Showing posts with label amitabh bachchan. Show all posts
Showing posts with label amitabh bachchan. Show all posts

Thursday, 8 November 2018

ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान: सिनेमा के ठगों से बचिए! [1.5/5]


1968 में एक फिल्म बनी थी, ‘राजा और रंक’. राजा-महाराजाओं की कहानी थी. नायक (संजीव कुमार) कालकोठरी में बंद है. उसे छुड़ाने की गरज़ से आई नायिका (कुमकुम) ‘मेरा नाम है चमेली गीत गाते-गाते पहरेदारों और सिपाहियों को शराब पिला-पिला कर धुत्त कर देती है. नायक गिरफ़्त से बच निकलता है. ठीक 50 साल बाद, ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान में नायक आमिर खान भी ऐसी ही कुछ जुगत लगा रहे हैं, अमिताभ बच्चन के किरदार को अंग्रेजों के चंगुल से छुड़ाने में. बस्स, शराब की जगह इस बार नशीले लड्डुओं ने ले ली है. ‘मेरा नाम है चमेली गीत मैं आज भी बड़े, छोटे हर परदे पर देख सकता हूँ. उस गाने के साथ मेरा बचपन और बीते दौर की महक दोनों खिंचे चले आते हैं. ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान के साथ इस तरह की कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है. न कानों को प्रिय लगने वाला संगीत, ना ही पुराने दौर से जुड़े होने का भरम. इसलिए इसे देखते वक़्त, अक्सर मुझे मनोज कुमार की ‘क्रांति के गानों की तलब लगने लगती है. आख़िरकार, जब सब कुछ पुराना सा, नकली और बासी ही है, तो बीते हुए कल में झांककर पहले से मौजूद मनोरंजन खोज लेने में हर्ज़ ही क्या है? हाँ, लेकिन तब फिल्म इंडस्ट्री का सबसे बड़ा स्टूडियो (यशराज फिल्म्स) होने का अहम् ज़रूर दांव पर लग जाएगा.

1795 के आसपास का वक़्त है. ज़रूर भारत उस वक़्त ‘सोने की चिड़िया’ ही रहा होगा. कम से कम, फिल्म के भारी-भरकम सेट्स देख के तो यही लगता है. खैर, खुदाबक्श जहाज़ी (अमिताभ बच्चन) आज़ाद का नाम धरकर अंग्रेज़ों से लोहा ले रहा है. साथ है ज़फीरा (फ़ातिमा सना शेख़), जो पिता की हत्या के बाद अंग्रेजों से रियासत वापस लेने की लड़ाई लड़ रही है. अंग्रेज़ अफसर क्लाइव (लॉयड ओवेन) का मोहरा है, फिरंगी मल्लाह (आमिर खान). अव्वल दर्ज़े का धोखेबाज़, जो गिरगिट से भी तेज़ अपना रंग बदलता है और पैसों के लिए कभी भी अपना पाला बदल सकता है. एक फिरंगी मल्लाह के किरदार को थोड़ी रियायत दे दें; तो फिल्म का कोई भी दृश्य या किरदार ऐसा नहीं है, जो आपको पूरी तरह प्रभावित करता हो या चौंकाने में कामयाब होता हो. कहना गलत नहीं होगा कि फिल्म के लेखक-निर्देशक विजय कृष्ण आचार्य फ़ॉर्मूले में बंधी एक बेहद औसत दर्जे की कहानी चुनते हैं, जिसका हर मोड़ आपका जाना-पहचाना है. ऊपर से, समझदारी से ज्यादा सहूलियत के साथ एक दृश्य से दूसरे दृश्य में जाने का आलसीपन. आज़ादी की लड़ाई से कहीं ज्यादा, फिल्म ज़फीरा के बदले की कहानी बन के रह जाती है.

विजय कृष्ण आचार्य बड़े कैनवस की फिल्में बनाने के लिए जाने जाते हैं. यकीनी तौर पर, फिल्म के सेट्स और कैमरा शॉट्स हर बार बड़े से और बड़े होते जाते हैं, और कहानी हर बार इस भव्यता के नीचे कहीं दब कर दम तोड़ देती है. ताज्जुब तब होता है, जब आमिर जैसे समझदार भी जान-बूझ कर बड़ी आसानी से इस साज़िश का हिस्सा और शिकार बन जाते हैं. फिल्म का 10 से 15 फ़ीसदी हिस्सा सिर्फ बैकग्राउंड म्यूजिक के सहारे (वो भी वेस्टर्न स्टाइल का संगीत) किरदारों को बड़ा करके दिखाने में खर्च हो जाता है. स्लो-मोशन कैमरा हो या लो-एंगल शॉट्स; फिल्म कहानी में ड्रामा भले ही न पेश कर पाती हो, दृश्यों में ठूंस-ठूंस कर ड्रामा भरती जरूर नज़र आती है. यशराज फिल्म्स में एक वक़्त तक (यश चोपड़ा साब के ज़माने में) कहानी के लिए एक तयशुदा डिपार्टमेंट होता था. उनके जाने के साथ ही शायद अब ये चलन भी जाता रहा, वरना ‘शान की तरह शाकाल के अड्डे पर खुलेआम नाचते हुए भी भेष बदले होने का भरम पालने वाला दौर आज के परदे पर क्यूँ कर शामिल होता?

अभिनय में सबसे निराश करते हैं अमिताभ बच्चन. भारी-भरकम गेट-अप के बीच अक्सर या तो उन्हें बोलने की छूट नहीं मिलती, या फिर हमसे उनको सुनना छूट जाता है. परदे पर शानदार लगने-दिखने के अलावा उनके किरदार में कोई धार नज़र नहीं आती, वरना एक वक्त था और वो फिल्में जब उनकी संवाद अदायगी ही काफी थी रोमांचित करने को. फ़ातिमा के हिस्से कुछ अच्छे एक्शन दृश्य ज़रूर आये हैं, पर अभिनय में उनकी काबलियत अभी भी ‘दंगल के भरोसे ही है. कटरीना कैफ महज़ गिनती के कुछ दृश्यों और दो अदद गानों तक सीमित हैं. फिल्म में निर्देशन की कमजोरी इस बात से भी आंकी जा सकती है कि मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे सह-कलाकार भी हंसोड़ ज्यादा लगते हैं, अभिनेता कम. बच-बचा कर, आमिर ही हैं जो थोड़ी बहुत राहत देते हैं. उनकी आँखों में धूर्तता और चाल-चलन में छल पूरी तरह समाया हुआ दिखता है, और एकरस होते हुए भी कई बार मजेदार लगता है. फिर भी ये कहना कि फिल्म आमिर के लिए ही देखी जा सकती है, ज्यादती हो जायेगी.

आखिर में; ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान उन बेरहम ठगों के बारे में कम है, जो आज़ादी से पहले के भारत में पाए जाते थे, बल्कि उन बेशरम ठगों के बारे में ज्यादा है, जो आज के दौर में सिनेमा और मनोरंजन के नाम पर दर्शकों की समझ और पसंद को, कुछ भी ऊल-जलूल, थकाऊ और वाहियात परोस कर ठग रहे हैं. आमिर खान और अमिताभ बच्चन जैसे बड़े-बड़े नामों को आगे करके भीड़ खींचने वाले इन दिमाग़ी दिवालियों से जितनी दूर रहेंगे, आपकी और हिंदी सिनेमा की सेहत के लिए बेहतर होगा! [1.5/5]              

Thursday, 8 February 2018

पैडमैन: सामाजिक झिझक 'सोखने' वाली एक सुपर-हीरो फिल्म! [3.5/5]

तमिलनाडु के अरुणाचलम मुरुगनान्थम भारत के उन चंद 'सुपरहीरोज' में से हैं, जिन्होंने सस्ते सेनेटरी पैड बनाने और उन्हें गाँव-गाँव में महिलाओं तक पहुंचाने के अपने लगातार प्रयासों के जरिये, टेड-टॉक्स जैसे वर्चुअल प्लेटफार्म से लेकर यूनाइटेड नेशन्स जैसे विश्वस्तरीय मंच पर अपनी एक अलग पहचान बनाई है. उनकी सादगी, उनके बोलने के अंदाज़, उनके खुशमिजाज़ व्यक्तित्व और समाज में बदलाव लाने की उनकी ललक, उनकी जिद, उनके संघर्षों को, आर. बाल्की की फिल्म 'पैडमैन' एक फ़िल्मी जामा पहनाकर ही सही, परदे पर बड़ी कामयाबी से सामने रखती है. ये अरुणाचलम मुरुगनान्थम की ईमानदार कहानी और उनकी मजेदार शख्सियत ही है, जो थोड़ी-बहुत कमियों के बावजूद, फिल्म और फिल्म के साथ-साथ परदे पर मुरुगनान्थम का किरदार निभा रहे अक्षय कुमार को बहुत सारी इज्ज़त उधार में दे देती है. और जिसके वो हक़दार हैं भी, आखिर हिंदी फिल्मों में कितनी बार आपने एक मुख्यधारा के बड़े नायक को कुछ मतलब की बात करते सुना है, जो उसके सिनेमाई अवतार से अलग हो, जो सामाजिक ढ़ांचे में 'अशुद्ध, अपवित्र और अछूत' माना जाता रहा हो. 

'पैडमैन' महिलाओं की जिंदगी में हर महीने आने वाले उन 5 दिनों के बारे में बात करती है, जिसे अक्सर हम घरों में देख कर भी अनदेखा कर देते हैं. महीने भर की शॉपिंग-लिस्ट तैयार करते हुए कितनी बार आपने सेनेटरी पैड्स का जिक्र किया होगा? वो काली थैली या अखबार में लपेटे हुए पैकेट्स कैसे सबकी नज़रों से नज़र चुराते हुए किसी आलमारी में ऐसे दुबक जाते हैं, जैसे सामने खुल जाएँ तो क्या क़यामत आ जाये? मध्यप्रदेश का लक्ष्मीकांत चौहान (अक्षय कुमार) अपनी पत्नी गायत्री (राधिका आप्टे) को गन्दा कपड़ा इस्तेमाल करते देखता है, तो चौंक जाता है, "मैं तो अपनी साइकिल न साफ़ करूं इससे", और पत्नी 'ये हम औरतें की दिक्कत है, आप इसमें मत पड़िये' बोल के 5 दिन के लिए बालकनी में बिस्तर लगा लेती है. गली में क्रिकेट खेल रहे लौंडे भी खूब जानते हैं, "गायत्री भाभी का (5 दिन का) टेस्ट मैच चल रहा है". 

ये भारत के उस हिस्से की बात है, जहां पहली बार 'महीना' शुरू होने पर लड़की से औरत बनने का उत्सव मनाया जाता है. रस्में होती हैं, पूजा होती है, भोज होता है, पर सोना लड़की को बरामदे में ही पड़ता है. लक्ष्मी की समझ से परे है कि थोड़ी सी रुई और जरा से कपड़े से बनी इस हलकी सी चीज का दाम 55 रूपये जितना महंगा कैसे हो सकता है? और इसी गुत्थी को सुलझा कर सस्ते सेनेटरी पैड्स बनाने की जुगत में लक्ष्मी बार-बार नाकामयाबी, डांट-फटकार, सामाजिक बहिष्कार और पारिवारिक उथल-पुथल से जूझता रहता है. तब तक, जब तक परी (सोनम कपूर) के रूप में उसे उसकी पहली ग्राहक और एक मददगार साथी नहीं मिल जाता है. 

'पैडमैन' अपने पहले हिस्से में जरूर कई बार खुद को दोहराने में फँसी रहती है. लक्ष्मी का सेनेटरी पैड को लेकर उत्साह और उसे मुकम्मल तरीके से बना पाने की जिद खिंची-खिंची सी लगने लगती है. हालाँकि इस हिस्से में अक्षय से कहीं ज्यादा आपकी नज़रें राधिका आप्टे पर टिकी रहती हैं, जो एक बहुत ही घरेलू, सामान्य सी दिखने वाली और सामजिक बन्धनों के आगे बड़ी आसानी से हार मान कर बैठ जाने वाली औरत और पत्नी के किरदार में जान फूँक देती हैं. उनके लहजे, उनकी झिझक, उनके आवेश, सब में एक तरह की ईमानदारी दिखती है, जिससे आपको जुड़े रहने में कभी कोई तकलीफ महसूस नहीं होती. अक्षय जरूर शुरू शुरू में आपको 'टॉयलेट-एक प्रेम कथा' के जाल में फंसते हुए दिखाई देते हैं, पर फिल्म के दूसरे भाग में वो भी बड़ी ऊर्जा से अपने आप को संभाल लेते हैं. एक्सिबिशन में अपनी मिनी-मशीन को समझाने वाले दृश्य और यूनाइटेड नेशन्स के मंच पर अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी की स्पीच के साथ, अक्षय अपनी पिछली कुछ फिल्मों की तुलना में बेहतर अभिनय करते दिखाई देते हैं. ये शायद इस वजह से भी हो, कि 'पैडमैन' कहीं भी उनके 'देशभक्त' होने और परदे पे दिखने-दिखाने के पूर्वनियोजित एजेंडे पर चलने से बचती है. 

'पैडमैन' अपने विषय की वजह से पहले फ्रेम से ही एक जरूरी फिल्म का एहसास दिलाने लगती है. बाल्की 'माहवारी' के मुद्दे पर पहुँचने में तनिक देर नहीं लगाते, न ही कभी झिझकते हैं. फिल्म अपने कुछ हिस्सों में डॉक्यूमेंटरी जैसी दिखाई देने लगती है, तो वहीँ सोनम के किरदार के साथ लक्ष्मी का अधूरा प्रेम-प्रसंग जैसे हिंदी फिल्म होने की सिर्फ कोई शर्त पूरी करने के लिए रखा गया हो, लगता है. दो-एक गानों, अमिताभ बच्चन के एक लम्बे भाषण और फिल्म के मुख्य किरदार का नाम बदल कर अरुणाचलम मुरुगनान्थम से उनकी उपलब्धियों, उनके व्यक्तित्व का एक छोटा हिस्सा चुरा लेने के एक बड़े अपराध को नज़रंदाज़ कर दिया जाये, तो 'पैडमैन' एक मनोरंजक फिल्म होने के साथ साथ एक बेहद जरूरी फिल्म भी है. परिवार के साथ बैठ के देखेंगे, तो सेनेटरी पैड को लेकर आपस की झिझक तोड़ेगी भी, सोखेगी भी. [3.5/5]     

Friday, 12 May 2017

सरकार 3: कंपनी नई-माल वही! [1/5]

‘फैक्ट्री’ बंद हो चुकी है. ‘कम्पनी’ खुल गयी है. बाकी का सब कुछ वैसे का वैसा ही है. पुराने माल को उसी पुराने बदरंग पैकेजिंग में डाल कर वापस आपको बेचने की कोशिश की जा रही है. अपनी ही फिल्म के एक संवाद ‘मुझे जो सही लगता है, मैं करता हूँ’ को फिल्ममेकर राम गोपाल वर्मा ने अपनी जिद बना ली है. ‘सरकार 3’ जैसी सुस्त, थकाऊ और नाउम्मीदी से भरी तमाम फिल्में, एक के बाद एक लगातार अपने ज़माने के इस प्रतिभाशाली निर्देशक को उसके खात्मे तक पहुंचाने में मदद कर रही हैं. तकनीकी रूप से फिल्म-मेकिंग में जिन-जिन नये, नायाब तजुर्बों को रामगोपाल वर्मा की खोज मान कर हम अब तक सराहते आये थे, वही आज इस कदर दकियानूसी, वाहियात और बेवजह दिखाई देने लगे हैं कि दिल, दिमाग और आँखें परदे से बार-बार भटकती हुई अंधेरों में सुकून तलाशने लगती है. और ऐसा होता है, क्यूंकि रामगोपाल वर्मा के सिनेमा की भाषा अब बासी हो चली है. पानी ठहरा हुआ हो, तो सड़न पैदा होती ही है. अपने दो सफल प्रयासों (सरकार और सरकार राज) के बावजूद, ‘सरकार 3’ से उसी सड़न की बू आती है.

अपने दोनों बेटों की मौत के बाद भी, सुभाष नागरे (अमिताभ बच्चन) का दम-ख़म अभी देखने लायक है. ठीक ‘सरकार’ की तरह, फिल्म के दूसरे-तीसरे दृश्य में ही नागरे एक बिज़नेसमैन का गरीब बस्तियों को हटाने के लिए करोड़ों का ऑफर ठुकराते हुए कहते हैं, ‘मैं नहीं करूंगा, और किसी को करने भी नहीं दूंगा’. इस बीच उनका पोता शिवाजी (अमित साध) भी लौट आया है. उधर विरोधी भी एकजुट होने लगे हैं. गोविन्द देशपांडे (मनोज बाजपेई) राजनीति के गंदे खेल का सबसे नया-नवेला चेहरा है. दुबई में बैठा वाल्या (जैकी श्रॉफ) अंडरवर्ल्ड की कमान संभाले है. साथ ही, शिवाजी की प्रेमिका अनु (यामी गौतम), जिसके पिता की हत्या सरकार ने करवा दी थी. षड्यंत्र और विश्वासघात से बुनी इस बिसात पर कोई नहीं कह सकता कि कौन सा मोहरा किस करवट बैठेगा? ‘सरकार 3’ एक बार फिर सरकार की सोच को सही साबित करने और उसकी शक्ति को बरक़रार रखने की लड़ाई है.

फिल्म की सबसे कमज़ोर कड़ी है, फिल्म की बेतरतीब पटकथा और हद बनावटी संवाद. रामगोपाल वर्मा से बेहतर स्क्रिप्ट या कहानी की समझ रखना तो बेवकूफी है ही, इस बार फिल्म-लेखकों की टीम भी बुरी तरह निराश करती है. फिल्म का कोई भी हिस्सा आपको चौंकाने में सफल नहीं होता, बल्कि अपनी चौकन्नी समझ से आप खुद कदम-दो कदम आगे ही रहते हैं. फिल्म के संवाद बड़ी बेशर्मी से न सिर्फ अपने आप को दोहराते हैं, बल्कि सुनने में ही इतने बेस्वाद और बकवास लगते हैं कि कभी-कभी लगता है, उन्हें बोलते वक़्त अभिनेताओं की अपनी समझ कहाँ घास चरने चली गयी थी? मनोज बाजपेयी जैसे दिग्गज अभिनेता परदे पर 3 मिनट तक लगातार बोल रहे हों, और आप में तनिक भी जोश-ओ-ख़रोश पैदा न हो, तो गलती अभिनेता में नहीं, उन बेदम अल्फाजों में है जो आपने उन्हें परोसे हैं. फिल्म के शुरूआती दृश्य में ही, अमिताभ बच्चन परदे पर बूढ़े शेर की तरह दहाड़ रहे हैं, पर अफ़सोस! आपका ध्यान खींचने के लिए सिर्फ उनकी आवाज़ ही काफी नहीं है. ‘शेर की खाल पहन लेने से कोई कुत्ता शेर नहीं बन जाता’, ‘शेर कितना भी शक्तिशाली हो, जंगली कुत्ते मिलके शेर का शिकार कर ही लेते हैं’, ऐसे घटिया संवादों से भरी फिल्में मुझे वीसीआर के ज़माने में अच्छी लगती थीं.

फिल्म का तकनीकी पहलू भी उतना आजमाया हुआ है. फिल्म के सेट पर मौजूद किसी भी चीज़ का वहाँ पाया जाना सिर्फ एक ही जरूरत पूरी करता है, कैमरे की फ्रेमिंग को लेकर रामगोपाल वर्मा का पागलपन. टेबल पर पड़ा चश्मा हो, हाथ में कॉफ़ी का मग, चाय का कप, फर्श पर पत्थर का बना कुत्ता, कोने में खड़ा ‘लॉफिंग बुद्धा’; कभी न कभी सबको कैमरे के सामने आना ही है, वो भी पूरे क्लोज-अप में. वर्मा जाने किस ग़लतफहमी का शिकार फिल्ममेकर हैं, जो आज भी जोशीले फिल्म-स्टूडेंट की तरह आईने में एक हल्का शॉट डिजाईन करते हैं, और खुद को के. आसिफ मान कर बैठ जाते हैं. मानो अपने हिस्से का ‘शीशमहल’ उन्होंने पा लिया. फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर शोर-शराबे से भरा तो है ही, भड़काऊ भी है. जब भी आप सुनते हैं, आपको चीखने का मन करता है.

फिल्म की दो ही अच्छी बातें है. एक तो अमिताभ बच्चन, जो 12 साल बाद भी सुभाष नागरे के किरदार में उसी शिद्दत से फिट हो जाते हैं, जैसे पहली वाली ‘सरकार’ में. दूसरा मनोज बाजपेयी की अदाकारी, खास कर उस दृश्य में जहाँ वो राजनीति की तुलना समंदर की लहरों के साथ करते हैं. उनके किरदार का पागलपन उस दृश्य में सम्मोहित कर देता है. वरना तो पूरी फिल्म में हर अभिनेता खराब अभिनय की दौड़ में एक-दूसरे से आगे निकलना चाहता है. हाँ, जाने क्यूँ जैकी श्रॉफ का किरदार हर वक़्त एक कम-अक्ल मॉडल के साथ दिखाया जाता है? यकीन नहीं होता, इसी रामगोपाल वर्मा ने ‘कंपनी’ में हमें मलिक (अजय देवगन) जैसा ज़मीनी गैंगस्टर भी दिया था.

आखिर में, ‘ गॉडफ़ादर’ से ‘सरकार सीरीज’ की तुलना करने वाले रामगोपाल वर्मा खुद कांति शाह से ज्यादा काबिल नज़र नहीं आते, खास कर हिंदी सिनेमा में उनके हालिया योगदान को देखते हुए. दोनों में ‘बैक टू बैक’ फिल्में बनाने का ज़ज्बा तो कूट-कूट कर भरा है, पर दोनों को ही अपने आप को खुश रखने से फुर्सत नहीं. सिनेमा जाता है गर्त में, तो जाये, मेरी बला से! तकलीफ ये है, कि चाहकर भी 25 सालों से हिंदी फिल्में बनाने वाले रामगोपाल वर्मा हिंदी में मेरे ये जज़्बात पढ़ नहीं पायेंगे. तो सवाल ये है कि अब उन्हें ‘सरकार 4’ बनाने से रोकेगा कौन? [1/5]             

Wednesday, 28 December 2016

साल के बेमिसाल...(They Came, They Saw, They Conquered)

ढर्रे को तोड़ना, उस जमीन पर रास्ते तलाशना जहाँ पहले कभी इंसानी पाँव पड़े ही नहीं, अपने ही बनाये मानकों को लांघ कर आगे निकल जाना; बॉलीवुड के लिए कभी आसान नहीं रहा. फिर भी इस पूरे साल, कईयों ने हिम्मत दिखाई और अपनी मौजूदगी का बाकायदा एहसास कराते रहे. ‘पिंक’ अगर औरतों के प्रति मर्दों की सदियों पुरानी सड़ांध भरी मानसिकता को कड़े शब्दों में ‘ना’ कहने, और ‘ना’ का मतलब ‘ना’ ही होने की जोरदार पहल करती है, तो ‘अलीगढ़’ समलैंगिकता के जुड़े ज़ज्बातों को ‘ओछी नैतिकता’ के दुनियावी दलदल से निकाल कर हमारे दिलों और घरों में बाइज्ज़त कायम करने की सफल कोशिश करती है.

हिंदी सिनेमा की भाषा बदल रही है, और इस बात की मिसाल ‘कपूर एंड संस’ से बढ़िया और क्या हो सकती है? पारिवारिक अंतर्कलह हमेशा से हिंदी सिनेमा के रंगीन परदे को लुभाता रहा है. दर्शकों की आँखों में नमी लाकर बॉक्सऑफिस पर पैसे बटोरने का फ़न पुराना और बासी हो चला है, और इस बात की भनक तब लगती है, जब हम ‘कपूर एंड संस’ से मिलना तय करते हैं. यहाँ सब कुछ वैसा ही बेतरतीब है, जैसे अपने घरों में होता है. यहाँ सब जैसे टूटे हुए बैठे हैं या टूट कर बिखरने की कगार पर हैं. मलाल, गुस्सा, शिकवे-शिकायतें और कुढ़न, सबके अन्दर जैसे एक ज्वालामुखी सो रहा है, जब उठेगा, फटेगा तो जाने क्या होगा? यहाँ आने में आपको थोड़ी झिझक जरूर होगी, पर एक बार आ गए तो जाने में भी उतनी ही मुश्किल.

साल 2016 के इन 10 बेमिसाल फिल्मों में कहीं न कहीं आपको पुराना बॉलीवुड नये चोले पहनता हुआ दिखाई देगा. हौसला-अफजाई तो बनती है...शुक्रिया!  


#एयरलिफ्ट #डियर जिंदगी #निल बट्टे सन्नाटा #नीरजा #अलीगढ़ 
#रमन राघव 2.0 #कपूर एंड संस #उड़ता पंजाब #दंगल #पिंक        





AIRLIFT is a nice, well-intended break from loud and fake jingoism in Hindi cinema. The patriotism portrayed here is never too pushy, preached or purposefully painted. No matter how millionth of times you have seen a tricolour being hoisted up from soil to sky, you’re tend to feel the ‘get-up-and-go’ force within you but Raja Menon gives it all a reason, more unadulterated and uncontaminated. 


The merit also lies in casting Akshay Kumar who deliberately decides to underplay his unapologetically self-interested image for a while and gives us a character that’s more human than just feeding off someone’s unchallenged starry ego. He’s not new to the flavor though. BABY and SPECIAL 26 have done quite well for him in the past. AIRLIFT is a greater addition to the list.




डियर ज़िन्दगी’ अपने छोटे-छोटे, हलके-फुल्के पलों में बड़े-बड़े फलसफों वाली बातें कहने का जोखिम बखूबी और बेख़ौफ़ उठाती है. डॉक्टर खान जब भी रिश्तों को लेकर ज़िन्दगी का एक नया पहलू काईरा को समझा रहे होते हैं, उनकी इस भूमिका में शाहरुख़ जैसे बड़े कलाकार का होना अपनी अहमियत साफ़ जता जाता है. ये चेहरा जाना-पहचाना है. बीसियों साल से परदे पर प्यार, दोस्ती और ज़िन्दगी की बातें करता आ रहा है, पर इस बार उसकी बातों की दलील पहले से कहीं ज्यादा गहरी है, मजबूत है, कारगर है. 

आलिया जिस तरह भरभरा कर टूटती हैं परदे पर, हिंदी सिनेमा में अपने साथ के तमाम कलाकारों को धकियाते हुए एकदम आगे निकल जाती हैं. फिल्म की खासियतों में से एक ये भी है कि शाहरुख़ जैसा दमदार स्टार होते हुए भी कैमरा और कहानी दोनों आलिया के किरदार से कभी दूर हटते दिखाई नहीं देते.





सपनों के कोई दायरे नहीं हुआ करते. छोटी आँखों में भी बड़े सपने पलते देखे हैं हमने. फेसबुक की दीवारों और अखबारों की परतों के बीच आपको दिल छू लेने वाली ऐसी कई कहानियाँ मिल जायेंगी, जिनमें सपनों की उड़ान ने उम्मीदों का आसमान छोटा कर दिया हो. हालिया मिसालों में वाराणसी के आईएएस (IAS) ऑफिसर गोविन्द जायसवाल का हवाला दिया सकता है, जिनके पिता कभी रिक्शा चलाते थे. 

अश्विनी अय्यर तिवारी की मार्मिक, मजेदार और प्रशंसनीय फिल्म ‘निल बट्टे सन्नाटा’ भी ऐसी ही एक मर्मस्पर्शी कहानी के जरिये आपको जिंदगी के उस हिस्से में ले जाती है, जहां गरीबी सपनों की अमीरी पर हावी होने की कोशिश तो भरपूर करती है पर अंत में जीत हौसलों से लथपथ सपने की ही होती है. 






Real-life heroes are way better than the ones we see, create or admire on big screen. They might not look perfectly decked-up all the time, make a grand entry and an even greater exit from the frame in the most overrated slow-motion shots. They might not be so exceptionally skilled to kill every bad man in their way; on the other hand, they might get killed at the end. 

And trust me if they do so, it’s never pre-designed to sympathetically benefit their own image amongst their fans. Real-life heroes also necessarily don’t have to be always a ‘Hero’ to inspire; they can also come in as a bold, fearless, strong-headed and proud 23-year old girl from the next door! Ram Madhvani’s inspirational biopic NEERJA successfully brings us closer to one such hero, most of us wouldn’t have known of if the efforts were not made.



दो-चार-दस गिनती की फिल्में को छोड़ दें तो हिंदी फिल्म इंडस्ट्री ने समलैंगिकों और समलैंगिकता को जिस बेरुखी, जिस छिछले तरीके से परदे पर अपने मतलब (...और भौंडे मनोरंजन) के लिए इस्तेमाल किया है, उसे साफ़ और पाक करने के लिए कोई एक फिल्म काफी साबित नहीं हो सकती, ये एक शर्मनाक सच है...पर इसी के साथ एक सच और भी है, कोशिशों ने हौसलों का दामन अभी छोड़ा नहीं है. 

हंसल मेहता की बेहद सुलझी हुई, संजीदगी और सादगी से भरी हुई ईमानदार फिल्म ‘अलीगढ़’ ऐसी ही एक बेहतरीन कोशिश है, जो समलैंगिकता को सनसनीखेज बनाकर परोसने की बेहयाई नहीं करती बल्कि उसे ‘निजता के अधिकार’ के साथ मिलाकर एक ऐसा मुहीम छेड़ देती है जिससे बचना-मुंह मोड़ना और अनदेखा कर देना किसी भी संवेदनशील आदमी के लिए आसान नहीं रह जाता!







अपनी नई फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ को अनुराग उनकी सबसे ख़तरनाक लव-स्टोरी का दर्जा देते हैं.अनुराग कश्यप और लव-स्टोरी?? इसका सटीक जवाब तो आपको फिल्म के आख़िरी पलों में ही मिलता है, पर अच्छी बात ये है कि ‘बॉम्बे वेलवेट’ की नाकामयाबी ने उन्हें वापस उनके अपने जाने-पहचाने दायरे में ला खड़ा किया है. हालांकि भारतीय सिनेमा में ये दायरा भी उन्हीं की बदौलत इस मुकाम तक पहुंचा है. यहाँ उनका कोई दूसरा सानी नहीं. इस बार भी उनसे कहीं कोई चूक नहीं होती. 

रमन राघव 2.0’ अब तक की उनकी सबसे ‘डार्क’ फिल्म बिना किसी झिझक कही जा सकती है. रक्त का रस और गाढ़ा हो चला है. खौफ़ का चेहरा पल-पल मुखौटे बदल रहा है. अँधेरे का साम्राज्य और गहराने लगा है.





It seems Bollywood has learnt its way to deal Indian families in films the way it should be. Chaotic, dramatic, relatable and real! With Shakun Batra’s KAPOOR & SONS (SINCE 1921), even Dharma Productions have come a long way. Forget Karan Johar’s all elite, genteel and heavenly prosperous families melting & merging patently into the equally overwhelming interiors inspired by latest interior design magazines! The characters here, in Shakun’s world, don’t really chew their words before spitting them out. On the contrary, they are loose out in the open to grind each other’s peace unabashedly. 

Backed up by good writing and even better direction skills, KAPOOR & SONS (SINCE 1921) marks the arrival of a totally fascinating and utterly dysfunctional ‘on-screen’ family you would love to see more of it. 



गुलज़ार साब की ‘माचिस’ जैसी कुछेक को अलग रख कर देखें तो पंजाब को हिंदी फिल्मों ने हमेशा मीठी चाशनी में ही लपेट कर परोसा है. दिन में बैसाखी के मेले और रात में लोहड़ी का जश्न, इससे आगे बढ़ने की हिम्मत पंजाबी सिनेमा ने तो कभी-कभी दिखाई भी है पर बॉलीवुड कमोबेश बचता ही रहा है. अब तक. ‘उड़ता पंजाब’ के आने तक. 

पंजाब की जो सपनीली तस्वीर आपने ‘यशराज फिल्म्स’ के चश्मे से देखी थी, अभिषेक चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ पहले फ्रेम से ही उस तस्वीर पे चिपके ‘एनआरआई कम्पेटिबल’ चमक को खरोंचने में लग जाती है. सीने पर आतंकवाद का बोझ और पीठ पर ’84 के ज़ख्म उठाये पंजाब को अब हेरोइन, स्मैक और कोकीन की परतों ने ढक लिया है. खुरदुरी, किरकिराती, पपड़ी जमी परतों ने! 







अपने अधूरे सपनों का बोझ अपने बच्चों के नरम-नाज़ुक कन्धों पे डाल देना; हमारे माँ-बाप के लिए कोई नया नहीं है, और ज्यादातर मामलों और मायनों में वाज़िब भी नहीं. सख्ती कब ज्यादती बन जाती है, कोई नहीं बता सकता. धागे भर का ही फर्क है दोनों में. लकीर के इस पार का पिता अक्सर उस पार खड़ा ‘हानिकारक खलनायक’ दिखने लगता है, पर तभी तक, जब तक बच्चों को अपने पिता के सपनों में अपना भविष्य देख पाने की नज़र और समझ पैदा नहीं हो जाती. 

नितेश तिवारी की ‘दंगल’ बड़ी समझदारी से इस टकराव का सामना करती है और इस पेशोपेश से जुड़े हर ज़ज्बात को परदे पर पूरी ईमानदारी से पेश करती है. एक ऐसी फिल्म जो खुद को ही सवालों के घेरे में खड़ा करने से न डरती है, न ही पीछे हटती है. इससे पहले कि आप के ज़ेहन में कुलबुलाहट हो, कोई न कोई किरदार आपके सवालों को अपने अल्फाज़ दे देता है.




हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. 

‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं.






Friday, 16 September 2016

पिंक: इसको ‘ना’ कहने का सवाल ही नहीं! [4/5]

पिंक’ कोई नई बात नहीं कह रही. ‘पिंक’ में हो रहा सब कुछ, खास कर लड़कियों के साथ कुछ बहुत नया नहीं है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं. गाँव के पुलियों पर बैठे, साइकिल चलाकर स्कूल जाती लड़कियों पर आँख गड़ाये आवारों के जमघट से लेकर बड़े शहरों की बड़ी इमारतों में ख़ूनी लाल रंग की लिपस्टिक लगाने वाली, अपनी ही ऑफिस की लड़की को ‘अवेलेबल’ समझने की समझदारी दिखाते पढ़े-लिखों तक, ‘पिंक’ किसी को नहीं छोड़ती.

अक्सर देर रात को घर लौटने वाली ‘प्रिया’ ज़रूर किसी ग़लत धंधे में होगी. सबसे हंस-हंस कर बातें करने वाली ‘अंजुम’ को बिस्तर तक लाना कोई मुश्किल काम नहीं. 30 से ऊपर की हो चली ‘रेशम’ के कमरे पर आने वाले लड़के सिर्फ दोस्त तो नहीं हो सकते. ‘कोमल’ तो शराब भी पीती है, और शॉर्ट स्कर्ट पहनती है. ये ‘नार्थ-ईस्ट’ वाले तो होते ही हैं ऐसे. हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. ‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है.

दिल्ली में अकेले रहने वाली तीन लड़कियां [तापसी पुन्नू, कीर्ति कुल्हारी, एंड्रिया] एक रॉक-शो में तीन लड़कों से मिलती हैं. थोड़ी सी जान-पहचान के बाद लड़के जब उनके ‘फ्रेंडली’ होने का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं, लड़कियों में से एक उनपे हमला कर देती है. राजवीर [अंगद बेदी] हमले में घायल हो जाता है. लड़कियां भाग निकलती हैं. चार दिन बाद भी, लड़कियां सदमे में हैं. राजवीर ऊँचे रसूख वाला है. पुलिस अब लड़कियों के ही पीछे पड़ी है. बचाने के लिए आगे भी कोई आया है, तो अपने बुढ़ापे और ‘बाइपोलर डिसऑर्डर’ से जूझता एक रिटायर्ड वकील [अमिताभ बच्चन].

अनिरुद्ध रॉय चौधरी की ‘पिंक’ शुरुआत से ही आपको झकझोरने लगती है. हालाँकि पहले भाग में फिल्म का पूरा फोकस लड़कियों के डरे-सहमे चेहरों और उनकी डांवाडोल होती हिम्मत और हौसलों पर ही टिका होता है, पर ये वो हिस्सा है जो आपको सोचने पर मजबूर करता है. अगले भाग में कोर्ट की जिरह में अमिताभ लड़कियों की सुरक्षा, उनकी पसंद-नापसंद, उनके अधिकारों जैसे हर मसले पर मर्दों की सोच पर मजबूती से प्रहार करते हैं. इस हिस्से में फिल्म कहीं-कहीं नाटकीय भी होने लगती है, पर अंत तक पहुँचते-पहुँचते ‘पिंक’ अपनी बात रखने-कहने में बिना हिचकिचाहट सफल होती है.

पहले ही दृश्य में, घबराई हुई मीनल [तापसी] कैब ड्राईवर को डांटते हुए पूछती है, “नींद आ रही है क्या? रुको, आगे बैठकर बातें करती हूँ”. मेरे लिए, तापसी के इस किरदार में धार उसी दम से महसूस होनी शुरू हो जाती है. उसके बाद, बच्चन साब को उसका पलट कर घूरना. निश्चित तौर पर, तापसी इस फिल्म की सबसे मज़बूत कड़ी हैं. अपने से बड़ी उम्र के आदमी के साथ कभी रिश्ते में रही, फलक के किरदार में कीर्ति और ‘नार्थ-ईस्ट’ से होने का दर्द चेहरे पे लिए एंड्रिया; फिल्म के अलग-अलग हिस्सों में अपनी मौजूदगी बार-बार और लगातार दर्ज कराती रहती हैं. अपने ही मुवक्किलों को कटघरे में सवाल दागते उम्रदराज़ वकील की भूमिका में अमिताभ बच्चन बेहतरीन हैं, ख़ास कर उन मौकों पर, जब वो बोलने की जेहमत भी नहीं उठा रहे होते.

अंत में; ‘पिंक’ उन सभी महिलाओं के लिए एक दमदार, जोरदार आवाज़ है, जो हर रोज चुपचाप घरों, दफ्तरों, बाजारों में मर्दों की दकियानूसी सोच, गन्दी नज़र और घिनौनी हवस का शिकार बनती रहती हैं. साथ ही, मर्दों के लिए भी ये उतनी ही जरूरी फिल्म है. देखिये और सोचिये. कहीं आप के अन्दर भी कुछ बहुत तेज़ी से सड़ तो नहीं रहा? [4/5] 

Friday, 10 June 2016

तीन: कहानी रिटर्न्स! [3/5]


फिल्मों के नाम इन दिनों काफी चर्चा में हैं. तो शुरुआत नाम से ही करते हैं. रिभु दासगुप्ता की ‘तीन’ का नाम ‘तीन’ ही क्यूँ रखा गया, ‘कहानी-2’ क्यूँ नहीं; फिल्म देखने के बाद भी मेरी समझ से परे है. कहीं ‘तीन’ सुजॉय घोष की ‘कहानी’ श्रृंखला की वो तीसरी पेशकश तो नहीं, जो ‘कहानी-2’ से पहले आ गयी? खैर, नाम के पीछे का रहस्य जो भी हो, एक बात तो तय है कोरियाई क्राइम थ्रिलर ‘मोंटाज़’ की ऑफिशिअल रीमेक ‘तीन’ पर सुजॉय घोष की ‘कहानी’ का असर साफ़-साफ़, सुन्दर-सुन्दर और सही मायनों में दिखता है. सुजॉय फिल्म के निर्माताओं में सबसे प्रमुख हैं तो ये गैर-इरादतन, नाजायज़ या हैरतंगेज़ भी नहीं लगता. बहरहाल, ‘तीन’ एक बहुत ही करीने से बनाई गयी थोड़ी अलग किस्म की थ्रिलर है, जो आपको हर पल नए-नए रहस्यमयी खुलासों की बौछार से असहज भले ही महसूस न कराये, एक जानलेवा ठहराव के साथ आपको अंत तक कुरेदती ज़रूर रहती है.

जॉन बिश्वास [अमिताभ बच्चन] पिछले आठ साल से पुलिस स्टेशन के चक्कर लगा रहे हैं. किडनैपिंग के बाद उनकी नातिन की मौत एक एक्सीडेंट में हो गयी थी, जिसके बाद अब तक किडनैपर का कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा है. केस लगभग बंद हो चुका है. उस वक़्त के इंस्पेक्टर मार्टिन दास [नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी] नाकामी का बोझ सीने पर लिये अब चर्च में फ़ादर बनकर सुकून तलाश रहे हैं. नई पुलिस ऑफिसर सरिता सरकार [विद्या बालन] को भी जॉन से पूरी हमदर्दी है पर कहीं से कोई उम्मीद दिखाई नहीं देती. ऐसे में एक दिन, एक और बच्चे की किडनैपिंग का मामला सामने आता है. सब कुछ दोबारा ठीक वैसे ही घट रहा है जैसे आठ साल पहले जॉन के साथ हुआ था.

घटनाओं का पहले तो बड़ी बेदर्दी से इधर-उधर घाल-मेल कर देना और फिर धीरे-धीरे उन्हें उनके क्रम में पिरोकर आईने जैसी एक साफ़ तस्वीर सामने रख देना, किसी भी थ्रिलर के लिए ये सबसे अहम् चुनौती होती है. रिभु दासगुप्ता इन दोनों पहलुओं को बराबर तवज्जो देने में थोड़े ढीले नज़र आते हैं. जहां फिल्म के दूसरे भाग में रिभु बेतरतीब सिरों को जोड़ने में जल्दबाजी दिखाने लगते हैं, वहीँ पहले भाग में किरदारों के भीतर के सूनेपन, खालीपन और उदासी में सोख लेने वाली धीमी गति आपको परेशान भी करती रहती है. हालाँकि कोलकाता शहर के किरदार की रंगीनियत को बखूबी स्क्रीन पर उतार देने में रिभु कहीं कमज़ोर नहीं पड़ते. सरकारी दफ़्तरों में धूल चाटती फाइलों के अम्बार के बीच बैठे रूखे चेहरे हों या घरों-दीवारों पर लटकती बाबा आदम के ज़माने की तस्वीरें और तश्तरियां; फिल्म का आर्ट डायरेक्शन काबिल-ए-तारीफ है.

अमिताभ बच्चन जिस कद के अभिनेता हैं, उन्हें अब कुछ भी साबित करने की जरूरत नहीं है. सिनेमा और अभिनय के प्रति उनकी ललक भी बढ़ती उम्र के साथ बढ़ती ही रही है, पर ‘तीन’ में उनका अभिनय कोई नई ऊँचाईयाँ हासिल नहीं करता, बल्कि एकरसता ही दिखाई देती है. हाँ, उन्हें अपनी ही उम्र को परदे पर जीते देखना कोई कम अनुभव नहीं है. नवाज़ुद्दीन अच्छे हैं, पर उनके किरदार में थोड़ी उलझन है. कहीं वो फिल्म में हंसी की कमी पूरी करने में लगा दिए जाते हैं (चर्च वाले दृश्यों में खासकर) तो कहीं एक बड़े संजीदा पुलिस वाले की भूमिका जीने में मशगूल हो जाते हैं. विद्या बालन और सब्यसाची चक्रबर्ती छोटी भूमिकाओं में भी स्क्रीन पर चमक बिखेरने में कामयाब रहते हैं.

कोरियाई फिल्म ‘मोंटाज़’ अगर आपने देखी हो, तो ‘तीन’ दूसरे रीमेक की तरह बेशर्मी से दृश्यों की नक़ल करने की होड़ नहीं दिखाती, बल्कि एक बेहतरीन आर्ट डायरेक्शन और सधे हुए अभिनय के साथ आपको कुछ अलग परोसने की कोशिश करती है. ‘मोंटाज़’ में जहां क्राइम और उससे जुड़े घटनाक्रम को रोमांचक बना कर पेश किया गया है, ‘तीन’ किरदारों के भीतर और बाहर दोनों की दुनिया को तसल्ली से देखने और दिखाने में अपना वक़्त ज्यादा लगाती है. हर कहानी ‘कहानी’ नहीं हो सकती, पर इसमें बहुत कुछ है जो आपको ‘कहानी’ की याद दिलाता रहेगा...और अच्छी यादें किसे पसंद नहीं? [3/5]                

Friday, 1 April 2016

KI & KA: KI-ling of a promising KA-ncept! [2/5]

Gender equality is the easiest thing to talk about these days, if you really want to make a deliberate statement about how ‘cool’ you are. Can you guess what is more effortless than that? Women liberation, especially if you’re a posing intellectual and a gentleman. I presume you can differentiate the two from the word go; because I don’t think the advertising guru-turned-filmmaker R Balki is very comfortable with that. His role-reversal drama KI & KA is exactly like its title; sounds unique and interesting but is confusing, forced and dramatic most of the time. Balki tries to address the relevance of the issue in his most honest & thoughtful manner but fails to make it relatable and logical. I fear the search for ‘coolness’ in everything he shows gets rammed over by his over-confident storytelling.

KIA [Kareena Kapoor] is one of those rare girls who are a complete misfit in any grand and loud Indian wedding party. Such type exists? Anyway, she sees marriages as a big and bold full-stop to the girl’s individuality, personally and professionally. Next, she meets a crying handsome co-passenger KABIR [Arjun Kapoor] in a flight. Cool? Yeah; keep counting. KABIR wants to be a house-husband. Aspirations to earn big positions in any multi-national company or to take shit-load of salary home every month don’t excite him really. He fancies being an artist who makes ‘Homes’ rather than houses like his mother was. It’s a perfect setup. The girl is focused to take control of her promising professional career in the out world and the boy has no shilly-shallying attitude in running the house like a pro. Such a smooth trip until a few fuzzy faceoff incidents takes place in the relationship involving one’s unexpected expansion from being a house-husband to a TEDX celebrity-talker and the other’s steaming ego-issues.

Balki treats his concept of role-reversal in marriage as if it is something very alien and novel idea to the society. On the contrary, it is not. But Balki makes it look so dramatic, droll and desired that it starts irritating you after a while. Soon, his role-reversal theory starts bothering you as a futile role-play. The man becomes a woman and the woman acts like a man. Meanwhile, Balki decides to keep the spotlight on all the ‘cool’ gimmicks rather than exploring the emotional storm within. You see Arjun Kapoor charming married ladies in his neighborhood while giving them a fitness session or inviting them for a kitty-party. His love for riding a Segway or for that matter, making his home a train-toy museum too is more of a ‘cool’ addition to the style than to the substance. In fact, the initiative to put female artists’ name ahead of their male co-artistes in the opening titles loses its steam when it comes to other technical credits. Why is a female assistant director not given the same respect? Because you don’t give a damn!

KI & KA also doesn’t oblige you much if you’re seeking something outstanding in the performances. Kareena Kapoor Khan hams like there is no tomorrow. All she does in the name of acting is to intimidate you with her sparkly wide-eyed expressions and all the increasing now-reducing then redness on her face. Arjun Kapoor, on the other hand, does give you some freshness even if it is exaggerated and overacted. Rajit Kapoor and Swaroop Sampat are extremely delightful faces you would always love to see on screen. Though the writing again makes them stereotyped parents who either would end up being very friendly to their kids or totally cold towards them! Amitabh Bachchan & Jaya Bachchan play themselves in the most celebrated scene as a cameo. The scene beautifully tickles the idea they tackled together on screen in Hrishikesh Mukherji’s ABHIMAAN. It is also supposedly a tour to their drawing room.

Coming from the background of advertising world, Balki makes sure everything looks perfectly placed, lit and shot but he often misses the relativity of the context and in the content. In one scene, Kareena being a marketing professional throws an idea to sell an edible oil product at 50% off if the husbands would make the buying. Her case is that no Indian husband buys grocery and this will improve the sales. In other, we are informed that the couple pays 10,000/- salary to their part-time maid in Delhi. What a promising job opportunity hidden there! Mr. Balki sure belongs to the same rarest wing Kareena targets in the film. Better watch the new ARIEL- share the load commercial, if you want something progressive and feminist in true respect! [2/5]

Friday, 8 January 2016

WAZIR: Stylish But Not Smart Enough! [2/5]

While talking about Bejoy Nambiar’s WAZIR, let’s not talk about anything related to the game of Chess. I fear, it might sound something smart, edgy and intelligent. And I don’t want to give any wrong impressions. It does try to look like one but it is not. So, we better stick to the movie and not the game. Based on an original (?) story by Vidhu Vinod Chopra, WAZIR couldn’t have been any better directorial vehicle for Nambiar. He’s known for those over-stylized crime-thrillers (SHAITAN, DAVID) that sure are racy-pacy but also predictable at the end and too manipulative in terms of throwing some loud-mouthed ‘smart’ twists and turns at you. WAZIR is exactly that but then, where is the midas touch of Vidhu Vinod Chopra-Abhijat Joshi collaboration on the writing front? Oh, I remember there is a shred of Bachchan Mania that brings him on board in a magical make-up phenomenon [like in EKLAVYA] and a trivial bit of Kashmir too. So much for Mr. Chopra!

WAZIR sets pieces to bring two of tormented souls struggling with identical grieves together over the chess-board. Danish Ali [Farhan Akhtar] from Anti-terrorist Squad is facing his wife’s [Aditi Rao Hydri] rejection and repulsion for losing her daughter in a terrorist encounter. Enters wheelchair-ridden Pundit Omkar Nath Dhar [Amitabh Bachchan] sharing the pain of similar loss of his young daughter in a mysterious accident. A union minister [Manav Kaul] is on his radar as a prime suspect of the murder. And then, begins the game of chess where metaphors like ‘pyada’ ‘wazir’ ‘badshah’ get much of exposures in dialogues but hardly sound considerable in actual actions. In one of the scenes, Pundit ji throws a momentous line at Danish about how it’s all about timing in the game of chess but there is no timing to play the chess; and Danish hits back with a plain, simple and straight-faced reaction as ‘Bakwaas’. I wanted these kind of verbal punches more in the film than relying on a heroic shootout, a couple of ‘race against time’ chase sequences and some soulful melodies only to give the director a framework to fit some of his trademark shots i.e. capturing rainfall in slow-motion.

WAZIR’s strength, without a doubt, finds its traces in its supremely competent cast. Though making Mr. Bachchan’s character wheelchair-ridden looks mere a gimmick, he never lets you feel the same about his performance. He’s easy, effortless and a pro but again, the writing holds him back restricting it to not make it to the list of his bests. Farhan tries hard and succeeds in a couple of emotionally-charged scenes. His quick ‘spur-of-the-moment’ real reactions do grab your attention for most of the scenes. Aditi Rao Hydari looks good on her part, and makes you wanting more of her, once again. Manav Kaul does it again with his skilled acting ability to perform the part with absolute honesty. His subtly to be in a scene and in a space made exclusively for him is never overpowering or too imposing to make anyone feel unsettled, and it’s rare. My only expectation from his intellect was to have a Kashmiri dialect as his character is sketched like one and he’s too not alien to the place in actual.

Overall, WAZIR is one of those thrillers that make all the deliberate attempts to be able to overwhelm you with its calculated twists in the plot without showing any respect to your intellect. I could see this coming from a first-time filmmaker who doesn’t live in hopes to have a second chance, thus applying every trick to impress the viewers but not from someone so established. Play smartly; don’t play smart! [2/5]