easy on this as the road ahead from here is anything taken before in Bollywood. BADLAPUR is unconventional, exceptional and incomparable in its league.

It’s been 15 years; Raghu [the unforeseen shades of charming Varun Dhawan] once your regular boy next door is obstinately trying his luck to stumble on one of the murderers of his family. The other partner in crime Liak [the show-stealer Nawazuddin Siddiqui] is already serving 20-year term. An NGO activist informs Raghu that Laik is dying of cancer and needs his forgiveness to taste the free air for the rest of his life. Raghu is unlike our heroes with heart and is even more focused than villains in our films used to be. He doesn’t blow up hideouts of the villain. He hammers on their mental stature. In one of the incontestable situations, he forces his opponent [Vinay Pathak] to let him sleep with his wife [Radhika Apte]. The wife is made producing fake sexual sounds behind the doors and the husband is seen dying in humiliation.

BADLAPUR is an enjoyable and inventive mix of such brutal humor with amusing action but the film gets a new dimension in the climax. The villain ticks off the hero for cold-bloodedly killing his partner. ‘You have gone mad. Go, see a doctor’ he suggests sympathetically. Film also raises the question that how far one would go for revenge? And what after it’s done? The other astounding subplot is the heartfelt romantic track between Laik and his sex-worker girlfriend Jhumli [Huma Qureshi]; where the lover loves to hear ‘dirty talks’ his flame masters in.    

Sriram Raghavan takes forward all the expectations his ‘EK HASINA THI’ and ‘JOHNNY GADDAR’ has built in cinema-lovers all over India. BADLAPUR too constantly keeps you on the edge of your seat with the riveting drama taking a new turn every time you blink your eyes. The rawness in characters and in the characteristics of the scene never misses the opportunity to surprise you. Watch out for the brilliantly visualized and set first static shot of the film. It’s your regular dull day in apparently uncrowded market and as a viewer; you really don’t see it coming.

BADLAPUR is a film celebrated most for its casting and worthy performances from every one listed. Yami Gautam looks ravishing and does succeed in making your heart bleed in those ‘not many’ scenes. Ashwini Kalsekar as the private detective leaves an impression she’s known for. Pratima Kannan is remarkably good so is Vinay Pathak. Radhika Apte plays it effectively while playing a convinced wife who can go any extend to save her husband. I have always maintained that Kumud Mishra is an eye-candy treat to see that something really sparkling in him. Huma continues to entice the screen with her mystical looks and presence. Divya Dutta is another talent who never fails.  And last but not the least, the Varun Dhawan-Nawazuddin duo! Where the balanced-than-ever-before Varun surprises with his new find scheming eyes and calculated smile, Nawaz takes your breath away with his gifted chameleon-like ability to throw on you an all new shade in his character one after the other.

To rest my case, Raghavan’s BADLAPUR is a smartly bricked film that blurs the line between your regular perception about good and bad, and does it so beautifully you find yourself in a tight spot as which side you are and which side you should be at the end of day. Watch out for Nawazuddin’s deliciously evil performance and the unconventional route it dares to take! A must-watch!! [4/5] 

Friday, 4 July 2014

LEKAR HUM DEEWANA DIL: Escape this downgraded version of SOCHA NA THA! [1.5/5]

If Bollywood films are to be believed, everyone in love is predestined to elope from their wedding-mandaps at the very last moment when Pheras are to be performed. Events of similar nature do happen in real life, it’s just I haven’t been lucky enough to witness any such in my whole life of more than 30 years. But one thing I am very sure about…I have seen romantic comedies like Arif Ali’s LEKAR HUM DEEWANA DIL for more than I could remember. One prominent inspiration here is SOCHA NA THA, the launch-pad of writer-director Imtiaz Ali who incidentally also happens to be Arif’s brother. The similarities and likenesses are so evident; LEKAR HUM DEEWANA DIL could & should be tagged as a SOCHA NA THA rip-off, but an awful one. It’s an extremely long-boring-escapable journey no one will like to hop on.

The ‘BFF (Best Friends Forever)’ duo Karisma & Dino [Newcomers Deeksha Seth & the Kapoor-clan Arman Jain] are often teased as a couple by their common friends. In a hasty & impulsive pronouncement of love and the passion of being together, they decide to elope as Karisma’s hardcore traditional father would marry her off to any boring guy of his choice and for Dino’s father; Dino is nothing but a plain nobody. Together, they take a ride that is hardly any exciting and too superfluous to find a place in your heart. Much later, just on the verge of interval; they realize the honeymoon period is over and the romantic fairytale is nowhere to be found. Follows the process of annulment of their marriage, parental participation to make things even bitter and finally, the weirdly convenient realization of love for each other! Oh, not again!

Romantic comedies are the safest options to mark a début in Bollywood, and probably the hardest ones too. What one expects from any such effort are a thicken chemistry between leads, freshness in the plot and relatable drama to clinch your emotions at its place. Sadly, Arif as a writer-director doesn’t even try to look any different and gets hugely dependent on his brother’s flicks like SOCHA NA THA [parental angle], JAB WE MET [Stopover at small city] & even COCKTAIL [For most of styling and dialogues] for so-called inspirations. Only addition here that had slightest of promises was their accidental encounter with naxalites of Bastar & Dantewada. Disheartening to say that even this sequence ends up mocking their fight to justice & freedom in a completely ham-fisted item number!

Arman and Deeksha both look confident and do succeed in creating some very good moments to rejoice but the staleness in writing kills it all. Of the supporting cast, most are just wasted and that included veterans like Kumud Mishra, Rohini Hattangadi and Varun Vadola. A R Rehman’s music soothes the soul in between all the baffling scenes haphazardly coming one after the other but it never rules the heart. You’ll find it hard to remember all the ‘Khaleefas’ and ‘Tu Shinings’ sooner or later.

To sum up, LEKAR HUM DEEWANA DIL suffers from a time-lapse syndrome. Had it come in late 90’s when uber urban generation was gaining the spot with a certain lingo full of slangs, strong urge to reinvent new dimensions to the term ‘new-age’ and a demand of change in cinema, it would have made a clean mark. As of now, it is just another forgettable love-story! Escape it! [1.5/5]

Friday, 6 June 2014

FILMISTAAN: Divided by borders! United by cinema!! [3/5]

Clad in sheer innocence & extreme enthusiasm, Sunny Arora [played by the fabulous Sharib Hashmi] is probably one fervent follower of Bollywood we all have met-seen-known at some point in our lives. Hardcore is hardly able enough to match up with his degree of intensity. No matter how hostile the situation is, he never ceases to crack the juiciest ‘filmy’ dialogues Bollywood has produced in all these years. ‘iss chalte-phirte Bombay Talkies ko ignore karna mushkil hi nahin, namumkin hai’. He’s the undividable soul to FILMISTAAN- 2012’s National Award Winning Film by Nitin Kakkar.

In the deserted Indo-Pak border range of Rajasthan, Sunny Arora- a wannabe actor working now as assistant director in a foreign documentary filmmaking crew mistakenly gets abducted by a terrorist group. Till the mistake is being corrected, he has to find a place in a small village in outskirts of Pakistan. The fellows around to accompany him are a fanatic with gun [Kumud Mishra, last seen in Revolver Rani], his sidekick [Gopal Dutt in a controlled but confident performance] and Aftab- a local distributor-cum-seller of pirated CDs of Bollywood movies [Inaamulhaq in a competent supporting role].

Once reached in gun-shadowed Pakistan, FILMISTAAN starts trying to make the balance between the relatable similarities, the pain of partition divided in both the parties in equal measure and the undivided love for Bollywood. In one sequence, when the camera-conscious Sunny decides to take charge of directing his own hostile video, unknowingly he turns the terrorists in a film crew with designated roles to each one. In other, Sunny locked up in a dark room starts performing dialogues of Salman’s superhit ‘Maine Pyaar Kiya’ well in sync with the movie getting played on home video outside. You might enjoy this on screen but in real; nothing can be more irritating than that. I can guarantee. FILMISTAAN does the same to you. When you enjoy it, you enjoy it to the fullest but when it gets dragged and pushy with pinch of heavy drama and a completely unimaginative climax; you sure take the back seat as a discouraged viewer in search of a better outcome.

FILMISTAAN if does cross the above-average barrier, it is all because of the two very colourful, very dynamic characters disguised as big cinema-lovers. Sharib Hashmi is a total revelation as Sunny. His energy and confidence as a fine performer never run out. Inaamulhaq provides full support with his starry-eyed movie-buff portrayal. The chemistry between the two is one of the highlights. Kumud Mishra is a veteran and though he’s there hardly speaking much, his expressive eyes do the most for him. Gopal Dutt impresses. 

In gist, as quoted by Sunny in the film, “film chahe chhoti ho, dil se banani chahiye”…and FILMISTAAN is a film made with heart, humor and drama all at its place. Flaws can be ignored if entertainment is there in a larger capacity. Watch it for a good film and good fun! [3/5]