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Friday, 1 March 2019

सोनचिड़िया : मुक्ति के प्यासे, बीहड़ के पंछी! (3.5/5)


बीहड़ के बाग़ियों की सारी लड़ाईयां सरकारी फौज़ और जातियों में बंटे अलग-अलग गैंगों तक ही सीमित नहीं है. कुछ मुठभेड़ अंदरूनी भी हैं. खुद से खुद की लड़ाई. जिन बाग़ियों की बन्दूक दूसरी बार सवाल पूछने पर गोलियों से जवाब देना पसंद करती है, अब बार-बार खुद ही सवाल पूछने लगी है. ‘बाग़ी का धर्म क्या है?’. जवाब भी सबके अपने अपने हैं, कुछ अभी भी तलाश रहे हैं. आम तौर पर हिंदी फिल्मों में चम्बल के डाकू या तो खूंखार लुटेरे होते हैं, या सामाजिक अन्याय और सरकारी दमन से पीड़ित कमज़ोर नायकों के विरोध का प्रखर स्वर बनने की एक प्रयोगशाला. ‘बैंडिट क्वीन और ‘पान सिंह तोमर इसी खांचे-सांचे की फिल्में होते हुए भी उत्कृष्ट अपवाद हैं. अभिषेक चौबे की ‘सोनचिड़िया थोड़ी और गहरे उतरती है. ज़मीनी किरदारों के ज़ेहन तक पैठ बनाने वाली, बदले-छलावे, न्याय-अन्याय, सही-गलत, जाति-पांति और आदमी-औरत के भेदों के साथ-साथ मोक्ष, मुक्ति और पछतावे का पीछा करती फिल्म. 1972 में आई प्रकाश मेहरा की फिल्म ‘समाधि’ के पहले हिस्से जैसा कुछ.

मान सिंह (मनोज बाजपेई) के कंधे झुकने लगे हैं. बढ़ती उम्र की वजह से नहीं, कंधे पर हर वक़्त टंगी दोनाली की वजह से नहीं, बल्कि कुछ है जो अतीत से बार बार बाहर निकल कर दबोच लेता है. गैंग के एक दूसरे नौजवान सदस्य लाखन सिंह (सुशांत सिंह राजपूत) को भी उस 5 साल की लड़की की चीख आज भी डराती रहती है, जो मान सिंह और लाखन के कुकर्मों की इकलौती चश्मदीद रही थी. दोनों अब मोक्ष और मुक्ति की तलाश में हैं, और दारोगा गुर्जर (आशुतोष राणा) इन्हें मौत तक पहुंचाने के फ़िराक में. गैंग धीरे-धीरे ख़तम हो रहा है. रेडियो पर इंदिरा गांधी के आपातकाल की घोषणा हो चुकी है. साथियों में ‘सरेंडर’ की भी सुगबुगाहट चल रही है. एक बाग़ी की चिंता है कि सरेंडर के बाद जेल में ‘मटन’ मिलेगा या नहीं? ऐसे में, इंदुमती तोमर (भूमि पेडणेकर) और आ टकराती है अपनी ‘सोनचिरैय्या को साथ लिए. साथी बाग़ी वकील सिंह (रनवीर शौरी) की मर्ज़ी के खिलाफ, लाखन के लिए यही सोनचिरैय्या (यौनशोषण की शिकार एक बच्ची) उसके अतीत के दाग को पश्चाताप की आग में तपाने का जरिया दिखने लगती है.

‘सोनचिड़िया में अभिषेक चौबे चम्बल को दिखाने के लिए जिस चश्मे का इस्तेमाल करते हैं, वो बेहद जाना-पहचाना है. शेखर कपूर वाला. हालाँकि अपने कथानक में वो जिस तरह डार्कनेस ले आते हैं, और रूखे-रूखे व्यंगों का प्रयोग करते हैं, वो उनका अपना ही ट्रेडमार्क है. फिल्म की शुरुआत आपको अंत का आभास कराती है. एक ऐसी शुरुआत जहां सब कुछ ख़तम हो रहा है. मानसिंह का गैंग अपना अच्छा खासा नाम कमा चुका है. खौफ़ के लिए उसे सिर्फ लाउडस्पीकर पर मुनादी ही करनी पड़ती है, गोलियों की बौछार नहीं. शादी लूटने पहुंचे डाकू दुल्हन को 101 रूपये का शगुन दे रहे हैं. नए हथियारों की जरूरत तो है, पर गैंग के पास पैसे ही नहीं हैं. गोली लगती है, तो मानसिंह हँसता है, “सरकार की गोली से कबहूँ कोऊ मरे है? अरे इनके तो वादन से मर जात है लोग.’. दारोगा गुर्जर जाति का है, और उसके नीचे काम करने वाले चाचा-भतीजा ठाकुर जाति के. चाचा (हरीश खन्ना) की समझ पुख्ता है. वर्दी से बड़ी है चमड़ी. चमड़ी पे कोई स्टार नहीं लगे होते, जैसी जिसको मिल गयी, मिल गयी. एक दृश्य में एक महिला बाग़ी का दर्द सामने निकल रहा है. ‘ठाकुर, बाभन मर्दों में होते हैं, औरतों की जात अलग ही होती है’. झूठ नहीं है, तभी तो 12-14 साल का बेटा बंदूक टाँगे माँ को खोज कर मारने के लिए डकैतों के बीच घूम रहा है. खुद में बाप से ज्यादा मर्दानगी महसूस करता है.

‘सोनचिड़िया एक डकैतों की फिल्म लगने के तौर पर आम दर्शकों में जितनी भी उम्मीदें जगाती है, सब पर तो खरी नहीं उतरती. मसलन, फिल्म का एक्शन मसालेदार होने का बिलकुल दावा नहीं करता, हालाँकि सच्चाई से दूर भी नहीं जाता. हट्टे-कट्टे 6 फुटिया पहलवान को दबोचने में 3-3 डाकू हांफने लगते हैं. फिल्म की रफ़्तार धीमी लगती है. गीत-संगीत भी किरदारों के मूड से ज्यादा बीहड़ की बड़ाई में रचे-बसे हैं. इतने सब के बावजूद, सिनेमा की नज़र से फिल्म किसी मास्टरक्लास से कम नहीं. स्क्रीनप्ले में अभिषेक की बारीकियां, खालिस बुन्देलखंडी बोली के संवाद, बेहतरीन कैमरावर्क और कलाकारों का शानदार अभिनय; ‘सोनचिड़िया डकैतों की फिल्म होने से कहीं ज्यादा कुछ है. मनोज बाजपेई कमाल हैं. ढलती उम्र को जिस तरह मनोज अपने किरदार में ढाल कर पेश करते हैं, आप उन्हें खलनायक से अलग, इंसानी तौर पर देखने से नहीं रोक पाते. सुशांत बिलकुल घुलमिल जाते हैं. उनकी पहली फिल्म होती तो शायद आप उन्हें ‘एनएसडी के लौंडों’ से अलग नहीं समझते! रनवीर शौरी फिर एक बार जता जाते हैं कि बॉलीवुड उन्हें कितना कमतर आंकता है? आशुतोष राणा अपने पुराने अवतार में हैं. उनकी कन्चई आँखें अब भी अपनी कुटिलता से आपके अन्दर सिहरन पैदा करने में कामयाब रहती हैं, इतने सालों बाद भी. भूमि गिनती के दृश्यों में ही आगे आती हैं, और उनमें सटीक हैं.  

आखिर में, ‘सोनचिड़िया चम्बल की घाटियों और रेतीली पहाड़ियों में आम से दिखने वाले डकैतों का एक नया सच है, जहां सब अपनी अपनी मुक्ति का मार्ग ढूंढ रहे हैं. जाति, धर्म, समाज और सरकार से लड़ते-लड़ते एक बड़े अंत की तलाश में भटकते कुछ ऐसे बाग़ी, जिनकी जिंदगियों के मायने और मकसद एक बड़ा मतलब लिए हुए हैं. [3.5/5]      

Friday, 9 June 2017

राब्ता: पुरानी 'पुनर्जन्म' वाली फ़िल्मों का बासी 'रायता'! [1/5]

एक धूमकेतु है, 'लव जॉय' नाम का. 800 साल में एक बार पृथ्वी के पास से होकर गुजरता है. अगले हफ्ते ये कुदरती करिश्मा फिर होने वाला है, और इसी के साथ कुछ और भी होने वाला है, जो पहले भी हो चुका है. ठीक इसी वक़्त पर, ठीक इसी मुहूर्त में. तकलीफ़ ये है कि चौसर की इस बाज़ी में सारे के सारे अहम् खिलाड़ी दुनिया के अलग-अलग कोनों में हैं. कहानी का राजकुमार (सुशांत सिंह राजपूत) पंजाब में गिन-गिन कर लड़कियां पटाने में व्यस्त है, अनाथ राजकुमारी (कृति सैनन) लन्दन में चॉकलेट शॉप चलाती हैं, और दुष्ट राजा (जिम सरभ) जाने कहाँ समन्दर के बीचो-बीच बने अपने महल में, एक काली-सफ़ेद तस्वीर में बने चेहरे के होठों पर लाल रंग पोत रहा है. 

अब कुदरत, लेखक (गरिमा-सिद्धार्थ) और निर्देशक दिनेश विजान की जिम्मेदारी बनती है, कि कैसे इस एक हफ्ते में तीनों को एक-दूसरे के सामने ला खड़ा करें? रास्ता कठिन है; पहले तो राजकुमार का लन्दन आना, मुलाक़ात के दूसरे दिन ही उनका राजकुमारी के बिस्तर से अंगड़ाईयां लेते हुए बाहर निकलना, दुष्ट राजा साहब का इत्तेफ़ाकन लन्दन आ टपकना, फिर धीरे-धीरे सबको पिछले जनम की याद दिलाना. किसी के आम फ़िल्मकार के बस की कहाँ ये माथापच्ची? फिल्मों में पहले कभी देखा-सुना हो, तो भी थोड़ी मदद हो जाती. खैर...राजकुमारी को सपने आते हैं, अजीब डरावने सपने. अपने 'करन-अर्जुन' की तरह, फोटो-नेगेटिव इफ़ेक्ट में. पानी से डर भी लगता है. राजकुमार के पीठ पर चोट की निशान जैसा बर्थ-मार्क भी है, जैसा शाहरुख़ को था 'ओम शांति ओम' में. राजा साहब से कोई पूछने की हिम्मत भी नहीं करता कि इस जनम में उन्हें सब कुछ याद कैसे आया? ना ही वो बताने की जरूरत भी समझते हैं, पर इन सबमें जो ढाई घंटे (पूरी की पूरी फिल्म) बर्बाद होते हैं, उसे बचाने का एक उपाय तो मैं ही दिनेश विजान साब को सुझा सकता था. अच्छा होता, अगर फिल्म की शुरुआत में ही सारे किरदारों को 'राज़ पिछले जनम का' के एक-दो एपिसोड दिखा दिये जाते. इसी बहाने रवि किशन से अभिनय के गुर भी सीखने को मिल जाते, और सबका दिमाग भी चलने लगता. 'आग से डर लगता है? आप पिछले जनम में जल के मरे थे' ' गले पे निशान है? आप रस्सी से लटक के मरे थे' और सबके सब पिछले जनम में राजा-रानी-सैनिक. कोई गरीब किसान नहीं, किसी की सामान्य मृत्यु नहीं. जाओ, ऐश करो और अपनी मौत का बदला लो.    

'राब्ता' देखते हुए एक ख्याल बार-बार दिमाग में हथौड़े की तरह बजता है कि आखिर कोई भी समझदार इस तरह की बेवकूफ़ी भरी, घिसी-पिटी, वाहियात कहानी पर फिल्म बनाने और उसमें काम करने के लिए राजी क्यूँ, और क्यूँ होगा? फिर याद आये इस फिल्म से निर्देशन में कदम रख रहे दिनेश विजान साब, जो खुद 'बीइंग सायरस', 'लव आज कल', 'कॉकटेल', 'बदलापुर' और 'हिंदी मीडियम' के प्रोड्यूसर रह चुके हैं, और फिर अचानक ही मन की सारी शंकायें, दुविधाएं झट काफ़ूर हो गयीं. 'बॉस हमेशा सही होता है' की तर्ज़ पर एक कहावत फिल्म इंडस्ट्री में भी बहुत मशहूर है, 'मेरा पैसा, मेरा तमाशा'. पैसों की गड्डियों के नीचे दबी डेढ़ सौ पेज की स्क्रिप्ट में खामियां किसे दिखतीं भला. 

बहरहाल, फिल्म में अगर कुछ ठीक-ठाक है, तो वो हैं फिल्म के संवाद. हालाँकि उनका सच्चाई से कोई लेना-देना नहीं और कई बार तो इतने पीछे चले जाते हैं, जैसे राजकुमार-वहीदा रहमान-मनोज कुमार के 'नीलकमल' की बची-खुची खुरचन हों; पर अपने नए ज़माने के तौर-तरीकों और लहजों से एक वही हैं जो थोड़ा बहुत मनोरंजन करते रहते हैं. अभिनय में कृति कम निराश करती हैं, और शिकायत के मौके भी कम ही देतीं हैं. सुशांत कोशिश तो बहुत करते हैं, पर चाह के भी आप उनको सराहने का ज़ोखिम नहीं ले पाते. जिम सरभ इस तरह की मेनस्ट्रीम मसाला फिल्मों के लिए बने नहीं दिखते. उनका अभिनय 'नीरजा' में चौंका देने वाला था. यहाँ वो आपके भरोसे को डगमगा देते हैं. मेहमान भूमिका में न तो राजकुमार राव खुद पहचाने जाते हैं, न ही उनके अभिनय की वो चिर-परिचित छाप. हाँ, उनके मेक-अप की जितनी तारीफ़ करनी हो, भले ही कर लीजिये. 

आखिर में, 'राब्ता' देखने की वजह तो छोड़ ही दीजिये, मुझे इस फिल्म के बनने की वजह भी दूर-दूर तक समझ नहीं आती. इस ढाई घंटे की एक भयंकर भूल को भुलाने में मुझे कोई ख़ास दिक्कत नहीं होगी, पर दिनेश विजान साब से एक शिकायत तो रहेगी. "ज़नाब, इतने ही बजट में चार छोटे-छोटे 'मसान' 'अ डेथ इन द गंज', 'बीइंग सायरस' आराम से आ जाते, इतनी क्या हाय-तौबा मची थी 'राब्ता' परोसने की?' पर मुझे क्या, पैसा आपका, तो तमाशा भी आपका'! [1/5]            

Friday, 30 September 2016

एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी: औसत दर्जे की ‘धोनी-फ्रेंडली’ फिल्म! [2.5/5]

“धोनी रांची का रहने वाला है. स्कूल के दिनों में तो उसे क्रिकेट से कुछ लेना-देना भी नहीं था. फुटबॉल खेलता था, गोलकीपर अच्छा था. वो तो स्कूल के कोच सर ने क्रिकेट में खींच लिया. बाद में, रेलवे में टिकट कलेक्टर लग गया था, पर क्रिकेट का जूनून उतरा नहीं सर से. फिर जो एक बार इंडिया टीम में सेलेक्ट हुआ, सबकी छुट्टी कर दी. क्या सीनियर खिलाड़ी, क्या रिकॉर्ड-होल्डर्स! आज भी रांची आता है तो बाइक पर दोस्तों के साथ ‘कल्लू ढाबा’ की ओर निकल जाता है. बाइक का बड़ा शौक है भाई को. हर तरह की, महंगी से महंगी, सब मिल जायेंगी उसके गैराज़ में खड़ी. ज्यादा तो कुछ पता नहीं, पर साक्षी से पहले उसकी एक और भी गर्लफ्रेंड थी.” मुझे यकीन है, भारतीय क्रिकेट के सबसे बड़े सितारों में से एक महेंद्र सिंह धोनी के बारे में इतना सब तो उनके चाहने वालों की जबान की नोक पर रखा होगा. पर यहाँ सवाल कुछ और है, क्या महेंद्र सिंह धोनी पर बनने वाली फिल्म में भी आप यही सब देखना पसंद करेंगे? कामयाबी के पीछे संघर्ष ढूँढने की ललक हम सबमें रहती है, पर अपने चहेतों को ‘हीरो’ मान बैठने की जल्दबाजी में कहीं हम उस वजनदार नाम के पीछे की छोटी-छोटी ही सही तमाम गलतियों, खामियों को नज़रअंदाज़ करने की भूल तो नहीं कर बैठते? एक सच्ची और ईमानदार जीवनी इन सभी संदेहों और शंकाओं से लगातार परे रहने की कोशिश करती है.   

भारत में क्रिकेट और सिनेमा को ‘धर्म से परे एक और धर्म’ की नज़र से देखा जाता है. और अगर ऐसा है, तो नीरज पाण्डेय एकलौते ऐसे फ़िल्मकार के तौर पर उभर के आते हैं, जो अपनी इस नई फिल्म में इन दोनों धर्मों को बराबर तवज्जो देते हैं. नीरज की ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ एक सधी हुई ‘सेफ’ फिल्म है, जिसे हम एक ऐसे फैन की तरफ से अपने ‘हीरो’ को श्रद्धांजलि मान सकते हैं, जो अपने ‘हीरो’ को कहीं भी डगमगाने, लडखडाने या हिचकिचाने तक की छूट नहीं देता. हालाँकि फिल्म के पहले भाग में उनका पूरा ध्यान धोनी [सुशांत सिंह राजपूत] के अति-मध्यमवर्गीय परिवेश से उठने और उस माहौल की संवेदनाओं से उपजने वाले डर, झिझक और संयम से जूझने पर ही टिका रहता है, पर निश्चित तौर पर यही वो हिस्सा है जो साधारण, सहज और सरल होते हुए भी आपको बांधे रखने में कामयाबी हासिल करता है. पिता [अनुपम खेर] रांची के स्थानीय स्टेडियम में पंप चलाकर पानी से पिच गीली कर रहे हैं. बेटे की चाहत भी जानते हैं और पढ़ाई की जरूरत भी. हमेशा साथ खड़े रहने वाले दोस्तों की जमात को तो बस ‘माही मार रहा है’ सुनने की ललक है.

नीरज पाण्डेय अपनी फिल्मों में चौंकाने के लिए जाने जाते हैं. कभी कहानी को कोई सनसनीखेज मोड़ देकर, तो कभी अभिनेताओं के साथ किसी नए तरह के प्रयोग के साथ. ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ इस तरह की किसी लाग-लपेट में उलझने की कोशिश नहीं करती, बल्कि एक ही ढर्रे पर हलके-फुल्के उतार-चढ़ाव के साथ चलती रहती है. कुछेक बहुत रोचक और रोमांचक पलों में, युवराज सिंह [हैरी टंगरी] के साथ धोनी का पहला मैच, जहां दोनों एक-दूसरे के आमने सामने होते हैं, फिल्म के पहले भाग में सबसे उत्साहित करने वाला दृश्य बन पड़ता है. फिल्म के दूसरे भाग में, नीरज, धोनी के व्यक्तिगत जीवन और एक से अधिक प्रेम-प्रसंगों में झाँकने के साथ ही कहानी के ‘हीरो’ को फिल्म का ‘हीरो’ बना देने की गलती कर बैठते हैं. एक के बाद एक गानों की लड़ी लग जाती है और फिर अंत तक आते आते आप जिस धोनी को जानने-समझने की उम्मीद ले कर थिएटर आये थे, उसी धोनी की कामयाबी की चकाचौंध में गुम होकर रह जाते हैं.  

शुरुआत के दो-चार खराब ‘ग्राफ़िकली ट्रीटेड’ दृश्यों को छोड़ दें तो सुशांत सिंह राजपूत पूरी तरह से धोनी के किरदार में रचे-बसे नज़र आते हैं, खासकर परदे पर धोनी के चिर-परिचित शॉट्स को जिंदा रखने में. उन पर कभी धोनी जैसा दिखने का दबाव नहीं रहा, शायद इसलिए भी उनका आत्मविश्वास फिल्म में पूरी तरह कायम दिखता है. अनुपम खेर तो जैसे नीरज पाण्डेय की फिल्मों में एक ख़ास तरह की अभिनय-शैली अपना लेने भर तक ही सीमित दिखने लगे हैं. भूमिका चावला कहीं से भी सहज नहीं दिखतीं. हैरी टंगरी युवराज सिंह को बखूबी परदे पर उतार लाते हैं. धोनी के कोच की भूमिका में राजेश शर्मा शानदार अभिनय करते हैं. तमाम एतेहासिक मैचों में विज़ुअल ग्राफ़िक्स की मदद से सुशांत को धोनी बनाने में कहीं भी चूक नहीं होती.

आखिर में, नीरज पाण्डेय की ‘एम एस धोनी- द अनटोल्ड स्टोरी’ एक सामान्य फिल्म है जो मनोरंजक होने की शर्त पूरी करते-करते भूल जाती है कि किरदारों के गढ़ने में हथौड़ों की चोट भी उतनी ही जरूरी होती है, जितनी सहूलियत और नजाकत उसे सजाने-संवारने में. आखिर एक सफ़ेद कैनवास को आप कितने देर निहारते रहेंगे? कुछ स्याह भी हो, कुछ सीलन भी हो. 3 घंटे से भी थोड़ी लम्बी ये फ़िल्मी पारी, धोनी की क्रिकेट में सबसे यादगार पारियों के करीब भी नहीं पहुँचती, न रोमांच में, न ही इमोशन्स में! [2.5/5]                     

Friday, 3 April 2015

DETECTIVE BYOMKESH BAKSHY: Splendid, spectacular & mesmeric! [4/5]

A man goes missing. The detective offering help doesn’t even blink or think before giving out his verdict that it is a possible case of murder. His one of many simplistic theories draws even the son in suspicion. As a viewer, you don’t need much time to realize that he is not your usual ‘unrealistically intellectual’ beast like Sherlock Holmes and is not at all a detective but a detective in making. Dibakar Banerjee’s splendid-spectacular & mesmeric murder-mystery thriller DETECTIVE BYOMKESH BAKSHY! may not be able to flabbergast you with terrific twists and reckless revelations but then, it also never ceases to engage with enticing visuals, imaginatively authentic art-design to recreate the nostalgic period, acquisitive music score, brilliantly written characters and some really well-directed sequences for a cinematic treat.

It is Calcutta of 1940s. Japanese are constantly trying to snatch the control over the city from the British. Chinese drug mafia wants to make it a world drug capitol. The young ones are fighting for freedom. The ‘newborn in business’ Byomkesh Bakshy [Sushant Singh Rajput] is trying to prove his theory of missing man’s murder for his forced client Ajit [Anand Tiwari]. He is the same who joins Bakshy later as his sidekick or subordinate. The connecting threads lead him to a powerful politician, his sultry & seductive mistress [Swastika Mukherjee], an intimidating dentist-cum-Japanese tutor and a kind and obliging [Neeraj Kabi of ‘SHIP OF THESEUS’]. For the most parts, Bakshy is only seen finding links between two loose ends. For times, when we all are modified to watch razor-sharp detectives seeing it from miles and acting against it in an electric-speed; there is hardly anything in the plot you would describe as ‘extremely surprising’ but the ambiguity in the air never goes missing.

DETECTIVE BYOMKESH BAKSHY! is stylishly shot gorgeous looking film where everything you see is fabricated, but how aesthetically and inventively! This is the world nowhere close to what we have seen in Doordarshan’s Byomkesh Bakshy series. The case-to-be solved here also doesn’t have limitations of being just another family affair. Dibakar Banerjee takes it on a bigger canvas to make Bakshy’s first case the biggest of what we have seen before. His Calcutta is nothing but a painting with brilliant art-design powered with nostalgic posters on wall, ‘approaching vintage status’ ambassador cars, man-pulling rickshaws on streets and Bata leather shoes for instance. In one momentous shot, we see camera following Bakshy-Bakshy bumping into a stranger-camera following stranger-stranger bumping into the man following Bakshy and then again camera getting back on track to follow the man; all this exercise through the windows of an ambassador car. See it, and you won’t miss it.

With subtle and deadpan humor, film is a delightful watch. When at a drug-making company’s office, Bakshy jokes about him providing blood-sample that it is a must for every candidate before the job-interview, we see the whole lot of young candidates disappearing like a Jeannie. In another just after the blood-bathed climax, Ajit instructs his home-servant to make some tea as the police can visit the crime-scene anytime soon. Though Sushant looks very much in skin of the character, it’s the supporting cast that excels in the performance-sheet. Anand Tiwari as Ajit is a spot-on. Neeraj Kabi makes his act a balanced yet exceedingly outshining one. One more significant contribution one can’t ignore is the outstanding music score by Sneha Khanwalkar. My first move after the movie got over was to put the album on my playlist.

At the end, Dibakar’s DETECTIVE BYOMKESH BAKSHY! is like a strong and effective opium intake once taken you will sure get addicted to it, sooner or later. Expect the unexpected while watching it but don’t forget, even Bakshy is a man with many drawbacks. Don’t expect him to beat goons single-handedly. Watch it for being one of the most magnificent looking films of simple nature and nostalgic feel. [4/5]           

Friday, 19 December 2014

PK: Oh, My God! Year’s most entertaining Film! [5/5]

You can’t question religion. You can’t ask for logical explanations when it comes to one’s faith. We are not supposed to do that. We are not taught to do that. You have to be either an alien or an escapee from the nearest mental asylum. PK [played by the calculative risk-taker & a game-changer in many cases Aamir Khan] is one such rare genus. His level of indulgence with our worldly Gods is absolutely ‘out of this world’. His child-like innocence can bombard questions of all kind without giving you much time to think and react. He can also make you thunderstruck with his logical demonstrations about things you never bothered or rather apprehended to ask about. No doubt, he looks like a distant and conscientiously more intuitive cousin to Fungshuk Wangdu of 3 IDIOTS.  

‘PK’ is another gem of Rajkumar Hirani’s school of film-making where success can also be formulated by assimilating an unfussy entertainment of dramatic but simple nature & a ‘never gets preachy’ social message weaved in good humor and honest emotions. So when PK- the untainted innocent soul discovers people buying goods of their needs simply by exchanging a piece of paper with an old man’s picture [our very own ‘father of the nation] printed on it, he starts collecting every single poster & newspaper-cutting carrying his image. Next, we are made realize how we only respect the ‘financial’ worth and not the ‘moral’ values the man lived his life for.

‘PK’ also dares to question your blind-faith on forged Godmen from all religions. It’s high time we turn to humanity as our primary religious conviction rather than wasting our hard-money and the gifted wisdom to differentiate right from wrong on someone else’s phony tactics. As PK says in the film, the God who created us is very different from the ones we created. And the prayers we make through these age-old practices are nothing more than a ‘wrong number’ call.

The biggest strength of ‘PK’ is that it talks less and speaks more. There is hardly a scene where you don’t get thrashed by one or other social issues or expected human behavioral flaws in us; in a very subtle, explicable, logical and entertaining manner. The Bhojpuri texture to the lingo adds to it fervently and freely. It is one of the most sugary languages spoken across country; still very misinterpreted and wrongly portrayed and performed for Bollywood films. ‘PK’ also doesn’t do it flawlessly but certainly the respect is there. For a change, I am not offended this time!

Hirani and Abhijat Joshi’s taut and an almost flawless screenplay gives you ample hilarious as well as heartwarming moments. Anushka Sharma impresses with her sparkling presence very well translated into a lovely & lively character on screen. Saurabh Shukla and Boman Irani are efficiently likeable. Sushant Singh Rajput is charming and plays it cool, though is only for a shorter role. And who wouldn’t agree? The leading man leads like no one does better. Aamir is known to reinvent his acting abilities as well as the commercial cinema in India. This one takes his efforts to the next level. He gives us a multicolored paan-chewing character you will take home immediately.

And if could give you more about the film, I would be writing it hours in row. There is so much to cheer-so much to cherish; you wouldn’t mind it going twice in its first week. I am ready for the evening show. Till then; my only reaction to the film is if Bollywood is meant to follow the latest formula for recreating similar box-office success, are we going to see many more ‘PK’s in coming years? I am sure, the answer is negative. PK is outstanding! PK doesn’t come to us too often! Go; get a slice of it…NOW! [5/5]

Friday, 6 September 2013

SHUDDH DESI ROMANCE: Unconventionally romantic at heart & freshly matured in nature! [3.5/5]

At the very start, when Tara [Debutant Vaani Kapoor] in her wedding-mandup finds out that her would-be life partner Raghu [Sushant Singh Rajput], arranged by so-called concerned relatives, has been fled away out of his fears of being committed to just one in life, all you expect is a melodramatic break-down but hold your horses because Maneesh Sharma’s unapologetically graduated romantic comedy SHUDDH DESI ROMANCE rejects and revolts to be conventional in any manner. So, Tara doesn’t collapse but seeks comfort in a chair nearby, sheds the fake traditional attitude and asks casually, “koi thanda pila do yaar? (Can I have a cold-drink, please?)”.

SHUDDH DESI ROMANCE is a refreshing take on how the concept of marriages in our today’s society has been tainted and tarnished with phony-bogus customs that don’t allow it to be modified and adoptive towards the changing practicalities & priorities of individuals and social relevance. Film also unhesitatingly and constantly talks about the idea of the up-and-coming culture of live-in relationships in the incredible India.

In the most colorful city of Jaipur, Sushant plays a tourist guide-cum-fake rented baraati in marriages, romantic at heart but confused youth who probably takes up everything half-heatedly and leaves it in the middle for something else coming in way. To continue this further, he leaves Tara on his wedding-day, to be settled later with Gayatri [The vivaciously emotive, confident and natural Parineeti Chopra] as her live-in partner. The gigantic commitment issue strikes again and this time, it’s Gayatri who makes the move first. In times of dejection & despair, Raghu bumps into Tara who now doesn't want any commitment for life. The biggest question is with Raghu if he does really know as where to go.

SHUDDH DESI ROMANCE pleasantly surprises at many levels including the opening montage having Ati-random shots of couples romancing in the by-lanes,  parks, crowded markets, monumental areas and where not! The lingo characters speak hardly sounds written. Jaideep Sahni is the man who sure deserves applause for being realistic to the core. There are at least 4 sequences where characters indulge themselves in a conversation happened earlier in an exact manner with same set of dialogues but you would not consider them a repetition, I bet. On the direction front, Maneesh Sharma shows an upper hand in amalgamating the lively colors & culture of Jaipur and plausible characters with their mental predicament. He upholds the narrative in such way that if not a laugh-out-loud gag, a constant smile sure finds its place on your face throughout.

Sushant, after his confident début in KAI PO CHE! keeps your expectations alive. He is an actor restricted by looks but vast in potential. Parineeti Chopra is excellent and a talent to watch out for. Can anyone be so sure and effortless? Really? Well, she is. Vaani impresses. And then, there is impeccably adorable Rishi Kapoor. If anyone who really knows how to rediscover himself with changing times, it’s him. Treat to watch!

SHUDDH DESI ROMANCE sure puts you off with a few lazy moments and could have easily have been shorter by 10-12 minutes but at the end, it is a decisive effort that doesn't believe in taking routes that have been traveled to death. Be attentive and you could enjoy nuances and dialogues where the age-old traditional concept of marriage and our double-faced society is smacked-slapped & spanked by characters who consider live-in a more relevant option to discover love. Unconventionally romantic at heart & freshly matured in nature! Don’t miss it. [3.5/5]