Showing posts with label mukesh chhabra. Show all posts
Showing posts with label mukesh chhabra. Show all posts

Tuesday, 17 January 2017

हरामखोर: खुरदरी, बिखरी-बिखरी, पर अच्छी! [3/5]

पटना के प्रोफेसर बटुकनाथ चौधरी, उम्र 55 साल की प्रेम-कहानी अपनी ही एक शिष्या जूली, उम्र 26 साल के साथ, टीवी के समाचार चैनलों पर काफी लोकप्रिय रही थी. देखने वालों से लेकर दिखाने वालों तक, सब अपने-अपने नजरिये से इस औगढ़ प्रेम-कहानी को परंपरागत सामाजिक ढ़ांचे से अलग-थलग करके देखने की जुगत भिड़ा रहे थे. तकरीबन 10 साल बाद, श्लोक शर्मा की ‘हरामखोर’ कुछ इसी तरह की पृष्ठभूमि पर अपनी एक अलग कहानी गढ़ने का साहस दिखाती है. फर्क सिर्फ इतना है कि श्लोक फिल्म या फिल्म के किरदारों के बारे में राय बनाने का हक दर्शकों के जिम्मे छोड़ने की हिम्मत नहीं दिखा पाते. जहां एक तरफ फिल्म का निहायत ही स्पष्ट टाइटल सीधे-सीधे आपको एक तयशुदा मंजिल की ओर लगातार धकेलता रहता है, वहीँ दूसरी ओर फिल्म की शुरुआत में ही उनका सधा हुआ ‘डिस्क्लेमर’ कहानी कहने-समझने से कोसों पहले ही बचाव की मुद्रा में आ जाता है. मुझे नहीं पता, अगर ऐसा किन्ही सामाजिक संगठनों (सेंसर बोर्ड या बाल कल्याण समिति जैसा कोई भी) के दबाव में आकर किया गया हो.

श्याम (नवाज़ुद्दीन सिद्दीक़ी) अव्वल दर्जे का हरामखोर मास्टर है. अपनी ही एक स्टूडेंट को पटा कर पहले ही बीवी बना चुका है, और अब मंसूबे दूसरी स्टूडेंट संध्या (श्वेता त्रिपाठी) को भी भोगने की है. फ्रस्टियाता है तो स्कूल में बच्चियों को बेरहमी से कूट भी देता है. गिरगिट ऐसा कि जब बीवी सुनीता (त्रिमला अधिकारी) उसे गुस्से में छोड़ कर जा रही होती है, मनाने के लिए जमीन तक पर लोट जाता है. पर अगले ही पल जब उसे थप्पड़ पड़ता है, तो झुंझलाहट में उसी बीवी को गालियाँ बकने लगता है. श्लोक बड़ी आसानी से और बड़ी जल्दबाजी में उसे ‘हरामखोर’ पेश करने में लग जाते हैं, जबकि फिल्म में बड़े ‘हरामखोर’ कद में छोटे और इरादों में कमीने कुछ ऐसे बच्चे हैं, जो बड़ी सफाई से न सिर्फ बड़ों (श्याम-संध्या और सुनीता) के रिश्तों में उथल-पुथल मचाते रहते हैं, बल्कि बड़ी बेशर्मी से उनके किरदारों को कसौटी पर कसने की, उनकी नैतिकता पर फैसले सुनाने की हिमाकत भी खूब करते हैं.

कमल (मास्टर इरफ़ान खान) को भी संध्या से पहली नज़र का प्यार है. कमल को संध्या से मिलाने में मिंटू (मास्टर मोहम्मद समद) हर वक़्त एक पैर पर खड़ा रहता है. उसी ने बताया है कि अगर लड़का-लड़की एक दूसरे को बिना कपड़ों के देख लें, तो उनकी शादी हो जाती है. कमल ने संध्या को देख लिया है, अब सारी मेहनत सफल हो जाये अगर संध्या भी कमल को बिना कपड़ों में देख ले. संध्या बिन माँ की बच्ची है. पिता अक्सर शराब में धुत्त घर लौटते हैं. संध्या जानती है, हर हफ्ते पिता काम-काज का बहाना करके शहर क्यूँ जाते हैं? नीलू जी सिर्फ उसके पिताजी के साथ काम नहीं करतीं, दोनों ने अपना एक अलग आशियाना बना रखा है. पिता की बेरूखी और उनसे कटाव भले ही संध्या के लिये मास्टरजी के चंगुल में फंसने का वाजिब बहाना दिखे, पर संध्या बखूबी और पूरी मजबूती से इस प्यार में खुद को कड़ा और खड़ा रहती है.

'हरामखोर’ उस खांचे की फिल्म है, जहाँ फिल्म का बैकग्राउंड इतना जमीनी है कि आप उससे जुड़े बिना नहीं रह सकते. टीले पर अगर तेज़ हवा सांय-सांय बह रही है, तो धूल जैसे आपके चेहरे पर पर भी आ रही है, इतना जमीनी. पर श्लोक जहाँ चूकते नज़र आते हैं, वो है उनके किरदारों का ताबड़-तोड़ आपके सामने खुल के बिखर जाना. कुछ इतनी तेज़ी से कि उनसे आपका लगाव हमेशा बनते-छूटते रहता है. फिल्म में बहुत सारे पल ऐसे हैं जो बोल्ड होते हुए भी मजेदार हैं और मजेदार होते हुए भी उतने ही बोल्ड, पर एक बार फिर, एक-दूसरे से इतने कटे-कटे कि लगता है जैसे जिग्सा पजल के कुछ टुकड़े अभी भी बीच-बीच में रखने बाकी हैं.

मुकेश छाबड़ा कास्टिंग में कमाल कर जाते हैं, खास कर बाल कलाकारों और नीलू जी की भूमिका निभाने वाली कलाकार के चयन में. पैंट-बुशर्ट पहनने वाली, लड़कों जैसे कटे बालों में संध्या के पिता की प्रेमिका फिल्म की शायद एकलौती ऐसी कलाकार हैं, जिनके साथ आप धीरे-धीरे जुड़ना शुरू करते हैं, और अंत तक आते-आते उन्ही का एक दृश्य फिल्म का सबसे निर्णायक और सबसे संजीदा बनकर उभरता है. नवाज़ुद्दीन अगर अपने हाव-भाव, तौर-तरीके से गंवई मास्टरजी का एकदम सटीक चित्रण पेश करने में कामयाब रहते हैं, तो श्वेता भी आपको हैरान करने में पीछे नहीं रहतीं. 15 साल की उमर, झिझक, तुनक, छिटक, खनक, सनक; श्वेता संध्या की किरदार से पल भर भी दूर नहीं होतीं. मास्टर इरफ़ान और मास्टर समद फिल्म के सबसे मजेदार दृश्यों को अपने नाज़ुक कन्धों पर बिना किसी शिकन के ढोते रहते हैं. त्रिमला बेहतरीन हैं.

आखिर में; श्लोक शर्मा की ‘हरामखोर’ उस खुरदरे, उबड़-खाबड़ रस्ते जैसी है, जिस से होकर कभी आपने बचपन का सफ़र तय किया होगा. एक बार फिर उन रस्तों पर चलने, न चलने की सुविधा लाख आपके पास हो, बीते वक़्त का जायका चखने का मोह कौन छोड़ना चाहेगा भला? बेहतर होता, अगर कहानी पूरी तरह जीने के बाद निष्कर्ष पर पहुँचने की सुविधा भी हमारे ही हाथ होती! किरदारों के साथ तसल्ली से जुड़ कर उन्हें ‘हरामखोर’ ठहरा पाने का सुख भी हमारे (दर्शकों के) ही नसीब होता!...और थोड़ी कम अस्त-व्यस्त, कम बिखरी-बिखरी! [3/5]  

Saturday, 10 May 2014

MASTRAM: A satisfying session, far from being an orgasmic delight! [3/5]

The fact that I belong to Uttar Pradesh, the dregs of North India and the very same time zone; there can’t be any possible chance of denial that I might not know about these hugely popular & highly erotic writing materials, openly available at all book stores at crowded state bus-stations and local newspaper vendors under a fictional handle-name of Mastram. I never really bothered much about who’s the man behind and what force could drive him to enter this very exploitable yet offensive sector till Akhilesh Jaiswal’s fictional biography MASTRAM came into limelight.

A small town writer from Himachal Pradesh dreams to make it big as a novel-writer in big cities like Delhi. He definitely is aware of the consequences of being a writer so doesn’t want to get into married life but soon he’s told about the girl being a typical housewife material who can cook lip-smacking mutton, he agrees. Now, this is the era where most publishers are only interested in printing study materials and not some boring ‘shuddh Hindi’ literature. Rajaram- our protagonist is forced to look out for some ‘masaaledar’ addition to his stories, often explained by people around as sex. And, thus Rajaram turns into Mastram- an unknown iconic writer of soft-porn novels!

Many would look at it with expectations to be a pornographic movie that would tickle mostly the lower part of human body but the writer-director Jaiswal boldly decides to focus on the writer’s catch-22 situation while changing gears from one kind to a completely different, the pain of losing opportunity to be known and famous and also the categorical expansion that creates competition in his self-claimed province. Film also talks; if not in volumes, in suggestions for sure, about the hypocrisy of the two-faced society. People, who read him the most, start disgusting him in the same measure after his identity comes out in light.

The real hero of MASTRAM besides the fascinating concept is Mukesh Chhabra- the casting director of the film. This man does magic with his strong sense in reading the characters and finding out talents that can carry it more than what is written, briefed or expected. Though Rahul Bagga as Rajaram is very recluse, reserved and restricted for the most part, it’s the supporting cast that outshines everyone else in the crew. Debutante Tara-alisha Berry as his charming wife, Akash Dhaiya with his publisher partner and Istiyak Khan as his best friend are outstanding.

With aesthetically shot intimate sequences, hilariously erotic dialogues on the likes of the original Mastram bestsellers, nicely built plot and believable performances, if MASTRAM couldn’t take a deserving leap from being just watchable, it is only because it lacks more layers to the story with time and again getting repetitive especially with the episodic visualizations of erotic stories he pens down.

Overall, it is an entertaining effort to bring the legend of Indian soft-porn back on screen. Watch it to relive the era or to get a brief intro to this yesteryear’s guilty pleasure if you haven’t been fortunate enough to enjoy till date. Do not expect orgasmic pleasure but a satisfying experience is guaranteed! [3/5]         

Friday, 7 February 2014

HASEE TOH PHASEE: Parineeti rules! Writing Rocks!! One of the most refreshing Rom-Com!! [3.5/5]

If I could really take my eyes off the extremely sweet, lovable, charming, carefree and magically inexplicable Parineeti Chopra in debutante Vinil Matthew’s ‘no non-sense’ romantic comedy HASEE TOH PHASEE, I would have certainly noticed the ‘time demands’ merger of one of the most celebrated production houses in the industry and the most promising pool of talents. No wonder the product in result comes out as one of the most refreshing, brilliantly acted, smartly written but quite a balanced in nature rom-com in recent.

It neither forces you with the typical candy floss boy-meets-girl feel with all those unreal slow-motion shots overflowing with foot-tapping song & dance numbers and forceful melodramatic complications in the storyline. Karan Johar style of cinema masters in that league. Nor it makes you feel drained out with insipid, self-indulged, dead existent stories with layered harsh reality what Anurag Kashyap school of cinema is known for. It stands somewhere in the middle of both.

Nikhil, played by Sidharth Malhotra is all set to loose his bachelorhood for his girlfriend Karisma [Adah Sharma] of 7 years. Just 7 days to the d-day & he happens to meet a girl from the bride-side who’s no one else but Karisma’s younger sister Meeta, played by the infectious livewire called Parineeti Chopra. She supposedly was a drug-addict. She has this weird syndrome that deals with different kind of sensations in body as described by her, “thartharahat, sarsarahat, sansanahat, gudgudahat, dagmagahat, farfarahat & more”. She takes pills to be active on life. She eats toothpastes. She blinks her eyes in a certain ‘in your face’ way. She talks faster than you imagine. She’s anything but the girl next door; still you will find it hard to look anywhere else if she’s there in the frame. You feel connected to the girl who is equally sentimental but confined & reserved in revealing the wounds from her past. Same goes with confused Nikhil who is now left with choices that could ruin or rule his life afterward.   

HASEE TOH PHASEE is a good mix of over-the-top Indian emotions with uber cool practicalities of today’s generation. So, if there is a ‘would-be Damaad’ asking for financial help from his ‘would-be Sasur’- a saree king, in the most unhesitant manner, you would also find a rigidly traditional family that could abandon their kid for life as she had once decided to run away from the house. Though the film couldn’t save itself from being conventional & convenient specifically in the storyline, it compensates that with the garden-fresh characters [Casting director Mukesh Chhabra deserves applause for giving apt faces to fill the requirement], believable performances, quirky-witty-smart writing [Harshvardhan Kulkarni takes the credit here] & a sense of pragmatism while dealing with the situations. Beautifully cinematographed & crisply edited! But the performances are above all especially Parineeti. She amazes, surprises & also manages to move your heart with her ‘blinking eyes’ presence on screen. Sidharth plays it highly confident and a total fit for the role.

At the end, it feels good to see that the genre of romantic comedy in Bollywood is getting blessed by good grown-up writing. Watch it if you want a nice break from regular romantic love-stories! Watch not if you still believe in unreal overdramatic romance only made for cinema-screens! [3.5/5]