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Friday, 16 September 2016

राज़ रीबूट (A): अंत हुआ, भला हुआ! [1/5]

विक्रम भट्ट की ‘राज़ रीबूट’ रिलीज़ से पहले ही आपको खुश कर जाती है. महेश भट्ट पहले ही बयान दे चुके हैं, ‘राज़’ सीरीज की ये आख़िरी फिल्म होगी. इसका मतलब ये है कि अब विक्रम भट्ट की वो घिसी-पिटी, वाहियात संवादों से भरी स्क्रिप्ट जो पिछले 7 सालों से ‘राज़ (2002)’ की कामयाबी को भुनाने के चक्कर में बार-बार एक अलग और नई फिल्म के तौर पर दर्शकों तक पहुंचाई जा रही थी, अब ये खेल बंद हुआ समझिये. अपने आप में ये एक बहुत राहत पहुंचाने वाली बात है, हालाँकि सीरीज की आख़िरी किश्त ‘राज़ रीबूट’ जाते-जाते भी आप पर कोई रहम नहीं करती.

डराने की हर कोशिश जब हंसाने लग जाए, समझिये विक्रम भट्ट फॉर्म में हैं. फिर भी मैं कहता हूँ, डायलाग-राइटिंग में हाथ आजमाने वाले हर नए-पुराने टैलेंट को इस फिल्म से सीखना चाहिए कि आखिर क्या नहीं लिखना है? हीरोइन को एक ऐसा कैमरा चाहिए, जो लाइट ऑफ होने के बाद भी कमरे में होने वाली सारी एक्टिविटी रिकॉर्ड कर सके. दुकानदार का जवाब सुनिए, “ओह, तो आपको नाईट विज़न कैमरा चाहिए?”. भूत-प्रेतों पर रिसर्च करने वाला एक दिव्यांग (नेत्रहीन) चाय का कप छू कर बता देता है, “इस कप पर दो लोगों के होंठ महसूस हो रहे हैं”. वाह, गुरुदेव! पति-पत्नी के शादीशुदा दोस्तों में से एक पूछती है, “मैंने नोटिस किया है, तुम्हारे बेडरूम के बिस्तर पर एक तरफ सिलवटें नहीं हैं. तुम लोग अलग-अलग सो रहे हो?” मैं पूछता हूँ, ये कौन है जो बेड पर बड़ी सफाई और सावधानी से एक ही तरफ सो लेने का टैलेंट रखता है?

शादी के बाद प्रेमी-जोड़ा [गौरव अरोरा, कृति खरबंदा] मुंबई से रोमानिया ताजा-ताजा शिफ्ट हुआ है. “बर्फ का शहर है, अगले 5 साल तक कहीं और नहीं जाना है, तो चलो ‘बच्चा’ कर लेते हैं”, बीवी ज़िद पे अड़ी है. पति को पैसे कमाने हैं. झगड़ा पहले ही दिन इस हद दर्जे का है, कि दोनों के बिस्तर अलग-अलग हो जाते हैं. साथ सोने भर से भी शायद ‘बच्चा’ हो जाता हो. खैर, कुछ ही वक़्त बाद बीवी को घर में ‘किसी और’ के होने का एहसास होने लगता है. सिंक में आँख दिखाई देने लगती है, लैपटॉप से खून की नदियाँ बह निकलती हैं, वगैरह, वगैरह! पति को जब इन बेकार की बातों में यकीन नहीं होता, बीवी को उसका पुराना आशिक़ [इमरान हाशमी] आकर सहारा देता है. फिर वही होता है, जिसका आपको भी पता था और इंतज़ार भी. दो-चार किसिंग सीन, उतने ही गाने और एक ‘राज़’ जिसके खुलने से पहले ये एक लफ्ज़ इतनी बार बोला-सुनाया जाता है कि आपको फर्क पड़ना ही बंद हो जाता है.

विक्रम भट्ट साब की एक ही परेशानी है कि वो अपनी फिल्म चाहे दुनिया के किसी भी कोने में या ब्रह्माण्ड के किसी भी ग्रह पर लेकर चले जाएँ, अपने साथ भारतीय हॉरर सिनेमा के कुछ अनमोल तत्व ले जाना नहीं भूलते, मसलन, मंगलसूत्र. मंगलसूत्र का खो जाना एक पतिव्रता नारी के लिए कितना कष्टप्रद हो सकता है, आपको फिल्म देखकर ही पता चलेगा. वहीँ, जब शादीशुदा होने के बावजूद गैर-मर्द से सम्बन्ध बनाने की बारी आती है, बड़ी सहूलियत से कपड़े उतारने से पहले मंगलसूत्र उतार देना सब कुछ जायज़ कर देता है. फिल्म में ‘द एक्सोर्सिस्ट’ की भी छाप हर बार की तरह इस बार भी भरपूर है. मजेदार बात ये है कि इस बार वाला भूत ‘एफ़-वर्ड’ इस्तेमाल करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाता, और दिल खोल के गालियाँ बरसाता है.

अभिनय की बात करें, तो गौरव अरोरा  का फिल्म में होना ही हिंदी फिल्म इंडस्ट्री के कामकाज के तरीकों पर सवालिया निशान खड़े कर देता है. विक्रम भट्ट की फिल्म में आफ़ताब और रजनीश दुग्गल जैसों का होना फिर भी चलता है, गौरव अरोरा के साथ तो ‘गुड लुक्स’ का भी चक्कर दूर-दूर तक नहीं दिखता. असल में इमरान हाश्मी ही हैं जो पूरी तरह से समर्पित दिखाई देते हैं. फिल्म से ज्यादा, भट्ट कैंप और अपनी ‘सीरियल किसर’ वाली इमेज के प्रति. कृति खरबंदा डराने वाले दृश्यों में कामयाब रहती हैं.

फिल्म के शुरूआती एक दृश्य में, एक कौवा रुकी हुई कार के सामने वाले शीशे से टकराकर आत्महत्या कर लेता है. जानवरों को आने वाले संकट और बुरे वक़्त का अंदेशा इंसानों से बहुत पहले ही हो जाता है. काश, उसके इस बलिदान को हम इंसान वक़्त रहते समझ पाते! कम से कम पूरी फिल्म झेलने से बच जाते! चलो, ‘राज़’ का अंत हुआ...और कभी-कभी अंत ही भला होता है. [1/5]      

Friday, 15 July 2016

ग्रेट ग्रैंड मस्ती (A): एक बचकानी एडल्ट कॉमेडी, आपके ‘उस’ व्हाट्स ऐप ग्रुप के लिए! [1/5]

बॉलीवुड में फिल्म-प्रमोशन का दौर एक ऐसा जादुई वक़्त होता है, जब फिल्म से जुड़े तमाम लोगों में अचानक ‘दैवीय ज्ञान’ का संचार होने लगता है. अपनी फिल्म को अच्छी बताने और बता कर बेचने में मैंने अक्सर बड़े-बड़े ‘सिनेमा-विशेषज्ञों’ को गिरते देखा है. खैर, ‘इट्स ऑल पार्ट ऑफ़ द जॉब’. हालाँकि ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ को बेचते हुए निर्माता-निर्देशक इन्द्र कुमार काफी हद तक सच के साथ खड़े दिखते हैं. उनका कहना है, “अगर हम एडल्ट जोक्स आपस में कह-सुन सकते हैं तो परदे पर एडल्ट कॉमेडी क्यूँ नहीं”. दुरुस्त, पर दुर्भाग्य ये है कि इन्द्र कुमार साब एडल्ट कॉमेडी के नाम पर उन्हीं बासी, घिसे-पिटे एडल्ट जोक्स को बार-बार हमारे सामने परोसते हैं, जिन्हें हम और आप अपने ‘व्हाट्स ऐप ग्रुप’ में पढ़ते ही डिलीट कर देते हैं. सिनेमा डिलीट नहीं होता. और अगर ये सिनेमा है तो काश सिनेमा डिलीट हो सकता! ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ एक उबाऊ, पकाऊ और झेलाऊ फिल्म है, जहां हंसाने के नाम पर बद्तमीजियां ज्यादा होती हैं और फूहड़पन हर तरफ बिखरा पड़ा है.

मस्ती’ अगर बॉलीवुड में एडल्ट कॉमेडी के एक नए दौर की शुरुआत थी तो ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ को अंत मान लेना चाहिए, क्यूंकि इसके आगे अब बस ‘पोर्न’ ही बचता है. ऐसा नहीं है कि मैं पोर्न फिल्मों के खिलाफ़ हूँ पर तब वो खांटी तौर पर एक नया मुद्दा होगा बहसबाजी और अवलोकन के लिये. एडल्ट कॉमेडी में अक्सर द्विअर्थी कहावतों और ‘वन-लाइनर्स’ की भरमार होती है. ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ में द्विअर्थी कुछ भी नहीं. यहाँ सबका मतलब साफ़ और एक ही है. फिल्म में अगर ‘मेरा खड़ा है’, ‘इसका छोटा है’, ‘मुझे करना है’ जैसे संवाद बोले जाते हैं, तो दादा कोंडके साब की तरह उन संवादों के आगे-पीछे किसी तरह को कोई एक्सप्लेनेशन जोड़ कर आपको चौंकाया नहीं जाता, बल्कि उनका सीधा मतलब आपके शारीरिक अंगों और यौन-क्रियाकलापों की तरफ ही होता है. जाहिर है, इसमें हँसी आने की कहीं कोई गुंजाईश नहीं बचती. बात सिर्फ संवादों तक ही रुक जाती तो गनीमत होती, यहाँ तो लेखक और निर्देशक उन तमाम अंगों-प्रत्यंगों को ‘कुचलने, काटने, कूटने’ तक पर उतर आते हैं. और हम लोग अनुराग कश्यप को सबसे ‘हिंसक’ फिल्म-निर्देशक का तमगा देने पर आमादा है, कैसी विडंबना है!

अमर, प्रेम और मीत [रितेश, विवेक और आफ़ताब; मुझे फर्क नहीं पड़ा कि किसका क्या नाम है] अपने-अपने वैवाहिक जीवन में ‘सेक्स-सुख’ न मिलने की वजह से ‘बाहर की बिरयानी’ खाने का मन बना चुके हैं. प्लान के मुताबिक तीनों रितेश के गाँव उसके वीरान बंगले को बेचने की नीयत से आते हैं. इस वीरान बंगले में एक भूत का कब्ज़ा है, भूत वो भी हद्द खूबसूरत [उर्वशी रौतेला] और 50 साल से मर्दों के लिए प्यासी. आप सोच रहे होंगे, टेंशन क्या है? पर नहीं, पहले तो ये तीनों भूखे भेड़िये (उनकी एक्टिंग देख कर तो कम से कम ऐसा ही लगता है) आपस में ‘मे बेस्ट मैन विन’ की रेस लगाने लगते हैं और बाद में भूत की शर्त. कुल मिलाकर आपको 2 घंटे 10 मिनट तक बेवकूफ बनाये रखने का पूरा इंतज़ाम यहाँ मौजूद है. कहने की बात नहीं है कि अंत में सारे मर्द ‘लौट के बुद्धू घर को आये’ और ‘सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते’ जैसे कहावतों की बिला पर साफ़ बरी हो जाते हैं.

अभिनय की नज़र से ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ एक बहुत जरूरी फिल्म है, उन लोगों के लिए ख़ास जिन्हें परदे पर कभी न कभी इंसानों के पूर्वजों की भूमिका करने में दिलचस्पी रही हो. ‘फैरेक्स-बेबी’ आफ़ताब इस लिहाज़ से काफी मजबूत कलाकार हैं. उनकी उछल-कूद देखकर मन में कोई दुविधा नहीं रह जाती. विवेक थोड़े पीछे रह जाते हैं. रितेश इस तरह की भूमिकाओं में ‘पदमश्री’ लेकर ही मानेंगे. उर्वशी रौतेला गानों में अपना जौहर ज्यादा बखूबी से पेश करती हैं, अभिनय में उनका सफ़र अभी काफी लम्बा और काटों भरा है. उषा नाडकर्णी और संजय मिश्रा पर हँसी कम, तरस ज्यादा आता है. फिल्म का सबसे दमदार दृश्य मेहमान भूमिका में सुदेश लाहिरी के हिस्से आता है, जहां वो रामसे ब्रदर्स और उनकी तमाम भूतिया फिल्मों पर छींटाकशी करते नज़र आते हैं. दिलचस्प बात ये है कि वो खुद उन्हीं फिल्मों के ‘लालटेन वाले चौकीदार’ की भूमिका में हैं.

ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ के एक मार-धाड़ वाले दृश्य में एक आदमी उड़ता हुआ मशहूर पेंटर Vincent van Gogh की पेंटिंग के ऊपर आ गिरता है. कला और सिनेमा पर ये फिल्म उसी तरह का एक निर्मम प्रहार है. इनका बंद होना तो नाजायज़ और नामुमकिन है; उम्मीद करता हूँ इन पर हंसने वालों की तादात थोड़ी कम हो. बहरहाल, मस्ती के नाम पर ये है एक गन्दी, सस्ती और बचकानी फिल्म! [1/5]    

Friday, 13 September 2013

GRAND MASTI: Cheap, disgusting, offensive, insensitive & a must if you think from your lower abdominal parts [0/5]

Why on earth do Bollywood adult-comedies have to have double-meaning dialogues that fall only for one intended meaning? And why on earth do writers for such sleazy entertainers have to use their boneless part of lower-abdomen area to think and not the obvious upper part primarily called as mind?
Well, if sex-comedies are like classic ALIEN series, Indra Kumar’s adult-comedy GRAND MASTI is Shirish Kunder’s JOKER. Both have common ingredients to offer viewers a good platter of entertainment but are still very divergent in recipe and in taste. The former is cheap, shameful, lousy, crappy, distasteful, disgusting, mean, offensive and everything else but funny.

Sequel to MASTI- the 2004’s surprise hit, GRAND MASTI revisits the dull, boring & ‘suck sex’ful married lives of Meet (Vivek Oberoi), Prem (Aftab Shivdasani) and Amar (Ritesh Deshmukh). Their wives are busy in everything around; from serving extended families non-stop like an adarsh- bahu to working late at boss’s place for better future & also in baby-sitting but all they ignore unpretentiously is the sexual desires [I can use the term ‘lost love in marital lives’ to be sober but trust me the film itself didn’t talk of it even in suggestion] of their husbands, as if that is the last thing on earth to stay alive. So, the trio seeks the alternate means of pleasure in their college reunion with barely clad sex-sirens sickeningly named as Rose, Mary & Marlow to be pronounced later in exact order for at least 60-70 times till you start hating such beautiful names.

I widely understand the need of below-the-belt jokes in any adult-comedy but the situation goes horribly wrong, monotonous & unbearable after a while when makers decide to stay there and there only to tickle I don’t know what bones of yours but certainly not the tickling one. So, you have weird sex-driven word-plays in every second sentences characters speak, old tasteless adult jokes getting re-enacted, forceful body-show and sequences literally hitting on every private part of human body. It goes on and on like the flat, flavorless rubber in your mouth [Chewing gum, I mean].

Also, there are times when it turns so absurd-so ridiculous you don’t want to look at the screen. Well, even these things you can take for granted in the name of entertainment but how can you not be sensitive or apologetic about offensive sequences where women & kids are being treated as a substance of pleasure without showing any love, respect or care for that matter. In one of scenes, Amar (Ritesh Deshmukh) blatantly curses his cutely adorable kid with a gesture like ‘kaash maine uss din nirodh ka virodh na kiya hota!’ and later offers him to a burglar to get rid of him. Painful!

There are no reasons that can justify its viewing except you are a sex-starved, low-IQed, male chauvinist who sees women as sex-object & doesn’t love/care/respect even their ladies at home. I regret watching it and very sorry as I didn’t think I would be also reviewing a soft-porn someday. Watch it at your own risk! [0/5]