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Friday, 3 August 2018

कारवां: ‘लाइक’ कीजिये, और आगे बढ़िये! [2.5/5]


फोटोग्राफर बनने की चाह छोड़कर, अविनाश (दुलकर सलमान) एक आईटी कंपनी की ऊबाऊ नौकरी में जिंदगी गुज़ार रहा है. तान्या (मिथिला पालकर) कॉलेज में है, बाग़ी मिजाज़ की है. उम्र से ज्यादा, जिंदगी को लेकर दोनों के रवैये में ख़ासा फर्क है. फिल्म के एक हिस्से में दोनों फोटोग्राफी पर बहस कर रहे हैं. तान्या के लिए अविनाश ओल्ड-स्कूल है, खूबसूरत पलों को कैद करने के लिए फ्रेमिंग और लाइटिंग जैसी चीजों पर ज्ञान दे रहा है, जबकि इंस्टाग्राम के जादुई फिल्टर्स के साथ वो किसी भी फोटो को खूबसूरत बनाने का हुनर बखूबी जानती है. अच्छा ही तो है, सब फोटोग्राफर बन जायेंगे.” आकर्ष खुराना की कारवां भी उन्हीं इंस्टाग्राम पोस्ट्स की तरह बेहद खूबसूरत है, पर बनी-बनाई गयी है. कुदरती तौर पर पलों को कैद करने की कवायद या फिर ठहर कर, रुक कर, थम कर फ्रेम बनाने का सब्र आखिर कौन करे, जब पहले से तैयार सांचे इस सारी मेहनत पर वक़्त जाया करने से आपको बचा सकते हैं. यही वजह है कि कारवाँ पूरी तरह खूबसूरत होते हुए भी, आसानी से अच्छा लगने के एहसास के बावजूद ना ही आपको छूती है, ना ही याद रह पाती है.

रोड-ट्रिप पर बनने वाली फिल्मों का एक अपना खाका है, एक अपना बहाव है. कारवाँ वो सब रस्ते, वो सब मोड़, वो सब उतार-चढ़ाव पूरी शिद्दत से, बड़ी तैय्यारी के साथ, बिना किसी भूल-चूक पार करती है. एक बुरी खबर और एक छोटी सी गड़बड़ी से शुरू हुआ सफ़र अपनी मंजिल तक पहुँचने से पहले सब कुछ ठीक कर देता है, साथ ही धारावाहिक की कहानियों की तरह हर पड़ाव पर मनोरंजन का पूरा-पूरा ध्यान रखता है. तीर्थ यात्रा पर निकले अविनाश के पिता की एक्सीडेंट में मृत्यु हो गयी है, और अब अविनाश के पास जो डेड बॉडी आई है, वो किसी और की है. अपने पिता के मृत शरीर को लेने अब उसे बंगलौर से कोच्ची जाना है. दोस्त शौकत (इरफ़ान खान) अपनी वैन के साथ मदद को तैयार खड़ा है. कहने की बात नहीं कि रास्ते इतने सीधे नहीं है, कभी किसी मोड़ से किसी और को साथ लेना है, तो कभी किसी से अचानक मिल जाने का मौका. साथ ही, रोमांच और रोमांस के लिए करीने से बनायी (घुसाई) गयी जगह...और इन सब के बीच, पर्वतों, पहाड़ों, झीलों, झरनों, नदियों और सड़क किनारे पीछे की ओर भागते पेड़ों के दृश्यों के साथ मखमली आवाज में, टुकड़ों में आता-जाता एक गीत.

कारवां ख़ूबसूरती और मनोरंजन की बड़ी सधी सी और सीधी सी मिलावट है. ख़ूबसूरती के लिए मलयालम फिल्मों के बेहतरीन अदाकार दुलकर सलमान और वेब-वर्ल्ड का जाना-पहचाना नाम मिथिला पालकर; और मनोरंजन के लिए एकलौते ही काफी, इरफ़ान. फिल्म ज्यादातर वक़्त डार्क-कॉमेडी से गुदगुदाने का प्रयास करती है, पर कामयाबी उसे इरफ़ान की अपनी चिर-परिचित शैली से मिलने वाले मजेदार पलों में ही नसीब होती है. दृश्यों के बीच में, इरफ़ान का हवा की तरह घुस आना और फिर हलके से गुदगुदा के चले जाना कभी भी गलत साबित नहीं होता. हालाँकि इसके लिए फिल्म की कहानी उन्हें कोई ख़ास वजह नहीं देती. फिल्म उनके लिए एक पिकनिक जैसी लगती है, जहां मौजूद हर किरदार के साथ वो हंसी-ठिठोली भी कर रहे हों तो आपको मज़ा ही आता है. वरना 2018 के साल में, लड़कियों के कपड़ों की लम्बाई पर बिफरने वाले किरदार के साथ आप क्यूँ ही हँसना-खिलखिलाना चाहेंगे?

फिल्म दो ख़ास मौकों पर थोड़ी असहज होती है, और शायद उन्हीं पलों में ठहरना भी सीखती है. अविनाश अपने कॉलेज की ख़ास दोस्त रूमी (कृति खरबंदा) से सालों बाद मिल रहा है, उसके घर में, उसके पति के साथ. अविनाश के जाते समय, हाथ हिलाती रूमी से आके उसका पति लिपट जाता है. पूछता है, ‘’वो ठीक तो है?’’. उसे सब कुछ पहले से पता है. दूसरी बार ऐसा मौका आता है, जब तान्या की माँ की भूमिका में अमला अक्किनेनी परदे पर सामने आती हैं. हालाँकि उनका किरदार फिल्म में कुछ बहुत अलग सा इजाफ़ा नहीं करता, पर उनका होना ही जैसे फिल्म को थमने की याद दिला देता है. यही वो पल हैं, जब दुलकर को भी उनकी काबिलियत के बराबर का दृश्य अभिनीत करने को मिलता है.  

आखिर में, कारवां को नापसंद करने की कोई ख़ास वजह नहीं है. बहुत मुमकिन है कि आप इस सफ़र को बहुत देर तक याद भले ही न रखें, इस सफ़र में होना आपको कतई परेशान नहीं करेगा. फिल्म में शौक़त की वैन पर एक मशहूर शेर लिखा होता है, “मैं अकेला ही चला था, जानिब-ए-मंजिल मगर...लोग साथ आते गये, कारवां बनता गया. फिल्म देखने के बाद स्वर्गीय नीरज जी का एक गीत मेरे ज़ेहन में भी उभरा, “कारवां गुजर गया, गुबार देखते रहे’, हालाँकि ये गुबार खूबसूरत बहुत था! [2.5/5]              

Friday, 6 April 2018

ब्लैकमेल: ब्लैक कॉमेडी या ब्लैक ट्रेजेडी! [1.5/5]


“एक पति अपनी बीवी को सरप्राइज करने के लिए जल्दी घर पहुँच जाता है. बेडरूम में क्या देखता है कि उसकी पत्नी किसी और आदमी के साथ बिस्तर पे सो रही है. उसके बाद पता है, पति क्या करता है?”.... “पति उस आदमी को ब्लैकमेल करने लगता है”. अभिनय देव की ‘ब्लैकमेल’ में फिल्म का ये मजेदार प्लॉट गिन के तीन बार अलग-अलग मौकों पर सुनाया जाता है. फिल्म की शुरुआत में पहली बार जब नायक खुद इसे ज़ोक के तौर पर सुनाता है, उसके दोस्त को जानने में तनिक देर नहीं लगती कि वो अपनी ही बात कर रहा है. ‘ट्रेजेडी में कॉमेडी’ की एक अच्छी पहल, एक अच्छी उम्मीद यहाँ तक तो साफ दिखाई दे रही है, पर अंत तक आते-आते फिल्म का यही प्लॉट जब पूरी संजीदगी के साथ बयान के तौर पर पुलिस के सामने रखा जाता है, वर्दी वाला साहब बिफर पड़ता है, “क्या बी-ग्रेड फिल्म की कहानी सुना रहा है?” एक मुस्तैद दर्शक होने के नाते, आपका भी रुख और रवैय्या अब फिल्म को लेकर ऐसा ही कुछ बनने लगा है.

देव (इरफ़ान खान) की शादीशुदा जिंदगी परफेक्ट नहीं है. ऑफिस में देर रात तक रुक कर वक़्त काटता है, और फिर घर जाने से पहले किसी भी डेस्क से किसी भी लड़की की फोटो लेकर चुपचाप ऑफिस के बाथरूम में घुस जाता है. एक रात सरप्राइज देने के चक्कर में जब उसे पता चलता है कि उसकी बीवी रीना (कीर्ति कुल्हारी) का किसी अमीर आदमी रंजीत (अरुणोदय सिंह) से चक्कर चल रहा है, वो अपनी मुश्किलें मिटाने के लिए उसे ब्लैकमेल करने का प्लान बनाता है. आसान लगने वाला ये प्लान तब और पेचीदा हो जाता है, जब सब अपनी-अपनी जान बचाने और पैसों के लिए एक-दूसरे को ही ब्लैकमेल करने लगते हैं. पति प्रेमी को, प्रेमी पत्नी को, पत्नी पति को, पति के साथ काम करने वाली एक राजदार पति को, यहाँ तक कि एक डिटेक्टिव भी.        

ब्लैक कॉमेडी बता कर खुद को पेश करने वाली ‘ब्लैकमेल’ एक उबाऊ चक्करघिन्नी से कम नहीं लगती. कुछ ऐसे जैसे आपकी कार इंडिया गेट के गोल-गोल चक्कर काट रही है, और बाहर निकलने वाला सही ‘कट’ आपको मिल ही नहीं रहा. वरना जिस फिल्म में इरफ़ान खान जैसा समझदार, काबिल और खूबसूरत अदाकार फिल्म की हर कमी को अपने कंधे पर उठा कर दौड़ पूरी करने का माद्दा रखता हो, वहां अज़ब और अजीब किरदारों और कहानी में ढेर सारे बेवजह के घुमावदार मोड़ों की जरूरत ही क्या बचती है? ‘ब्लैकमेल’ एक चालाक फिल्म होने के बजाय, तिकड़मी होना ज्यादा पसंद करती है. इसीलिए टॉयलेट पेपर बनाने वाली कंपनी के मालिक के किरदार में ओमी वैद्य अपने वाहियात और उजड्ड प्रयोगों से आपको बोर करने के लिए बार-बार फिल्म की अच्छी-भली कहानी में सेंध लगाने आ जाते हैं. देव के दोस्त के किरदार में प्रद्युमन सिंह मल्ल तो इतनी झुंझलाहट पैदा करते हैं कि एक वक़्त के बाद उन्हें देखने तक का मन नहीं करता. यकीन ही नहीं होता, ‘तेरे बिन लादेन’ में इसी कलाकार ने कभी हँसते-हँसते लोटपोट भी किया था. शराब में डूबी दिव्या दत्ता और प्राइवेट डिटेक्टिव की भूमिका में गजराज राव थोड़े ठीक लगते हैं.

‘ब्लैकमेल’ अभिनय देव की अपनी ही फिल्म ‘डेल्ही बेली’ जैसा दिखने, लगने और बनने की कोशिश भर में ही दम तोड़ देती है. ब्लैक कॉमेडी के नाम पर एडल्ट लगना या एडल्ट लगने को ही ब्लैक कॉमेडी बना कर पेश करने में ‘ब्लैकमेल’ उलझी रहती है. देव अपनी पहचान छुपाने के लिए जब एक पेपर बैग का सहारा लेता है, ब्रांड एक लड़कियों के अंडरगारमेंट का है. नाकारा रंजीत जब भी अपने अमीर ससुर के सामने हाथ बांधे खड़ा होता है, डाइनिंग टेबल पर बैठी उसकी सास कभी संतरे छिल रही होती है, तो कभी अंडे. इशारा रंजीत के (?) की तरफ है. हालाँकि कुछेक दृश्य इनसे अलग और बेहतर भी हैं, जैसे फ्रिज में रखी लाश के सामने बैठ कर फ़ोन पर उसकी सलामती के बारे में बात करना, पर गिनती में बेहद कम.

आखिर में, अभिनय देव ‘ब्लैकमेल’ के जरिये एक ऐसी सुस्त और थकाऊ फिल्म सामने रखते हैं, जहां अतरंगी किरदारों को बेवजह फिल्म की सीधी-सपाट कहानी में शामिल किया जाता है, और फिर बड़ी सहूलियत से फिल्म से गंदगी की तरह उन्हें साफ़ करने के लिए एक के बाद एक खून-खराबे के जरिये हटा दिया जाता है. बेहतर होता, अगर फिल्म अपने मुख्य कलाकार इरफ़ान खान की अभिनय क्षमता पर ज्यादा भरोसा दिखा पाती! सैफ अली खान की भूमिका वाली ‘कालाकांडी’ अपनी कहानी में इससे कहीं बेहतर फिल्म कही जा सकती है, जबकि उसे भी यादगार फिल्म मान लेने की भूल कतई नहीं करनी चाहिए. [1.5/5]  

Friday, 19 May 2017

हिंदी मीडियम: ‘क्लास’ की क्लास, और क्लास की एक्टिंग! [3.5/5]

बच्चों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर आजकल माँ-बाप कुछ ख़ासा ही जागरूक हो गए हैं. जिंदगी एक दौड़ है, और इस दौड़ में पीछे रह जाने वालों के लिए कोई जगह नहीं, इस पागलपन को सर पे लादे बेचारे माँ-बाप बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए क्या-क्या कर गुजरने का जोखिम नहीं उठाते, पर ध्यान से देखें तो इतनी भी बेचारगी नहीं है. खेल सब किया कराया है, उस एक छोटी समझ का, जिसके हिसाब से बच्चों की कामयाबी का सारा दारोमदार फर्राटेदार इंग्लिश बोलने की चाहत से शुरू होकर शहर के सबसे बड़े, सबसे महंगे स्कूल में एडमिशन मिल जाने तक ही सीमित है. इक जद्दो-जेहद समाज के ऊँचे तबके तक पहुँचने की. साकेत चौधरी की ‘हिंदी मीडियम’ माँ-बाप के उसी अँधाधुंध भाग-दौड़ को बड़े मनोरंजक तरीके से आपके सामने रखती है.

राज बत्रा (इरफ़ान खान) चांदनी चौक में कपड़ों की दुकान चलाता है. रहने-खाने की कोई कमी नहीं है, पर उसकी बीवी मीता (सबा क़मर) का सारा ध्यान बस इसी एक कोशिश में रहता है कि उनकी बेटी पिया का एडमिशन कैसे भी दिल्ली के सबसे महंगे स्कूल में हो जाये. इसके लिए जरूरी है कि माँ-बाप न सिर्फ अमीर हों, अमीर दिखें और लगें भी. शुरुआत हो चुकी है, राज को अपने चांदनी चौक की गलियाँ छोड़कर वसंत विहार जैसे पॉश इलाके में घर लेना पड़ेगा. उसके बाद ‘द सूरी’ज़’, ‘द मल्होत्रा’ज़’ जैसे अमीरों से मेल-जोल बढ़ाना, ताकि पिया को अच्छी संगत मिले, और फिर स्कूल के इंटरव्यू की तैय्यारी. इंग्लिश में तंग हाथ लिए बिचारे राज के लिए तो जान पर बन आई है, पर मीता हार नहीं मानने वाली. बड़ी उलट-फेर तब होती है, जब इतनी जद्द-ओ-जेहद के बाद भी पिया का एडमिशन नहीं होता, और अब बस एक ही रास्ता बचा है. स्कूलों में ‘राईट टू एजुकेशन’ एक्ट के तहत मिलने वाले गरीबी कोटा में गरीब बनकर अप्लाई करना.

साकेत चौधरी बढ़ा-चढ़ाकर ही सही, पर आजकल के शिक्षा-जगत में फैली दुर्व्यवस्था पर हर तरीके और हर तरफ से व्यंग्यात्मक प्रहार करते हैं. मीता का इंग्लिश मीडियम स्कूलों को लेकर हद दर्जे का पागलपन अगर कई बार आपको झकझोरता है, तो कई बार झुंझलाहट भी पैदा करता है. फिल्म की शुरुआत में जब साकेत जवानी की दहलीज़ पर कदम रख रहे राज और मीता की लव-स्टोरी दिखाने का तय करते हैं, उसकी जरूरत आपको आगे चल कर समझ आती है. जिंदगी से राज और मीता दोनों की अपेक्षाएं, उम्मीदें और ख्वाहिशें हमेशा एक-दूसरे से जुदा रही हैं. जहाँ ‘एलिट’ बनने की चाह मीता की आँखों में चमक ले आती है, वहीँ राज के लिए अच्छा पति, अच्छा पिता बने रहना ज्यादा मायने रखता है.

फिल्म की कहानी में ठहराव और उबाल दोनों एक साथ तब आते हैं, जब परदे पर आपकी जान-पहचान श्याम (दीपक डोबरियाल) और उसकी बीवी (स्वाति दास) के किरदार से कराया जाता है. अपने बेटे के भविष्य के लिए उसकी पढ़ाई-लिखाई के प्रति जागरूक एक माँ-बाप ये भी हैं, जो गरीबी की मार सहते हुए भी कोशिश करने में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहते. जहां एक की बुनियाद में झूठी चमक-दमक है, इन माँ-बाप की जिद और धुन ईमानदारी की कसौटी पर पक्की और सच्ची है. हालाँकि अंत तक आते-आते, साकेत थोड़े तो नाटकीय होने लगते हैं, पर कमोबेश गुदगुदाते रहने की उनकी आदत पूरी फिल्म में एक सी ही रहती है. चूकते वो सिर्फ एक जगह हैं, जहां बात एक ही तराजू से सभी अमीरों और गरीबों को तोलने की आती है. सारे के सारे अमीर मुंहफट, बदतमीज़, सारे के सारे गरीब हमदर्द, मददगार.

इरफान खान घर की दाल जितने जाने-पहचाने हो गए हैं अब. रोज मिलते रहें, तब भी आपको कोई कोफ़्त नहीं होगी, कोई शिकायत नहीं होगी. हाँ, अगर ज्यादा दिन तक न मिलें, तब तरसना बनता है. कपड़े की दुकान पर जिस तरह ग्राहकों से पेश आते हैं, या फिर अमीर-गरीब बनने के खेल के बीच जिस तरह झूलते दिखाई देते हैं, उनका हर एक्ट तीर की तरह वही लगता है, जहाँ के लिए निशाना लगाया गया था. फिल्म खुद बहुत ज्यादा संजीदा होने से बचती है, तो आप भी इरफ़ान से मनोरंजन की ही उम्मीद लगाईये, निराश नहीं होंगे. सबा अपने किरदार से आपको जोड़े रखने में कामयाब रहती हैं, पर दीपक और स्वाति जिस दर्जे का अभिनय पेश करते हैं, आप उन्हें भूलने नहीं पाते. स्वाति अगर अपनी मौजूदगी मात्र से ही आपका ध्यान लगातार अपनी ओर खींचती रहती हैं, तो दीपक कुछ ख़ास पलों में बड़ी आसानी से आपकी आँखें नम कर जाते हैं. दीपक उन दृश्यों में भी कमजोर दिखाई नहीं पड़ते, जिनमें इरफ़ान भी मौजूद हों, और अभिनय में ये रुतबा बहुत कम अदाकारों को नसीब है.

आखिर में; ‘हिंदी मीडियम’ एक ऐसी जरूरी फिल्म है, जो भारत के अपर मिडिल-क्लास की खोखली महत्वाकांक्षाओं पर हंसती भी है, हंसाती भी है. वो जिनके घरों में रैपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स की किताब शीशे की आलमारियों से मुंह निकाल कर झांकती हैं, और जयशंकर प्रसाद, मुंशी प्रेमचंद की कहानियाँ कहीं नीचे, पीछे दबी-दबी धूल फांकती हैं. देखिये, और हंसिये थोड़ा अपने आप पर भी! [3.5/5]    

Friday, 22 July 2016

मदारी: इरफ़ान का ‘तमाशा’! [2.5/5]

किसी एक सतर्क, सजग आम आदमी का सतह से उठना और कानून की हद से बाहर जा के पहाड़ जैसे अजेय दिखने वाले सिस्टम से सीधे-सीधे भिड़ जाना; बॉलीवुड के लिए ये फार्मूला हमेशा से एक ऐसा ऊंट रहा है, जो बड़े आराम से दोनों करवट बैठ लेता है. चाहे वो बॉक्स ऑफिस पर भीड़ इकट्ठी करनी हो या फिल्म समीक्षकों से थोक में सितारे बटोरने हों. वजह बहुत साफ़ है, कहीं न कहीं सब बहुत त्रस्त हैं. दिन भर दफ़्तर की हांक के बाद घर की घुटी-घुटी सांस और ऊपर से महंगाई, भ्रष्टाचार और मूलभूत अधिकारों के हनन जैसे मसलों से हताश आम आदमी को ऐसी फिल्मों के नायक में ही अपना चेहरा ढूंढ लेने की मजबूरी भी है.

पहले भी और मौजूदा हाल में भी आपको बहुत सारे ऐसे नाम खोजने से मिल जायेंगे, जो लाख मुश्किलों के बाद भी सरकार और सिस्टम दोनों की नाकामियों को कठघरे में खड़ा करने की लगातार कोशिश करते रहे हैं, पर जो सुख, जो रोमांच, जो तृप्ति फ़िल्मी परदे पर एक अदना से आम आदमी के सामने सिस्टम को घुटने टेकते देखने में आता है, वो ‘अन-रियल’ ही है. ‘मदारी’ अपनी ज्यादातर अच्छाइयों और इरफ़ान खान जैसे दिग्गज अभिनेता के अच्छे अभिनय के बावजूद, कहीं न कहीं एक ऐसा ही ‘अभूतपूर्व’ अनुभव बनते-बनते रह जाती है.

गृहमंत्री [तुषार दलवी] का बेटा किडनैप हो गया है. अगवा करने वाले [इरफ़ान] ने अपना भी बेटा सिस्टम की नाकामी के चलते खो दिया था. हिसाब बराबर करने का वक़्त आ गया है. बेटा लाओ-बेटा पाओ! पर कौन है ये आदमी? ढूँढें तो कहाँ? वो खुद कहता है, “कपड़े-लत्ते, शकल-सूरत से 120 करोड़ लोगों जैसा दिखता हूँ, कैसे पहचानोगे?”. सीरत और सूरत में कुछ-कुछ नीरज पाण्डेय की ‘अ वेडनेसडे’ जैसे सेटअप में नचिकेत वर्मा [जिम्मी शेरगिल] ने स्पेशल टास्क फ़ोर्स के साथ अपनी पूरी जान लड़ा दी है. चूजे पर बाज़ का शिकंजा कसता चला जा रहा है. अब कोई जांच समिति नहीं, कोई सुनवाई नहीं, सीधे दोषियों को सज़ा. इसी बीच अगवा हुए बच्चे को लगता है, उसके साथ कुछ कुछ ‘स्टॉकहोम सिंड्रोम’ जैसा हो रहा है. (जिसमें किडनैपर और विक्टिम के बीच एक तरह का इमोशनल सम्बन्ध बनने लगता है).

निशिकांत कामत की ‘मदारी’ आपको सीधी, सपाट और सहज रास्ते पर नहीं ले जाती. यहाँ कहानी में हिचकोले बहुत हैं, जो बार-बार फिल्म की लय और आपके सफ़र की उम्मीदों को तोड़ते रहते हैं. फिल्म में पिता-पुत्र के निजी पलों वाले इमोशनल दृश्यों का इसमें ख़ासा योगदान दिखता है. हालाँकि फिल्म जब उठती है तो अपने पूरे उफान पे होती है (अक्सर इरफ़ान की मौजूदगी में), पर जब सरकने की ठान लेती है तो उतनी ही निर्जीव और बेस्वाद! सोशल नेटवर्किंग साइट्स और मीडिया का आम जन-मानस पर क्षणिक, बदलता और बढता असर इस फिल्म में बखूबी पेश किया गया है.

फिल्म को थ्रिलर का जामा पहनाने के लिए कामत नायक के इरादों और वजहों को बड़ी फ़िल्मी तरीके से छुपाते और उजागर करते रहते हैं. इसी कड़ी में वो फिल्म को दोहरा अंत देने का खेल भी आजमाते नज़र आते हैं, जहां एक अंत पर पहुँच कर आपको बताया जाता है कि पिच्चर तो अभी बाकी है. ‘इमोशनल’ और ‘थ्रिलर’ होने के बीच झूलने वाली ‘मदारी’ अंत तक किसी एक तय मुकाम पर पहुँचने का सुख हासिल नहीं कर पाती.

इरफ़ान ‘मदारी’ हैं और ‘मदारी’ इरफ़ान; इस बात से किसी को इनकार नहीं होगा पर फिल्म के ज्यादातर दृश्य मानो इरफ़ान की काबिलियत को ही भुनाने का और मांजने का एक जरिया भर बनाने की कोशिश लगते हैं. इतने पर भी, अस्पताल में उनका फूट-फूट कर रोने वाला दृश्य हो या फिर अपने बेटे को खो देने के दर्द में खोया हुआ पिता, इरफ़ान आपको उन्हें याद रखने के लिए काफी कुछ दे जाते हैं.

आखिर में, ‘मदारी’ सत्ता-कानून व्यवस्था और सिस्टम में फैले भ्रष्टाचार पर हर उस तरीके से बोलने की नीयत दिखाती है, जो आजकल के परिवेश में एकदम फिट बैठते हैं. पर न तो खुद किसी साफ़ नतीजे पर पहुँचती है, न ही आपको पहुँचने के लिए उकसाती है. कुल मिलाकर, ये वो तमाशा है जहां आप खेल की दांव-पेंच पर कम, बाजीगर की उछल-कूद पर ज्यादा तालियाँ बजाते हैं. [2.5/5]          

Friday, 9 October 2015

JAZBAA: Not all Greens are good! [2/5]

The reason behind a remake can be disciplined into more than one intention or culpable justification. Recreating the success story at the box-office now in your favor [HUM AAPKE HAIN KOUN…! tops the list] is one. Blessing the original with a new perspective to instate your radical creative expression [DEV D could be the most genre-defining example] is other. Meanwhile, some choose to be unapologetically lazy to create anything at their own. Calculatedly, Sanjay Gupta’s JAZBAA is a lethal combination belonging to each one of the above given grounds but unintentionally it proves to be one of those lame efforts that make the original look a classic while it wasn’t. JAZBAA is nothing but the return of a ‘stuck in his own world’ filmmaker who believes more in styling their actors than in making them dive into the characters they are playing on-screen, to a great deal of depth.

Looking at the vital components in the plot, Korean thriller ‘SEVEN DAYS’ was a perfect film destined to be remade by Sanjay Gupta at any given time. Tainted characters, twisted plot and the dark world of crime to deal with; Gupta has always a ‘green’ eye for such vulnerable subject. Criminal lawyer and a single-parent Anuradha Verma [Mrs Rai Bachchan] never minds taking false cases from evidently guilty clients as only they can afford her services and not the innocent ones. Though we rarely see her best foot being put forward in the court scenes, the tag of being an advocate with 100% success record is forced-feed to us very conveniently. One day, her daughter goes missing and now the abductor wants her to take the case of a rapist and murderer [Chandan Roy Sanyal] and bring him back alive from the death ropes. Anuradha has a ticking bomb in her hands that makes her run, jump and chase to save her daughter. Suspended corrupt cop Yohaan [Irrfan] is the only helping shadow by her side.

Sanjay Gupta with Robin Bhatt doesn’t feel any shame in lifting clues and cues from its original Korean film. While the original has managed to stick on the plot as a plain crime thriller, Gupta does make an effort to make it socially relevant film by raising the burning issue of rapes in India. He makes his characters speak about it. He ends the film with stats and facts about the issue. And this was the only addition apart from the veteran Kamlesh Pandey’s verbal punches but the way Sanjay Gupta deals with it; I think it declines more on the ‘exploitation’ side. Gupta gives you all shiny and well-styled characters that wear sunglasses even at the darkest places on earth, show off their ‘killer’ attitude through the cheesy one-liners that could easily get turned into a cheap ‘Whats App’ picture message and cry out so loud you would start feeling sorry more for your eardrums than her pain. Here, even the most insignificant characters treat you as the punching bag in their drawing room and keep throwing at you heavily philosophical lines about life, death and what not.

Aishwarya Rai Bachchan in her comeback shows magical sparks in her presence on screen like the way she always has in her. No matter how intense or depressing the scene is, you could never turn aside your eyes from appreciating her flawless beauty. You can count the same a negative in a performance based role like this. Irrfan plays it ultra-cool and takes away all the claps and whistles every time he talks something utter meaningless yet massy lines. Shabana Azmi is as melodramatic as she could be yet her being in the frame itself brings more credence, power and life altogether. Jackie Shroff, Atul Kulkarni, Abhimanyu Singh and Chandan Roy Sanyal are wasted.

In an interesting scene, Irrfan beats a guy when he asks for his right not to be arrested by a suspended cop. Irrfan makes it clear then and there that it is no Hollywood film but a Bollywood one where anything can happen. JAZBAA could have been a good thriller if the melodrama, styling, obsessively done color-correction and uninspiring background sound would have not shadowed the more significant aspect of the filmmaking i.e. honest storytelling. Wait till it premiers on TV and you might enjoy the latest addition in Bollywood’s ‘Khan-brigade’ with all the required swag; Irrfan! [2/5]             

Thursday, 1 October 2015

तलवार : साल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक ! [4.5/5]

सबूतों, गवाहों और उनके बयानों के मद्देनजर सच को तलाशने की जुगत में अपनी भावनाओं को अलग रख कर एक तटस्थ माध्यम बने रहना बहुत ही मुश्किल है. हम जो देखना चाहते हैं, जो सुनना चाहते हैं और जो मानना चाहते हैं, उसी के इर्द-गिर्द सच्चाई की परिकल्पना तैयार करने में लग जाते हैं. हैरत की बात नहीं, जब एक ही घटना से जुड़े तमाम लोगों का सच एक-दूसरे से एकदम अलग दिखाई और सुनाई देने लगते हैं. मेघना गुलज़ार की ‘तलवार’ हमारी पुलिस, कानून और न्याय व्यवस्था पर एक ऐसा तंज है, जो अपनी बात रखने के लिए सनसनीखेज तरीकों का इस्तेमाल बिलकुल नहीं करती और सच्चाई के करीब रहने की एक भरपूर और कामयाब कोशिश करती है. सच्ची और रोमांचक आपराधिक कहानियों पर आपने बहुत सी फिल्में देखीं होंगी, अच्छी भी, बुरी भी पर ‘तलवार’ जिस ख़ामोशी और ईमानदारी से आपको डराने, सचेत करने और गुस्सा दिलाने में सक्षम साबित होती है, कोई और फिल्म उस ऊंचाई तक पहुँचने का साहस ही नहीं कर पाती.

नोएडा, उत्तर प्रदेश में आरुषि हत्याकांड के घटनाक्रमों से प्रेरित, मेघना गुलज़ार की ‘तलवार’ बिना किसी की तरफदारी किये आपके सामने घटना का सिलसिलेवार ब्यौरा कुछ इस तरह रखती है, जैसे अकीरा कुरोसावा की फिल्म ‘रशोमोन’. जैसे-जैसे घटनाक्रम अपने तौर-तरीके, रंग-रूप और हाव-भाव  बदलती है, हमारा नजरिया, हमारी सोच, किरदारों के प्रति हमारी वफादारी भी उतनी ही तेज़ी से पलटती दिखाई देती है. पेशे से डॉक्टर, टंडन दम्पति [नीरज कबी और कोंकणा सेन] की 14-वर्षीया एकलौती बेटी की लाश उसके ही कमरे में मिली है. शुरूआती जांच में लापरवाह पुलिस का शक घर के नौकर पर जाता है, जिसकी गैरमौजूदगी ही उसके मुजरिम होने का सबूत मान लिया जाता है. पुलिस की हडबडाहट तब बढ़ जाती है जब नौकर की लाश दो दिन बाद उसी घर की छत पर मिलती है. आनन-फानन में पुलिस अपने अधकचरे सबूतों के बल पर डॉक्टर-दम्पति को ही एक प्रेस-कांफ्रेंस के जरिये अपराधी घोषित कर देती है. टीवी में न्यूज़ पैनल पर बैठे दिग्गजों और सामने बैठे हम ड्रामा-पसंद भारतीयों को वैसे भी हमेशा से ऐसा ही सच भाता रहा है जिसमें कुछ सनसनीखेज हो, और फिर इस खुलासे में तो आंतरिक सम्बन्धों, रिश्तों में कालापन और भावुकता से लबरेज मसालों की कोई कमी ही नहीं थी. बहरहाल, जांच का जिम्मा अब CDI [क्रिमिनल डिपार्टमेंट ऑफ़ इन्वेस्टीगेशन] के पास है, जिसकी बागडोर काबिल ऑफिसर कुमार [इरफ़ान खान] संभाल रहे हैं.

‘तलवार’ एक ऐसी धारदार थ्रिलर फिल्म है जो आपके यकीन, आपकी समझ को हर वक़्त टटोलती और तौलती रहती है. हालाँकि पुलिस की बेपरवाह जांच वाले दृश्य मज़ेदार हैं, आपको हंसी भी आती है पर एक डर भी आपके जेहन को जकड़े रहता है कि जहां व्यवस्था इतनी लचर, लापरवाह और पूर्वाग्रहों से ग्रसित है वहाँ इन्साफ की उम्मीद करना कितना मुश्किल है. हत्या जैसे बड़े अपराधों में पुलिस जिस बेरुखी और बेदिली से काम करती दिखाई देती है, और फिर कानून व्यवस्था जिस बेरहमी से उसके नतीजों के साथ खिलवाड़ करती है, आप बेचैन हुए बिना रह नहीं पाते. लगातार बदलते गवाह, सबूतों की अनदेखी, जन-मानस की भावनाओं को संतुष्ट करने की कवायद और समाज की सोच को न्याय का मापदंड बनाते हमारे न्याय-मंदिर, इस फिल्म में बहुत कुछ है जो आपके दिल को काफी वक़्त तक कचोटता रहेगा.

इतने सब के बावजूद, फिल्म आपके मनोरंजन में कोई कमी नहीं छोडती. ब्लैक ह्यूमर के कुछ बहुत ही सधे हुए प्रयोग आपको इस फिल्म में देखने मिलेंगे. घर के एक कमरे से दूसरे कमरे तक आवाज़ पहुँचने-न पहुँचने की जांच परख में एक सहायक अधिकारी का लोकगीत गाना और फिल्म के बेहतरीन अंतिम क्षणों में पहली टीम का दूसरी जांच टीम के हास्यास्पद नतीजों की खिल्ली उड़ाना, फिल्म के बहुत सारे मजेदार दृश्यों में से कुछ ख़ास हैं. फिल्म के एक नाटकीय प्रसंग में, तब्बू का होना फिल्म को देखने की एक और वजह दे जाता है. तब्बू इरफ़ान की बीवी की भूमिका में हैं, जिनके रिश्ते में अब अगर कुछ बचा है तो बस तलाक, हालाँकि कोर्ट में दोनों के पास कोई भी वजह नहीं है. इन दोनों के रिश्ते में गुलज़ार साब की फिल्म ‘इजाज़त’ की झलक और मौजूदगी बड़ी ख़ूबसूरती से पिरोई गयी है.  अभिनय की कहें तो इरफ़ान अपनी भूमिका में पूरी तरह रचे-बसे दिखाई देते हैं. ये उनकी कुछ बेहद जटिल भूमिकाओं में से एक है, जहां उनके किरदार के जज़्बाती उतार-चढ़ाव उन्हें अभिनय के लिए काफी बड़ा कैनवास दे जाते हैं. नीरज कबी और कोंकणा सेन [खास तौर पर ‘अभी रोना भी है’ वाले सीन में] उम्दा हैं. सोहम शाह, गजराज राव, अतुल कुमार अपनी भूमिकाओं में कहीं कोई कसर नहीं छोड़ते.

अंत में; मेघना गुलज़ार की ‘तलवार’ एक बेहद कसी हुई, सुलझी, समझदार और बहुत बढ़िया फिल्म है. एक ऐसी फिल्म, जो सच को सनसनीखेज नहीं बनाती, फिर भी आप पर अपनी पकड़ कभी ढीली नहीं पड़ने देती. साल की सबसे बेहतरीन फिल्मों में से एक, और थ्रिलर फिल्मों में शायद सबसे ऊपर! न देखने की कोई वजह ही नहीं! [4.5/5] 

Friday, 12 June 2015

HAMARI ADHURI KAHANI: A sob-sob dated story! [1.5/5]

Despite being screamed at, threatened and controlled by her egoist, rough and aggressive husband, an Indian wife can’t gather enough guts to throw away her ‘Mangalsutra’. As the matter of fact, she tries to shut her ears melodramatically with both the hands when is suggested for the same from an old lady happened to be her own mother-in-law. And when the unwanted husband makes an unexpected visit in last 5 years, she doesn’t mind giving him a warm welcome with all the comforts he can wish for. And, if overwhelmed by someone’s goodwill for her miserable life, she can easily entitle him ‘God’. And, she cries all the time. Well, this is not an overview on the condition of women in prehistoric India. This is Mohit Suri’s regressively depressing and awfully hopeless film HAMARI ADHURI KAHANI written by one of the most ‘ahead of his times’ filmmakers in India, Mr Mahesh Bhatt.

Vasudha [Vidya Balan] is a single mother working as a florist in an established hotel and waiting for her gone husband Hari [Rajkumar Rao] - a prime suspect in a terrorist-act. Impressed by her dedication at work, her new boss Aarav [Emran Hashmi] offers her a better job opportunity but soon, falls in love with the lady. He loves to help the needy. And he has a very convincing justification too, for his compassion; as if no man on this earth can show empathy towards any woman around without having a proper, emotional and dramatic back-story. Aarav’s mother too has been a single-parent for the most of her life.

Hari returns. Incidentally, he is innocent and is framed. The Indian wife has turned now in a ‘Savitri’ mode to save her husband’s life. Meanwhile, the crying has been accelerated in fourth gear. The lover has to sacrifice all to play the kind-hearted matchmaker between two poor souls. Poor not because of their misfortune but the bad regressive writing! I bet, pick any old Hindi film of 60’s titled on its main female lead and it will have more liberal, sympathetic and progressive plot than this. If the plot doesn’t engage you at all, dialogues also don’t do any better. Everyone seems to be in the race to mouth lines soaked in grave philosophy about life, marriage, man-woman relationship and what not. It’s exactly like listening to Bhatt Saab’s dreadful life-lessons at any social-forum. Melodrama is another abysmal addition that creates an unbearable situation equivalent to any Balaji TV soaps. The background score actually travels the same crescendo once when Hari gets violent over Vasudha’s love confession.  

HAMARI ADHURI KAHANI has three bankable actors in its kitty. Emran Hashmi being the crowd-puller tries his luck as a serious performer here. He took it in a literal sense, I fear. Still, he is not unbearable at all but Vidya is. She constantly posses as either the most unfortunate girl on earth or the most undeserving for all the good things life has to offer her. In both conditions, one thing remains same and unvarying; the crying. Rajkumar Rao is good. His portrayal of a sadistic, male-chauvinist and solipsist husband could have more shades but the length hardly allows him to open the wings. Narendra Jha (of HAIDER fame) reminds me of Irrfan Khan getting wasted in his earlier acting-sting in Bhatt camp. Actor of such caliber deserves more and better.

Overall, Mohit Suri’s HAMARI ADHURI KAHANI is meant to have intent to get you sunk in deep, dead world of an uncompleted-unfinished love saga but turns out to be a sob-sob dated story where nothing makes a connect, neither the pain nor the love. I know a couple of single-mothers who don’t need to put fake cards on her son’s birthday gifts in the name of separated fathers; they are the fathers. Appreciate them if you get a chance! [1.5/5]

Friday, 8 May 2015

PIKU: A ‘Motion’ picture about ‘Emotions’! [4/5]

On a rainy Sunday, go on a long drive with lawns of lushing greenery on either side of the road and try to stick your face out of the window of the speeding car. Shoojit Sircar’s PIKU feels exactly like that moist breeze of fresh air on your face. But that would be one of the most positively, imaginatively and pleasingly fabricated statements to describe the film. Let’s keep it simple and honest! PIKU is an awesome feeling you earn after ‘satisfactorily’ disposing the waste from your digestive tract in the morning, to make sure the day ahead sees no ‘constipated’ look, mood or temper. PIKU works like an efficient and the best in business ‘Kayam Churna’ to make Bollywood flushing out all the frustration with freely-flowing entertainment all the way.

Mr. Banerjee [Big B himeslf] is nothing but a chaos in himself. More than being an ageing single father, he’s irritating father to Piku [Deepika Padukone]- an unmarried in her 30’s trying her hardest to take care the challenges Mr. Banerjee creates every now and then. Here’s a father who doesn’t want his daughter to get married as marriages in India don’t do any good to women. He also can reveal her daughter’s sexual independency to the man he’s just met surely to ensure no possibilities of wedding bells ahead. Progressively selfish you can say! These all look petty issues over the ever not- happening potty issue of Mr. Banerjee! And now, it’s not Piku alone in all this ‘shit’ discussions happening everywhere from dining table to car-ride and where not. Rana Chaudhary [Irrfan] accidently joins them on a road-trip as the responsible owner of the taxi-service, now acting as the committed driver.

Film marks the brilliance in writing [Credit goes to Juhi Chaturvedi] where humor comes generously from a place everyone feels comfortable being silent. The hot seat in the lavatory! The toilet-humor has never smelled so fresh. Picture this when all three main leads start discussing the texture, color and graphical representation of the waste-disposal act, that too on the breakfast table! But PIKU is not only about ‘motion’ but ‘emotion’. The daughter is frustrated with her unsympathetic father but couldn’t hold herself any longer from dancing when finds the old man enjoying his day after much chaos. Dialogues wisely shift its tone from argumentative Bengali to expressive Hindi and conversational English.      

Amitabh Bachchan’s outspoken, loud and blunt Bengali father Bhaskar Banerjee in PIKU is completely opposite to the sophisticated, refined and shy Dr. Bhaskar Banerjee in Hrishikesh Da’s ANAND. The resembling identify can be coincidental or a deliberate choice to make some connect between both the filmmakers’ shared style. The actor blesses the character so much in details you never doubt on the believability factor. Especially in her de-glam look, Deepika Padukone shines and surprises you to the last. The anger, annoyance and concern keep on flashing on her face with supreme ease and sheer confidence. Irrfan charms, and better than any romantic screen-Gods in Bollywood! He makes you believe in the audacity of an actor who slips into any given character’s skin smoothly and leaves you speechless. Yesteryear actress Mausumi Chatterjee does a pleasant comeback.

At the end, Shoojit Sircar’s PIKU is a beautiful film that celebrates dysfunctional Indian families in the most entertaining manner without losing the undercurrent emotions. We keep shouting on our ageing parents for being illogical and over-sensitive; PIKU gives us a priceless chance to sit and have plentiful of good laughs with them! Book your tickets…and for your whole family! It demands, it deserves! [4/5] 

Friday, 20 February 2015

किस्सा: परत-दर-परत खुलती, चौंकाती, उदास कर जाती… [3/5]

बंटवारे की त्रासदी झेल रहे उम्बर सिंह [इरफ़ान खान] को एक बेटा चाहिए! तीसरी बेटी के वक़्त तो उन्होंने बच्ची का मुंह देखने से भी इंकार कर दिया था, ये कहते हुए कि बेटियां तो बहुत देख लीं. ऐसे मुश्किल वक़्त में जब लोग एक-दूसरे को बाजरे की तरह काट रहे हों और औरतों को घर की सबसे कीमती चीज़ समझ कर छुपाया-बचाया जाता हो, उम्बर सिंह की बेटा पाने की चाह और सनक उन्हें एक ऐसे रास्ते पे ले आती है जहां से वापस लौटने की कोई सूरत बनती नहीं दिखती।

अनूप सिंह की 'किस्सा' एक बेहद सुलझी हुई, पर उतनी ही गहरी और कई परतों में खुलने वाली फिल्म है जो खत्म होने के बाद भी आपका पीछा नहीं छोड़ती और आपके ज़ेहन में घर बना लेती है! 'किस्सा' किसी एक लोककथा की तरह है जहां तर्कों की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है पर कहानी की प्रासंगिकता और बांधे रखने की क्षमता पर सवाल कभी खड़े नहीं होते। उम्बर सिंह अपनी चौथी बेटी को बेटे की तरह पालने लगते हैं, इतनी हिफाज़त से कि उनकी बीवी [टिस्का चोपड़ा] और बाकी बच्चियां भी कँवर [तिलोत्तमा शोम] को लड़का ही मानते हैं, यहां तक कि खुद कँवर को भी अपने जिस्मानी तरजीह पर शक नहीं होता! मामला तब रंग पकड़ता है जब उम्बर सिंह, कँवर की शादी एक लड़की [रसिका दुगल] से करा देते हैं. रिश्तों की आड़ में इंसानी समझौते और पहचान छुपाने की इस उधेड़बुन में मर्दों के खोखले अहम की बखिया भी उधड़ती हुई दिखाई देती है.

'किस्सा' में हालांकि बंटवारे की लड़ाई का ज़िक्र है पर असली लड़ाई उम्बर सिंह और कँवर की है. एक दूसरे से कहीं ज्यादा अपने आप से! एक ऐसे किरदार में, जो अपने डर, समझ और अहम में इतना बंधा हुआ है कि मौत के बाद भी आज़ाद होने की तमन्ना बाकी ही रहती है, इरफ़ान खान बखूबी जंचते हैं. उनकी सहज़ता में भी एक तरह का सैलाब है जो आपको अपने साथ बहा ले जाता है. तिलोत्तमा, कँवर की झिझक, परेशानी, गुस्से और उदास अकेलेपन की पीड़ा को बारीकी के साथ परदे पर पेश करती हैं. हालात से लड़ कर, थक कर ज़िंदगी के समझौतों में दबी बीवियों के किरदार में टिस्का और रसिका छाप छोड़ने में कामयाब रहती हैं. 

अंत में; अनूप सिंह की 'किस्सा' बीते दौर की कहानी भले ही हो, आज के लिए भी उतनी ही माकूल है. खानदान चलाने के लिए बेटों की दकियानूसी अहमियत हो या औरतों के हाल-हालात तय करने बैठे मर्दों का खोखला रोब-दाब, 'किस्सा' कहीं न कहीं हमारी सोच पे चोट करने की कामयाब कोशिश करती है! हालाँकि फिल्म की रफ़्तार थोड़ी धीमी है और कहानी का आखिरी हिस्सा थोड़ा उलझा हुआ, पर ये निश्चित तौर पर देखने वाली फिल्म है. ये आपको न सिर्फ हैरान करेगी, आपको बहुत कुछ सोचने पर मजबूर भी करेगी!  [३/५]

Thursday, 2 October 2014

HAIDER: A Bollywood rare that tries to speak…emotionally & politically! [4/5]

1995, Kashmir. When single screen cinemas like Faraz & Sheila in Srinagar were turned into a full-fledged army camps & detention centers, we at the other side were probably unscathed enjoying those terribly silly love-stories on VHS in our drawing rooms and least bothered about that ‘integral part’ of our country. Calling it ‘integral’ itself is an irony. We normally don’t do that to other states. Are we? Vishal Bhardwaj’s HAIDER is a strong political statement retold and represented covered in the long dark shrouds of Shakespearian emotional saga. It’s depressingly sad, gloomy, violent, nerve-racking and makes you bleed emotionally.

Haider [Played by Shahid Kapoor] returns to his soil after his father goes missing in the bleak times of militancy contaminating the Jhelum waters. The disappearance soon gets linked with the unseen before closeness between his mother [Immeasurably talented Tabu] and his power-hungry uncle [Kay Kay Menon in a well-suited comfortable role]. The hunt for the missing and the haunting ache of losing all his emotional supports lands him into the fiery world of hatred, vengeance and revolt at personal front.   

Adopted from ‘Hamlet’ of William Shakespeare, HAIDER suffers from the 'Chutzpah' of Vishal Bhardwaj as a deep and sound filmmaker who ruthlessly puts you through the gloomiest atmospheric tale of Kashmir in the times of brutal political turmoil. This is the time of ambiguity when even the closest to your heart can ask you, “Whose side are you on?”. This is the time when ‘Freedom’ merely has just one connotation to it. The burnt doors, broken windows, unclaimed houses and people holding their identity cards waiting in line for getting searched; Bhardwaj sensitively paints the pain and melancholia in the air. There is a scene actually where a man in a mental shock refuses to enter his own house before being searched by anyone. Created to give you a moment to laugh but really?

In its one of the most comical sequences, Vishal Bhardwaj gives us two of Salman Khan fans who also share the name with Salman and run a VHS parlor. There are also moments and elements snitched from the original work like the slightest intimation of layered mother-son relationship. It does make you uncomfortable at first but the makers deserve a pat on back for such bold baby-step. In other, watch out for the old gravediggers stealing the moment at the climax.

And now the performances! Not many might be familiar with Narendra Jha by name but this man exceeds all expectations as a fine performer in the role of Haider’s father. You will find Kashmir in him in all senses. Tabu as an unsettling soul seeking serenity is a mesmerizing presence on screen. She makes us miss her more in films. Kay Kay Menon is comfortably in his zone. Somehow, this is a role we have seen him wearing like a skin. Shraddha Kapoor doesn’t leave any scope to complain. Irrfan Khan in a special appearance brings a good amount of joy and a flare of surprise.

And then there is Shahid Kapoor! Where in the first part he hardly shows anything unforeseen and mostly repeats himself, in the second half he completely blows you off with a brilliantly acted monologue piece and constantly reinventing his acting skills!                 

Despite all this, there is of course a muddled theatrical concluding part, bearably lengthy duration of nearly 3 hours and harshly done back and forth narrative to offer a bumpy ride and a sense of dissatisfaction but the melancholic shades in the characters and in the character of Kashmir both painted beautifully by some of the most sincere and serious performances make HAIDER an experience worth putting your time and money in. A bollywood film trying to speak is rare and should get a warm welcome! (4/5)

Friday, 19 July 2013

D-DAY: drought of a good thriller still haunts Bollywood [2.5/5]

Every time a terrorist attack happens in any part of our country, the conversation among common people & the ‘on serious note’ panel discussions on TV get heated with mostly unrequited-unresolved demand for the exile of the most wanted criminal, reportedly residing now in one of the posh cities of our neighboring country.

We all have wanted that much-awaited extradition for ages, and God only knows if that would be possible ever in the future but for now, Nikhil Advani’s sincerely executed yet flawed-Bollywood at heart-taut thriller of high promises D-DAY offers a ‘dream come true’ fictional story line, largely getting built up on ‘would have been-should have been’ conditions applied.

Taking cues from real incidents, in-depth functioning of intelligence agencies & the earnest psyche of undercover agents, where an impressive first half suggests it being an intelligent, well researched, on real locations espionage drama with four Indian secret agents starting off their mission to get Goldman [the man in pink shades modeled on the Dawood Ibrahim, played by immensely likeable Rishi Kapoor] back to India, the second half pointlessly falters with focusing more on the masala; Bollywood is known to plant whenever they start lacking on gripping plots. So, we see emotional urges taking over obvious astuteness, regular tiffs between the team, hard-to-believe successful escape plans and an unfeasible end that totally is to please & blow away audience’s various sentiments regarding this national issue sounded more like a personal war for every countryman. Get your hands ready for claps when see that happen what if only on screen!

Advani’s premise is very appealing-very mass attracting. The execution part is also thoroughly intended and incessantly belongs to the likes of any docu-drama shot in the crowded lanes of Karachi. Narrative pattern that includes timelines of the events on screen to make it look documented effort, works in favor. Special mention to the ‘Alvida’ song for its bloody beautiful visualization, literally! On the acting front, Irrfan does his part with sheer honesty. Watch out for him in heartrending scenes with his family. Arjun Rampal, Shruti Haasan & Huma Quareshi is standard. But if we are talking about performances par expectations, Rishi Kapoor as stylishly dressed Don, Aakash Dahiya as fourth player in the operation and Shriswara as Irrfan’s affably adorable wife top the list. Chandan Roy Sanyal is a complete waste.

At the end, this thrilling operation that had all the means to finish the long-awaited drought of a good thriller miserably could not meet its desirable end, thanks to its own flaws that lie in the high octane drama & a forcibly commercial end in the second half. A troubled case of wasted opportunity! [2.5/5]