Showing posts with label Amit sadh. Show all posts
Showing posts with label Amit sadh. Show all posts

Friday, 12 July 2019

सुपर 30: हृतिक की मेहनत को ‘जीरो’ करता फिल्मी फ़ार्मूला [2/5]


दिहाड़ी में 3 रूपये रोज बढ़ाने की मांग करने वाली दलित लड़कियों की बलात्कार के बाद हत्या होते हम पिछले हफ्ते ही ‘आर्टिकल 15’ में देख चुके हैं. जातिगत भेदभाव के बाद, इस हफ्ते बॉलीवुड के निशाने पर है शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक रूप से पिछड़े होनहार छात्रों के साथ हो रही नाइंसाफ़ी. ऊंची जात और नीची जात के बीच की खाई से कम गहरा नहीं है अमीर और गरीब के बीच का फ़र्क. दोनों फ़िल्में अपना कथानक अखबारों की सुर्खियों और असल ज़िंदगी की घटनाओं से उधार लेती हैं, पर एक बड़ा अंतर जो इन दोनों को लकीर के बिलकुल आर-पार, आमने-सामने खड़ा कर देता है, वो है फ़िल्म बनाते वक़्त कहानी और उसके कहे जाने के पीछे के मकसद के साथ बरती जाने वाली ईमानदारी. ‘आर्टिकल 15’ कहानी में कोई एक नायक खोजने या बनाने के फ़िज़ूल चक्करों में नहीं फंसती, जबकि ‘सुपर 30 एक ख़ालिस दमदार नायक होने के बावज़ूद, कहानी में नायक गढ़ने के लिए जबरदस्ती के ताने-बाने बुनने में अपनी सारी अक्ल खर्च कर देती है. ये कुछ उतना ही बड़ा जुर्म है, जैसा राजकुमार हिरानी ‘संजू बनाते वक़्त कर बैठते हैं. ‘सुपर 30 में ड्रामा है, एक्शन है, इमोशन है, गीत-संगीत भरपूर है, पर सब का सब बड़ी सफाई और सहूलियत से कहानी में ठूंसा हुआ. ठीक वैसे ही जैसे फिल्म में हृतिक का किरदार अपनी गर्लफ्रेंड के चेहरे को ख़ूबसूरती के गणितीय-सूत्र से मापता फिरता है.


आर्थिक स्तर पर तंगी से जूझता आनंद कुमार (हृतिक रोशन) अप्रत्याशित तौर से मेधावी है. पैसों की कमी ने न सिर्फ कैंब्रिज यूनिवर्सिटी जाने का सपना उससे छीन लिया है, उसके पिता (वीरेंद्र सक्सेना) भी नहीं रहे. शिक्षा-माफिया लल्लन सिंह (आदित्य श्रीवास्तव) को आनंद साइकिल पर पापड़ बेचता हुआ मिलता है. अब आनंद लल्लन सिंह के कोचिंग इंस्टिट्यूट का ‘प्रीमियम टीचर है. पैसों ने उसका हाल बदल दिया है, उसकी चाल बदल दी है. जिदंगी के साइकिल की चेन उतर गयी थी, मगर वापस चढ़ने में बहुत देर नहीं लगती. गुरु द्रोणाचार्य को राजाओं के बेटों को राजा बनाने से बेहतर लगने लगा है, प्रतिभा से धनी-साधनों से हीन एकलव्यों को उनकी शिक्षा का हक़ देना/दिलाना.         

बिहार के मशहूर गणितज्ञ आनंद कुमार और उनके मेधावी छात्रों पर बनी ‘सुपर 30 के साथ सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि फिल्म जिस मुद्दे के खिलाफ़ पूरे जोश से नारे लगाती है, उसी चक्रव्यूह में खुद अन्दर तक फंसी नज़र आती है. ‘राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, राजा वही बनेगा जो हक़दार होगा का परचम बुलंद करते हुए परदे पर ‘ग्रीक गॉड’ कहे जाने वाले हृतिक रोशन आनंद कुमार कम, ब्रांडेड फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन में अपनी रंगत के लिए लगातार शर्मिंदगी झेलने वाले संभावित ग्राहक ज्यादा दिखते हैं. एक दृश्य में एक अमीर छात्र पूछ लेता है, ‘सर, मैं अमीर हूँ तो इसमें मेरी क्या गलती है?’. जवाब देने के लिये, सामने फिर हृतिक ही खड़े मिलते हैं, फिल्म में अपने आप के ही अस्तित्व को खारिज़ करते हुए. हालाँकि फिल्म में उनका अभिनय आप पर चढ़ते-चढ़ते चढ़ ही जाता है, पर कहीं न कहीं उसके पीछे हृतिक के अभिनय कौशल से ज्यादा उनकी जी-तोड़ मेहनत और साफ़ नीयत हावी रहती है.

आनंद कुमार हर साल 30 गरीब छात्रों को आई.आई.टी. जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों की प्रवेश-परीक्षाओं के लिए तैयार करते हैं. उनके रहने-खाने से लेकर पढ़ाई की दूसरी जरूरतों तक, सब मुफ़्त में मुहैय्या कराते हैं, और अपने आम से दिखने वाले व्यक्तित्व और अध्यापन में अपनी ख़ास ठेठ शैली के लिए सराहे जाते हैं. गणित के भारी-भरकम सूत्रों को असल जिंदगी के आसान उदाहरणों से जोड़ कर पढ़ाई को मनोरंजक बनाने की उनकी पहल फिल्म में दिखती तो है, पर उसका अंत कुछ इस नाटकीयता तक पहुँच जाता है, जो आपको सच्चाई से कोसों परे लगती है और आप धीरे-धीरे फिल्म से कटने लगते हैं. बच्चे हथियारबंद गुंडों का मुकाबला कर रहे हैं, गणित के सूत्रों का इस्तेमाल करके. इस मुकाम पर आकर ‘गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर और ‘चिल्लर पार्टी एक ही फ्रेम का हिस्सा हो जाते हैं. अंग्रेजी से डरकर भागने वाले बच्चे बीच चौराहे पर टूटी-फूटी अंग्रेजी में गीत गा रहे हैं, ‘बसंती! डोंट डांस’, और देखते ही देखते पूरी की पूरी भीड़ उनके साथ उन्हीं के राग में रम जाती है. फिल्म के लेखक-निर्देशक अब अपना दिमाग़ चलाने लगे हैं. उन्हें शायद आनंद कुमार की शख्सियत और उनकी कहानी में दम दिखना बंद हो चुका है.

‘सुपर 30 का सबसे तगड़ा पहलू है, गरीब बच्चे-बच्चियों के किरदार में अभिनेताओं का सटीक चयन. फिल्म में जितने भी पल आपको द्रवित कर पाते हैं (गिनती के ही सही, पर यकीनन फिल्म में ऐसे दृश्य हैं), सब के सब इन्हीं बच्चों के हिस्से. आदित्य श्रीवास्तव और वीरेंद्र सक्सेना की सहज अदाकारी ही है, जो फिल्म के बैकड्राप में बिहार को स्थापित कर पाती है वरना तो पंकज त्रिपाठी भी कुछ नया पेश करने की कोशिश में असफल ही नज़र आते हैं. दो ख़ास दृश्यों में साधना सिंह और मृणाल ठाकुर बेहतरीन हैं. एक दृश्य में साधना जी अपने आप को ‘हॉट’ कह कर शर्माती हैं, दूसरे में मृणाल ‘मर्दों में मेरी चॉइस हमेशा अच्छी रहती है कहकर मानव गोहिल को गुदगुदाती हैं.

आखिर में; ‘सुपर 30 आनंद कुमार को सुपर-नायक बनाने की कोशिशों में गरीब बच्चों को लेकर उनके ईमानदार प्रयासों और प्रयोगों को कमतर आंकने की भूल कर बैठती है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की कहानी में फ़ार्मूला ढूँढने की भूख ने एक और फिल्म को बेहतर होने से काफी पहले रोक लिया है. आनंद कुमार को जानने-सराहने के लिए उनके साथ एक घंटे का इंटरव्यू ही ज्यादा माकूल होता. [2/5]     


Wednesday, 15 August 2018

गोल्ड: नक्कालों से सावधान! [2/5]

स्पोर्ट्स फिल्म बनाने में मेहनत लगती है. मैच असली लगने चाहियें. खिलाड़ियों का जोश, मैदान में उनकी रफ़्तार, उनका तालमेल स्क्रीन पर सब कुछ असल की शक्ल में दिखाई देना चाहिए. उम्दा, लायक और भरोसेमंद सिनेमाई तकनीक यहाँ पर बहुत अहम् रोल अदा करती है. जबकि बायोपिक बनाने में वक़्त और मेहनत दोनों लगती है. रिसर्च यहाँ तकनीक पर हावी हो जाती है. घटनाओं और किरदारों की सच्चाई जब दांव पर हो, तो फिल्मकार के तौर पर आपकी समझ भी कठघरे में पूरे वक़्त एक पाँव पर खड़ी रहती है. हालाँकि इस कठिन हाल से साफ़-साफ़ बच कर निकलने का एक बेहद आजमाया हुआ नुस्खा भी मौजूद है बॉलीवुड में. नायक को देशभक्ति की घुट्टी पिलाकर और दर्शकों को सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान सुनाकर बड़ी आसानी से पतली गली पकड़ी जा सकती है. आपसे किसी तरह का और कोई सवाल किया ही नहीं जाएगा. रीमा कागती की गोल्ड यही करती है. एकदम यही. साधारण स्क्रिप्ट, जबरदस्ती का नायक, बनावटी ड्रामे, कहानी में उधार के उतार-चढ़ाव और घटिया दर्जे के कंप्यूटर ग्राफ़िक्स; और इन सब पर देशभक्ति का चमकीला पर्दा डालने के लिए इतिहास की एक (असल की रोमांचक) घटना और उनके इर्द-गिर्द ढेर सारे बनावटी चोचले.

दौर आज़ादी से ठीक पहले का है. बच्चे क्रिकेट नहीं खेलते, हॉकी के दीवाने हैं. देश की टीम ओलंपिक्स में 3 गोल्ड जीत चुकी है, पर सारे के सारे ब्रिटिश इंडिया के खाते में दर्ज हैं. भारत के पास मौका है ओलंपिक्स में तिरंगा लहराने का. कुछ सालों में आजादी भी मिलने वाली है, और ओलंपिक्स भी 12 साल बाद फिर से होने वाले हैं. तपन दास (अक्षय कुमार) घोर बंगाली है. बर्लिन ओलंपिक्स में सपना देखा था, अगले ओलंपिक्स में तिरंगा लहराने का. अब दो बार से ओलंपिक्स कैंसिल हो रहे हैं, तो शराब की लत पाल ली है. आने वाले ओलंपिक्स के लिए खिलाड़ियों को चुनने की जिम्मेदारी मिल भी गयी है, तो उसे कहाँ पता था कि भारत-पकिस्तान के बंटवारे में टीम का भी बंटवारा हो जाएगा. लिहाज़ा, शराब में फिर डूब जाने का मौका भी है, दस्तूर भी. जैसे तैसे नए सदस्यों के साथ टीम फिर से खड़ी होती भी है, तो जश्न के माहौल में पीने की सूरत फिर से बन जाती है. टीम अब अपने इस देवदास के बिना ही लन्दन ओलंपिक्स जा रही है. एक ऐसी टीम जिसमें कोई कोच नहीं है, 70 मिनट, सिर्फ 70 मिनट हैं तुम्हारे पास का ओजस्वी भाषण देने के लिए. तपन दास की शकल में सिर्फ एक मैनेजर ही था, जो अंग्रेजों से 200 साल का बदला लेने के लिए तत्पर है.

स्पोर्ट्स, देशभक्ति और बायोपिक की इस मिलीजुली सिनेमाई साजिश में 3 ख़ास खामियां हैं, जो गिनती की कुछ अच्छाइयों के मुकाबले बेहद भारी-भरकम हैं. गोल्ड स्क्रिप्ट के स्तर पर एक बेहद साधारण फिल्म है, जो अपना ज्यादातर हिस्सा शिमित अमीन की (अब तक की) बेहतरीन फिल्म चक दे! इंडिया से काफी हद तक उधार लेती है. कबीर खान (शाहरुख़ खान) की ही तरह यहाँ भी तपन दास एकलौता पूरी की पूरी टीम चुनता है, खड़ा करता है. यहाँ तक कि टीम में एक-दूसरे से जलने और होड़ रखने वाले खिलाड़ियों का ट्रैक भी कुछ इतना मिलता जुलता है, मानो दोनों एक-दूसरे का ज़ेरॉक्स हों. सेंटर फॉरवर्ड की पोजीशन पर खेलने की जिद पाले बैठे दो खिलाड़ी और उन्हीं के कन्धों और फैसलों पर टिका वो आखिरी मैच का निर्णायक गोल. गोल्ड बड़ी बेशर्मी से दंगल के उस कम दमदार, पर असरदार ड्रामे की भी नक़ल कर लेती है, जहाँ मैच में उस एक नायक का होना बेहद जरूरी है, पर एक साज़िश के तहत उसे स्टेडियम तक पहुँचने से रोक लिया जाता है.

दूसरी कमज़ोर कड़ी है, फिल्म का तकनीकी पहलू. खराब कंप्यूटर ग्राफ़िक्स के अलावा, गोल्ड में न तो मैच को रोमांचक बनाने वाले दांव-पेंच ही मौजूद हैं, ना ही उस तरीके का तेज़ रफ़्तार कैमरावर्क जो आपको मैदान पर होने का एहसास करा जाए. जहां चक दे! इंडिया में दिखाए गये मैच लंबे-लम्बे शॉट्स के साथ बड़ी समझ से डिजाईन किये हुए लगते थे, गोल्ड के मैच टुकड़ों और क्लोज-अप्स में ही सीमित रह जाते हैं. खिलाड़ियों को न तो हीरो बनने का ही वक़्त मिलता है, ना ही आपको उनकी क़ाबलियत से जुड़ने का. और अब आखिरी में, फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी, अक्षय कुमार. अक्षय एक सोची समझी रणनीति के तहत देश और देशभक्ति का राग अलापती फिल्मों का हिस्सा बनते आ रहे हैं. हालाँकि एक अभिनेता के तौर पर गोल्ड में किरदार से जुड़ने की उनकी कोशिश उनकी पिछली फिल्मों से सबसे ज्यादा नज़र आती है, पर उनके होने भर से ही कहानी में वजन आने की रही-सही उम्मीद भी जाती रहती है. किरदारों को कैरीकचर बना कर छोड़ देने में उनका कोई सानी नहीं.

अक्षय का एकरस अभिनय एक तरह से एक अच्छा मौका भी है, सनी कौशल, कुनाल कपूर और अमित साध जैसे सह-अभिनेताओं के लिए. सनी कौशल फिल्म का सबसे भरोसेमंद अभिनेता बनकर उभरते हैं. देश के लिए खेलने की आग पाले बैठे किरदार में सनी जैसे परदे पर अपने मौके का इंतज़ार ही कर रहे होते हैं. यहाँ तक कि प्रेम-प्रसंग वाले हलके-फुल्के पलों में भी सनी ही भारी पड़ते हैं, अक्षय पर भी. मौनी रॉय बंगाली फिल्म के लिए ऑडिशन देने आई किसी बहुत उत्साहित नयी लड़की से ज्यादा बेहतर या लायक नहीं लगतीं. अमित साध राजघराने से आये एक अकडू युवराज के किरदार में भी बेहद मनोरंजक लगते हैं. विनीत कुमार सिंह भी कतई निराश नहीं करते. बंटवारे से पहले आज़ाद भारत के कप्तान और बंटवारे के बाद पाकिस्तान की हॉकी टीम के कप्तान के रूप में उनके हाव-भाव में जो एक हल्का सा फर्क और पैनापन विनीत शामिल कर पाते हैं, अगर आप भांप लें तो अदाकार के तौर पर विनीत के कद को ज्यादा समझ पाएंगे.

आखिर में; गोल्ड चमकदार तो है, पर हर चमकती चीज को सोना समझने की भूल कौन करता है भला? मुझे काफी वक़्त तक लगता था, स्वर्ण पदक विजेताओं के गोल्ड मैडल को दांतों से काटने की परम्परा भी शायद इसी को जांचने की एक प्रक्रिया होती होगी. गोल्ड देशभक्ति के नाम पर आपको कुछ ऐसा ऐरा-गैरा परोसने की कोशिश है. बेहतर होगा, नक्कालों से सावधान रहे! [2/5]

Friday, 28 July 2017

राग देश: देश का राग, अपने असली सुर में! [3/5]

देशभक्ति में ओत-प्रोत बहुत सारी फिल्में आपको याद होंगी. 'बॉर्डर', 'क्रांति' जैसी कुछ चीख-चीख कर दुश्मनों के छक्के छुड़ा देने वाली जोशीली, और कुछेक '1971', 'विजेता' जैसी ठहरी हुई; जिनके रोमांच की बुनियाद सिर्फ और सिर्फ एक दमदार कहानी पर टिकी होती है, जो कभी-कभी इतिहास की क्लास जैसी उबाऊ भी लग सकती है, पर कहानी कहते वक़्त ईमानदार बने रहने की कोशिश कभी नहीं छोड़तीं. तिग्मांशु धूलिया की 'राग देश' जैसे किसी केस-फ़ाइल की तरह, पूरी तरह जाँची-परखी और एक संतुलित-संयमित देशभक्ति फिल्म है. उम्मीद ये कतई ना करें कि यहाँ आपका हीरो अकेले दुश्मन के ऊपर टूट पड़ेगा, ना ही कि जंग की मुश्किल घड़ियों में पर्स टटोलेगा और प्रेमिका की फोटो पर उंगलियाँ फिराते हुए गाना गाने लगेगा. 

'राग देश' इतिहास के किसी जरूरी चैप्टर की तरह नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के आज़ाद हिन्द फौज़ और उससे जुड़े 3 ख़ास सेनानियों पर ब्रिटिश हुकूमत द्वारा चलाये जाने वाले देशद्रोह के मुकदमे का परत-दर-परत ब्यौरा पेश करता है. दूसरे विश्वयुद्ध में जापान के आगे घुटने टेक देने के बाद, बर्मा में ब्रिटिश सरकार ने भारतीय सेना की एक टुकड़ी जापानियों के सुपुर्द कर दी थी. जापानियों की मदद से, आज़ाद हिन्द फौज़ की नींव वहीँ पड़ी और धीरे-धीरे बुलंद होती गयी. देश आज़ाद कराने की लड़ाई में अब हिन्दुस्तानियों की ही बन्दूक थी, और हिन्दुस्तानियों का ही सीना. तमाम छोटी-छोटी सफलताओं के बावजूद और नेताजी की असामयिक मृत्यु के बाद, आज़ाद हिन्द फौज बिखरने लगी और अब उसके 3 अधिकारियों मेजर जनरल शाहनवाज़ खान (कुनाल कपूर), लेफ्टिनेंट कर्नल गुरबख्श सिंह ढिल्लों (अमित साध) और कर्नल प्रेम सहगल (मोहित मारवाह) पर देशद्रोह और मर्डर का मुकदमा चल रहा है. 

फिल्म की शुरुआत में ही, तिग्मांशु धूलिया बड़ी समझदारी से अपनी आवाज़ में 1945 के भारत की तस्वीर पूरी तरह साफ़ कर देते हैं. कोर्ट की प्रक्रिया के साथ-साथ धीरे-धीरे गवाहों के बयानात के ज़रिये, धूलिया आज़ाद हिन्द फौज के गठन और सैनिकों के साथ नेताजी के प्रेरक-प्रसंगों को फ्लैशबैक में पेश करते हैं. धूलिया फिल्म में मनोरंजन का भी ख़ास ख्याल रखते हैं, पर कुछ इस तरह जो अटपटा न हो, और कहानी की गंभीरता से बहुत ज्यादा अलग भी नहीं. कर्नल सहगल के पिता (कंवलजीत सिंह) पंडित नेहरु से वकील बदलने की बात कर रहे हैं, नेहरूजी का जवाब आता है, "कहीं आपका इशारा मेरी तरफ तो नहीं?", सहगल साब साफ़ मना कर देते हैं, "आप राजनीतिक मामलों में तो ठीक है, पर सेना के मामलों में आपके पास ज्यादा कुछ अनुभव नहीं है". इसी तरह कर्नल प्रेम सहगल की हाज़िर-जवाबी और अंग्रेजों के साथ लेफ्ट. कर्नल ढिल्लों की नोक-झोंक रह-रह कर आपको गुदगुदाती रहती है. कैप्टन लक्ष्मी स्वामीनाथन (मृदुला मुरली) के साथ कर्नल प्रेम सहगल के प्रेम को परदे पर कम ही वक़्त मिल पाता है. 

'राग देश' की खासियत है उसका रिसर्च-वर्क, जो तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने के बजाय ज्यों का त्यों सामने धर देता है, चाहे उसे जानने में आपकी कोई मंशा हो, न हो. फिल्म के किरदार अगर पंजाबी, जापानी, ब्रिटिश हैं तो वे अपनी ही भाषा में बात करते हुए सुनाई देते हैं. फिल्म न सिर्फ विवादास्पद प्रसंगों से बचती है, बल्कि नेताजी के कुछ बहुत ही भावुक पलों को बड़ी ख़ूबसूरती से सामने रखती है, जो आज के वक़्त में प्रासंगिक भी हैं, और प्रेरणास्पद भी, जैसे बर्मा में मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फर की कब्र पर चादर चढ़ाते हुए वादा करना कि एक दिन आपको हिंदुस्तान लेकर जायेंगे, जैसे मंदिर से दर्शन के बाद निकलते हुए माथे से तिलक का निशान मिटाना ताकि देश की लड़ाई में किसी एक धर्म की हिस्सेदारी न लगे. कास्टिंग में कुनाल, अमित और मोहित एकदम ठीक-ठीक हैं, अन्य कलाकारों में केनेथ देसाई मजेदार हैं.

आखिर में; 'राग देश' ऐसे मुश्किल वक़्त में जब देशभक्ति को लेकर सबके अपने अपने पैमाने हैं, आज़ादी की लड़ाई की एक सच्ची कहानी, एक सच्ची घटना को पूरी शिद्दत और नेकनीयती से सामने रखती है. मसाले कम हैं, तो थोड़ी बोरियत और सूनापन जरूर घेरने की कोशिश करेगा; मगर फिल्म की तमाम अच्छाइयों के बीच इसे नज़रंदाज़ करना इतना मुश्किल नहीं. [3/5]

Friday, 12 May 2017

सरकार 3: कंपनी नई-माल वही! [1/5]

‘फैक्ट्री’ बंद हो चुकी है. ‘कम्पनी’ खुल गयी है. बाकी का सब कुछ वैसे का वैसा ही है. पुराने माल को उसी पुराने बदरंग पैकेजिंग में डाल कर वापस आपको बेचने की कोशिश की जा रही है. अपनी ही फिल्म के एक संवाद ‘मुझे जो सही लगता है, मैं करता हूँ’ को फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा ने अपनी जिद बना ली है. ‘सरकार 3’ जैसी सुस्त, थकाऊ और नाउम्मीदी से भरी तमाम फिल्में, एक के बाद एक लगातार अपने ज़माने के इस प्रतिभाशाली निर्देशक को उसके खात्मे तक पहुंचाने में मदद कर रही हैं. तकनीकी रूप से फिल्म-मेकिंग में जिन-जिन नये, नायाब तजुर्बों को रामगोपाल वर्मा की खोज मान कर हम अब तक सराहते आये थे, वही आज इस कदर दकियानूसी, वाहियात और बेवजह दिखाई देने लगे हैं कि दिल, दिमाग और आँखें परदे से बार-बार भटकती हुई अंधेरों में सुकून तलाशने लगती है. और ऐसा होता है, क्यूंकि रामगोपाल वर्मा के सिनेमा की भाषा अब बासी हो चली है. पानी ठहरा हुआ हो, तो सड़न पैदा होती ही है. अपने दो सफल प्रयासों (सरकार और सरकार राज) के बावजूद, ‘सरकार 3’ से उसी सड़न की बू आती है.

अपने दोनों बेटों की मौत के बाद भी, सुभाष नागरे (अमिताभ बच्चन) का दम-ख़म अभी देखने लायक है. ठीक ‘सरकार’ की तरह, फिल्म के दूसरे-तीसरे दृश्य में ही नागरे एक बिज़नेसमैन का गरीब बस्तियों को हटाने के लिए करोड़ों का ऑफर ठुकराते हुए कहते हैं, ‘मैं नहीं करूंगा, और किसी को करने भी नहीं दूंगा’. इस बीच उनका पोता शिवाजी (अमित साध) भी लौट आया है. उधर विरोधी भी एकजुट होने लगे हैं. गोविन्द देशपांडे (मनोज बाजपेई) राजनीति के गंदे खेल का सबसे नया-नवेला चेहरा है. दुबई में बैठा वाल्या (जैकी श्रॉफ) अंडरवर्ल्ड की कमान संभाले है. साथ ही, शिवाजी की प्रेमिका अनु (यामी गौतम), जिसके पिता की हत्या सरकार ने करवा दी थी. षड्यंत्र और विश्वासघात से बुनी इस बिसात पर कोई नहीं कह सकता कि कौन सा मोहरा किस करवट बैठेगा? ‘सरकार 3’ एक बार फिर सरकार की सोच को सही साबित करने और उसकी शक्ति को बरक़रार रखने की लड़ाई है.

फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी है, फिल्म की बेतरतीब पटकथा और हद बनावटी संवाद. रामगोपाल वर्मा से बेहतर स्क्रिप्ट या कहानी की समझ रखना तो बेवकूफी है ही, इस बार फिल्म-लेखकों की टीम भी बुरी तरह निराश करती है. फिल्म का कोई भी हिस्सा आपको चौंकाने में सफल नहीं होता, बल्कि अपनी चौकन्नी समझ से आप खुद कदम-दो कदम आगे ही रहते हैं. फिल्म के संवाद बड़ी बेशर्मी से न सिर्फ अपने आप को दोहराते हैं, बल्कि सुनने में ही इतने बेस्वाद और बकवास लगते हैं कि कभी-कभी लगता है, उन्हें बोलते वक़्त अभिनेताओं की अपनी समझ कहाँ घास चरने चली गयी थी? मनोज बाजपेयी जैसे दिग्गज अभिनेता परदे पर 3 मिनट तक लगातार बोल रहे हों, और आप में तनिक भी जोश-ओ-ख़रोश पैदा न हो, तो गलती अभिनेता में नहीं, उन बेदम अल्फाजों में है जो आपने उन्हें परोसे हैं. फिल्म के शुरूआती दृश्य में ही, अमिताभ बच्चन परदे पर बूढ़े शेर की तरह दहाड़ रहे हैं, पर अफ़सोस! आपका ध्यान खींचने के लिए सिर्फ उनकी आवाज़ ही काफी नहीं है. ‘शेर की खाल पहन लेने से कोई कुत्ता शेर नहीं बन जाता’, ‘शेर कितना भी शक्तिशाली हो, जंगली कुत्ते मिलके शेर का शिकार कर ही लेते हैं’, ऐसे घटिया संवादों से भरी फिल्में मुझे वीसीआर के ज़माने में अच्छी लगती थीं.

फिल्म का तकनीकी पहलू भी उतना आजमाया हुआ है. फिल्म के सेट पर मौजूद किसी भी चीज़ का वहाँ पाया जाना सिर्फ एक ही जरूरत पूरी करता है, कैमरे की फ्रेमिंग को लेकर रामगोपाल वर्मा का पागलपन. टेबल पर पड़ा चश्मा हो, हाथ में कॉफ़ी का मग, चाय का कप, फर्श पर पत्थर का बना कुत्ता, कोने में खड़ा ‘लॉफिंग बुद्धा’; कभी न कभी सबको कैमरे के सामने आना ही है, वो भी पूरे क्लोज-अप में. वर्मा जाने किस ग़लतफहमी का शिकार फिल्ममेकर हैं, जो आज भी जोशीले फिल्म-स्टूडेंट की तरह आईने में एक हल्का शॉट डिजाईन करते हैं, और खुद को के. आसिफ मान कर बैठ जाते हैं. मानो अपने हिस्से का ‘शीशमहल’ उन्होंने पा लिया. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शोर-शराबे से भरा तो है ही, भड़काऊ भी है. जब भी आप सुनते हैं, आपको चीखने का मन करता है.

फिल्म की दो ही अच्छी बातें है. एक तो अमिताभ बच्चन, जो 12 साल बाद भी सुभाष नागरे के किरदार में उसी शिद्दत से फिट हो जाते हैं, जैसे पहली वाली ‘सरकार’ में. दूसरा मनोज बाजपेयी की अदाकारी, खास कर उस दृश्य में जहाँ वो राजनीति की तुलना समंदर की लहरों के साथ करते हैं. उनके किरदार का पागलपन उस दृश्य में सम्मोहित कर देता है. वरना तो पूरी फिल्म में हर अभिनेता खराब अभिनय की दौड़ में एक-दूसरे से आगे निकलना चाहता है. हाँ, जाने क्यूँ जैकी श्रॉफ का किरदार हर वक़्त एक कम-अक्ल मॉडल के साथ दिखाया जाता है? यकीन नहीं होता, इसी रामगोपाल वर्मा ने ‘कंपनी’ में हमें मलिक (अजय देवगन) जैसा ज़मीनी गैंगस्टर भी दिया था.

आखिर में, ‘ गॉडफ़ादर’ से ‘सरकार सीरीज’ की तुलना करने वाले रामगोपाल वर्मा खुद कांति शाह से ज्यादा काबिल नज़र नहीं आते, खास कर हिंदी सिनेमा में उनके हालिया योगदान को देखते हुए. दोनों में ‘बैक टू बैक’ फिल्में बनाने का ज़ज्बा तो कूट-कूट कर भरा है, पर दोनों को ही अपने आप को खुश रखने से फुर्सत नहीं. सिनेमा जाता है गर्त में, तो जाये, मेरी बला से! तकलीफ ये है, कि चाहकर भी 25 सालों से हिंदी फिल्में बनाने वाले रामगोपाल वर्मा हिंदी में मेरे ये जज़्बात पढ़ नहीं पायेंगे. तो सवाल ये है कि अब उन्हें ‘सरकार 4’ बनाने से रोकेगा कौन? [1/5]             

Friday, 2 September 2016

अकीरा: मानसिक अत्याचार! [1/5]

आर मुरुगदास की नई फिल्म ‘अकीरा’ की शुरुआत एक सूफी कहावत से होती है. “कुदरत भी आपके उसी गुण का बार बार इम्तिहान लेती है, जो आपके अन्दर सबसे ज्यादा है”. ये बात मुझ जैसे फिल्म समीक्षकों पर एकदम सटीक बैठती है. शुक्रवार-दर-शुक्रवार खराब फिल्मों को झेलने का जिस तरह का और जितना जोखिम हम उठा रहे होते हैं, उतनी ही बेदर्दी से ख़राब फिल्मों का ज़खीरा अगले हफ्ते फिर हमारी तरफ रुख कर लेता है. इन्तेहा तब हो जाती है, जब ऐसी फिल्मों का तूफ़ान गुज़र जाने के बाद भी, उनके बारे में लिखते वक़्त हमें उस मंज़र को दोबारा याद करना पड़ता है. खैर, ये तो अपनी ही चुनी राह है, तो शिकायत क्यूँ?

अकीरा’ देखने-सुनने से आपको महिलाओं के सशक्तिकरण के हक में आवाज़ उठाने वाली एक अलग फिल्म ज़रूर लग रही होगी, और लगती भी है खासकर फिल्म के पहले 10 मिनट में, जब महिलाओं पर होने वाले ‘एसिड अटैक’ जैसे घिनौने अपराधों का सहारा लेकर फिल्म लड़कियों को आत्म-रक्षा के लिए तैयार रहने की सीख देती है. पर, जल्द ही ये सारा माहौल बदलने लगता है और पूरे का पूरा ध्यान गिनती के चार भ्रष्ट पुलिस वालों के खिलाफ एक तेज़-तर्रार लड़की के संघर्ष पर केन्द्रित हो जाता है. गोविन्द राणे [अनुराग कश्यप] की अगुवाई में चार पुलिसवाले एक एक्सीडेंट के दौरान क्षतिग्रस्त कार की डिग्गी से करोड़ो रूपये उड़ा लेते हैं. गोविन्द के जुल्मों से आजिज़ एक सेक्स-वर्कर गोविन्द के इस इकबालिया बयान की विडियो बना लेती है, पर उसका फायदा उठाने से पहले ही विडियो कैमरा एक कैफ़े से चोरी हो जाता है. शक कुछ स्टूडेंट्स पर जाता है, जो पास के ही हॉस्टल में रहते हैं. उसी हॉस्टल की एक स्टूडेंट है अकीरा [सोनाक्षी सिन्हा], निडर, लड़ाकू और दबंग.

अकीरा’ एक दोयम दर्जे की राइटिंग की शिकार फिल्म है, जहां थ्रिलर के नाम पर कुछ भी उल-जलूल पेश किया जाता है, और जिसकी भनक आपको बहुत पहले ही लग जाती है. एक तरफ तो जहां फिल्म अकीरा के बेख़ौफ़ किरदार के साथ कुछ नया पेश करने का ज़ज्बा दिखाती है, वहीँ पुराने ढर्रे की कहानी और कहानी कहने के तरीके में नयापन न ढूंढ पाने की वजह से बहुत ही आलसी और थकी हुई नज़र आती है. ये वो फिल्म है जो सत्तर या अस्सी के दशक से अब तक कोमा में थी, और जहां अब भी दुश्मनों से निपटने के लिए उन्हें ‘पागलखाने’ भेज दिया जाता है. यहाँ मानसिक रोगियों को ‘पागल’ दिखाने और बोलने में किसी को कोई गुरेज़ या झिझक नहीं होती. यहाँ अब भी हर मनोरोगी का इलाज़ बिजली के झटके और इंजेक्शन ही होते हैं. फिल्म एक हिस्से में बालाजी टेलीफिल्म के धारावाहिकों से भी प्रेरित लगती है, जब नए ज़माने की बहू अपनी सास को पहली बार देखती है और दौड़ कर उसके पैरों के पास से बच्चे के खिलौने उठाने लगती है. सास को लगता है, वो पैर छूने आई थी. बेटे के चेहरे पर कोई भाव नहीं हैं.

अकीरा’ दर्शक के तौर पर आपकी मानसिक क्षमता को कमतर आंकने का दुस्साहस बार-बार करती है. हर छोटी से छोटी बात को तसल्ली से बयान करने में इतना उलझी रहती है कि अपने ढाई घंटे के पूरे वक़्त में ज्यादातर बेमतलब और वाहियात ही लगती है. फिल्म के चंद गिने-चुने मजेदार पल अनुराग कश्यप को देखते हुए बीतते हैं, जहां उनका मजे ले-लेकर अभिनय करना, उनके किरदार के कमीनेपन पर भारी पड़ता रहता है. आखिर के दृश्य में, ये बावलापन और भी बढ़ कर गुदगुदाता है. ईमानदार और चौकस गर्भवती पुलिस अफसर की भूमिका में कोंकना सेन शर्मा पूरी फिल्म में अलग-थलग सी पड़ी रहती हैं. उनका फिल्म में आना-जाना बड़ी बेतरतीबी से होता है. सोनाक्षी अपनी पिछली फिल्मों से अलग यहाँ पूरी शिद्दत से अपने किरदार में ढली रहने की कोशिश करती हैं. एक्शन दृश्यों में उनका आत्मविश्वास और खुल के सामने आता है.

अंत में, ‘अकीरा’ नारी-शक्ति की जिन उम्मीदों की दुहाई देती है, उन्हें तोड़ने और मिट्टी में मिलाने का सुख भी अपने हिस्से ही रखती है. अकीरा की सारी लड़ाई अपने अस्तित्व तक ही सीमित रख कर, वो भी एक ऐसे घटनाक्रम के ज़रिये जहां उसकी मौजूदगी में न कोई वाजिब वजह हो, न कोई संवेदनशील उद्देश्य, फिल्म अपने औसतपन से ऊपर उठने की कोशिश भी नहीं करती. और नीचे गिराने में रही सही कसर पूरी कर देता है, फिल्म का बहुत ही ठंडा, हल्का और लचीला स्क्रीनप्ले. इसे देखना खुद पर एक मानसिक अत्याचार से कम नहीं! [1/5]      

Wednesday, 6 July 2016

सुल्तान: भाई मुबारक!! [3/5]

ईद आ गयी है. सिर्फ इसलिए नहीं क्यूंकि रमज़ान का महीना ख़त्म होने को आया बल्कि इसलिए भी क्यूंकि ‘भाई’ की फिल्म सिनेमाघरों में आ गयी है. लोग अपनों में ईद मनाने ‘अन्दरुने मुल्क’ तो जा ही रहे होंगे, सिनेमाघरों में भी भीड़ गज़ब की उमड़ने लगी है. ये अप्रत्याशित नहीं है. इसी की उम्मीद थी, और ये उम्मीद बड़ी सोची-समझी उम्मीद है. इस उम्मीद का सिनेमा से उतना लेना-देना नहीं है, जितना कि फिल्मों के व्यावसायिक पक्ष से. अली अब्बास ज़फर की ‘सुल्तान’ जिस दिमागी कसरत से उपजती है, वहां स्टार की डेट्स और रिलीज़ का दिन पहले मुकर्रर हो जाता है; कहानी, निर्देशन और अभिनय से जुड़े दूसरे पहलू इसके बाद धीरे-धीरे अपने तय क्रम में जुड़ते चले जाते हैं.

‘भाई’ की कोई भी फिल्म ‘भाई’ की ही फिल्म होती है. ‘सुल्तान’ कुछ अलग नहीं है. हाँ, कुछ मामलों में थोड़ी बेहतर ज़रूर है. बड़े कसमसाते हुए ही सही, ‘भाई’ यहाँ 30 की उम्र से सफ़र करते हुए 40 की दहलीज़ तक पहुँचने का दम-ख़म दिखाते हैं, पहली बार. हालाँकि ‘भाई’ पहले भी स्क्रीन पर शर्ट उतारते नज़र आये हैं, पर इस बार जब वो ऐसा करते हैं, अन्दर से उनके गठीले बदन के खांचे नज़र नहीं आते बल्कि एक थुलथुली सी तोंद सामने छलक पड़ती है. जाने-अनजाने ही सही, ‘भाई’ ने किरदार में ढलने की ओर एक सफल कोशिश तो कर ही दी है. रही-सही कोर-कसर पूरी कर देते हैं ‘मस्तराम’ और ‘मिस टनकपुर हाज़िर हों’ के अभिनेता राहुल बग्गा, जो इस फिल्म में ‘भाई’ के हरियाणवी लहजे पे नज़र रखने वाले मास्टरजी बनकर परदे के पीछे ही डटे रहते हैं. इतने सब के बावजूद भी, ‘भाई’ अपने एक उसूल से पीछे नहीं हटते. ‘भाई’ एहसान लेते नहीं, एहसान करते हैं. चाहे वो अकेले हल चलाकर खेत जोतना ही क्यूँ न हो. वैसे अगर हल को पीछे से जमीन में जोतना वाला कोई न हो तो ये काम काम रह ही नहीं जाता. फिर तो आप दौड़ते रहिये हल सर पे उठाये.

सुल्तान’ में पहलवानी और मुक्केबाजी भरपूर है, पर इसे एक ‘स्पोर्ट्स फिल्म’ कहना उतना ही बचकाना होगा जितना साजिद खान की फिल्मों को कॉमेडी कहना. असलियत में ‘सुल्तान’ दो कुश्तिबाज़ों की प्रेम-कहानी है. आरफ़ा [अनुष्का शर्मा] और सुल्तान [सलमान खान]. आरफ़ा ओलंपिक्स में भारत के लिए गोल्ड मेडल हासिल करने का सपना देख रही है. गाँव का निठल्ला-नालायक सुल्तान जब उसे पहली बार मिलता है, आरफ़ा के मन में कोई दो राय नहीं है. उसके लिए उसका सपना ही सब कुछ है. आपको लगता है ये है हरियाणे की लड़की. बाद में, 30 साल का सुल्तान उसके प्यार में पहलवान तक बन जाता है. अचानक आरफ़ा को निकाह पढ़वाना है. अचानक आरफ़ा को माँ बनने से भी कोई दिक्कत नहीं. अचानक आरफ़ा को अपना सपना सुल्तान के सपने में दिखने लगता है. और ये सब सिर्फ इसलिए क्यूंकि ‘सुल्तान’ ‘भाई’ की फिल्म है. और चूँकि ‘सुल्तान’ ‘भाई’ की फिल्म है तो ‘भाईगिरी’ तो रहेगी ही; ‘बीइंग ह्यूमन’ का तड़का भी होगा, कभी न कम पड़ने वाला ‘स्वाग’ भी होगा, थोड़ी उल-जलूल हरकतें भी होंगीं, इमोशंस का बहाव भी होगा और होगा ढेर सारा एक्शन. सब है. अगर कुछ नहीं है, तो ये सब होने की कोई ख़ास, कोई मुक्कमल वजह!

तकरीबन 3 घंटे के अपने पूरे वक़्त में, ‘सुल्तान’ बेहतरीन कैमरावर्क, शानदार प्रोडक्शन-डिज़ाइन, जोशीले साउंडट्रैक और कुछ बहुत अच्छे फाइटिंग सीक्वेंस के साथ आपको बांधे रखने की पूरी कोशिश करती है. अभिनय में कुमुद मिश्रा, अमित साढ और सुल्तान की दोस्त की भूमिका करने वाला कलाकार पूरी तरह प्रभावित करते हैं. रणदीप हुडा मेहमान कलाकार की हैसियत से थोड़े ही वक़्त स्क्रीन पर नज़र आते हैं. अनुष्का के किरदार के साथ फिल्म की कहानी भले ही पूरी तरह न्याय करती न दिखती हो, पर अनुष्का कहीं भी कमज़ोर नहीं पड़तीं. ‘भाई’ की फिल्म न होती तो शायद हम और फिल्म के लेखक इस किरदार की पेचीदगी को और समझने की कोशिश ज़रूर करते.

अंत में; ‘सुल्तान’ में सलमान बहुत हद तक फिल्म के किरदार को अपनाने की ओर बढ़ते दिखाई देते हैं. फिल्म में कई बार अपने हाव-भाव, अपने लहजे-लिहाज़ और अपने पहनावे से सलमान आपको चौंका देते हैं, और ये हिंदी सिनेमा के लिए काफी अच्छे संकेत हैं हालाँकि उनके अभिनय के बारे में अब भी बहस की जा सकती है, पर सबसे ज्यादा निराश करती है फिल्म की औसत कहानी और उसके घिसे-पिटे डायलाग. ज़िन्दगी के थपेड़ों से लड़ते-जूझते बॉक्सर जिनको अंततः मोक्ष, मंजिल, मुक्ति मिलती है बॉक्सिंग रिंग के अन्दर ही; ऐसी कितनी ही कहानियाँ हम पहले भी परदे पर देखते आये हैं, और इससे कहीं बेहतर ढंग से कही गयी, पर ‘सुल्तान’ की बात अलग है. ये ‘भाई’ की फिल्म है, तो ईद के मौके पर आप सबको...‘भाई मुबारक’! [3/5]          

Friday, 3 July 2015

GUDDU RANGEELA: Average Writing makes it Average! [2/5]

Subhash Kapoor carries certain gravity with his name. You should remember him as the wisely witty and responsibly engaging filmmaker behind PHAS GAYE RE OBAMA- a hilarious take on Global Recession and JOLLY LLB- another satirical drama on Indian Judiciary System. The fact that he’s been chosen to replace Raju Hirani and direct the next in the MUNNABHAI series itself says a lot about the man. Sadly, his latest GUDDU RANGEELA despite having all his trademarks fails miserably to impress, or even entertain at large to match that extended expectations.

Full-time Orchestra singers and small-time criminals Guddu [Amit Sadh] and Rangeela [Arshad Warsi] find themselves trapped in a ‘kidnapping gone wrong’ case but what’s hidden in the box, has also an opportunity they have been looking for almost a decade. Their counterpart Billu Pehalwan [Ronit Roy] is a local MLA and a hardcore supporter-admirer and motivator of Khap Panchayats. Honor-killing is just one of his favorite leisure activities.

GUDDU RANGEELA decides to talk about social filths of many sorts but doesn’t showcase guts to provide sensible solutions or a definite way out in any manner. In fact, it doesn’t think twice before turning a potential social-drama into a personal revenge-saga. Khap Panchayats can be as heartless, harsh and cold-blooded as anyone could think of. We all are sentient to the Manoj-Babli honor killing case; but this is no real world. Looks like Subhash Kapoor believes in having the cake and eating it too. The reel world’s Manoj and Babli conveniently escape the bloody fate to be able to walk the road to the bazaar-demanding happy end. The writing and the jokes are strictly average, though the twist in the first half is well-executed. Film loses its steam completely when starts settling all this with a dramatic climax on the lines of any action movie from 80’s.  

Raju Hirani is known to bring interesting still images on screen that has already been successful in filling your heart with joy. Remember, the passing shot of a man clicking a bunch of women all clad in Burkha from head to toe, in 3 IDIOTS? Mr. Kapoor too tries it with the most colorful visual in the film, of Saadhus playing football in the yard of a temple. In others, Achint Kaur plays a new-age Chief Minister enjoying her chewing gum while showing off her strength and force in the character. The coolest, I say! And then there is this intrepid scene where Guddu unapologetically asks Baby [Aditi Rao Hydari], “Degi?” without giving any shady explanation. I like it! I wish GUDDU RANGEELA would have had more and more of such differently able scenes, and not just some lame, age-old and tasteless jokes to cover-up.

Arshad Warsi is repeating himself big time, I’m telling you. His ISHQIYA days are still here. And he is hardly able to level it with whatever he’s getting to play. Amit Sadh tries his hard to give us a believable Haryanvi character but the efforts overshadow the talent. Ronit Roy despite having a one-dimensionally written part manages to pull out very well. He never goes off-track, neither in his attitude nor in the lingual detailing. Of the rests, Rajeev Gupta as the Sub-inspector tickles you the most.

At last, with the kind of metaphors and affection Subhash Kapoor uses in GUDDU RANGEELA, it sure can be seen as his SHOLAY mashed with the sensitivity towards some real bad social impurities. But not in a perfect measure! [2/5]