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Friday, 3 August 2018

कारवां: ‘लाइक’ कीजिये, और आगे बढ़िये! [2.5/5]


फोटोग्राफर बनने की चाह छोड़कर, अविनाश (दुलकर सलमान) एक आईटी कंपनी की ऊबाऊ नौकरी में जिंदगी गुज़ार रहा है. तान्या (मिथिला पालकर) कॉलेज में है, बाग़ी मिजाज़ की है. उम्र से ज्यादा, जिंदगी को लेकर दोनों के रवैये में ख़ासा फर्क है. फिल्म के एक हिस्से में दोनों फोटोग्राफी पर बहस कर रहे हैं. तान्या के लिए अविनाश ओल्ड-स्कूल है, खूबसूरत पलों को कैद करने के लिए फ्रेमिंग और लाइटिंग जैसी चीजों पर ज्ञान दे रहा है, जबकि इंस्टाग्राम के जादुई फिल्टर्स के साथ वो किसी भी फोटो को खूबसूरत बनाने का हुनर बखूबी जानती है. अच्छा ही तो है, सब फोटोग्राफर बन जायेंगे.” आकर्ष खुराना की कारवां भी उन्हीं इंस्टाग्राम पोस्ट्स की तरह बेहद खूबसूरत है, पर बनी-बनाई गयी है. कुदरती तौर पर पलों को कैद करने की कवायद या फिर ठहर कर, रुक कर, थम कर फ्रेम बनाने का सब्र आखिर कौन करे, जब पहले से तैयार सांचे इस सारी मेहनत पर वक़्त जाया करने से आपको बचा सकते हैं. यही वजह है कि कारवाँ पूरी तरह खूबसूरत होते हुए भी, आसानी से अच्छा लगने के एहसास के बावजूद ना ही आपको छूती है, ना ही याद रह पाती है.

रोड-ट्रिप पर बनने वाली फिल्मों का एक अपना खाका है, एक अपना बहाव है. कारवाँ वो सब रस्ते, वो सब मोड़, वो सब उतार-चढ़ाव पूरी शिद्दत से, बड़ी तैय्यारी के साथ, बिना किसी भूल-चूक पार करती है. एक बुरी खबर और एक छोटी सी गड़बड़ी से शुरू हुआ सफ़र अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले सब कुछ ठीक कर देता है, साथ ही धारावाहिक की कहानियों की तरह हर पड़ाव पर मनोरंजन का पूरा-पूरा ध्यान रखता है. तीर्थ यात्रा पर निकले अविनाश के पिता की एक्सीडेंट में मृत्यु हो गयी है, और अब अविनाश के पास जो डेड बॉडी आई है, वो किसी और की है. अपने पिता के मृत शरीर को लेने अब उसे बंगलौर से कोच्ची जाना है. दोस्त शौकत (इरफ़ान खान) अपनी वैन के साथ मदद को तैयार खड़ा है. कहने की बात नहीं कि रास्ते इतने सीधे नहीं है, कभी किसी मोड़ से किसी और को साथ लेना है, तो कभी किसी से अचानक मिल जाने का मौका. साथ ही, रोमांच और रोमांस के लिए करीने से बनायी (घुसाई) गयी जगह...और इन सब के बीच, पर्वतों, पहाड़ों, झीलों, झरनों, नदियों और सड़क किनारे पीछे की ओर भागते पेड़ों के दृश्यों के साथ मखमली आवाज में, टुकड़ों में आता-जाता एक गीत.

कारवां ख़ूबसूरती और मनोरंजन की बड़ी सधी सी और सीधी सी मिलावट है. ख़ूबसूरती के लिए मलयालम फिल्मों के बेहतरीन अदाकार दुलकर सलमान और वेब-वर्ल्ड का जाना-पहचाना नाम मिथिला पालकर; और मनोरंजन के लिए एकलौते ही काफी, इरफ़ान. फिल्म ज्यादातर वक़्त डार्क-कॉमेडी से गुदगुदाने का प्रयास करती है, पर कामयाबी उसे इरफ़ान की अपनी चिर-परिचित शैली से मिलने वाले मजेदार पलों में ही नसीब होती है. दृश्यों के बीच में, इरफ़ान का हवा की तरह घुस आना और फिर हलके से गुदगुदा के चले जाना कभी भी गलत साबित नहीं होता. हालाँकि इसके लिए फिल्म की कहानी उन्हें कोई ख़ास वजह नहीं देती. फिल्म उनके लिए एक पिकनिक जैसी लगती है, जहां मौजूद हर किरदार के साथ वो हंसी-ठिठोली भी कर रहे हों तो आपको मज़ा ही आता है. वरना 2018 के साल में, लड़कियों के कपड़ों की लम्बाई पर बिफरने वाले किरदार के साथ आप क्यूँ ही हँसना-खिलखिलाना चाहेंगे?

फिल्म दो ख़ास मौकों पर थोड़ी असहज होती है, और शायद उन्हीं पलों में ठहरना भी सीखती है. अविनाश अपने कॉलेज की ख़ास दोस्त रूमी (कृति खरबंदा) से सालों बाद मिल रहा है, उसके घर में, उसके पति के साथ. अविनाश के जाते समय, हाथ हिलाती रूमी से आके उसका पति लिपट जाता है. पूछता है, ‘’वो ठीक तो है?’’. उसे सब कुछ पहले से पता है. दूसरी बार ऐसा मौका आता है, जब तान्या की माँ की भूमिका में अमला अक्किनेनी परदे पर सामने आती हैं. हालाँकि उनका किरदार फिल्म में कुछ बहुत अलग सा इजाफ़ा नहीं करता, पर उनका होना ही जैसे फिल्म को थमने की याद दिला देता है. यही वो पल हैं, जब दुलकर को भी उनकी काबिलियत के बराबर का दृश्य अभिनीत करने को मिलता है.  

आखिर में, कारवां को नापसंद करने की कोई ख़ास वजह नहीं है. बहुत मुमकिन है कि आप इस सफ़र को बहुत देर तक याद भले ही न रखें, इस सफ़र में होना आपको कतई परेशान नहीं करेगा. फिल्म में शौक़त की वैन पर एक मशहूर शेर लिखा होता है, “मैं अकेला ही चला था, जानिब-ए-मंजिल मगर...लोग साथ आते गये, कारवां बनता गया. फिल्म देखने के बाद स्वर्गीय नीरज जी का एक गीत मेरे ज़ेहन में भी उभरा, “कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’, हालाँकि ये गुबार खूबसूरत बहुत था! [2.5/5]              

Friday, 16 September 2016

राज़ रीबूट (A): अंत हुआ, भला हुआ! [1/5]

विक्रम भट्ट की ‘राज़ रीबूट’ रिलीज़ से पहले ही आपको खुश कर जाती है. महेश भट्ट पहले ही बयान दे चुके हैं, ‘राज़’ सीरीज की ये आख़िरी फिल्म होगी. इसका मतलब ये है कि अब विक्रम भट्ट की वो घिसी-पिटी, वाहियात संवादों से भरी स्क्रिप्ट जो पिछले 7 सालों से ‘राज़ (2002)’ की कामयाबी को भुनाने के चक्कर में बार-बार एक अलग और नई फिल्म के तौर पर दर्शकों तक पहुंचाई जा रही थी, अब ये खेल बंद हुआ समझिये. अपने आप में ये एक बहुत राहत पहुंचाने वाली बात है, हालाँकि सीरीज की आख़िरी किश्त ‘राज़ रीबूट’ जाते-जाते भी आप पर कोई रहम नहीं करती.

डराने की हर कोशिश जब हंसाने लग जाए, समझिये विक्रम भट्ट फॉर्म में हैं. फिर भी मैं कहता हूँ, डायलाग-राइटिंग में हाथ आजमाने वाले हर नए-पुराने टैलेंट को इस फिल्म से सीखना चाहिए कि आखिर क्या नहीं लिखना है? हीरोइन को एक ऐसा कैमरा चाहिए, जो लाइट ऑफ होने के बाद भी कमरे में होने वाली सारी एक्टिविटी रिकॉर्ड कर सके. दुकानदार का जवाब सुनिए, “ओह, तो आपको नाईट विज़न कैमरा चाहिए?”. भूत-प्रेतों पर रिसर्च करने वाला एक दिव्यांग (नेत्रहीन) चाय का कप छू कर बता देता है, “इस कप पर दो लोगों के होंठ महसूस हो रहे हैं”. वाह, गुरुदेव! पति-पत्नी के शादीशुदा दोस्तों में से एक पूछती है, “मैंने नोटिस किया है, तुम्हारे बेडरूम के बिस्तर पर एक तरफ सिलवटें नहीं हैं. तुम लोग अलग-अलग सो रहे हो?” मैं पूछता हूँ, ये कौन है जो बेड पर बड़ी सफाई और सावधानी से एक ही तरफ सो लेने का टैलेंट रखता है?

शादी के बाद प्रेमी-जोड़ा [गौरव अरोरा, कृति खरबंदा] मुंबई से रोमानिया ताजा-ताजा शिफ्ट हुआ है. “बर्फ का शहर है, अगले 5 साल तक कहीं और नहीं जाना है, तो चलो ‘बच्चा’ कर लेते हैं”, बीवी ज़िद पे अड़ी है. पति को पैसे कमाने हैं. झगड़ा पहले ही दिन इस हद दर्जे का है, कि दोनों के बिस्तर अलग-अलग हो जाते हैं. साथ सोने भर से भी शायद ‘बच्चा’ हो जाता हो. खैर, कुछ ही वक़्त बाद बीवी को घर में ‘किसी और’ के होने का एहसास होने लगता है. सिंक में आँख दिखाई देने लगती है, लैपटॉप से खून की नदियाँ बह निकलती हैं, वगैरह, वगैरह! पति को जब इन बेकार की बातों में यकीन नहीं होता, बीवी को उसका पुराना आशिक़ [इमरान हाशमी] आकर सहारा देता है. फिर वही होता है, जिसका आपको भी पता था और इंतज़ार भी. दो-चार किसिंग सीन, उतने ही गाने और एक ‘राज़’ जिसके खुलने से पहले ये एक लफ्ज़ इतनी बार बोला-सुनाया जाता है कि आपको फर्क पड़ना ही बंद हो जाता है.

विक्रम भट्ट साब की एक ही परेशानी है कि वो अपनी फिल्म चाहे दुनिया के किसी भी कोने में या ब्रह्माण्ड के किसी भी ग्रह पर लेकर चले जाएँ, अपने साथ भारतीय हॉरर सिनेमा के कुछ अनमोल तत्व ले जाना नहीं भूलते, मसलन, मंगलसूत्र. मंगलसूत्र का खो जाना एक पतिव्रता नारी के लिए कितना कष्टप्रद हो सकता है, आपको फिल्म देखकर ही पता चलेगा. वहीँ, जब शादीशुदा होने के बावजूद गैर-मर्द से सम्बन्ध बनाने की बारी आती है, बड़ी सहूलियत से कपड़े उतारने से पहले मंगलसूत्र उतार देना सब कुछ जायज़ कर देता है. फिल्म में ‘द एक्सोर्सिस्ट’ की भी छाप हर बार की तरह इस बार भी भरपूर है. मजेदार बात ये है कि इस बार वाला भूत ‘एफ़-वर्ड’ इस्तेमाल करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाता, और दिल खोल के गालियाँ बरसाता है.

अभिनय की बात करें, तो गौरव अरोरा  का फिल्म में होना ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कामकाज के तरीकों पर सवालिया निशान खड़े कर देता है. विक्रम भट्ट की फिल्म में आफ़ताब और रजनीश दुग्गल जैसों का होना फिर भी चलता है, गौरव अरोरा के साथ तो ‘गुड लुक्स’ का भी चक्कर दूर-दूर तक नहीं दिखता. असल में इमरान हाश्मी ही हैं जो पूरी तरह से समर्पित दिखाई देते हैं. फिल्म से ज्यादा, भट्ट कैंप और अपनी ‘सीरियल किसर’ वाली इमेज के प्रति. कृति खरबंदा डराने वाले दृश्यों में कामयाब रहती हैं.

फिल्म के शुरूआती एक दृश्य में, एक कौवा रुकी हुई कार के सामने वाले शीशे से टकराकर आत्महत्या कर लेता है. जानवरों को आने वाले संकट और बुरे वक़्त का अंदेशा इंसानों से बहुत पहले ही हो जाता है. काश, उसके इस बलिदान को हम इंसान वक़्त रहते समझ पाते! कम से कम पूरी फिल्म झेलने से बच जाते! चलो, ‘राज़’ का अंत हुआ...और कभी-कभी अंत ही भला होता है. [1/5]