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Friday, 1 June 2018

भावेश जोशी सुपरहीरो : ‘मार्वल’ नहीं, ‘डीसी’ है. देसी है. [3/5]


दुनिया ख़तम नहीं हो रही है. धरती पर दूसरे ग्रहों के आड़े-टेढ़े दिखने वाले एलियंस का अटैक भी नहीं हो रहा. इसीलिये उड़ने, चिपकने, रंग बदलने और तरह-तरह की अजीब-ओ-ग़रीब शक्तियों का रंगीन तमाशा दिखाने वाले सुपरहीरोज़ की जरूरत भी नहीं है. ये भारत है, यहाँ भ्रष्टाचार ही सबसे बड़ा दानव है. सिस्टम का खोखलापन ही वक़्त-बेवक्त लाचार से दिखने वाले आम इंसान को कभी-कभी इतना झकझोर देता है कि उसके लिए किनारे पर खड़े रहकर सब कुछ चुपचाप होते देखते रहना मुश्किल हो जाता है. हिंदी सिनेमा में शहंशाह ही शायद इस तरह की आख़िरी फिल्म रही थी. कृश इस मामले में देसी होते हुए भी अपनी पहचान हॉलीवुड से ही उधार लेता है. विक्रमादित्य मोटवाने की भावेश जोशी सुपरहीरो इन दोनों के बीच अपना एक अलग रास्ता, अपनी एक अलग जगह तलाशती है, जहां सबकुछ हद दर्जे तक अपना है, ज़मीनी है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे आन्दोलन में जन लोकपाल बिल की मांग करते लाखों नौजवानों में भावेश जोशी (प्रियांशु पैन्यूली) और सिकंदर खन्ना (हर्षवर्धन कपूर) भी शामिल हैं. करप्शन इज़ शिट, एंड शिट स्टिंक्स जैसे नारों से बढ़कर जब खुद कुछ करने की बारी आती है, तो मुंह पर पेपर-बैग्स पहन कर सोसाइटी का इन्टरनेट ठीक करवाने, पेड़ कटने से बचाने और नो एंट्री में घुसती कारों को रोकने से ज्यादा न कुछ उनके बस का होता है, ना ही वो कोशिश ही करते हैं. यूट्यूब चैनल पर लाइक्स तो मिल रहे हैं, पर धीरे-धीरे दुनिया बदलने का जोश भी ठंडा पड़ता जा रहा है. सिकंदर कोडिंग की नौकरी के सिलसिले में विदेश जाने के लिए पासपोर्ट बनवा आया है, वो भी खुद रिश्वत दे कर. हालाँकि भावेश के लिए अभी भी सब कुछ ख़तम नहीं हुआ है. मुंबई में जड़ों तक पसरे पानी की तस्करी के मामले ने उसमें एक नयी आग फूँक दी है. भावेश जोशी सुपरहीरो किसी एक चेहरे की कहानी नहीं है, बल्कि इस लड़ाई में लगातार उठ खड़े होते एक जज़्बे का किस्सा है.

विक्रमादित्य मोटवाने अपने मुख्य किरदार से फिल्म की शुरुआत में ही साफ़-साफ़ बुलवा देते हैं कि फिल्म मार्वल नहीं, बल्कि डीसी वाले ज़ोन में अपने आपको ज्यादा सुरक्षित महसूस करती है. आमने-सामने के सीधे मुकाबलों में नायक उतनी ही देर टिक पाता है, जितनी देर उसकी कद-काठी का कोई भी आम इंसान लड़ सकता हो. गैजेट्स के नाम पर उसके पास सिर्फ हैंडीकैम, लैपटॉप और एक स्मार्टफ़ोन ही हैं. ज्यादातर लड़ाईयां स्थानीय मुद्दों पर लड़ी जाती हैं, और इंटरनेट पर ही निपट जाती हैं. ज़मीनी झड़पों में चोटों का खामियाज़ा हमेशा नायक को ही उठाना पड़ता है. तीखे आदर्शवाद और तेज़ आक्रोश के साथ भावेश का जुझारूपन, अपने इर्द-गिर्द चीजें न बदल पाने की खीज़ और बावजूद इन सबके हार न मानने की जिद मोटवाने जिस नितांत गहरे और घने तौर पर सामने रखते हैं, कुछ नया देखने का एहसास लगभग लगभग हर वक़्त बना ही रहता है. हालाँकि फिल्म के दूसरे हिस्से में बदलने का जोश बदले की आग में तब्दील जरूर हो जाता है, पर इमोशन्स कमोबेश वैसे ही बने रहते हैं. कुछ बहुत करीने से फिल्माए गये एक्शन दृश्यों में विश्वसनीयता का तड़का उन्हें और भी रोचक-रोमांचक बना देता है.

सिकंदर की भूमिका में औसत कद-काठी वाले हर्षवर्धन का चुनाव, जहां एक स्तर पर उनके किरदार से पूरी तरह मेल खाता है, भीड़ में खो जाने और सुपर हीरो बनने की सबसे कम संभावनाओं के तौर पर सटीक लगता है; वहीँ उस किरदार के ज़ज्बाती उतार-चढ़ाव के सफ़र में उनका कमतर अभिनय फिल्म को नुक्सान भी बहुत पहुंचाता है. कभी-कभी लगता है, काश राजकुमार राव जैसा कद्दावर अदाकार कुछ पलों के लिए आता और सब कुछ संभाल लेता. प्रियांशु पेन्यूली से कोई शिकायत नहीं रहती. फिल्म के पहले हिस्से की कामयाबी काफी हद तक उनके ही मज़बूत कन्धों पर टिकी होती है. दूसरे हिस्से में मोटवाने या तो एक्शन दृश्यों का सहारा लेते दिखाई देते हैं, या फिर तेरे चुम्मे में च्यवनप्राश है जैसे आइटम नंबर में व्यस्त हो जाते हैं.  

155 मिनट के लम्बे वक़्त में, भावेश जोशी सुपरहीरो कई बार लड़खड़ाती है, लंगड़ाती है, मगर अंत तक आते-आते फिल्म के नायक की तरह ही आत्मविश्वास से कुछ इस कदर लबरेज हो जाती है, मानो अंत नहीं, इसे एक नयी शुरुआत समझी जानी चाहिए. भावेश जोशी के परदे पर वापस लौटने की संभावनाओं को एक माकूल ज़मीन देने में तो जरूर फिल्म सफल हो जाती है, पर खुद में एक मुकम्मल फिल्म का दर्ज़ा हासिल करने कहीं न कहीं चूक जाती है. भावेश लौटे, तभी भावेश जोशी सुपर हीरो को उसकी तयशुदा मंजिल हासिल होगी! [3/5]  

Friday, 12 January 2018

मुक्काबाज़: कश्यप की सबसे जिम्मेदार फिल्म! शायद साल की भी! [4/5]

मवेशी ले जा रहे कुछ लोगों पर 'गौरक्षकों' ने हमला कर दिया है. 'भारत माता की जय' के जोशीले नारों के बीच मोबाइल पर हिंसा के वीडियो बनाए जा रहे हैं. कोच साब के घर का गेंहू पिसवाने आया बॉक्सर श्रवण कुमार सिंह (विनीत सिंह) विडियो में मुंह बांधे एक तथाकथित गौरक्षक को तुरंत पहचान जाता है. वो उस जैसे तमाम कोच साब के बेरोजगार चेलों में से ही एक है. पूछने पर साफ़ मुकर जाता है, और श्रवण के लिए भी यह कोई हिला देने वाली बात नहीं है. इस एक वाकिये में ही देश की लगातार विकृत होती राजनीतिक प्रवृत्ति और गर्त में धकेली जा रही नयी पीढ़ी के सपनों का क्रूर मर्दन ज़ोरदार तरीके से सामने आता है. इस लिहाज़ से अनुराग कश्यप की 'मुक्काबाज़' शायद उनकी सबसे जिम्मेदार फिल्म मानी जा सकती है, जहाँ कुछ भी महज़ मनोरंजन के लिए नहीं है, बल्कि सब कुछ सिनेमा के जरिये कुछ कहने की एक सशक्त कोशिश.  

...और फिर ये तो सिर्फ शुरुआत है, 'मुक्काबाज़' वास्तव में एक ही फिल्म में कई फिल्में एक साथ हैं. अगर उत्तर प्रदेश की संस्कृति में भी राजस्थानी थाली जैसी कोई परिकल्पना प्रचलित होती तो मैं कहता कि 'मुक्काबाज़' उत्तर प्रदेश की एक बड़ी सी सामाजिक, राजनीतिक और जातीय जायकों से लबरेज एक मनोरंजक थाली है. कुछ स्वाद अगर ज़बान मीठा कर जाते हैं, तो कुछ ऐसे भी हैं जो दिल खट्टा, मन कड़वा और आँखें नम. हो सकता है कि पहली नज़र में 'मुक्काबाज़' उत्तर प्रदेश की धमनियों में रचे-बसे, जाति के सामाजिक खेल और खेलों में जाति की राजनीति के उलझाव में फँसी एक सुलझी हुई प्रेम-कहानी ही लगे, जहां नायिका नायक को लड़ता देख मुग्ध हो जाती है, सामाजिक दुराव और जातिगत भेद के बावजूद दोनों में प्रेम पनपता है और फिर खलनायक की साज़िशों और जिंदगी की कठोर सच्चाईयों से हाथापाई करते दोनों आखिर में एक सुखद अंत की ओर बढ़ निकलते हैं. ऐसा है भी, पर इस बार कहानी के तेवर सीधे सीधे मुद्दों को निशाना बनाने से परहेज़ नहीं करते. 

स्टेट बॉक्सिंग फेडरेशन के शीर्ष पर काबिज़ कोच भगवान दास मिश्रा (जिम्मी शेरगिल) अपने ही साथी कोच से उसकी जाति पूछने का सिर्फ दुस्साहस ही नहीं करता, उसके हरिजन होने पर वेटर को अलग बर्तन में पानी पेश करने का आदेश भी पूरे गर्व से देता है. अपनी भतीजी से प्यार करने के खामियाज़े में अपने ही सबसे अच्छे बॉक्सर श्रवण को बॉक्सिंग रिंग से दूर रखने में पूरा दम ख़म झोंक देता है. उधर देश के लिए खेलने की आशायें पाले प्रतिभावान खिलाड़ी कोच साब की मालिश करने, उनके घर का राशन लाने और अपने अधिकारियों की बीवियों को 'मार्केटिंग' पर ले जाने में जाया हो रहे हैं.

'मुक्काबाज़' के ज़रिये, परदे पर अनुराग दो बेहद सशक्त किरदार परोसते हैं. वो भी एक-दूसरे के आमने-सामने. सुनयना (ज़ोया हुसैन) बोल नहीं सकती, पर उसे सुनने-समझने में आपको ज्यादा मुश्किल नहीं होगी. सुनयना का छिटकना, उसका गुस्सा, उसकी झुंझलाहट, उसकी दिलेरी, उसके ताव, उसके तेवर सब बेआवाज़ हैं, पर बेख़ौफ़ और बेरोक-टोक बोलते हैं. सुनयना के किरदार में ज़ोया कहीं भी कमतर नहीं दिखाई पड़तीं. ठीक वैसे ही, जैसे श्रवण के किरदार में विनीत. निराश, हताश और गुस्सैल श्रवण जैसे परदे पर हर वक़्त पटाखे की तरह फटता रहता है, और हर बार धमाका उतना ही बड़ा होता है, उतना ही जोरदार. 

विनीत का एक बॉक्सर के तौर पर, अपने किरदार श्रवण में ढल जाना बॉलीवुड के अभिनेताओं के लिए एक चुनौती बनकर उभरता है. सिर्फ कद-काठी तक ही नहीं, विनीत अपने अदाकारी में भी वो धार-वो चमक लेकर आते हैं, जिसे भुलाना आसान नहीं होगा. अपने पिता के साथ उनकी खीज़ भरी बहस का दृश्य हो, सुनयना के साथ 'साईन लैंग्वेज' में बात करने वाले दृश्य या फिर बॉक्सिंग रिंग में उनकी शानदार मौजूदगी; विनीत इस फिल्म को अपना सब कुछ बक्श देते हैं. फ़िल्मकार के तौर पर अनुराग कश्यप को तो सीमाएं लांघते आपने दसियों बार सराहा होगा, पर इस बार विनीत कुमार सिंह के अभिनय में वो लोहा दिखेगा कि तमाम खान, कपूर जैसे बॉलीवुड के दिग्गज़ धूल चाटते नज़र आयेंगे. मेरी लिए, साल की सबसे दमदार परफॉरमेंस.

'मुक्काबाज़' कोई 'स्पोर्ट्स' फिल्म नहीं है, जो खिलाड़ियों की जीत का रोमांच बेचने में यकीन रखती हो, पर जितनी देर भी परदे पर खेलों-खिलाड़ियों और उनके इर्द-गिर्द जाल की तरह फैले राजनीति के बारे में बोलती है, असल स्पोर्ट्स फिल्म ही लगती है. यूँ तो फिल्म में बॉक्सर श्रवण हैं, 'मुक्काबाज़' में सबसे जोरदार घूंसे और मुक्के अनुराग कश्यप की तरफ से ही आते हैं. कभी तीख़े व्यंग्य की शक्ल में, तो कभी मज़ेदार संवादों के ज़रिये. हालाँकि ढाई घंटे की इस लम्बी फिल्म पर दूसरे हिस्से में कई बार अपने आप को दोहराने का आरोप भी जड़ा जा सकता है, पर दिलचस्प संगीत, जबरदस्त अभिनय, मनोरंजक संवादों और कहानी में बखूबी पिरोये गए मुद्दों की अहमियत फिल्म को अलग ही मुकाम तक ले जा छोडती है. [4/5]     

Friday, 23 June 2017

ट्यूबलाइट: यकीनन...ख़राब फिल्म-खराब एक्टिंग! [1.5/5]

'ट्यूबलाइट' के होने की वजह मेरे हिसाब से 'बजरंगी भाईजान' की कामयाबी में ही तलाशी गयी होगी. चाहे-अनचाहे, जाने-अनजाने कबीर खान के हाथ अब एक ऐसा अमोघ फार्मूला लग गया था, जिसमें बॉक्स-ऑफिस पर सिक्कों की खनक पैदा करने की हैसियत तो थी ही, आलोचकों और समीक्षकों का मुंह बंद कराने की ताकत और जुड़ गयी. एक सीधी-सादी दिल छू लेने वाली कहानी, थोड़ा सा 'बॉर्डर-प्रेम' का पॉलिटिकल तड़का, चुटकी भर 'बीइंग ह्यूमन' का वैश्विक सन्देश और साफ़ दिल रखने की तख्ती हाथों में लेकर घूमते एक बेपरवाह 'भाईजान'. 'ट्यूबलाइट' बड़े अच्छे तरीके और आसानी से इसी ढर्रे, इसी तैयार सांचे में फिट हो जाती है, पर जब आग में तप कर बाहर आती है तो नतीज़ा कुछ और ही होता है. मिट्टी ही सही नहीं हो, तो ईटें भी कमज़ोर ही निकलती हैं. 

कुमाऊँ के एक छोटे से गाँव में गांधीजी कहकर गये, "यकीन से कुछ भी हासिल किया जा सकता है". ट्यूबलाइट की तरह, देर से दिमाग की बत्ती जलने वाले लक्ष्मण (सलमान खान) की सुई इस 'यकीन' पर आके कुछ ऐसे अटक गयी कि सालों बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध में लापता भाई (सोहेल खान) की वापसी के लिए भी, लक्ष्मण उसी 'यकीन' की तरफ टकटकी लगाये देख रहा है. कबीर खान कहानी की इस ठीक-ठाक नींव को मज़बूत करने में थकाऊ धीमी गति और पकाऊ भाषणों से इतना वक़्त खपाते हैं कि फिल्म का वो ज़रूरी पैग़ाम देने में देर हो जाती है, जहां चीनी मूल के भारतीय माँ-बेटे लीलिंग और गुओ (ज़ू ज़ू और माटिन रे तंगु) को गांववाले चीनी समझकर नस्ली भेदभाव दिखाने लगते हैं. लक्ष्मण खुद गुओ को 'गू' कहकर बुलाता है, और एक दृश्य में तो गुओ को 'भारत माता की जय' बोल कर हिन्दुस्तानी होने का सबूत देने को भी कहता है. आज के दौर में, जब सेना के जुझारूपन और हर किसी के 'देशभक्त' होने, न होने की पिपिहरी पूरे देश में जोरों से बज रही है, कबीर खान भारतीय सेना के एक अधिकारी (यशपाल शर्मा) से युद्ध-विरोधी बातें कहलवाने की हिम्मत तो जरूर दिखाते हैं, लेकिन सब कुछ बेदम, बनावटी और बेअसर!

फिल्म में बहुत कुछ बेढंगा और वाहियात है, जो आपको लगातार परेशान करता रहता है. कुमाऊँ का यह गाँव फिल्मी सेट लगने-दिखने की हद से बाहर जा ही नहीं पाता. फिल्मों में 80 के दशक के गाँव और वही 25-50 चेहरे, जो हर जगह भीड़ का हिस्सा बनकर चौराहे पर डटे रहते थे, बेबस याद आ जाते हैं. कैलेंडर पर '62 भले ही चल रहा हो, गाँववालों की बातचीत के लहजे में 'चाइना', 'ज़िप', 'गैप' और तमाम अंग्रेज़ी के शब्द बड़ी बेशर्मी से कानों में सुनाई देते रहते हैं. फिर आती हैं मशहूर चीनी अभिनेत्री ज़ू ज़ू. मुझे कोई वजह समझ नहीं आती कि उनकी जगह कोई दूसरी (नार्थ-ईस्ट की) भारतीय अभिनेत्री क्यूँ नहीं हो सकती थी? जैसे उनके बेटे की भूमिका में माटिन रे तंगु अरुणाचल प्रदेश से ही हैं. 'मैरी कॉम' में प्रियंका चोपड़ा की कास्टिंग जैसी ही कुछ भयानक गलती है ये. 

...पर फिल्म में एक पॉइंट पर आकर आपको ये सारी शिकायतें बहुत छोटी लगने लगती हैं, जब आप फिल्म के मुख्य कलाकार सलमान खान को एक के बाद एक हर दृश्य में अभिनय के नाम पर कुछ भी आढ़े-टेढ़े चेहरे बनाते हुए देखते हैं. कबीर उनके किरदार को परदे पर रोते हुए पेश करने में ज्यादा मेहनत दिखाते हैं, पर हमें रोना आता है तो सिर्फ सलमान की अभिनय में नाकाम कोशिशों से. फिल्म में सलमान अपने यकीन से पहाड़ भी हिला देते हैं, ऐसा ही कोई यकीन उन्हें अपने अभिनय में भी दिखाना चाहिए. कभी-कभी ही सही. मोहम्मद जीशान अय्यूब जैसे मंजे कलाकार के लिए फिल्म में बहुत कुछ करने को नहीं है, पर एक दृश्य में जब वो सलमान के किरदार को थप्पड़ जड़ रहे होते हैं, लगता है सलमान को जैसे सज़ा मिल रही हो, अच्छी एक्टिंग न करने की, उससे जो शायद फ़िल्म में सबसे अच्छी कर रहा हो. सोहेल खान बड़ी समझदारी से फिल्म में आते-जाते रहते हैं, तो उनसे न तो ज्यादा उम्मीदें बनती हैं, न ही शिकायतें. शाहरुख एक दृश्य में आते तो हैं, पर उनसे भी किसी करिश्मे की कोई आस नहीं जगती.    

आखिर में; 'ट्यूबलाइट' में कबीर खान अपने 'बजरंगी भाईजान' वाले फ़ॉर्मूले को बॉक्स-ऑफिस पर दोबारा भुनाने की कोशिश करते हैं, पर ठीक वैसे ही औंधे मुंह गिरते हैं, जैसे 'एक था टाइगर' के बाद 'फैंटम'. रही बात यकीन की, तो मुझे यकीन है कि भाई एक दिन एक्टिंग करनी सीख ही जायेंगे, तब तक के लिए भेजते रहिये 'ईदी'...और बिजली में कटौती, रौशनी में बढौती के लिए अपनाईये एलईडी! [1.5/5]        

Friday, 17 March 2017

ट्रैप्ड: हिंदी सिनेमा का एक नया अध्याय! [4/5]

दो दुनिया है यहीं कहीं, इक अदृश्य रेखा से बंटी-कटी. जब आप इधर नहीं होते, तो उधर होते हैं; उधर नहीं तो पक्का इधर. एक दुनिया, जहां बहरे होते जा रहे हैं हम. जरूरतों के पीछे की अंधाधुंध दौड़ में, मानवीय संवेदनाओं को सुनने-समझने-देखने की ताकत खोते जा रहे हैं. भीड़ का शोर दूसरी दुनिया से आ रही उस एक अदद आवाज़ को हमारे कानों तक पहुँचने ही नहीं देता, जिस से जुड़ कर हम खुद को ही खोने से बचा सकते हैं. इस दुनिया में, कानों पे एक अलग ही किस्म का रेडियो चिपका रक्खा है हम सभी ने, फरमाईशी फ़िल्मी संगीत का छलावा जिसमें जोरों से थाप दे रहा है. यहाँ अपनी अपनी छतों पे चढ़ कर आसमान में आँखें बोने का चस्का तो सभी को है, पर मदद की गुहार में ज़मीनी सतह से उठते दूसरी दुनिया के हाथ चाह कर भी हमें दिखाई नहीं देते.

मजेदार है कि दूसरी तरफ भी हमीं हैं. इस भीड़ भरी दुनिया से अलग-थलग पड़ जाने का डर पाले, बंद कमरे के अन्दर से दरवाजे पीटने, खिड़कियों की सलाखें पकड़ के ‘बचाओ-बचाओ’ चीखने को मजबूर. जाल और जंजाल तो दोनों ही तरफ हैं, मगर इस दुनिया का संघर्ष तोड़ कर रख देता है. सामाजिक मान्यताओं के खंडन से लेकर व्यक्तिगत पराक्रम की पराकाष्ठा तक, सब कुछ अपने चरम पर. विक्रमादित्य मोटवाने की ‘ट्रैप्ड’ एक ऐसी ही सशक्त फिल्म है, जो एक बंद कमरे के सीमित दायरे में घुटती, लड़ती, जूझती और अंततः जीतती जिन्दगी के हौसले का सम्पूर्ण सम्मान और सत्कार करती है. हॉलीवुड में भले ही आपने ‘127 आवर्स’ या ‘बरी’ड’ जैसी फिल्में बहुत देखी हों, हिंदी सिनेमा में इस तरह का प्रयास अपनी तरह का एकलौता है, और बेहतरीन भी.

मुंबई जैसे महानगर में शौर्य (राजकुमार राव) जैसे नौकरी-शुदा प्रेमियों के लिए शादी की पहली शर्त, रहने का एक अच्छा ठिकाना ही होती है. नूरी (गीतांजलि थापा) अब उसके दोस्तों की जमात वाले एक कमरे के फ्लैट में तो रहने से रही. खैर, जुगाड़ काम आया और शौर्य को 35वें फ्लोर पर एक सही फ्लैट मिल गया है. भीड़-भाड़ वाला इलाका है, पर बिल्डिंग एकदम सुनसान. कानूनी मामलों में फँसी ऐसी बियाबान इमारतें मुंबई जैसे महानगरों में हैरत की बात नहीं, पर किसे अंदाज़ा था कि अगली ही सुबह जब शौर्य गलती से अपने ही फ्लैट में कैद हो जाएगा, तो उसके लिए वहाँ से निकलने में दो-चार घंटे, या एक-दो दिन नहीं, पूरे 21 दिन लग जायेंगे? मैं जानता हूँ, आप इस एक लाइन के ख़त्म होते-होते तक अपने उपायों, सवालों और सुझावों की लम्बी फेहरिस्त के साथ तैयार हो जायेंगे कि ऐसा होना किस हद तक नामुमकिन है, खास कर मुंबई जैसे शहर और आजकल के प्रबल तकनीकी दौर में? पर विक्रमादित्य मोटवाने जैसे ठान कर बैठे हों कि आपको मनवा के ही छोड़ेंगे. और उनकी इस कोशिश में उनका पूरा-पूरा साथ देते हैं राजकुमार राव. उनकी झल्लाहट हो, डर हो, खीझ हो, विपरीत परिस्थितियों से लड़ने की जिद हो या फिर नाउम्मीदी में टूट कर बिखरने और फिर खुद को समेट कर उठ खड़े होने का दम; राव अविश्वसनीय तरीके से पूरी फिल्म को अपने मज़बूत कंधे पर ढोते रहते हैं. फिल्म की दमदार कहानी, अपने सामान्य से दिखने वाले डील-डौल की वजह से राव पर हमेशा हावी दिखाई देती है, जिससे दर्शकों के मन में राव के किरदार के प्रति सहानुभूति का एक भाव लगातार बना रहता है, पर धीरे-धीरे जब राव अपने ताव बदलते हैं, फिल्म उनकी अभिनय-क्षमता के आगे दबती और झुकती चली जाती है.

ट्रैप्ड’ की सबसे बड़ी खासियत है, एक ही लोकेशन पर सिमटे रहने के बावजूद आपको घुटन महसूस नहीं होने देती. आप खुद भी उस एक कमरे से बाहर निकलने की राह जोहते रहते हैं, पर ऐसा सिर्फ उस किरदार से जुड़ाव की वजह से होता है. बहरी बाहरी दुनिया का ध्यान खींचने के लिए, जब जब शौर्य कोई नयी जुगत लगाता है, आप उसके लिए तालियाँ पीटते हैं, पर जब कुछ भी काम नहीं आता, आप ही उसके साथ झल्लाते भी हैं. मोटवाने अपने लेखकों के साथ मिलकर इतनी मुस्तैदी से सारा ताना-बाना बुनते हैं कि शिकायत करने को ज्यादा कुछ रह नहीं जाता. घर को आग के हवाले कर देने से लेकर, खून से तख्तियां लिख-लिख कर बाहर फेंकने, यहाँ तक कि टीवी को खिड़की से नीचे गिराने तक की सारी जद्दो-जेहद आपको इस ‘बिना इंटरवल की फिल्म’ में शुरू से लेकर अंत तक कुर्सी से बांधे रखती है.

आखिर में; ‘ट्रैप्ड’ भारतीय सिनेमा में ‘सर्वाइवल ड्रामा’ का एक नया अध्याय बड़ी ईमानदारी और पूरी शिद्दत से लिखती है. किशोरावस्था की चुनौतियों से लड़ते ‘उड़ान’ और सिनेमाई परदे की क्लासिक प्रेम-कहानियों को श्रद्धांजलि देती ‘लुटेरा’ के बाद; विक्रमादित्य मोटवाने की ये छोटी सी फिल्म हिंदी सिनेमा के बड़े बदलाव का एक अहम् हिस्सा है. एक ऐसी फिल्म, जिस पर फ़िल्मी दर्शक के रूप में आपको भी नाज़ होगा. कुछ ऐसा जो आपने हिंदी सिनेमा में पहले कभी नहीं देखा; तो जाईये, देख आईये! [4/5]

Friday, 24 June 2016

रमन राघव 2.0 (A) : कालिख़ से भी काली, कश्यप की दुनिया! [4/5]

जोड़ियां आसमानों में बनती हैं. अकेले हम अधूरे हैं और हमें पूरा करने वाला भी दुनिया में कहीं न कहीं अधूरा-अधूरा घूम रहा है, तब तक जब तक दोनों मिल नहीं जाते. कई बार हम उसे ग़लत जगह तलाशने में लगे रहते हैं, और कई बार एक झटके में ही वो सामने दिख जाता है. फिल्मों में पहली नज़र का प्यार अगर आपको लगता है कुछ ख़ास बड़े नामों की ही बपौती है? तो आप को बड़ी बुरी तरह ग़लत साबित करते हैं अनुराग कश्यप. अपनी नई फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ को अनुराग उनकी सबसे ख़तरनाक लव-स्टोरी का दर्जा देते हैं.

अनुराग कश्यप और लव-स्टोरी?? इसका सटीक जवाब तो आपको फिल्म के आख़िरी पलों में ही मिलता है, पर अच्छी बात ये है कि ‘बॉम्बे वेलवेट’ की नाकामयाबी ने उन्हें वापस उनके अपने जाने-पहचाने दायरे में ला खड़ा किया है. हालांकि भारतीय सिनेमा में ये दायरा भी उन्हीं की बदौलत इस मुकाम तक पहुंचा है. यहाँ उनका कोई दूसरा सानी नहीं. इस बार भी उनसे कहीं कोई चूक नहीं होती. ‘रमन राघव 2.0’ अब तक की उनकी सबसे ‘डार्क’ फिल्म बिना किसी झिझक कही जा सकती है. रक्त का रस और गाढ़ा हो चला है. खौफ़ का चेहरा पल-पल मुखौटे बदल रहा है. अँधेरे का साम्राज्य और गहराने लगा है.

अनुराग शुरुआत में ही साफ़ कर देते हैं, फिल्म 60 के दशक में रूह कंपा देने वाले सनकी सीरियल किलर रमन राघव की कहानी बिलकुल नहीं है. हाँ, कहानी पर उस पुराने रमन राघव की परछाईं हमेशा ज़रूर मंडराती रहती है पर 2015 के आस-पास के कथाकाल में अब रमन और राघव दो अलग किरदारों में बंट जाते हैं. पिछले ढाई साल में 9 क़त्ल हुए हैं. रमन्ना [नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी] ने खुद को पुलिस के सामने पेश कर इकबालिया बयान में जुर्म कबूल भी कर लिया है, पर उसकी ऊटपटांग बातों और हद औसत हुलिये पर ना तो एसीपी राघवन [विक्की कौशल] को यकीन है ना ही दूसरे पुलिसवालों को. हालाँकि दर्शक के तौर पर आपके मन में रमन्ना को लेकर कोई संदेह नहीं रहता. असली रमन राघव वायरलेस पर भगवान से सीधे-सीधे बात करने का दम भरता था. अपना रमन्ना खुद को भगवान का ‘सीसीटीवी कैमरा’ मानता है और दोनों हाथों से हवाई दूरबीन बनाकर अपने शिकार को अपनी लोमड़ी वाली कंचई आँखों से देखता रहता है. मारना उसके लिए ‘खाना खाने और हगने’ जैसा ही है. रोजमर्रा का काम.

राघवन एक अलग तरह का जानवर है. बहुत कुछ हमारी ही तरह. पुरुष अहंवाद में लिपटाया, नारी-विरोधी और नशे में सर तक डूबा हुआ. सड़ रही लाशों के बीच क्राइम-सीन पर भी नाक में पाउडर उड़ेलता, बिस्तर पर ‘कंडोम’ न पहनने वाला आम मर्द, जिसे नशे के चलते अपने ढीली पड़ती मर्दानगी के ऊपर किये गए ठहाके अन्दर तक भेद जाते हैं. राघवन सोता नहीं. कभी नहीं. राघवन को तलाश है रमन की और मज़े की बात है कि रमन को भी राघवन उतना ही चाहिए, जितना सिगरेट के लिए माचिस. पकड़म-पकड़ाई के इस खेल में अँधेरा जब छंटता है तो उजाला नहीं होता, बल्कि अन्दर से एक और अँधेरा आपको निगलने के लिये बढ़ लेता है. पहले वाले से कहीं ज्यादा काला, घुप्प और डरावना.

मुंबई की झुग्गी-झोपड़ियों के बीच अनुराग एक ऐसी दुनिया खोज लेते हैं, जो आपका देखा-सुना-जाना तो लगता है पर एक अनजाने रहस्य की तरह आपके सामने परत-दर-परत खुलता भी रहता है. विचलित कर देने वाली हत्याओं के वक़्त, अनुराग डर, खौफ़ और सनक का एक ऐसा मिला-जुला माहौल बनाते हैं कि आप उसमें अन्दर धंसते चले जाते हैं. कैमरा इस बार खून में नहा जाता हो, ऐसा शायद ही कभी होता है (मैं शिकायत कत्तई नहीं कर रहा) पर जिस तसल्ली से अनुराग पहले रमन्ना के हाव-भाव पर नज़रें गड़ाये रहते हैं और बाद में उन खौफज़दा चेहरों पर, आप सहम कर अपनी सीटों में दुबक जाते हैं या फिर आँखें फेर लेते हैं. फिल्म में औरतों के किरदार से आप कमोबेश नाखुश ही लौटते हैं. डरी-सहमी, घुटने टेक देने वाली अपने ही भाई से यौन-पीड़ित बहन हो या तीन-तीन गर्भपातों से गुजर चुकी गर्लफ्रेंड, यहाँ आपको कुछ बहुत मज़बूत नहीं दिखने वाला.

अभिनय में जूनून देखना हो तो ‘रमन राघव 2.0’ में सिद्दीकी को देखिये. हालाँकि उनमें ‘बदलापुर’ के ‘लायिक’ की झलक देखने को ज़रूर मिलती है, पर इस बार उनका पागलपन सारी हदें पार कर देता है. हैरत में डालते हैं आपको ‘मसान’ के विक्की कौशल. अपनी तीसरी ही फिल्म में उन्हें इस तरह का जटिल किरदार इतनी बखूबी निभाते देखना हैरतंगेज़ अनुभव है. अमृता सुभाष जबरदस्त हैं. अपने एक अदद सीन में ही वो आपको अन्दर तक झकझोर जाती हैं.

अंत में, ‘रमन राघव 2.0’ सिर्फ एक आम क्राइम थ्रिलर नहीं है. फिल्म उन अनुराग कश्यप की वापसी दर्ज कराती है जिन्हें लीक पर चलना आता ही नहीं. हिंदी सिनेमा के सदियों पुराने घेरे तोड़ने में जो बहुत उतावले भी दिखते हैं और कभी-कभी बहुत बनावटी भी, पर हैं दो-टूक. सनकी रमन्ना कहता है ना, “मैं आड़ में नहीं मारता. वर्दी की, धर्म की, इंसानियत की खाल के पीछे छुपकर नहीं मारता.” ठीक वैसे ही. [4/5]        

Friday, 17 June 2016

उड़ता पंजाब (A): चुभती सच्चाई. चुभती फिल्म. [4/5]

गुलज़ार साब की ‘माचिस’ जैसी कुछेक को अलग रख कर देखें तो पंजाब को हिंदी फिल्मों ने हमेशा मीठी चाशनी में ही लपेट कर परोसा है. मुंबई का कैमरा जब भी अमृतसर, भटिंडे या पटियाले में लेंस से कैप हटाता है, हरे-पीले सरसों के खेतों में लाल-नीली चुन्नियाँ लहराती मुटियारें रोटी लेकर दौड़ लगा रही होती हैं. दिन में बैसाखी के मेले और रात में लोहड़ी का जश्न, इससे आगे बढ़ने की हिम्मत पंजाबी सिनेमा ने तो कभी-कभी दिखाई भी है पर बॉलीवुड कमोबेश बचता ही रहा है. अब तक. ‘उड़ता पंजाब’ के आने तक. पंजाब की जो सपनीली तस्वीर आपने ‘यशराज फिल्म्स’ के चश्मे से देखी थी और आज तक अपने जेहन में बसाये घूम रहे थे, अभिषेक चौबे की ‘उड़ता पंजाब’ पहले फ्रेम से ही उस तस्वीर पे चिपके ‘एनआरआई कम्पेटिबल’ चमक को खरोंचने में लग जाती है. सीने पर आतंकवाद का बोझ और पीठ पर ’84 के ज़ख्म उठाये पंजाब को अब हेरोइन, स्मैक और कोकीन की परतों ने ढक लिया है. खुरदुरी, किरकिराती, पपड़ी जमी परतों ने!  

सरसों के खेतों की जगह अब फिल्म बेरंग सफेदे [यूकेलिप्टस] के पेड़ों से शुरू होती है, वो भी रात के अँधेरे में. बॉर्डर पार से पाकिस्तान की जर्सी पहने एक खिलाड़ी हेरोइन का एक पैकेट ऐसे फ़ेंक रहा है, जैसे ओलिंपिक में मेडल जीत लेने का ये उसका आख़िरी चांस हो. नेताओं और पुलिस की मिली-भगत से चल रहे ड्रग्स के इस काले कारोबार का शिकार सब हैं, स्कूल-कॉलेज जाने वाले लड़कों से लेकर उनके पसंदीदा रॉकस्टार टॉमी सिंह [शाहिद कपूर] तक. अपनी मर्ज़ी और खुदगर्जी भरे गानों में गालियाँ बकने वाला ये रॉकस्टार हमेशा नशे में धुत्त, सनकी और गुस्सैल किस्म का आम नशेड़ी है, जिसका अपने ऊपर कोई जोर नहीं. सरताज सिंह [दिलजीत दोसंझ] एक आम पुलिसवाला है जिसे सच्चाई मानने में कोई ख़ास तकलीफ़ नहीं है तब तक, जब तक उसका छोटा भाई खुद नशे में गिरफ्त में नहीं आ जाता. डॉ. प्रीत [करीना कपूर खान] के साथ मिलकर अब सरताज इस पूरे रैकेट की जड़ तक पहुंचना चाहता है. इन सब के बीच एक बिहारन [आलिया भट्ट] भी हर पल पिस रही है. अच्छी ज़िन्दगी की तलाश ने उसे इस गर्त में ला फेंका है, अब जाने कब और कैसे इस कैद से उसकी रिहाई मुमकिन होगी?

फिल्म शुरू ही हुई है, जब थाने की कोठरी में बंद टॉमी अपने रसूख की धौंस में हो-हल्ला मचा रहा है और अपने छोटे भाई की हालत से हिला हुआ सरताज बाहर बैठा नशे को कोस रहा है. थोड़ी ही देर में आप देखते हैं, सरताज टॉमी की थप्पड़ों और घूंसों से जम कर धुलाई कर रहा है. ये बॉलीवुड के लिए नया है. इस एक वाकये से अभिषेक चौबे तय कर देते हैं कि फिल्म किरदारों को तवज्जो देती है न कि उन्हें निभाने वाले अभिनेताओं के कद को. वरना ये वही बॉलीवुड है जो परदे पर किस बड़े स्टार का नाम पहले आएगा, जैसे फ़िज़ूल के हाय-तौब्बा से निर्माताओं की जान सुखा देता था. ‘उड़ता पंजाब’ जमीनी हकीकत को इतनी बेरूखी और बेदर्दी से आपके सामने रखती है कि इसके कुछ दृश्य आपको फिल्म ख़त्म होने के काफी बाद तक परेशान करते रहते हैं. ‘एनएच 10’ के आख़िरी सीन में अनुष्का का किरदार किस बेखौफ़ियत से सिगरेट जलाती है और फिर लोहे की सरिया जमीन पर खरोंचते हुए विलेन की ओर बढती है. आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं. ‘उड़ता पंजाब’ उसी धारदार कलम [सुदीप शर्मा] से निकली है.

अभिनय में शाहिद अपने ‘कमीने’ वाले पागलपन में पूरे जोश-ओ-खरोश से वापस लौट आये हैं. ठहराव में तो अभी भी गुंजाईश बहुत है पर जिस उतावलेपन और बेचैनी से वो ड्रग एडिक्ट की भूमिका निभाते हैं, कहीं कहीं अपने पिता पंकज कपूर जी की झलक छोड़ जाते हैं. करीना ठीक ही लगती हैं. दिलजीत वाकई में दिल जीत लेते हैं. एक ख़ास किस्म की सादगी तो है ही उनमें, अभिनय में भी कहीं कोई कमी नहीं दिखती. देखना होगा कि बॉलीवुड उन्हें आगे किस तरह ट्रीट करता है. और अब बात आलिया की. आलिया फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी हैं. उनकी बिहारी बोली में थोड़ी घालमेल जरूरी दिखती है, पर जिस दर्द को वो बिना बोले फिल्म में जीते नज़र आती हैं, वो आलिया को आज के दौर के नामचीन अभिनेताओं की श्रेणी में ला खड़ा करने के लिए काफी है.

अंत में, ‘उड़ता पंजाब’ आसान फिल्म नहीं है और एकदम से परफेक्ट भी नहीं. पर फिल्म में कुछ ऐसा भी नहीं, जो नहीं कहा जाना चाहिए या जिसे बेहतर तरीके से कहा जा सकता था. गालियों की थोड़ी अति ज़रूर है पर उनसे कहीं ज्यादा चुभती है सच्चाई. फिल्म के एक हिस्से में टॉमी अपने चाहनेवालों के सामने स्टेज में बेबाकी से कह जाता है, “मुझे सिर्फ ड्रग्स पता था. अपने गाने में मैंने वही डाल दिया. मुझसे गये-गुजरे तुम लोग हो, जिन्होंने उसमें फिलोसोफी ढूंढ ली और मुझ 22 साल के लौंडे को रॉकस्टार बना दिया”. ‘उड़ता पंजाब’ देखने से ज्यादा, सोचने की फिल्म है! देखिये, सोचिये और प्लीज शुतुरमुर्ग मत बने रहिये. [4/5]      

Friday, 29 May 2015

CHAAR CUTTING: Big talents in small packets! [3/5]

Short films in India have now become the most exciting medium for budding filmmakers to showcase their talent. It is a kind of plausible gateway to Bollywood yet the route is not very painless to travel. Some do get worthy appreciations and recommendations from the biggies in the profession but most succumb to being just a YouTube or Vimeo link waiting forever to get noticed, irrespective of the quality of their content. CHAAR CUTTING is another kind. If the promising works of Anuj Gulati, Hardik Mehta, Vivek Soni and Vijayeta Kumar could see the light of the day and get a theatrical release, the credit goes to the makers themselves. Bravo, for going that extra mile!

Anuj Gulati directs MANILA RUNNING- a short based in Manila, Philippines. An outsider lands in the city to get his nose-job done. Don’t bother to get the back-story! Stick with the place where everyone looks so household to crime you might have to run all day to save you in one piece. Even the only safe-house in the city is not so friendly but then what choice you are left with? Anuj handles the subject flawlessly to give you a fearsome drama mixed well with a pinch of deadpan humor. It has an interesting flair of psychotic thriller but somehow leaves you half-contented with a hurriedly done climax.

Hardik Mehta’s SKIN DEEP sees Naveen Kasturia and Aditi Vasudev as a couple soon to be married. All has been planned, just a minor operation for ‘circumcision’ and the placard is ready to cover the screen with ‘…And they lived happily ever after’. This is a story written by an unlikely Vikramaditya Motwane and based in Mumbai where literally, anything can happen. Over-dramatic, convenient and forcibly audacious SKIN DEEP is watchable only because of its lead actors. Naveen and Aditi both are superbly natural, reliable and convincing.

BAWDI throws you in the deserted, drought affected land where love suffers the consequences of the lack of water in the village. The Cola Company in the native has sucked all the water leaving not so many options for the dwellers. At the stake is the love. Vivek paints the frame with excruciating conditions of a former who doesn’t want to leave his land and a son who’s stuck between his love and the life. This looks a complete film at its own, with a prefect hand at sound-designing, songs, costumes, locations, cinematography and direction as well.

But the cherry on the cake is definitely BLOUSE by Vijayeta Kumar! Sounds like an old folktale; it has a certain kind of honesty, simplicity and Indianness. A newly-wed bride wants a perfect-fit blouse on her first Karwa-chauth made by a famous tailor. Now, this could be the ‘first impression’ chance for the husband to ensure his love for the lady. The problem is that the husband doesn’t have a size-sample for the measurement purpose. Rest is a hilarious peek-a-boo at simple yet loveable situations in order to get the gift of love. Sumeet Vyas as the husband is terrific. Imran Rasheed as the tailor is perfectly cast.

Having said that, CHAAR CUTTING is not a typical cinema-outing! At the end of the day, these 4 are nothing but short-films. Don’t expect to have an orgasmic experience! Also, the ticket-price [I spent 300 bucks] might make you unsure about your choice but I would say if you can afford it, buy it. Watching talents in the making, before they could make it always feels good. [3/5]                               

Friday, 20 March 2015

HUNTERRR (A): Not all great foreplays ensure great climaxes! [2/5]

The stage/bed is set. Nicely decorated with all flowery elements, scented in the most arousing aroma and with dimly lit intense mood-making ambient! Charming players [more than you can imagine but essentially and effectively three in this case] have taken their pre-marked place. So far so good! You have all the control over the most before the drum rolls and the game begins; still no one can guarantee an orgasmic climax or even a smooth ride to make it a satisfying s-experience. First timer Harshvardhan Kulkarni’s ‘coming of age’ sex-comedy HUNTERRR is exactly like any love-making situation; you never know which side the camel will sit. Foreplay is just foreplay. It can’t replace the final act, no matter how skillfully it is being performed. Contrary to the myths, the extensive length doesn’t always ensure great pleasure. You may slower the pace, withdraw your force at regular intervals but the rhythm has to be there…and HUNTERRR lacks it. It is one of those failed sex-adventures where you were all set to lose yourself but it never happened the way you imagined.

Mandar Ponkshe [Gulshan Devaiah] has always been a sex-addict all his life. He’s been hunting ladies of all sorts since his young days. A college girl, an unhappy housewife in his building, a passionate sex-lover; the list is countless. But at 40, this is the age when he must get settled. His all ‘grown-up’ uncle-look is killing his charm. Tripti [Radhika Apte] - a modern girl who can unhesitatingly confess all her past affairs is his last bet to start a fresh. Can he put it on risk by telling her about his irrepressible compulsion to hit on any possible bait in saree, skirt or denims? Or will he be able to tame this wild animal in him for everyone’s good?

HUNTERRR promises not to be in the league of regular adult-comedies with lewd double-meaning dialogues and the objectification of women with their body parts shown on screen in the most abusive manner but at the same time, couldn’t hold itself from portraying its women characters as the dumbest class on earth. They can be easily fooled and brought to bed by any average looking-certainly ‘not so smart in his tricks’ guy. Why on earth there was not a single female who could bring him beneath her? Yet, some sequences sure work well with a catchy retro-feel soundtrack [Bappi Lahiri and Altaf Raja’s tracks are perfect to recreate the era] and an authentically designed middle-class settings playing the believable quotient in the final mixture. The young days in the plot are potent and fun. The characters are very much from the neighborhood.

Performances are a relief. They make you stay in the game though the ‘too much’ back and forth narrative style takes all the fun and excitement out of this cheesy looking film of great promises. Sai Tamhankar as the sensuously attractive housewife is perfectly cast. She is expressive, impressive and talented enough to pull it off like no one else could have. Radhika Apte is all about how confident, bold and clear Indian women are today. She brings an effortless and comforting performance yet a very radiant one. And then, the hunter himself! Gulshan’s charming looks and impenitently impish-scheming & teasing body language do it the way it should be. He may not be the typical hero with qualities to die for but sure there’s something in him inexplicable that makes you go with him all the way from start to end. He gives strong shoulders to rest this comparatively weaker film.

HUNTERRR also tries to speak for domestic sexual violence and new finds in modern age of marriages like compatibility and trust but it is all just some words at touch & go. Overall; it is not a sleazy but lazy, long but loose and ‘not so satisfying’ session. There’s always a next time and a more suitable position to try! [2/5]                 

Friday, 13 March 2015

NH10: Raw, real and ruthless! Anushka leads the way!! [4/5]

The female protagonist has been put in a situation where every door knocked for help is an added danger to her life; this is not some breaking news for a Bollywood thriller. We have witnessed our leading ladies running after one possible hand of help turning ugly to another many a times and even rising from dust to stand at her own (Rekha is my personal favorite in such given stricture] against all odds. But when Anushka Sharma, calm and cold as corpse, with an iron-rod in her hand sits and lights a cigarette while watching her challenger crawling with a broken leg, this easily becomes ‘my’ moment to cheer for the invincible human survival instinct and all the women empowerment slogans coined just for the sake of it. This is raw. This is real. This is never seen before.  

With a powerfully violent, gritty and dark NH10; Navdeep Singh of MANORAMA SIX FEET UNDER returns to his deep-rooted den of atmospheric crime thrillers where the landscape speaks the language of ruthless nature of criminal mind and the characters don’t even need dialogues to express their anger, anxiety and agitation. Meera [Anushka in a ‘would die for’ role] and Arjun [Perfectly cast Neil Bhoopalam] is your regular career-focused, party-loving couple from Gurgaon- the emerging city of hopes seen working on laptops at their side of the same bed. A perfect holiday at a private villa in the outskirts is planned. It’s Meera’s birthday. A day-long road-trip on highway has started. Beware; even a small brawl can land you in the most brutal nightmare of your life. This is no bright-lit Gurgaon. This is the dark lawless badland where ‘killings’ are an ‘honor’ to the power man upholds. Of course, there is no looking back!

The plot of NH10 is never unforeseen; in fact you can predict the twists and turns miles before reaching at the end of the road but the undertones used to shake your souls and shiver your guts are very much surprising. The headlines of honor-killings might have raised your eyebrows till the time it’s on your screen but this is like abducting you from your drawing room and throwing in the deserted land of crimes done in the name of cast, creed and culture. A sister is poisoned by her brother [Darshan Kumar from Mary Kom] for loving and marrying boy of same ‘Gothra’. One gentleman in uniform enlightens, “Social norms should not be broken. Never! Try to drive on the wrong side of the road and accidents will happen.” Heartbreaking! Nerve-wracking! And a threatening state of real India-rural India!!

NH10 marks the arrival of a new Anushka Sharma. The pouting glam-doll sheds her comfort cover and brilliantly plays the carter of the long and hard-pressed angst of Indian women. Every time she screams at her opponents, she doesn’t scream for herself but all the women been ever in such circumstances. She is the answer to every sexiest and stinking remark made ever on any women out there, and the most powerful and the most influential one. The top-slot in the list of year’s best performers has already been taken. Bravura performance!

In others, Neil Bhoopalam supports well. He boldly shifts from charming guy next flat in the apartment to the fearing-frightened soul shaken by the harsh reality and the evil face of society. Though Darshan Kumar doesn’t have much to do in length but still manages to chill your bones with sinful looks. Can’t miss out on Deepti Naval for her surprise cameo!

On the whole, NH10 is a ride to hell. A hell every one must visit, admit and act against it. It is sure not a film best described with words like ‘flawless’ and ‘extraordinary’ but these expressions will fit in well in admiring and approving Anushka’s performance. The last act alone is like a winning shot you would want to put on ‘repeat’! [4/5]  

Friday, 22 August 2014

कटियाबाज़: ड्रामा, एक्शन, इमोशन…सब असली है! [3.5/5]

कहानियाँ जो ज़िंदगी की सच्चाई से निकली हों, काल्पनिक कथाओं से कहीं बेहतर, कहीं रोचक होती हैं. रत्ती भर का बनावटीपन नहीं और कहीं भी पकड़ छूटने या बनाये रखने का दबाव नहीं. बस छोड़ दीजिये अपने आप को और बहते रहिये एक ऐसे बहाव में, जिस से आप अछूते नहीं हैं. जिसकी रवानगी कहीं कहीं आपके ज़ेहन में कैद है, ज़िंदा है. हालांकि 'कटियाबाज़' कानपुर से ताल्लुक रखती एक डाक्यूमेंटरी ड्रामा है, पर ऐसा नहीं है कि आप बड़े शहरों में रहते हों और इस तरह के हालात से बिलकुल ही परिचित हों.

कानपुर, जो कभी 'भारत का मैनचेस्टर' कहा जाता था, आज बिजली कटौती की भयंकर समस्या से जूझ रहा है. गर्मियों में 45 डिग्री तक पारा पहुँचने वाले इस शहर में 16-18 घंटे तक की बिजली कटौती होती है और व्यवस्था की इस नाकामी से लोगों को जो थोड़ी बहुत राहत मिलती है, उसका सर्वेसर्वा है, कटियाबाज़ी का उस्ताद लोहा सिंह! कटियाबाज़ यानि गैर कानूनी तरीके से बिजली की चोरी के लिए तार जोड़ने का हुनर जानने वाला! लोहा सिंह को मौत छू भी नहीं सकती (उसका मानना है कि तार जोड़ते वक़्त वह अपनी साँसे रोक लेता है और इसीलिए मौत उसे पहले से ही मरा जान कर छोड़ जाती है), लोहा सिंह को व्यवस्था से भी कोई डर नहीं! लोहा सिंह एक ठिगना सा आम आदमी ही क्यों हो, आप को उसमें बॉलीवुड के तक़रीबन-तकरीबन सारे एंटी-हीरोज़ की झलक देखने को मिल जायेगी। तो अगर लोहा सिंह फिल्म का एंटी-हीरो है, हीरो कौन है? कानपुर बिजली सप्लाई कंपनी की नयी मैनेजिंग डायरेक्टर रितु माहेश्वरी बिजली चोरी रोकने में कोई कसर छोड़ना नहीं चाहती। कानपुर जैसे शहर में, और कानपुर ही क्यों? ऐसे हर शहर में जहां लोग जरूरत की सारी सुविधाएं मुफ्त में लेने को मरे जाते हों, ये नामुकिन सा ही लगता है.

फ़हाद मुस्तफ़ा और दीप्ति कक्कड़ की 'कटियाबाज़' उन चंद डॉक्यूमेंटरी फिल्मों में से है, जिनमें मनोरंजन और ड्रामा की भरपूर गुंजाइश है. सच्ची घटनाओं को एक सुगढ़ नाटकीय तरीके से पेश करने की उम्दा कोशिश! प्रसिद्द म्यूज़िक बैंड 'इण्डियन ओसीन' का गंवई अंदाज़ और उस पर वरुण ग्रोवर के ठेठ गीत एकदम सटीक बैठते हैं, फिल्म के कथानक और उसके मूड के हिसाब से. फिल्म में ऐसे मजेदार दृश्यों की भरमार है जो आपको शायद ही किसी बॉलीवुड फिल्म में देखने को मिलें, मसलन बिजली चोरी रोकने के लिए बनाया गया स्क्वाड जो कटिया के तारों को बाकायदा सबूत की तरह सँभालते दिखते हैं. पर 'कटियाबाज़' को एक बेहतर फिल्म बनाती है उसकी संवेदनशीलता, एक तगड़ी पकड़ उन इमोशंस पर जो शायद हम देखना भी नहीं चाहते! एक दबंग नेता के चलते जब रितु माहेश्वरी का तबादला हो जाता है और लोग उनके विदाई समारोह में उनकी प्रशंसा के गीत गा रहे होते हैं, गुलदस्तों के ढेर के बीच बैठी एक नेक नीयत आईएएस अफसर के अंदर का खालीपन आपको अंदर तक कचोट जाता है. ऐसा ही कुछ फिल्म के अंत में देखने को मिलता है, जब शराब के देसी ठेके पर लोहा सिंह को उसकी कटियाबाज़ी के काम के लिए दुत्कार मिलती है. फिल्म के ये दोनों किरदार कभी आपस में मिलते नहीं, पर एक-दूसरे से जाने-अनजाने काफी कुछ बांटते हैं.

'कटियाबाज़' 85 मिनट की सिर्फ एक फिल्म नहीं है, 'कटियाबाज़' हम सबकी ज़िंदगी का एक हिस्सा है जहां ड्रामा, एक्शन, इमोशन सब असल का है. अगर आपको लगता है डॉक्यूमेंटरी सिर्फ कुछ चुनिंदा, बहुत ही संजीदा किस्म के लोगों के लिए ही बनती और बनायीं जाती हैं, आप 'कटियाबाज़' ज़रूर देखें। ये आपकी अपनी फिल्म है और आप ही के लिए बनाई गयी है! [3.5/5]