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Wednesday, 15 August 2018

गोल्ड: नक्कालों से सावधान! [2/5]

स्पोर्ट्स फिल्म बनाने में मेहनत लगती है. मैच असली लगने चाहियें. खिलाड़ियों का जोश, मैदान में उनकी रफ़्तार, उनका तालमेल स्क्रीन पर सब कुछ असल की शक्ल में दिखाई देना चाहिए. उम्दा, लायक और भरोसेमंद सिनेमाई तकनीक यहाँ पर बहुत अहम् रोल अदा करती है. जबकि बायोपिक बनाने में वक़्त और मेहनत दोनों लगती है. रिसर्च यहाँ तकनीक पर हावी हो जाती है. घटनाओं और किरदारों की सच्चाई जब दांव पर हो, तो फिल्मकार के तौर पर आपकी समझ भी कठघरे में पूरे वक़्त एक पाँव पर खड़ी रहती है. हालाँकि इस कठिन हाल से साफ़-साफ़ बच कर निकलने का एक बेहद आजमाया हुआ नुस्खा भी मौजूद है बॉलीवुड में. नायक को देशभक्ति की घुट्टी पिलाकर और दर्शकों को सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान सुनाकर बड़ी आसानी से पतली गली पकड़ी जा सकती है. आपसे किसी तरह का और कोई सवाल किया ही नहीं जाएगा. रीमा कागती की गोल्ड यही करती है. एकदम यही. साधारण स्क्रिप्ट, जबरदस्ती का नायक, बनावटी ड्रामे, कहानी में उधार के उतार-चढ़ाव और घटिया दर्जे के कंप्यूटर ग्राफ़िक्स; और इन सब पर देशभक्ति का चमकीला पर्दा डालने के लिए इतिहास की एक (असल की रोमांचक) घटना और उनके इर्द-गिर्द ढेर सारे बनावटी चोचले.

दौर आज़ादी से ठीक पहले का है. बच्चे क्रिकेट नहीं खेलते, हॉकी के दीवाने हैं. देश की टीम ओलंपिक्स में 3 गोल्ड जीत चुकी है, पर सारे के सारे ब्रिटिश इंडिया के खाते में दर्ज हैं. भारत के पास मौका है ओलंपिक्स में तिरंगा लहराने का. कुछ सालों में आजादी भी मिलने वाली है, और ओलंपिक्स भी 12 साल बाद फिर से होने वाले हैं. तपन दास (अक्षय कुमार) घोर बंगाली है. बर्लिन ओलंपिक्स में सपना देखा था, अगले ओलंपिक्स में तिरंगा लहराने का. अब दो बार से ओलंपिक्स कैंसिल हो रहे हैं, तो शराब की लत पाल ली है. आने वाले ओलंपिक्स के लिए खिलाड़ियों को चुनने की जिम्मेदारी मिल भी गयी है, तो उसे कहाँ पता था कि भारत-पकिस्तान के बंटवारे में टीम का भी बंटवारा हो जाएगा. लिहाज़ा, शराब में फिर डूब जाने का मौका भी है, दस्तूर भी. जैसे तैसे नए सदस्यों के साथ टीम फिर से खड़ी होती भी है, तो जश्न के माहौल में पीने की सूरत फिर से बन जाती है. टीम अब अपने इस देवदास के बिना ही लन्दन ओलंपिक्स जा रही है. एक ऐसी टीम जिसमें कोई कोच नहीं है, 70 मिनट, सिर्फ 70 मिनट हैं तुम्हारे पास का ओजस्वी भाषण देने के लिए. तपन दास की शकल में सिर्फ एक मैनेजर ही था, जो अंग्रेजों से 200 साल का बदला लेने के लिए तत्पर है.

स्पोर्ट्स, देशभक्ति और बायोपिक की इस मिलीजुली सिनेमाई साजिश में 3 ख़ास खामियां हैं, जो गिनती की कुछ अच्छाइयों के मुकाबले बेहद भारी-भरकम हैं. गोल्ड स्क्रिप्ट के स्तर पर एक बेहद साधारण फिल्म है, जो अपना ज्यादातर हिस्सा शिमित अमीन की (अब तक की) बेहतरीन फिल्म चक दे! इंडिया से काफी हद तक उधार लेती है. कबीर खान (शाहरुख़ खान) की ही तरह यहाँ भी तपन दास एकलौता पूरी की पूरी टीम चुनता है, खड़ा करता है. यहाँ तक कि टीम में एक-दूसरे से जलने और होड़ रखने वाले खिलाड़ियों का ट्रैक भी कुछ इतना मिलता जुलता है, मानो दोनों एक-दूसरे का ज़ेरॉक्स हों. सेंटर फॉरवर्ड की पोजीशन पर खेलने की जिद पाले बैठे दो खिलाड़ी और उन्हीं के कन्धों और फैसलों पर टिका वो आखिरी मैच का निर्णायक गोल. गोल्ड बड़ी बेशर्मी से दंगल के उस कम दमदार, पर असरदार ड्रामे की भी नक़ल कर लेती है, जहाँ मैच में उस एक नायक का होना बेहद जरूरी है, पर एक साज़िश के तहत उसे स्टेडियम तक पहुँचने से रोक लिया जाता है.

दूसरी कमज़ोर कड़ी है, फिल्म का तकनीकी पहलू. खराब कंप्यूटर ग्राफ़िक्स के अलावा, गोल्ड में न तो मैच को रोमांचक बनाने वाले दांव-पेंच ही मौजूद हैं, ना ही उस तरीके का तेज़ रफ़्तार कैमरावर्क जो आपको मैदान पर होने का एहसास करा जाए. जहां चक दे! इंडिया में दिखाए गये मैच लंबे-लम्बे शॉट्स के साथ बड़ी समझ से डिजाईन किये हुए लगते थे, गोल्ड के मैच टुकड़ों और क्लोज-अप्स में ही सीमित रह जाते हैं. खिलाड़ियों को न तो हीरो बनने का ही वक़्त मिलता है, ना ही आपको उनकी क़ाबलियत से जुड़ने का. और अब आखिरी में, फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी, अक्षय कुमार. अक्षय एक सोची समझी रणनीति के तहत देश और देशभक्ति का राग अलापती फिल्मों का हिस्सा बनते आ रहे हैं. हालाँकि एक अभिनेता के तौर पर गोल्ड में किरदार से जुड़ने की उनकी कोशिश उनकी पिछली फिल्मों से सबसे ज्यादा नज़र आती है, पर उनके होने भर से ही कहानी में वजन आने की रही-सही उम्मीद भी जाती रहती है. किरदारों को कैरीकचर बना कर छोड़ देने में उनका कोई सानी नहीं.

अक्षय का एकरस अभिनय एक तरह से एक अच्छा मौका भी है, सनी कौशल, कुनाल कपूर और अमित साध जैसे सह-अभिनेताओं के लिए. सनी कौशल फिल्म का सबसे भरोसेमंद अभिनेता बनकर उभरते हैं. देश के लिए खेलने की आग पाले बैठे किरदार में सनी जैसे परदे पर अपने मौके का इंतज़ार ही कर रहे होते हैं. यहाँ तक कि प्रेम-प्रसंग वाले हलके-फुल्के पलों में भी सनी ही भारी पड़ते हैं, अक्षय पर भी. मौनी रॉय बंगाली फिल्म के लिए ऑडिशन देने आई किसी बहुत उत्साहित नयी लड़की से ज्यादा बेहतर या लायक नहीं लगतीं. अमित साध राजघराने से आये एक अकडू युवराज के किरदार में भी बेहद मनोरंजक लगते हैं. विनीत कुमार सिंह भी कतई निराश नहीं करते. बंटवारे से पहले आज़ाद भारत के कप्तान और बंटवारे के बाद पाकिस्तान की हॉकी टीम के कप्तान के रूप में उनके हाव-भाव में जो एक हल्का सा फर्क और पैनापन विनीत शामिल कर पाते हैं, अगर आप भांप लें तो अदाकार के तौर पर विनीत के कद को ज्यादा समझ पाएंगे.

आखिर में; गोल्ड चमकदार तो है, पर हर चमकती चीज को सोना समझने की भूल कौन करता है भला? मुझे काफी वक़्त तक लगता था, स्वर्ण पदक विजेताओं के गोल्ड मैडल को दांतों से काटने की परम्परा भी शायद इसी को जांचने की एक प्रक्रिया होती होगी. गोल्ड देशभक्ति के नाम पर आपको कुछ ऐसा ऐरा-गैरा परोसने की कोशिश है. बेहतर होगा, नक्कालों से सावधान रहे! [2/5]

Wednesday, 28 December 2016

साल के बेमिसाल...(They Came, They Saw, They Conquered)

ढर्रे को तोड़ना, उस जमीन पर रास्ते तलाशना जहाँ पहले कभी इंसानी पाँव पड़े ही नहीं, अपने ही बनाये मानकों को लांघ कर आगे निकल जाना; बॉलीवुड के लिए कभी आसान नहीं रहा. फिर भी इस पूरे साल, कईयों ने हिम्मत दिखाई और अपनी मौजूदगी का बाकायदा एहसास कराते रहे. ‘पिंक’ अगर औरतों के प्रति मर्दों की सदियों पुरानी सड़ांध भरी मानसिकता को कड़े शब्दों में ‘ना’ कहने, और ‘ना’ का मतलब ‘ना’ ही होने की जोरदार पहल करती है, तो ‘अलीगढ़’ समलैंगिकता के जुड़े ज़ज्बातों को ‘ओछी नैतिकता’ के दुनियावी दलदल से निकाल कर हमारे दिलों और घरों में बाइज्ज़त कायम करने की सफल कोशिश करती है.

हिंदी सिनेमा की भाषा बदल रही है, और इस बात की मिसाल ‘कपूर एंड संस’ से बढ़िया और क्या हो सकती है? पारिवारिक अंतर्कलह हमेशा से हिंदी सिनेमा के रंगीन परदे को लुभाता रहा है. दर्शकों की आँखों में नमी लाकर बॉक्सऑफिस पर पैसे बटोरने का फ़न पुराना और बासी हो चला है, और इस बात की भनक तब लगती है, जब हम ‘कपूर एंड संस’ से मिलना तय करते हैं. यहाँ सब कुछ वैसा ही बेतरतीब है, जैसे अपने घरों में होता है. यहाँ सब जैसे टूटे हुए बैठे हैं या टूट कर बिखरने की कगार पर हैं. मलाल, गुस्सा, शिकवे-शिकायतें और कुढ़न, सबके अन्दर जैसे एक ज्वालामुखी सो रहा है, जब उठेगा, फटेगा तो जाने क्या होगा? यहाँ आने में आपको थोड़ी झिझक जरूर होगी, पर एक बार आ गए तो जाने में भी उतनी ही मुश्किल.

साल 2016 के इन 10 बेमिसाल फिल्मों में कहीं न कहीं आपको पुराना बॉलीवुड नये चोले पहनता हुआ दिखाई देगा. हौसला-अफजाई तो बनती है...शुक्रिया!  


#एयरलिफ्ट #डियर जिंदगी #निल बट्टे सन्नाटा #नीरजा #अलीगढ़ 
#रमन राघव 2.0 #कपूर एंड संस #उड़ता पंजाब #दंगल #पिंक        





AIRLIFT is a nice, well-intended break from loud and fake jingoism in Hindi cinema. The patriotism portrayed here is never too pushy, preached or purposefully painted. No matter how millionth of times you have seen a tricolour being hoisted up from soil to sky, you’re tend to feel the ‘get-up-and-go’ force within you but Raja Menon gives it all a reason, more unadulterated and uncontaminated. 


The merit also lies in casting Akshay Kumar who deliberately decides to underplay his unapologetically self-interested image for a while and gives us a character that’s more human than just feeding off someone’s unchallenged starry ego. He’s not new to the flavor though. BABY and SPECIAL 26 have done quite well for him in the past. AIRLIFT is a greater addition to the list.




डियर ज़िन्दगी’ अपने छोटे-छोटे, हलके-फुल्के पलों में बड़े-बड़े फलसफों वाली बातें कहने का जोखिम बखूबी और बेख़ौफ़ उठाती है. डॉक्टर खान जब भी रिश्तों को लेकर ज़िन्दगी का एक नया पहलू काईरा को समझा रहे होते हैं, उनकी इस भूमिका में शाहरुख़ जैसे बड़े कलाकार का होना अपनी अहमियत साफ़ जता जाता है. ये चेहरा जाना-पहचाना है. बीसियों साल से परदे पर प्यार, दोस्ती और ज़िन्दगी की बातें करता आ रहा है, पर इस बार उसकी बातों की दलील पहले से कहीं ज्यादा गहरी है, मजबूत है, कारगर है. 

आलिया जिस तरह भरभरा कर टूटती हैं परदे पर, हिंदी सिनेमा में अपने साथ के तमाम कलाकारों को धकियाते हुए एकदम आगे निकल जाती हैं. फिल्म की खासियतों में से एक ये भी है कि शाहरुख़ जैसा दमदार स्टार होते हुए भी कैमरा और कहानी दोनों आलिया के किरदार से कभी दूर हटते दिखाई नहीं देते.





सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. 

अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है. 






Real-life heroes are way better than the ones we see, create or admire on big screen. They might not look perfectly decked-up all the time, make a grand entry and an even greater exit from the frame in the most overrated slow-motion shots. They might not be so exceptionally skilled to kill every bad man in their way; on the other hand, they might get killed at the end. 

And trust me if they do so, it’s never pre-designed to sympathetically benefit their own image amongst their fans. Real-life heroes also necessarily don’t have to be always a ‘Hero’ to inspire; they can also come in as a bold, fearless, strong-headed and proud 23-year old girl from the next door! Ram Madhvani’s inspirational biopic NEERJA successfully brings us closer to one such hero, most of us wouldn’t have known of if the efforts were not made.



दो-चार-दस गिनती की फिल्में को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने समलैंगिकों और समलैंगिकता को जिस बेरुखी, जिस छिछले तरीके से परदे पर अपने मतलब (...और भौंडे मनोरंजन) के लिए इस्तेमाल किया है, उसे साफ़ और पाक करने के लिए कोई एक फिल्म काफी साबित नहीं हो सकती, ये एक शर्मनाक सच है...पर इसी के साथ एक सच और भी है, कोशिशों ने हौसलों का दामन अभी छोड़ा नहीं है. 

हंसल मेहता की बेहद सुलझी हुई, संजीदगी और सादगी से भरी हुई ईमानदार फिल्म ‘अलीगढ़’ ऐसी ही एक बेहतरीन कोशिश है, जो समलैंगिकता को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बेहयाई नहीं करती बल्कि उसे ‘निजता के अधिकार’ के साथ मिलाकर एक ऐसा मुहीम छेड़ देती है जिससे बचना-मुंह मोड़ना और अनदेखा कर देना किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए आसान नहीं रह जाता!







अपनी नई फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ को अनुराग उनकी सबसे ख़तरनाक लव-स्टोरी का दर्जा देते हैं.अनुराग कश्यप और लव-स्टोरी?? इसका सटीक जवाब तो आपको फिल्म के आख़िरी पलों में ही मिलता है, पर अच्छी बात ये है कि ‘बॉम्बे वेलवेट’ की नाकामयाबी ने उन्हें वापस उनके अपने जाने-पहचाने दायरे में ला खड़ा किया है. हालांकि भारतीय सिनेमा में ये दायरा भी उन्हीं की बदौलत इस मुकाम तक पहुंचा है. यहाँ उनका कोई दूसरा सानी नहीं. इस बार भी उनसे कहीं कोई चूक नहीं होती. 

रमन राघव 2.0’ अब तक की उनकी सबसे ‘डार्क’ फिल्म बिना किसी झिझक कही जा सकती है. रक्त का रस और गाढ़ा हो चला है. खौफ़ का चेहरा पल-पल मुखौटे बदल रहा है. अँधेरे का साम्राज्य और गहराने लगा है.





It seems Bollywood has learnt its way to deal Indian families in films the way it should be. Chaotic, dramatic, relatable and real! With Shakun Batra’s KAPOOR & SONS (SINCE 1921), even Dharma Productions have come a long way. Forget Karan Johar’s all elite, genteel and heavenly prosperous families melting & merging patently into the equally overwhelming interiors inspired by latest interior design magazines! The characters here, in Shakun’s world, don’t really chew their words before spitting them out. On the contrary, they are loose out in the open to grind each other’s peace unabashedly. 

Backed up by good writing and even better direction skills, KAPOOR & SONS (SINCE 1921) marks the arrival of a totally fascinating and utterly dysfunctional ‘on-screen’ family you would love to see more of it. 



गुलज़ार साब की ‘माचिस’ जैसी कुछेक को अलग रख कर देखें तो पंजाब को हिंदी फिल्मों ने हमेशा मीठी चाशनी में ही लपेट कर परोसा है. दिन में बैसाखी के मेले और रात में लोहड़ी का जश्न, इससे आगे बढ़ने की हिम्मत पंजाबी सिनेमा ने तो कभी-कभी दिखाई भी है पर बॉलीवुड कमोबेश बचता ही रहा है. अब तक. ‘उड़ता पंजाब’ के आने तक. 

पंजाब की जो सपनीली तस्वीर आपने ‘यशराज फिल्म्स’ के चश्मे से देखी थी, अभिषेक चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ पहले फ्रेम से ही उस तस्वीर पे चिपके ‘एनआरआई कम्पेटिबल’ चमक को खरोंचने में लग जाती है. सीने पर आतंकवाद का बोझ और पीठ पर ’84 के ज़ख्म उठाये पंजाब को अब हेरोइन, स्मैक और कोकीन की परतों ने ढक लिया है. खुरदुरी, किरकिराती, पपड़ी जमी परतों ने! 







अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. 

नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.




हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. 

‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं.






Friday, 23 December 2016

दंगल: साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! [5/5]

अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.

महावीर सिंह फोगाट (आमिर खान) किसी अलग सांचे में ढला पिता नहीं है. ऐसे पिता, जिनके मुंह से ‘शाब्बास’ सुनने के लिए बच्चों के कान तरस जाएँ, हमारे आस-पास बहुतेरे हैं. ऐसे पिता, जिनके भारी-भरकम सपनों को पीठ पर लादे बच्चे अंधाधुंध भाग रहे हों, हम सबने देखे हैं. कभी अपने पिता में, तो कभी बगल वाले शर्मा जी में. महावीर सिंह फोगाट को अगर कुछ अलग करता है, तो वो है उसकी जिद, उसका जूनून और परिस्थितियों से सीखने, सीख कर समझने और समझ कर संभलने का लचीलापन, जो उसके हठी किरदार में एक रोचक और रोमांचक विरोधाभास पैदा करता है. कुश्ती में मेडल लाने का सपना सिर्फ एक बेटा ही पूरा कर सकता है, फोगाट इस चाह में चार बेटियों का पिता बन चुका है. ऐसे में, एक दिन जब उसे एहसास होता है कि मेडल बेटियाँ भी ला सकती हैं, तो अपनी बच्चियों गीता (ज़ायरा वसीम) और बबिता (सुहानी भटनागर) को अखाड़े तक लाने में कोई ढील नहीं बरतता.       

फिल्म के दूसरे हिस्से में ‘दंगल’ कई परतों में खुलती है. गीता (फ़ातिमा सना शेख) को राष्ट्रीय खेल अकादमी में एक उजड्ड कोच (गिरीश कुलकर्णी) के भरोसे छोड़कर लौटते बाप की उलझन हो, शाहरुख़ की फिल्म और गोलगप्पों के बीच कुश्ती के नए तौर-तरीकों से पनपा गीता का नया आत्म-विश्वास हो या बबिता (सान्या मल्होत्रा) के साथ उसके वैचारिक मतभेद; बाप-बेटियों के इस ज़ज्बाती गुत्थम-गुत्थी से अलग हटकर देखें, तो कुश्ती को एक खेल के रूप में परदे पर प्रस्तुत करने वाली बेशक ‘दंगल’ सबसे भरोसेमंद फिल्म है. कुश्ती के गूढ़ दांव-पेंच यहाँ जिस रोमांचक तरीके से दिखाए और समझाए जाते हैं, उनका मकसद किरदारों या उन्हें निभाने वाले कलाकारों को परदे पर बढ़ा-चढ़ा कर ‘नायक’ की तरह पेश करना कतई नहीं रहता, बल्कि उन खालिस पलों में सिर्फ कुश्ती ही निखर कर सामने आती है. फिल्म का टाइटल सीक्वेंस भी इसी सोच की बुनियाद पुख्ता करता है, जहां असली दुनिया के असली पहलवान कैमरे के सामने खड़े आपकी आँखों में एकटक झांकते दिखाई देते हैं.

दंगल’ एक कलाकार के तौर पर आमिर खान की सबसे अच्छी फिल्म है. अपने स्टारडम को हाशिये पर रखकर किरदार तक ही सीमित रहने का हुनर उनसे अच्छा शायद ही किसी और ‘स्टार’ को आता हो. बात सिर्फ वजन घटा-बढ़ा कर प्रयोग करने की नहीं है, फिल्म के तमाम जरूरी हिस्सों और दृश्यों में केंद्र-बिंदु बने रहने का लोभ-संवरण कर पाना, हर किसी के बस की बात नहीं. अपनी पहली ही फिल्म में गीता और बबिता के किरदारों में ज़ायरा, सुहानी, फ़ातिमा और सान्या चारों ही आपको लुभाने, हंसाने, रुलाने और इमोशनली जोड़े रखने में कामयाब रहती हैं. फिल्म में अगर किसी का होना बहुत चौंकाता है, तो वो हैं साक्षी तंवर. साक्षी भले ही फिल्म में कैमरे का पसंदीदा चेहरा न रही हों, (आप उन्हें अक्सर बैकग्राउंड में ही देखते हैं) पर फिल्म की रंगीनियत में उनसे ज्यादा घुला-मिला, रचा-बसा शायद ही कोई और दिखता है. अपारशक्ति खुराना प्रभावित करते हैं, इस हद तक कि जैसे इसी रोल के लिए बने हों.

आखिर में, ‘दंगल’ कमियों से परे न होते हुए भी (फिल्म का सोचा-समझा अंत थोड़ा असहज करता है) एक ऐसी मुकम्मल फिल्म है, जो मनोरंजन का दामन छोड़े बगैर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की बागडोर पूरी मुस्तैदी से अपने हाथ रखती है. सच्चे किरदारों की सच्ची कहानियाँ परदे पर कहनी हों, तो ‘दंगल’ बॉलीवुड के लिए बाइबिल से कम नहीं. साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! देखने जाईये, अभी जाईये, पूरे खानदान के साथ जाईये! [5/5]