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Friday, 21 December 2018

ज़ीरो: शाहरुख़ के करिश्मे और कद के सामने छोटी पड़ती फिल्म! [2/5]


ये साल हिंदी सिनेमा के महानायकों को औंधे मुंह गिरते हुए देखने का है. ख़ास तौर पर खानों (सलमान, आमिर, शाहरुख़) की तिकड़ी दर्शकों की कसौटी पर कतई खरी नहीं उतर रही. सलमान ‘रेस 3’ में अपने आपको बड़ी बेहयाई और दंभ से बार-बार दोहराने का खामियाज़ा भुगत चुके हैं. मनोरंजन के नाम पर भव्यता की चमकीली पन्नी में लपेट कर कुछ भी सस्ता और सड़ा-गला परोसने के लिए, ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ में आमिर नकारे जा चुके हैं; और अब अनोखी लेकिन बेतुकी और अजीब सी ‘ज़ीरो’ में शाहरुख़ अपने करिश्मे के बूते एक ऐसी फिल्म चलाने की कोशिश करते नज़र आ रहे हैं, जो जितनी जादुई और मनोरंजक है, उतनी ही थका देने वाली भी. हालाँकि बाकी दोनों मिसालों की बनिस्पत, ‘ज़ीरो कम से कम अपनी कमजोरियों और कमियों का ठीकरा अपने मुख्य नायक की क़ाबलियत पर तो नहीं ही फोड़ सकती! शाहरुख़ अपने पूरे शबाब पर हैं, और गनीमत है कि परदे पर उनका बौनापन सिर्फ उनके किरदार के कद तक ही सीमित रहता है, अभिनय पर तनिक भी हावी नहीं होता.

परदे पर छोटे शहरों के रोमांस में आनंद एल राय बड़ा नाम बन चुके हैं. ‘ज़ीरो की शुरुआत भी छोटे से शहर मेरठ से होती है, जहां शाहरुख़ जैसे बड़े नाम को कहानी में ‘फिट करने के लिए छोटा (बौना) बनने की शर्त से गुज़ारा जाता है. खेल बराबरी का होना चाहिए. बऊआ सिंह (खान) हिंदी में ‘अड़तीस’ और इंग्लिश में ‘थर्टी नाइन का हो चुका है, पर शादी की कोई सूरत नहीं बन रही. कद में छोटा बऊआ सपने में बड़ा बन जाता है. छोटे शहर का है, तो अमेरिका से लौटी, शराब-सिगरेट पीने वाली लड़की को शादी के बारे में सोचते देख झल्ला जाता है. ‘तू कहाँ से पड़ गयी इन चक्करों में?’. छोटे शहर का है, मर्द है तो जिद भी कि लड़की को बऊआ सिंह में इंटरेस्ट दिखाना ही होगा. बऊआ चंट है. मतलबी भी, और कोयल भी. खुद का घोंसला बनाने से चिढ़ मचती है. चाहे लड़की उसने खुद चुनी हो, अपने बराबरी की. व्हीलचेयर पर चिपकी, सेलेब्रल पल्सी से लड़ती, नासा की वैज्ञानिक (अनुष्का शर्मा).

फिल्म के लेखक हिमांशु शर्मा छोटे शहरों के चाल-चलन, ताव-तेवर और लय-लहज़ा का काफी कुछ भले ही पहले की फ़िल्मों में परोस चुके हों, ‘ज़ीरो में कहीं से भी उसके जायकों में कमी या बासीपन नहीं आने देते. उनके चुटीले संवादों में और बऊआ सिंह के बेशरम किरदार में आपकी दिलचस्पी अब भी बनी रहती है. दिक्कत पेश आती है, जब कहानी को बड़ी करने के लिए आनंद एल राय और हिमांशु बिना वजह तरकीबें लड़ाने लगते हैं. पतंगें उड़ाती ‘तनु वेड्स मनु की छत ‘ज़ीरो तक आते आते पैसों की बारिश कराने वाले छज्जे बन जाते हैं. रिक्शे पर घर लौटती तनु हो, या चौराहे पर पिटता कुंदन; गलियाँ-रस्ते अब ताज़ा-ताज़ा रंगे-पुते सेट बन गये हैं. भरोसेमंद किरदारों की भीड़ से अलग, कहानी में फ़िल्मी जगत के सितारों का बेरोक-टोक आना-जाना बढ़ गया है. एक सुपरस्टार (सलमान), दो कोरियोग्राफर (गणेश आचार्य, रेमो डिसूज़ा) और स्क्रीन पर करिश्माई मौजूदगी दर्ज कराने वाले दो काबिल अभिनेताओं (अभय देओल, आर माधवन) के साथ-साथ आधा दर्ज़न भर सिने-सुंदरियां (काजोल, रानी, दीपिका, जूही, श्रीदेवी, करिश्मा), मानो बऊआ के छोटे से कद में बखूबी घुसे शाहरुख़ अभी निकल कर ‘लक्स’ के बाथटब में छलांग मार देंगे.  

‘ज़ीरो अपनी कहानी में कुछेक अनोखे मोड़, अधूरेपन का जश्न मनाते किरदारों और उनकी सपनीली दुनिया के ज़रिये कई बार एक प्यारी सी, फंतासी रोमांस वाली ‘डिज्नी फिल्म होने का जोरदार आभास कराती है; खास कर अपने अंत की ओर बढ़ते हुए. इतना ही नहीं, हर वक़्त मनोरंजक होने की शर्त पूरी करने की ललक में फिल्म का पहला हिस्सा राजकुमार हिरानी की फिल्मों की भी याद ख़ूब दिला जाता है, लेकिन ये सारी उम्मीदें धीरे धीरे धुंआ होती जाती हैं. अभिनय में, अनुष्का की मेहनत साफ़ दिखती है. सेलेब्रल पल्सी और व्हीलचेयर के साथ भी, उनके चेहरे के भाव कितनी ही बार बरबस आपके चेहरे पर मुस्कान खींच देते हैं. ब्रेकअप के बाद बेपरवाह फिल्मस्टार की छोटी सी ही भूमिका में कटरीना कैफ़ अपनी सबसे रोमांचित कर देने वाली छाप छोड़ जाती हैं. तिग्मांशु धूलिया जमते हैं, और ज्यादा दिखाई देने की चाह पैदा करते हैं.

...लेकिन ‘ज़ीरो शाहरुख़ से अलग करके नहीं देखी जा सकती. बऊआ सिंह बनकर शाहरुख़ ना सिर्फ सुपरस्टार होने की उस अकड़ को तोड़ फेंकते हैं, जिसे हटाने की उम्मीद उनसे हाल-फिलहाल की जाने लगी थी; बल्कि ऐसा करते हुए वो अपने उस गुजरे हुए जादुई दौर को भी वापस जी लेते हैं, जहां उनका करिश्मा उनके किरदार की सच्चाइयों से पैदा होता था. बऊआ सिंह के सूरत और सीरत का हुलिया काफी हद तक ‘राजू बन गया जेंटलमैन’, ‘कभी हाँ कभी ना’ और ‘यस बॉस जैसी फिल्मों में उनके किरदारों से मेल खाता दिखता है. ‘जियरा चकनाचूर गाने में सलमान के चारो ओर जोश में नाचते बऊआ सिंह को देखना बरबस आपको शाहरुख़ की लगन, एनर्जी और सिनेमा को लेकर उनकी गंभीरता का मुरीद बना देगा. बऊआ सिंह को एक और मौका मिलना ही चाहिए.

आखिर में; ‘ज़ीरो फिल्म के तौर पर शाहरुख़ के करिश्मे और उनके मजेदार किरदार के कद के आगे बहुत छोटी पड़ जाती है. हालाँकि आनंद एल राय शाहरुख़ के कन्धों पर चढ़कर एक नया आसमान नापने की कोशिश पूरी करते हैं, पर तकरीबन पौने तीन घंटे की फिल्म में ज्यादातर वक़्त हवाबाजी में ही खर्च कर देते हैं. अगर सिर्फ फिल्म का पहला हिस्सा देखने की बात हो, तो मैं दो बार और देख सकता हूँ, पर शायद दूसरे हिस्से में फिल्म के बुरी तरह लड़खड़ाने का दर्द मुझे तब भी थिएटर से दूर ही रखेगा! [2/5]  

Saturday, 29 September 2018

सुई धागा: उम्मीदों से छोटी, पर बेहद प्यारी! [3/5]


ज़िन्दगी की चादर में उम्मीदों के पैबंद लगाने हों, या दुनिया भर से लड़ते-झगड़ते, उधड़ने लगे छोटे-छोटे सपने को रफ़ू करना हो, तो सुई-धागे का मेलजोल जरूरी हो जाता है. छोटे शहरों की आँखों में पलने वाले मोटे-मोटे सपनों के साकार होने की कहानी हिंदी फ़िल्मी परदे पर न जाने कितनी बार देखी-दिखाई जा चुकी है. शायद इतनी दफ़े कि अब आपको ये जानने में कोई दिक्कत नहीं होती कि ऊंट किस करवट बैठेगा? खुद यशराज फिल्म्स भी ‘बैंड बाजा बारात’ जैसी फिल्मों के साथ इस कामयाब चलन का हिस्सा रहा है. शरत कटारिया की ‘सुई धागा’ यशराज फिल्म्स की ही प्रस्तुति है, और एक बेहद प्यारी फिल्म होने के बावज़ूद, कहीं न कहीं दर्शकों के मन में ‘यही होगा’ और ‘यही होना था का दंभ पैदा होने से रोकने में असफल रह जाती है. सूरत-सीरत और स्वभाव में अपनी ही बेहतरीन फिल्म ‘दम लगा के हईशा’ से अच्छा-खासा मेल खाने के बाद भी, कटारिया फिल्म को बड़ी बेदर्दी से जाने-पहचाने रास्तों पर डाल कर, घिसे-पिटे उतार-चढ़ावों पर लुढ़कने से बचा नहीं पाते.

मौजी (वरुण धवन) और ममता (अनुष्का शर्मा) की कहानी में सुई-धागा सपनों को पाने का उनका एक जरूरी जरिया तो है, पर दूसरी तरफ वो खुद भी अपनी कहानी के सुई-धागा ही है, जिनमें शादी के सालों बाद भी बेहतर तालमेल की गुंजाईश अभी भी बरकरार है. मौजी अपने मालिक के कहने पर कभी कुत्ता, तो कभी गली का सांड बन के उनका मनोरंजन करता है. दिक्कत ये है कि उसे ये सब करने में कुछ गलत भी नज़र नहीं आता, जब तक उसकी बीवी ममता इस बारे में उससे बात नहीं करती. ममता मौजी की तरह नहीं है. समझदार है. मौजी को सपने देखना सिखा रही है. वो सपना, जिसमें वो खुद उसके साथ-साथ चल सके. हाथ पकड़ के. सर उठा के.

शरत कटारिया लोअर मिडिल क्लास की दुनिया को परदे पर जिंदा करने में जैसी बारीकी और काबलियत दिखाते हैं, हालिया दौर में शायद ही कोई और कर रहा हो. वरना फिल्मों का नायक दुकान में बनियान-पजामा पहने बैठा ऑडियो कैसेट्स में गाने रिकॉर्ड करने वाला प्रेम प्रकाश तिवारी या पेड़ के नीचे सिलाई की दुकान लगाए बैठा, कबूतरों को नाम से बुलाने वाला मौजी हो, कितनी बार देखने को मिलता है? अम्मा (यामिनी दास) गुसलखाने में फिसल कर गिर गयी हैं, दर्द में हैं, पर बाल्टी में पानी भरने का अधूरा काम याद दिलाना नहीं भूल रहीं. डॉक्टर कह रहा है, हार्ट अटैक है पर अम्मा को इलाज़ पता है, ‘’रोज सुबह चौक तक पैदल टहलने लगूंगी, हो जायेगा ठीक. बहू को घर लौटने में देर हो रही है, बाऊजी (रघुवीर यादव) अम्मा के लिए खुद रोटियाँ सेंकना शुरू कर चुके हैं. पड़ोसी छोटी सी लड़ाई पर डर कर चिल्ला रहा है, ‘100 नंबर पे फ़ोन लगाओ कोई. बगल वाली नाराज़ चाची समोसे-चाय के बदले सुलह करने पर तैयार हो गयी हैं.

रोजमर्रा की बातचीत वाले मजेदार संवादों, असलियत के करीब-करीब दिखने वाले किरदारों और मिडिल क्लास की दबी-दबी चाहतों से भरा-पूरा माहौल बना कर, कटारिया अपने कलाकारों को अदाकारी का पूरा मौका देते हैं. अभिनय में वरुण की ईमानदारी कोई भी नज़रंदाज़ नहीं कर सकता. उनकी कोशिशें हर बार कामयाब न भी हों, तब भी उनका असर आप पर कम नहीं होता. अनुष्का कुछ-कुछ दृश्यों में जरूरत से ज्यादा कर जाती हैं, खास तौर पर जहां जहां उनका किरदार फिल्म में ज़ज्बाती होने की तरफ बढ़ता है. आसान पलों में उनकी छवि बेहतर नज़र आती है. रघुवीर यादव बेहतरीन हैं. जाने क्यूँ वो जब भी परदे पर होते हैं, मैं फ्रेम में कहीं हारमोनियम तलाशने लगता हूँ और इस उम्मीद में आँखें चमक जाती हैं, कि अभी उन्हें गाते हुए सुनूंगा. यामिनी दास इस फिल्म की पंकज त्रिपाठी हैं. फरक नहीं पड़ता कि वो फ्रेम में क्या कर रही हैं, फ्रेम में उनका होना भर न सिर्फ गुदगुदाता है, ख़ूब तबियत से माँओं की याद भी दिलाता है.   

‘सुई धागा में शरत कटारिया अपने किरदारों के आँखों में सपने तो बहुत चमकीले, नायाब और वाजिब बुनते हैं, पर जब उन्हें उन सपनों तक पहुंचाने की बारी आती है तो नाटकीयता की रौ में कुछ इस कदर बह जाते हैं कि किरदारों के इमोशन्स से दर्शकों के भरोसे की डोर टूटने लगती है. अपना खुद का कुछ करने के चाह में, मौजी और ममता एक सरकारी सिलाई मशीन पाने के लिए जिस तरह का कड़ा संघर्ष करते हुए दिखाए जाते हैं, जबरदस्ती का और ठूंसा हुआ लगता है. फिल्म का अंत भी आपको बिलकुल चौंकाता नहीं. ‘दिलवाले दुल्हनियां ले जायंगे में फरीदा जलाल सालों से दोहरा रही हैं, ‘सपने देखो, सपने देखने में कोई हर्ज़ नहीं है, कुछ गलत नहीं, बस्स उनके पूरे होने की शर्त मत रखो.’’ काश, ‘सुई धागा अपने सपने पूरे कर लेने की शर्त से बचने पाती, और एक आजमाए हुए अंत की तलाश के बजाय एक बेहतर शुरुआत की तरफ बढ़ पाती!

इन सबके बाद भी, मैं चाहूँगा कि इन किरदारों से आप उन्हीं की चहारदीवारी के भीतर एक बार जरूर मिलें, और देखें...बेटे को बाप से अखबार के दूसरे पन्नों के लिए लड़ते हुए, बाऊजी का बिस्तर पर पड़ी अम्मा को मोबाइल पर उनके पसंदीदा टीवी सीरियल के एपिसोड्स दिखाते हुए, मौजी-ममता के चुराये हुए अन्तरंग पलों में बस के मुसाफिरों को गाने की धुन पर ऐसे लहराते हुए, जैसे खुद बस घुमावदार रास्तों से गुजर रही हो. कई बार सफ़र का मुकम्मल होना इतना अहम् नहीं होता, जितना सफ़र के दौरान बिताये छोटे-छोटे यादगार पलों का जश्न मनाना! [3/5]

Friday, 2 March 2018

परी- नॉट अ फेयरीटेल: 'हॉरर' में कहानी की शुरुआत! [3/5]

हिंदी फिल्मों में 'हॉरर' अपने हर दौर में अक्सर किसी एक ख़ास नाम या बैनर के खूंटे से बंध कर रहा है. रामसे ब्रदर्स की भूतिया हवेलियों से रामगोपाल वर्मा के शहरी मकानों और भट्ट कैंप के इन्तेहाई खूबसूरत यूरोपियन मेंशन्स तक; 'हॉरर' के साथ सबने अपने-अपने लैब में जब भी चीर-फाड़ की, फ़ॉर्मूले हमेशा एक से ही रहे. यही वजह है कि '13B', 'एक थी डायन' और हाल-फिलहाल की 'द हाउस नेक्स्ट डोर' जैसी थोड़ी सी भी अलग और नये लिहाज़ की डरावनी फिल्में उम्मीदों का पहाड़ खुद ज्यादा ही बड़ा कर देती हैं. प्रोसित रॉय की 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' ऐसी ही एक हॉरर फिल्म है, जिस पे 'हॉरर' के किसी भी पुराने कारखानों की कोई मोहर या छाप नहीं दिखाई देती. हालाँकि खामियों की फेहरिस्त भी कुछ कम बड़ी नहीं, पर 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' अपने नए अंदाज़ से न सिर्फ आपको डराती है, ज्यादातर वक़्त चौंकाती भी है.

डरावनी फिल्मों में अंधविश्वास, लोक कथाओं और पुरानी मान्याताओं का बोलबाला रहता ही है. ऐसी फिल्मों में, ऐसी फिल्मों से तार्किक या वैज्ञानिक होने की उम्मीद करना अपने आप में एक भुलावे की स्थिति है. प्रोसित भी अपनी पहली फिल्म के तौर पे 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' में दकियानूसी होने से परहेज़ नहीं करते. डराने की मूलभूत जरूरत को पूरा करने के लिए, वक़्त-बेवक्त यहाँ भी बिजलियाँ कड़कती हैं, खिड़कियाँ खड़कती हैं, कंधे पे हाथ रखते ही डरावने चेहरे पलट कर आखों तक चले आते हैं और बैकग्राउंड में एक उदास आवाज़ धीमे-धीमे लोरियां सुनाती रहती है, पर इस बार की कहानी सतही तौर पर दकियानूसी होने के बावजूद, अपने आप में 'और भी' बहुत कुछ कहने की गुंजाईश बाकी रखती है. 

बांग्लादेश के एक ख़ास हिस्से में एक ख़ास नस्ल को मिटाने की मुहीम चल रही है. नहीं, इसका रोहिंग्या मुसलामानों से कोई लेना देना नहीं है. हालाँकि बात जिन्नों की है, और जिन्न भी इसी ख़ास महज़ब में अपनी पैठ ज्यादा रखते हैं. इफरित नाम का एक ख़ास जिन्न है, जो अपनी नस्ल बढ़ाने के लिए औरतों का सहारा लेता है. प्रो. कासिम अली (रजत कपूर) ढूंढ-ढूंढ के ऐसी औरतों का गर्भपात करते-कराते हैं. रुखसाना (अनुष्का शर्मा) ऐसी ही एक नाजायज़ पैदाइश है, जिसे पेरी या परी कहा जाता है. नानी की कहानियों वाली नेकदिल परी नहीं, बल्कि ऐसी जिसकी फ़ितरत ख़ूनी वैम्पायरों जैसी दिल दहलाने वाली हो. बहरहाल, एक एक्सीडेंट में अपनी माँ को खोने के बाद रुखसाना आजकल अरनब (परमब्रत चैटर्जी) के यहाँ पनाह ले रही है. 

ऐसे समाज में जहां औरतों को डायन कह कर मार दिया जाता हो, अनचाहे गर्भ को गिराने के लिए इंसानियत गिरा दी जाती हो; प्रोसित डर के बाज़ार को गर्म रखने के लिए ऐसे ही प्रतीकों का सहारा तो बखूबी लेते हैं, पर इनको लेकर किसी तरह की कोई ठोस या गहरी बात कहने में चूक जाते हैं. फिल्म के आखिर तक आते आते, रुखसाना के किरदार के साथ दर्शकों की सहानुभूति बनाने की जोर-आजमाईश में फिल्म थोड़ी भटकती जरूर नज़र आती है, और उलझती भी; लेकिन अपने बेहतर कैमरा-वर्क, खूबसूरत आर्ट-डायरेक्शन और अनदेखे अंदाज़ की वजह से 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' उन पलों में भी एक खूबसूरत फिल्म की तरह पेश आती है, जिन पलों में उसपे डराने का कोई बोझ या दबाव नहीं होता. पर्दों के पीछे सायों का लिपटना और चिपटना क्या ही बेहतर दृश्य है! 

...और अब जिक्र अनुष्का का. फिल्म की सबसे दमदार कड़ी. हिंदी फिल्मों में 'हॉरर' को आसान कमाई और कम खतरे वाला कदम माना जाता है. ऐसे में 'हॉरर' के साथ इस तरह का नया प्रयोग करने के लिए, अनुष्का (फिल्म की निर्माता के तौर पर) को बधाई मिलनी ही चाहिए. रही बात उनके अभिनय की, तो अनुष्का उन दृश्यों में ज्यादा प्रभाव छोड़ती हैं, जिनमें उन्हें संवादों के सहारे नहीं रहना होता. फिल्म में खून-खराबा भी खूब है, पर असल टीस आपको अनुष्का के किरदार के दर्द से ही उठती है. उनकी आँखों की चमक ही कितनी बार आपको सिहरा जाती है. रजत कपूर शानदार रूप से दिल की धडकनें बढ़ाते रहते हैं. परमब्रत 'कहानी' के अपने किरदार के आस-पास ही रह जाते हैं. उतने ही सजीले, शर्मीले और सधे हुए.

आखिर में, 'परी- नॉट अ फेयरीटेल' डरावनी फिल्मों में कहानी पिरोने की एक कोशिश के तौर पर सराही जानी चाहिए. एक ऐसी फिल्म, जो जेहनी तौर पर थोड़ी और बेहतर, थोड़ी और काबिल हो सकती थी, पर डर के लिए एक कसा हुआ माहौल गढ़ने में जो कहीं से भी चूकती नहीं. [3/5]  

Friday, 4 August 2017

जब हैरी मेट सेजल: पुराने इम्तियाज़- नए शाहरुख़ [3/5]

बॉलीवुड में रोमांटिक फिल्मों का एक आख़िरी बेंचमार्क तकरीबन 22 साल पहले आया था. तब से मुंबई के मराठा मंदिर में 'दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे' आज तक चल रही है. इस बीच 'चेन्नई एक्सप्रेस' और 'बेफ़िक्रे' जैसी बहुत सारी फिल्मों ने गाहे-बगाहे इस 'भारतीय फिल्म इतिहास की शायद सबसे चहेती रोमांटिक फिल्म' को अपने-अपने तरीके से परदे पर दोबारा जिंदा करने की कोशिश की है. कहना ग़लत नहीं होगा कि कमोबेश सभी ने फिल्म की रूह को समझने से ज्यादा, उसकी बाहरी चमक-दमक को ही अपना केंद्र-बिंदु बनाये रक्खा. 'जब हैरी मेट सेजल' के साथ, इम्तियाज़ अली अपना जाना-पहचाना, जांचा-परखा, सूफ़ियाना असर फिल्म की रूमानियत में घोल देते हैं, साथ ही वापस ले कर आते हैं रोमांस के बादशाह शाहरुख़ खान को उनकी अपनी ही दुनिया में, मगर इस बार एक अलग नए अंदाज़ में. 'दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे' अगर इन 22 सालों में और बालिग़, और उम्रदराज़, और परिपक्व होने की किस्मत पा सकती, तो बेशक 'जब हैरी मेट सेजल' के आस-पास ही होती...सीरत में न सही, सूरत में जरूर! 

लन्दन के नौजवान मसखरे, दिलफेंक राज की जगह अब यूरोप के रूख़े, तुनकमिजाज़ और मुंहफट ट्रेवल-गाइड हैरी (शाहरुख खान) ने ले ली है. टूर ख़तम होने के साथ ही, उसके रंग बदलने लगते हैं. मीठा-मीठा बोलने वाला हैरी झल्लाहट में पंजाबी गालियाँ भुनभुनाता रहता है. अपनी बेपरवाही को चाशनी में लपेट कर लड़कियां पटाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि पूरी अकड़ और तेवर से अपने 'गंदे' होने का ढिंढोरा पीट-पीट कर पहले ही आगाह कर देता है. और तब भी, अगर लड़की नज़दीक आने की कोशिश करे तो 'मत कर, मुश्किल हो जायेगी!' कहकर पीछे हट जाता है. हालाँकि देसी और विदेशी लड़कियों में उसका ये फ़र्क अब भी समझ से परे है, बावजूद इस वाहियात 'पुरुषवादी' सफाई कि 'तू चाइना वास की तरह है, एक जगह रख के देखते रहने के लिए'.

सेजल (अनुष्का शर्मा) भी सिमरन की ही तरह साफ़ कर देती है, 'मैं वैसी लड़की नहीं हूँ', पर इस बार उसे भारी दिक्कत 'स्वीट, क्यूट, ब्यूटीफुल, सिस्टर-लाइक' समझे जाने से है. सेजल सगाई की अंगूठी खोजने के बहाने कुछ और ही खोज रही है. शायद आज़ादी की सांस, जो अपनी ही फॅमिली बिज़नेस का लीगल एडवाइजर बन के नसीब नहीं हो रहा या फिर शादी के बाद जिसके खो जाने का डर बना हुआ है. हालाँकि यूरोप का 'यहाँ अंगूठी नहीं है, वहाँ चलो' वाला अबकी बार का ट्रिप, 'मैं इस बार ट्रेन मिस नहीं करना चाहती' वाले ट्रिप जितना मजेदार नहीं है, बल्कि कहीं ज्यादा झेला और झल्ला देने वाला है, इसमें कोई शक़ नहीं. 

शाहरुख़ के लिए रोमांस नया नहीं है, पर इस बार शाहरुख़ ज़रूर नए हैं. उम्र का असर सिर्फ परदे पर नज़र नहीं आता, एक गहराई के साथ उनके किरदार में भी समाया हुआ दिखता है. 'डियर जिंदगी' की तरह एकदम चौंकाने वाला तो नहीं, पर हैरी में शाहरुख़ के अन्दर का अदाकार काफी हद तक ज़मीनी और कम बनावटी नज़र आता है. अनुष्का भी बड़ी आसानी से और ख़ूबसूरती से अपनी भाव-भंगिमाएं बदल लेती हैं. तो फिर परेशानी क्या है? परेशानी है, कहानी. फिल्म की कहानी पानी के उस एक बुलबुले की तरह है, जिसके फूटने का इंतज़ार दर्शकों को ढाई घंटे तक कराना ही अपने आप में एक चुनौती है. उस पर से वही जानी-पहचानी, जांची-परखी इम्तियाज़ अली की दुनिया, जो एक तरफ तो फिल्म को अपने सूफियाना फलसफों से ठहराव भी बहुत देती है, पर इधर-उधर के तमाम दृश्यों की बनावट और सजावट में 'लव आजकल', 'रॉकस्टार' जैसी अपनी ही फिल्मों से उधार ली हुई लगती है. 

इम्तियाज़ अगर कहीं अपने आप को बेहतरी के लिये दोहराते हैं तो उस वक़्त जब उन्हें हैरी और सेजल के दरमियान आपसी नज़दीकियों के दृश्यों में कुछ बेहद खूबसूरत लम्हें कैद करने का मौका मिलता है, और ऐसे मौके फिल्म में दूर-दूर ही सही, मगर बहुत सारे हैं. खूबसूरत लोकेशन्स, बेहतरीन कैमरावर्क, गानों और बैकग्राउंड म्यूजिक के अलावा एक बात और जो काबिल-ऐ-तारीफ़ है, वो हैं फिल्म के संवाद. कुछ बातें मायनों के साथ कही जाती हैं, कुछ बातें कहने के बाद अपने मायने तलाशती हैं. 'जब हैरी मेट सेजल' लगातार बोलती रहती है पर जो कहना चाहती है, बड़ी समझदारी से अधूरा ही छोड़ देती है. 

आखिर में; 'जब हैरी मेट सेजल' की पूरी कोशिश परदे पर शाहरुख के उस करिश्माई शख्सियत को इम्तियाज़ अली की दुनिया से मिलाने की है, जिसे कभी यश चोपड़ा जी ने अपनी फिल्मों में निखारा-संवारा था. इम्तियाज़ आज के ज़माने के 'यश चोपड़ा' माने जाते हैं, पर एक अदद कमज़ोर कहानी की वजह से 'जब हैरी मेट सेजल' इस पूरी कोशिश को भले ही नज़रंदाज़ कर दे, शाहरुख़ को इस फिल्म में नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. [3/5]   

Sunday, 26 March 2017

फ़िल्लौरी: कहानी चुस्त, फिल्म सुस्त! [2.5/5]

हिंदी फिल्मों में पंजाब अब अपनी महक, अपना रंग, अपनी चमक खोता जा रहा है, या यूँ कहें तो दर्शकों को पंजाब के नाम पर दिखाने, भरमाने और लुभाने के लिए हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के पास अब ज्यादा कुछ रह नहीं गया है. शादी, संगीत, पार्टियों और अजीब-ओ-गरीब मज़ाकिया किरदारों से भरे-पूरे, खतरनाक रूप से अमीर परिवारों के साथ अब हर फिल्म करन जौहर और आदित्य चोपड़ा का ‘खानदानी विडियो’ लगने लगी है. ताज्जुब नहीं होना चाहिए, अगर अंशाई लाल की ‘फ़िल्लौरी’ देखते वक़्त सब कुछ अच्छा-अच्छा होते हुए भी आप बोरियत से घिर जायें! और फिर यहाँ तो दो-दो पंजाब हैं, एक अभी का और दूसरा, आज़ादी से पहले का. आज़ादी से पहले वाला पंजाब ज्यादा सुकून देता है, दिलचस्प है और अनदेखा तो नहीं, पर कम देखा-जाना-सुना है. अब के वाला पंजाब वही है, ‘मानसून वेडिंग’ और ‘बार बार देखो’ के बीच हिचकोले खाता, जिसका जिक्र ऊपर की लाइनों में हो चुका है.

शादी की चाह कन्नन (सूरज शर्मा) को सात समुन्दर पार से अमृतसर खींच लायी है. अनु (मेहरीन पीरज़ादा) को वो बचपन से जानता है. दोनों परिवार साथ-साथ शामें रंगीन करते हैं. व्हिस्की पीने वाली बीजी (दादी) भी यहाँ हैं, जो अपने बेटे को ‘दो पैग का नतीज़ा’ कहकर ठहाके लगाती हैं, और बालों में रोलर्स लगाकर बाप-बेटे की हरकतों पे झल्लाने वाली बेबे (माँ) भी. हालात तब मजेदार हो जाते हैं, जब मांगलिक दोष से ग्रस्त कन्नन को असली शादी से पहले, पेड़ से शादी करनी पड़ जाती है. हालाँकि मुश्किल यहाँ ख़तम नहीं होती, बल्कि शुरू होती है. अगले ही रात/दिन से कन्नन को शशि (अनुष्का शर्मा) का भूत दिखाई देने लगता है. शशि का बसेरा उसी पेड़ पर था, जिसको शादी के बाद अब काट दिया गया है. अब शशि जाये तो कहाँ जाये? और अगर शशि नहीं जायेगी, तो कन्नन की जिंदगी में अनु कैसे आएगी?  

फ़िल्लौरी’ उन फिल्मों में से है, जो परंपरागत रूप से फिल्म में कहानी होने की अहमियत समझती हैं, मानती हैं. इस एक बात पर कहीं कोई दो राय नहीं हो सकती कि ‘फ़िल्लौरी’ में कहानी तो अच्छी है ही. हाँ, जिस बचकाने ढंग से उसे बुना जाता है, जिस थकाऊ तरीके से उसे परदे पर परोसा जाता है, वो निर्देशक अंशाई लाल और लेखिका अन्विता दत्त की समझ पर बड़े सवाल खड़े करता है. फिल्म में शशि और उसके प्रेमी फ़िल्लौरी (दलजीत दोसांझ) का खूबसूरत प्रेम-प्रसंग हर बार आपको जैसे कन्नन और अनु के हद एकरस कथानक से झकझोर कर फ्लैशबैक के सुहाने सफ़र पर ले जाता है और जगाये रखता है. हालाँकि मेहरीन अपनी पहली ही फिल्म में बहुत ज्यादा निराश नहीं करतीं, पर सूरज एक ही तरह के भाव चेहरे पर मढ़े-मढ़े पूरी फिल्म निकाल देते हैं. शुरू-शुरू में उनकी कॉमिक-टाइमिंग ताज़गी का एहसास जरूर कराती है, पर फिर धीरे-धीरे वो धार कहीं कुंद पड़ती जाती है.

एनएच 10’ से फिल्म प्रोडक्शन में सफल शुरुआत करने के बाद, अनुष्का की इस नयी कोशिश में विज़ुअल ग्राफ़िक्स कमाल के हैं. अनुष्का भूत से कहीं ज्यादा किसी परी की तरह परदे पर रंगीनियाँ बिखेरती नज़र आती हैं. भूत के रूप में जिन-जिन दृश्यों में वो नज़र आती हैं, उनमें एडिटिंग बेहतरीन तरीके से आपका ध्यान आकर्षित करती है. अनुष्का खुद एक कलाकार के तौर पर दोनों (फ्लैशबैक में, और वर्तमान में) रूपों में भली लगती हैं. दलजीत परदे पर अपना करिश्मा बिखेरने में फिर एक बार कामयाब रहते हैं. मनमौजी गायक की आवारगी से दीवाने आशिक की संजीदगी तक के उनके सफ़र में आपका वक़्त बड़े इत्मीनान से गुजरता है. शशि के भाई की भूमिका में मानव विज एक-दो दृश्यों में ही अपने जौहर दिखा जाते हैं. ‘उड़ता पंजाब’ में हम उन्हें ऐसा ही कुछ कमाल करते पहले ही देख चुके हैं. दिवंगत अभिनेता शिवम् प्रधान (पियूष की भूमिका में) को मजेदार रोल में देखना, और इस सक्षम अदाकार को दुबारा न देख पाने की कसक एक साथ दिल कचोटती रहती है.

आखिर में, ‘फ़िल्लौरी’ एक अच्छी कहानी होने के बावजूद ढीले डायरेक्शन, बेतरतीब राइटिंग और सुस्त रफ़्तार की वजह से वो मुकाम हासिल नहीं कर पाती, जिसकी हकदार वो कई मायनों में वाकई है. जिस ख़ूबसूरती के साथ अंशाई लाल शशि के किरदार को शानदार विज़ुअल ग्राफ़िक्स के जरिये परदे पर ज़िंदा रखते हैं, अंत तक आते-आते उसे कुछ इस हद तक निचोड़ने में लग जाते हैं कि आपको ‘दी एण्ड’ तक रुकना भी भारी लगने लगता है. [2.5/5]                 

Friday, 28 October 2016

ऐ दिल है मुश्किल: अनुष्का-रणबीर और इश्क़ की जबान उर्दू!! [3.5/5]

दोस्ती में प्यार, प्यार में दोस्ती. और इन दोनों के बीच की तमाम मुश्किलें. करन जौहर अरसे से इस समंदर में गोता लगा रहे हैं. ‘कुछ कुछ होता है के राहुल और अंजलि परदे पर भले ही बीस साल बाद अभी भी उतनी ही बचकानी ढंग से पेश रहे हों, करन परदे के पीछे काफी संजीदा हो चले हैं. अपनी नई फिल्म दिल है मुश्किल में करन एक बार फिर इकतरफा प्यार में भीगे आशिक़ की कहानी कह रहे हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उनके किरदार कई मामलों में पहले से ज्यादा समझदार, ज्यादा ईमानदार और कुछेक मामलों में एकदम दो-टूक हैं. इतने दो-टूक कि चुभने लगें, दर्द देने लगें. रिश्तों में लाग-लपेट वाली कोई चाशनी नहीं, कोई मलाल नहीं. बस बेपरवाह मुहब्बत, और मुहब्बत में बेपरवाही.

दिल है मुश्किल बड़ी सफाई से, और बहुत ही दिलचस्प तरीके से बॉलीवुड में रोमांटिक फिल्मों का जश्न भी मनाती है और साथ ही साथ, उन्हीं पर तंज कसते हुए हंसना भी जानती है. लन्दन में अलीज़ेह (अनुष्का शर्मा) अयान (रणबीर कपूर) से मिलती है. दोनों बॉलीवुड के भक्त हैं. अयान मोहम्मद रफ़ी बनना चाहता है. अलीज़ेह शिफॉन साड़ी पहन कर बर्फीली पहाड़ियों में हिंदी फिल्म की हीरोइनों जैसे नाचना चाहती है. हालिया ब्रेक-अप से गुज़र रही अलीज़ेह को अयान की आदतें, पसंद-नापसंद, ज़िन्दगी जीने का तरीका सब कुछ इतना अपना सा लगता है कि एक बार तो वो पूछ भी बैठती है, कहीं तुम मेरे बिछड़े हुए भाई तो नहीं?”. पर अयान को तो प्यार होने लगा है, अलीज़ेह से. अलीज़ेह की ज़िन्दगी में उसका अली (फ़वाद खान) वापस लौट आया है. मुहब्बत पर कभी यकीन नहीं करना चाहिए. दिल चटकने लगा है. गाने में अब दर्द की टीस सुनाई देने लगी है. 

निरंजन आयंगर के साथ मिल कर, करन जौहर प्यार, इश्क़ और मुहब्बत पर भारी-भरकम उर्दू अल्फाजों से भरे, शायराना अंदाज़ वाले खूबसूरत डायलॉग्स से फिल्म को एक नई ताजगी देते हैं. फिल्म के पहले हिस्से में, अनुष्का और रणबीर के बीच का हर सीन आपको जम के गुदगुदाता है. यहाँ अनुष्का अपने किरदार की बेबाकी और अपनी बेझिझक परफॉरमेंस से सारी तालियाँ बटोर ले जाती हैं. फिल्म में अब तक रणबीर सिर्फ अपने दिलकश अंदाज़ से ही आपको लुभाते रहे हैं. फिल्म का दूसरा हिस्सा टूटे हुए दिलों का दर्द बयान करता है. अयान को तलाकशुदा शायरा सबा (ऐश्वर्या राय बच्चन) मिल गयी हैं. दोनों एक ऐसे रिश्ते में रहना चाहते हैं, जिसका कोई नाम हो, जिसके कायदे-कानून बने ही हों कि कभी भी तोड़े जा सकें. प्यार कई पायदान ऊपर चढ़ आया है. पर पहले की टीस अभी भी कहीं दबी है.

दूसरे हिस्से में, ‘ दिल है मुश्किल थोड़ी मुश्किल में फंसती नज़र आती है, जब वो खुद हिंदी फिल्मों के उन्हीं दायरों में बंध कर कर रह जाती है, जिनकी अभी तक वो हँसी उड़ा रही थी. करन की दर्शकों को इमोशनल कर देने की चाह फिल्म पर भारी पड़ने लगी है. सब कुछ अब उतना परफेक्ट नहीं लग रहा, जितना शुरुआत में दिखा था. करन फिल्म में कई सारे पुराने बॉलीवुड गानों को अपने किरदारों को गढ़ने और फिल्म की कहानी को आगे बढ़ाने में इस्तेमाल करते हैं. काश, वो साहिर लुधियानवी साब केवो अफसाना जिसे अंजाम तक लाना हो मुमकिन, उसे एक खूबसूरत मोड़ देकर छोड़ना बेहतरपर अमल करने की हिम्मत दिखा पाते, और फिल्म को वक़्त रहते समेट लेते. 

ऐश्वर्या का खूबसूरत लगना कोई ताज्जुब की बात या दिलचस्प वाकया नहीं है, पर दिल है मुश्किल सही मायनों में उनके हुस्न--जमाल का पूरी तरह और बखूबी इस्तेमाल करती है. रणबीर, इस हिस्से में, अपनी अदाकारी पर भरोसा दिखाने लगे हैं. ऐश्वर्या और अनुष्का के साथ डाइनिंग टेबल वाले दृश्य में, उनकी आँखें आपको अन्दर तक कोंच देती हैं. फ़वाद खान हमेशा की तरह आपकी नज़रें खुद से हटने नहीं देते. ताज्जुब की बात है कि फिल्म में एक और पाकिस्तानी कलाकार इमरान अब्बास भी मेहमान भूमिका में हैं, पर उनको लेकर किसी तरह का कोई हंगामा नहीं हुआ.

खैर, ‘ दिल है मुश्किल देखने में अपनी सूरत से कई सारी हालिया फिल्मों जैसी (तमाशा, ये जवानी है दीवानी) भले ही लगती हो, अपनी सीरत में काफी अलग है. इसे एकबॉलीवुड फिल्मसे आगे जाकर देखने की गलती अगर आप नहीं करेंगे, तो मुमकिन है आपका वक़्त अच्छा कटेगा. हिंदी फिल्मों में खूबसूरत अदाकारों के मुंह से ख़ालिस उर्दू के अलफ़ाज़ सुने अरसा बीत गया था. उम्मीद करता हूँ, उर्दू से किसी को (राजनीतिक पार्टियां, फ़र्ज़ी देशभक्त और व्हाट्स ऐप के शरारती तत्व) कोई तकलीफ़ हो! [3.5/5]