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Sunday, 26 March 2017

फ़िल्लौरी: कहानी चुस्त, फिल्म सुस्त! [2.5/5]

हिंदी फिल्मों में पंजाब अब अपनी महक, अपना रंग, अपनी चमक खोता जा रहा है, या यूँ कहें तो दर्शकों को पंजाब के नाम पर दिखाने, भरमाने और लुभाने के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पास अब ज्यादा कुछ रह नहीं गया है. शादी, संगीत, पार्टियों और अजीब-ओ-गरीब मज़ाकिया किरदारों से भरे-पूरे, खतरनाक रूप से अमीर परिवारों के साथ अब हर फिल्म करन जौहर और आदित्य चोपड़ा का ‘खानदानी विडियो’ लगने लगी है. ताज्जुब नहीं होना चाहिए, अगर अंशाई लाल की ‘फ़िल्लौरी’ देखते वक़्त सब कुछ अच्छा-अच्छा होते हुए भी आप बोरियत से घिर जायें! और फिर यहाँ तो दो-दो पंजाब हैं, एक अभी का और दूसरा, आज़ादी से पहले का. आज़ादी से पहले वाला पंजाब ज्यादा सुकून देता है, दिलचस्प है और अनदेखा तो नहीं, पर कम देखा-जाना-सुना है. अब के वाला पंजाब वही है, ‘मानसून वेडिंग’ और ‘बार बार देखो’ के बीच हिचकोले खाता, जिसका जिक्र ऊपर की लाइनों में हो चुका है.

शादी की चाह कन्नन (सूरज शर्मा) को सात समुन्दर पार से अमृतसर खींच लायी है. अनु (मेहरीन पीरज़ादा) को वो बचपन से जानता है. दोनों परिवार साथ-साथ शामें रंगीन करते हैं. व्हिस्की पीने वाली बीजी (दादी) भी यहाँ हैं, जो अपने बेटे को ‘दो पैग का नतीज़ा’ कहकर ठहाके लगाती हैं, और बालों में रोलर्स लगाकर बाप-बेटे की हरकतों पे झल्लाने वाली बेबे (माँ) भी. हालात तब मजेदार हो जाते हैं, जब मांगलिक दोष से ग्रस्त कन्नन को असली शादी से पहले, पेड़ से शादी करनी पड़ जाती है. हालाँकि मुश्किल यहाँ ख़तम नहीं होती, बल्कि शुरू होती है. अगले ही रात/दिन से कन्नन को शशि (अनुष्का शर्मा) का भूत दिखाई देने लगता है. शशि का बसेरा उसी पेड़ पर था, जिसको शादी के बाद अब काट दिया गया है. अब शशि जाये तो कहाँ जाये? और अगर शशि नहीं जायेगी, तो कन्नन की जिंदगी में अनु कैसे आएगी?  

फ़िल्लौरी’ उन फिल्मों में से है, जो परंपरागत रूप से फिल्म में कहानी होने की अहमियत समझती हैं, मानती हैं. इस एक बात पर कहीं कोई दो राय नहीं हो सकती कि ‘फ़िल्लौरी’ में कहानी तो अच्छी है ही. हाँ, जिस बचकाने ढंग से उसे बुना जाता है, जिस थकाऊ तरीके से उसे परदे पर परोसा जाता है, वो निर्देशक अंशाई लाल और लेखिका अन्विता दत्त की समझ पर बड़े सवाल खड़े करता है. फिल्म में शशि और उसके प्रेमी फ़िल्लौरी (दलजीत दोसांझ) का खूबसूरत प्रेम-प्रसंग हर बार आपको जैसे कन्नन और अनु के हद एकरस कथानक से झकझोर कर फ्लैशबैक के सुहाने सफ़र पर ले जाता है और जगाये रखता है. हालाँकि मेहरीन अपनी पहली ही फिल्म में बहुत ज्यादा निराश नहीं करतीं, पर सूरज एक ही तरह के भाव चेहरे पर मढ़े-मढ़े पूरी फिल्म निकाल देते हैं. शुरू-शुरू में उनकी कॉमिक-टाइमिंग ताज़गी का एहसास जरूर कराती है, पर फिर धीरे-धीरे वो धार कहीं कुंद पड़ती जाती है.

एनएच 10’ से फिल्म प्रोडक्शन में सफल शुरुआत करने के बाद, अनुष्का की इस नयी कोशिश में विज़ुअल ग्राफ़िक्स कमाल के हैं. अनुष्का भूत से कहीं ज्यादा किसी परी की तरह परदे पर रंगीनियाँ बिखेरती नज़र आती हैं. भूत के रूप में जिन-जिन दृश्यों में वो नज़र आती हैं, उनमें एडिटिंग बेहतरीन तरीके से आपका ध्यान आकर्षित करती है. अनुष्का खुद एक कलाकार के तौर पर दोनों (फ्लैशबैक में, और वर्तमान में) रूपों में भली लगती हैं. दलजीत परदे पर अपना करिश्मा बिखेरने में फिर एक बार कामयाब रहते हैं. मनमौजी गायक की आवारगी से दीवाने आशिक की संजीदगी तक के उनके सफ़र में आपका वक़्त बड़े इत्मीनान से गुजरता है. शशि के भाई की भूमिका में मानव विज एक-दो दृश्यों में ही अपने जौहर दिखा जाते हैं. ‘उड़ता पंजाब’ में हम उन्हें ऐसा ही कुछ कमाल करते पहले ही देख चुके हैं. दिवंगत अभिनेता शिवम् प्रधान (पियूष की भूमिका में) को मजेदार रोल में देखना, और इस सक्षम अदाकार को दुबारा न देख पाने की कसक एक साथ दिल कचोटती रहती है.

आखिर में, ‘फ़िल्लौरी’ एक अच्छी कहानी होने के बावजूद ढीले डायरेक्शन, बेतरतीब राइटिंग और सुस्त रफ़्तार की वजह से वो मुकाम हासिल नहीं कर पाती, जिसकी हकदार वो कई मायनों में वाकई है. जिस ख़ूबसूरती के साथ अंशाई लाल शशि के किरदार को शानदार विज़ुअल ग्राफ़िक्स के जरिये परदे पर ज़िंदा रखते हैं, अंत तक आते-आते उसे कुछ इस हद तक निचोड़ने में लग जाते हैं कि आपको ‘दी एण्ड’ तक रुकना भी भारी लगने लगता है. [2.5/5]                 

Friday, 17 June 2016

उड़ता पंजाब (A): चुभती सच्चाई. चुभती फिल्म. [4/5]

गुलज़ार साब की ‘माचिस’ जैसी कुछेक को अलग रख कर देखें तो पंजाब को हिंदी फिल्मों ने हमेशा मीठी चाशनी में ही लपेट कर परोसा है. मुंबई का कैमरा जब भी अमृतसर, भटिंडे या पटियाले में लेंस से कैप हटाता है, हरे-पीले सरसों के खेतों में लाल-नीली चुन्नियाँ लहराती मुटियारें रोटी लेकर दौड़ लगा रही होती हैं. दिन में बैसाखी के मेले और रात में लोहड़ी का जश्न, इससे आगे बढ़ने की हिम्मत पंजाबी सिनेमा ने तो कभी-कभी दिखाई भी है पर बॉलीवुड कमोबेश बचता ही रहा है. अब तक. ‘उड़ता पंजाब’ के आने तक. पंजाब की जो सपनीली तस्वीर आपने ‘यशराज फिल्म्स’ के चश्मे से देखी थी और आज तक अपने जेहन में बसाये घूम रहे थे, अभिषेक चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ पहले फ्रेम से ही उस तस्वीर पे चिपके ‘एनआरआई कम्पेटिबल’ चमक को खरोंचने में लग जाती है. सीने पर आतंकवाद का बोझ और पीठ पर ’84 के ज़ख्म उठाये पंजाब को अब हेरोइन, स्मैक और कोकीन की परतों ने ढक लिया है. खुरदुरी, किरकिराती, पपड़ी जमी परतों ने!  

सरसों के खेतों की जगह अब फिल्म बेरंग सफेदे [यूकेलिप्टस] के पेड़ों से शुरू होती है, वो भी रात के अँधेरे में. बॉर्डर पार से पाकिस्तान की जर्सी पहने एक खिलाड़ी हेरोइन का एक पैकेट ऐसे फ़ेंक रहा है, जैसे ओलिंपिक में मेडल जीत लेने का ये उसका आख़िरी चांस हो. नेताओं और पुलिस की मिली-भगत से चल रहे ड्रग्स के इस काले कारोबार का शिकार सब हैं, स्कूल-कॉलेज जाने वाले लड़कों से लेकर उनके पसंदीदा रॉकस्टार टॉमी सिंह [शाहिद कपूर] तक. अपनी मर्ज़ी और खुदगर्जी भरे गानों में गालियाँ बकने वाला ये रॉकस्टार हमेशा नशे में धुत्त, सनकी और गुस्सैल किस्म का आम नशेड़ी है, जिसका अपने ऊपर कोई जोर नहीं. सरताज सिंह [दिलजीत दोसंझ] एक आम पुलिसवाला है जिसे सच्चाई मानने में कोई ख़ास तकलीफ़ नहीं है तब तक, जब तक उसका छोटा भाई खुद नशे में गिरफ्त में नहीं आ जाता. डॉ. प्रीत [करीना कपूर खान] के साथ मिलकर अब सरताज इस पूरे रैकेट की जड़ तक पहुंचना चाहता है. इन सब के बीच एक बिहारन [आलिया भट्ट] भी हर पल पिस रही है. अच्छी ज़िन्दगी की तलाश ने उसे इस गर्त में ला फेंका है, अब जाने कब और कैसे इस कैद से उसकी रिहाई मुमकिन होगी?

फिल्म शुरू ही हुई है, जब थाने की कोठरी में बंद टॉमी अपने रसूख की धौंस में हो-हल्ला मचा रहा है और अपने छोटे भाई की हालत से हिला हुआ सरताज बाहर बैठा नशे को कोस रहा है. थोड़ी ही देर में आप देखते हैं, सरताज टॉमी की थप्पड़ों और घूंसों से जम कर धुलाई कर रहा है. ये बॉलीवुड के लिए नया है. इस एक वाकये से अभिषेक चौबे तय कर देते हैं कि फिल्म किरदारों को तवज्जो देती है न कि उन्हें निभाने वाले अभिनेताओं के कद को. वरना ये वही बॉलीवुड है जो परदे पर किस बड़े स्टार का नाम पहले आएगा, जैसे फ़िज़ूल के हाय-तौब्बा से निर्माताओं की जान सुखा देता था. ‘उड़ता पंजाब’ जमीनी हकीकत को इतनी बेरूखी और बेदर्दी से आपके सामने रखती है कि इसके कुछ दृश्य आपको फिल्म ख़त्म होने के काफी बाद तक परेशान करते रहते हैं. ‘एनएच 10’ के आख़िरी सीन में अनुष्का का किरदार किस बेखौफ़ियत से सिगरेट जलाती है और फिर लोहे की सरिया जमीन पर खरोंचते हुए विलेन की ओर बढती है. आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. ‘उड़ता पंजाब’ उसी धारदार कलम [सुदीप शर्मा] से निकली है.

अभिनय में शाहिद अपने ‘कमीने’ वाले पागलपन में पूरे जोश-ओ-खरोश से वापस लौट आये हैं. ठहराव में तो अभी भी गुंजाईश बहुत है पर जिस उतावलेपन और बेचैनी से वो ड्रग एडिक्ट की भूमिका निभाते हैं, कहीं कहीं अपने पिता पंकज कपूर जी की झलक छोड़ जाते हैं. करीना ठीक ही लगती हैं. दिलजीत वाकई में दिल जीत लेते हैं. एक ख़ास किस्म की सादगी तो है ही उनमें, अभिनय में भी कहीं कोई कमी नहीं दिखती. देखना होगा कि बॉलीवुड उन्हें आगे किस तरह ट्रीट करता है. और अब बात आलिया की. आलिया फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं. उनकी बिहारी बोली में थोड़ी घालमेल जरूरी दिखती है, पर जिस दर्द को वो बिना बोले फिल्म में जीते नज़र आती हैं, वो आलिया को आज के दौर के नामचीन अभिनेताओं की श्रेणी में ला खड़ा करने के लिए काफी है.

अंत में, ‘उड़ता पंजाब’ आसान फिल्म नहीं है और एकदम से परफेक्ट भी नहीं. पर फिल्म में कुछ ऐसा भी नहीं, जो नहीं कहा जाना चाहिए या जिसे बेहतर तरीके से कहा जा सकता था. गालियों की थोड़ी अति ज़रूर है पर उनसे कहीं ज्यादा चुभती है सच्चाई. फिल्म के एक हिस्से में टॉमी अपने चाहनेवालों के सामने स्टेज में बेबाकी से कह जाता है, “मुझे सिर्फ ड्रग्स पता था. अपने गाने में मैंने वही डाल दिया. मुझसे गये-गुजरे तुम लोग हो, जिन्होंने उसमें फिलोसोफी ढूंढ ली और मुझ 22 साल के लौंडे को रॉकस्टार बना दिया”. ‘उड़ता पंजाब’ देखने से ज्यादा, सोचने की फिल्म है! देखिये, सोचिये और प्लीज शुतुरमुर्ग मत बने रहिये. [4/5]