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Friday, 7 July 2017

मॉम: साधारण फिल्म में 'असाधारण' श्रीदेवी! [3/5]

रात के गहरे सन्नाटे में एक दैत्याकार काली गाड़ी दिल्ली की सुनसान सड़कों पर चली जा रही है. कैमरा किसी बाज़ या चील के पैरों में कस कर बाँध दिया गया हो जैसे. गाड़ी के ठीक ऊपर, उसी की रफ़्तार में उड़ा जा रहा है. एक तिराहे पर गाड़ी रूकती है, कैमरा भी ठहर गया है. ड्राइविंग सीट से एक आदमी उतर कर पीछे की तरफ चला जाता है. उसकी जगह अब दूसरे ने ले ली है. गाड़ी वापस उसी रफ़्तार, उसी मुर्दई के साथ चल पड़ी है. कैमरा भी. बैकग्राउंड साउंड सुनकर आपका दिल बैठा जा रहा है. आप अच्छी तरह जानते हैं, क्या होने वाला है? क्या हो रहा है? क्या होता आया है? अखबारों में पढ़ते आये हैं, 'चलती गाड़ी में गैंगरेप'. टीवी पर समाचारों में सुनते आये हैं, 'फिर शर्मसार हुई इंसानियत'; वही रटी-रटाई लाइनें, वही थकी-थकाई नाउम्मीदी में लिपटी प्रतिक्रियाएं, 'कोई सेफ नहीं आजकल'. बस्स. लेकिन जिस माकूल अंदाज़ से परदे पर रवि उद्यावर यह पूरा मंजर पेश करते हैं, डर भी लगता है और रोंगटे भी खड़े हो जाते हैं. 

तकलीफ़ की बात ये है कि रवि की ये कामयाबी सिर्फ और सिर्फ उनके 'सिनेमाई कौशल' के हक में गिरती है, और इंटरवल के पहले तक ही प्रभावित कर पाती है, बाकी का सारा आधा हिस्सा किसी बहुत ही औसत 'एक्शन फिल्म' की तरह शुरू होता है और ख़तम हो जाता है. शुक्र है कि इन दोनों, एक-दूसरे से इतने अलग हिस्सों में कोई तो है, जो अपनी खाल एक पल के लिए भी नहीं उतारता. 'मॉम' श्रीदेवी की 300वीं फिल्म है, और उन्हें परदे पर अदाकारी करते देख लगता है कि जैसे उनके लिए 'कट' की आवाज़ का कोई मतलब ही नहीं. एक बार जो किरदार में उतरीं, तो उसे किनारे तक छोड़ आने से पहले कोई 'कट' नहीं. फिल्म में ऐसे दसियों दृश्य हैं, जिनमें श्री जी को देखते-देखते आप किरदार याद रखते हैं, अदाकारी याद रखते हैं, फिल्म भूल जाते हैं. 

देवकी (श्रीदेवी) आर्या (सजल अली) के लिए 'मॉम' नहीं, बस 'मैम' हैं. घर में भी. अपनी पहली माँ को भूली नहीं है अभी वो. 'उसको समझाने की नहीं, समझने की जरूरत है'. देवकी कोशिश कर रही है. आम माओं की तरह अपनी फ़िक्र चीख-चिला कर नहीं बताती, पर देर रात पार्टी के लिए जा रही आर्या को फ़ोन चार्ज रखने के लिए बोलना नहीं भूलती. आर्या घर नहीं लौटी है. सुबह किसी ने उसे सड़क किनारे, नाले में अधमरी हालत में पाया और अब वो हॉस्पिटल में है. कुछ लोगों ने बलात्कार के बाद उसे गला दबाकर मारने की कोशिश की थी. शिनाख्त के बावजूद, 'पर्याप्त' सबूतों के अभाव में सारे अभियुक्त (उनमें से एक मोहित, आर्या की क्लास का स्टूडेंट था) छूट जाते हैं, पर माँ के लिए अभी केस ख़तम नहीं हुआ है. 

रवि उद्यावर अपनी पहली ही फिल्म में बड़े स्टाइलिश तरीके से एक 'इमोशनल थ्रिलर' के सारे हथकंडे आजमा लेते हैं. फिल्म के पहले हिस्से में उनकी समझदारी, उनके सिनेमा से पूरी तरह 'हैण्ड इन हैण्ड' चलती है, चाहे वो स्कूल में मोहित से देवकी का सामना हो, देवकी का आईसीयू में आर्या के सामने फूट-फूट कर रोना हो या फिर लोकल डिटेक्टिव डीके (नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी) के साथ इंटरवल का वो रोमांचक पल, जहाँ देवकी कहती है, "भगवान् हर जगह नहीं होते, डीके जी" और डीके जवाब देता है, "...इसलिये तो उसने माँ बनाई है". यहाँ तक की पूरी फिल्म जितनी ईमानदारी से थ्रिलर होने का फ़र्ज़ निभाती है, यहाँ के बाद उतनी ही बेशर्मी से कोई आम 'बदले की फिल्म' बन के रह जाती है. नवाज़ुद्दीन का किरदार बेवजह और बेवक्त का हंसी-मज़ाक पेश करने में उलझा दिया जाता है, जबकि इस तरह की फिल्म से उस तरह के हास्य की उम्मीद कोई करता भी नहीं. 'मैं भी अपनी माँ जैसा सिंगर बनना चाहता था' 'आपकी माँ गाती थीं?' 'नहीं, वो भी बनना चाहती थीं'. सच्ची? क्यूँ? 

अभिनय में; सजल अली बलात्कार-पीड़िता आर्या की भूमिका किसी बहुत ही माहिर अदाकारा की तरह पेश आती हैं. श्री जी के बाद वही हैं, जो फिल्म में कहीं कमज़ोर नहीं पड़तीं. अदनान सिद्दीकी (देवकी के पति की भूमिका में) पूरे ठहराव के साथ श्री जी का पूरा साथ देते हैं. नवाज अपने अलग लुक और हंसोड़ अंदाज़ से थोड़े वास्तविकता से दूर जरूर लगते हैं, पर फिल्म आगे चल कर जिस तरह का रुख ले लेती है, मज़ेदार भी लगते हैं. अक्षय खन्ना सिर्फ अपने चिर-परिचित अंदाज़ और स्टाइलिश लुक को ही चमकाते नज़र आते हैं. 

आखिर में, 'मॉम' एक औसत फिल्म है, जिसे श्रीदेवी के रूप में एक ऐसी कलाकार तोहफे में मिल गयी, जिसका आकर्षण, जिसकी अभिनय-क्षमता और कैमरे के साथ जिसके रिश्तों पर उम्र का कोई असर नहीं दिखता. फिल्म औरतों पर होने वाले अत्याचारों की बात ज़रूर करती है, लेकिन बड़े परिदृश्य में 'पिंक' की तरह किसी बड़े मुहिम की तरफ बढ़ने का इशारा भी नहीं करती. 'मॉम' के लिए न सही, श्रीदेवी के लिए देखिये. [3/5]

Friday, 29 July 2016

ढिशूम: बेमतलब है, पर वाहियात नहीं! [2/5]

रोहित धवन की ‘ढिशूम’ बिलकुल अपने नाम की तरह ही है, बेमतलब. ढिशूम को सालों-साल पहले हिंदी फिल्मों में मार-धाड़ के दृश्यों में मुक्के और घूंसों की आवाज़ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, वो भी डबिंग के वक़्त मुंह से बोल कर. आज अगर उन दृश्यों को आप देखें तो शायद उस वक़्त की तकनीकी कमियों पर हंस भी पड़ें, पर उस जमाने के दर्शकों पर उसके प्रभाव को नज़रअंदाज़ करना आपके बस में नहीं. खैर, सिंक-साउंड और रीयलिस्टिक सिनेमा के दौर में धीरे-धीरे इस लफ्ज़-ऐ-इज़हार में वो प्रभाव, वो असर अब रहा नहीं. ऐसी ही कुछ तबियत, रंगत और सीरत ‘ढिशूम’ फिल्म की भी है. हाँ, एक बात तारीफ के काबिल ज़रूर है...’ढिशूम’ बेमतलब और बेअसर की होने के बावजूद आपको दूसरी वाहियात फिल्मों की तरह परेशान बिलकुल नहीं करती. सच्चाई तो ये है कि ये फिल्म अपने आपको भी कभी सीरियसली नहीं लेती. नतीजा ये होता है कि पूरी फिल्म आपकी आँखों के आगे से यूँ निकल जाती है और आप उस पर रियेक्ट करने की जेहमत ही नहीं उठाते!

मिडिल-ईस्ट में कहीं किसी जगह, भारत-पाकिस्तान के फाइनल क्रिकेट मैच से ठीक पहले भारतीय टीम के धुआंधार बल्लेबाज विराज शर्मा [साकिब सलीम] को किसी ने अगवा कर लिया है. भारत ने स्पेशल टास्क फ़ोर्स के अपने सबसे काबिल ऑफिसर कबीर [जॉन अब्राहम] को अगली ही फ्लाइट से वहाँ के लिये रवाना कर दिया है. कबीर की मदद के लिए वहां है जुनैद [वरुण धवन], अपनी छिछोरी, बेवकूफ़ाना और हंसोड़ हरकतों के साथ. गुस्सैल-अकड़ू कबीर और मजाकिया जुनैद की ये जोड़ी बॉलीवुड के लिए कोई नई नहीं है. दिमाग पर ज़ोर डालिए और इस तरह की ‘एक अनाड़ी-एक खिलाड़ी’ मर्द जोड़ियों के जो भी नाम आपको याद आयेंगे, यकीन मानिए कबीर और जुनैद उन सब से ही निकलते मिलेंगे, उन सब जैसे ही दिखते मिलेंगे.

जैकलीन फर्नान्डीज़ फिल्म में शौकिया चोर की भूमिका में हैं जिसकी अपनी एक दर्द भरी कहानी है, जो करन अंशुमन की ‘बैंगिस्तान’ में उनके किरदार की कहानी से इतनी मिलती-जुलती है मानो जैकलीन सीधा उसी फिल्म के सेट से इस फिल्म में आ गिरी हों. और इन सब के बीच अक्षय खन्ना का वापस फ़िल्मी परदे पर आना! मेहमान भूमिकाएं हों, खूबसूरत लोकेशंस हों या एक्शन, रोहित धवन एक मौका नहीं छोड़ते, आपका ताबड़तोड़ मनोरंजन करने की कोशिश में. एक के बाद एक वो अपने पत्ते कुछ इतनी जल्दी में फेंकते हैं कि आपको दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. गैर-मुल्कों में कैसे सभी लोग इतनी अच्छी हिंदी बोलते-समझते हैं? ये गलती तो बॉलीवुड में अब गलती मानी ही नहीं जाती, पर दुश्मन के अड्डे से बच के निकलना हो, किडनैपिंग के केस में एक लीड से दूसरी लीड तक पहुंचना हो या फिल्म के सबसे बड़े विलेन को पकड़ने में एक कुत्ते की भूमिका; फिल्म के लेखक भी कहानी लिखने में दिमाग का इस्तेमाल करने से बचते रहे हैं. बड़ी बात ये है कि इसके लिए भी उन्हें काफी मोटी रकम पेश हुई होगी.

अभिनय में किसी को भी अच्छा कहना थोड़ा विवादास्पद हो सकता है, और हास्यास्पद भी. जॉन अब्राहम के डोलों की साइज़ में भले ही इज़ाफा हुआ हो, उनकी एक्टिंग में धागे भर की भी तरक्की नहीं दिखती. जैकलीन में जितनी चाभी भरिये, उतनी ही देर तक चलती हैं. हाँ, वरुण आपको अपने भोले-भाले-साफ़ दिल चेहरे से अच्छा-खासा बहलाए रखते हैं. अक्षय खन्ना अभी पूरी तरह वापस नहीं आये हैं, एक-दो फिल्में और लगेंगी. विराट कोहली के इर्द-गिर्द बुने गए किरदार में साकिब सलीम और सुषमा स्वराज जैसी दिखने-लगने-बोलने वाली केन्द्रीय मंत्री की भूमिका में मोना अम्बेगांवकर फिल्म की सबसे मज़बूत कास्टिंग हैं. अक्षय कुमार, सतीश कौशिक और नरगिस फाखरी अपनी-अपनी मेहमान भूमिकाओं में ठीक-ठाक हैं.

आखिर में, रोहित धवन की ‘ढिशूम’ उन पलों में ज्यादा कारगर साबित होती है, जहां रोहित अपने पिता डेविड धवन मार्का एंटरटेनमेंट की झलकियाँ पेश करते हैं. सतीश कौशिक, विजयराज और वरुण के किरदार डेविड धवन की ‘हार्मलेस’ कॉमेडी फिल्मों के आड़े-टेढ़े किरदारों की ही याद दिलाते हैं. अफसोस, ऐसे मजाकिया पल फिल्म में बस गिनती के ही हैं और ज्यादातर वक़्त फिल्म सिर्फ अपना ही मज़ाक बनाने में गुमसुम रहती है. देखिये, अगर आप उन चंद ख़ास ‘गिफ्टेड’ लोगों में से हैं जो अपना दिमाग हर जगह लेकर नहीं जाते! [2/5]