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Thursday, 8 November 2018

ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान: सिनेमा के ठगों से बचिए! [1.5/5]


1968 में एक फिल्म बनी थी, ‘राजा और रंक’. राजा-महाराजाओं की कहानी थी. नायक (संजीव कुमार) कालकोठरी में बंद है. उसे छुड़ाने की गरज़ से आई नायिका (कुमकुम) ‘मेरा नाम है चमेली गीत गाते-गाते पहरेदारों और सिपाहियों को शराब पिला-पिला कर धुत्त कर देती है. नायक गिरफ़्त से बच निकलता है. ठीक 50 साल बाद, ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान में नायक आमिर खान भी ऐसी ही कुछ जुगत लगा रहे हैं, अमिताभ बच्चन के किरदार को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने में. बस्स, शराब की जगह इस बार नशीले लड्डुओं ने ले ली है. ‘मेरा नाम है चमेली गीत मैं आज भी बड़े, छोटे हर परदे पर देख सकता हूँ. उस गाने के साथ मेरा बचपन और बीते दौर की महक दोनों खिंचे चले आते हैं. ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के साथ इस तरह की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. न कानों को प्रिय लगने वाला संगीत, ना ही पुराने दौर से जुड़े होने का भरम. इसलिए इसे देखते वक़्त, अक्सर मुझे मनोज कुमार की ‘क्रांति के गानों की तलब लगने लगती है. आख़िरकार, जब सब कुछ पुराना सा, नकली और बासी ही है, तो बीते हुए कल में झांककर पहले से मौजूद मनोरंजन खोज लेने में हर्ज़ ही क्या है? हाँ, लेकिन तब फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा स्टूडियो (यशराज फिल्म्स) होने का अहम् ज़रूर दांव पर लग जाएगा.

1795 के आसपास का वक़्त है. ज़रूर भारत उस वक़्त ‘सोने की चिड़िया’ ही रहा होगा. कम से कम, फिल्म के भारी-भरकम सेट्स देख के तो यही लगता है. खैर, खुदाबक्श जहाज़ी (अमिताभ बच्चन) आज़ाद का नाम धरकर अंग्रेज़ों से लोहा ले रहा है. साथ है ज़फीरा (फ़ातिमा सना शेख़), जो पिता की हत्या के बाद अंग्रेजों से रियासत वापस लेने की लड़ाई लड़ रही है. अंग्रेज़ अफसर क्लाइव (लॉयड ओवेन) का मोहरा है, फिरंगी मल्लाह (आमिर खान). अव्वल दर्ज़े का धोखेबाज़, जो गिरगिट से भी तेज़ अपना रंग बदलता है और पैसों के लिए कभी भी अपना पाला बदल सकता है. एक फिरंगी मल्लाह के किरदार को थोड़ी रियायत दे दें; तो फिल्म का कोई भी दृश्य या किरदार ऐसा नहीं है, जो आपको पूरी तरह प्रभावित करता हो या चौंकाने में कामयाब होता हो. कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म के लेखक-निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य फ़ॉर्मूले में बंधी एक बेहद औसत दर्जे की कहानी चुनते हैं, जिसका हर मोड़ आपका जाना-पहचाना है. ऊपर से, समझदारी से ज्यादा सहूलियत के साथ एक दृश्य से दूसरे दृश्य में जाने का आलसीपन. आज़ादी की लड़ाई से कहीं ज्यादा, फिल्म ज़फीरा के बदले की कहानी बन के रह जाती है.

विजय कृष्ण आचार्य बड़े कैनवस की फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. यकीनी तौर पर, फिल्म के सेट्स और कैमरा शॉट्स हर बार बड़े से और बड़े होते जाते हैं, और कहानी हर बार इस भव्यता के नीचे कहीं दब कर दम तोड़ देती है. ताज्जुब तब होता है, जब आमिर जैसे समझदार भी जान-बूझ कर बड़ी आसानी से इस साज़िश का हिस्सा और शिकार बन जाते हैं. फिल्म का 10 से 15 फ़ीसदी हिस्सा सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक के सहारे (वो भी वेस्टर्न स्टाइल का संगीत) किरदारों को बड़ा करके दिखाने में खर्च हो जाता है. स्लो-मोशन कैमरा हो या लो-एंगल शॉट्स; फिल्म कहानी में ड्रामा भले ही न पेश कर पाती हो, दृश्यों में ठूंस-ठूंस कर ड्रामा भरती जरूर नज़र आती है. यशराज फिल्म्स में एक वक़्त तक (यश चोपड़ा साब के ज़माने में) कहानी के लिए एक तयशुदा डिपार्टमेंट होता था. उनके जाने के साथ ही शायद अब ये चलन भी जाता रहा, वरना ‘शान की तरह शाकाल के अड्डे पर खुलेआम नाचते हुए भी भेष बदले होने का भरम पालने वाला दौर आज के परदे पर क्यूँ कर शामिल होता?

अभिनय में सबसे निराश करते हैं अमिताभ बच्चन. भारी-भरकम गेट-अप के बीच अक्सर या तो उन्हें बोलने की छूट नहीं मिलती, या फिर हमसे उनको सुनना छूट जाता है. परदे पर शानदार लगने-दिखने के अलावा उनके किरदार में कोई धार नज़र नहीं आती, वरना एक वक्त था और वो फिल्में जब उनकी संवाद अदायगी ही काफी थी रोमांचित करने को. फ़ातिमा के हिस्से कुछ अच्छे एक्शन दृश्य ज़रूर आये हैं, पर अभिनय में उनकी काबलियत अभी भी ‘दंगल के भरोसे ही है. कटरीना कैफ महज़ गिनती के कुछ दृश्यों और दो अदद गानों तक सीमित हैं. फिल्म में निर्देशन की कमजोरी इस बात से भी आंकी जा सकती है कि मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे सह-कलाकार भी हंसोड़ ज्यादा लगते हैं, अभिनेता कम. बच-बचा कर, आमिर ही हैं जो थोड़ी बहुत राहत देते हैं. उनकी आँखों में धूर्तता और चाल-चलन में छल पूरी तरह समाया हुआ दिखता है, और एकरस होते हुए भी कई बार मजेदार लगता है. फिर भी ये कहना कि फिल्म आमिर के लिए ही देखी जा सकती है, ज्यादती हो जायेगी.

आखिर में; ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान उन बेरहम ठगों के बारे में कम है, जो आज़ादी से पहले के भारत में पाए जाते थे, बल्कि उन बेशरम ठगों के बारे में ज्यादा है, जो आज के दौर में सिनेमा और मनोरंजन के नाम पर दर्शकों की समझ और पसंद को, कुछ भी ऊल-जलूल, थकाऊ और वाहियात परोस कर ठग रहे हैं. आमिर खान और अमिताभ बच्चन जैसे बड़े-बड़े नामों को आगे करके भीड़ खींचने वाले इन दिमाग़ी दिवालियों से जितनी दूर रहेंगे, आपकी और हिंदी सिनेमा की सेहत के लिए बेहतर होगा! [1.5/5]              

Wednesday, 28 December 2016

साल के बेमिसाल...(They Came, They Saw, They Conquered)

ढर्रे को तोड़ना, उस जमीन पर रास्ते तलाशना जहाँ पहले कभी इंसानी पाँव पड़े ही नहीं, अपने ही बनाये मानकों को लांघ कर आगे निकल जाना; बॉलीवुड के लिए कभी आसान नहीं रहा. फिर भी इस पूरे साल, कईयों ने हिम्मत दिखाई और अपनी मौजूदगी का बाकायदा एहसास कराते रहे. ‘पिंक’ अगर औरतों के प्रति मर्दों की सदियों पुरानी सड़ांध भरी मानसिकता को कड़े शब्दों में ‘ना’ कहने, और ‘ना’ का मतलब ‘ना’ ही होने की जोरदार पहल करती है, तो ‘अलीगढ़’ समलैंगिकता के जुड़े ज़ज्बातों को ‘ओछी नैतिकता’ के दुनियावी दलदल से निकाल कर हमारे दिलों और घरों में बाइज्ज़त कायम करने की सफल कोशिश करती है.

हिंदी सिनेमा की भाषा बदल रही है, और इस बात की मिसाल ‘कपूर एंड संस’ से बढ़िया और क्या हो सकती है? पारिवारिक अंतर्कलह हमेशा से हिंदी सिनेमा के रंगीन परदे को लुभाता रहा है. दर्शकों की आँखों में नमी लाकर बॉक्सऑफिस पर पैसे बटोरने का फ़न पुराना और बासी हो चला है, और इस बात की भनक तब लगती है, जब हम ‘कपूर एंड संस’ से मिलना तय करते हैं. यहाँ सब कुछ वैसा ही बेतरतीब है, जैसे अपने घरों में होता है. यहाँ सब जैसे टूटे हुए बैठे हैं या टूट कर बिखरने की कगार पर हैं. मलाल, गुस्सा, शिकवे-शिकायतें और कुढ़न, सबके अन्दर जैसे एक ज्वालामुखी सो रहा है, जब उठेगा, फटेगा तो जाने क्या होगा? यहाँ आने में आपको थोड़ी झिझक जरूर होगी, पर एक बार आ गए तो जाने में भी उतनी ही मुश्किल.

साल 2016 के इन 10 बेमिसाल फिल्मों में कहीं न कहीं आपको पुराना बॉलीवुड नये चोले पहनता हुआ दिखाई देगा. हौसला-अफजाई तो बनती है...शुक्रिया!  


#एयरलिफ्ट #डियर जिंदगी #निल बट्टे सन्नाटा #नीरजा #अलीगढ़ 
#रमन राघव 2.0 #कपूर एंड संस #उड़ता पंजाब #दंगल #पिंक        





AIRLIFT is a nice, well-intended break from loud and fake jingoism in Hindi cinema. The patriotism portrayed here is never too pushy, preached or purposefully painted. No matter how millionth of times you have seen a tricolour being hoisted up from soil to sky, you’re tend to feel the ‘get-up-and-go’ force within you but Raja Menon gives it all a reason, more unadulterated and uncontaminated. 


The merit also lies in casting Akshay Kumar who deliberately decides to underplay his unapologetically self-interested image for a while and gives us a character that’s more human than just feeding off someone’s unchallenged starry ego. He’s not new to the flavor though. BABY and SPECIAL 26 have done quite well for him in the past. AIRLIFT is a greater addition to the list.




डियर ज़िन्दगी’ अपने छोटे-छोटे, हलके-फुल्के पलों में बड़े-बड़े फलसफों वाली बातें कहने का जोखिम बखूबी और बेख़ौफ़ उठाती है. डॉक्टर खान जब भी रिश्तों को लेकर ज़िन्दगी का एक नया पहलू काईरा को समझा रहे होते हैं, उनकी इस भूमिका में शाहरुख़ जैसे बड़े कलाकार का होना अपनी अहमियत साफ़ जता जाता है. ये चेहरा जाना-पहचाना है. बीसियों साल से परदे पर प्यार, दोस्ती और ज़िन्दगी की बातें करता आ रहा है, पर इस बार उसकी बातों की दलील पहले से कहीं ज्यादा गहरी है, मजबूत है, कारगर है. 

आलिया जिस तरह भरभरा कर टूटती हैं परदे पर, हिंदी सिनेमा में अपने साथ के तमाम कलाकारों को धकियाते हुए एकदम आगे निकल जाती हैं. फिल्म की खासियतों में से एक ये भी है कि शाहरुख़ जैसा दमदार स्टार होते हुए भी कैमरा और कहानी दोनों आलिया के किरदार से कभी दूर हटते दिखाई नहीं देते.





सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. 

अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है. 






Real-life heroes are way better than the ones we see, create or admire on big screen. They might not look perfectly decked-up all the time, make a grand entry and an even greater exit from the frame in the most overrated slow-motion shots. They might not be so exceptionally skilled to kill every bad man in their way; on the other hand, they might get killed at the end. 

And trust me if they do so, it’s never pre-designed to sympathetically benefit their own image amongst their fans. Real-life heroes also necessarily don’t have to be always a ‘Hero’ to inspire; they can also come in as a bold, fearless, strong-headed and proud 23-year old girl from the next door! Ram Madhvani’s inspirational biopic NEERJA successfully brings us closer to one such hero, most of us wouldn’t have known of if the efforts were not made.



दो-चार-दस गिनती की फिल्में को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने समलैंगिकों और समलैंगिकता को जिस बेरुखी, जिस छिछले तरीके से परदे पर अपने मतलब (...और भौंडे मनोरंजन) के लिए इस्तेमाल किया है, उसे साफ़ और पाक करने के लिए कोई एक फिल्म काफी साबित नहीं हो सकती, ये एक शर्मनाक सच है...पर इसी के साथ एक सच और भी है, कोशिशों ने हौसलों का दामन अभी छोड़ा नहीं है. 

हंसल मेहता की बेहद सुलझी हुई, संजीदगी और सादगी से भरी हुई ईमानदार फिल्म ‘अलीगढ़’ ऐसी ही एक बेहतरीन कोशिश है, जो समलैंगिकता को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बेहयाई नहीं करती बल्कि उसे ‘निजता के अधिकार’ के साथ मिलाकर एक ऐसा मुहीम छेड़ देती है जिससे बचना-मुंह मोड़ना और अनदेखा कर देना किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए आसान नहीं रह जाता!







अपनी नई फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ को अनुराग उनकी सबसे ख़तरनाक लव-स्टोरी का दर्जा देते हैं.अनुराग कश्यप और लव-स्टोरी?? इसका सटीक जवाब तो आपको फिल्म के आख़िरी पलों में ही मिलता है, पर अच्छी बात ये है कि ‘बॉम्बे वेलवेट’ की नाकामयाबी ने उन्हें वापस उनके अपने जाने-पहचाने दायरे में ला खड़ा किया है. हालांकि भारतीय सिनेमा में ये दायरा भी उन्हीं की बदौलत इस मुकाम तक पहुंचा है. यहाँ उनका कोई दूसरा सानी नहीं. इस बार भी उनसे कहीं कोई चूक नहीं होती. 

रमन राघव 2.0’ अब तक की उनकी सबसे ‘डार्क’ फिल्म बिना किसी झिझक कही जा सकती है. रक्त का रस और गाढ़ा हो चला है. खौफ़ का चेहरा पल-पल मुखौटे बदल रहा है. अँधेरे का साम्राज्य और गहराने लगा है.





It seems Bollywood has learnt its way to deal Indian families in films the way it should be. Chaotic, dramatic, relatable and real! With Shakun Batra’s KAPOOR & SONS (SINCE 1921), even Dharma Productions have come a long way. Forget Karan Johar’s all elite, genteel and heavenly prosperous families melting & merging patently into the equally overwhelming interiors inspired by latest interior design magazines! The characters here, in Shakun’s world, don’t really chew their words before spitting them out. On the contrary, they are loose out in the open to grind each other’s peace unabashedly. 

Backed up by good writing and even better direction skills, KAPOOR & SONS (SINCE 1921) marks the arrival of a totally fascinating and utterly dysfunctional ‘on-screen’ family you would love to see more of it. 



गुलज़ार साब की ‘माचिस’ जैसी कुछेक को अलग रख कर देखें तो पंजाब को हिंदी फिल्मों ने हमेशा मीठी चाशनी में ही लपेट कर परोसा है. दिन में बैसाखी के मेले और रात में लोहड़ी का जश्न, इससे आगे बढ़ने की हिम्मत पंजाबी सिनेमा ने तो कभी-कभी दिखाई भी है पर बॉलीवुड कमोबेश बचता ही रहा है. अब तक. ‘उड़ता पंजाब’ के आने तक. 

पंजाब की जो सपनीली तस्वीर आपने ‘यशराज फिल्म्स’ के चश्मे से देखी थी, अभिषेक चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ पहले फ्रेम से ही उस तस्वीर पे चिपके ‘एनआरआई कम्पेटिबल’ चमक को खरोंचने में लग जाती है. सीने पर आतंकवाद का बोझ और पीठ पर ’84 के ज़ख्म उठाये पंजाब को अब हेरोइन, स्मैक और कोकीन की परतों ने ढक लिया है. खुरदुरी, किरकिराती, पपड़ी जमी परतों ने! 







अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. 

नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.




हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. 

‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं.






Friday, 23 December 2016

दंगल: साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! [5/5]

अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.

महावीर सिंह फोगाट (आमिर खान) किसी अलग सांचे में ढला पिता नहीं है. ऐसे पिता, जिनके मुंह से ‘शाब्बास’ सुनने के लिए बच्चों के कान तरस जाएँ, हमारे आस-पास बहुतेरे हैं. ऐसे पिता, जिनके भारी-भरकम सपनों को पीठ पर लादे बच्चे अंधाधुंध भाग रहे हों, हम सबने देखे हैं. कभी अपने पिता में, तो कभी बगल वाले शर्मा जी में. महावीर सिंह फोगाट को अगर कुछ अलग करता है, तो वो है उसकी जिद, उसका जूनून और परिस्थितियों से सीखने, सीख कर समझने और समझ कर संभलने का लचीलापन, जो उसके हठी किरदार में एक रोचक और रोमांचक विरोधाभास पैदा करता है. कुश्ती में मेडल लाने का सपना सिर्फ एक बेटा ही पूरा कर सकता है, फोगाट इस चाह में चार बेटियों का पिता बन चुका है. ऐसे में, एक दिन जब उसे एहसास होता है कि मेडल बेटियाँ भी ला सकती हैं, तो अपनी बच्चियों गीता (ज़ायरा वसीम) और बबिता (सुहानी भटनागर) को अखाड़े तक लाने में कोई ढील नहीं बरतता.       

फिल्म के दूसरे हिस्से में ‘दंगल’ कई परतों में खुलती है. गीता (फ़ातिमा सना शेख) को राष्ट्रीय खेल अकादमी में एक उजड्ड कोच (गिरीश कुलकर्णी) के भरोसे छोड़कर लौटते बाप की उलझन हो, शाहरुख़ की फिल्म और गोलगप्पों के बीच कुश्ती के नए तौर-तरीकों से पनपा गीता का नया आत्म-विश्वास हो या बबिता (सान्या मल्होत्रा) के साथ उसके वैचारिक मतभेद; बाप-बेटियों के इस ज़ज्बाती गुत्थम-गुत्थी से अलग हटकर देखें, तो कुश्ती को एक खेल के रूप में परदे पर प्रस्तुत करने वाली बेशक ‘दंगल’ सबसे भरोसेमंद फिल्म है. कुश्ती के गूढ़ दांव-पेंच यहाँ जिस रोमांचक तरीके से दिखाए और समझाए जाते हैं, उनका मकसद किरदारों या उन्हें निभाने वाले कलाकारों को परदे पर बढ़ा-चढ़ा कर ‘नायक’ की तरह पेश करना कतई नहीं रहता, बल्कि उन खालिस पलों में सिर्फ कुश्ती ही निखर कर सामने आती है. फिल्म का टाइटल सीक्वेंस भी इसी सोच की बुनियाद पुख्ता करता है, जहां असली दुनिया के असली पहलवान कैमरे के सामने खड़े आपकी आँखों में एकटक झांकते दिखाई देते हैं.

दंगल’ एक कलाकार के तौर पर आमिर खान की सबसे अच्छी फिल्म है. अपने स्टारडम को हाशिये पर रखकर किरदार तक ही सीमित रहने का हुनर उनसे अच्छा शायद ही किसी और ‘स्टार’ को आता हो. बात सिर्फ वजन घटा-बढ़ा कर प्रयोग करने की नहीं है, फिल्म के तमाम जरूरी हिस्सों और दृश्यों में केंद्र-बिंदु बने रहने का लोभ-संवरण कर पाना, हर किसी के बस की बात नहीं. अपनी पहली ही फिल्म में गीता और बबिता के किरदारों में ज़ायरा, सुहानी, फ़ातिमा और सान्या चारों ही आपको लुभाने, हंसाने, रुलाने और इमोशनली जोड़े रखने में कामयाब रहती हैं. फिल्म में अगर किसी का होना बहुत चौंकाता है, तो वो हैं साक्षी तंवर. साक्षी भले ही फिल्म में कैमरे का पसंदीदा चेहरा न रही हों, (आप उन्हें अक्सर बैकग्राउंड में ही देखते हैं) पर फिल्म की रंगीनियत में उनसे ज्यादा घुला-मिला, रचा-बसा शायद ही कोई और दिखता है. अपारशक्ति खुराना प्रभावित करते हैं, इस हद तक कि जैसे इसी रोल के लिए बने हों.

आखिर में, ‘दंगल’ कमियों से परे न होते हुए भी (फिल्म का सोचा-समझा अंत थोड़ा असहज करता है) एक ऐसी मुकम्मल फिल्म है, जो मनोरंजन का दामन छोड़े बगैर अपनी सामाजिक जिम्मेदारियों की बागडोर पूरी मुस्तैदी से अपने हाथ रखती है. सच्चे किरदारों की सच्ची कहानियाँ परदे पर कहनी हों, तो ‘दंगल’ बॉलीवुड के लिए बाइबिल से कम नहीं. साल की सबसे ‘धाकड़’ फिल्म! देखने जाईये, अभी जाईये, पूरे खानदान के साथ जाईये! [5/5]                  

Friday, 18 September 2015

KATTI BATTI: A ‘yawn’ experience! [1.5/5]

Love-stories can be clichéd. One should never be ashamed of it or in the state of complete denial. In fact, there will always be the ‘boy-meets-girl’ design in the plot, some or the other way, but you can’t be so unimaginative, uninspired and uninteresting that no one would even try to invest their emotions in whatever story you’re telling or just cooking it up for the sake of it. Nikhil Advani’s KATTI BATTI is probably year’s most lackluster romantic film; not just because it lacks the chemistry, the spark, the romance or even the reason behind its existence but also, for being a ruthless demolisher of a proficient actor’s potential [That goes for Kangana]. This is a film where romance is judged by how competently you preserve the first 20-rupee note your ‘true love’ has offered you with her phone number on it, or how proudly you carry a piece of paper once used for writing the word ‘sorry’ as many as fifty times to brace your apology. I can hear you all going ‘Aww’ with multiple ‘W’s, girls! But this all happen, hold your breath, in a modern day live-in relationship! Growing up is a choice, I fear most of the Bollywood writers don’t like to go for.

The film is set in a world where every Madhav involuntarily becomes Maddy [Imran Khan] but Payal [Kangana] remains Payal despite being more foresighted, focused and free-spirited than the cool dude in question. No wonder, she is called ‘a good catch’, ‘chalu’ and a ‘man-eater’ who can chew men and spit out the waste, for the choices she makes in her life. On the other hand, the boy is on the loose to chase the girl until she accepts to be with him. 5 years later, they are breaking-up. And then, of course there is a bunch of supporting human angles to make it happening whatever needs to be in those circumstances! A friend who’s irritatingly always there [Doesn’t he have his own life?], a bossy kid sister with her so-called wise advices, another friend who’s shown pregnant while being already the mother of a one & half year old toddler [Though it’s not a crime, I really want to know what went wrong that night] and many others including a baddie actually being a goodie. Did I just pass a lame clue here for a shamefully twisted climax or eventually the director’s cover up for his own sins? I think I deserve a ‘thank you’ to save some of your mental exercise.

Surprisingly, the film starts with a really impressive scene where the couple is seen discussing their live-in relationship status, in bed, followed by the inventively-shot ‘lip to lip de kissiyaan’ song. It smells fresh but only till you know the writer has been briefed to make every scene a laughter-joint no matter how irrelevant, erratic or unreal it is. The film is filled with scenes when humor is forced, freaky and fatigued. As a writer, I can tell you how one sell these kind of scenes to the director. The popular expression is ‘On-screen aur achcha lagega’. We all have been made fools. While watching movies, one should always be attentive as there might be a hidden hint for your own good. Well; just before the climax, Nikhil throws a song named ‘Jaago mohan pyaare’ on us to make sure all of us are awake to notice the high-point of his film i.e. the weepy-creepy and shabbily sentimental climax.

Kangana Ranaut, on the cast, is underused for her abilities to emote and over-used for providing a gimmicky ‘different looks in one film’ formula, she apparently has mastered in TANU WEDS MANU AGAIN. On the contrary, Imran is given more screen-time, attention and opportunities to show his caliber. As a nerd, bore and one-track lover of an ambitious, smart and animated girl, he is quite watchable. So is Vivan Bhatena. Special mention to Suneel Sinha as Maddy’s father who has all the talents and looks to fill the long-awaited gap for a cool, caring and compassionate Bollywood father. Now, that’s some fresh casting I see.

There has been news of Aamir Khan seen crying after watching this dead & dull romantic affair. I can only say, crying is good but never for the wrong reasons. The makers should have an on-screen affirmation saying something like, ‘This is the scene that made Aamir cry’, it would be more helpful to incite some emotions in viewers. Otherwise, Nikhil Advani’s KATTI BATTI is an affair NOT to remember! A ‘yawn’ experience! [1.5/5]

Friday, 5 June 2015

DIL DHADAKNE DO: Parents, O Parents! A long family affair! [3.5/5]

An ideal family is a myth. Issues like gender discrimination, forceful implementations of the patriarchy power, constant manipulations over fake morality, compromises for the sake of saving relationships and a flair of hypocrisy even in the most sober looking character do lie in every family. It’s only a matter of time to experience what will surface and when. A dysfunctional family as they call it is nothing but an elaborated term for any family out in this world. Zoya Akhtar's DIL DHADAKNE DO offers you a chance for a paid visit to one of these 'dysfunctional' families.

Anil Kapoor plays the ‘self-made’ millionaire Mehra, who’s celebrating his 30th marriage anniversary with Mrs. Mehra [Shefali Shah] on a cruise. The daughter Mehra [Priyanka Chopra] losing her surname now to her husband’s after marriage is irked with the invitation-card not carrying her name as a family-member. The son Mehra [Ranveer Singh] is trying his hard to fit in his father’s shoes. Along with some close friends and relatives, Mehras are out on loose on the cruise. Everything looks perfectly planned, well-designed, glossy, shiny and desirable until the real issues within the family start melting down all the plastics on the most beautiful looking faces on earth. The daughter Mehra wants to move in life and is now asking for a divorce. The son Mehra is blackmailed emotionally to marry the daughter of one of the possible business partners. The catch for the son Mehra is a private jet he finds his true love in. Parents, O parents!

Zoya Akhtar with Reema Kagti presents to you a gorgeous looking family you might wish to have in your next life but with the short and sour problems chances are you’re already facing in this very life. Who haven’t been preached all his life hearing the same-old struggle-story of his father from the horse’s mouth? Do mothers ever fail in ‘baby-ing’ the son even if he’s started dating hot babes? And then, there is this epic scheming side of the parents who are alive only to see their sons/daughters getting married. The best part is the Zoya-Reema duo doesn’t try to sink you in the murkiness of the situations but saves you with the quirk in dialogues and a flashy wit in the nature of the characters. Despite a certain kind of dreariness in the plot and the slacken off duration, film manages to keep you smiling for the most parts.

With a picturesque star-cast that looks like coming to a special edition magazine cover photo-shoot, DIL DHADKANE DO never actually has a dull frame. Even the brigade of supporting actors like Divya Seth Shah, Parmeet Sethi, Vandana Sajnani, Ridhima Sud, Vikrant Massey and Manoj Pahwa charmingly finds its place to rise and shine. Also Farhan, Priyanka, Rahul Bose and Anushka are branded names to come up with performances you can’t crib about but eventually DIL DHADAKNE DO finds its acting-giants in Anil Kapoor, Ranveer Singh and Shefali Shah. All of these three names have rediscovered themselves in their own way. Anil Kapoor’s performance as a suave, money-driven, self-centered, crude, controlling and calculative patriarch is terrific. Ranveer Singh surprises as well. Probably for the first time, he has brought something called subtly in his performance and it’s totally rewarding. Move over his ‘ever ready’ charged up energy assurance, here is an actor a lot more yet to be explored. Shefali Shah is brilliant and makes you wonder why Bollywood hasn’t given her yet what she deserves. Well done, Ma’am!

To conclude, DIL DHADAKNE DO suffers two major slip-ups. One being the length of the film of course and the other is the narration given by none other than Aamir Khan lending his voice to the younger Mehra of the family; a dog! Yes, you heard it right.  Now, this can be an ‘Aww’ moment for puppy-loving beauties but for the film, it does throw a fit of boredom on you. Watch out for some real ‘surprising’ performances and dialogue-driven humor! [3.5/5]

Friday, 19 December 2014

PK: Oh, My God! Year’s most entertaining Film! [5/5]

You can’t question religion. You can’t ask for logical explanations when it comes to one’s faith. We are not supposed to do that. We are not taught to do that. You have to be either an alien or an escapee from the nearest mental asylum. PK [played by the calculative risk-taker & a game-changer in many cases Aamir Khan] is one such rare genus. His level of indulgence with our worldly Gods is absolutely ‘out of this world’. His child-like innocence can bombard questions of all kind without giving you much time to think and react. He can also make you thunderstruck with his logical demonstrations about things you never bothered or rather apprehended to ask about. No doubt, he looks like a distant and conscientiously more intuitive cousin to Fungshuk Wangdu of 3 IDIOTS.  

‘PK’ is another gem of Rajkumar Hirani’s school of film-making where success can also be formulated by assimilating an unfussy entertainment of dramatic but simple nature & a ‘never gets preachy’ social message weaved in good humor and honest emotions. So when PK- the untainted innocent soul discovers people buying goods of their needs simply by exchanging a piece of paper with an old man’s picture [our very own ‘father of the nation] printed on it, he starts collecting every single poster & newspaper-cutting carrying his image. Next, we are made realize how we only respect the ‘financial’ worth and not the ‘moral’ values the man lived his life for.

‘PK’ also dares to question your blind-faith on forged Godmen from all religions. It’s high time we turn to humanity as our primary religious conviction rather than wasting our hard-money and the gifted wisdom to differentiate right from wrong on someone else’s phony tactics. As PK says in the film, the God who created us is very different from the ones we created. And the prayers we make through these age-old practices are nothing more than a ‘wrong number’ call.

The biggest strength of ‘PK’ is that it talks less and speaks more. There is hardly a scene where you don’t get thrashed by one or other social issues or expected human behavioral flaws in us; in a very subtle, explicable, logical and entertaining manner. The Bhojpuri texture to the lingo adds to it fervently and freely. It is one of the most sugary languages spoken across country; still very misinterpreted and wrongly portrayed and performed for Bollywood films. ‘PK’ also doesn’t do it flawlessly but certainly the respect is there. For a change, I am not offended this time!

Hirani and Abhijat Joshi’s taut and an almost flawless screenplay gives you ample hilarious as well as heartwarming moments. Anushka Sharma impresses with her sparkling presence very well translated into a lovely & lively character on screen. Saurabh Shukla and Boman Irani are efficiently likeable. Sushant Singh Rajput is charming and plays it cool, though is only for a shorter role. And who wouldn’t agree? The leading man leads like no one does better. Aamir is known to reinvent his acting abilities as well as the commercial cinema in India. This one takes his efforts to the next level. He gives us a multicolored paan-chewing character you will take home immediately.

And if could give you more about the film, I would be writing it hours in row. There is so much to cheer-so much to cherish; you wouldn’t mind it going twice in its first week. I am ready for the evening show. Till then; my only reaction to the film is if Bollywood is meant to follow the latest formula for recreating similar box-office success, are we going to see many more ‘PK’s in coming years? I am sure, the answer is negative. PK is outstanding! PK doesn’t come to us too often! Go; get a slice of it…NOW! [5/5]

Friday, 20 December 2013

DHOOM 3: The Great Indian Bollywood Circus! Formulaic but Spectacular & Extremely Watchable [3/5]

It’s not very hard to predict what’s in store for you, if you have booked your tickets to take a roller-coaster ride in the latest & the third installment of Bollywood’s first of a kind film-franchisee DHOOM: 3. High octane action, vrooming bikes, eye-catching locales, brilliantly choreographed song & dance sequences, fantastic production design & twists in the tale that you can only see it coming just a few moments before it actually comes. So, what are the additional elements that make YashRaj Film’s DHOOM 3 an extremely watchable action thriller, better and bigger than the previous two installments?

Written & directed by Vijay Krishna Acharya, DHOOM: 3 is the most spectacular presentation of all in the series, one would never question that, but it’s the writing and the performances [I desperately wanted it to make singular but then you’ll agree to it after watching it] that take it to another level.

Set in Chicago, story takes you back in 90’s when the owner of ‘the great Indian circus’ [Jackie Shroff in a delightful cameo] kills himself after losing his battle to save the property from financial crisis. Years later, his only son Sahir [Aamir Khan standing tall as a towering inferno] decides to bring the Bank responsible for his father’s death down all in the dust by constantly robbing all its branches. With no valid logic behind, ACP Jai Dixit [Abhishek Bachchan in his one-expression mode] & his ‘still irritating’ associate Ali Akbar from Nagpada [who else?? The ‘Uday Chopra’] are called in to help the Chicago Police Department. Rest is the thrilling cat-and-mouse chase sequences with good amount of bike-stunts, an unpredictable pinch of emotions and a satisfying surprise in the box that I wish I could tell you more about.

Though the story seems & is very filmy, formulaic and borrowed straight from some late 70’s vengeance potboilers, the surprise in the box alone keeps you thoroughly engaged and entertained. Till the time it reaches you from various sources, I don’t want to be the spoiler. All I can say is it brings lots of emotions on the board and in a very well executed manner. Keep guessing!

Of the cast, let’s talk about Katrina first. She’s sexy, sensuous & stunning as all the Dhoom girls in the past. Though the writing doesn’t provide her a good meaty role, watch her introduction scene in the ‘Kamli’ song and as briefed by the character of Aamir in the film, you are bound to not take off your eyes from her for once. What an electrifying appearance!

Same goes with Aamir. The certain amount of charisma and the sincerity in the performance that he brings with himself is totally infectious. He sets screen on fire in the magical & the magnificent ‘Malang’ song. Look at the kind of effort he makes to meet the expectations par level to the new generation in industry. Commendable job! This is the most commercial performance of his after GHAJINI.

In a whole 3 hours of duration, it is not plausible that you do not get carried away with some really putting off sequences like the typical ‘Uday Chopra’ comical scenes, disregard of a good mix of logic in the screenplay and a hurriedly conceptualized love-angle between Katrina & Aamir! But the grand canvas, great production quality, good performance and the surprise element compensate for the most of it. If you love ‘no logic’ formula Bollywood, you will love it more! [3/5]