Showing posts with label vijayraj. Show all posts
Showing posts with label vijayraj. Show all posts

Friday, 28 September 2018

पटाखा: चटख किरदार, विस्फ़ोटक अभिनय! [4/5]


सारे रिश्ते हर वक़्त लगाव की चाशनी में डूबे रहें, नहीं होता. सारे रिश्ते हमेशा ही नफरतों की आग में भुनते रहें, ये भी नहीं होता, पर कुछ एकदम अलग से होते हैं. चंपा (राधिका मदान) और गेंदा (सान्या मल्होत्रा) के रिश्ते जैसे. नाम फूलों के, पर अंदाज़ काँटों से भी तीखे, जहर बुझे और नुकीले. जनम से सगी बहनें, लेकिन करम से एक-दूसरे की कट्टर दुश्मन. भारत-पाकिस्तान जैसे. एक को भिन्डी बेहद पसंद हैं, तो दूसरी भिन्डी का नाम सुनकर ही इस कदर बौखला जाती है कि किसी का खून तक कर दे. एक का सपना ही है अपना खुद का डेरी फार्म खोलना, तो दूसरी को दूध देख के ही मितली आने लगती है. ‘मुक्का-लात ही जिनके लिए मुलाक़ात का बहाना है, और अजीब-ओ-ग़रीब गालियों का सुन्दर प्रयोग आपस की बातचीत का ज्यादातर हिस्सा. आम रिश्तों में जहां प्यार, दुलार और अपनापन जैसे नर्म, नाजुक इमोशन्स अपनी जगह बना रहे होते हैं, यहाँ गेंदा और चम्पा के बीच गुस्सा, जलन, नफरत हावी है. दोनों एक-दूसरे को फूटी आँख नहीं सुहातीं, और कभी-कभी तो लगता है कि एक-दूसरे को नीचा दिखाने की जिद में ही अपने किरदारों की पसंद-नापसंद, सपने-उम्मीदें गढ़ती रहती हैं.

विशाल भारद्वाज की ‘पटाखा अपनी गंवई पृष्ठभूमि, रोचक किरदारों और उनके बीच घटने वाली मजेदार घटनाओं के साथ हिंदी कहानी की चिर-परिचित शैली को परदे पर उकेरने की एक बेहद सफल कोशिश है. विशाल इससे पहले शेक्सपियर और रस्किन बॉन्ड के साहित्य को सिनेमाई रूप दे चुके हैं. इस बार भी, जब वो दर्शकों के लिये चरण सिंह पथिक की एक छोटी कहानी ‘दो बहनें’ को चुनते हैं, मनोरंजन की कसौटी पर कोई चूक नहीं करते. पथिक की कलम हमें राजस्थान के एक छोटे से गाँव का हिस्सा बना रख छोड़ती है, जहां रंग-रंगीले किरदार बड़ी बेपरवाही और घोर ईमानदारी से अपने खालिस ज़ज्बातों की पूरे शोर-शराबे के साथ बयानबाज़ी करते हैं. विशाल बेशक इसे नाटकीय और भरपूर मनोरंजक बनाने में बखूबी अपना योगदान देते हैं. बेटियों को बीड़ी न फूंकने की सलाह देते हुए बापू (विजय राज) कहता है, “बापखाणियों की! बच्चेदानी झुलस जावेगी, बाँझ बन के रह जाओगी. कौन करेगो ब्याह?’’ गेंदा के पास अलग सवाल है, “पड़ोस की ताई ने तो खो-खो की टीम जन दी, 5 साल की थी, तब से फूंके हैं बीड़ी. वो तो न हुई बाँझ”. लड़ाई सिर्फ जबान तक नहीं रहती, चम्पा और गेंदा जब एक-दूसरे का झोंटा पकड़-पकड़ के लड़ती हैं, पूरा गाँव देखता है और वो ये तक नहीं देखतीं कि बीच-बचाव कराने आया उनका बापू भी धक्के से गिरकर गोबर में लोट रहा है.

‘पटाखा अपने आप में एक अलग ही दुनिया है. यहाँ शादियों के फैसले पत्थर को टॉस की तरह उछाल कर किये जाते हैं. थूक से गीला हिस्सा आने पर बड़की का ब्याह, सूखा आया तो छोटकी का. गाँव के रंडवे पटेल की बहू नेपाली है, दाम देकर ब्याही गयी है. गालियों, गंदगियों और मार-पीट, लड़ाई-झगड़े से भरी एक ऐसी दुनिया, जो सुनने में काली भले ही लग रही हो. देखने में एकदम रंगीन है. ईस्टमैन कलर जितनी रंगीन. ऐसी दुनिया, जिसमें जाने से आपको कोई गुरेज न हो. इसका काफी सारा क्रेडिट किरदारों में हद साफगोई और उन किरदारों में जान फूंकते कुछ दिलचस्प, काबिल अदाकारों के अभिनय को जाता है. गेंदा के किरदार में जब सान्या पागलों की तरह परदे पर उछलती हैं, ‘दंगल’ वाले अक्खड़, पर बंधे-बंधे से किरदार की खाल भी टूट कर चकनाचूर हो जाती है. फिल्म के दूसरे हिस्से में शादीशुदा गेंदा तो और भी ज्यादा प्रभावित करती है, खासकर अपने डील-डौल और हाव-भाव में संजीदगी ले आकर. राधिका मदान चम्पा के किरदार में जिस बेपरवाही से घुसती हैं, परदे पर किसी विस्फ़ोट से कम अनुभव नहीं होता उन्हें देखना. दागदार दांतों से निचला ओंठ दबाते, उनकी शरारती आँखों की चमक देर तक याद रह जाती है. न थमने-न रुकने वाली शुरूआती लड़ाईयों से लेकर आखिर में ह्रदय-द्रवित कर देने वाले उलाहनों और तानों के मार्मिक दृश्य तक, दोनों का पागलपन एक-दूसरे को टक्कर भी देता है, और एक-दूसरे का पूरा साथ भी.

‘पटाखा में सुनील ग्रोवर भी खासे चौंकाते हैं. एक तरह फिल्म के सूत्रधार भी वही हैं. नारद मुनि की तरह बीच-बीच में आते हैं और फिल्म को एक नया रुख देकर निकल लेते हैं. दोनों बहनों के साथ उनका रिश्ता अनाम ही है, पर शायद सबसे ज्यादा करीबी. दोनों जब लड़ती हैं, तो टिन का डब्बा पीट-पीट कर नाचता है, जब शांत रहती हैं तो लड़ने के लिए उकसाता है. फिल्म के होने की वजह में इस ‘डिपर’ का होना भी उतना ही ख़ास है, जितना चंपा-गेंदा का. परेशान पिता की भूमिका में विजयराज सटीक हैं. यह भूमिका निश्चित तौर पर उनकी सबसे जटिल है. अपने हाव-भाव में विजयराज इस बार अपनी उस जानी-पहचानी, लोकप्रिय छवि से भी दूर रहने की कोशिश करते हैं, जहां उनके अभिनय में रस अक्सर उनके हाज़िर-जवाब, लच्छेदार संवादों का मोहताज़ रहती है.

आखिर में, ‘पटाखा किसी हज़ार-दस हज़ार की लड़ी जितनी ही मजेदार है. एक बार फटनी शुरू होती है, तो ख़तम होने का नाम ही नहीं लेती. हालाँकि कभी कभी दिक्कत का सबब भी वही बन जाती है. विशाल अक्सर बीच-बीच में ट्रम्प-मोदी, भारत-पाकिस्तान, इजराईल-फ़िलिस्तीन जैसे रूपकों के साथ, राजनीतिक व्यंग्य और राष्ट्रीय सरोकार के प्रति अपना प्रेम दर्शाते रहते हैं, लेकिन मैं इसे सीधे-सादे तौर पर ‘एक अजीब से रिश्ते की एक गज़ब ज़ज्बाती कहानी’ ही मान कर देखना पसंद करूंगा, जहां कहानी का चरमोत्कर्ष आपका दिल भर दे, और आँखें नम कर दे. [4/5]                  

Friday, 29 July 2016

ढिशूम: बेमतलब है, पर वाहियात नहीं! [2/5]

रोहित धवन की ‘ढिशूम’ बिलकुल अपने नाम की तरह ही है, बेमतलब. ढिशूम को सालों-साल पहले हिंदी फिल्मों में मार-धाड़ के दृश्यों में मुक्के और घूंसों की आवाज़ के तौर पर इस्तेमाल किया जाता था, वो भी डबिंग के वक़्त मुंह से बोल कर. आज अगर उन दृश्यों को आप देखें तो शायद उस वक़्त की तकनीकी कमियों पर हंस भी पड़ें, पर उस जमाने के दर्शकों पर उसके प्रभाव को नज़रअंदाज़ करना आपके बस में नहीं. खैर, सिंक-साउंड और रीयलिस्टिक सिनेमा के दौर में धीरे-धीरे इस लफ्ज़-ऐ-इज़हार में वो प्रभाव, वो असर अब रहा नहीं. ऐसी ही कुछ तबियत, रंगत और सीरत ‘ढिशूम’ फिल्म की भी है. हाँ, एक बात तारीफ के काबिल ज़रूर है...’ढिशूम’ बेमतलब और बेअसर की होने के बावजूद आपको दूसरी वाहियात फिल्मों की तरह परेशान बिलकुल नहीं करती. सच्चाई तो ये है कि ये फिल्म अपने आपको भी कभी सीरियसली नहीं लेती. नतीजा ये होता है कि पूरी फिल्म आपकी आँखों के आगे से यूँ निकल जाती है और आप उस पर रियेक्ट करने की जेहमत ही नहीं उठाते!

मिडिल-ईस्ट में कहीं किसी जगह, भारत-पाकिस्तान के फाइनल क्रिकेट मैच से ठीक पहले भारतीय टीम के धुआंधार बल्लेबाज विराज शर्मा [साकिब सलीम] को किसी ने अगवा कर लिया है. भारत ने स्पेशल टास्क फ़ोर्स के अपने सबसे काबिल ऑफिसर कबीर [जॉन अब्राहम] को अगली ही फ्लाइट से वहाँ के लिये रवाना कर दिया है. कबीर की मदद के लिए वहां है जुनैद [वरुण धवन], अपनी छिछोरी, बेवकूफ़ाना और हंसोड़ हरकतों के साथ. गुस्सैल-अकड़ू कबीर और मजाकिया जुनैद की ये जोड़ी बॉलीवुड के लिए कोई नई नहीं है. दिमाग पर ज़ोर डालिए और इस तरह की ‘एक अनाड़ी-एक खिलाड़ी’ मर्द जोड़ियों के जो भी नाम आपको याद आयेंगे, यकीन मानिए कबीर और जुनैद उन सब से ही निकलते मिलेंगे, उन सब जैसे ही दिखते मिलेंगे.

जैकलीन फर्नान्डीज़ फिल्म में शौकिया चोर की भूमिका में हैं जिसकी अपनी एक दर्द भरी कहानी है, जो करन अंशुमन की ‘बैंगिस्तान’ में उनके किरदार की कहानी से इतनी मिलती-जुलती है मानो जैकलीन सीधा उसी फिल्म के सेट से इस फिल्म में आ गिरी हों. और इन सब के बीच अक्षय खन्ना का वापस फ़िल्मी परदे पर आना! मेहमान भूमिकाएं हों, खूबसूरत लोकेशंस हों या एक्शन, रोहित धवन एक मौका नहीं छोड़ते, आपका ताबड़तोड़ मनोरंजन करने की कोशिश में. एक के बाद एक वो अपने पत्ते कुछ इतनी जल्दी में फेंकते हैं कि आपको दिमाग लगाने की जरूरत ही नहीं पड़ती. गैर-मुल्कों में कैसे सभी लोग इतनी अच्छी हिंदी बोलते-समझते हैं? ये गलती तो बॉलीवुड में अब गलती मानी ही नहीं जाती, पर दुश्मन के अड्डे से बच के निकलना हो, किडनैपिंग के केस में एक लीड से दूसरी लीड तक पहुंचना हो या फिल्म के सबसे बड़े विलेन को पकड़ने में एक कुत्ते की भूमिका; फिल्म के लेखक भी कहानी लिखने में दिमाग का इस्तेमाल करने से बचते रहे हैं. बड़ी बात ये है कि इसके लिए भी उन्हें काफी मोटी रकम पेश हुई होगी.

अभिनय में किसी को भी अच्छा कहना थोड़ा विवादास्पद हो सकता है, और हास्यास्पद भी. जॉन अब्राहम के डोलों की साइज़ में भले ही इज़ाफा हुआ हो, उनकी एक्टिंग में धागे भर की भी तरक्की नहीं दिखती. जैकलीन में जितनी चाभी भरिये, उतनी ही देर तक चलती हैं. हाँ, वरुण आपको अपने भोले-भाले-साफ़ दिल चेहरे से अच्छा-खासा बहलाए रखते हैं. अक्षय खन्ना अभी पूरी तरह वापस नहीं आये हैं, एक-दो फिल्में और लगेंगी. विराट कोहली के इर्द-गिर्द बुने गए किरदार में साकिब सलीम और सुषमा स्वराज जैसी दिखने-लगने-बोलने वाली केन्द्रीय मंत्री की भूमिका में मोना अम्बेगांवकर फिल्म की सबसे मज़बूत कास्टिंग हैं. अक्षय कुमार, सतीश कौशिक और नरगिस फाखरी अपनी-अपनी मेहमान भूमिकाओं में ठीक-ठाक हैं.

आखिर में, रोहित धवन की ‘ढिशूम’ उन पलों में ज्यादा कारगर साबित होती है, जहां रोहित अपने पिता डेविड धवन मार्का एंटरटेनमेंट की झलकियाँ पेश करते हैं. सतीश कौशिक, विजयराज और वरुण के किरदार डेविड धवन की ‘हार्मलेस’ कॉमेडी फिल्मों के आड़े-टेढ़े किरदारों की ही याद दिलाते हैं. अफसोस, ऐसे मजाकिया पल फिल्म में बस गिनती के ही हैं और ज्यादातर वक़्त फिल्म सिर्फ अपना ही मज़ाक बनाने में गुमसुम रहती है. देखिये, अगर आप उन चंद ख़ास ‘गिफ्टेड’ लोगों में से हैं जो अपना दिमाग हर जगह लेकर नहीं जाते! [2/5]   

Friday, 2 May 2014

क्या दिल्ली क्या लाहौर : मंज़िल से पहले दम तोड़ती एक ईमानदार कोशिश…[2.5/5]

"पड़ोसी मुल्क भी रहें पड़ोसियों से, तो क़्या अच्छा हो!
हँसे भी तो जी भर के, रोयें भी तो गले लग के!!"

भारत-पाकिस्तान बंटवारे की त्रासदी को जाने कितनी ही हिंदी फिल्मों ने अपने-अपने नजरिये से देखने-समझने की कोशिश की है, कमोबेश सबका एक ही हासिल रहा है, "सरहदें जमीन पे खिंचीं लकीरें भर हैँ, आर-पार के बाशिंदों में फ़र्क धागे भर का भी नहीं"! जाने-माने अभिनेता विजयराज निर्देशित 'क्या दिल्ली क्या लाहौर' भी इसी खयाल को और गाढ़ा, और मज़बूत करती है। हालाँकि महीन जज्बातों और जहींन किरदारों के साथ यह फ़िल्म एक अलग तस्वीर खेंचने में क़ामयाब साबित होती है, पर कहानी का हलकापन और किरदारों का एक हद के बाद बेरंग होते जाना फ़िल्म की क़ाबलियत के दायरे को उसके मुकाम तक पहुंचने नहीं देता। 

गुलज़ार साब की, उन्हीं की रूहानी आवाज़ में एक नज़्म से शुरु होती 'क्या दिल्ली क्या लाहौर' आपको 1948 में कहीं भारत-पाकिस्तान की किसी सरहद पर ला छोड़ती है, जहाँ कहने को तो सिर्फ़ दो ही किरदार हैं.…हिन्दुस्तानी फ़ौज़ का एक खानसामा [मनु ऋषि] और पाकिस्तानी आर्मी का एक अदना सा सिपाही [विजय राज], पर बातें-आहें-शिकायतें दोनों मुल्कों में बसे हरेक इन्सान से इत्तेफाक़ रखतीं हैं। मज़े की बात ये भी है कि दोनों बंटवारे से पहले एक दूसरे के पाले से ताल्लुक रखते थे, तो जहां हिंदुस्तानी सिपाही के लहज़े में उर्दू-पंजाबी की मिलावट साफ़ सुनाई पड़ती है, पाकिस्तानी फ़ौज़ी खड़ी बोली का मुरीद पता चलता है। दोनों के हालात भी अनजान नहीं हैं एक-दूसरे से, पर जब सियासत इंसानियत पर हावी होती है, दोनों एक दूसरे पर गोलियां बरसाने से भी चूकते नहीं।

किरदारों का सीधापन, बातों में साफ़गोई और उनका खुरदुरा लहज़ा-अख्खड़ रवैया अगर 'क्या दिल्ली क्या लाहौर' को एक मज़ाकिया रंग देते हैं तो उनके हालातों से चोट खाये दिल गहरा असर भी रखते हैं। एक बानगी देखिये, " हमारी छत का चाँद लगता था खाट पे ही आ गिरेगा, यहॉँ का चाँद तो मुंह भी नहीं लगाता"! खांटी हिंदुस्तानी बोली हालांकि कहीं-कहीं ज्यादा हो जाती है और किरदार भी अपने आप को बार-बार दोहराते नज़र आते हैं, असल तकलीफ तब होती है जब कहानी जरूरत से ज्यादा खिंचने लगती है और आखिर तक आते-आते आप उन तमाम मसअलों और जज़्बातों से खुद को कटा कटा पाते हैँ, जिनका ज़िक्र और फ़िक्र फ़िल्म के पहले हिस्से में सुझाई देता है।फिल्म अक्सर सिनेमा के पर्दे पर थिएटर की क़िसी पेशकश का एहसास कराने लगती है तो मुमकिन है, सिर्फ 1 घंटे 48 मिनट की इस 'जंग की मुख़ालफ़त करने वाली' फिल्म में कई बार आप खुद उबाहट से ज़ंग लड़ते दिखें! 

विजयराज और मनु ऋषि जैसे नाम किसी तारीफ़ का मोहताज़ नहीं है! दोनों छोटी से छोटी भूमिका में भी आप को निराश नहीं करते, यहॉँ तो फिर भी पूरी की पूरी फ़िल्म उनके कंधों पर दौड़ती है। कुल मिला कर, 'क्या दिल्ली क्या लाहौर' एक ऐसी ईमानदार, नेकदिल कोशिश है जो और भी अच्छी, और भी बेहतर हो सकती थी! [2.5/5]

Friday, 10 January 2014

डेढ़ इश्क़िया: मिज़ाज कातिलाना, अंदाज़ शायराना! उम्दा!! [4/5]

फिल्म के एक अहम सीन में, जब दबंग विधायक जाँ मुहम्मद [विजयराज अपने निहायत ही जाने-पहचाने अंदाज़ में], जिन्हें नवाब बनना-दिखना-लगना-कहलाना पसंद है, और उसके गुर्गों का सामना खालू [नसीरूद्दीन शाह] और बब्बन [अरशद वारसी] से होता है...दोनों ही गुट एक दूसरे को पिस्तौल के निशाने पर रख लेते हैं! मुश्किल ये है की अब पिस्तौल पहले कौन हटाये? इसी पेशोपेश में सुबह हो जाती है! अगर आप समझ पायें कि कहानी लख़नऊ के आस-पास की है, जहाँ की तहज़ीब और तमीज़ 'पहले आप-पहले आप' में रची-बसी है तो बहुत मुश्किल नहीं है अभिषेक चौबे की लज्ज़तदार कॉमेडी थ्रिलर 'डेढ़ इश्क़िया' का लुत्फ़ उठाना!

'डेढ़ इश्क़िया' उन चंद फिल्मों में से है जिसकी ख़ूबसूरती जिस शिद्दत से कलम से निकलती है, उसी बख़ूबी पर्दे पे भी रंग लाती है! फ़िल्म आपको एक ऐसी दुनिया में ले जाती है जहाँ के मिज़ाज कातिलाना, किरदार गुस्ताख़ और तबियत शायराना है। उर्दू महज़ लफ़्ज़ों तक नहीं रुकती, हवाओं और फिज़ाओं में रूह की तरह बेपरवाह बहती है। पिछली बार ऐसा कुछ तेवर आपने तिगमांशु धुलिया की 'साहब बीवी और गैंगस्टर' में महसूस किया होगा। सुनकर या पढ़कर अगर आपको लग रहा हो, ये एक बीते दौर की पुरानी फ़िल्म है तो आप एक बार फिर गलत हैं। अभिषेक चौबे जिस तरह फ़िल्म को एक अलग अंदाज़ से अपने बिंदास ह्यूमर और बेबाक किरदारों के साथ परोसते हैं, फ़िल्म आपको ना सिर्फ बाँधे रखती है नयेपन का भी पूरा एहसास कराती है! 

खालू [नसीर साब] पे अब उमर असर दिखाने लगी है पर जवान दिल के साथ वो अभी भी महमूदाबाद रियासत की बेगम पारा [बेइंतिहाई खूबसूरत माधुरी] का शायराना शौहर बनने की होड़ से खुद को पीछे नहीं रख पाता! ऐसे ही एक और नकली नवाब हैं विजयराज जो एक क़ैद शायर [मनोज पाहवा] की मदद से बेगम के दिल और रियासत दोनों पर काबिज़ होना चाहते हैं। जल्दी ही ये सारी कवायद परत-दर-परत साज़िशों और किरदारों के बदलते अक्स का नमूना बन जाती है...और फिर शुरू होता ही दौर, दिलचस्प हादसों का जिनकी भनक आपको कतई नहीं लगती! खुराफाती बब्बन [अरशद] और बेगम की हमराज़ मुनिया [हुमा कुरैशी] भी इस सारी जद्द-ओ-जेहद का हिस्सा हैं।

फिल्म की जान सिर्फ कहानी ही नहीं है, विशाल भारद्वाज के मजेदार डायलॉग- बशीर बद्र साब की शायरी- खूबसूरत सिनिमेटोग्रफी और किरदारों का शानदार अभिनय फिल्म को एक अलग मुकाम पर ले जाता है। जहाँ एक-एक फ्रेम आपको दीवार पे सजी तस्वीरों का गुमान कराती है, किरदारों के ज़बानी इज़हार चेहरे पे मुस्कुराहट बिखेर देते हैं, वहीं फिल्म का स्क्रीनप्ले बहुत ही संजीदा तरीके से आपको उस मौहाल के एकदम करीब ले जाता है। बेगम के कमरे में बजता ग्रामोफ़ोन, उस पर बेगम अख्तर की ठुमरी 'हमरी अटरिया पे आओ जी', शायराना जलसे में मशहूर शायर नवाज़ देवबंदी की मौजूदगी...यहाँ कुछ भी बेढंगा, बेवजह नहीं है! फिल्म के आखिर में, बेगम अख्तर की ग़ज़ल 'वो जो हम में तुम में करार था' और उस पे फिल्माया गया शूटआउट सीन लाजवाब है. इस तरह का तजुर्बा हमें अक्सर टोरंटीनो की फिल्मों में देखने को मिलता है।

आखिर में सिर्फ इतना ही, 'डेढ़ इश्क़िया' 'इश्क़िया' जितनी मजेदार या मज़ाकिया भले ही ना हो, सूरत और सीरत में उस से कहीं बेहतर फिल्म है। काफी वक़्त बाद, एक ऐसी हिंदुस्तानी फिल्म जिसमें उर्दू को एक वाजिब तवज़्ज़ो अता की गयी है। समझ में आती हो तो बेशक़ देखनी चाहिये, नहीं आती हो फिर भी देखिये! [४/५]  

Saturday, 4 January 2014

MR JOE B. CARVALHO: ‘Errors in comedy’ & a case-history in the ‘worsts’ section of Bollywood [0.5/5]

Playing a detective, when Arshad Warsi comes to take the brief of a ‘runaway daughter’ case from Shakti Kapoor playing the father, Warsi investigates if he has any clue where his daughter could be. And you really can’t hold yourself bursting into giggles when Shakti Kapoor gives him an absolutely definite & detailed address in reply. This is a good example of black-humour and most importantly, it is one of those few gags that really come out well on screen. I wish other jokes would also have the same luck!

To be pronounced as ‘Mr jo bhi karwa lo’, debutante Samir Tewari’s ‘MR JOE B. CARVALHO’ is rather ‘errors in comedy’ than ‘comedy of errors’. The characters and I mean ‘each & everyone’ credited here acts and reacts like mad cows trying to eat as much grass from the field as they could.

Arshad Warsi plays a detective who’s hired to solve the mystery [???] behind a daughter running away with the cook of the house. In other plot, there is a cold-blooded killer [the less-wasted Javed Jaffery] out on loose to kill another couple responsible for a self-proclaimed don-cum-lover’s heartbreak. Vijayraj plays a green-eyed, envious goon who’s looking for chances to kill his rival Carlos-the killer. Soha Ali Khan is in role of a ‘Lady Dabangg’ cop who misunderstands his ex-boyfriend Warsi as the same contract killer, God knows why often addressed as a terrorist. Himani Shivpuri as the blind mother to Warsi gets trembling around everywhere without much reason. Rest is the series of happenings, mis-happenings and not-happenings.

With a completely immature, faulty and terrible work of writing, neither the film takes itself serious nor the actors. Everyone races against each other to win ‘who’s worst’ title in the performance. Javed Jaffery shows some relief as the master of disguise Carlos. Arshad Warsi was the biggest bet in this and though he never really disappoints you, he should take accountability for choosing such bad film. For the rest, you will find lots of improvisation from actors taking place in many scenes but even that also don’t help any better. Watching actors mumbling just anything before leaving the frame or camera getting zoomed in to a face to get some reaction and after realizing that it’s not gonna happen, ending it with a late-cut is hilarious but only if you are into the tricks & trades of filmmaking.

Dialogues are pathetically pedestrian. So if there is a talk about bad stomach, be ready to hear Soha starting her sentence with ‘I gas’ only to rectifying it soon after with ‘I guess’. The songs are penned down to tickle funny bones but fall flat only for a well-needed break to visit loo or the cafeteria in the theatre premise.

At the end; if you laugh ever in the film, it is not because of the gags but the situations that are not funny at all. Filmmaking is a serious business and people who think they can have fun with it in trying to make it funnier, should need to learn-unlearn few basics. Cinema lovers can consider it a strictly ‘No-No’ and a case-history in the ‘worsts’ section of Bollywood. Come on 2014, don’t dishearten us! Give us something really good soon! [0.5/5]