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Friday, 7 September 2018

लैला मजनू: परदे पर जूनूनी इश्क़ के दौर की वापसी! [3.5/5]


इश्क़ में हद से गुजर जाने वाले आशिक़ अब कहाँ ही मिलते हैं? विछोह में पगला जाने वाले, इबादत में माशूक को ख़ुदा के बराबर बिठा देने वाले अहमकों की जमात लगातार कम होती जा रही है. ऐसे में, सदियों से सुनते-देखते आये मोहब्बतों के क़िस्से आज भी कुछ कम सुकून नहीं देते, शर्त बस ये है कि उन्हें पेश करने में थोड़ी सी समझदारी और सुनने में आपकी हिस्सेदारी ज़रा दिल से होनी चाहिए. साजिद अली की लैला मजनू फिल्मों में प्रेम-कहानियों के उस दौर को जिंदा करती है, जहां जूनूनी किरदारों के बग़ावती तेवर बेरहम दुनिया के जुल्म-ओ-सितम के आगे दम भले ही तोड़ दे, घुटने कभी नहीं टेकते. हालाँकि वक़्त-बेवक्त हीर-राँझा, रोमियो-जूलिएट और मिर्ज़ा-साहिबां जैसी अमर प्रेम-कथाओं पर तमाम हिंदी फिल्मों ने पूरे हक से अपनी दावेदारी दिखाते हुए दर्शकों को लुभाने की कोशिश की है, पर हालिया दौर में लैला मजनू शर्तिया तौर पर सबसे ईमानदार और यकीन करने लायक कोशिश कही जा सकती है. सदियों पुरानी कहानी को आज के सूरते-हाल में ढाल कर पेश करने में लैला-मजनू अगर पूरी तरह नहीं, तो ज्यादातर वक़्त तो कामयाब रहती ही है.        

कश्मीर के एक हिस्से में लैला (तृप्ति डिमरी) की ख़ूबसूरती के चर्चे आम हैं. लड़के ताक में रहते हैं कि कब लैला टिश्यू पेपर पर अपने होठों की लगी लिपस्टिक का निशान चस्पा करके, कार की खिड़की से बाहर फेंके और वो उसे लेने को जान की बाज़ी लगा दें. लैला के बारे में मशहूर है कि वो लड़कों को घुमाती है. एक नंबर की फ़्लर्ट है, पर असलियत तो ये है कि क्लास के बाद सहेली से पहले किस का हाल बड़ी बेसब्री से लिया जा रहा है. मजनू बनने से पहले हमारे मजनू को लोग कैस बट (अविनाश तिवारी) के नाम से जानते हैं. कैस भी कम नहीं है. एक नंबर का बिगडैल. अफवाह है कि उसके चक्कर में एक लड़की ने तो प्रेग्नेंट हो जाने पर दुबई जा कर जान दे दी थी. दोनों में कुछ तो है. पिछले जनम का न सही, बचपन का ही, मगर है कुछ तो. और उनके परिवारों में भी. दोनों के बापों में एक छटांक भी बनती नहीं. अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि दोनों की किस्मतों में इश्क़ का मुकम्मल होना शामिल नहीं है. लेकिन फिर, दुनिया की सबसे मशहूर प्रेम-कहानियाँ का अंजाम आखिर ख़ुशगवार कब रहा है!

लैला मजनू पर इम्तियाज़ अली की छाप साफ़ देखी जा सकती है. ऐसा होना लाजमी भी है, जब फिल्म इम्तियाज़ की कलम से ही निकली हो, और फिल्म के निर्देशक इम्तियाज़ के ही भाई हों. इम्तियाज़ जिस तरह फिल्म के मुख्य किरदारों को, अपने दिलचस्प संवादों से उनके ख़ास ताव और तेवर बख्शते हैं, किरदार एक अलग ही रौशनी में उभर कर आते हैं. लैला का पहली बार कैस से आमना-सामना हो, लैला का तेज़तर्रार बाग़ी रवैया या फिर फिल्म के आखिरी हिस्से में कैस का सूफ़ियाना लहजा; इम्तियाज़ हर दृश्य में अपनी बात जाना-पहचाना तरीका होने के बावजूद, एक नये-नवेले तौर से सामने रखते हैं. कैस के किरदार में अविनाश तिवारी को परंपरागत तौर पर नायक की छवि में देखना दर्शकों के लिए आसान नहीं होगा, इम्तियाज़ जान लेते हैं और शायद इसीलिए पहले ही दृश्य में उनके किरदार से साफ़ कहलवा देते हैं. “मेरी सूरत अच्छी नहीं है ना, इसीलिए मुझे स्मार्ट लगने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है. देखो, स्टेबल (हलकी दाढ़ी) भी रखा है. उनका ये डिफेंसिव मैकेनिज्म अविनाश के लिए सटीक बैठता है, फिल्म के आखिर तक आते-आते आप उनके, उनकी अदाकारी, उनकी दमदार आवाज़ के मुरीद हुए बिना रह नहीं पाते. मेरी ही तरह अब आपको भी याद आने लगा होगा कि अविनाश को पहले भी आप तू है मेरा संडे में सराह चुके हैं.   

लैला के किरदार में तृप्ति डिमरी के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है. शुरू शुरू में आपको तृप्ति की लैला इम्तियाज़ की ही फिल्मों की दूसरी नायिकाओं, खास कर रॉकस्टार की नर्गिस फाखरी की याद दिलाती है. शायद इसलिए भी क्यूंकि दोनों के तेवर और लहजे में एक खास तरह की साझा बनावट है. नर्गिस की संवाद-अदायगी में अगर उनका हिंदीभाषी न होना हावी था, तो यहाँ तृप्ति को कश्मीरी लहज़े में बात करने की शर्त से गुजरना था. बहरहाल, तृप्ति रॉकस्टार में होतीं तो नर्गिस की हीर में कुछ इज़ाफा ही करतीं! सुमित कौल का किरदार शायद फिल्म का सबसे मेलोड्रमेटिक पहलू रहा, बावजूद इसके उनके अभिनय की तारीफ़ करनी होगी. बेंजामिन गिलानी और परमीत सेठी अच्छे हैं.  

लैला मजनू कश्मीर में अपनी कहानी गढ़ती है, और कश्मीर भी इस कहानी में ख़ूब रच-बस जाता है; सिर्फ बर्फीले मौसम, हरे घास की चादरों या चिनार के पत्तों तक नहीं, बल्कि फिल्म की पृष्ठभूमि से लेकर गीत-संगीत और कहानी की खुशबू तक में. हालाँकि इस कश्मीर से आतंकवाद, सेना के जवान और डर का माहौल बड़ी सफाई से नदारद हैं, पर बात जब मोहब्बत की हो रही हो, ऐसी चीजों को नज़रंदाज़ भी करना बेहतर ही है. हर तस्वीर में ग़ुरबत के रंग हों, जरूरी तो नहीं.

खैर, बॉलीवुड ने एक अरसे तक लैलाओं को बार-गर्ल और आइटम-गर्ल बना रख छोड़ा था, समाज और सरकारों ने मजनुओं को वैसे ही बदनाम कर रखा है; ऐसे में साजिद अली की लैला मजनू मुकम्मल तौर पर प्रेम-कहानियों की गिरती साख को ऊपर उठाती है. नाकाम इश्क़, ग़मगीन अंजाम और जूनूनी आशिक़; ये कहानी पुरानी ही सही, आज भी उतनी ही असर रखती है, बशर्ते आप दिली तौर पर तैयार हों. [3.5/5]               

Friday, 29 July 2016

ढिशूम: बेमतलब है, पर वाहियात नहीं! [2/5]

रोहित धवन की ‘ढिशूम’ बिलकुल अपने नाम की तरह ही है, बेमतलब. ढिशूम को सालों-साल पहले हिंदी फिल्मों में मार-धाड़ के दृश्यों में मुक्के और घूंसों की आवाज़ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, वो भी डबिंग के वक़्त मुंह से बोल कर. आज अगर उन दृश्यों को आप देखें तो शायद उस वक़्त की तकनीकी कमियों पर हंस भी पड़ें, पर उस जमाने के दर्शकों पर उसके प्रभाव को नज़रअंदाज़ करना आपके बस में नहीं. खैर, सिंक-साउंड और रीयलिस्टिक सिनेमा के दौर में धीरे-धीरे इस लफ्ज़-ऐ-इज़हार में वो प्रभाव, वो असर अब रहा नहीं. ऐसी ही कुछ तबियत, रंगत और सीरत ‘ढिशूम’ फिल्म की भी है. हाँ, एक बात तारीफ के काबिल ज़रूर है...’ढिशूम’ बेमतलब और बेअसर की होने के बावजूद आपको दूसरी वाहियात फिल्मों की तरह परेशान बिलकुल नहीं करती. सच्चाई तो ये है कि ये फिल्म अपने आपको भी कभी सीरियसली नहीं लेती. नतीजा ये होता है कि पूरी फिल्म आपकी आँखों के आगे से यूँ निकल जाती है और आप उस पर रियेक्ट करने की जेहमत ही नहीं उठाते!

मिडिल-ईस्ट में कहीं किसी जगह, भारत-पाकिस्तान के फाइनल क्रिकेट मैच से ठीक पहले भारतीय टीम के धुआंधार बल्लेबाज विराज शर्मा [साकिब सलीम] को किसी ने अगवा कर लिया है. भारत ने स्पेशल टास्क फ़ोर्स के अपने सबसे काबिल ऑफिसर कबीर [जॉन अब्राहम] को अगली ही फ्लाइट से वहाँ के लिये रवाना कर दिया है. कबीर की मदद के लिए वहां है जुनैद [वरुण धवन], अपनी छिछोरी, बेवकूफ़ाना और हंसोड़ हरकतों के साथ. गुस्सैल-अकड़ू कबीर और मजाकिया जुनैद की ये जोड़ी बॉलीवुड के लिए कोई नई नहीं है. दिमाग पर ज़ोर डालिए और इस तरह की ‘एक अनाड़ी-एक खिलाड़ी’ मर्द जोड़ियों के जो भी नाम आपको याद आयेंगे, यकीन मानिए कबीर और जुनैद उन सब से ही निकलते मिलेंगे, उन सब जैसे ही दिखते मिलेंगे.

जैकलीन फर्नान्डीज़ फिल्म में शौकिया चोर की भूमिका में हैं जिसकी अपनी एक दर्द भरी कहानी है, जो करन अंशुमन की ‘बैंगिस्तान’ में उनके किरदार की कहानी से इतनी मिलती-जुलती है मानो जैकलीन सीधा उसी फिल्म के सेट से इस फिल्म में आ गिरी हों. और इन सब के बीच अक्षय खन्ना का वापस फ़िल्मी परदे पर आना! मेहमान भूमिकाएं हों, खूबसूरत लोकेशंस हों या एक्शन, रोहित धवन एक मौका नहीं छोड़ते, आपका ताबड़तोड़ मनोरंजन करने की कोशिश में. एक के बाद एक वो अपने पत्ते कुछ इतनी जल्दी में फेंकते हैं कि आपको दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. गैर-मुल्कों में कैसे सभी लोग इतनी अच्छी हिंदी बोलते-समझते हैं? ये गलती तो बॉलीवुड में अब गलती मानी ही नहीं जाती, पर दुश्मन के अड्डे से बच के निकलना हो, किडनैपिंग के केस में एक लीड से दूसरी लीड तक पहुंचना हो या फिल्म के सबसे बड़े विलेन को पकड़ने में एक कुत्ते की भूमिका; फिल्म के लेखक भी कहानी लिखने में दिमाग का इस्तेमाल करने से बचते रहे हैं. बड़ी बात ये है कि इसके लिए भी उन्हें काफी मोटी रकम पेश हुई होगी.

अभिनय में किसी को भी अच्छा कहना थोड़ा विवादास्पद हो सकता है, और हास्यास्पद भी. जॉन अब्राहम के डोलों की साइज़ में भले ही इज़ाफा हुआ हो, उनकी एक्टिंग में धागे भर की भी तरक्की नहीं दिखती. जैकलीन में जितनी चाभी भरिये, उतनी ही देर तक चलती हैं. हाँ, वरुण आपको अपने भोले-भाले-साफ़ दिल चेहरे से अच्छा-खासा बहलाए रखते हैं. अक्षय खन्ना अभी पूरी तरह वापस नहीं आये हैं, एक-दो फिल्में और लगेंगी. विराट कोहली के इर्द-गिर्द बुने गए किरदार में साकिब सलीम और सुषमा स्वराज जैसी दिखने-लगने-बोलने वाली केन्द्रीय मंत्री की भूमिका में मोना अम्बेगांवकर फिल्म की सबसे मज़बूत कास्टिंग हैं. अक्षय कुमार, सतीश कौशिक और नरगिस फाखरी अपनी-अपनी मेहमान भूमिकाओं में ठीक-ठाक हैं.

आखिर में, रोहित धवन की ‘ढिशूम’ उन पलों में ज्यादा कारगर साबित होती है, जहां रोहित अपने पिता डेविड धवन मार्का एंटरटेनमेंट की झलकियाँ पेश करते हैं. सतीश कौशिक, विजयराज और वरुण के किरदार डेविड धवन की ‘हार्मलेस’ कॉमेडी फिल्मों के आड़े-टेढ़े किरदारों की ही याद दिलाते हैं. अफसोस, ऐसे मजाकिया पल फिल्म में बस गिनती के ही हैं और ज्यादातर वक़्त फिल्म सिर्फ अपना ही मज़ाक बनाने में गुमसुम रहती है. देखिये, अगर आप उन चंद ख़ास ‘गिफ्टेड’ लोगों में से हैं जो अपना दिमाग हर जगह लेकर नहीं जाते! [2/5]   

Friday, 3 June 2016

हाउसफुल 3: कॉमेडी कोमा में है..! [1/5]

‘कॉमेडी’ कोमा में चली गयी है. अब उसका हॉस्पिटल के बिस्तर से उठना और आपको जी भर के गुदगुदाना न जाने कब होगा? बॉलीवुड की ज़बान में कहें तो, “अब दवा की नहीं, दुआ की जरूरत है”. हँसी के नाम पर रंग, लिंग और नस्ल-भेद को कोंचती टीका-टिप्पणी के बाद, इस बार ‘कॉमेडी’ को शारीरिक अपंगता पर गढ़े गए भौंडे और भद्दे प्रहार झेलने पड़े हैं. घाव गहरे हैं, पर ऐसा नहीं कि सिर्फ ‘कॉमेडी’ को ही मिले हैं. फ़रहाद-साज़िद की ‘हाउसफुल 3’ आपकी सोच, समझ और संवेदनाओं का भी बड़ी बेशर्मी से मज़ाक उड़ाती है, वरना कौन भलामानस होगा जिसे व्हील चेयर पर बैठे ‘दिव्यांग’ की सच्चाई का पता लगाने के लिए उसकी पैंट में चीटियाँ छोड़े जाने पर हँसी आती हो? शादी न हो इसके लिए बेटियों के पेट से थैली (ovary) निकलवा देने के सुझाव के बाद ‘आय एम जोकिंग’ बोल भर देने से क्या सब सिर्फ मज़ाक की हद तक ही रह जाता है?

लन्दन में कहीं एक बहुत पैसे वाला बाप है बटुक पटेल [बोमन ईरानी] जिनका मानना है, “आदमी को सीधा होना चाहिए, उल्टा तो तारक मेहता का चश्मा भी है”. उसकी तीनों बेटियाँ [जैकलीन फर्नान्डीज़, नरगिस फाखरी, लीज़ा हेडन] भी कम नहीं. एक कहती है, “पापा, मैं बच्चा नहीं कर रही.” आपको लग रहा होगा, लड़की प्रेगनेंसी के खिलाफ है? जी नहीं, उसका मतलब है, “आय एम नॉट किडिंग”. बिहार बोर्ड की टॉपर रूबी राय का विडियो खासा वायरल हुआ है आजकल. फिल्म की पृष्ठभूमि लन्दन न होकर बिहार होती तो ये तीनों बड़ी आसानी से खप जातीं. बहरहाल, तीनों के बॉयफ्रेंड्स भी हैं [अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन, रितेश देशमुख] जो लड़कियों से कम, उनकी दौलत से ज्यादा प्यार करते हैं. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि तीनों को अँधा, गूंगा और अपाहिज़ बनने का नाटक करना पड़ता है. और फिर जो एक बार नाटक शुरू होता है, वो नाटक कम आपके दिल-ओ-दिमाग के साथ खिलवाड़ ज्यादा लगता है.

विकलांगों के प्रति बॉलीवुड पहले भी इस तरह की असंवेदनशीलता दिखा चुका है. दीपक तिजोरी की ‘टॉम, डिक एंड हैरी’ और इंदर कुमार की ‘प्यारे मोहन’ भूलने लायक ही फिल्में थीं. पर ‘हाउसफुल 3’ में फ़रहाद-साजिद सारी हदें लांघ जाते हैं. सस्ते मज़ाक के लिए घिसे-पिटे जोक्स का पूरा बोरा उड़ेल दिया है दोनों ने. हर किरदार जैसे कॉमनसेंस की स्पेल्लिंग भूल कर उल-जलूल हरकतें करने में लगा रहता है. अक्षय का किरदार स्प्लिट पर्सनालिटी डिसऑर्डर का शिकार है. ‘इंडियन’ शब्द सुनते ही उसके भीतर से एक और किरदार बाहर आने लगता है, पहले वाले से ज्यादा खूंखार. देश का जैसा माहौल है, ये एकदम फिट बैठता है. ‘भारत माता’ ‘गाय’ या ‘लता मंगेशकर और सचिन’ सुनते ही अकसर देश के लोगों में इस तरह के बदलाव आजकल खूब देखे जा रहे हैं. रितेश का किरदार शब्दों के चयन में हमेशा मात खा जाता है. ‘विरोध’ की जगह ‘निरोध’, ‘वाइफ’ की जगह ‘तवायफ़’, ‘खिलाड़ी’ की जगह ‘कबाड़ी’; इसलिए कोई हैरत नहीं अगर उसकी ‘कॉमेडी’ आपको ‘ट्रेजेडी’ लगे तो. अभिषेक का किरदार ‘बच्चन-परिवार’ के इर्द-गिर्द ही घूमता है. कभी बड़े बच्चन साब के पुतले के साथ सेल्फी, तो कभी बहू बच्चन [ऐश्वर्या] के पुतले के साथ रोमान्स!

फिल्म में अगर कुछ भी झेल जाने लायक है, तो वो है अक्षय का सब पर हावी हो जाने का अंदाज़. स्क्रिप्ट से बढ़कर सीन में कुछ न कुछ करते रहने का दुस्साहस ही उन्हें इस तरह की फिल्मों में कामयाब बनाता है. और दूसरा, फिल्म का ‘फ़ेक इश्क़’ गाना जिसमें तीनों नायकों को पैसे के पीछे भागना खलने लगता है और सच्चे प्यार का इमोशन हलके-हलके छू रहा होता है. एक यही वक़्त है फिल्म में जब हँसी हलकी-फुलकी ही सही, साफ़-सुथरी, उजली-उजली दिखती है. अंत में, अगर जैकलीन के किरदार के अंदाज़ में कहूं तो, “फ़रहाद-साजिद, जल्दी कुएं में जाओ (गेट वेल सून)!” और आप के लिए, “ठंडी दवाई लो (टेक अ चिल पिल)!...नहीं तो सरदर्द की गोली तो लेनी ही पड़ेगी! [1/5]    

Monday, 30 May 2016

वीरप्पन (A): बोर-प्पन, शोर-प्पन! [1.5/5]

(वीरप्पन देख चुके और देखने जाने वाले दो दर्शकों के बीच की बातचीत का एक अंश)

“सुना है, राम गोपाल वर्मा लौट आये हैं?”
“हाँ, भाई! लौट आये हैं.”
सत्या वाले?”
“कहाँ तुम भी...”
“...तो? कंपनी वाले?”
“मज़ाक न करो”
भूत वाले तो होंगे?”
“....(चुप)”
सरकार?....सरकार राज?”
“(झुंझला कर) अज्ञात वाले हैं. रक्त-चरित्र वाले हैं. आया समझ?”
“(आह भरते हुए)...चलो, आग वाले तो नहीं हैं ना!”

अगर आप भी सिर्फ इसी बात से तसल्ली कर लेने के लिए तैयार बैठे हैं कि चलो, राम गोपाल वर्मा वापस तो गए, ऐसे हाल में उनकी नयी फिल्म ‘वीरप्पन’ आपको ज्यादा निराश नहीं करेगी. आख़िरकार इसमें ऐसा कुछ अलग या अनोखा तो है नहीं, जो आपको झटका दे दे, चौंका दे. वही सब तो है जिसके लिए राम गोपाल वर्मा जाने जाते हैं और जिसके लिए आप उनके, उनकी फिल्मों के मुरीद हैं. किसी एक के कंधे से होते हुए दूसरे के चेहरे पे चढ़ता कैमरा, जिन्हें हम OTS (over the shoulder) शॉट पुकारते हैं, कानफाड़ू बैकग्राउंड म्यूजिक, एक्टिंग के नाम पर आड़े-तिरछे चेहरे बनाना और डायलॉग्स एकदम सतही-सपाट; रामू एक बार फिर अपने (उस) आप को दोहराने में सफल साबित होते हैं, जिसे हममें से कोई भी अब और बर्दाश्त करने के मूड में नहीं दिखता.

राम गोपाल वर्मा जिस शिद्दत से जुर्म की कालिख में लिपे-पुते चेहरों में अपने नायक ढूंढते रहते हैं, कुख्यात चन्दन तस्कर वीरप्पन ऐसा लगता है जैसे उन्हीं के लिए गढ़ा गया हो. एक ऐसा जीवंत किरदार जो खूंखार हो, वहशी हो, निर्मम हो और जिसका हिंसा के साथ एक पागलपन वाला रिश्ता हो, राम गोपाल वर्मा के लिए कोई और दूसरा इससे बेहतर ढूंढ पाना मुश्किल था. बेहतर होता, रामू इसे महज़ अपना ‘कमबैक’ न मान कर थोड़ा और महत्वाकांक्षी हो पाते. वीरप्पन की रोबदार मूंछों वाली छवि को परदे पर उतार भर लेने की कामयाबी से ही रामू इतने उत्साहित लगने लगते हैं कि उसके किरदार की बर्बरता को उकेरना भूल ही जाते हैं. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पूरी फिल्म में वीरप्पन के खौफ से ज्यादा गोलियों का शोर आपको अधिक विचलित करता है. अपने आपराधिक जीवनकाल में वीरप्पन ने तकरीबन सौ पुलिसवालों की हत्या की थी, राम गोपाल वर्मा फिल्म में इस गिनती का पीछा करते थकते नहीं, मानो वीरप्पन के वीरप्पन बनने में इसी एक अदद गिनती का हाथ रहा हो.

अभिनेता संदीप भारद्वाज का हूबहू वीरप्पन की तरह दिखना और लगना अगर वीरप्पन फिल्म का सबसे कामयाब पहलू है, तो सचिन जोशी [पुलिस वाले की भूमिका में] का ठंडा अभिनय सबसे कमज़ोर. उसके ऊपर पूरी फिल्म में उन्हीं की आवाज़ के साथ कहानी का आगे बढ़ना; आप को पता चल गया होगा असली मुजरिम कौन है? वैसे फिल्म अगर कहीं आपको सचमुच बाँधने की कोशिश करती है तो वो है वीरप्पन की पत्नी लक्ष्मी का ट्रैक. स्पेशल टास्क फ़ोर्स अपने ही एक अधिकारी की विधवा पत्नी [लीज़ा रे] को लक्ष्मी [उषा जाधव] के करीब ले जाती है, जहां पूरी कहानी दोनों के इर्द-गिर्द घूमने लगती है. यहाँ भी उषा जाधव तो अपने अभिनय में सधी और संपन्न नज़र आती हैं, पर लीज़ा के लिए अभी भी अभिनय उतना ही मुश्किल लगता है जितना उनका साफ़ तरह से हिंदी बोल पाना. वो नर्गिस फाखरी की याद दिलाती हैं, अजीब अजीब तरह के चेहरे बनाती हैं, जैसे वो किसी फिल्म का नहीं, बालाजी टेलीफिल्म्स के सास-बहू सीरियल्स का एक ऐसा किरदार हों जो बैकग्राउंड में बोलना ज्यादा पसंद करता हो और बात-बात पर गर्दन टेढ़ी करके आँखें छोटी-बड़ी करता रहता हो.

आखिर में सिर्फ इतना ही, राम गोपाल वर्मा की वीरप्पन शोर बहुत करती है, कहती बहुत कम. रामू अगर बॉलीवुड में इसे अपनी वापसी का जरिया मान रहे हों, तो मैं कहूँगा आपको अभी भी कुछ दिन और एकांतवास में रहना चाहिए. मेरा इंतज़ार अभी ख़तम नहीं हुआ. “मेरे राम गोपाल वर्मा आयेंगे! ज़रूर आयेंगे!!” कब? पूछिए मत! [1.5/5] 

Friday, 13 May 2016

अज़हर: वन्स अपॉन अ टाइम इन क्रिकेट [1/5]

शुरुआत में ही, अपने तीन पैराग्राफ लम्बे बयान [Disclaimer] के साथ ‘अज़हर’ विवादों से बचने और कुछ बहुत जरूरी सवालों से मीलों दूर रहने की समझदार कोशिश में दर्शकों पर इतनी शर्तें लाद देती है कि कहना मुश्किल हो जाता है, आप एक जीते-जागते शख्सियत पर बनी एक ईमानदार फिल्म देखने जा रहे हैं या फिर एक पूरी तरह मनगढ़ंत कहानी. फिल्म की विश्वसनीयता, नीयत और सूरत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि अगर इसका नाम ‘अज़हर’ न होकर ‘जन्नत 3’ या ‘वन्स अपॉन टाइम इन क्रिकेट’ भी होता, तो भी फिल्म की सीरत में कोई बड़ा बदलाव नहीं दिखता. आखिर में रहती तो ये इमरान हाशमी की ही फिल्म. आगे बढ़ने से पहले एक Disclaimer मैं भी पढ़ देना चाहता हूं, “आगे की पंक्तियों में ‘अज़हर’ शब्द का इस्तेमाल सिर्फ और सिर्फ फिल्म के शीर्षक और फिल्म के मुख्य किरदार के लिए किया जा रहा है. इसका किसी भी मशहूर क्रिकेटर या पूर्व सांसद से कोई लेना देना नहीं है.” लीजिये, अब मैं भी फिल्म की राह पर पूरी तरह स्वच्छंद और स्वतंत्र हूँ, कुछ भी उल-जलूल लिखने-कहने के लिए!

99वें टेस्ट मैच में शानदार प्रदर्शन के बाद, अज़हर [इमरान हाशमी] अब अपने नानूजान [कुलभूषण खरबंदा] के सपने से सिर्फ एक मैच और दूर है, जब उसे मैच-फिक्सिंग के इल्ज़ाम में क्रिकेट खेलने से बैन कर दिया जाता है. इस फिल्म वाले अज़हर को भारतीय क्रिकेट टीम के सबसे कामयाब कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन के रूप में देखने की गलती करने की आपको पूरी छूट है, हालाँकि मुझे ये दोनों [परदे का अज़हर और असलियत के अज़हरुद्दीन] वो दो जुड़वाँ भाई लगते हैं जिनका आपस में कुछ भी मिलता नहीं. न शकल, न हाव-भाव! 

हाँ, फिल्म की कुछ घटनाएं और किरदार जरूर आपको इस भूल-भुलैय्ये में उलझाये रखते हैं कि आप एक सच्ची कहानी देख रहे हैं. मसलन, अज़हर के साथ ड्रेसिंग रूम शेयर करते मनोज प्रभाकर [करणवीर शर्मा], नवजोत सिंह सिद्धू [मंजोत सिंह], रवि शास्त्री [गौतम गुलाटी], कपिल देव [वरुण वडोला] और अज़हर की जिंदगी में खासा दखल रखने वाली 90 के दशक की खूबसूरत बॉलीवुड एक्ट्रेस संगीता बिजलानी [नरगिस फाखरी]. इन सबमें अगर कोई अपने किरदार के बहुत करीब तक पहुँच पाने में कामयाब हुआ है तो वो हैं सिर्फ नरगिस. उनका और संगीता बिजलानी दोनों का ही एक्टिंग से कभी कोई सरोकार रहा नहीं.  

हालाँकि ‘अज़हर’ सनसनीखेज बने रहने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देती, पर दिक्कत वहां मुंह बाये खड़ी हो जाती है जब फिल्म ईमानदारी से कहानी कहने की बजाय अज़हर को ‘हीरो’, ‘बेक़सूर’ और ‘बेचारा’ बनाने और बताने की जी-तोड़ कोशिश आप पर थोपने लगती है. रोमांच और रोमांस का तड़का जिस सस्ते, हलके और ठन्डे तरीके से फिल्म में परोसा जाता है, आप मोहम्मद अज़हरुद्दीन [फिल्म वाला नहीं, असली वाला] से सिर्फ हमदर्दी ही जता पाते हैं. ‘देश’, ‘मुल्क’ और ‘कौम’ जैसे भारी-भरकम शब्दों के बार-बार खोखले इस्तेमाल से अगर आप बच भी जाएँ, तो ‘सच ये, सच वो’ का जुमला आपका दम घोंटने के लिए काफी है. रजत अरोरा के दोयम दर्जे के संवाद सिर्फ शब्दों की हेरा-फेरी तक ही अपना जादू चला पाते हैं. उनके मायने ढूँढने की गलती कीजियेगा भी मत.

अज़हर’ एक निहायत ही डरपोक किस्म की नाकाबिल फिल्म है जो सिर्फ उन बातों को चुनती है, जिनके कहने-सुनने में किसी तरह का कोई अन्तर्विरोध पैदा न हो. एक बहुत ही हलकी फिल्म जो अपने ‘हीरो’ के साथ कहीं से भी कोई न्याय नहीं करती! फिल्म में बुकी से पैसे लेकर भी अच्छा खेल जाने पर अज़हर की सफाई सुनिए, “मैंने पैसे रख लिए ताकि तुम किसी और खिलाड़ी तक पहुँच न सको...तुम्हारे पैसे वापस भिजवा रहा हूँ’. अब अपनी कहानी में तो सब खुद ही हीरो होते हैं, इसमें नया क्या है? बस्स, इस कहानी में दम नहीं! [1/5]                

Friday, 25 July 2014

KICK: Have faith in God aka Salman & you might enjoy him taking you for a ride! [2/5]

Many describe most of the mass-entertainers a ‘paisa-vasool’ film. I really want to know what this reckless term is all about. Does a ‘dhaansu’ entry of the hero pay you back a 50 rupee note? How much a Nargis Fakhri item number is worth of, accordingly? And how to evaluate all those silly fight sequences and an emotional backup to the story to justify all the ridiculous actions our hero does?? I am still trying to locate my ‘paisa’ spent on Sajid Nadiadwala’s KICK in my wallet, if it’s come back! No, it’s not there yet! My ‘Paisa’ is not ‘Vasool-ed’.

Getting into direction with a Salman Khan film is one of the wisest decisions Sajid would ever have made. The man who knows it all [Sajid being the most celebrated Film producer] meets the man who does it all [Salman is known for that] and the outcome is all set to break records on box-office but not without testing your patience and questioning your intelligence. The man in question here is nothing but God to his fans. Everything he does on screen robotically becomes believable and justifiable. Otherwise, who would have the guts to propose a name like ‘Devi’ to a character played by Salman Khan? (No offence to women out there!)

So, he’s a good-hearted guy who endorses alcohol ferociously and gets offended by the idea of being a ‘Ghar Jamai’ though he has nothing to be proud of except, of course a good ‘being human’ heart. Wow, how manly he is! Only thing he seeks from life is a kind of adrenalin rush and he can really go far for that. Even stealing from the riches becomes one of the mediums to achieve one such kick. Reminds of DHOOM 3? Why not, it is a distant cousin to that in many aspects. Replacing one accented leading lady with the other irksome victim of same disorder could be one.

KICK also suffers from a bunch of ironies. One that leaves you in splits is when Devi [the Salman Khan] is repeatedly called a ‘headache’, ‘torture’ and ‘unjhelable’ by none other than his girlfriend. Was she referring to the film? I hope so. In one of the last scenes, Salman is seen dancing on ‘Saat Samundar Paar’ from VISHWATMA. This is undeniably the sweetest and cutest tribute to Divya Bharti from his husband Sajid but the irony doesn’t find a place to hide that the yesteryear actress’s suspicious death has drinking habits as allegedly one of the main causes and this whole sequence encourages drinking like there’s no one watching. Awful! 

On the performance meter, it’s Randeep Hooda who brings in the most controlled performance. For making himself confidently able to stand against someone like Salman in a film designed for Salman, Hooda deserves it. The most annoying of the lot is Nawazuddin Siddiqui. His weirdly wicked act of a villainous laugh is so old-fashioned and maddening to hear one after another. As for as Salman is concerned, he is hardly concerned about it! As a true ardent fan, we should not look for logics in whatever he does like after so much criminal cases against him, he’s seen wearing a police uniform at the end; to make it loud and clear that, “Do not try understanding me!” Well, I dare not! And you better not if going for it! [2/5] 

Monday, 26 August 2013

MADRAS CAFÉ: Flawed but undoubtedly the finest political thriller Bollywood has come up with [3.5/5]

Imagine a war thriller where you already can sense what is going to happen but still it manages to make you question your understandings that either it might not happen this way or if it must, how the proceedings will fit into place. Shoojit Sircar’s MADRAS CAFÉ is one such intriguingly intense, aptly intelligent, flawed but finest political thriller in recent.

Positioned in the time-zone of mid 80’s & early 90’s, when our neighboring country Sri Lanka was going through its toughest episode of heavily brutal & deeply inhuman civil war, MADRAS CAFÉ digs into the past to expose an untold political conspiracy behind our prime-minister’s assassination. Now the best part is, it is a fictional documentation but wrapped cleverly in a series of historic facts that it looks more promising than any other war-dramas based on real life events. West has been doing it since ages, thanks to their liberal environment of freedom to create but in a country like India where extremist-groups are much more in numbers than the unwanted mushrooms in your backyard in monsoons, coming with such a debatable product needs sheer amount of guts.

In his first ‘YAHAAN’, Shoojit Sircar has impressed most of us with a textured romance in the backdrop of militancy and army rule in Kashmir. Here the backdrop is set in Jaffna- the point of action for LTF headed by Anna [reference to LTTE chief Prabhakaran] and Indian force working for peace. John Abraham plays Vikram- an R&AW agent on a secret mission to knock down the open-ended territory of Anna. Meanwhile, the traces of treason take the organization and the mission for granted and in order to repair it, with the help of a committed British journalist [played by Nargis Fakhri], Vikram intercepts the covert plot to assassin our prime minister [reference to Mr. Rajiv Gandhi].

Film’s strongest point is the ‘real people on real locations’ feel, at least for the most of it. Sircar sets a perfect atmospheric war-scene with chilling visuals captured beautifully by Kamaljeet Negi. Also, be ready to witness the most surprising casting in Bollywood ever. Siddhrath Basu as the R&AW chief is the most impressive. There is not a single moment where you doubt his ability to act. Then, there is the ad-man Piyush Pandey as the effortlessly straightforward cabinet secretary and Dibang- the most consistent news anchor on NDTV in the most delightful cameo I have seen in Bollywood.

Having said that, I won’t deny the fact that MADRAS CAFÉ is far from a flawless effort. Story is impeccably fascinating. Dialogues are as colloquial as it could be. But the narrative and the screenplay have more than one loose end. First part is filled with voice-overs and runs like a bullet train to capture and clear the political picture before setting the premise for the finale ‘pressure cooker situation’ where assassination supposes to end it all. Scenes come with a fade-in/fade-out manner only to give it a disengaged lengthy montage kind of feel. Some of the vital information [the madras café conversation between LTF representative, Indian bureaucrat and foreign beneficiary] is being thrown to you repeatedly without much addition until the very last.

Despite all this, the 2 hour 10 min of MADRAS CAFÉ is worth all your money spent on tickets and popcorn. This is a flawed but undoubtedly the finest political thriller Bollywood has come up with. The war-scenes and the bone-chilling explosion scene of Indian prime-minister’s assassination in the climax alone will leave you contented. [3.5/5]