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Friday, 18 August 2017

बरेली की बर्फ़ी: प्रेम-त्रिकोण की पारिवारिक मिठाई! अहा, मीठी-मीठी! [3/5]

'मोहल्ले का प्यार अक्सर डॉक्टर-इंजीनियर ले जाते हैं', 'राँझना' में कुंदन को मुरारी का ये दिलचस्प ज्ञान आपको भी मुंह-जुबानी याद होगा. छोटे शहरों का ऐसा वाला प्यार, अपनी तमाम कमियों-कमजोरियों के साथ, परदे पर 'राँझना' से ज्यादा मजेदार हाल-फिलहाल में नहीं दिखा. लड़की एक दोस्त को पसंद आते ही दूसरे के लिए फ़ौरन 'भाभी' बन जाती है. लड़का हर मुमकिन कोशिश में रहता है कि कैसे लड़की के साथ-साथ उसके माँ-बाप की नज़रों में भी 'अच्छा' बनके पूरे नंबर कमाये जाएँ? और इन सब चक्करों के बीच, खतरा ये भी कि आप खुद अपनी शादी की मिठाई खाने के बजाय, उसी घर में, उसी लड़की की सगाई की तैय्यारी में, मेहमानों के लिए खुद लड्डू बाँध रहे हों. हालाँकि पिछले कुछ सालों में 'दम लगा के हईशा', 'तनु वेड्स मनु' और 'बहन होगी तेरी' जैसी तमाम सफल-असफल फिल्मों में इन मोहल्लों, इन गलियों और इन किरदारों को आपने खूब अच्छी तरह देखा-भाला है, तो अश्विनी अय्यर तिवारी की फिल्म 'बरेली की बर्फी' में नयेपन के नाम पर बहुत कुछ ज्यादा आपको रिझाने के लिये है नहीं, पर आखिर में हम सब हैं तो हिन्दुस्तानी ही, मीठा जब मिले, जहां मिले, जैसा मिले, खुशियाँ अपने आप चेहरे पर अनायास तैर जाती हैं. 'बरेली की बर्फी' ऐसी ही एक प्यार भरी मिठास दिल खोल कर बांटती है. 

बाप (पंकज त्रिपाठी) सुबह-सुबह 'प्रेशर' बनाने के लिये सिगरेट खोज रहा है. माँ (सीमा पाहवा) बेटी (कृति सैनन) को जगा कर पूछ रही है, 'है क्या?, एक दे दे, अर्जेंट है'. बेटी बिट्टी मिश्रा में और भी 'ऐब' हैं, इंग्लिश फिल्में देखती है, रातों को देर से घर लौटती है. तेजतर्रार माँ के डर से, बाप यूँ तो रात को उठकर चुपके से दरवाज़ा खोल देता है, पर एक गुजारिश उसकी भी है, "बाइक पर दोनों पैर एक तरफ करके बैठा कर!". जाहिर तौर पर शादी के लिये रिश्ते हर बार सिर्फ चाय-समोसे तक ही सीमित रह जाते हैं. आखिरी लड़के ने तो पूछ लिया था, "आर यू वर्जिन?" और बिट्टी ने भी जो रख के दिया था, "क्यूँ? आप हैं?"...पर कोई तो है जो बिट्टी को करीब से जानता है, और उसकी कमियों के साथ उसे चाहता है. प्रीतम विद्रोही (राजकुमार राव) के किताब में नायिका बबली एकदम बिट्टी जैसी ही है. बिट्टी को प्रीतम से मिलना है, पर उस अनजान लेखक को शहर में अगर कोई जानता है तो सिर्फ चिराग दूबे (आयुष्मान खुराना) जिसने असलियत में अपनी पूर्व-प्रेमिका बबली के लिये लिखी कहानी, प्रीतम के नाम से खुद अपनी ही प्रिंटिंग-प्रेस में छापी थी. अब जब बिट्टी में चिराग को बबली दिखने लगी है, तो दब्बू और डरपोक प्रीतम को बिट्टी की नज़रों से गिराने में उसे तिकड़मी बनने के अलावा कुछ और नहीं सूझता.   

प्यार में चालबाजी कब उलटी पड़ जाती है, और रंगबाजी कब उस पर हावी हो जाती है; 'बरेली की बर्फी' कहानी के इन उतार-चढ़ावों में बेहद मजेदार है. जहां फिल्म का पहला भाग आपको बरेली जैसे छोटे शहरों की आब-ओ-हवा के साथ घुलने-मिलने पर ज्यादा तवज्जो देता है, दूसरे हिस्से में राजकुमार राव अपनी बेहतरीन अदाकारी और अपने गिरगिटिया किरदार से आपको बार-बार खुल कर हंसने का मौका देते हैं. जावेद अख्तर साब की आवाज़ में सुनाई जा रही इस कहानी में ठेठ किरदार, सधी अदाकारी और आम बोल-चाल की भाषा का इस्तेमाल ज्यादातर मौकों पर एक साथ खड़े दिखते हैं. अपने अनुभवी और योग्य सह-कलाकारों (खास कर पंकज और सीमा जी) के साथ, अश्विनी परदे पर पूरी कामयाबी से हर दृश्य को देखने लायक बना ही देती हैं. हालाँकि मुख्य कलाकारों में कृति और आयुष्मान हर वक़्त उस माहौल में खपने की पूरी कोशिश करते नज़र आते हैं, पर जो सहजता और सरलता राजकुमार राव दिखा और निभा जाते हैं, कृति और आयुष्मान उस स्तर तक पहुँचने से रह ही जाते हैं. राव जैसे किसी ठहरी हुई फिल्म में आंधी की तरह आते हैं, और हर किसी को जिन्दा कर जाते हैं. दोपहर की गर्मी में निम्बू-पानी तो पी ही रहे थे आप, उसमें जलजीरा जैसे और घोल दिया हो किसी ने. 

सीमा पाहवा और पंकज त्रिपाठी के बीच के दृश्य बाकमाल हैं. ट्रेलर में सीमा जी का बिट्टी के भाग जाने का ख़त पढ़ने वाला दृश्य तो सभी ने देखा है, अदाकारी में जिस तरह की पैनी नज़र सीमा जी रखती हैं, और जिस तरीके के हाव-भाव बड़े करीने से अपने अभिनय में ले आती हैं, आप दंग रह जाते हैं. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें, तो पंकज त्रिपाठी फिल्म में ज्यादातर 'फ़िलर' की तरह परोसे गए हैं. हर दृश्य में उनके होने की वजह भले ही न हो, उनके संवाद भले ही दृश्य की जटिलता में कोई इज़ाफा न करते हों, फिर भी उनके सटीक और सहज एक्शन-रिएक्शन आपका मन मोह लेते हैं. 

आखिर में; अश्विनी अय्यर तिवारी की फिल्म 'बरेली की बर्फी' बॉलीवुड के चिर-परिचित प्रेम-त्रिकोण को एक ऐसी चाशनी में भिगो कर पेश करती है, जिसमें मनोरंजन के लिए किसी भी तरह का कोई बाजारू रंग नहीं मिला है. आपके अपने चहेते दुकान की शुद्ध देसी मिठाई, जिसे आप जब भी खाते हैं, अपने अपनों के लिए भी पैक कराना नहीं भूलते. [3/5] 

Friday, 23 December 2016

दंगल: साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! [5/5]

अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.

महावीर सिंह फोगाट (आमिर खान) किसी अलग सांचे में ढला पिता नहीं है. ऐसे पिता, जिनके मुंह से ‘शाब्बास’ सुनने के लिए बच्चों के कान तरस जाएँ, हमारे आस-पास बहुतेरे हैं. ऐसे पिता, जिनके भारी-भरकम सपनों को पीठ पर लादे बच्चे अंधाधुंध भाग रहे हों, हम सबने देखे हैं. कभी अपने पिता में, तो कभी बगल वाले शर्मा जी में. महावीर सिंह फोगाट को अगर कुछ अलग करता है, तो वो है उसकी जिद, उसका जूनून और परिस्थितियों से सीखने, सीख कर समझने और समझ कर संभलने का लचीलापन, जो उसके हठी किरदार में एक रोचक और रोमांचक विरोधाभास पैदा करता है. कुश्ती में मेडल लाने का सपना सिर्फ एक बेटा ही पूरा कर सकता है, फोगाट इस चाह में चार बेटियों का पिता बन चुका है. ऐसे में, एक दिन जब उसे एहसास होता है कि मेडल बेटियाँ भी ला सकती हैं, तो अपनी बच्चियों गीता (ज़ायरा वसीम) और बबिता (सुहानी भटनागर) को अखाड़े तक लाने में कोई ढील नहीं बरतता.       

फिल्म के दूसरे हिस्से में ‘दंगल’ कई परतों में खुलती है. गीता (फ़ातिमा सना शेख) को राष्ट्रीय खेल अकादमी में एक उजड्ड कोच (गिरीश कुलकर्णी) के भरोसे छोड़कर लौटते बाप की उलझन हो, शाहरुख़ की फिल्म और गोलगप्पों के बीच कुश्ती के नए तौर-तरीकों से पनपा गीता का नया आत्म-विश्वास हो या बबिता (सान्या मल्होत्रा) के साथ उसके वैचारिक मतभेद; बाप-बेटियों के इस ज़ज्बाती गुत्थम-गुत्थी से अलग हटकर देखें, तो कुश्ती को एक खेल के रूप में परदे पर प्रस्तुत करने वाली बेशक ‘दंगल’ सबसे भरोसेमंद फिल्म है. कुश्ती के गूढ़ दांव-पेंच यहाँ जिस रोमांचक तरीके से दिखाए और समझाए जाते हैं, उनका मकसद किरदारों या उन्हें निभाने वाले कलाकारों को परदे पर बढ़ा-चढ़ा कर ‘नायक’ की तरह पेश करना कतई नहीं रहता, बल्कि उन खालिस पलों में सिर्फ कुश्ती ही निखर कर सामने आती है. फिल्म का टाइटल सीक्वेंस भी इसी सोच की बुनियाद पुख्ता करता है, जहां असली दुनिया के असली पहलवान कैमरे के सामने खड़े आपकी आँखों में एकटक झांकते दिखाई देते हैं.

दंगल’ एक कलाकार के तौर पर आमिर खान की सबसे अच्छी फिल्म है. अपने स्टारडम को हाशिये पर रखकर किरदार तक ही सीमित रहने का हुनर उनसे अच्छा शायद ही किसी और ‘स्टार’ को आता हो. बात सिर्फ वजन घटा-बढ़ा कर प्रयोग करने की नहीं है, फिल्म के तमाम जरूरी हिस्सों और दृश्यों में केंद्र-बिंदु बने रहने का लोभ-संवरण कर पाना, हर किसी के बस की बात नहीं. अपनी पहली ही फिल्म में गीता और बबिता के किरदारों में ज़ायरा, सुहानी, फ़ातिमा और सान्या चारों ही आपको लुभाने, हंसाने, रुलाने और इमोशनली जोड़े रखने में कामयाब रहती हैं. फिल्म में अगर किसी का होना बहुत चौंकाता है, तो वो हैं साक्षी तंवर. साक्षी भले ही फिल्म में कैमरे का पसंदीदा चेहरा न रही हों, (आप उन्हें अक्सर बैकग्राउंड में ही देखते हैं) पर फिल्म की रंगीनियत में उनसे ज्यादा घुला-मिला, रचा-बसा शायद ही कोई और दिखता है. अपारशक्ति खुराना प्रभावित करते हैं, इस हद तक कि जैसे इसी रोल के लिए बने हों.

आखिर में, ‘दंगल’ कमियों से परे न होते हुए भी (फिल्म का सोचा-समझा अंत थोड़ा असहज करता है) एक ऐसी मुकम्मल फिल्म है, जो मनोरंजन का दामन छोड़े बगैर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की बागडोर पूरी मुस्तैदी से अपने हाथ रखती है. सच्चे किरदारों की सच्ची कहानियाँ परदे पर कहनी हों, तो ‘दंगल’ बॉलीवुड के लिए बाइबिल से कम नहीं. साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! देखने जाईये, अभी जाईये, पूरे खानदान के साथ जाईये! [5/5]                  

Friday, 22 April 2016

निल बट्टे सन्नाटा: जिंदगी-कहानी-सिनेमा! [4/5]

सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है.

घरों, जूते की फैक्ट्री और मसाले की दुकानों पर काम करने वाली चंदा (स्वरा भास्कर) एक रात जब थक कर सोने से पहले अपनी 15 साल की बेटी अप्पू (रिया शुक्ला) से पूछती है कि वो बड़ी होकर क्या बनेगी? अप्पू खरी-खरी कह देती है, “मैं बाई बनूंगी. बाई की बेटी बाई ही तो बनेगी.” चंदा बहस में जीत नहीं सकती. 10वीं के बाद अप्पू को पढ़ाने के लिए पैसे कहाँ हैं चंदा के पास? वैसे भी, अप्पू मैथ्स में ‘निल बट्टा सन्नाटा’ है, मतलब ज़ीरो. पैसे तो बाद की बात हैं, पर इस मैथ्स का क्या करें? चंदा तो खुद मैट्रिक फ़ेल है. डॉ. दीवान (रत्ना पाठक शाह) के पास एक उपाय है. चंदा भी अप्पू का स्कूल ज्वाइन कर ले, खुद भी पढ़े और अप्पू की भी मदद करे. बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए माँ-बाप क्या कुछ नहीं करते, पर हम बच्चे कितना समझ पाते हैं? अप्पू के पास तो कोई सपना ही नहीं है, और चंदा के पास अप्पू से बड़ा कोई सपना नहीं!

अश्विनी अय्यर तिवारी अपनी पहली ही फिल्म में साफ़ कर देती हैं कि सिनेमा कहानी कहने का एक सशक्त माध्यम है, कहानी जिसका कहा जाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है उसका सही ढंग से कहा जाना. आगरा की तंगहाल बस्तियां हों या सरकारी स्कूलों का वही जाना-पहचाना बेढंगापन; तिवारी बड़ी खूबी से फिल्म को सच्चाई के बिलकुल करीब तक रखने में कामयाब रही हैं. उनके किरदार भी अपनी जड़ों से एक बार भी उखड़ते दिखाई नहीं देते. चंदा गुस्से में होती है तो अपनी बेटी को भी गाली देने से झिझकती नहीं.

अभिनय की दृष्टि से ‘निल बट्टे सन्नाटा’ एक जोरदार और जबरदस्त फिल्म है. स्वरा भास्कर एक पल को भी चन्दा से अलग नहीं दिखतीं. बेटी की हताशा में बेबस, गरीबी से जूझती, सपनों को जिंदा रखने में दौड़ती-भागती एक अकेली माँ का सारा खालीपन उनकी आँखों में हमेशा तैरता रहता है, ऐसा शायद ही कभी होता है कि वो पूरी तरह टूट जाएँ स्क्रीन पर, फिर भी आपकी आँखों को भिगोने में वो हर बार कामयाब होती हैं. अपनी पहली फिल्म में ही रिया एक मंजी हुई कलाकार की तरह आपको चौंका देती हैं, और इन दोनों के बीच फिल्म के सबसे मजेदार दृश्यों में नज़र आते हैं पंकज त्रिपाठी! अक्खड़, अकड़ू और निहायत ही अनुशासित मैथ्स टीचर की भूमिका में त्रिपाठी आपको अपने किसी न किसी पुराने टीचर की याद दिला ही देंगे.

अंत में; ‘निल बट्टे सन्नाटा’ सिनेमा के उस क्लासिक नियम की जोर-शोर से पैरवी करती है, जहां फिल्म के बड़ी होने से कहीं ज्यादा ‘कहानी’ का बड़ा होना मायने रखता है. फ़िल्म के एक दृश्य में चंदा कहती भी है, “कृष 3 नहीं है, जिंदगी है जिंदगी”. और जिंदगी से ज्यादा दिलचस्प, जिंदगी से ज्यादा जज्बाती, जिंदगी से ज्यादा सच्ची कहानी और क्या होगी! [4/5] 

Friday, 11 April 2014

BHOOTHNATH RETURNS: A serious family entertainer that could have been sweeter if shorter! [3.5/5]

If you could just overlook the overtly stretched length of the film [2 hour 35 minutes to be précised], there is an enormous chance you would discover quite a complete family entertainer in Nitesh Tiwari’s directorial sequel BHOOTHNATH RETURNS that also manages to talk about many social issues in a loud, clear and smart way. A satirical take on criminalization, corruption and commercialization of Indian politics, BHOOTHNATH RETURNS is suitably backed by juicy writing with proper dose of wit and Indian melodrama, applause-worthy performances, fearless direction and a story that touches your heart at large.

Taking story forward from the previous part, Kailash Nath played by the towering inferno called Amitabh Bachchan is sent to an afterlife ghost world which is being run in a modus operandi similar to our slow-moving, uninterested, unresponsive government offices of all kinds. Just because he could not scare a little kid Banku on earth, he’s now sent back to earth to rectify his failure. But to his bad bad luck, the kid here a rough-tongued, carefree slumdog tapori named Akhrot from Dharavi [Parth Bhalerao, equally confident and high on talent] also bounces back to Bhoothnath’s scare tactics with, “tu bhoot hai toh main daayan, shaadi banayega??” The chemistry between two sparks from the very start and they become friends forever. Things look smooth until the events and actions lead them to Bhau- the local goon-turned-corrupt politician [Boman Irani in a bit repetitive but interesting role]. And then starts the most dis-interesting game of politics for common man with a new fascinating twist! Bhoothnath is ready to contest the election against Bhau!!

Writer-director Nitesh Tiwari smartly makes the story move from being a satirical take on life afterlife to the dead serious issues in current political scenario in our country. After a hilariously amusing first 45 minutes that includes mainly the bonding between Bhoothnath and Akhrot, when Nitesh takes a u-turn on politics with a grim-grave real visual montage of child-labor, poverty, unemployment and hunger on a goose-bumping song ‘Saahib nazar rakhna’ you sure dip in doubts if this is the right route for a bollywood entertainer?? But the way Nitesh takes it forward, it’s amazing!                   

From long queue of dead souls in waiting to get their desired reincarnation in the bhoot-world to Bhoothnath filing nomination in the Loksabha elections, film keeps you engaged and entertained for the most part and often in a regular interval. Only letdown here is the duration that makes you wonder if the film would ever end. On the performances, I would repeat Akhrot as he says to Bhoothnath, “thoda overacting kiya tu, but India mein yehi chalta hai”. Amitabh Bachchan is exceptionally likeable and emotive, Boman as a mean-menace Bhau suits the part but it’s Parth Bhalerao who stands taller than anyone else and steals the show with his power-packed coolness and ‘bindaas’ performance! Cameo by Anurag Kashyap and a short but soul-stirring part of a dead social activist by Vijay Maurya are worth mentioning.

In these times of elections, BHOOTHNATH RETURNS is the best bet for anyone to get motivated to cast his vote as it speaks in volumes about anything and everything in Indian politics and that too without losing its spirit, sensitivity and the entertainment quotient. It dares to inherit the sparks, simplicity and sincerity in the story-telling techniques any of ‘Raju Hirani’ movies successfully emboss…and succeeds too, if not for the whole in glimpse for sure! Watch it! [3.5/5]