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Thursday, 6 June 2019

भारत: भाई की ‘ईदी’ और सिनेमा के ‘घाव’ (2/5)

परदे पर नायक की इमेज़ को भुनाना या दोहराना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए कोई नयी बात नहीं. दिलीप कुमार ‘ट्रेजेडी किंग, मीना कुमारी ‘ट्रेजेडी क्वीन या अमिताभ बच्चन ‘एंग्री यंग मैन’ यूं ही नहीं बन जाते. सलमान खान इस मामले में इन सब से कई कदम आगे निकल चुके हैं. रोमांटिक हीरो (हम आपके हैं कौन, हम दिल दे चुके सनम) से मनोरंजक एक्शन स्टार (वांटेड, दबंग) के बाद, अपने सफ़र के अगले पड़ाव में सलमान अब अपनी बेपरवाह ‘दिल में आता हूँ, समझ में नहीं वाले तेवर से निकलने की छटपटाहट ख़ूब दिखा रहे हैं. उनकी फिल्मों का नायक अब वो शख्स नहीं रहा, सलमान के चाहने वाले जिसे असल जिंदगी के सलमान से जोड़ कर देख लेते थे. आज के परदे का सलमान अपने आपको एक ऐसे नए चोगे में पेश करना चाहता है, जिसकी स्वीकार्यता महज़ टिक-टॉक वाली पीढ़ी तक सीमित न हो, बल्कि बड़े स्तर पर हो, देश स्तर पर हो. अली अब्बास ज़फर की ‘भारत एक ऐसी ही करोड़ों रुपयों वाली विज्ञापन फिल्म है, जिसके केंद्र में सलमान को ‘देश का नमक-टाटा नमक’ की तरह बेचने की कोशिश लगातार चलती रहती है; वरना ‘जन गण मन सुनाकर नौकरी हथियाने वाले नाकारा और नाक़ाबिल लोगों की टीम के लिए सिनेमाहॉल में कोई भी समझदार दर्शक 52 सेकंड्स के लिए भी क्यूँ खड़ा होगा?

‘भारत कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फ़ादर’ पर आधिकारिक रूप से आधारित है. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में 10 साल का भारत (सलमान खान) अपने पिता (जैकी श्रॉफ) और छोटी बहन से बिछड़ कर पुरानी दिल्ली आ गया है, और अब अपने पिता को दिए वादे के साथ बाकी परिवार को एकजुट रखने में मेहनत-मशक्कत कर रहा है, इस उम्मीद में कि एक दिन उसके पिता लौटेंगे. 70 साल की उम्र में राशन की दुकान चलाने से पहले, भारत ‘द ग्रेट इंडियन सर्कस में मौत का कुआं जैसे करतब भी दिखा चुका है, अरब देशों में तेल के खदानों में काम भी कर चुका है, और समंदर में माल ढोने वाले जहाज़ों पर रहते हुए सोमालियाई समुद्री लुटेरों का सामना भी. फिल्म पहले ही जता चुकी है कि 70 साल के बूढ़े आदमी की जिंदगी में काफी कुछ वाकये ऐसे हुए हैं, जिन पर भरोसा करना आसान नहीं होगा. विडम्बना ये है कि फिल्म मनोरंजन के लिए खुद इन तमाम घटनाओं को इतनी लापरवाही और हलके ढंग से पेश करती है कि हंसी तो छोड़िये, आप परेशान होकर अपना सर धुनने बैठ जाते हैं. ख़तरनाक सोमालियाई लुटेरे अमिताभ बच्चन के फैन निकलते हैं, सलमान और उसके दोस्तों को एक-दो हिंदी गानों पर नचा कर छोड़ देते हैं. तेल के खदान में फंसा हुआ भारत जैसे स्क्रीनप्ले के वो चार पन्ने ही खा जाता है, जिसमें उसे खदान से बाहर निकलने की मेहनत करनी पड़ती. बजाय इसके भारत बने सलमान सिर्फ अपनी शर्ट उतारता है, और अगले दृश्य में खदान से बाहर. सलमान थोड़ी कोशिश करते, तो ‘काला पत्थर की स्क्रिप्ट के कुछ पन्ने सलीम खान साब के कमरे से चुराए तो जा ही सकते थे.

बहरहाल, फिल्म भारत को किरदार और देश के तौर पर अलग-अलग देखते हुए भी दोनों के सफ़र को एक-दूसरे से जोड़े रखने की नाकामयाब तरकीब भी लड़ाती है. भारत की जिंदगी के खास ख़ास पलों को जोड़ने में देश के तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक हालातों पर की गयी टिप्पणी जैसे एक भूली-भटकी एक्सरसाइज लगती है- कभी याद आ गयी तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं. नेहरु जी की मृत्यु से लेकर, साठ के दशक में बेरोजगारी और फिर नब्बे के दशक की अर्थव्यवस्था में डॉ. मनमोहन सिंह के योगदान का उल्लेख इसी कड़ी का हिस्सा हैं.

‘भारत में मनोरंजन का अच्छा-खासा दारोमदार फिल्म के सह-कलाकारों के काबिल कन्धों पर रख छोड़ा गया है. कलाकारों की क़ाबलियत जहां इस बात का मज़बूत पक्ष है, स्क्रिप्ट में जिस तरह की सस्ती कॉमेडी उनके हिस्से मढ़ दी गयी है, उतनी ही शर्मनाक और वाहियात. पूरी फिल्म में आसिफ शेख़ और सुनील ग्रोवर दो ही ऐसे अभिनेता हैं, जो अपने किरदार से एक पल के लिए भी अलग नहीं होते. आसिफ शेख के हिस्से जहां नब्बे के दौर के उनके अपने ही मजाकिया हाव-भाव हाथ लगे हैं, और वो उनमें काफी हद तक कामयाब भी रहते हैं; सुनील अपनी मौज़ूदगी तकरीबन हर दृश्य में ज़ाहिर तो करते हैं, मगर ‘चड्डी वाले दोयम दर्जे के मजाकिया दृश्यों से वो भी बच नहीं पाते. यहाँ तक कि एक दृश्य में उन्हें औरत बनने का सुख भी हासिल कराया जाता है. सतीश कौशिक एक फिल्म के साथ परदे पर एक बेहरतीन अभिनेता के तौर पर लौटते ज़रूर हैं, मगर उन्हें भी ‘तुतलाने और तेज़ बोलने वाले किरदार तक ही बाँध कर रख दिया जाता है, मानो उनका वो हिस्सा सीधे-सीधे किसी डेविड धवन फिल्म से उठा लिया गया हो.

कैटरीना कैफ़ बहुत मेहनत करते हुए नज़र आती हैं- ‘भारतीय’ लगने और सुनाई देने की कोशिश करते हुए. साड़ियों और सादे सलवार सूट में हिंदी साफ़-साफ़ बोलने में इस बार उनके नंबर कम ही कटते हैं, और ऐसा तब और जरूरी हो जाता है, जबकि उनके किरदार का नाम ‘कुमुद’ हो, ना कि ‘जोया’, ‘लैला या ‘जैज़’. फिर भी दो मौकों पर उनका ‘स्टोर को ‘स्तोर बोलना खलता है. कहानी और मनोरंजन के बाद, फिल्म अगर सबसे ज्यादा नाइंसाफ़ी किसी से करती है तो वो हैं, सलमान के माँ की भूमिका में सोनाली कुलकर्णी. असल जिंदगी में सोनाली सलमान से 10 साल छोटी हैं, और परदे पर और ज्यादा छोटी दिखती हैं. हालाँकि फिल्म शुरुआत में ही एलान करती है कि पिता हीरो होते हैं, और माएं सुपर हीरो, मगर फिल्म में सोनाली का किरदार महज़ एक प्रॉप से ज्यादा कुछ नहीं. इस माँ को सुपर हीरो बनने का न तो मौका हासिल होता है, न ही न बन पाने की सहानुभूति. बेटा सलमान है आख़िर! और सलमान के लिए? पूरी फिल्म में अभिनय के नाम पर हैं, उनकी पुरानी फिल्मों से मिलते-जुलते गेटअप्स, बूढ़ा दिखाने वाला मेकअप और आंसू बहाने वाले दो दृश्य! अली अब्बास ज़फर की ही फिल्म ‘सुलतान में सलमान ने वजन बढ़े हुए पहलवान के किरदार को आईने के सामने नंगा खड़ा कर देने की जो हिम्मत दिखाई थी, 70 साल के बूढ़े के किरदार यहाँ ऐसी कोई साहसिक कोशिश करने में आलस दिखा जाते हैं.

आखिर में; ‘भारत एक अति-साधारण कोशिश है साधारण से दिखने वाले एक बूढ़े की असाधारण कहानी को परदे पर उकेरने की. ओरिजिनल कोरियाई फिल्म में इस्तेमाल मानवीय संवेदनाओं और गहरे ज़ज्बातों को ताक पर रख कर, मनोरंजन के लिए सस्ते हथकंडों का प्रयोग लेखन-निर्देशन का खोखलापन खुले-आम ज़ाहिर करता है. बंटवारे की त्रासदी पर फिल्म देखनी हो, तो देखिये ‘पिंजर, खदानों में फंसे मजदूरों की जिजीविषा देखनी हो, तो देखिये ‘काला पत्थर, समुद्री लुटेरों से जूझते नायक की कहानी देखनी हो, तो देखिये ‘कैप्टेन फिलिप्स’. हाँ, अगर ‘भाई’ को ईदी देने की रस्म-अदायगी ज़रूरी है आपके लिए, तो एक राहत-कोष बना लीजिये. कम से कम हर साल सिनेमा को घाव तो नहीं सहने पड़ेंगे. [2/5] 

Friday, 22 December 2017

टाइगर ज़िंदा है: ...पर कहानी का क्या? [2.5/5]

क्या आपको पता है, सी पी प्लस ('ऊपर वाला सब देख  रहा है' की टैगलाइन वाले)ब्रांड के सीसीटीवी कैमरा इराक में भी बिकते हैं? क्या आपको पता है, रॉ अपने सीक्रेट मिशन के कोडवर्ड के तौर पर हिंदी गानों का इस्तेमाल करती है? तूतू तू, तूतू तारा, आ गया दोस्त हमारा? क्या आपको पता है, आखिरी मिनटों में टाइम बम रोकने के लिए 'लाल' तार ही काटना होता है? और अगर लाल तार हो ही नहीं, तो पूरा बम निकाल फेंक देने में ही समझदारी है? क्या आपको पता है, रॉ की ही तरह पाकिस्तान की आईएसआई एजेंसी भी 'शांति' चाहती है? क्या आपको पता है, भारत और पाकिस्तान लोग जब भी मिलते हैं 'ग़दर', सानिया-शोएब और क्रिकेट की ही बातें करते हैं? 

अली अब्बास ज़फर की 'टाइगर ज़िंदा है' आपके ऐसे ढेर सारे वाहियात सवालों का गिन गिन के पूरा जवाब देती है. बस भूल जाती है तो एक अहम सवाल, "कहानी का क्या हो रहा है, भाई?". ये सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्यूंकि फिल्म में एक अदद अच्छी कहानी की झलक कभी-कभी ही सही, साफ़ तौर पर दिखती है. तकलीफ ये है कि फिल्म ज्यादातर वक़्त (सलमान) भाई के स्लो-मोशन शॉट्स और गोला-बारूद के बीच फिल्माए गए एक्शन दृश्यों में ही खुले हाथों खर्च होती रहती है.  

ईराक के एक अस्पताल में आतंकवादियों ने 25 भारतीय और 15 पाकिस्तानी नर्सों को बंधक बना रखा है. भारत की ओर से एजेंट टाइगर (सलमान खान) ही है, जो इस मिशन को अंजाम दे सकता है. पाकिस्तान की ओर से एजेंट ज़ोया (कटरीना कैफ़) को ये इज्ज़त बख्शी जाती है, जो इत्तेफ़ाक से टाइगर की बीवी भी हैं. इस बीच आतंकवादी संगठन के प्रमुख अबू उस्मान (सज्जाद देलाफरूज़) पर अमेरिका की भी नज़र बनी हुई है, हवाई हमला कभी भी हो सकता है. टाइगर और ज़ोया के पास सिर्फ 7 दिन हैं इस मिशन को पूरा करने के लिए. 

इसी साल की मलयालम फिल्म 'टेक ऑफ' इसी विषय पर बनी एक बेहतरीन फिल्म है. इससे उबरें, तो कभी उधर भी तशरीफ़ ले जाईये. फ़िलहाल, बात 'टाइगर ज़िंदा है' की. सलमान की फिल्मों से अक्सर शिकायत रहती है, कहानी के नदारद होने की. इस फिल्म के बाद ये शिकायत बंद कर देनी चाहिए. आख़िरकार, किसी भी अच्छी-भली कहानी को सलमान की क्या जरूरत? फिल्म देखते वक़्त आप बड़ी आसानी से तय कर पायेंगे कि फिल्म दो सतहों पर चलती नज़र आती है. एक, जहाँ बंधक नर्सों की कहानी आपको हर बार बांधे रखना चाहती है, मगर उसे तयशुदा वक़्त नहीं मिलता. और दूसरा, जहां सलमान अपनी हरकतों पर वक़्त जाया करने से बाज़ नहीं आते. भला हो, फिल्म के बड़े कैनवास का, कुछ बेहद कसे हुए रोमांचक एक्शन दृश्यों का, जो बेवजह ही सही, मजेदार लगते हैं.

बंद घड़ी भी दिन में दो बार सही वक़्त बताती है. फिल्म भी लगभग इतनी ही बार ईमानदार दिखती है. मिशन पर एक नौजवान एजेंट अपने साथ तिरंगा लेकर आया है, और मिशन ख़त्म होने पर उसे लहराने-फहराने का मौका छोड़ना नहीं चाहता. एक अंडर-कवर एजेंट के लिए तिरंगा साथ रखना मिशन के लिए खतरनाक हो सकता है, इसलिए टाइगर उसे समझाता है, 'ज़ज्बा रखना ठीक है, ज़ज्बाती होना नहीं'. ठीक ऐसे ही, फिल्म भारत-पाकिस्तान के बीच सुलह, शांति और अमन की बात कई मौकों पर बड़ी दिलेरी से सामने रखती है. हालाँकि ज्यादातर वक़्त ये सब आपको प्रवचन से ज्यादा और कुछ नहीं लगता. 

जहाँ तक मुझे लगता है, कुदरती रूप से रॉ एजेंट जासूस ही होते हैं, पर 'टाइगर ज़िंदा है' एक औसत जासूसी-थ्रिलर होने के करीब भी नहीं पहुँचती और एक ठीक-ठाक एक्शन-एंटरटेनर होके ही रह जाती है. हालाँकि फिल्म में सलमान ताबड़तोड़ आतंकवादियों पर गोलियां बरसाते हैं, गोले दागते हैं, और अंत तक सबको बचाने में कामयाब भी साबित होते हैं, पर वहीँ किसी एक कोने में दम तोड़ती एक रोमांचक कहानी को देर तक जिंदा नहीं रख पाते. क्या फर्क पड़ता है, और फ़िक्र भी क्यूँ? जब तक एक अदद नाम का ही जलवा काफी है, कारगर है, बरक़रार है. [2.5/5]  

Wednesday, 6 July 2016

सुल्तान: भाई मुबारक!! [3/5]

ईद आ गयी है. सिर्फ इसलिए नहीं क्यूंकि रमज़ान का महीना ख़त्म होने को आया बल्कि इसलिए भी क्यूंकि ‘भाई’ की फिल्म सिनेमाघरों में आ गयी है. लोग अपनों में ईद मनाने ‘अन्दरुने मुल्क’ तो जा ही रहे होंगे, सिनेमाघरों में भी भीड़ गज़ब की उमड़ने लगी है. ये अप्रत्याशित नहीं है. इसी की उम्मीद थी, और ये उम्मीद बड़ी सोची-समझी उम्मीद है. इस उम्मीद का सिनेमा से उतना लेना-देना नहीं है, जितना कि फिल्मों के व्यावसायिक पक्ष से. अली अब्बास ज़फर की ‘सुल्तान’ जिस दिमागी कसरत से उपजती है, वहां स्टार की डेट्स और रिलीज़ का दिन पहले मुकर्रर हो जाता है; कहानी, निर्देशन और अभिनय से जुड़े दूसरे पहलू इसके बाद धीरे-धीरे अपने तय क्रम में जुड़ते चले जाते हैं.

‘भाई’ की कोई भी फिल्म ‘भाई’ की ही फिल्म होती है. ‘सुल्तान’ कुछ अलग नहीं है. हाँ, कुछ मामलों में थोड़ी बेहतर ज़रूर है. बड़े कसमसाते हुए ही सही, ‘भाई’ यहाँ 30 की उम्र से सफ़र करते हुए 40 की दहलीज़ तक पहुँचने का दम-ख़म दिखाते हैं, पहली बार. हालाँकि ‘भाई’ पहले भी स्क्रीन पर शर्ट उतारते नज़र आये हैं, पर इस बार जब वो ऐसा करते हैं, अन्दर से उनके गठीले बदन के खांचे नज़र नहीं आते बल्कि एक थुलथुली सी तोंद सामने छलक पड़ती है. जाने-अनजाने ही सही, ‘भाई’ ने किरदार में ढलने की ओर एक सफल कोशिश तो कर ही दी है. रही-सही कोर-कसर पूरी कर देते हैं ‘मस्तराम’ और ‘मिस टनकपुर हाज़िर हों’ के अभिनेता राहुल बग्गा, जो इस फिल्म में ‘भाई’ के हरियाणवी लहजे पे नज़र रखने वाले मास्टरजी बनकर परदे के पीछे ही डटे रहते हैं. इतने सब के बावजूद भी, ‘भाई’ अपने एक उसूल से पीछे नहीं हटते. ‘भाई’ एहसान लेते नहीं, एहसान करते हैं. चाहे वो अकेले हल चलाकर खेत जोतना ही क्यूँ न हो. वैसे अगर हल को पीछे से जमीन में जोतना वाला कोई न हो तो ये काम काम रह ही नहीं जाता. फिर तो आप दौड़ते रहिये हल सर पे उठाये.

सुल्तान’ में पहलवानी और मुक्केबाजी भरपूर है, पर इसे एक ‘स्पोर्ट्स फिल्म’ कहना उतना ही बचकाना होगा जितना साजिद खान की फिल्मों को कॉमेडी कहना. असलियत में ‘सुल्तान’ दो कुश्तिबाज़ों की प्रेम-कहानी है. आरफ़ा [अनुष्का शर्मा] और सुल्तान [सलमान खान]. आरफ़ा ओलंपिक्स में भारत के लिए गोल्ड मेडल हासिल करने का सपना देख रही है. गाँव का निठल्ला-नालायक सुल्तान जब उसे पहली बार मिलता है, आरफ़ा के मन में कोई दो राय नहीं है. उसके लिए उसका सपना ही सब कुछ है. आपको लगता है ये है हरियाणे की लड़की. बाद में, 30 साल का सुल्तान उसके प्यार में पहलवान तक बन जाता है. अचानक आरफ़ा को निकाह पढ़वाना है. अचानक आरफ़ा को माँ बनने से भी कोई दिक्कत नहीं. अचानक आरफ़ा को अपना सपना सुल्तान के सपने में दिखने लगता है. और ये सब सिर्फ इसलिए क्यूंकि ‘सुल्तान’ ‘भाई’ की फिल्म है. और चूँकि ‘सुल्तान’ ‘भाई’ की फिल्म है तो ‘भाईगिरी’ तो रहेगी ही; ‘बीइंग ह्यूमन’ का तड़का भी होगा, कभी न कम पड़ने वाला ‘स्वाग’ भी होगा, थोड़ी उल-जलूल हरकतें भी होंगीं, इमोशंस का बहाव भी होगा और होगा ढेर सारा एक्शन. सब है. अगर कुछ नहीं है, तो ये सब होने की कोई ख़ास, कोई मुक्कमल वजह!

तकरीबन 3 घंटे के अपने पूरे वक़्त में, ‘सुल्तान’ बेहतरीन कैमरावर्क, शानदार प्रोडक्शन-डिज़ाइन, जोशीले साउंडट्रैक और कुछ बहुत अच्छे फाइटिंग सीक्वेंस के साथ आपको बांधे रखने की पूरी कोशिश करती है. अभिनय में कुमुद मिश्रा, अमित साढ और सुल्तान की दोस्त की भूमिका करने वाला कलाकार पूरी तरह प्रभावित करते हैं. रणदीप हुडा मेहमान कलाकार की हैसियत से थोड़े ही वक़्त स्क्रीन पर नज़र आते हैं. अनुष्का के किरदार के साथ फिल्म की कहानी भले ही पूरी तरह न्याय करती न दिखती हो, पर अनुष्का कहीं भी कमज़ोर नहीं पड़तीं. ‘भाई’ की फिल्म न होती तो शायद हम और फिल्म के लेखक इस किरदार की पेचीदगी को और समझने की कोशिश ज़रूर करते.

अंत में; ‘सुल्तान’ में सलमान बहुत हद तक फिल्म के किरदार को अपनाने की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं. फिल्म में कई बार अपने हाव-भाव, अपने लहजे-लिहाज़ और अपने पहनावे से सलमान आपको चौंका देते हैं, और ये हिंदी सिनेमा के लिए काफी अच्छे संकेत हैं हालाँकि उनके अभिनय के बारे में अब भी बहस की जा सकती है, पर सबसे ज्यादा निराश करती है फिल्म की औसत कहानी और उसके घिसे-पिटे डायलाग. ज़िन्दगी के थपेड़ों से लड़ते-जूझते बॉक्सर जिनको अंततः मोक्ष, मंजिल, मुक्ति मिलती है बॉक्सिंग रिंग के अन्दर ही; ऐसी कितनी ही कहानियाँ हम पहले भी परदे पर देखते आये हैं, और इससे कहीं बेहतर ढंग से कही गयी, पर ‘सुल्तान’ की बात अलग है. ये ‘भाई’ की फिल्म है, तो ईद के मौके पर आप सबको...‘भाई मुबारक’! [3/5]          

Friday, 14 February 2014

GUNDAY: Drama drives a bumpy ride! Story thrown to back seat!! [2.5/5]

If 70’s hit box-office formula, exploited mercilessly later in 90’s, of macho-giri, hero-panthi & solid dialogue-baazi could still guarantee an out-sized rage in entertainment, YashRaj film’s GUNDAY would have easily been a winner all the way but what it misses out in translation is the unforeseen elements in the plot. So, GUNDAY- the saga of love, friendship & betrayal remains limited and disappoints for the most part.

In a GANGS OF WASSEYPUR-ish docudrama style of narration, Irrfan playing a confident cop takes us back in 1971’s Bangladesh where 2 young guns are forced to flee and find a shelter in Calcutta only to rise as the second most famous [infamous would do the justice] craze after the monumental Howrah Bridge. These so-called ‘local Robinhoods’ & the biggest goons of their times [Ranveer playing Bikram and Arjun being Bala] are into every illegal business in the list. So far so good, but then the next chain of events is not very tricky to track down when both fall in ‘sachche wala pyaar’ with the same girl [Priyanka Chopra sizzles as a cabaret dancer]. Film gets derailed from being a hardcore anti-hero film to bring down the dysfunctional system to a typical romantic triangle with an outdated pinch of betrayal and misunderstandings coming in the way of friendship and love.

Setting a story in 70’s-80’s brings plenty of interesting nuances in the plot to rejoice. Rajesh Khanna is mentioned as a superstar girls fall for, for more than once. Mithun da’s dance moves are hard to ignore in choreography. Bappi Lahiri’s voice is prominently used to catch the bong-connection. The colors and characters also smell rustic & next-door [One specific character can’t stop himself addressing his bloodthirsty rival as ‘dada’]. Obviously the direction is on the right track but obviousness in plot kills the grandness of GUNDAY. Why to borrow [Copy-paste] from storylines that are done-to-death? I don’t have any clue and I guess the thinking tanks behind this would also not have a justification.

Film if manages to hold your attention, despite being tad lengthy by at least 15-20 minutes, the credit goes to its production value which makes it a grandeur explosion of drama on screen, the performances mainly of Irrfan who is regular but delightfully charming with some of the cheesiest lines and an attitude that becomes skin to the character and last but not the least the high-voltage drama. Whatever happens here happens in a slow-motion technique. Everyone appears from a hazy-foggy-smoky background. Punches hit the chiseled body in high-speed. In the rest, Ranveer outshines with a good performance. Arjun impresses but not without showing limitations as an actor. Priyanka does it the way she’s known to.

Overall, Ali Abbas Jafar’s glorification of anti-heroes ends up in a lengthy bumpy ride that is enjoyable in parts, grand in looks but definitely not worthy enough to be a descendant of bygone era’s masala/mass entertainers. Watch it if your idea to celebrate Valentine’s Day is nothing else but to see two shirtless men fighting for one girl. [2.5/5]