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Friday, 29 December 2017

ज़बां गुनगुनाती है...(2017's 15 Best Hindi Movie Songs)


# kidre javaan- Haraamkhor
Singer: Jasleen Royal
Lyrics: Aditya Sharma
Composed by: Jasleen Royal

# saahiba- Phillauri
Singers: Pawni Pandey, Romy
Lyrics: Anvita Dutt
Composed by: Shashwat Sachdev

# ye ishq hai- Rangoon
Singer: Arijit Singh
Lyrics: Gulzar
Composed by: Vishal Bhardwaj

# mann beqaid hua- Anaarkali of Aarah
Singer: Sonu Nigam
Lyrics: Prashant Ingole
Composed by: Rohit Sharma

# maana ke hum yaar nahin (female)- Meri Pyaari Bindu
Singer: Parineeti Chopra
Lyrics: Kausar Munir
Composed by: Sachin-Jigar

# o sona tere liye- Mom
Singers: AR Rahman, Shashaa Tirupati
Lyrics: Irshad Kamil
Composed by: AR Rahman

# phir wahi- Jagga Jasoos
Singer: Arijit Singh
Lyrics: Amitabh Bhattacharya
Composed by: Pritam

# tujhe namami ho- Raag Desh
Singers: Shreya, Sunidhi, KK, Rana Mazumder
Lyrics: Sandeep Nath
Composed by: Rana Majumder

# ghar- Jab Harry Met Sejal
Singers: Nikita Gandhi, Mohit Chauhan
Lyrics: Irshad Kamil
Composed by: Pritam

# barfani (female)- Babumoshai Bandookbaaz
Singer: Orunima Bhattacharya 
Lyrics: Ghalib Asad Bhopali
Composed by: Gaurav Dagaonkar

# chal tu apna kaam kar- Newton
Singer: Raghubir Yadav
Lyrics: Irshad Kamil
Composed by: Rachita Arora

# title track- Tu Hai Mera Sunday
Singer: Shalmali Kholgade
Lyrics: Milind Dhaimade
Composed by: Amartya Rahut (Bobo)

# rafu- Tumhari Sulu
Singer: Ronkini Gupta
Lyrics: Santanu Ghatak
Composed by: Santanu Ghatak

# dil diyaan gallan (unplugged)- Tiger Zinda Hai
Singer: Neha Bhasin
Lyrics: Irshad Kamil
Composed by: Vishal and Shekhar

# rozaana- Naam Shabana
Singer: Shreya Ghoshal
Lyrics: Manoj Muntazir
Composed by: Rochak Kohli

Friday, 4 August 2017

जब हैरी मेट सेजल: पुराने इम्तियाज़- नए शाहरुख़ [3/5]

बॉलीवुड में रोमांटिक फिल्मों का एक आख़िरी बेंचमार्क तकरीबन 22 साल पहले आया था. तब से मुंबई के मराठा मंदिर में 'दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे' आज तक चल रही है. इस बीच 'चेन्नई एक्सप्रेस' और 'बेफ़िक्रे' जैसी बहुत सारी फिल्मों ने गाहे-बगाहे इस 'भारतीय फिल्म इतिहास की शायद सबसे चहेती रोमांटिक फिल्म' को अपने-अपने तरीके से परदे पर दोबारा जिंदा करने की कोशिश की है. कहना ग़लत नहीं होगा कि कमोबेश सभी ने फिल्म की रूह को समझने से ज्यादा, उसकी बाहरी चमक-दमक को ही अपना केंद्र-बिंदु बनाये रक्खा. 'जब हैरी मेट सेजल' के साथ, इम्तियाज़ अली अपना जाना-पहचाना, जांचा-परखा, सूफ़ियाना असर फिल्म की रूमानियत में घोल देते हैं, साथ ही वापस ले कर आते हैं रोमांस के बादशाह शाहरुख़ खान को उनकी अपनी ही दुनिया में, मगर इस बार एक अलग नए अंदाज़ में. 'दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे' अगर इन 22 सालों में और बालिग़, और उम्रदराज़, और परिपक्व होने की किस्मत पा सकती, तो बेशक 'जब हैरी मेट सेजल' के आस-पास ही होती...सीरत में न सही, सूरत में जरूर! 

लन्दन के नौजवान मसखरे, दिलफेंक राज की जगह अब यूरोप के रूख़े, तुनकमिजाज़ और मुंहफट ट्रेवल-गाइड हैरी (शाहरुख खान) ने ले ली है. टूर ख़तम होने के साथ ही, उसके रंग बदलने लगते हैं. मीठा-मीठा बोलने वाला हैरी झल्लाहट में पंजाबी गालियाँ भुनभुनाता रहता है. अपनी बेपरवाही को चाशनी में लपेट कर लड़कियां पटाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि पूरी अकड़ और तेवर से अपने 'गंदे' होने का ढिंढोरा पीट-पीट कर पहले ही आगाह कर देता है. और तब भी, अगर लड़की नज़दीक आने की कोशिश करे तो 'मत कर, मुश्किल हो जायेगी!' कहकर पीछे हट जाता है. हालाँकि देसी और विदेशी लड़कियों में उसका ये फ़र्क अब भी समझ से परे है, बावजूद इस वाहियात 'पुरुषवादी' सफाई कि 'तू चाइना वास की तरह है, एक जगह रख के देखते रहने के लिए'.

सेजल (अनुष्का शर्मा) भी सिमरन की ही तरह साफ़ कर देती है, 'मैं वैसी लड़की नहीं हूँ', पर इस बार उसे भारी दिक्कत 'स्वीट, क्यूट, ब्यूटीफुल, सिस्टर-लाइक' समझे जाने से है. सेजल सगाई की अंगूठी खोजने के बहाने कुछ और ही खोज रही है. शायद आज़ादी की सांस, जो अपनी ही फॅमिली बिज़नेस का लीगल एडवाइजर बन के नसीब नहीं हो रहा या फिर शादी के बाद जिसके खो जाने का डर बना हुआ है. हालाँकि यूरोप का 'यहाँ अंगूठी नहीं है, वहाँ चलो' वाला अबकी बार का ट्रिप, 'मैं इस बार ट्रेन मिस नहीं करना चाहती' वाले ट्रिप जितना मजेदार नहीं है, बल्कि कहीं ज्यादा झेला और झल्ला देने वाला है, इसमें कोई शक़ नहीं. 

शाहरुख़ के लिए रोमांस नया नहीं है, पर इस बार शाहरुख़ ज़रूर नए हैं. उम्र का असर सिर्फ परदे पर नज़र नहीं आता, एक गहराई के साथ उनके किरदार में भी समाया हुआ दिखता है. 'डियर जिंदगी' की तरह एकदम चौंकाने वाला तो नहीं, पर हैरी में शाहरुख़ के अन्दर का अदाकार काफी हद तक ज़मीनी और कम बनावटी नज़र आता है. अनुष्का भी बड़ी आसानी से और ख़ूबसूरती से अपनी भाव-भंगिमाएं बदल लेती हैं. तो फिर परेशानी क्या है? परेशानी है, कहानी. फिल्म की कहानी पानी के उस एक बुलबुले की तरह है, जिसके फूटने का इंतज़ार दर्शकों को ढाई घंटे तक कराना ही अपने आप में एक चुनौती है. उस पर से वही जानी-पहचानी, जांची-परखी इम्तियाज़ अली की दुनिया, जो एक तरफ तो फिल्म को अपने सूफियाना फलसफों से ठहराव भी बहुत देती है, पर इधर-उधर के तमाम दृश्यों की बनावट और सजावट में 'लव आजकल', 'रॉकस्टार' जैसी अपनी ही फिल्मों से उधार ली हुई लगती है. 

इम्तियाज़ अगर कहीं अपने आप को बेहतरी के लिये दोहराते हैं तो उस वक़्त जब उन्हें हैरी और सेजल के दरमियान आपसी नज़दीकियों के दृश्यों में कुछ बेहद खूबसूरत लम्हें कैद करने का मौका मिलता है, और ऐसे मौके फिल्म में दूर-दूर ही सही, मगर बहुत सारे हैं. खूबसूरत लोकेशन्स, बेहतरीन कैमरावर्क, गानों और बैकग्राउंड म्यूजिक के अलावा एक बात और जो काबिल-ऐ-तारीफ़ है, वो हैं फिल्म के संवाद. कुछ बातें मायनों के साथ कही जाती हैं, कुछ बातें कहने के बाद अपने मायने तलाशती हैं. 'जब हैरी मेट सेजल' लगातार बोलती रहती है पर जो कहना चाहती है, बड़ी समझदारी से अधूरा ही छोड़ देती है. 

आखिर में; 'जब हैरी मेट सेजल' की पूरी कोशिश परदे पर शाहरुख के उस करिश्माई शख्सियत को इम्तियाज़ अली की दुनिया से मिलाने की है, जिसे कभी यश चोपड़ा जी ने अपनी फिल्मों में निखारा-संवारा था. इम्तियाज़ आज के ज़माने के 'यश चोपड़ा' माने जाते हैं, पर एक अदद कमज़ोर कहानी की वजह से 'जब हैरी मेट सेजल' इस पूरी कोशिश को भले ही नज़रंदाज़ कर दे, शाहरुख़ को इस फिल्म में नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. [3/5]   

Friday, 14 July 2017

जग्गा जासूस: गलतियों वालीं 'म्यूजिकल', रनबीर 'मैजिकल'! [4/5]

खलनायक का पीछा करते-करते अचानक से खेतों में खड़ा प्लेन मिल जाये, और आपको इत्तेफाक़न चलाना आता भी हो क्यूंकि आपने लाइब्रेरी में पढ़ा था; सामने गुण्डे बन्दूक ताने खड़े हों और आप नाचने लग जाएँ, इतना कि फर्श टूट जाये और आप निकल भागें; या फिर कि आप लकड़ी के बड़े से डार्टबोर्ड पर बंधे हों, ख़ूनी कातिल आप पर चाक़ू से निशाना साध रहा हो, और पहिये की तरह लुढ़कते-लुढ़कते वही डार्टबोर्ड नदी में नाव की तरह बहने लग जाये, जिंदगी इतनी आसान तो दादी-नानी की परी-कथाओं में ही होती है, या फिर कॉमिक बुक्स किरदारों के साथ. अनुराग बासु की 'जग्गा जासूस' इन दोनों ही खांचों में फिट बैठती है, पर इतनी ही आसान होते हुए भी, इतनी भी आसान फिल्म नहीं है. खास कर तब, जब उसके तकरीबन सारे ख़ास कलाकार अपनी बात गा कर कहते हों. 

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में 'म्यूजिकल' फिल्में उन्हीं को कही जाती हैं, जिनमें 8-10 प्लेबैक गाने हों; पूरी फिल्म गीतों में और गीतों के जरिये ही बयान की जाये, हिंदी फिल्मों में कम आजमाया हुआ नुस्खा है. अनुराग इस तरह का प्रयोग करने की हिम्मत पूरे जोश-ओ-ख़रोश से दिखाते हैं, और इन हिस्सों में ख़ासा कामयाब भी रहते हैं, पर फिल्म की भटकाऊ कहानी और थकाऊ लम्बाई उनके इस जोश-ओ-ख़रोश को ठंडा कर देती है. देखने और सुनने में 'जग्गा जासूस' अनुराग की पिछली फिल्म 'बर्फी' की तरह ही बेहद खूबसूरत तो है, पर मिठास में कहीं न कहीं कम पड़ जाती है. 

जग्गा (रणबीर कपूर) अनाथ है, हकलाता है. बचपन में एक दिन उसने एक घायल आदमी को मरने से बचाया था, तब से वही (शाश्वत चैटर्जी) उसके पिता हैं. उन्होंने ही जग्गा को गा-गा कर अपनी बात कहना सिखाया. फिर एक दिन वो जग्गा को छोड़कर चले जाते हैं. अब साल-दर-साल जग्गा के जन्मदिन पर एक विडियो कैसेट भेजते रहते हैं, जिसमें जग्गा से कहने के लिए ढेर सारी बातें होतीं हैं और दुनिया भर की जानकारी. जग्गा अपने कॉलेज का जासूस है, शहर की छोटी-मोटी वारदातों में अपना दिमाग चलाता रहता है, ऐसे में जब एक दिन उसे उसके पिता के मौत की खबर मिलती है, साथ ही मिलती है उसे अपने पिता को खोजने की वजह भी. इस सफ़र में उसके साथ है श्रुति (कटरीना कैफ़)- एक ऐसी 'बैड-लकी' लड़की, जो कुछ ख़ास हालातों में ठीक जग्गा के पापा की तरह ही पेश आती है.  

जहाँ तक फिल्म को खूबसूरत दिखाने की बात है, सिनेमेटोग्राफर रवि वर्मन के साथ मिलकर अनुराग हरेक फ्रेम को एक तस्वीर की तरह पेश करते हैं, एक ऐसी तस्वीर जिसमें रंग जैसे छलक के बाहर आ गिर पड़ेंगे. तकरीबन 3 घंटे की फिल्म में शायद ही कभी आप फिल्म की ख़ूबसूरती को एक पल के लिए भी नज़रअंदाज़ कर पायेंगे. ऐसा ही कुछ रोमांच फिल्म की एडिटिंग भी दिखाती है, जब एक दृश्य से दूसरे दृश्य में जाने के लिए कई तरह के सफल प्रयोग बार-बार, लगातार किये जाते हैं. फिल्म को सही और सच्चे मायनों में 'म्यूजिकल' बनाने के लिए अनुराग की तमाम कोशिशों में 'सब खाना खाके दारू पी के चले गए', जग्गा का उसके पिता के साथ पहला दृश्य और 'तुक्का लगा-तुक्का लगा' जैसे दृश्य बेहतरीन हैं. दिक्कत तब आती है, जब फिल्म के दूसरे भाग में इस तरह के मजेदार (गाने में बातचीत) प्रयोग कम हो जाते हैं, और कहानी में भटकाव ज्यादा आ जाता है. इस हिस्से में इमोशन्स भी दूर-दूर ही मिलते हैं. 

अभिनय में, 'जग्गा जासूस' बिना शक रणबीर कपूर की सबसे मजेदार, मनोरंजक और बढ़िया अदाकारी वाली फिल्मों में शामिल होती है. गिनती में 'बर्फी' और 'रॉकस्टार' के ठीक बाद. हालाँकि उनके किरदार में एक वक़्त बाद एकरसता आने लगती है, पर परदे पर उनका करिश्मा तनिक भी कम नहीं पड़ता. एक-दो डबिंग की गलतियों को छोड़ दें, तो कटरीना यहाँ कम ही शिकायत का मौका देती हैं. जग्गा के पिता की भूमिका में शाश्वत चैटर्जी फिल्म में जरूरी ठहराव लेकर आते हैं और हर दृश्य में अपनी छाप छोड़ जाते हैं. सौरभ शुक्ला के तो कहने ही क्या! इस तरह की भूमिकाओं में एक तरह से महारत ही हासिल है उन्हें. 

आखिर में; 'जग्गा जासूस' को वेस एंडरसन और टिम बर्टन की फंतासी फिल्मों से अलग रखकर देख पायें, तो आपको बॉलीवुड में 'म्यूजिकल' बनाने की एक ईमानदार और दिलेर कोशिश नज़र आएगी, हालाँकि फिल्म कमियों से परे नहीं है. बच्चों की फिल्म में बड़ों के मुद्दे (अंतर्राष्ट्रीय हथियार व्यापार एवं तस्करी), बड़ों की फिल्म में बचकानी हरकतें; 'जग्गा जासूस' अगर दोनों का मनोरंजन भी बराबरी से करती है, तो दोनों को थोड़ा-थोड़ा निराश भी. [4/5]