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Friday, 28 December 2018

सिम्बा: साल की सबसे वाहियात फिल्म! [0.5/5]


बहन का बलात्कार, माँ की इज्ज़त, बाप के दामन पर लगा बेईमानी और बदनामी का दाग; अस्सी और नब्बे के दशक में हिंदी सिनेमा के नायकों की एक पूरी खेप इस फ़ॉर्मूले की छत्र-छाया में पलती-बढ़ती आई है. ‘त्रिशूल और ‘दीवार के बच्चन जहाँ सिनेमा की मुख्यधारा में ‘गंगा जमुना सरस्वती तक, समीक्षकों से लेकर समर्थकों तक, सबके चहेते बने रहे, बाद के सालों में ‘आदमी और ‘फूल और अंगार’ जैसी फिल्मों के साथ मिथुन ने भी आम जनता में अपनी पैठ काफ़ी मज़बूत की. एक वक़्त तो ऐसा भी गुजरा है कि मिथुन की फिल्मों में बहन का होना ही फिल्म में कम से कम एक बलात्कार के सीन होने की गारंटी समझा जाने लगा था. खैर, कई सालों से रह रह कर ग़लतफ़हमी सी होने लगी थी कि हिंदी सिनेमा अपने उस बजबजाते हुए गंदे-बदबूदार दौर से बाहर निकल आया है, और अब उस तरफ लौटकर दोबारा देखने की हिमाकत भी शायद ही करेगा!

सर पीट लीजिये, क्यूंकि रोहित शेट्टी ने बड़ी बेहयाई से ये कारनामा कर दिखाया है. फ़ॉर्मूला फिल्मों के शहंशाह और नए दौर के ‘मनमोहन देसाई बनने की शेखी में शेट्टी 2018 में, जहां महिला-सशक्तिकरण के प्रचार-प्रसार के लिए सब ऐंड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं, बलात्कार जैसे गंभीर मुद्दे को न सिर्फ अपनी फिल्म के टुटपूंजिया नायक को ‘अच्छा साबित करने की कोशिश में खर्च कर देते हैं, बल्कि अपनी कमअक्ली और असंवेदनशील समझ के जरिये (बॉक्स-ऑफिस पर) धन-उगाही के लिए भी ख़ूब निचोड़ते हैं. हालाँकि शेट्टी से उम्मीदें किसी की भी कुछ ज्यादा यूं भी नहीं होती हैं, फिर भी अपने बेवजह के एक्शन और बेवकूफाना स्टंट्स के मायाजाल को छोड़ कर जिस बेशर्मी से वो बलात्कार पर समाज को नैतिक शिक्षा का सबक सिखाने निकल पड़ते हैं, ‘सूप और छलनी’ वाली कहावत याद आ जाती है. पिछली फिल्मों का संज्ञान न भी लें, तो रोहित शेट्टी अपनी इस फिल्म में भी महिलाओं के प्रति शर्मनाक रवैया ज़ाहिर करने से बाज़ नहीं आते, वरना बलात्कार की पीड़िता की हत्या का शोक मनाने बैठे लोगों के बीच नायक से ‘चार दृश्यों और इतने गानों की मेहमान’ नायिका को ‘एक अच्छी सी चाय पिला दो का आदेश दिलवाने का क्या तुक बैठता है? सिर्फ एक, या तो फिल्म के लेखक और निर्देशक हैं ही इतने कमअक्ल या फिर उनका फिल्म में इस्तेमाल ‘फेमिनिस्ट एप्रोच सिर्फ एक ढोंग है और कुछ नहीं?

संग्राम भालेराव (रणवीर सिंह) एक महा-भ्रष्ट पुलिसवाला है, जो पैसे के लिए ही इस महकमे में शामिल हुआ है. अपराधियों (सोनू सूद) के लिए ज़मीन खाली करवाने से लेकर उनके ड्रग्स के कारोबार में आँखें मूँद कर मदद करने तक, भालेराव पैसे के लिए किसी भी हद तक गिर सकता है. उसके सर पे बिजली तभी गिरती है, जब उसकी मुंहबोली बहन का बलात्कार उसके ही आकाओं द्वारा अंजाम दिया जाता है. रिश्वत को सही ठहराने की दलील में ‘कोई रेप थोड़े ही न किया है का दंभ भरने वाला अचानक ही अपने आसपास की औरतों से बलात्कारियों की संभावित सज़ा पर राय लेने उठ खड़ा होता है. साथ ही, गुंडों को ताबड़तोड़ पीटते हुए ‘वो मेरी बहन थी, वो मेरी बहन थी का मन्त्र भी जपने लगता है. अदालत में पैरवी करते वक़्त भी बलात्कार के भयावह आंकड़ों को पेश करते हुए उसकी मुट्ठियाँ तन जाती हैं, और आप बस यही सोचते रहते हैं कि अगर वो लड़की इस घटिया पुलिस वाले की बहन न होती तो इन आंकड़ों का आज कहाँ अचार बन रहा होता?

हिंदी सिनेमा का एक वर्ग है, जो अपनी सोच का दायरा जाने-अनजाने बढ़ाने से कतराता है. ‘सिम्बा में गिनती के एक या दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पूरी फिल्म में कुछ भी ऐसा नहीं है जो आपने बीस-तीस साल पहले ही हिंदी फिल्मों में न देख लिया हो. ‘घटना के वक़्त तो मुलजिम शहर में ही नहीं था’ जैसी दलीलें सुनकर जब भालेराव अदालत में चौंकता है, तो मन करता है कि एक थप्पड़ लगाऊं और पूछूं कि फिर किस बात का बॉलीवुड फैन है, रे, तू?? ऊपर से संवाद भी इतने घिसे-पिटे कि आप खुद ब खुद किरदारों के साथ दोहराते जाएँ. ये वो फिल्म है, जहां लड़की गुंडों के अड्डे पर पहुँच जाती है, और पकड़े जाने पर ‘मैं अभी जाकर पुलिस को सब बता दूँगी अक्षरशः दोहरा देती है. ये वही वाली फिल्म है, जहां बलात्कारियों के इकबालिया बयान के लिए उन्हें बार-बार ‘नामर्द और ‘नपुंसक बोल बोल उकसाया जाता है. और यही वो वाली फिल्म भी है, जहां खलनायक अपने माँ, बीवी, बच्चों के सामने अपने धंधे की बात करने से झिझकता है. तो, अपनी अपनी याददाश्त के हिसाब से फिल्म का नाम चुनिए, और बैठ जाईये मेल कराने.

‘सिम्बा में, पुलिसवालों की बीवियां, बेटियाँ, बहुएं दोपहर के खाने के वक़्त अक्सर टिफिन लेकर थाने में हाज़िर हो जाती हैं, और फिर जिस तरह का हंसी-ठट्ठे से भरपूर घरेलू माहौल जमता है, लगता है जैसे आप अचानक रोहित शेट्टी की फिल्म से निकल कर सूरज बड़जात्या की फिल्मों में दाखिल हो गये हैं. इस एक ग़लतफहमी का सुख उन सब दुखों पर भारी पड़ता है, जहां फिल्म बलात्कार पर प्रवचनों की झड़ी लगा देती है. कभी जज साहिबा के मुंह से, तो कभी अपने महिला सह-कलाकारों के जरिये! अभिनय में, रणवीर की जिस ऊर्जा का अक्सर सब जिक्र करते हैं, भरपूर मात्रा में है. इस आदमी को एक बंद कमरे में रख कर गुपचुप भी शूट कर लो, तो कुछ न कुछ मनोरंजक निकल ही आएगा, लेकिन क्या ये वो फिल्म है जिसमें हमें रणवीर की उस ऊर्जा का जश्न मनाना चाहिए? बिलकुल नहीं.       

आखिर में; एक आजमाया पैमाना बताता हूँ. जिस फिल्म में अश्विनी कल्सेकर की अदाकारी आपको हताश करे, उससे किसी भी तरह का कोई उम्मीद मत रखिये. ‘सिम्बा अपनी मौलिक तेलुगु फिल्म ‘टेम्पर का बहुत कुछ अपनाते हुए भी आखिर का नाटकीयता भरा अंत छोड़ कर अपनी ही एक बेहद साधारण अंत का चुनाव करती है, जिसमें अजय देवगन जैसे स्टार की भूमिका पर ज्यादा दांव खेला गया है. इसे आप रोहित शेट्टी की ‘हिट खोजने की तरफ एक और समझदारी के नजरिये से भी देख सकते हैं. इतना महिमामंडन बहुत है, आज के ज़माने का ‘मनमोहन देसाई’ कह कर मनोरंजन के फ़ॉर्मूले का मखौल मत उड़ाइये! साल की सबसे वाहियात फिल्म!! [0.5/5]   

Thursday, 29 November 2018

2.0: ढाई घंटे का ‘विज़ुअल ग्राफ़िक्स पॉर्न’! [2/5]


इंडियन फिल्म इंडस्ट्री में ‘विज़नरी’ होने का सिर्फ एक ही मतलब है, आप कहानी कहते वक़्त दृश्यों को कितना बड़ा और कितना ‘महानाटकीय बना पाते हैं. टेक्नोलॉजी की मदद से एक ऐसी अजीब-ओ-गरीब दुनिया रच डालिए, जहां बड़े-बड़े सेट्स हों, कंप्यूटर जी की कृपा से सैकड़ों की भीड़ को लाखों में बदल दिया जाता हो, थका देने वाले एक्शन सीक्वेंस की भरमार हो, चाहे उनकी बनावट क्यूँ न एक जैसी ही हर बार हो, पर इन सबके साथ कहानी के मूल में मनोरंजन पेश करने की जो परिकल्पना हो, वो वही पुराने ढर्रे का बासीपन लिए हो. उसमें किसी भी तरह का बदलाव या उससे किसी भी किस्म का छेड़छाड़ बरदाश्त नहीं. शानदार विज़ुअल ग्राफ़िक्स के शो-रील जैसी शंकर की नयी साइंस-फिक्शन फ़िल्म ‘2.0 सिनेमा में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल के लिए परदे, कैमरे और अपने अपने ग्राफ़िक मशीनों के पीछे बैठे सैकड़ों लोगों की मेहनत ज़ाया करने के अलावा और किसी काम नहीं आती. भारत की सबसे महंगी फिल्म होने के तमगे के नीचे ‘अच्छी फिल्म’ होने की शर्त कहीं दब न जाए, फिल्म से जुड़े तकरीबन सभी लोग ये बात बड़ी सहूलियत से नज़रंदाज़ कर देते हैं.

चेन्नई इक नयी मुसीबत से जूझ रहा है. शहर के सभी लोगों के हाथों से मोबाइल फ़ोन उड़-उड़ कर गायब हो रहे हैं. जल्द ही, टेलिकॉम इंडस्ट्री से जुड़े लोगों की रहस्यमयी परिस्थितियों में मौत भी हो रही है. डॉ. वशीकरण (सुपरस्टार रजनी) के पास अपने सुपर-रोबोट चिट्टी को वापस लाने के अलावा और कोई चारा नहीं है. हालाँकि उनके पास एक और सुपर-रोबोट है नीला (एमी जैक्सन), पर वो घरेलू इस्तेमाल के लिए है. ज्यादातर वक़्त टीवी सीरियल्स और फ़िल्में देखती रहती है. फिल्म में हीरोइन होने से ज्यादा कुछ करना, उसके प्रोग्राम में ही नहीं है. बेचारी. वैसे भी रजनीकान्त की फिल्म में जहां चार—चार रजनी (डॉ. वशीकरण, चिट्टी, चिट्टी 2.0, चिट्टी माइक्रो बॉट्स) हों, एमी हो न हो, क्या ही फर्क पड़ता है? बहरहाल, पता चलता है कि इस नयी मुसीबत के पीछे पर्यावरणविद् पक्षीराजन (अक्षय कुमार) का हाथ है, जो मोबाइल रेडिएशन की वजह से पक्षियों पर होने वाले खतरनाक असर से दुखी भी हैं, और मनुष्य प्रजाति से खासे नाराज़ भी.

एक वक़्त था, फिल्म-निर्देशक शंकर अपनी कहानियों और किरदारों के होने की वजहों में महा-मनोरंजन खोजने की कोशिश करते थे. ‘इंडियन हो या ‘नायक, किरदारों का संघर्ष समाज के बड़े तबकों के हित के लिए होते हुए भी बेहद ज़मीनी था, और नाटकीय भी सिर्फ इतना कि अनदेखा होते हुए भी असल जिंदगी में ‘हो सकने’ की सम्भावना के थोड़ा करीब. ‘2.0 विज़ुअल इफेक्ट्स की दुनिया में मौजूद संभावनाओं को निचोड़ लेने की सनक से ज्यादा और कुछ नहीं है. कहानी में कल्पना के परे जाने पर कंप्यूटर ग्राफ़िक्स के मदद की जरूरत अक्सर सभी छोटे-बड़ों को पड़ती ही रहती है, ‘2.0’ को कंप्यूटर ग्राफ़िक्स में कुछ बड़ा कर गुजरने की चाह में, कुछ अनूठा गढ़ने की ललक में कहानी की जरूरत पड़ती है. वो भी, एक ही तरह की टेक्नोलॉजी, बार-बार. ‘रोबोट इस मामले में थोड़ी बेहतर थी. नयेपन की कसार रह रह की पूरे कर देती है. मैग्नेटिक फील्ड पैदा करके चिट्टी का गुंडों से उनके लोहे के हथियार छीन लेना और फिर उन्हीं के साथ थोड़े-बहुत बदलाव के साथ, माँ दुर्गा या काली जैसा एक ‘देवरूप ले लेना, पूरी भी नया भी था और भारतीयता का ख़ूब सारा पुट लिए हुए भी. ‘2.0 वैसा एक भी चित्र दिमाग में छोड़ जाने में असफल रह जाता है. लाखों मोबाइल्स मिला के एक दैत्याकार पक्षी का रूप धरने वाला प्रयोग बार-बार दोहराया जाता है. चिट्टी के सैकड़ों मॉडल्स का अलग-अलग रूप में जुड़ना-टूटना-बनना भी पिछली फिल्मों से एकदम नया नहीं है.

फिल्म रजनीकान्त के ऊँचे कद और उनके चाहने वालों को ख़याल में रख कर ही अपना हर कदम आगे बढ़ाती है. हालाँकि अभिनय के नाम पर उनसे कुछ भी लाज़वाब कर गुजरने की उम्मीद तो किसी को भी नहीं होगी, ख़ास कर ऐसी फिल्म में जहां सब कुछ कंप्यूटर पर रचा-रचाया हो, फिर भी रजनीकांत परदे पर अपने होने से अलग कुछ ख़ास करते नज़र नहीं आते. अक्षय कुमार के साथ थोड़ी नरमी बरती जा सकती है, क्योंकि उनके अभिनय का बहुत कुछ हिस्सा उनके भारी-भरकम गेट-अप के पीछे छुप जाता है. इतने के बावजूद भी, वो गिनती के दो-चार दृश्यों में अपने किरदार के सनकपन से सिहरन पैदा कर जाते हैं. हालाँकि दुखद है कि उनके किरदार का मकसद नेक होते हुए भी, शंकर उन्हें एक खलनायक से ज्यादा ऊपर उठने की छूट नहीं देते. ना ही, दर्शकों को उनके किरदार के साथ हमदर्दी या सहानुभूति रखने का मौका.  

आखिर में; ‘2.0’ ढाई घंटे का एक ‘विज़ुअल ग्राफ़िक्स पॉर्न’ है, जिसे आप चाह कर भी ज्यादा देर तक सराह नहीं पायेंगे. हाँ, बहुत मुमकिन है कि कुछ महीने में फिल्म के ख़ास एक्शन दृश्यों की ‘क्लिपिंग्स’ आपके फ़ोन के ‘व्हाट्स एप्प’ इनबॉक्स में धड़ाधड़ आनी शुरू हो जाएँ, और अगर ऐसा हुआ तो सोचिये, कितनी बड़ी ठिठोली होगी इस फिल्म के साथ, जो खुद मोबाइल्स के बढ़ते इस्तेमाल के खिलाफ जंग छेड़े बैठी हो. वक़्त आ गया है कि अब इंडियन फिल्म इंडस्ट्री बायोपिक के बाद साइंस-फिक्शन पर हाथ आजमाना बंद ही कर दे. ‘2.0 में फिक्शन तो बहुत है, लेकिन साइंस उतनी ही नदारद, जितनी त्रिपुरा के युवा मुख्यमंत्री बिप्लब देब के बयानों से. [2/5]               

Wednesday, 15 August 2018

गोल्ड: नक्कालों से सावधान! [2/5]

स्पोर्ट्स फिल्म बनाने में मेहनत लगती है. मैच असली लगने चाहियें. खिलाड़ियों का जोश, मैदान में उनकी रफ़्तार, उनका तालमेल स्क्रीन पर सब कुछ असल की शक्ल में दिखाई देना चाहिए. उम्दा, लायक और भरोसेमंद सिनेमाई तकनीक यहाँ पर बहुत अहम् रोल अदा करती है. जबकि बायोपिक बनाने में वक़्त और मेहनत दोनों लगती है. रिसर्च यहाँ तकनीक पर हावी हो जाती है. घटनाओं और किरदारों की सच्चाई जब दांव पर हो, तो फिल्मकार के तौर पर आपकी समझ भी कठघरे में पूरे वक़्त एक पाँव पर खड़ी रहती है. हालाँकि इस कठिन हाल से साफ़-साफ़ बच कर निकलने का एक बेहद आजमाया हुआ नुस्खा भी मौजूद है बॉलीवुड में. नायक को देशभक्ति की घुट्टी पिलाकर और दर्शकों को सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान सुनाकर बड़ी आसानी से पतली गली पकड़ी जा सकती है. आपसे किसी तरह का और कोई सवाल किया ही नहीं जाएगा. रीमा कागती की गोल्ड यही करती है. एकदम यही. साधारण स्क्रिप्ट, जबरदस्ती का नायक, बनावटी ड्रामे, कहानी में उधार के उतार-चढ़ाव और घटिया दर्जे के कंप्यूटर ग्राफ़िक्स; और इन सब पर देशभक्ति का चमकीला पर्दा डालने के लिए इतिहास की एक (असल की रोमांचक) घटना और उनके इर्द-गिर्द ढेर सारे बनावटी चोचले.

दौर आज़ादी से ठीक पहले का है. बच्चे क्रिकेट नहीं खेलते, हॉकी के दीवाने हैं. देश की टीम ओलंपिक्स में 3 गोल्ड जीत चुकी है, पर सारे के सारे ब्रिटिश इंडिया के खाते में दर्ज हैं. भारत के पास मौका है ओलंपिक्स में तिरंगा लहराने का. कुछ सालों में आजादी भी मिलने वाली है, और ओलंपिक्स भी 12 साल बाद फिर से होने वाले हैं. तपन दास (अक्षय कुमार) घोर बंगाली है. बर्लिन ओलंपिक्स में सपना देखा था, अगले ओलंपिक्स में तिरंगा लहराने का. अब दो बार से ओलंपिक्स कैंसिल हो रहे हैं, तो शराब की लत पाल ली है. आने वाले ओलंपिक्स के लिए खिलाड़ियों को चुनने की जिम्मेदारी मिल भी गयी है, तो उसे कहाँ पता था कि भारत-पकिस्तान के बंटवारे में टीम का भी बंटवारा हो जाएगा. लिहाज़ा, शराब में फिर डूब जाने का मौका भी है, दस्तूर भी. जैसे तैसे नए सदस्यों के साथ टीम फिर से खड़ी होती भी है, तो जश्न के माहौल में पीने की सूरत फिर से बन जाती है. टीम अब अपने इस देवदास के बिना ही लन्दन ओलंपिक्स जा रही है. एक ऐसी टीम जिसमें कोई कोच नहीं है, 70 मिनट, सिर्फ 70 मिनट हैं तुम्हारे पास का ओजस्वी भाषण देने के लिए. तपन दास की शकल में सिर्फ एक मैनेजर ही था, जो अंग्रेजों से 200 साल का बदला लेने के लिए तत्पर है.

स्पोर्ट्स, देशभक्ति और बायोपिक की इस मिलीजुली सिनेमाई साजिश में 3 ख़ास खामियां हैं, जो गिनती की कुछ अच्छाइयों के मुकाबले बेहद भारी-भरकम हैं. गोल्ड स्क्रिप्ट के स्तर पर एक बेहद साधारण फिल्म है, जो अपना ज्यादातर हिस्सा शिमित अमीन की (अब तक की) बेहतरीन फिल्म चक दे! इंडिया से काफी हद तक उधार लेती है. कबीर खान (शाहरुख़ खान) की ही तरह यहाँ भी तपन दास एकलौता पूरी की पूरी टीम चुनता है, खड़ा करता है. यहाँ तक कि टीम में एक-दूसरे से जलने और होड़ रखने वाले खिलाड़ियों का ट्रैक भी कुछ इतना मिलता जुलता है, मानो दोनों एक-दूसरे का ज़ेरॉक्स हों. सेंटर फॉरवर्ड की पोजीशन पर खेलने की जिद पाले बैठे दो खिलाड़ी और उन्हीं के कन्धों और फैसलों पर टिका वो आखिरी मैच का निर्णायक गोल. गोल्ड बड़ी बेशर्मी से दंगल के उस कम दमदार, पर असरदार ड्रामे की भी नक़ल कर लेती है, जहाँ मैच में उस एक नायक का होना बेहद जरूरी है, पर एक साज़िश के तहत उसे स्टेडियम तक पहुँचने से रोक लिया जाता है.

दूसरी कमज़ोर कड़ी है, फिल्म का तकनीकी पहलू. खराब कंप्यूटर ग्राफ़िक्स के अलावा, गोल्ड में न तो मैच को रोमांचक बनाने वाले दांव-पेंच ही मौजूद हैं, ना ही उस तरीके का तेज़ रफ़्तार कैमरावर्क जो आपको मैदान पर होने का एहसास करा जाए. जहां चक दे! इंडिया में दिखाए गये मैच लंबे-लम्बे शॉट्स के साथ बड़ी समझ से डिजाईन किये हुए लगते थे, गोल्ड के मैच टुकड़ों और क्लोज-अप्स में ही सीमित रह जाते हैं. खिलाड़ियों को न तो हीरो बनने का ही वक़्त मिलता है, ना ही आपको उनकी क़ाबलियत से जुड़ने का. और अब आखिरी में, फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी, अक्षय कुमार. अक्षय एक सोची समझी रणनीति के तहत देश और देशभक्ति का राग अलापती फिल्मों का हिस्सा बनते आ रहे हैं. हालाँकि एक अभिनेता के तौर पर गोल्ड में किरदार से जुड़ने की उनकी कोशिश उनकी पिछली फिल्मों से सबसे ज्यादा नज़र आती है, पर उनके होने भर से ही कहानी में वजन आने की रही-सही उम्मीद भी जाती रहती है. किरदारों को कैरीकचर बना कर छोड़ देने में उनका कोई सानी नहीं.

अक्षय का एकरस अभिनय एक तरह से एक अच्छा मौका भी है, सनी कौशल, कुनाल कपूर और अमित साध जैसे सह-अभिनेताओं के लिए. सनी कौशल फिल्म का सबसे भरोसेमंद अभिनेता बनकर उभरते हैं. देश के लिए खेलने की आग पाले बैठे किरदार में सनी जैसे परदे पर अपने मौके का इंतज़ार ही कर रहे होते हैं. यहाँ तक कि प्रेम-प्रसंग वाले हलके-फुल्के पलों में भी सनी ही भारी पड़ते हैं, अक्षय पर भी. मौनी रॉय बंगाली फिल्म के लिए ऑडिशन देने आई किसी बहुत उत्साहित नयी लड़की से ज्यादा बेहतर या लायक नहीं लगतीं. अमित साध राजघराने से आये एक अकडू युवराज के किरदार में भी बेहद मनोरंजक लगते हैं. विनीत कुमार सिंह भी कतई निराश नहीं करते. बंटवारे से पहले आज़ाद भारत के कप्तान और बंटवारे के बाद पाकिस्तान की हॉकी टीम के कप्तान के रूप में उनके हाव-भाव में जो एक हल्का सा फर्क और पैनापन विनीत शामिल कर पाते हैं, अगर आप भांप लें तो अदाकार के तौर पर विनीत के कद को ज्यादा समझ पाएंगे.

आखिर में; गोल्ड चमकदार तो है, पर हर चमकती चीज को सोना समझने की भूल कौन करता है भला? मुझे काफी वक़्त तक लगता था, स्वर्ण पदक विजेताओं के गोल्ड मैडल को दांतों से काटने की परम्परा भी शायद इसी को जांचने की एक प्रक्रिया होती होगी. गोल्ड देशभक्ति के नाम पर आपको कुछ ऐसा ऐरा-गैरा परोसने की कोशिश है. बेहतर होगा, नक्कालों से सावधान रहे! [2/5]

Thursday, 8 February 2018

पैडमैन: सामाजिक झिझक 'सोखने' वाली एक सुपर-हीरो फिल्म! [3.5/5]

तमिलनाडु के अरुणाचलम मुरुगनान्थम भारत के उन चंद 'सुपरहीरोज' में से हैं, जिन्होंने सस्ते सेनेटरी पैड बनाने और उन्हें गाँव-गाँव में महिलाओं तक पहुंचाने के अपने लगातार प्रयासों के जरिये, टेड-टॉक्स जैसे वर्चुअल प्लेटफार्म से लेकर यूनाइटेड नेशन्स जैसे विश्वस्तरीय मंच पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है. उनकी सादगी, उनके बोलने के अंदाज़, उनके खुशमिजाज़ व्यक्तित्व और समाज में बदलाव लाने की उनकी ललक, उनकी जिद, उनके संघर्षों को, आर. बाल्की की फिल्म 'पैडमैन' एक फ़िल्मी जामा पहनाकर ही सही, परदे पर बड़ी कामयाबी से सामने रखती है. ये अरुणाचलम मुरुगनान्थम की ईमानदार कहानी और उनकी मजेदार शख्सियत ही है, जो थोड़ी-बहुत कमियों के बावजूद, फिल्म और फिल्म के साथ-साथ परदे पर मुरुगनान्थम का किरदार निभा रहे अक्षय कुमार को बहुत सारी इज्ज़त उधार में दे देती है. और जिसके वो हक़दार हैं भी, आखिर हिंदी फिल्मों में कितनी बार आपने एक मुख्यधारा के बड़े नायक को कुछ मतलब की बात करते सुना है, जो उसके सिनेमाई अवतार से अलग हो, जो सामाजिक ढ़ांचे में 'अशुद्ध, अपवित्र और अछूत' माना जाता रहा हो. 

'पैडमैन' महिलाओं की जिंदगी में हर महीने आने वाले उन 5 दिनों के बारे में बात करती है, जिसे अक्सर हम घरों में देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. महीने भर की शॉपिंग-लिस्ट तैयार करते हुए कितनी बार आपने सेनेटरी पैड्स का जिक्र किया होगा? वो काली थैली या अखबार में लपेटे हुए पैकेट्स कैसे सबकी नज़रों से नज़र चुराते हुए किसी आलमारी में ऐसे दुबक जाते हैं, जैसे सामने खुल जाएँ तो क्या क़यामत आ जाये? मध्यप्रदेश का लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) अपनी पत्नी गायत्री (राधिका आप्टे) को गन्दा कपड़ा इस्तेमाल करते देखता है, तो चौंक जाता है, "मैं तो अपनी साइकिल न साफ़ करूं इससे", और पत्नी 'ये हम औरतें की दिक्कत है, आप इसमें मत पड़िये' बोल के 5 दिन के लिए बालकनी में बिस्तर लगा लेती है. गली में क्रिकेट खेल रहे लौंडे भी खूब जानते हैं, "गायत्री भाभी का (5 दिन का) टेस्ट मैच चल रहा है". 

ये भारत के उस हिस्से की बात है, जहां पहली बार 'महीना' शुरू होने पर लड़की से औरत बनने का उत्सव मनाया जाता है. रस्में होती हैं, पूजा होती है, भोज होता है, पर सोना लड़की को बरामदे में ही पड़ता है. लक्ष्मी की समझ से परे है कि थोड़ी सी रुई और जरा से कपड़े से बनी इस हलकी सी चीज का दाम 55 रूपये जितना महंगा कैसे हो सकता है? और इसी गुत्थी को सुलझा कर सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाने की जुगत में लक्ष्मी बार-बार नाकामयाबी, डांट-फटकार, सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक उथल-पुथल से जूझता रहता है. तब तक, जब तक परी (सोनम कपूर) के रूप में उसे उसकी पहली ग्राहक और एक मददगार साथी नहीं मिल जाता है. 

'पैडमैन' अपने पहले हिस्से में जरूर कई बार खुद को दोहराने में फँसी रहती है. लक्ष्मी का सेनेटरी पैड को लेकर उत्साह और उसे मुकम्मल तरीके से बना पाने की जिद खिंची-खिंची सी लगने लगती है. हालाँकि इस हिस्से में अक्षय से कहीं ज्यादा आपकी नज़रें राधिका आप्टे पर टिकी रहती हैं, जो एक बहुत ही घरेलू, सामान्य सी दिखने वाली और सामजिक बन्धनों के आगे बड़ी आसानी से हार मान कर बैठ जाने वाली औरत और पत्नी के किरदार में जान फूँक देती हैं. उनके लहजे, उनकी झिझक, उनके आवेश, सब में एक तरह की ईमानदारी दिखती है, जिससे आपको जुड़े रहने में कभी कोई तकलीफ महसूस नहीं होती. अक्षय जरूर शुरू शुरू में आपको 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' के जाल में फंसते हुए दिखाई देते हैं, पर फिल्म के दूसरे भाग में वो भी बड़ी ऊर्जा से अपने आप को संभाल लेते हैं. एक्सिबिशन में अपनी मिनी-मशीन को समझाने वाले दृश्य और यूनाइटेड नेशन्स के मंच पर अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी की स्पीच के साथ, अक्षय अपनी पिछली कुछ फिल्मों की तुलना में बेहतर अभिनय करते दिखाई देते हैं. ये शायद इस वजह से भी हो, कि 'पैडमैन' कहीं भी उनके 'देशभक्त' होने और परदे पे दिखने-दिखाने के पूर्वनियोजित एजेंडे पर चलने से बचती है. 

'पैडमैन' अपने विषय की वजह से पहले फ्रेम से ही एक जरूरी फिल्म का एहसास दिलाने लगती है. बाल्की 'माहवारी' के मुद्दे पर पहुँचने में तनिक देर नहीं लगाते, न ही कभी झिझकते हैं. फिल्म अपने कुछ हिस्सों में डॉक्यूमेंटरी जैसी दिखाई देने लगती है, तो वहीँ सोनम के किरदार के साथ लक्ष्मी का अधूरा प्रेम-प्रसंग जैसे हिंदी फिल्म होने की सिर्फ कोई शर्त पूरी करने के लिए रखा गया हो, लगता है. दो-एक गानों, अमिताभ बच्चन के एक लम्बे भाषण और फिल्म के मुख्य किरदार का नाम बदल कर अरुणाचलम मुरुगनान्थम से उनकी उपलब्धियों, उनके व्यक्तित्व का एक छोटा हिस्सा चुरा लेने के एक बड़े अपराध को नज़रंदाज़ कर दिया जाये, तो 'पैडमैन' एक मनोरंजक फिल्म होने के साथ साथ एक बेहद जरूरी फिल्म भी है. परिवार के साथ बैठ के देखेंगे, तो सेनेटरी पैड को लेकर आपस की झिझक तोड़ेगी भी, सोखेगी भी. [3.5/5]     

Friday, 11 August 2017

टॉयलेट- एक प्रेम कथा: सामाजिक सोच की सफाई के लिए राजनीतिक शौच? [2/5]

प्रधानमंत्री जी के 'स्वच्छ भारत अभियान' के दौरान उनके मातहतों के फ़ोटो अक्सर आपने अखबारों में देखे होंगे. साफ़-सुथरी सड़कों पर पहले सूखे पत्ते, कूड़ा-करकट फैलाए जाते हैं, फिर मंत्रीजी खुद झाड़ू लेकर सफाई अभियान में जुट जाते हैं. राजनीति में प्रतीकों का अपना एक स्थान है, चलता है; मगर सामाजिक सन्देश के नाम पर एक जरूरी फिल्म में इसे बरदाश्त कर पाना बिलकुल बस के बाहर की बात है. श्री नारायण सिंह की 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' सफाई करने से पहले खुद ही गंदगी फैलाती है, और गंदगी फैलाने में ही अपना ज्यादा वक़्त जाया करती है. रूढ़िवादी सामाजिक सोच को तोड़ने के लिए राजनीतिक शौच का सहारा लेते हुए 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' एक अच्छी-भली, सच्ची कहानी को मनोरंजक बनाने में खूब लीपा-पोती करती है. 

36 साल के केशव (अक्षय कुमार) की शादी एक 'दूधवाली', 'दूध की डेरी' मल्लिका से हो रही है. मल्लिका एक भैंस है, इसीलिए आपको उसके शारीरिक रूप का बखान करते वक़्त इस तरह के विशेषण मजाकिया लग रहे होंगे, पर जिस द्विअर्थी ज़बान में उस पर सस्पेंस और व्यंग्य कसा जाता है, इंद्र कुमार की सेक्स-कॉमेडी 'ग्रेट ग्रैंड मस्ती' की याद आनी वाजिब है. हद तो तब हो जाती है, जब एक महाशय ख्यालों में केशव को उसकी मल्लिका (भैंस) के साथ हनीमून मनाते हुए देखने लगते हैं, स्विट्ज़रलैंड की वादियों में एक-दूसरे के बदन से चिपके हुए. यकीनन, यहाँ जरूरत शौच में सफाई की नहीं, सोच में सफाई की है. बहरहाल, मांगलिक दोष से मुक्त होने के इस रिवाज़ के बाद केशव की जिंदगी में जया (भूमि पेडणेकर) आती है. ताड़ने, पीछा करने, छुप-छुप के मोबाइल से फोटो खींचने और दोस्तों के बीच जिक्र करके मज़ा लेने वाले आशिक़ों को जया खरी-खोटी सुनाने का कोई मौका नहीं छोडती, पर जैसे ही केशव से एक झिड़की मिली, उसे भी प्यार के नाम पर यही सब दोहराने में कोई झिझक-कोई शर्म नहीं होती.  

शादी की अगली ही सुबह जब जया को पड़ोस की औरतें 'लोटा पार्टी' ज्वाइन करने का निमंत्रण देतीं हैं, तब कहीं जा के फिल्म वापस पटरी पर आनी शुरू होती है. केशव के घर में टॉयलेट नहीं है. कहाँ तो इस एक बड़ी समस्या को गंभीरता से समझने की जरूरत थी, मगर यहाँ भी श्रीनारायण सिह अति-साधारण दर्जे के 'अक्षय कुमार' मार्का हास्य का कंधा तलाशने लगते हैं. वास्तविक घटना के विपरीत, असली मुद्दे से हटकर जया-केशव तरह-तरह के जुगाड़ों में लगे रहते हैं. कभी पास के रेलवे स्टेशन पर ट्रेन का शौचालय इस्तेमाल करने की ट्रिक, तो कभी फिल्म-शूटिंग से मोबाइल-टॉयलेट चुराने का प्लान. और अंत में कहीं जाकर, जब अखबारों-न्यूज़ चैनलों के सहारे बात सरकार के कानों तक पहुँचती भी है, तो सब मामला इतनी आसानी से सुलझ जाता है, जैसे कोई बड़ी बात थी ही नहीं. 

पिछले महीने 'इंदु सरकार' और अब 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा'; फिल्मों में किसी एक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार साफ़ नज़र आ रहा है. फिल्म में बड़ी सफाई से बताया जाता है कि उत्तर प्रदेश में जो ताज़ा 'टॉयलेट-घोटाला' है, वो चार साल पुराना है. नोटबंदी जैसे कड़े फैसले अगर प्रधानमंत्री ले सकते हैं, तो तत्कालीन उत्तर प्रदेश-मुख्यमंत्री क्यूँ पीछे रहें? अक्षय का किरदार भी प्रेस के सामने सरकार के बीच-बचाव की मुद्रा में तैनात नज़र आता है. इतने सब के बाद भी, फिल्म दो-तीन ख़ास मौकों पर 'घर-घर शौचालय' के मुद्दे पर अपना रवैया साफ़-साफ़ और कड़े शब्दों में रखने में कामयाब रहती है. अक्षय और भूमि के लम्बे भाषण भी ऐसे ही कामयाब मौकों का हिस्सा हैं. 

किसी 15-20 मिनट की शार्ट फिल्म में बेहतर कही जा सकने वाली कहानी और उससे जुड़ी सामाजिक-समस्या के तमाम पहलुओं को सामने रखने के लिये, 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' पौने तीन घंटे का समय ले लेती है. 'भारत कुमार' बनने की राह पर निकल पड़े अक्षय बड़ी चालाकी से फिल्मों का चयन तो कर रहे हैं, मगर लगता है कि ड्रामेबाजी से उभरने का कोई रास्ता अभी तक उन्हें सूझा नहीं है. भूमि को इस तरह की भूमिका में पहले भी देख चुके हैं हम. उनमें पूरी क़ाबलियत है आज के ज़माने की दीप्ति नवल बनने की, एक ऐसा अपना सा चेहरा जो घर के आस-पास ही रहता हो. सुधीर पाण्डेय साब को परदे पर बार-बार देखने की चाह एक बार फिर बनी रहती है. अपने वन-लाइनर और कॉमिक-टाइमिंग से दिव्येंदु गुदगुदाने में कामयाब साबित होते हैं. 

आखिर में; 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' किसी सरकारी पैम्फलेट की तरह रंग-बिरंगा भी है, जरूरी मुद्दे भी हैं, मतलब की बातें भी हैं और एक लुभावना चेहरा भी जिसे 'देश' से जोड़ कर देखने की आपको आदत है, पर इस सरकारी प्रचारपत्र को 'टॉयलेट-पेपर' तक  समझने की भूल मत कीजियेगा. अनुपम खेर फिल्म में सबसे समझदार और 'मॉडर्न' बुजुर्ग बने हैं, सनी लिओने के गाने टीवी पर इतरा-इतरा के देखते हैं. अख़बारों के बारे में उनकी एक राय है, "जो रद्दी है, उसे रद्दी में ही जाना चाहिए". 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' भी उन अख़बारों से कुछ ज्यादा अलग नहीं. [2/5]     

Friday, 31 March 2017

नाम शबाना: ‘पुअर बेबी’! [2/5]

देश की सुरक्षा का ज़िम्मा जितना सीमा पर तैनात सेना के जाबांजों का है, उतना या उससे थोड़ा सा ज्यादा ही ऐसी गुप्तचर सुरक्षा एजेंसियों का भी, जिन्हें गुमनामी के अँधेरे में रहकर हर पल खतरे के साये में जीना और मरना मंजूर होता है. नीरज पाण्डेय की ‘बेबी’ अगर आपने देखी हो, तो इन ‘अंडरकवर’ लड़ाकों के काम करने के तरीकों को तो अब तक आप जान ही गए होंगे? ‘नाम शबाना’ थोड़ा पीछे जाने की कोशिश करती है, कहानी के साथ भी और इन सीक्रेट एजेंट्स को चुने जाने की कड़ी कार्यवाही को सामने रखने के साथ भी. बहुत हैरतअंगेज़ है सब कुछ, एक ऐसी रहस्यमयी दुनिया, जहां फिल्मों की मानें तो 5 साल से एक ऐसी लड़की (तापसी पन्नू) पर पल-पल नज़र रखी जा रही है, जो अपने शराबी बाप की गैर-इरादतन हत्या के अपराध में सज़ा भुगत चुकी है. नज़र रखने वाले ने लड़की के जाने कितने फोटोग्राफ्स खींचे होंगे इस दरमियान? ऐसी दुनिया में आपका उम्रदराज़ केबल वाला (वीरेंद्र सक्सेना) भी ‘रॉ’ का एक अच्छा-खासा सीनियर टाइप ट्रेनर निकल सकता है, इसीलिए जब वो फ़ोन पर कहे, “मैडम, नया स्कीम चाहिए?’ तो ‘हाँ’ या ‘ना’ बोलने में पूरा वक़्त लीजिये, क्यूंकि बात सिर्फ आपके केबल कनेक्शन की नहीं है, सवाल सीक्रेट एजेंट के तौर पर आपके कैरियर का भी है.   

हालाँकि चौबीसों घंटे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का जाप करने वाली ये ‘एजेंसी’ अपनी एक उम्मीदवार और उसके साथी पर हो रहे जानलेवा हमले में सिर्फ इसलिए दखल नहीं देती क्यूंकि अभी तक वो उनकी ‘अपनी’ नहीं हुई है, पर उसी जानलेवा हमले का बदला लेने के लिए क़ानून की हद से आगे बढ़कर, उसे कातिल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती. जाहिर है, इस दुनिया के अपने कायदे क़ानून हैं, और इस फिल्म की स्क्रिप्ट में जरूरत से कहीं ज्यादा ‘कॉमन सेंस’ की कमी. ‘बेबी’ में तापसी की किरदार शबाना खान महज़ 20 मिनट के लिये परदे पर आती है, और अपने हाव-भाव-ताव से ताकतवर मर्दों से भरे उस फ्रेम में अपनी जगह बहुत दिलेरी से छीन लेती है, बना लेती है. ‘बेबी’ में शबाना के उस 20 मिनट वाले रुतबे तक पहुँचने में ‘नाम शबाना’ ढाई घंटे तक का वक़्त खर्च कर देती है, और फिर भी उसे छू पाने का दावा पेश नहीं कर पाती. जहां नीरज पाण्डेय की स्क्रिप्ट कहीं भी अपने आप को गंभीरता से नहीं लेती, वहीँ अपने ढीले-ढाले निर्देशन से शिवम् नायर पहले तो फिल्म का पूरा पहला हिस्सा सुरक्षा एजेंसी से दूर-दूर रह कर शबाना के निजी जिंदगी में झाँक-झांक कर निकाल देते हैं और उसके बाद, जब रोमांच का सारा खेल गढ़ने की बारी आती है तो बेवजह के ‘ट्विस्ट’ परोस कर (प्लास्टिक सर्जरी से चेहरे बदल लेने वाला विलेन, पृथ्वीराज सुकुमारन) और ‘बेबी’ के किरदारों का अधपका हवाला देकर (...और सर, ऑपरेशन बेबी कहाँ तक पहुंचा?) मनोरंजन की नैय्या पार लगाने की कोशिश करने लगते हैं.  

न चाहते हुए भी मानना पड़ता है कि फिल्म में तापसी स्क्रीन पर भले ही सबसे ज्यादा वक़्त के लिए दिखाई देती हों, भले ही उनकी मौजूदगी परदे पर जरूरी रोमांच बनाए रखने में सौ फीसदी सही साबित होती हो; नीरज पाण्डेय की चलताऊ स्क्रिप्ट उन्हें अक्षय कुमार के किरदार से आगे न निकलने देने के लिए बार-बार रोकती है. शबाना जब-जब मुसीबतों में घिरती नज़र आती है, अक्षय का किरदार उसे बांह पकड़ कर खींचता हुआ बाहर ले आता है. मुश्किलें जैसे जान-बूझकर आसान ही रखी गयी हों, क्योंकि फिल्म की हीरो तापसी हैं, अक्षय नहीं. शबाना को सुरक्षा एजेंसी तक लाने वाले अफसर की भूमिका में मनोज बाजपेई जंचते हैं, पर उनके किरदार की तह में जाने के लिए शायद एक और ‘स्पिन-ऑफ’ की जरूरत अलग से पड़े. कास्टिंग के नजरिये से फिल्म में दो अभिनेताओं को बड़ी चतुराई से उनके किरदार के लिए चुना गया है. शबाना के बॉयफ्रेंड की भूमिका में ताहेर शब्बीर जैसे मेहनती, पर कम तजुर्बे और सीमित अभिनय वाले नए कलाकार को, ताकि तापसी का किरदार उभर कर सामने आये...और विलेन के तौर पर, पृथ्वीराज सुकुमारन. पृथ्वीराज की मौजूदगी फिल्म के पोस्टर और कैनवस को जरूर बड़ा करती है, पर उन जैसे मंजे अभिनेता को इस तरह के वाहियात किरदारों में इस्तेमाल कर बॉलीवुड सिर्फ अपना ही नुक्सान कर रहा है.

आखिर में, ‘नाम शबाना’ अपनी अधपकी, कच्ची, बचकानी स्क्रिप्ट और दकियानूसी निर्देशन से सही मायनों में ‘बेबी’ की ‘प्रीक्वल’ ही लगती है. ऐसी ‘प्रीक्वल’ जो दो साल बाद नहीं आई हो, दो साल पहले आई हो. ऐसी ‘प्रीक्वल’ जो अपने इरादों में ही इतनी कमज़ोर, इतनी सुस्त लगती है कि उसमें ‘बेबी’ का बेंचमार्क छूने भर लेने तक का भी कोई जज़्बा नहीं बचता. फिल्म में एकाउंट्स पढ़ाने वाले मोहन कपूर की भाषा में कहें तो, “बेबी’ अगर संपत्ति (asset) है तो ‘नाम शबाना’ देनदारी (liability)”! [2/5] 

Wednesday, 28 December 2016

साल के बेमिसाल...(They Came, They Saw, They Conquered)

ढर्रे को तोड़ना, उस जमीन पर रास्ते तलाशना जहाँ पहले कभी इंसानी पाँव पड़े ही नहीं, अपने ही बनाये मानकों को लांघ कर आगे निकल जाना; बॉलीवुड के लिए कभी आसान नहीं रहा. फिर भी इस पूरे साल, कईयों ने हिम्मत दिखाई और अपनी मौजूदगी का बाकायदा एहसास कराते रहे. ‘पिंक’ अगर औरतों के प्रति मर्दों की सदियों पुरानी सड़ांध भरी मानसिकता को कड़े शब्दों में ‘ना’ कहने, और ‘ना’ का मतलब ‘ना’ ही होने की जोरदार पहल करती है, तो ‘अलीगढ़’ समलैंगिकता के जुड़े ज़ज्बातों को ‘ओछी नैतिकता’ के दुनियावी दलदल से निकाल कर हमारे दिलों और घरों में बाइज्ज़त कायम करने की सफल कोशिश करती है.

हिंदी सिनेमा की भाषा बदल रही है, और इस बात की मिसाल ‘कपूर एंड संस’ से बढ़िया और क्या हो सकती है? पारिवारिक अंतर्कलह हमेशा से हिंदी सिनेमा के रंगीन परदे को लुभाता रहा है. दर्शकों की आँखों में नमी लाकर बॉक्सऑफिस पर पैसे बटोरने का फ़न पुराना और बासी हो चला है, और इस बात की भनक तब लगती है, जब हम ‘कपूर एंड संस’ से मिलना तय करते हैं. यहाँ सब कुछ वैसा ही बेतरतीब है, जैसे अपने घरों में होता है. यहाँ सब जैसे टूटे हुए बैठे हैं या टूट कर बिखरने की कगार पर हैं. मलाल, गुस्सा, शिकवे-शिकायतें और कुढ़न, सबके अन्दर जैसे एक ज्वालामुखी सो रहा है, जब उठेगा, फटेगा तो जाने क्या होगा? यहाँ आने में आपको थोड़ी झिझक जरूर होगी, पर एक बार आ गए तो जाने में भी उतनी ही मुश्किल.

साल 2016 के इन 10 बेमिसाल फिल्मों में कहीं न कहीं आपको पुराना बॉलीवुड नये चोले पहनता हुआ दिखाई देगा. हौसला-अफजाई तो बनती है...शुक्रिया!  


#एयरलिफ्ट #डियर जिंदगी #निल बट्टे सन्नाटा #नीरजा #अलीगढ़ 
#रमन राघव 2.0 #कपूर एंड संस #उड़ता पंजाब #दंगल #पिंक        





AIRLIFT is a nice, well-intended break from loud and fake jingoism in Hindi cinema. The patriotism portrayed here is never too pushy, preached or purposefully painted. No matter how millionth of times you have seen a tricolour being hoisted up from soil to sky, you’re tend to feel the ‘get-up-and-go’ force within you but Raja Menon gives it all a reason, more unadulterated and uncontaminated. 


The merit also lies in casting Akshay Kumar who deliberately decides to underplay his unapologetically self-interested image for a while and gives us a character that’s more human than just feeding off someone’s unchallenged starry ego. He’s not new to the flavor though. BABY and SPECIAL 26 have done quite well for him in the past. AIRLIFT is a greater addition to the list.




डियर ज़िन्दगी’ अपने छोटे-छोटे, हलके-फुल्के पलों में बड़े-बड़े फलसफों वाली बातें कहने का जोखिम बखूबी और बेख़ौफ़ उठाती है. डॉक्टर खान जब भी रिश्तों को लेकर ज़िन्दगी का एक नया पहलू काईरा को समझा रहे होते हैं, उनकी इस भूमिका में शाहरुख़ जैसे बड़े कलाकार का होना अपनी अहमियत साफ़ जता जाता है. ये चेहरा जाना-पहचाना है. बीसियों साल से परदे पर प्यार, दोस्ती और ज़िन्दगी की बातें करता आ रहा है, पर इस बार उसकी बातों की दलील पहले से कहीं ज्यादा गहरी है, मजबूत है, कारगर है. 

आलिया जिस तरह भरभरा कर टूटती हैं परदे पर, हिंदी सिनेमा में अपने साथ के तमाम कलाकारों को धकियाते हुए एकदम आगे निकल जाती हैं. फिल्म की खासियतों में से एक ये भी है कि शाहरुख़ जैसा दमदार स्टार होते हुए भी कैमरा और कहानी दोनों आलिया के किरदार से कभी दूर हटते दिखाई नहीं देते.





सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. 

अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है. 






Real-life heroes are way better than the ones we see, create or admire on big screen. They might not look perfectly decked-up all the time, make a grand entry and an even greater exit from the frame in the most overrated slow-motion shots. They might not be so exceptionally skilled to kill every bad man in their way; on the other hand, they might get killed at the end. 

And trust me if they do so, it’s never pre-designed to sympathetically benefit their own image amongst their fans. Real-life heroes also necessarily don’t have to be always a ‘Hero’ to inspire; they can also come in as a bold, fearless, strong-headed and proud 23-year old girl from the next door! Ram Madhvani’s inspirational biopic NEERJA successfully brings us closer to one such hero, most of us wouldn’t have known of if the efforts were not made.



दो-चार-दस गिनती की फिल्में को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने समलैंगिकों और समलैंगिकता को जिस बेरुखी, जिस छिछले तरीके से परदे पर अपने मतलब (...और भौंडे मनोरंजन) के लिए इस्तेमाल किया है, उसे साफ़ और पाक करने के लिए कोई एक फिल्म काफी साबित नहीं हो सकती, ये एक शर्मनाक सच है...पर इसी के साथ एक सच और भी है, कोशिशों ने हौसलों का दामन अभी छोड़ा नहीं है. 

हंसल मेहता की बेहद सुलझी हुई, संजीदगी और सादगी से भरी हुई ईमानदार फिल्म ‘अलीगढ़’ ऐसी ही एक बेहतरीन कोशिश है, जो समलैंगिकता को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बेहयाई नहीं करती बल्कि उसे ‘निजता के अधिकार’ के साथ मिलाकर एक ऐसा मुहीम छेड़ देती है जिससे बचना-मुंह मोड़ना और अनदेखा कर देना किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए आसान नहीं रह जाता!







अपनी नई फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ को अनुराग उनकी सबसे ख़तरनाक लव-स्टोरी का दर्जा देते हैं.अनुराग कश्यप और लव-स्टोरी?? इसका सटीक जवाब तो आपको फिल्म के आख़िरी पलों में ही मिलता है, पर अच्छी बात ये है कि ‘बॉम्बे वेलवेट’ की नाकामयाबी ने उन्हें वापस उनके अपने जाने-पहचाने दायरे में ला खड़ा किया है. हालांकि भारतीय सिनेमा में ये दायरा भी उन्हीं की बदौलत इस मुकाम तक पहुंचा है. यहाँ उनका कोई दूसरा सानी नहीं. इस बार भी उनसे कहीं कोई चूक नहीं होती. 

रमन राघव 2.0’ अब तक की उनकी सबसे ‘डार्क’ फिल्म बिना किसी झिझक कही जा सकती है. रक्त का रस और गाढ़ा हो चला है. खौफ़ का चेहरा पल-पल मुखौटे बदल रहा है. अँधेरे का साम्राज्य और गहराने लगा है.





It seems Bollywood has learnt its way to deal Indian families in films the way it should be. Chaotic, dramatic, relatable and real! With Shakun Batra’s KAPOOR & SONS (SINCE 1921), even Dharma Productions have come a long way. Forget Karan Johar’s all elite, genteel and heavenly prosperous families melting & merging patently into the equally overwhelming interiors inspired by latest interior design magazines! The characters here, in Shakun’s world, don’t really chew their words before spitting them out. On the contrary, they are loose out in the open to grind each other’s peace unabashedly. 

Backed up by good writing and even better direction skills, KAPOOR & SONS (SINCE 1921) marks the arrival of a totally fascinating and utterly dysfunctional ‘on-screen’ family you would love to see more of it. 



गुलज़ार साब की ‘माचिस’ जैसी कुछेक को अलग रख कर देखें तो पंजाब को हिंदी फिल्मों ने हमेशा मीठी चाशनी में ही लपेट कर परोसा है. दिन में बैसाखी के मेले और रात में लोहड़ी का जश्न, इससे आगे बढ़ने की हिम्मत पंजाबी सिनेमा ने तो कभी-कभी दिखाई भी है पर बॉलीवुड कमोबेश बचता ही रहा है. अब तक. ‘उड़ता पंजाब’ के आने तक. 

पंजाब की जो सपनीली तस्वीर आपने ‘यशराज फिल्म्स’ के चश्मे से देखी थी, अभिषेक चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ पहले फ्रेम से ही उस तस्वीर पे चिपके ‘एनआरआई कम्पेटिबल’ चमक को खरोंचने में लग जाती है. सीने पर आतंकवाद का बोझ और पीठ पर ’84 के ज़ख्म उठाये पंजाब को अब हेरोइन, स्मैक और कोकीन की परतों ने ढक लिया है. खुरदुरी, किरकिराती, पपड़ी जमी परतों ने! 







अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. 

नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.




हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. 

‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं.