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Thursday, 6 June 2019

भारत: भाई की ‘ईदी’ और सिनेमा के ‘घाव’ (2/5)

परदे पर नायक की इमेज़ को भुनाना या दोहराना हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के लिए कोई नयी बात नहीं. दिलीप कुमार ‘ट्रेजेडी किंग, मीना कुमारी ‘ट्रेजेडी क्वीन या अमिताभ बच्चन ‘एंग्री यंग मैन’ यूं ही नहीं बन जाते. सलमान खान इस मामले में इन सब से कई कदम आगे निकल चुके हैं. रोमांटिक हीरो (हम आपके हैं कौन, हम दिल दे चुके सनम) से मनोरंजक एक्शन स्टार (वांटेड, दबंग) के बाद, अपने सफ़र के अगले पड़ाव में सलमान अब अपनी बेपरवाह ‘दिल में आता हूँ, समझ में नहीं वाले तेवर से निकलने की छटपटाहट ख़ूब दिखा रहे हैं. उनकी फिल्मों का नायक अब वो शख्स नहीं रहा, सलमान के चाहने वाले जिसे असल जिंदगी के सलमान से जोड़ कर देख लेते थे. आज के परदे का सलमान अपने आपको एक ऐसे नए चोगे में पेश करना चाहता है, जिसकी स्वीकार्यता महज़ टिक-टॉक वाली पीढ़ी तक सीमित न हो, बल्कि बड़े स्तर पर हो, देश स्तर पर हो. अली अब्बास ज़फर की ‘भारत एक ऐसी ही करोड़ों रुपयों वाली विज्ञापन फिल्म है, जिसके केंद्र में सलमान को ‘देश का नमक-टाटा नमक’ की तरह बेचने की कोशिश लगातार चलती रहती है; वरना ‘जन गण मन सुनाकर नौकरी हथियाने वाले नाकारा और नाक़ाबिल लोगों की टीम के लिए सिनेमाहॉल में कोई भी समझदार दर्शक 52 सेकंड्स के लिए भी क्यूँ खड़ा होगा?

‘भारत कोरियाई फिल्म ‘ओड टू माय फ़ादर’ पर आधिकारिक रूप से आधारित है. भारत-पाकिस्तान के बंटवारे में 10 साल का भारत (सलमान खान) अपने पिता (जैकी श्रॉफ) और छोटी बहन से बिछड़ कर पुरानी दिल्ली आ गया है, और अब अपने पिता को दिए वादे के साथ बाकी परिवार को एकजुट रखने में मेहनत-मशक्कत कर रहा है, इस उम्मीद में कि एक दिन उसके पिता लौटेंगे. 70 साल की उम्र में राशन की दुकान चलाने से पहले, भारत ‘द ग्रेट इंडियन सर्कस में मौत का कुआं जैसे करतब भी दिखा चुका है, अरब देशों में तेल के खदानों में काम भी कर चुका है, और समंदर में माल ढोने वाले जहाज़ों पर रहते हुए सोमालियाई समुद्री लुटेरों का सामना भी. फिल्म पहले ही जता चुकी है कि 70 साल के बूढ़े आदमी की जिंदगी में काफी कुछ वाकये ऐसे हुए हैं, जिन पर भरोसा करना आसान नहीं होगा. विडम्बना ये है कि फिल्म मनोरंजन के लिए खुद इन तमाम घटनाओं को इतनी लापरवाही और हलके ढंग से पेश करती है कि हंसी तो छोड़िये, आप परेशान होकर अपना सर धुनने बैठ जाते हैं. ख़तरनाक सोमालियाई लुटेरे अमिताभ बच्चन के फैन निकलते हैं, सलमान और उसके दोस्तों को एक-दो हिंदी गानों पर नचा कर छोड़ देते हैं. तेल के खदान में फंसा हुआ भारत जैसे स्क्रीनप्ले के वो चार पन्ने ही खा जाता है, जिसमें उसे खदान से बाहर निकलने की मेहनत करनी पड़ती. बजाय इसके भारत बने सलमान सिर्फ अपनी शर्ट उतारता है, और अगले दृश्य में खदान से बाहर. सलमान थोड़ी कोशिश करते, तो ‘काला पत्थर की स्क्रिप्ट के कुछ पन्ने सलीम खान साब के कमरे से चुराए तो जा ही सकते थे.

बहरहाल, फिल्म भारत को किरदार और देश के तौर पर अलग-अलग देखते हुए भी दोनों के सफ़र को एक-दूसरे से जोड़े रखने की नाकामयाब तरकीब भी लड़ाती है. भारत की जिंदगी के खास ख़ास पलों को जोड़ने में देश के तत्कालीन राजनीतिक, सामाजिक हालातों पर की गयी टिप्पणी जैसे एक भूली-भटकी एक्सरसाइज लगती है- कभी याद आ गयी तो ठीक, नहीं तो कोई बात नहीं. नेहरु जी की मृत्यु से लेकर, साठ के दशक में बेरोजगारी और फिर नब्बे के दशक की अर्थव्यवस्था में डॉ. मनमोहन सिंह के योगदान का उल्लेख इसी कड़ी का हिस्सा हैं.

‘भारत में मनोरंजन का अच्छा-खासा दारोमदार फिल्म के सह-कलाकारों के काबिल कन्धों पर रख छोड़ा गया है. कलाकारों की क़ाबलियत जहां इस बात का मज़बूत पक्ष है, स्क्रिप्ट में जिस तरह की सस्ती कॉमेडी उनके हिस्से मढ़ दी गयी है, उतनी ही शर्मनाक और वाहियात. पूरी फिल्म में आसिफ शेख़ और सुनील ग्रोवर दो ही ऐसे अभिनेता हैं, जो अपने किरदार से एक पल के लिए भी अलग नहीं होते. आसिफ शेख के हिस्से जहां नब्बे के दौर के उनके अपने ही मजाकिया हाव-भाव हाथ लगे हैं, और वो उनमें काफी हद तक कामयाब भी रहते हैं; सुनील अपनी मौज़ूदगी तकरीबन हर दृश्य में ज़ाहिर तो करते हैं, मगर ‘चड्डी वाले दोयम दर्जे के मजाकिया दृश्यों से वो भी बच नहीं पाते. यहाँ तक कि एक दृश्य में उन्हें औरत बनने का सुख भी हासिल कराया जाता है. सतीश कौशिक एक फिल्म के साथ परदे पर एक बेहरतीन अभिनेता के तौर पर लौटते ज़रूर हैं, मगर उन्हें भी ‘तुतलाने और तेज़ बोलने वाले किरदार तक ही बाँध कर रख दिया जाता है, मानो उनका वो हिस्सा सीधे-सीधे किसी डेविड धवन फिल्म से उठा लिया गया हो.

कैटरीना कैफ़ बहुत मेहनत करते हुए नज़र आती हैं- ‘भारतीय’ लगने और सुनाई देने की कोशिश करते हुए. साड़ियों और सादे सलवार सूट में हिंदी साफ़-साफ़ बोलने में इस बार उनके नंबर कम ही कटते हैं, और ऐसा तब और जरूरी हो जाता है, जबकि उनके किरदार का नाम ‘कुमुद’ हो, ना कि ‘जोया’, ‘लैला या ‘जैज़’. फिर भी दो मौकों पर उनका ‘स्टोर को ‘स्तोर बोलना खलता है. कहानी और मनोरंजन के बाद, फिल्म अगर सबसे ज्यादा नाइंसाफ़ी किसी से करती है तो वो हैं, सलमान के माँ की भूमिका में सोनाली कुलकर्णी. असल जिंदगी में सोनाली सलमान से 10 साल छोटी हैं, और परदे पर और ज्यादा छोटी दिखती हैं. हालाँकि फिल्म शुरुआत में ही एलान करती है कि पिता हीरो होते हैं, और माएं सुपर हीरो, मगर फिल्म में सोनाली का किरदार महज़ एक प्रॉप से ज्यादा कुछ नहीं. इस माँ को सुपर हीरो बनने का न तो मौका हासिल होता है, न ही न बन पाने की सहानुभूति. बेटा सलमान है आख़िर! और सलमान के लिए? पूरी फिल्म में अभिनय के नाम पर हैं, उनकी पुरानी फिल्मों से मिलते-जुलते गेटअप्स, बूढ़ा दिखाने वाला मेकअप और आंसू बहाने वाले दो दृश्य! अली अब्बास ज़फर की ही फिल्म ‘सुलतान में सलमान ने वजन बढ़े हुए पहलवान के किरदार को आईने के सामने नंगा खड़ा कर देने की जो हिम्मत दिखाई थी, 70 साल के बूढ़े के किरदार यहाँ ऐसी कोई साहसिक कोशिश करने में आलस दिखा जाते हैं.

आखिर में; ‘भारत एक अति-साधारण कोशिश है साधारण से दिखने वाले एक बूढ़े की असाधारण कहानी को परदे पर उकेरने की. ओरिजिनल कोरियाई फिल्म में इस्तेमाल मानवीय संवेदनाओं और गहरे ज़ज्बातों को ताक पर रख कर, मनोरंजन के लिए सस्ते हथकंडों का प्रयोग लेखन-निर्देशन का खोखलापन खुले-आम ज़ाहिर करता है. बंटवारे की त्रासदी पर फिल्म देखनी हो, तो देखिये ‘पिंजर, खदानों में फंसे मजदूरों की जिजीविषा देखनी हो, तो देखिये ‘काला पत्थर, समुद्री लुटेरों से जूझते नायक की कहानी देखनी हो, तो देखिये ‘कैप्टेन फिलिप्स’. हाँ, अगर ‘भाई’ को ईदी देने की रस्म-अदायगी ज़रूरी है आपके लिए, तो एक राहत-कोष बना लीजिये. कम से कम हर साल सिनेमा को घाव तो नहीं सहने पड़ेंगे. [2/5] 

Friday, 12 May 2017

सरकार 3: कंपनी नई-माल वही! [1/5]

‘फैक्ट्री’ बंद हो चुकी है. ‘कम्पनी’ खुल गयी है. बाकी का सब कुछ वैसे का वैसा ही है. पुराने माल को उसी पुराने बदरंग पैकेजिंग में डाल कर वापस आपको बेचने की कोशिश की जा रही है. अपनी ही फिल्म के एक संवाद ‘मुझे जो सही लगता है, मैं करता हूँ’ को फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा ने अपनी जिद बना ली है. ‘सरकार 3’ जैसी सुस्त, थकाऊ और नाउम्मीदी से भरी तमाम फिल्में, एक के बाद एक लगातार अपने ज़माने के इस प्रतिभाशाली निर्देशक को उसके खात्मे तक पहुंचाने में मदद कर रही हैं. तकनीकी रूप से फिल्म-मेकिंग में जिन-जिन नये, नायाब तजुर्बों को रामगोपाल वर्मा की खोज मान कर हम अब तक सराहते आये थे, वही आज इस कदर दकियानूसी, वाहियात और बेवजह दिखाई देने लगे हैं कि दिल, दिमाग और आँखें परदे से बार-बार भटकती हुई अंधेरों में सुकून तलाशने लगती है. और ऐसा होता है, क्यूंकि रामगोपाल वर्मा के सिनेमा की भाषा अब बासी हो चली है. पानी ठहरा हुआ हो, तो सड़न पैदा होती ही है. अपने दो सफल प्रयासों (सरकार और सरकार राज) के बावजूद, ‘सरकार 3’ से उसी सड़न की बू आती है.

अपने दोनों बेटों की मौत के बाद भी, सुभाष नागरे (अमिताभ बच्चन) का दम-ख़म अभी देखने लायक है. ठीक ‘सरकार’ की तरह, फिल्म के दूसरे-तीसरे दृश्य में ही नागरे एक बिज़नेसमैन का गरीब बस्तियों को हटाने के लिए करोड़ों का ऑफर ठुकराते हुए कहते हैं, ‘मैं नहीं करूंगा, और किसी को करने भी नहीं दूंगा’. इस बीच उनका पोता शिवाजी (अमित साध) भी लौट आया है. उधर विरोधी भी एकजुट होने लगे हैं. गोविन्द देशपांडे (मनोज बाजपेई) राजनीति के गंदे खेल का सबसे नया-नवेला चेहरा है. दुबई में बैठा वाल्या (जैकी श्रॉफ) अंडरवर्ल्ड की कमान संभाले है. साथ ही, शिवाजी की प्रेमिका अनु (यामी गौतम), जिसके पिता की हत्या सरकार ने करवा दी थी. षड्यंत्र और विश्वासघात से बुनी इस बिसात पर कोई नहीं कह सकता कि कौन सा मोहरा किस करवट बैठेगा? ‘सरकार 3’ एक बार फिर सरकार की सोच को सही साबित करने और उसकी शक्ति को बरक़रार रखने की लड़ाई है.

फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी है, फिल्म की बेतरतीब पटकथा और हद बनावटी संवाद. रामगोपाल वर्मा से बेहतर स्क्रिप्ट या कहानी की समझ रखना तो बेवकूफी है ही, इस बार फिल्म-लेखकों की टीम भी बुरी तरह निराश करती है. फिल्म का कोई भी हिस्सा आपको चौंकाने में सफल नहीं होता, बल्कि अपनी चौकन्नी समझ से आप खुद कदम-दो कदम आगे ही रहते हैं. फिल्म के संवाद बड़ी बेशर्मी से न सिर्फ अपने आप को दोहराते हैं, बल्कि सुनने में ही इतने बेस्वाद और बकवास लगते हैं कि कभी-कभी लगता है, उन्हें बोलते वक़्त अभिनेताओं की अपनी समझ कहाँ घास चरने चली गयी थी? मनोज बाजपेयी जैसे दिग्गज अभिनेता परदे पर 3 मिनट तक लगातार बोल रहे हों, और आप में तनिक भी जोश-ओ-ख़रोश पैदा न हो, तो गलती अभिनेता में नहीं, उन बेदम अल्फाजों में है जो आपने उन्हें परोसे हैं. फिल्म के शुरूआती दृश्य में ही, अमिताभ बच्चन परदे पर बूढ़े शेर की तरह दहाड़ रहे हैं, पर अफ़सोस! आपका ध्यान खींचने के लिए सिर्फ उनकी आवाज़ ही काफी नहीं है. ‘शेर की खाल पहन लेने से कोई कुत्ता शेर नहीं बन जाता’, ‘शेर कितना भी शक्तिशाली हो, जंगली कुत्ते मिलके शेर का शिकार कर ही लेते हैं’, ऐसे घटिया संवादों से भरी फिल्में मुझे वीसीआर के ज़माने में अच्छी लगती थीं.

फिल्म का तकनीकी पहलू भी उतना आजमाया हुआ है. फिल्म के सेट पर मौजूद किसी भी चीज़ का वहाँ पाया जाना सिर्फ एक ही जरूरत पूरी करता है, कैमरे की फ्रेमिंग को लेकर रामगोपाल वर्मा का पागलपन. टेबल पर पड़ा चश्मा हो, हाथ में कॉफ़ी का मग, चाय का कप, फर्श पर पत्थर का बना कुत्ता, कोने में खड़ा ‘लॉफिंग बुद्धा’; कभी न कभी सबको कैमरे के सामने आना ही है, वो भी पूरे क्लोज-अप में. वर्मा जाने किस ग़लतफहमी का शिकार फिल्ममेकर हैं, जो आज भी जोशीले फिल्म-स्टूडेंट की तरह आईने में एक हल्का शॉट डिजाईन करते हैं, और खुद को के. आसिफ मान कर बैठ जाते हैं. मानो अपने हिस्से का ‘शीशमहल’ उन्होंने पा लिया. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शोर-शराबे से भरा तो है ही, भड़काऊ भी है. जब भी आप सुनते हैं, आपको चीखने का मन करता है.

फिल्म की दो ही अच्छी बातें है. एक तो अमिताभ बच्चन, जो 12 साल बाद भी सुभाष नागरे के किरदार में उसी शिद्दत से फिट हो जाते हैं, जैसे पहली वाली ‘सरकार’ में. दूसरा मनोज बाजपेयी की अदाकारी, खास कर उस दृश्य में जहाँ वो राजनीति की तुलना समंदर की लहरों के साथ करते हैं. उनके किरदार का पागलपन उस दृश्य में सम्मोहित कर देता है. वरना तो पूरी फिल्म में हर अभिनेता खराब अभिनय की दौड़ में एक-दूसरे से आगे निकलना चाहता है. हाँ, जाने क्यूँ जैकी श्रॉफ का किरदार हर वक़्त एक कम-अक्ल मॉडल के साथ दिखाया जाता है? यकीन नहीं होता, इसी रामगोपाल वर्मा ने ‘कंपनी’ में हमें मलिक (अजय देवगन) जैसा ज़मीनी गैंगस्टर भी दिया था.

आखिर में, ‘ गॉडफ़ादर’ से ‘सरकार सीरीज’ की तुलना करने वाले रामगोपाल वर्मा खुद कांति शाह से ज्यादा काबिल नज़र नहीं आते, खास कर हिंदी सिनेमा में उनके हालिया योगदान को देखते हुए. दोनों में ‘बैक टू बैक’ फिल्में बनाने का ज़ज्बा तो कूट-कूट कर भरा है, पर दोनों को ही अपने आप को खुश रखने से फुर्सत नहीं. सिनेमा जाता है गर्त में, तो जाये, मेरी बला से! तकलीफ ये है, कि चाहकर भी 25 सालों से हिंदी फिल्में बनाने वाले रामगोपाल वर्मा हिंदी में मेरे ये जज़्बात पढ़ नहीं पायेंगे. तो सवाल ये है कि अब उन्हें ‘सरकार 4’ बनाने से रोकेगा कौन? [1/5]             

Friday, 9 September 2016

फ्रीकी अली: नवाज़ का ‘कॉमेडी सर्कस’! [2/5]

लेखक-निर्देशक सोहेल खान ने भारतीय टेलीविज़न पर कॉमेडी शोज में जज की भूमिका निभाते हुए अपना काफी वक़्त हँसते-खेलते बिताया है. उनकी नई फिल्म ‘फ्रीकी अली’ को अगर अच्छी तरह बयान करना हो तो उन्हीं कॉमेडी शोज का जिक्र लाजिमी हो जाता है. फिल्म न ही उन तमाम एपिसोड्स से कमतर है, न ही उनसे बेहतर. हां, नवाजुद्दीन सिद्दीकी को मुख्य किरदार के तौर पर फिल्म में ले लेना ज़रूर फिल्म को एक मज़बूत कन्धा दे देता है. कम से कम अब फिल्म के हर फ्रेम में एक ऐसा टैलेंट तो है, जिसे फिल्म भले ही उसकी शख्सियत-मुताबिक तवज्जो न दे पर जो खुद अपने आप को कभी निराश नहीं करता. संवादों में व्यंग परोसने की अपनी लगातार कोशिश के साथ, ‘फ्रीकी अली’ मनगढ़ंत सी लगने वाली, चलताऊ कहानी के बावजूद आप को अपने ठीक 2 घंटे की समय-अवधि में कम से कम उकताहट और उबासी तो महसूस नहीं ही होने देती.

अली ‘फ्रीकी’ क्यूँ है? इसका जवाब तो मुश्किल है पर अपनी गली की क्रिकेट टीम का ‘पिंचहिटर’ अली [नवाज़ुद्दीन] पैसे कमाने के लिए हर तरह की नौकरी-कारोबार आजमा चुका है. हफ्तावसूली उसका एकदम नया वाला पैंतरा है. एक दिन इसी सिलसिले में गलती से उसे ‘गोल्फ’ खेलने का मौका मिलता है. क्रिकेट के अनुभवों से लैस अली जल्द ही गोल्फ की दुनिया में मशहूर हो जाता है. अब उसके और उसके सपनों के बीच बस एक ही अड़चन है, अपनी अमीरी का रौब झाड़ने वाला ‘गोल्फ चैंपियन’ विक्रम सिंह राठौर [जस अरोरा, गुड़ नाल इश्क मिठा वाले]. विक्रम उसे नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं छोड़ता और अली उन मौकों को उतनी ही आसानी से उसके खिलाफ इस्तेमाल कर लेता है.

एडम सैंडलर की ‘हैप्पी गिलमोर’ से प्रभावित होकर लिखी गयी, ‘फ्रीकी अली’ की कहानी को मजेदार बनाने के लिए सोहेल खान अपने पुराने ‘हेलो ब्रदर’ ढर्रे का ही सहारा लेते हैं, जहां कहानी के मुख्य किरदार एक अलग ट्रैक पर भटक रहे हैं और दूसरे ट्रैक पर मजाकिया किरदार फिल्म के बीच बीच में आ कर, छोटे छोटे ‘गैग्स एंड गिग्स’ के साथ आपको हंसाने की कोशिश करते हैं. कॉमेडी का ये वो ‘खान’-दान है, जहां हँसी के लिए बूढों, बच्चों और औरतों को गरियाया जाता है, लतियाया जाता है और ऐसा करते वक़्त तनिक शिकन और शर्म भी चेहरे पर आने नहीं दिया जाता. ताज्जुब होता है कि करोड़ों की ये फिल्म उसी छत के नीचे सोची और लिखी गयी है, जहां हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के महानतम लेखकों में से एक अभी भी पूरी तरह सक्षम और सक्रिय है. सोहेल खान बार-बार अपने ‘जोक्स’ को दुहराते रहते हैं, किरदारों को कार्टून बना कर पेश करते हैं और ड्रामा के नाम पर कुछ भी ख़ास परोस पाने में असफल रहते हैं. संवाद और नवाज़ दो ही हैं जो हर बार एक-दूसरे के साथ घुल-मिल कर सोहेल के ‘मजाकिया’ दिवालियेपन को परदे पर नंगा होने से बचा लेते हैं.

कहने को तो यहाँ बहुत कुछ है. एक हट्टा-कट्टा गुंडा जिसकी समझ बच्चे से भी कम है [निकेतन धीर], एक चालाक बूढ़ा आदमी जिसे दुनिया की हर चीज़ याद है पर अपने पैसे और प्रॉपर्टी नहीं, एक माँ जो अपने बेटे के लिए ‘उसके पास माँ है’ की दुहाई देते हुए एक गैंगस्टर से भी भिड़ जाती है [सीमा विश्वास], पर जब अभिनय बात आती है सिर्फ नवाज़ आपको लुभाने में कामयाब रहते हैं. उनके साथी की भूमिका में अरबाज़ बेचारे से लगते हैं, जिन्हें सिर्फ इस लिए फिल्म में लिया गया है क्यूंकि वो ‘खान’दान से हैं. जस अरोरा गुर्राते ज्यादा सुनाई देते हैं. एमी जैक्सन कितनी ईमानदार कोशिश करती होंगी अपने परफॉरमेंस में, इसका अंदाजा आपको इसी बात से हो जाता है कि अक्सर अपनी लाइनें बोलते वक़्त उनके होंठ ही आपस में मिलने से इनकार कर देते हैं. एक दृश्य में जैकी श्रॉफ बस अपने बदनाम ‘मऊशी’ वीडियो क्लिप की ही याद दिलाने परदे पर आ जाते हैं.

अंत में; ‘फ्रीकी अली’ एक बहुत ही सामान्य सी, हलकी-फुलकी फिल्म है, जो दो घंटे के कम वक़्त में भी अपने आप को कई बार दोहराती रहती है. ऐसा लगता है जैसे आप टीवी पर ‘कॉमेडी सर्कस’ का कोई महा-एपिसोड देख रहे हैं, जहां कोई कपिल-कृष्णा-सुदेश नहीं हैं. हैं तो बस नवाज़! सन्डे को टीवी पर आये तो ज़रूर देखियेगा! [2/5]          

Friday, 3 June 2016

हाउसफुल 3: कॉमेडी कोमा में है..! [1/5]

‘कॉमेडी’ कोमा में चली गयी है. अब उसका हॉस्पिटल के बिस्तर से उठना और आपको जी भर के गुदगुदाना न जाने कब होगा? बॉलीवुड की ज़बान में कहें तो, “अब दवा की नहीं, दुआ की जरूरत है”. हँसी के नाम पर रंग, लिंग और नस्ल-भेद को कोंचती टीका-टिप्पणी के बाद, इस बार ‘कॉमेडी’ को शारीरिक अपंगता पर गढ़े गए भौंडे और भद्दे प्रहार झेलने पड़े हैं. घाव गहरे हैं, पर ऐसा नहीं कि सिर्फ ‘कॉमेडी’ को ही मिले हैं. फ़रहाद-साज़िद की ‘हाउसफुल 3’ आपकी सोच, समझ और संवेदनाओं का भी बड़ी बेशर्मी से मज़ाक उड़ाती है, वरना कौन भलामानस होगा जिसे व्हील चेयर पर बैठे ‘दिव्यांग’ की सच्चाई का पता लगाने के लिए उसकी पैंट में चीटियाँ छोड़े जाने पर हँसी आती हो? शादी न हो इसके लिए बेटियों के पेट से थैली (ovary) निकलवा देने के सुझाव के बाद ‘आय एम जोकिंग’ बोल भर देने से क्या सब सिर्फ मज़ाक की हद तक ही रह जाता है?

लन्दन में कहीं एक बहुत पैसे वाला बाप है बटुक पटेल [बोमन ईरानी] जिनका मानना है, “आदमी को सीधा होना चाहिए, उल्टा तो तारक मेहता का चश्मा भी है”. उसकी तीनों बेटियाँ [जैकलीन फर्नान्डीज़, नरगिस फाखरी, लीज़ा हेडन] भी कम नहीं. एक कहती है, “पापा, मैं बच्चा नहीं कर रही.” आपको लग रहा होगा, लड़की प्रेगनेंसी के खिलाफ है? जी नहीं, उसका मतलब है, “आय एम नॉट किडिंग”. बिहार बोर्ड की टॉपर रूबी राय का विडियो खासा वायरल हुआ है आजकल. फिल्म की पृष्ठभूमि लन्दन न होकर बिहार होती तो ये तीनों बड़ी आसानी से खप जातीं. बहरहाल, तीनों के बॉयफ्रेंड्स भी हैं [अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन, रितेश देशमुख] जो लड़कियों से कम, उनकी दौलत से ज्यादा प्यार करते हैं. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि तीनों को अँधा, गूंगा और अपाहिज़ बनने का नाटक करना पड़ता है. और फिर जो एक बार नाटक शुरू होता है, वो नाटक कम आपके दिल-ओ-दिमाग के साथ खिलवाड़ ज्यादा लगता है.

विकलांगों के प्रति बॉलीवुड पहले भी इस तरह की असंवेदनशीलता दिखा चुका है. दीपक तिजोरी की ‘टॉम, डिक एंड हैरी’ और इंदर कुमार की ‘प्यारे मोहन’ भूलने लायक ही फिल्में थीं. पर ‘हाउसफुल 3’ में फ़रहाद-साजिद सारी हदें लांघ जाते हैं. सस्ते मज़ाक के लिए घिसे-पिटे जोक्स का पूरा बोरा उड़ेल दिया है दोनों ने. हर किरदार जैसे कॉमनसेंस की स्पेल्लिंग भूल कर उल-जलूल हरकतें करने में लगा रहता है. अक्षय का किरदार स्प्लिट पर्सनालिटी डिसऑर्डर का शिकार है. ‘इंडियन’ शब्द सुनते ही उसके भीतर से एक और किरदार बाहर आने लगता है, पहले वाले से ज्यादा खूंखार. देश का जैसा माहौल है, ये एकदम फिट बैठता है. ‘भारत माता’ ‘गाय’ या ‘लता मंगेशकर और सचिन’ सुनते ही अकसर देश के लोगों में इस तरह के बदलाव आजकल खूब देखे जा रहे हैं. रितेश का किरदार शब्दों के चयन में हमेशा मात खा जाता है. ‘विरोध’ की जगह ‘निरोध’, ‘वाइफ’ की जगह ‘तवायफ़’, ‘खिलाड़ी’ की जगह ‘कबाड़ी’; इसलिए कोई हैरत नहीं अगर उसकी ‘कॉमेडी’ आपको ‘ट्रेजेडी’ लगे तो. अभिषेक का किरदार ‘बच्चन-परिवार’ के इर्द-गिर्द ही घूमता है. कभी बड़े बच्चन साब के पुतले के साथ सेल्फी, तो कभी बहू बच्चन [ऐश्वर्या] के पुतले के साथ रोमान्स!

फिल्म में अगर कुछ भी झेल जाने लायक है, तो वो है अक्षय का सब पर हावी हो जाने का अंदाज़. स्क्रिप्ट से बढ़कर सीन में कुछ न कुछ करते रहने का दुस्साहस ही उन्हें इस तरह की फिल्मों में कामयाब बनाता है. और दूसरा, फिल्म का ‘फ़ेक इश्क़’ गाना जिसमें तीनों नायकों को पैसे के पीछे भागना खलने लगता है और सच्चे प्यार का इमोशन हलके-हलके छू रहा होता है. एक यही वक़्त है फिल्म में जब हँसी हलकी-फुलकी ही सही, साफ़-सुथरी, उजली-उजली दिखती है. अंत में, अगर जैकलीन के किरदार के अंदाज़ में कहूं तो, “फ़रहाद-साजिद, जल्दी कुएं में जाओ (गेट वेल सून)!” और आप के लिए, “ठंडी दवाई लो (टेक अ चिल पिल)!...नहीं तो सरदर्द की गोली तो लेनी ही पड़ेगी! [1/5]    

Friday, 9 October 2015

JAZBAA: Not all Greens are good! [2/5]

The reason behind a remake can be disciplined into more than one intention or culpable justification. Recreating the success story at the box-office now in your favor [HUM AAPKE HAIN KOUN…! tops the list] is one. Blessing the original with a new perspective to instate your radical creative expression [DEV D could be the most genre-defining example] is other. Meanwhile, some choose to be unapologetically lazy to create anything at their own. Calculatedly, Sanjay Gupta’s JAZBAA is a lethal combination belonging to each one of the above given grounds but unintentionally it proves to be one of those lame efforts that make the original look a classic while it wasn’t. JAZBAA is nothing but the return of a ‘stuck in his own world’ filmmaker who believes more in styling their actors than in making them dive into the characters they are playing on-screen, to a great deal of depth.

Looking at the vital components in the plot, Korean thriller ‘SEVEN DAYS’ was a perfect film destined to be remade by Sanjay Gupta at any given time. Tainted characters, twisted plot and the dark world of crime to deal with; Gupta has always a ‘green’ eye for such vulnerable subject. Criminal lawyer and a single-parent Anuradha Verma [Mrs Rai Bachchan] never minds taking false cases from evidently guilty clients as only they can afford her services and not the innocent ones. Though we rarely see her best foot being put forward in the court scenes, the tag of being an advocate with 100% success record is forced-feed to us very conveniently. One day, her daughter goes missing and now the abductor wants her to take the case of a rapist and murderer [Chandan Roy Sanyal] and bring him back alive from the death ropes. Anuradha has a ticking bomb in her hands that makes her run, jump and chase to save her daughter. Suspended corrupt cop Yohaan [Irrfan] is the only helping shadow by her side.

Sanjay Gupta with Robin Bhatt doesn’t feel any shame in lifting clues and cues from its original Korean film. While the original has managed to stick on the plot as a plain crime thriller, Gupta does make an effort to make it socially relevant film by raising the burning issue of rapes in India. He makes his characters speak about it. He ends the film with stats and facts about the issue. And this was the only addition apart from the veteran Kamlesh Pandey’s verbal punches but the way Sanjay Gupta deals with it; I think it declines more on the ‘exploitation’ side. Gupta gives you all shiny and well-styled characters that wear sunglasses even at the darkest places on earth, show off their ‘killer’ attitude through the cheesy one-liners that could easily get turned into a cheap ‘Whats App’ picture message and cry out so loud you would start feeling sorry more for your eardrums than her pain. Here, even the most insignificant characters treat you as the punching bag in their drawing room and keep throwing at you heavily philosophical lines about life, death and what not.

Aishwarya Rai Bachchan in her comeback shows magical sparks in her presence on screen like the way she always has in her. No matter how intense or depressing the scene is, you could never turn aside your eyes from appreciating her flawless beauty. You can count the same a negative in a performance based role like this. Irrfan plays it ultra-cool and takes away all the claps and whistles every time he talks something utter meaningless yet massy lines. Shabana Azmi is as melodramatic as she could be yet her being in the frame itself brings more credence, power and life altogether. Jackie Shroff, Atul Kulkarni, Abhimanyu Singh and Chandan Roy Sanyal are wasted.

In an interesting scene, Irrfan beats a guy when he asks for his right not to be arrested by a suspended cop. Irrfan makes it clear then and there that it is no Hollywood film but a Bollywood one where anything can happen. JAZBAA could have been a good thriller if the melodrama, styling, obsessively done color-correction and uninspiring background sound would have not shadowed the more significant aspect of the filmmaking i.e. honest storytelling. Wait till it premiers on TV and you might enjoy the latest addition in Bollywood’s ‘Khan-brigade’ with all the required swag; Irrfan! [2/5]             

Friday, 14 August 2015

BROTHERS: Use your Right to Stay Away! [1.5/5]

No offense is taken if you have opted for a plot full of hard clichés but treating it like one is a big bad crime. And Karan Malhotra is a serious offender of doing so in his official remake of WARRIOR- a punchful fighting action drama from Hollywood. In fact, he has been accused of the same in his first venture AGNEEPATH- another remake, this time of a Bollywood blockbuster. Thankfully, the 100 Cr indemnity at the box-office saved him from facing the heat. My prayers go straight to him for his latest sin. BROTHERS is as painful as the heavy and heartless punches in the ring could possibly hurt a regular man. It is so formulaic in its melodramatic emotions and in the laziest cinematic treatment that as an evolved movie-watcher, you would feel disgusted, snubbed and insulted for whatever intellect you could bring along. And the worst part is, you pay for it.

Catholics are the most ill-treated [in their standard portrayal] and idly-written characters in any typical Bollywood film. You don’t need to ask for their names or surnames as they are all the same. Any Fernandez or Braganza will do. Even David and Maria are a better connect. And then, put the holy-cross all around in as many ways you can. Tattoos look cool, on Catholics. They can be freely shown drinking their guts out. Isn’t it a must in their religion? Putting merely a ‘Man’ at the end of a sentence and replacing every other word with its English translation in a Hindi sentence will positively end all the doubts of them being a Fernandez or Braganza or a D’Souza. If you are being impatient to typecast the Catholics, you sure should rush to Karan Malhotra. He is the one-point source to anything and everything related to them. He is the next Mahesh Bhatt in this particular field of interest.

Now, let’s look at the plot. The alcoholic Senior Fernandez [Jackie Shroff] is released from the jail after serving a life term for accidently murdering his loving wife [Shefali Shah]. He is the man seeking redemption for his sin. So, the tears need to be constantly in supply whether it is the matter of ‘khushi’ or ‘gham’. By the way, fighting is the family game of the Fernandez. The elder Fernandez [Akshay Kumar] has left it long back for the sake of his family and is now leading a regular low life. The real Fernandez [Jacqueline] plays the better-half of the reel Fernandez. What a cheesy trivia! The younger and step-Fernandez [Another Malhotra, Siddharth] is angry, very angry. Enters Mr Braganza, the filthy Lalit Modi of MMA [Mixed Martial Art] league! The hunt for the champion of the league will also witness the biggest clash in Indian fighting scene. It is blood against blood.

Gavin O’Connor’s WARRIOR was a perfect film for Karan Malhotra to remake. One could smell from miles as how he is going to adopt it. The melodrama is on its highest. People cry, shout and walk like zombies-on the-loose to release and reveal their stressed present and stormed past. The writing is all impudent, brazen and audacious, especially in the second half where running commentary of the event covers the most of the part. Songs are relatively more comforting and that doesn’t include one of the most the nonsensical and nasty item songs featuring Kareena Kapoor Khan. My takeaway from these dance numbers is the fact that no matter how titillating they are in nature, the people around in the song don’t bother to ‘bother’ the lady in the middle. How gentle, polite and tender Indian Men in front of camera can be!

At the end, I know it is not the end. Many have taken an oath to keep the histrionics of old-bollywood clichés alive till they are in business. Karan Malhotra is just one of them. The other Karan [Johar] I am sure will get busy in finalizing the deal of another remake for him, soon after confirming BROTHERS’ weekend collection at the box-office. Brothers in crime! If you don’t want to fight with your conscience, use your right to stay away! [1.5]                                                     

Saturday, 24 May 2014

HEROPANTI: Save the saving grace ‘Tiger’ for his next! [2/5]

In the dead core of age-old insipid recipe for a perfect Bollywood love-story, if anything in Sabbir Khan’s ‘HEROPANTI’ really looks garden-fresh besides the lead pair, is one comically emotional scene that makes a highlight; sadly much later in the film.

When Prakash Raj, playing a dominating father of the bride [Not for once but twice] and a heartless ‘Jaat’ crime-lord bound by his own caste-procedurals finds out that his second daughter is also planning to elope with someone on her wedding-day alike his elder daughter, he decides to accompany the possible guy for the rest of wedding to ensure things happen his own way. With a father trying his best to be not ashamed again in the eyes of his own men, this scene alone dares to take the plot in a region hadn’t been visited before. Sad part is, it comes at a point when you had lost all your hopes to see anything good in the movie.

The launching vehicle of Jackie Shroff’s cute, adorable and much flexible son Tiger, ‘HEROPANTI’ is nowhere close to be fresh, new and novel in terms of content. You can foresee the events far from a mile. Girl elopes on the D-day. Father with his goons takes boy’s friends in custody to know whereabouts of the couple. One of the friends falls for the second daughter…and the rest is, showcasing lots & lots of muscle-power, abruptly put love songs and a pinch of the great Indian emotional drama, a shameless rip-off from century’s most lovable DDLJ.

Film rides high with Tiger’s stretchy elastic body-show in action sequences and dance numbers but when it comes to move the muscles responsible for expressing emotions; he definitely looks clueless for most parts. His never-ending effort to be ever-smiling on screen often lands him in fumbled dialogue delivery and bad lip-syncing to songs. From verbal sexist comments to acts of physical torture, there is constant offence against women shown on regular interval. And it hurts. Badly. If that’s not all, you’ll also find everyone just keep taking names incorrectly. ‘Rakesh’ becomes ‘Rajesh’ for more than a couple of times, but who wants to get into these small flaws when you have bigger issues to notice.

With dashing looks and chiselled physique, Tiger charms and shows off an impressive screen presence but has a lot bigger room for improvisation in acting department. I wish his next to have more than just backflips, splits, summersaults…and I am talking about acting here. Kriti Sanon, surprisingly makes a much confident debut despite having a tinier room to roam around. Prakash Raj plays an over-dramatic father of the bride, as if smitten by the Karan Johar bug.

At the end, the film of such monotonous graph gets benefited by the sparkling presence of Tiger Shroff but Tiger sure deserved better ignition to take a flying start. Why on earth does every star-kid need a love-story as his first outing, that too of the same congested box of dying rules? With 2 hour 26 min of duration, it is best to realise that you have more active cells in the brain than the writer and maker of the film do. Listening to its chartbusters on your favourite FM radio station could lure you to rush to the nearest multiplex. Beware! Save the saving grace ‘Tiger’ for his next! [2/5]

Friday, 20 December 2013

DHOOM 3: The Great Indian Bollywood Circus! Formulaic but Spectacular & Extremely Watchable [3/5]

It’s not very hard to predict what’s in store for you, if you have booked your tickets to take a roller-coaster ride in the latest & the third installment of Bollywood’s first of a kind film-franchisee DHOOM: 3. High octane action, vrooming bikes, eye-catching locales, brilliantly choreographed song & dance sequences, fantastic production design & twists in the tale that you can only see it coming just a few moments before it actually comes. So, what are the additional elements that make YashRaj Film’s DHOOM 3 an extremely watchable action thriller, better and bigger than the previous two installments?

Written & directed by Vijay Krishna Acharya, DHOOM: 3 is the most spectacular presentation of all in the series, one would never question that, but it’s the writing and the performances [I desperately wanted it to make singular but then you’ll agree to it after watching it] that take it to another level.

Set in Chicago, story takes you back in 90’s when the owner of ‘the great Indian circus’ [Jackie Shroff in a delightful cameo] kills himself after losing his battle to save the property from financial crisis. Years later, his only son Sahir [Aamir Khan standing tall as a towering inferno] decides to bring the Bank responsible for his father’s death down all in the dust by constantly robbing all its branches. With no valid logic behind, ACP Jai Dixit [Abhishek Bachchan in his one-expression mode] & his ‘still irritating’ associate Ali Akbar from Nagpada [who else?? The ‘Uday Chopra’] are called in to help the Chicago Police Department. Rest is the thrilling cat-and-mouse chase sequences with good amount of bike-stunts, an unpredictable pinch of emotions and a satisfying surprise in the box that I wish I could tell you more about.

Though the story seems & is very filmy, formulaic and borrowed straight from some late 70’s vengeance potboilers, the surprise in the box alone keeps you thoroughly engaged and entertained. Till the time it reaches you from various sources, I don’t want to be the spoiler. All I can say is it brings lots of emotions on the board and in a very well executed manner. Keep guessing!

Of the cast, let’s talk about Katrina first. She’s sexy, sensuous & stunning as all the Dhoom girls in the past. Though the writing doesn’t provide her a good meaty role, watch her introduction scene in the ‘Kamli’ song and as briefed by the character of Aamir in the film, you are bound to not take off your eyes from her for once. What an electrifying appearance!

Same goes with Aamir. The certain amount of charisma and the sincerity in the performance that he brings with himself is totally infectious. He sets screen on fire in the magical & the magnificent ‘Malang’ song. Look at the kind of effort he makes to meet the expectations par level to the new generation in industry. Commendable job! This is the most commercial performance of his after GHAJINI.

In a whole 3 hours of duration, it is not plausible that you do not get carried away with some really putting off sequences like the typical ‘Uday Chopra’ comical scenes, disregard of a good mix of logic in the screenplay and a hurriedly conceptualized love-angle between Katrina & Aamir! But the grand canvas, great production quality, good performance and the surprise element compensate for the most of it. If you love ‘no logic’ formula Bollywood, you will love it more! [3/5]