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Thursday, 6 June 2019

भारत: भाई की ‘ईदी’ और सिनेमा के ‘घाव’ (2/5)

परदे पर नायक की इमेज़ को भुनाना या दोहराना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए कोई नयी बात नहीं. दिलीप कुमार ‘ट्रेजेडी किंग, मीना कुमारी ‘ट्रेजेडी क्वीन या अमिताभ बच्चन ‘एंग्री यंग मैन’ यूं ही नहीं बन जाते. सलमान खान इस मामले में इन सब से कई कदम आगे निकल चुके हैं. रोमांटिक हीरो (हम आपके हैं कौन, हम दिल दे चुके सनम) से मनोरंजक एक्शन स्टार (वांटेड, दबंग) के बाद, अपने सफ़र के अगले पड़ाव में सलमान अब अपनी बेपरवाह ‘दिल में आता हूँ, समझ में नहीं वाले तेवर से निकलने की छटपटाहट ख़ूब दिखा रहे हैं. उनकी फिल्मों का नायक अब वो शख्स नहीं रहा, सलमान के चाहने वाले जिसे असल जिंदगी के सलमान से जोड़ कर देख लेते थे. आज के परदे का सलमान अपने आपको एक ऐसे नए चोगे में पेश करना चाहता है, जिसकी स्वीकार्यता महज़ टिक-टॉक वाली पीढ़ी तक सीमित न हो, बल्कि बड़े स्तर पर हो, देश स्तर पर हो. अली अब्बास ज़फर की ‘भारत एक ऐसी ही करोड़ों रुपयों वाली विज्ञापन फिल्म है, जिसके केंद्र में सलमान को ‘देश का नमक-टाटा नमक’ की तरह बेचने की कोशिश लगातार चलती रहती है; वरना ‘जन गण मन सुनाकर नौकरी हथियाने वाले नाकारा और नाक़ाबिल लोगों की टीम के लिए सिनेमाहॉल में कोई भी समझदार दर्शक 52 सेकंड्स के लिए भी क्यूँ खड़ा होगा?

‘भारत कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फ़ादर’ पर आधिकारिक रूप से आधारित है. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में 10 साल का भारत (सलमान खान) अपने पिता (जैकी श्रॉफ) और छोटी बहन से बिछड़ कर पुरानी दिल्ली आ गया है, और अब अपने पिता को दिए वादे के साथ बाकी परिवार को एकजुट रखने में मेहनत-मशक्कत कर रहा है, इस उम्मीद में कि एक दिन उसके पिता लौटेंगे. 70 साल की उम्र में राशन की दुकान चलाने से पहले, भारत ‘द ग्रेट इंडियन सर्कस में मौत का कुआं जैसे करतब भी दिखा चुका है, अरब देशों में तेल के खदानों में काम भी कर चुका है, और समंदर में माल ढोने वाले जहाज़ों पर रहते हुए सोमालियाई समुद्री लुटेरों का सामना भी. फिल्म पहले ही जता चुकी है कि 70 साल के बूढ़े आदमी की जिंदगी में काफी कुछ वाकये ऐसे हुए हैं, जिन पर भरोसा करना आसान नहीं होगा. विडम्बना ये है कि फिल्म मनोरंजन के लिए खुद इन तमाम घटनाओं को इतनी लापरवाही और हलके ढंग से पेश करती है कि हंसी तो छोड़िये, आप परेशान होकर अपना सर धुनने बैठ जाते हैं. ख़तरनाक सोमालियाई लुटेरे अमिताभ बच्चन के फैन निकलते हैं, सलमान और उसके दोस्तों को एक-दो हिंदी गानों पर नचा कर छोड़ देते हैं. तेल के खदान में फंसा हुआ भारत जैसे स्क्रीनप्ले के वो चार पन्ने ही खा जाता है, जिसमें उसे खदान से बाहर निकलने की मेहनत करनी पड़ती. बजाय इसके भारत बने सलमान सिर्फ अपनी शर्ट उतारता है, और अगले दृश्य में खदान से बाहर. सलमान थोड़ी कोशिश करते, तो ‘काला पत्थर की स्क्रिप्ट के कुछ पन्ने सलीम खान साब के कमरे से चुराए तो जा ही सकते थे.

बहरहाल, फिल्म भारत को किरदार और देश के तौर पर अलग-अलग देखते हुए भी दोनों के सफ़र को एक-दूसरे से जोड़े रखने की नाकामयाब तरकीब भी लड़ाती है. भारत की जिंदगी के खास ख़ास पलों को जोड़ने में देश के तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक हालातों पर की गयी टिप्पणी जैसे एक भूली-भटकी एक्सरसाइज लगती है- कभी याद आ गयी तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं. नेहरु जी की मृत्यु से लेकर, साठ के दशक में बेरोजगारी और फिर नब्बे के दशक की अर्थव्यवस्था में डॉ. मनमोहन सिंह के योगदान का उल्लेख इसी कड़ी का हिस्सा हैं.

‘भारत में मनोरंजन का अच्छा-खासा दारोमदार फिल्म के सह-कलाकारों के काबिल कन्धों पर रख छोड़ा गया है. कलाकारों की क़ाबलियत जहां इस बात का मज़बूत पक्ष है, स्क्रिप्ट में जिस तरह की सस्ती कॉमेडी उनके हिस्से मढ़ दी गयी है, उतनी ही शर्मनाक और वाहियात. पूरी फिल्म में आसिफ शेख़ और सुनील ग्रोवर दो ही ऐसे अभिनेता हैं, जो अपने किरदार से एक पल के लिए भी अलग नहीं होते. आसिफ शेख के हिस्से जहां नब्बे के दौर के उनके अपने ही मजाकिया हाव-भाव हाथ लगे हैं, और वो उनमें काफी हद तक कामयाब भी रहते हैं; सुनील अपनी मौज़ूदगी तकरीबन हर दृश्य में ज़ाहिर तो करते हैं, मगर ‘चड्डी वाले दोयम दर्जे के मजाकिया दृश्यों से वो भी बच नहीं पाते. यहाँ तक कि एक दृश्य में उन्हें औरत बनने का सुख भी हासिल कराया जाता है. सतीश कौशिक एक फिल्म के साथ परदे पर एक बेहरतीन अभिनेता के तौर पर लौटते ज़रूर हैं, मगर उन्हें भी ‘तुतलाने और तेज़ बोलने वाले किरदार तक ही बाँध कर रख दिया जाता है, मानो उनका वो हिस्सा सीधे-सीधे किसी डेविड धवन फिल्म से उठा लिया गया हो.

कैटरीना कैफ़ बहुत मेहनत करते हुए नज़र आती हैं- ‘भारतीय’ लगने और सुनाई देने की कोशिश करते हुए. साड़ियों और सादे सलवार सूट में हिंदी साफ़-साफ़ बोलने में इस बार उनके नंबर कम ही कटते हैं, और ऐसा तब और जरूरी हो जाता है, जबकि उनके किरदार का नाम ‘कुमुद’ हो, ना कि ‘जोया’, ‘लैला या ‘जैज़’. फिर भी दो मौकों पर उनका ‘स्टोर को ‘स्तोर बोलना खलता है. कहानी और मनोरंजन के बाद, फिल्म अगर सबसे ज्यादा नाइंसाफ़ी किसी से करती है तो वो हैं, सलमान के माँ की भूमिका में सोनाली कुलकर्णी. असल जिंदगी में सोनाली सलमान से 10 साल छोटी हैं, और परदे पर और ज्यादा छोटी दिखती हैं. हालाँकि फिल्म शुरुआत में ही एलान करती है कि पिता हीरो होते हैं, और माएं सुपर हीरो, मगर फिल्म में सोनाली का किरदार महज़ एक प्रॉप से ज्यादा कुछ नहीं. इस माँ को सुपर हीरो बनने का न तो मौका हासिल होता है, न ही न बन पाने की सहानुभूति. बेटा सलमान है आख़िर! और सलमान के लिए? पूरी फिल्म में अभिनय के नाम पर हैं, उनकी पुरानी फिल्मों से मिलते-जुलते गेटअप्स, बूढ़ा दिखाने वाला मेकअप और आंसू बहाने वाले दो दृश्य! अली अब्बास ज़फर की ही फिल्म ‘सुलतान में सलमान ने वजन बढ़े हुए पहलवान के किरदार को आईने के सामने नंगा खड़ा कर देने की जो हिम्मत दिखाई थी, 70 साल के बूढ़े के किरदार यहाँ ऐसी कोई साहसिक कोशिश करने में आलस दिखा जाते हैं.

आखिर में; ‘भारत एक अति-साधारण कोशिश है साधारण से दिखने वाले एक बूढ़े की असाधारण कहानी को परदे पर उकेरने की. ओरिजिनल कोरियाई फिल्म में इस्तेमाल मानवीय संवेदनाओं और गहरे ज़ज्बातों को ताक पर रख कर, मनोरंजन के लिए सस्ते हथकंडों का प्रयोग लेखन-निर्देशन का खोखलापन खुले-आम ज़ाहिर करता है. बंटवारे की त्रासदी पर फिल्म देखनी हो, तो देखिये ‘पिंजर, खदानों में फंसे मजदूरों की जिजीविषा देखनी हो, तो देखिये ‘काला पत्थर, समुद्री लुटेरों से जूझते नायक की कहानी देखनी हो, तो देखिये ‘कैप्टेन फिलिप्स’. हाँ, अगर ‘भाई’ को ईदी देने की रस्म-अदायगी ज़रूरी है आपके लिए, तो एक राहत-कोष बना लीजिये. कम से कम हर साल सिनेमा को घाव तो नहीं सहने पड़ेंगे. [2/5] 

Sunday, 22 September 2013

'द गुड रोड': अच्छी है, पर बहुत धीमी, उबाऊ और साल की सबसे अच्छी तो बिलकुल नहीं! [3/5]

सारे रस्ते आपको कहीं न कहीं पहुंचा ही देते हैं। कुछ बड़ी आसानी से जहां भी आप जाना चाहते हैं, कुछ काफी घुमा-फिरा कर। ऐसे ही एक रस्ते पर कुछ अलग-अलग किरदार मिलते हैं-बिछड़ते हैं-भटकते हैं, और अंत में थोड़े बहुत भटकाव-घुमाव-फिराव के बाद अपनी मंजिल तक पहुँच भी जाते हैं। इसी रास्ते, इसी सफ़र की कहानी है ...लेखक-निर्देशक ज्ञान कोरिया की राष्ट्रीय पुरस्कार प्राप्त गुजराती फिल्म 'द गुड रोड'.

फिल्म बड़े ही खूबसूरत ढंग से आपको गुजरात की एक हाईवे पे छोड़ जाती है ...जहां छुट्टियां बिताने आया एक ७-साल का बच्चा बिछड़ जाता है अपने माँ-बाप से…जहां शहर से भागी हुई एक ९ साल की बच्ची अभी भी रास्ता ढूंढ रही है अपने अपनों तक पहुँचने का ...और इसी हाईवे पर एक ट्रक ड्राईवर गैरकानूनी कामों में उलझी अपनी जिंदगी का आखिरी सफ़र तय रहा है।

फिल्म की कहानी में रोमांच और रहस्य का पुट जिस बखूबी से डाला गया है, काबिले तारीफ़ है। हर पल "आगे क्या होने वाला है' इस उधेड़बुन में आप हमेशा अपने आपको उलझा हुआ पायेंगे। पर फिल्म कहीं-कहीं बहुत ही वास्तविकता के करीब है, जो शायद आपको विचलित भी कर सकता है। मसलन, जब ७-साल का बच्चा ट्रक ड्राईवर के साथ अपने माँ-बाप से मिलने की कोशिश में ट्रक को ही अपना घर बना लेता है, ट्रक का खलासी बच्चे के साथ बड़े गंदे तरीके से गाली-गलौज के साथ पेश आता है। एक दूसरे दृश्य में, कुछ नाबालिग लडकियां देह-व्यापार के लिए गाँव वालों के सामने जिस तरह रात के अँधेरे में परोसी जाती हैं, आप सच में अपने अन्दर कुछ टूटता हुआ पाते हैं।

फिल्म की गति काफी धीमी है और यकीन मानिए यह एक बहुत बड़ी कमी है। सिर्फ १ घंटे ३० मिनट की फिल्म अगर आपको उबाऊ और लम्बी लगे तो अच्छी बात नहीं। हालांकि अमिताभ सिंह ने कच्छ के रण और गुजरात हाईवे के आस-पास के असली लोकेशन्स को एक खूबसूरत पेंटिंग की तरह परदे पर उतारा और यही वजह है कि आप फिल्म से मुंह मोड़ नहीं पाते जबकि फिल्म की गति आपको ऐसा करने के लिए बार बार उकसाती है। फिल्म का एक और पक्ष है जो आपको बार-बार परेशान करता है, फिल्म का स्क्रीनप्ले कहानी को आगे बढाता तो है पर अपनी सुविधा के हिसाब से बड़ी आसानी से, जैसे बच्चा कार की पीछे वाली सीट से उतर जाता है और माँ-बाप को भनक तक नहीं लगती, कुछ पात्र तो सिर्फ इसलिए भटकते हैं क्यूंकि उन्हें भटकना है, किरदार अचानक ही भले लगने लगते हैं और अचानक ही सब कुछ ठीक भी हो जाता है।

अभिनय की दृष्टि से अजय गेही, सोनाली कुलकर्णी पहचाने कलाकार हैं, समर्थ लगते हैं। बाल कलाकार प्रभावित करते हैं। पर बहुत सारे कलाकार भले ही मंजे हुए न हों, किरदार में पूरी तरह समाये हुए नज़र आते हैं...आप उन्हें देखते हैं, कैमरे के साथ उनकी असहजता महसूस भी कर लेते हैं पर फिर भी वो आपको सच्चे लगते हैं।

अंत में, 'द गुड रोड' एक अच्छी फिल्म है, गुजराती सिनेमा के लिए मील का पत्थर...पर इसे साल की सबसे अच्छी फिल्म कहना मुझे थोडा ज्यादा लगता है। कलात्मक सिनेमा देखने वालों को शायद ज्यादा अच्छी लगे, पर ऐसे वक़्त में जब 'शिप ऑफ़ थिसिअस' जैसी भारी फिल्म भी दर्शकों के दिल में सहजता से उतरने की कला सिखा रही हो, जब 'द लंचबॉक्स' जैसी सीधी-सादी लव-स्टोरी भी आपको भावनात्मक रूप से झकझोर जाती हो…इस तरह की फिल्म-मेकिंग पुराने समानांतर सिनेमा की याद दिलाती है मगर दुर्भाग्यवश वहाँ तक पहुँच नहीं पाती! नतीजा? न इधर-न उधर! देखिये और खुद फैसला कीजिये [३/५]