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Friday, 28 December 2018

सिम्बा: साल की सबसे वाहियात फिल्म! [0.5/5]


बहन का बलात्कार, माँ की इज्ज़त, बाप के दामन पर लगा बेईमानी और बदनामी का दाग; अस्सी और नब्बे के दशक में हिंदी सिनेमा के नायकों की एक पूरी खेप इस फ़ॉर्मूले की छत्र-छाया में पलती-बढ़ती आई है. ‘त्रिशूल और ‘दीवार के बच्चन जहाँ सिनेमा की मुख्यधारा में ‘गंगा जमुना सरस्वती तक, समीक्षकों से लेकर समर्थकों तक, सबके चहेते बने रहे, बाद के सालों में ‘आदमी और ‘फूल और अंगार’ जैसी फिल्मों के साथ मिथुन ने भी आम जनता में अपनी पैठ काफ़ी मज़बूत की. एक वक़्त तो ऐसा भी गुजरा है कि मिथुन की फिल्मों में बहन का होना ही फिल्म में कम से कम एक बलात्कार के सीन होने की गारंटी समझा जाने लगा था. खैर, कई सालों से रह रह कर ग़लतफ़हमी सी होने लगी थी कि हिंदी सिनेमा अपने उस बजबजाते हुए गंदे-बदबूदार दौर से बाहर निकल आया है, और अब उस तरफ लौटकर दोबारा देखने की हिमाकत भी शायद ही करेगा!

सर पीट लीजिये, क्यूंकि रोहित शेट्टी ने बड़ी बेहयाई से ये कारनामा कर दिखाया है. फ़ॉर्मूला फिल्मों के शहंशाह और नए दौर के ‘मनमोहन देसाई बनने की शेखी में शेट्टी 2018 में, जहां महिला-सशक्तिकरण के प्रचार-प्रसार के लिए सब ऐंड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, बलात्कार जैसे गंभीर मुद्दे को न सिर्फ अपनी फिल्म के टुटपूंजिया नायक को ‘अच्छा साबित करने की कोशिश में खर्च कर देते हैं, बल्कि अपनी कमअक्ली और असंवेदनशील समझ के जरिये (बॉक्स-ऑफिस पर) धन-उगाही के लिए भी ख़ूब निचोड़ते हैं. हालाँकि शेट्टी से उम्मीदें किसी की भी कुछ ज्यादा यूं भी नहीं होती हैं, फिर भी अपने बेवजह के एक्शन और बेवकूफाना स्टंट्स के मायाजाल को छोड़ कर जिस बेशर्मी से वो बलात्कार पर समाज को नैतिक शिक्षा का सबक सिखाने निकल पड़ते हैं, ‘सूप और छलनी’ वाली कहावत याद आ जाती है. पिछली फिल्मों का संज्ञान न भी लें, तो रोहित शेट्टी अपनी इस फिल्म में भी महिलाओं के प्रति शर्मनाक रवैया ज़ाहिर करने से बाज़ नहीं आते, वरना बलात्कार की पीड़िता की हत्या का शोक मनाने बैठे लोगों के बीच नायक से ‘चार दृश्यों और इतने गानों की मेहमान’ नायिका को ‘एक अच्छी सी चाय पिला दो का आदेश दिलवाने का क्या तुक बैठता है? सिर्फ एक, या तो फिल्म के लेखक और निर्देशक हैं ही इतने कमअक्ल या फिर उनका फिल्म में इस्तेमाल ‘फेमिनिस्ट एप्रोच सिर्फ एक ढोंग है और कुछ नहीं?

संग्राम भालेराव (रणवीर सिंह) एक महा-भ्रष्ट पुलिसवाला है, जो पैसे के लिए ही इस महकमे में शामिल हुआ है. अपराधियों (सोनू सूद) के लिए ज़मीन खाली करवाने से लेकर उनके ड्रग्स के कारोबार में आँखें मूँद कर मदद करने तक, भालेराव पैसे के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है. उसके सर पे बिजली तभी गिरती है, जब उसकी मुंहबोली बहन का बलात्कार उसके ही आकाओं द्वारा अंजाम दिया जाता है. रिश्वत को सही ठहराने की दलील में ‘कोई रेप थोड़े ही न किया है का दंभ भरने वाला अचानक ही अपने आसपास की औरतों से बलात्कारियों की संभावित सज़ा पर राय लेने उठ खड़ा होता है. साथ ही, गुंडों को ताबड़तोड़ पीटते हुए ‘वो मेरी बहन थी, वो मेरी बहन थी का मन्त्र भी जपने लगता है. अदालत में पैरवी करते वक़्त भी बलात्कार के भयावह आंकड़ों को पेश करते हुए उसकी मुट्ठियाँ तन जाती हैं, और आप बस यही सोचते रहते हैं कि अगर वो लड़की इस घटिया पुलिस वाले की बहन न होती तो इन आंकड़ों का आज कहाँ अचार बन रहा होता?

हिंदी सिनेमा का एक वर्ग है, जो अपनी सोच का दायरा जाने-अनजाने बढ़ाने से कतराता है. ‘सिम्बा में गिनती के एक या दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पूरी फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं है जो आपने बीस-तीस साल पहले ही हिंदी फिल्मों में न देख लिया हो. ‘घटना के वक़्त तो मुलजिम शहर में ही नहीं था’ जैसी दलीलें सुनकर जब भालेराव अदालत में चौंकता है, तो मन करता है कि एक थप्पड़ लगाऊं और पूछूं कि फिर किस बात का बॉलीवुड फैन है, रे, तू?? ऊपर से संवाद भी इतने घिसे-पिटे कि आप खुद ब खुद किरदारों के साथ दोहराते जाएँ. ये वो फिल्म है, जहां लड़की गुंडों के अड्डे पर पहुँच जाती है, और पकड़े जाने पर ‘मैं अभी जाकर पुलिस को सब बता दूँगी अक्षरशः दोहरा देती है. ये वही वाली फिल्म है, जहां बलात्कारियों के इकबालिया बयान के लिए उन्हें बार-बार ‘नामर्द और ‘नपुंसक बोल बोल उकसाया जाता है. और यही वो वाली फिल्म भी है, जहां खलनायक अपने माँ, बीवी, बच्चों के सामने अपने धंधे की बात करने से झिझकता है. तो, अपनी अपनी याददाश्त के हिसाब से फिल्म का नाम चुनिए, और बैठ जाईये मेल कराने.

‘सिम्बा में, पुलिसवालों की बीवियां, बेटियाँ, बहुएं दोपहर के खाने के वक़्त अक्सर टिफिन लेकर थाने में हाज़िर हो जाती हैं, और फिर जिस तरह का हंसी-ठट्ठे से भरपूर घरेलू माहौल जमता है, लगता है जैसे आप अचानक रोहित शेट्टी की फिल्म से निकल कर सूरज बड़जात्या की फिल्मों में दाखिल हो गये हैं. इस एक ग़लतफहमी का सुख उन सब दुखों पर भारी पड़ता है, जहां फिल्म बलात्कार पर प्रवचनों की झड़ी लगा देती है. कभी जज साहिबा के मुंह से, तो कभी अपने महिला सह-कलाकारों के जरिये! अभिनय में, रणवीर की जिस ऊर्जा का अक्सर सब जिक्र करते हैं, भरपूर मात्रा में है. इस आदमी को एक बंद कमरे में रख कर गुपचुप भी शूट कर लो, तो कुछ न कुछ मनोरंजक निकल ही आएगा, लेकिन क्या ये वो फिल्म है जिसमें हमें रणवीर की उस ऊर्जा का जश्न मनाना चाहिए? बिलकुल नहीं.       

आखिर में; एक आजमाया पैमाना बताता हूँ. जिस फिल्म में अश्विनी कल्सेकर की अदाकारी आपको हताश करे, उससे किसी भी तरह का कोई उम्मीद मत रखिये. ‘सिम्बा अपनी मौलिक तेलुगु फिल्म ‘टेम्पर का बहुत कुछ अपनाते हुए भी आखिर का नाटकीयता भरा अंत छोड़ कर अपनी ही एक बेहद साधारण अंत का चुनाव करती है, जिसमें अजय देवगन जैसे स्टार की भूमिका पर ज्यादा दांव खेला गया है. इसे आप रोहित शेट्टी की ‘हिट खोजने की तरफ एक और समझदारी के नजरिये से भी देख सकते हैं. इतना महिमामंडन बहुत है, आज के ज़माने का ‘मनमोहन देसाई’ कह कर मनोरंजन के फ़ॉर्मूले का मखौल मत उड़ाइये! साल की सबसे वाहियात फिल्म!! [0.5/5]   

Friday, 15 June 2018

लस्ट स्टोरीज़ (A): ‘लव’ से ज्यादा असल और अलग! [4/5]


प्यार की कहानियाँ सदियों से अनगिनत बार कही और सुनाई जाती रही हैं. वासना के हिस्से ऐसे मौके कम ही आये हैं. हालाँकि दोनों में फर्क बस सामाजिक बन्धनों और नैतिकता के सीमित दायरों का ही है. कितना आसान लगता है हमें, या फिर कुछ इस तरह के हालात बना दिए गये हैं हमारे लिए कि प्यार के नाम पर सब कुछ सही लगने लगता है, पाक-साफ़-पवित्र; और वासना का जिक्र आते ही सब का सब गलत, गंदा और अनैतिक. रिश्तों में वासना तो हम अक्सर अपनी सतही समझ से ढूंढ ही लेते हैं, वासना के धरातल पर पनपते कुछ अलग रिश्तों, कुछ अलग कहानियों को समझने-तलाशने की पहल नेटफ्लिक्स की फिल्म लस्ट स्टोरीज़ में दिखाई देती है, जो अपने आप में बेहद अनूठा प्रयास है. ख़ास कर तब, जब ऐसी कहानियों को परदे पर कहने का दारोमदार हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के चार बड़े नामचीन फिल्मकारों (अनुराग कश्यप, जोया अख्तर, दिबाकर बैनर्जी, करण जौहर) के मजबूत और सक्षम कन्धों पर टिका हो.

चार छोटी-छोटी कहानियों से सजी लस्ट स्टोरीज़ अपने नाम की वजह से थोड़ी सनसनीखेज भले ही लगती हो, पर कहानी और किरदार के साथ अपनी संवेदनाओं और सिनेमा के लिए अपनी सशक्त जिम्मेदारियों में खुद को तनिक भी लचर या लाचार नहीं पड़ने देती. अनुराग की कहानी एक महिला प्रोफेसर के अपने ही एक स्टूडेंट के साथ जिस्मानी सम्बन्ध बनाने से शुरू होती है. कालिंदी (राधिका आप्टे) का डर, उसकी नर्वसनेस, तेजस (सैराट के आकाश ठोसर) पर जिस तरह वो अपना अधिकार जमाती है, सब कुछ एक सनक से भरा है. एक हिस्से में तो वो तेजस का बयान तक अपने मोबाइल में रिकॉर्ड करने लगती है, जिसमें तेजस सब कुछ आपसी सहमति से हुआ था की हामी भर रहा है. हालांकि अपने एक से ज्यादा रिश्तों में कालिंदी की तड़प उन दृश्यों में साफ़ होने लगती है, जिनमें वो कैमरे से रूबरू होकर कुछ बेहद अहम् सवाल पुरुषों की तरफ उछालती है. राधिका अपने किरदार के पागलपन में हद डूबी हुई दिखाई देती हैं, पर फिल्म कई बार दोहराव से भी जूझती नज़र आती है, अपने 35 मिनट के तय वक़्त में भी लम्बी होने का एहसास दे जाती है.

सुधा (भूमि पेडणेकर) अजीत (नील भूपलम) के साथ कुछ देर पहले तक बिस्तर में थी. अब फर्श पर पोछा लगा रही है. पोहे की प्लेट और चाय का कप अजीत को दे आई है. अब बर्तन कर रही है. बिस्तर ठीक करते हुए ही दरवाजा बंद होने की आवाज़ आती है. अजीत ऑफिस जा चुका है. सुधा उसी बिस्तर पर निढाल होकर गिर गयी है. जोया अख्तर की इस कहानी में ऊंच-नीच का दुराव बड़ी संजीदगी से पिरोया गया है. सुधा एक काम करने वाली नौकरानी से ज्यादा कुछ नहीं है, उसे भी पता है. अजीत के साथ शारीरिक सम्बन्धों के बावजूद, अपने ही सामने अजीत को लड़की वालों से मिलते-बतियाते देखते और उनके लिए चाय-नमकीन की तैयारी करते वक़्त भी उसे अपनी जगह मालूम है, फिर भी उसकी ख़ामोशी में उसके दबते-घुटते अरमानों और ख्वाहिशों की चीख आप बराबर सुन पाते हैं. भूमि को उनकी रंग-ओ-रंगत की वजह से भले ही आप इस भूमिका में सटीक मान बैठे हों, पर असली दम-ख़म उनकी जबरदस्त अदाकारी में है. गिनती के दो संवाद, पर पूरी फिल्म में क्या दमदार उपस्थिति. इस फिल्म में जोया का सिनेमा भी क्या खूब निखर कर सामने आता है. कैमरे के साथ उनके कुछ दिलचस्प प्रयोग मज़ा और दुगुना कर देते हैं.

दिबाकर बैनर्जी की कहानी एक बीचहाउस पर शाम होते ही गहराने लगती है. रीना (मनीषा कोईराला) साथ ही बिस्तर में है, जब सुधीर (जयदीप अहलावत) को सलमान (संजय कपूर) का फ़ोन आता है. सलमान को लगने लगा है कि उसकी बीवी रीना का कहीं किसी से अफेयर चल रहा है. शादी-शुदा होने का बोझ और बीवी होने से ज्यादा बच्चों की माँ बन कर रह जाने की कसक अब रीना की बर्दाश्त से बाहर है. सलमान को खुल कर सब सच-सच बता देने में ही सबकी भलाई है. वैसे भी तीनों कॉलेज के ज़माने से एक-दूसरे को जानते हैं. शादी से बाहर जाकर अवैध प्रेम-संबंधों और अपने पार्टनर से वफादारी के मुद्दे पर दिबाकर इन अधेड़ उम्र किरदारों के जरिये एक बेहद सुलझी हुई फिल्म पेश करते हैं, जहां एक-दूसरे की जरूरतों को बात-चीत के लहजे में समझने और समझ कर एक माकूल रास्ता तलाशने में सब के सब परिपक्व और समझदार बन कर सामने आते हैं. मनीषा और संजय को नब्बे के दशक में हम बहुत सारी मसाला फिल्मों में नॉन-एक्टर घोषित करते आये हैं, इस एक छोटी फिल्म में दोनों ही उन सारी फिल्मों में अपने किये-कराये पर मखमली चादर डाल देते हैं. जयदीप तो हैं ही बाकमाल.

आखिरी किश्त करण जौहर के हिस्से है, और शायद सबसे फ़िल्मी भी. कहानी पिछले साल की शुभ मंगल सावधान से बहुत अलग नहीं है. मेघा (कियारा आडवाणी) के लिए बिस्तर पर अपने पति पारस (विक्की कौशल) के साथ सुख के पल गिनती के ही रह जाते हैं (हर बार वो उँगलियों से गिनती रहती है), और उसके पति को कोई अंदाज़ा ही नहीं कि उसकी बीवी का सुख उसके सुख से अलग है, और कहीं ज्यादा है. मनचाही ख़ुशी के लिए बैटरी और रिमोट से चलने वाले खिलौने की दखल के साथ, करण कहानी को रोचक बनाने में ज्यादा उत्तेजित दिखते हैं, कुछ इस हद तक कि अपनी महान पारिवारिक फिल्म कभी ख़ुशी कभी गम के गाने का मज़ाक उड़ाने में भी झिझकते नहीं. विक्की कौशल मजेदार हैं.

आखिर में, लस्ट स्टोरीज़ 2013 में आई अनुराग, ज़ोया, दिबाकर और करण की बॉम्बे टॉकीज वाले प्रयोग की ही अगली कड़ी है. फिल्म इस बार बड़े परदे पर नहीं दिखेगी, और सिर्फ नेटफ्लिक्स पर ही मौजूद रहेगी, इसलिए अपनी सहूलियत से कभी भी और कहीं भी देखने का लुत्फ़ आप उठा सकते हैं. ज़ोया और दिबाकर की कहानियों के बेहतर होने के दावे के साथ ही, एक बात की ज़मानत तो दी ही जा सकती है कि हिंदी सिनेमा के आज में इस तरह की समर्थ, सक्षम और असामान्य कहानियां कहने की कोशिशें कम ही होती हैं, खुद इन चारों फिल्मकारों को भी आप शायद ही इन मुद्दों पर एक बड़ी फिल्म बनाते देख पायें, तब तक एक ही फिल्म में चारों अलग-अलग ज़ायकों का मज़ा लीजिये. लव से ज्यादा मिलेगा, कुछ नया मिलेगा. [4/5]

Friday, 28 April 2017

बाहुबली 2: बड़ा है, बेहतर नहीं! [3.5/5]

अगर दो साल पहले आप ‘माहिष्मती’ राज्य का भ्रमण कर चुके हैं, तो आपकी जानकारी के लिये बता दें कि दो साल बाद भी ‘माहिष्मती’ में बहुत कुछ बदला नहीं है. पिछली रात दादी माँ की कहानी सुनते-सुनते जिस हिस्से तक पहुँच के हम सो गए थे, आज फिर कहानी वहीँ से शुरू हो चुकी है. फिल्म की ही तरह इन दो लम्बी-लम्बी लाइनों में, ‘बाहुबली 2’ अपने बेहतर होने या न होने, दोनों की दलील पेश कर देती है. सीक्वल देखने का जो नजरिया हमें हॉलीवुड ने बक्शा है, उसके हिसाब से हर सीक्वल का पहले से बड़ा और बेहतर होना पहली शर्त बन जाता है. हालाँकि ‘बाहुबली 2’ सीक्वल कम, ‘पार्ट 2’ ज्यादा है, दोनों का फर्क समझना जरूरी है. सीक्वल पहली फिल्म की सफलता भुनाने की वजह से पनपता है, जबकि ‘पार्ट-2’ पहले से ही तयशुदा है. इसीलिये ‘बाहुबली 2’ का कमोबेश अपने पहले भाग जैसा ही दिखाई देना, उसके लिये दो-धारी तलवार पर चलने जैसा है.

बाहुबली’ में ‘न्याय’, ‘शासन’, ‘प्रजा’ जैसे भारी-भरकम शब्द आप पहले भी सुन चुके हैं, इस बार कुछ नए शब्द शामिल हुए हैं, ‘राजद्रोह’, ‘अंतर्युद्ध’, ‘संविधान’, ‘प्रतिशोध’. ‘बाहुबली 2’ की कहानी इन्हीं शब्दों के इर्द-गिर्द बुनी गयी है. ‘कटप्पा ने बाहुबली को क्यूँ मारा?’ से पहले और बाद में भी बहुत सारा कुछ और भी है, जो फिल्म में इस एक ‘यक्ष-प्रश्न’ से कहीं ज्यादा अहमियत रखता है. स्क्रिप्ट लिखते वक़्त, फिल्म-लेखक अक्सर ‘करैक्टर-ब्रेकडाउन’ जैसा एक अभ्यास भी करते हैं, जिसमें तमाम किरदारों के तौर-तरीके, हाव-भाव और चाल-चलन दर्ज कर लिए जाते हैं, ताकि किसी एक ख़ास दृश्य में कोई एक ख़ास किरदार किस तरह और किस तरीके की प्रतिक्रिया देगा, इस पर नज़र रखी जा सके. ‘बाहुबली 2’ में कम से कम दो मुख्य किरदार ऐसे हैं, जो बहुत ही सहूलियत से अपना रंग छोड़ते और बदलते रहते हैं. पहले भाग में, मन, वचन, कर्म से हमेशा नतमस्तक रहने वाले, धीर-गंभीर कटप्पा (सत्यराज) अचानक इस भाग में, होने वाले महाराज अमरेन्द्र बाहुबली (प्रभास) के लंगोटिया यार बनकर, तेलुगू मसाला फिल्मों के अभिन्न हास्य-कलाकारों की कमी पूरी करने में लग जाते हैं. और हंसी के नाम पर भी संवाद ऐसे कि, “बहुत दिन हुए, चिड़िया को मार के, धीमी आंच पर भून के, नमक-मिर्च छिड़क कर खाए हुए”!

फिल्म में ऐसे प्रसंगों की भरमार है, जहाँ आप फिल्म से समझदारी की उम्मीद करते हैं, पर फिल्म आपकी उम्मीदों को दरकिनार करते हुए, अपनी ही दुनिया में ‘मनोरंजन’ ढूँढने में बेसुध रहती है. ‘न्याय, सुशासन और ममता की मूर्ती’ शिवगामी देवी (राम्या कृष्णन) से इस फिल्म में इन तीनों की अपेक्षा न ही करें तो बेहतर है. ‘बाहुबली’ में जहाँ वो नारी-सशक्तिकरण का एक दमदार उदाहारण बनकर आपके रोंगटे खड़े करने में कामयाब रहीं थीं, अचानक क्यूँ षड्यंत्र की शिकार एक अबला, अहंकारी नारी का चोला ओढ़ लेती हैं, राजामौली सर ही बता सकते हैं. उनके किरदार का पतन ही शायद एकमात्र जरिया बचा हो, देवसेना (अनुष्का शेट्टी) के किरदार की मजबूती जाहिर करने में, वरना कौन सोच सकता है कि बेटे की ‘मुझे वो चाहिए, माँ’ जैसी फरमाईश पर लड़की से पूछे बिना शिवगामी देवी कहें, “जा, वो तेरी होगी!” कहानी के लिए किरदार की बलि??

...पर इन सबके बावजूद, कोई तो है जो आपको रत्ती भर भी निराश नहीं करता! एस एस राजामौली जिस तरह की मनमोहक दुनिया, जिस तरह के मनोरम दृश्य आपके लिए परदे पर रचते हैं, पर्दा छोटा पड़ जाता है, और आप अवाक रह जाते हैं. उनकी यह दुनिया रामायण और महाभारत जैसी पौराणिक कहानियों से ही प्रेरित है, फिर भी जिस सफाई और जिस शिद्दत से वो आपको इसके इंच-इंच से रूबरू कराते हैं, आपको ‘माहिष्मती’ के अस्तित्व पर तनिक भी सदेह नहीं होता. इस दुनिया में टेलिस्कोप भी है, ह्यूमन राकेट लांचर जैसी तकनीक भी. देखते हुए आपको हंसी भी आती है, पर ये हंसी राजामौली सर की खूबियों को नकारने की हिमाकत कभी नहीं करती. राजामौली सर के कल्पना की उड़ान युद्ध के दृश्यों में और निखर कर सामने आती है. बेहतरीन विज़ुअल ग्राफ़िक्स के इस्तेमाल से आपके लिए तय कर पाना मुश्किल हो जाता है कि कौन सा हिस्सा असली है, कौन सा ग्राफ़िकल?  

प्रभास गज़ब के अदाकार हैं. रोमांस, कॉमेडी, एक्शन और इमोशनल दृश्यों में उनका करिश्मा, उनकी पकड़, उनका भरोसा कहीं भी डगमगाता नहीं है. परदे पर उनका चलना, दौड़ना, एक्शन करना उन्हें हर उस सुपरस्टार के बराबर ला खड़ा करता है, जिन्हें भारतीय सिनेमा में दर्शक मानते नहीं, पूजते हैं. राणा डग्गुबाती अपने शानदार डील-डौल से एक्शन दृश्यों में जान फूँक देते हैं. इस बात से अलग कि उनके किरदार कटप्पा के साथ फिल्म में क्या अजीब-ओ-गरीब हो रहा है, सत्यराज को अपनी अदाकारी के जौहर दिखाने के बहुत मौके मिले हैं इस फिल्म में, और सब में वो बहुत ही मनोरंजक लगे हैं. अनुष्का शेट्टी पिछले भाग की सारी शिकायतें और अभिनय में रही सही सब कसर इस फिल्म में पूरी कर देती हैं. राम्या कृष्णन बिजली की तरह परदे पर चमकती हैं. काश, उनके फिल्म की कहानी किरदार की धार बरक़रार रहने देती!

आखिर में, “बाहुबली 2” एक भरपूर मनोरंजक फिल्म है, जो अपने बेहतरीन विज़ुअल ग्राफ़िक्स और ढेर सारे अद्भुत रोमांचक दृश्यों की मदद से एक ऐसी परंपरागत ढ़ांचे की कहानी गढ़ती है, जिसमें समझदारी की गुंजाईश बहुत है. ‘बाहुबली’ के साथ एक फायदे की बात थी कि उस जैसा हमने पहले कभी कुछ नहीं देखा था; ‘बाहुबली 2’ के साथ ये इमोशन नहीं जुड़ता. फिर भी, न देखने की कोई सूरत ही नहीं बचती; कुछ रिश्तों को ‘क्लोज़र’ की जरूरत पड़ती ही है. ‘बाहुबली’ के साथ हम ऐसे ही एक रिश्ते में हैं, और ‘बाहुबली 2’ है उसका ‘हैप्पी क्लोज़र’! बेहतर नहीं, तो कमतर भी नहीं! [3.5/5] 

Sunday, 26 March 2017

फ़िल्लौरी: कहानी चुस्त, फिल्म सुस्त! [2.5/5]

हिंदी फिल्मों में पंजाब अब अपनी महक, अपना रंग, अपनी चमक खोता जा रहा है, या यूँ कहें तो दर्शकों को पंजाब के नाम पर दिखाने, भरमाने और लुभाने के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पास अब ज्यादा कुछ रह नहीं गया है. शादी, संगीत, पार्टियों और अजीब-ओ-गरीब मज़ाकिया किरदारों से भरे-पूरे, खतरनाक रूप से अमीर परिवारों के साथ अब हर फिल्म करन जौहर और आदित्य चोपड़ा का ‘खानदानी विडियो’ लगने लगी है. ताज्जुब नहीं होना चाहिए, अगर अंशाई लाल की ‘फ़िल्लौरी’ देखते वक़्त सब कुछ अच्छा-अच्छा होते हुए भी आप बोरियत से घिर जायें! और फिर यहाँ तो दो-दो पंजाब हैं, एक अभी का और दूसरा, आज़ादी से पहले का. आज़ादी से पहले वाला पंजाब ज्यादा सुकून देता है, दिलचस्प है और अनदेखा तो नहीं, पर कम देखा-जाना-सुना है. अब के वाला पंजाब वही है, ‘मानसून वेडिंग’ और ‘बार बार देखो’ के बीच हिचकोले खाता, जिसका जिक्र ऊपर की लाइनों में हो चुका है.

शादी की चाह कन्नन (सूरज शर्मा) को सात समुन्दर पार से अमृतसर खींच लायी है. अनु (मेहरीन पीरज़ादा) को वो बचपन से जानता है. दोनों परिवार साथ-साथ शामें रंगीन करते हैं. व्हिस्की पीने वाली बीजी (दादी) भी यहाँ हैं, जो अपने बेटे को ‘दो पैग का नतीज़ा’ कहकर ठहाके लगाती हैं, और बालों में रोलर्स लगाकर बाप-बेटे की हरकतों पे झल्लाने वाली बेबे (माँ) भी. हालात तब मजेदार हो जाते हैं, जब मांगलिक दोष से ग्रस्त कन्नन को असली शादी से पहले, पेड़ से शादी करनी पड़ जाती है. हालाँकि मुश्किल यहाँ ख़तम नहीं होती, बल्कि शुरू होती है. अगले ही रात/दिन से कन्नन को शशि (अनुष्का शर्मा) का भूत दिखाई देने लगता है. शशि का बसेरा उसी पेड़ पर था, जिसको शादी के बाद अब काट दिया गया है. अब शशि जाये तो कहाँ जाये? और अगर शशि नहीं जायेगी, तो कन्नन की जिंदगी में अनु कैसे आएगी?  

फ़िल्लौरी’ उन फिल्मों में से है, जो परंपरागत रूप से फिल्म में कहानी होने की अहमियत समझती हैं, मानती हैं. इस एक बात पर कहीं कोई दो राय नहीं हो सकती कि ‘फ़िल्लौरी’ में कहानी तो अच्छी है ही. हाँ, जिस बचकाने ढंग से उसे बुना जाता है, जिस थकाऊ तरीके से उसे परदे पर परोसा जाता है, वो निर्देशक अंशाई लाल और लेखिका अन्विता दत्त की समझ पर बड़े सवाल खड़े करता है. फिल्म में शशि और उसके प्रेमी फ़िल्लौरी (दलजीत दोसांझ) का खूबसूरत प्रेम-प्रसंग हर बार आपको जैसे कन्नन और अनु के हद एकरस कथानक से झकझोर कर फ्लैशबैक के सुहाने सफ़र पर ले जाता है और जगाये रखता है. हालाँकि मेहरीन अपनी पहली ही फिल्म में बहुत ज्यादा निराश नहीं करतीं, पर सूरज एक ही तरह के भाव चेहरे पर मढ़े-मढ़े पूरी फिल्म निकाल देते हैं. शुरू-शुरू में उनकी कॉमिक-टाइमिंग ताज़गी का एहसास जरूर कराती है, पर फिर धीरे-धीरे वो धार कहीं कुंद पड़ती जाती है.

एनएच 10’ से फिल्म प्रोडक्शन में सफल शुरुआत करने के बाद, अनुष्का की इस नयी कोशिश में विज़ुअल ग्राफ़िक्स कमाल के हैं. अनुष्का भूत से कहीं ज्यादा किसी परी की तरह परदे पर रंगीनियाँ बिखेरती नज़र आती हैं. भूत के रूप में जिन-जिन दृश्यों में वो नज़र आती हैं, उनमें एडिटिंग बेहतरीन तरीके से आपका ध्यान आकर्षित करती है. अनुष्का खुद एक कलाकार के तौर पर दोनों (फ्लैशबैक में, और वर्तमान में) रूपों में भली लगती हैं. दलजीत परदे पर अपना करिश्मा बिखेरने में फिर एक बार कामयाब रहते हैं. मनमौजी गायक की आवारगी से दीवाने आशिक की संजीदगी तक के उनके सफ़र में आपका वक़्त बड़े इत्मीनान से गुजरता है. शशि के भाई की भूमिका में मानव विज एक-दो दृश्यों में ही अपने जौहर दिखा जाते हैं. ‘उड़ता पंजाब’ में हम उन्हें ऐसा ही कुछ कमाल करते पहले ही देख चुके हैं. दिवंगत अभिनेता शिवम् प्रधान (पियूष की भूमिका में) को मजेदार रोल में देखना, और इस सक्षम अदाकार को दुबारा न देख पाने की कसक एक साथ दिल कचोटती रहती है.

आखिर में, ‘फ़िल्लौरी’ एक अच्छी कहानी होने के बावजूद ढीले डायरेक्शन, बेतरतीब राइटिंग और सुस्त रफ़्तार की वजह से वो मुकाम हासिल नहीं कर पाती, जिसकी हकदार वो कई मायनों में वाकई है. जिस ख़ूबसूरती के साथ अंशाई लाल शशि के किरदार को शानदार विज़ुअल ग्राफ़िक्स के जरिये परदे पर ज़िंदा रखते हैं, अंत तक आते-आते उसे कुछ इस हद तक निचोड़ने में लग जाते हैं कि आपको ‘दी एण्ड’ तक रुकना भी भारी लगने लगता है. [2.5/5]                 

Sunday, 12 March 2017

बद्रीनाथ की दुल्हनिया: बेटे पढाओ, बेटी बचाओ! [2/5]

दुल्हन शादी के मंडप में दूल्हे को सजा-सजाया छोड़ के भाग गयी है. पढ़ी-लिखी है, उसे ‘क्लौस्ट्रोफ़ोबिया’ का मतलब अच्छी तरह पता है. एक साल बाद खबर आई है कि लड़की मुंबई में कहीं है. लड़का अब भी हाथ भर का मुंह लटकाए, थूथन फुलाए सड़क पर बाइक का एक्सीलेटर चांप रहा है. पिताजी हैं बड़का विलेन टाइप. फरमान सुना दिये हैं कि लड़की को उठा लाओ, हवेली के चौखटे पे लटका देंगे ताकि पता तो चले, बेइज्ज़ती का ज़ायका होता कैसा है? लड़का भी अपने झाँसी का ही है, ‘जो आज्ञा, पिताजी’ बोल के निकल पड़ा है. खैर, दुल्हनिया बद्रीनाथ की हो या केदारनाथ की, पिक्चर तो करन जौहर की ही है ना! तो भईया, आखिर में होना वही है, क्लाइमेक्स तक पहुँचते-पहुँचते लड़के में बदलाव के लक्षण इतने तेज़ी से चमकाई देते हैं जैसे फिल्म नहीं, गोरा बनाने वाली फेयरनेस क्रीम का विज्ञापन चल रहा हो. और लड़की? लड़कियों के लिए तो भाई आजकल सब माफ़ है. हम और आप होते कौन हैं, उनके इंटेंट और ‘चेंज ऑफ़ इंटरेस्ट’ पर प्रश्नवाचक चिन्ह लगाने वाले?

हम्प्टी शर्मा की दुल्हनिया’ के तर्ज़ पर ही, लेखक-निर्देशक शशांक खेतान एक बार फिर आपका परिचय छोटे शहरों के मिडिल-क्लास घरों-परिवारों के बड़े अपने से लगने वाले किरदारों से कराते हैं. तेज़-तर्रार बाप (रितुराज सिंह) के आगे कोई अपनी मर्ज़ी से चूं तक नहीं कर सकता. भाभी (श्वेता बासु प्रसाद) पढ़ी-लिखी होने के बावज़ूद, जॉब करने जैसी फालतू बात सोच भी नहीं सकती. और लड़के तो एक नम्बर के मजनूं. दूसरे की शादी में अपने लिए लड़की पसंद कर आते हैं, वो भी दुल्हन की सबसे क़रीबी. नहीं, नहीं, वो पीछे वाली सांवली-सलोनी नहीं, आगे वाली गोरी-चिट्टी, जो बाकायदा स्टेप मिला-मिला के डांस कर लेती हो. फिर ‘वो तेरी, ये मेरी, इसको तू रख ले, उसको मुझे दे दे’, और उसके बाद लड़की (आलिया भट्ट) के आगे-पीछे चक्कर लगाने का खेल.  वैसे ‘बद्रीनाथ की दुल्हनिया’ बड़े ठीक मौके पर सिनेमाघरों में आई है. भाजपा जल्द ही उत्तर प्रदेश में ‘एंटी-रोमियो स्क्वाड’ का गठन करने वाली है. अपनी थेथरई, बेहयाई और अकड़ की वजह से, उनके लिए बद्रीनाथ (वरुण धवन) जैसे आशिक़ एकदम सटीक बैठते हैं, जिनको लड़कियों की ‘ना’ सुनाई ही नहीं देती, जिनके ताव के आगे क्या झाँसी, क्या सिंगापुर, सब बराबर हैं, और जिनको लड़की पर धौंस जमानी हो, तो ‘मेरा बाप कौन है, पता है?” जैसे जुमले उछालने खूब आते हों.   

लड़का-लड़की के बीच का भेदभाव हो, समाज की कुंठित-कुत्सित पितृसत्तात्मक व्यवस्था हो या फिर दहेज़ की समस्या; फिल्म पहले तो बड़ी समझदारी से उन पर व्यंग्य कसती है, हंसती है-हंसाती है, पर कहीं-कहीं उनका मखौल उड़ाने की जल्दबाजी में अपनी कमजोरियां, अपनी उदासीनता भी जग-जाहिर कर बैठती है. झाँसी के लड़के ‘मोलेस्टेशन’ का मतलब भी नहीं जानते, पर जब उन्हीं के साथ (जी हाँ, मर्दों के साथ भी होता है) ऐसी स्थिति बनती है, तो समझदार, सेंसिटिव वैदेही भी मुंह दबा कर हंसती नज़र आती है. वहीँ बदला हुआ बद्री जब अपने परिवार के बारे में टीका-टिप्पणी करता है, “वैदेही तो यहाँ घुट-घुट के मर जाती!’, उस मूढ़ को सामने खड़ी अपनी भाभी नज़र भी नहीं आतीं, जिनकी हालत और हालात वैदेही से कहीं कमतर नहीं. ‘चैरिटी बिगिन्स एट होम’ उसने शायद सुना भी नहीं होगा!

फिल्म अपने पहले हिस्से में बड़े भोलेपन और सादगी के साथ, भारतीय मर्दों के जंग लगे अहं और भारतीय स्त्रियों के बदलते ‘मेरी आजादी, मेरा ब्रांड’ सुर के बीच के टकराव को सामने लाती है, पर मध्यांतर के तुरंत बाद सब उलट-पुलट और गड्डमगड्ड हो जाता है. किरदार अपने रंग छोड़ने लगते हैं. कहानी ढर्रे पर उतरती चली जाती है, और अंत तक पहुँचते-पहुँचते तो सब कुछ ‘बॉलीवुडाना’ हो जाता है. सही को सही कहने के लिए, गलत को गलत ठहराने के लिए ‘बोतल’ की भूमिका अहम हो जाती है, और अंत तो तभी सुखद होगा ना, जब लड़का-लड़की मिलेंगे और ‘शादी’ होगी. ताज्जुब होता है कि ऐसी फिल्म करन जौहर के बैनर से निकलती है, जो खुद ‘शादी’ को इतनी अहमियत नहीं देते और अभी-अभी अविवाहित रहते हुए सरोगेसी के जरिये जुड़वाँ बच्चों के पिता बने हैं.

आखिर में, सिर्फ इतना ही कि फिल्म में ‘क्यूटनेस’ कूट-कूट कर भरी है तो मुद्दों को गंभीर हुए बिना नज़रंदाज़ किया भी जा सकता है. हिंदी सिनेमा अब तक बॉक्सऑफिस पर आखिर यही फार्मूला तो भुनाता आया है, सवाल है कि कब तक? हालाँकि इस फिल्म के बद्री को बदलने में महज़ कुछ घंटे ही लगते हैं, जब वो अपने होने वाले बच्चों के नाम ‘विष्णु, सार्थक, रुक्मणि और प्रेरणा’ से बदल कर ‘वैष्णवी, सार्थकी, रुक्मणि और प्रेरणा’ कर लेता है (मैं इसे अति-फेमिनिज्म कहता हूँ), पर हमारे सिनेमा, समाज और सोच को बदलने में जाने कितने और साल लग जाएँ, कौन कह सकता है? [2/5]          

Wednesday, 30 November 2016

डियर जिंदगी: Rx, एक सुकून भरा ‘सेशन’! [3.5/5]

गौरी शिंदे की ‘डियर जिंदगी’ देखने के लिए आपको एक ख़ास तरह का चश्मा चाहिए होगा. वो चश्मा जिसके भीतर से आप देख पाएं कि कैसे एक सुपरस्टार अपने स्टारडम का बोझ धीरे-धीरे ही सही, अपने मज़बूत कन्धों से उतारने की कोशिश तो कर रहा है. हालाँकि कई बार आपको ये कोशिश जबरदस्ती की लगेगी, और कई बार बहुत बनावटी, फिर भी. तकरीबन तीन दशकों के अपने पूरे फ़िल्मी कैरियर में शाहरुख़ इस तरह की बेहद जरूरी कोशिश सिर्फ गिनती के कुछ वक़्त ही (स्वदेश और चक दे! इंडिया) करते नज़र आते हैं, इसीलिए इसके मायने और भी बढ़ जाते हैं. फिल्म में उनका किरदार एक जगह कहता भी है, “ज़िन्दगी में जब भी पैटर्न और आदतें बनती दिखाई दें, जीनियस वही है जिसे पता हो कि कब और कहाँ रुकना है?” इस फिल्म से शायद शाहरुख़ भी यही सीख रहे हैं.  

...और इसी करामाती चश्मे से शायद आप ये भी देख पाएं कि एक ‘मेनस्ट्रीम’ हिंदी फिल्म होते हुए भी, अपनी कहानी और कहानी कहने की शैली की वजह से कैसे ‘डियर जिंदगी’ कमोबेश एक प्रयोगधर्मी ‘इंडी’ फिल्म का चोला ओढ़ने में कहीं कोई शर्मिंदगी नहीं दिखाती. ज़िन्दगी की मुश्किलों को आसान बनाने के रास्ते सुझाती, ये फिल्म भले ही किसी बड़ी सर्जरी की तरह हिंदी सिनेमा की सारी तकलीफें एक झटके में दूर न कर पाती हो, पर एक सुकून भरा ‘सेशन’ तो है ही, जिसका असर आने वाले वक़्त में बिलकुल दिखाई देगा.

रिश्ते बनाने-निभाने में काईरा (आलिया भट्ट) थोड़ी कच्ची है. ‘बाय’ बोलने की जैसे उसको जल्दी रहती है. दूसरा कोई बोले, दर्द हो, दुःख पहुंचे, इससे पहले खुद ही बोल दो. जाने कैसे-कैसे डर पाले बैठी रहती है, बिलकुल हम सबकी तरह. रोने का मन हो तो हरी मिर्ची चबा कर कहती है, “मिर्ची की वजह से हो रहा है ये”. सिड (अंगद बेदी) के बाद रघुवेंद्र (कुनाल कपूर) भी उसकी जिंदगी से जाता दिख रहा है. डिप्रेशन का दौर है ये. गोलियां खाने के बाद भी काईरा को नींद नहीं आती. दिमाग के डॉक्टर, जहांगीर खान (शाहरुख खान) के सामने बैठी है, पर अपनी तकलीफ़, अपना डर सब कुछ अपना न कह कर, अपनी दोस्त के नाम पर धड़ल्ले से बताती जा रही है. आखिर, ऐसे डॉक्टर के पास जाने वाले को ‘लोग’ पागल जो समझते हैं.

खैर, डॉक्टर खान को मर्ज़ जानने में कोई मुश्किल नहीं होती. उन्हें बस उस ज्वालामुखी को कुरेदना है, जहां सब कुछ धधकते लावे की शक्ल में जमा होता जा रहा है. हालाँकि वो खुद डाइवोर्स जैसे अँधेरे रास्ते से गुजर चुके हैं, और कहते हुए झिझकते नहीं कि वो अपने बेटे को अच्छी यादें देना चाहते हैं, ताकि उसके पास अपने ‘थेरेपिस्ट’ को बताने के लिए कुछ तो हो. सच कहिये तो ऐसे ‘थेरेपिस्ट’ के पास जाने की जरूरत हम सबको है, जिनके फ़ोन कॉल्स अपने माँ-बाप के लिए कभी दो-चार मिनट से ज्यादा लम्बे नहीं होते.

डियर ज़िन्दगी’ अपने छोटे-छोटे, हलके-फुल्के पलों में बड़े-बड़े फलसफों वाली बातें कहने का जोखिम बखूबी और बेख़ौफ़ उठाती है. डॉक्टर खान जब भी रिश्तों को लेकर ज़िन्दगी का एक नया पहलू काईरा को समझा रहे होते हैं, उनकी इस भूमिका में शाहरुख़ जैसे बड़े कलाकार का होना अपनी अहमियत साफ़ जता जाता है. ये चेहरा जाना-पहचाना है. बीसियों साल से परदे पर प्यार, दोस्ती और ज़िन्दगी की बातें करता आ रहा है, पर इस बार उसकी बातों की दलील पहले से कहीं ज्यादा गहरी है, मजबूत है, कारगर है. आलिया जिस तरह भरभरा कर टूटती हैं परदे पर, हिंदी सिनेमा में अपने साथ के तमाम कलाकारों को धकियाते हुए एकदम आगे निकल जाती हैं. फिल्म की खासियतों में से एक ये भी है कि शाहरुख़ जैसा दमदार स्टार होते हुए भी कैमरा और कहानी दोनों आलिया के किरदार से कभी दूर हटते दिखाई नहीं देते.

गिनती के दो-चार बेहद आम दृश्यों को छोड़ दें, खासकर काईरा का ‘फॅमिली अफेयर’ जहां फिल्म की कहानी दूसरे हिस्सों के मुकाबले काफी बेअसर और लचर दिखाई पड़ती है, तो ‘डियर जिंदगी’ एक बहुत ही सुलझी हुई फिल्म है. जितना बोलती है, उतना ही कहती भी है, पूरी तरह नाप-तौल कर, पूरी तरह सोच-समझ कर! [3.5/5]         

Friday, 28 October 2016

ऐ दिल है मुश्किल: अनुष्का-रणबीर और इश्क़ की जबान उर्दू!! [3.5/5]

दोस्ती में प्यार, प्यार में दोस्ती. और इन दोनों के बीच की तमाम मुश्किलें. करन जौहर अरसे से इस समंदर में गोता लगा रहे हैं. ‘कुछ कुछ होता है के राहुल और अंजलि परदे पर भले ही बीस साल बाद अभी भी उतनी ही बचकानी ढंग से पेश रहे हों, करन परदे के पीछे काफी संजीदा हो चले हैं. अपनी नई फिल्म दिल है मुश्किल में करन एक बार फिर इकतरफा प्यार में भीगे आशिक़ की कहानी कह रहे हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उनके किरदार कई मामलों में पहले से ज्यादा समझदार, ज्यादा ईमानदार और कुछेक मामलों में एकदम दो-टूक हैं. इतने दो-टूक कि चुभने लगें, दर्द देने लगें. रिश्तों में लाग-लपेट वाली कोई चाशनी नहीं, कोई मलाल नहीं. बस बेपरवाह मुहब्बत, और मुहब्बत में बेपरवाही.

दिल है मुश्किल बड़ी सफाई से, और बहुत ही दिलचस्प तरीके से बॉलीवुड में रोमांटिक फिल्मों का जश्न भी मनाती है और साथ ही साथ, उन्हीं पर तंज कसते हुए हंसना भी जानती है. लन्दन में अलीज़ेह (अनुष्का शर्मा) अयान (रणबीर कपूर) से मिलती है. दोनों बॉलीवुड के भक्त हैं. अयान मोहम्मद रफ़ी बनना चाहता है. अलीज़ेह शिफॉन साड़ी पहन कर बर्फीली पहाड़ियों में हिंदी फिल्म की हीरोइनों जैसे नाचना चाहती है. हालिया ब्रेक-अप से गुज़र रही अलीज़ेह को अयान की आदतें, पसंद-नापसंद, ज़िन्दगी जीने का तरीका सब कुछ इतना अपना सा लगता है कि एक बार तो वो पूछ भी बैठती है, कहीं तुम मेरे बिछड़े हुए भाई तो नहीं?”. पर अयान को तो प्यार होने लगा है, अलीज़ेह से. अलीज़ेह की ज़िन्दगी में उसका अली (फ़वाद खान) वापस लौट आया है. मुहब्बत पर कभी यकीन नहीं करना चाहिए. दिल चटकने लगा है. गाने में अब दर्द की टीस सुनाई देने लगी है. 

निरंजन आयंगर के साथ मिल कर, करन जौहर प्यार, इश्क़ और मुहब्बत पर भारी-भरकम उर्दू अल्फाजों से भरे, शायराना अंदाज़ वाले खूबसूरत डायलॉग्स से फिल्म को एक नई ताजगी देते हैं. फिल्म के पहले हिस्से में, अनुष्का और रणबीर के बीच का हर सीन आपको जम के गुदगुदाता है. यहाँ अनुष्का अपने किरदार की बेबाकी और अपनी बेझिझक परफॉरमेंस से सारी तालियाँ बटोर ले जाती हैं. फिल्म में अब तक रणबीर सिर्फ अपने दिलकश अंदाज़ से ही आपको लुभाते रहे हैं. फिल्म का दूसरा हिस्सा टूटे हुए दिलों का दर्द बयान करता है. अयान को तलाकशुदा शायरा सबा (ऐश्वर्या राय बच्चन) मिल गयी हैं. दोनों एक ऐसे रिश्ते में रहना चाहते हैं, जिसका कोई नाम हो, जिसके कायदे-कानून बने ही हों कि कभी भी तोड़े जा सकें. प्यार कई पायदान ऊपर चढ़ आया है. पर पहले की टीस अभी भी कहीं दबी है.

दूसरे हिस्से में, ‘ दिल है मुश्किल थोड़ी मुश्किल में फंसती नज़र आती है, जब वो खुद हिंदी फिल्मों के उन्हीं दायरों में बंध कर कर रह जाती है, जिनकी अभी तक वो हँसी उड़ा रही थी. करन की दर्शकों को इमोशनल कर देने की चाह फिल्म पर भारी पड़ने लगी है. सब कुछ अब उतना परफेक्ट नहीं लग रहा, जितना शुरुआत में दिखा था. करन फिल्म में कई सारे पुराने बॉलीवुड गानों को अपने किरदारों को गढ़ने और फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल करते हैं. काश, वो साहिर लुधियानवी साब केवो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना बेहतरपर अमल करने की हिम्मत दिखा पाते, और फिल्म को वक़्त रहते समेट लेते. 

ऐश्वर्या का खूबसूरत लगना कोई ताज्जुब की बात या दिलचस्प वाकया नहीं है, पर दिल है मुश्किल सही मायनों में उनके हुस्न--जमाल का पूरी तरह और बखूबी इस्तेमाल करती है. रणबीर, इस हिस्से में, अपनी अदाकारी पर भरोसा दिखाने लगे हैं. ऐश्वर्या और अनुष्का के साथ डाइनिंग टेबल वाले दृश्य में, उनकी आँखें आपको अन्दर तक कोंच देती हैं. फ़वाद खान हमेशा की तरह आपकी नज़रें खुद से हटने नहीं देते. ताज्जुब की बात है कि फिल्म में एक और पाकिस्तानी कलाकार इमरान अब्बास भी मेहमान भूमिका में हैं, पर उनको लेकर किसी तरह का कोई हंगामा नहीं हुआ.

खैर, ‘ दिल है मुश्किल देखने में अपनी सूरत से कई सारी हालिया फिल्मों जैसी (तमाशा, ये जवानी है दीवानी) भले ही लगती हो, अपनी सीरत में काफी अलग है. इसे एकबॉलीवुड फिल्मसे आगे जाकर देखने की गलती अगर आप नहीं करेंगे, तो मुमकिन है आपका वक़्त अच्छा कटेगा. हिंदी फिल्मों में खूबसूरत अदाकारों के मुंह से ख़ालिस उर्दू के अलफ़ाज़ सुने अरसा बीत गया था. उम्मीद करता हूँ, उर्दू से किसी को (राजनीतिक पार्टियां, फ़र्ज़ी देशभक्त और व्हाट्स ऐप के शरारती तत्व) कोई तकलीफ़ हो! [3.5/5]