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Friday, 16 March 2018

रेड: दमदार निर्देशन, ईमानदार मनोरंजन...और सौरभ शुक्ला! [3.5/5]

सर से पाँव तक ईमानदारी में डूबे पुलिस ऑफिसर के किरदार में अजय देवगन को आप पहले भी देख चुके हैं. इस तरह के किरदारों में उनका अभिनय दो एकदम अलग धुरी पर आपको लेकर जाता है. खलनायक को डराने के लिए ‘सिंघम’ में उनकी दहाड़ ही काफी है, जबकि ‘गंगाजल’ जैसी फिल्मों में उनका किरदार इस तरह के तेज़-तीखे प्रतीकों से बचते हुए अपनी जिद-अपने ढीठपने से ही खलनायकों को ज्यादा परेशान करता है. राजकुमार गुप्ता की ‘रेड’ में काफ़ी वक़्त बाद आपको इस दूसरे तरीके के अजय देवगन नज़र आते हैं, इसीलिए बखूबी भाते हैं; पर इस बार उनके सामने जिस कद्दावर अभिनेता को खलनायक के तौर पर खड़ा किया जाता है, उसकी अदाकारी का जौहर कुछ और ही रंग में ढल कर सामने आता है. फिल्म का दमदार लेखन भी जैसे नायक को छोड़ कर इस ‘रंग बदलते’ बुरे किरदार का दामन ख़ुशी-ख़ुशी थाम लेता है. ‘रेड’ में सौरभ शुक्ला अपनी अदाकारी के चरम पर हैं. शुरू से आखिर तक. हर बार. लगातार.


सत्य घटनाओं से प्रेरित, ‘रेड’ अस्सी के दशक के शुरुआती साल में देश के सबसे लम्बे चलने वाले (3 दिन) इनकम टैक्स छापेमारी की कहानी बयान करती है. 7 साल की नौकरी में 49 तबादलों का तमगा लेकर घूमने वाले आयकर अधिकारी अमय पटनायक (अजय देवगन) को ईमानदारी कुछ इस हद तक पसंद है कि दूसरे की पार्टियों में भी अपने ब्रांड की रम साथ लेकर जाते हैं. ‘वही पीता हूँ, जो खरीद सकूं’. पत्नी (इलियाना डी’क्रूज़) को ऐसी ईमानदारी से डर तो लगता है, पर अमय के लिए हौसले की खदान भी वही है. गुप्त सूत्रों के हवाले से, अमय को उत्तर प्रदेश के सबसे रसूख वाले बाहुबली सांसद रामेश्वर सिंह (सौरभ शुक्ला) के अकूत और अवैध कालाधन के बारे में पता चलता है, और वो पहुँच जाता है छापेमारी के लिए. कानून-पसंद, धीर-गंभीर और जिद्दी अमय के सामने है ताकत, सत्ता और धन के मद में चूर रामेश्वर सिंह, जिसके शुरूआती तेवर एक बार के लिए तो अमय में भी अपने गलत होने का संदेह पैदा कर देते हैं.

 

हालाँकि एक दर्शक के तौर पर आप भी बहुत पहले से जानते हैं कि ऊंट किस करवट बैठने वाला है? और शायद यही एक बात है जो ‘रेड’ को एक ‘पूरी तरह’ रोमांचक फिल्म होने से रोकती है; फिर भी रितेश शाह (‘पिंक’ फेम) का जबरदस्त लेखन और राजकुमार गुप्ता का उतना ही कसा हुआ निर्देशन फिल्म को कहीं भी भटकने नहीं देता. अमय और रामेश्वर सिंह जब भी आमने-सामने होते हैं, संवादों की झड़ी पुरानी फिल्मों के ‘डायलागबाज़ी’ वाले दृश्यों की याद जरूर दिलाते हैं, पर दोनों कलाकारों के सहज और संजीदा अभिनय फिल्म को कमोबेश वास्तविकता के करीब ही रखते हैं. बेवजह के दो गाने और रामेश्वर सिंह के परिवार के एक-दो दृश्यों को छोड़ दिया जाए, तो फिल्म धीमी होने के बावजूद मनोरंजन में कोई कसर नहीं छोडती. भ्रष्ट अधिकारी की भूमिका में अमित स्याल, मुंहफट दादी के किरदार में पुष्पा सिंह और सांकेतिक दृश्यों में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी का चित्रण खास तौर पर रोमांचित करता है. शुरू-शुरू में इलियाना जरूर महज़ रोमांटिक गानों में जगह भरने के लिए कहानी में शामिल की गयी लगती हैं, पर अजय देवगन के साथ कुछ भावुक क्षणों में उनका होना खलता नहीं. ऐसी भूमिकाओं में ‘शूल’ की रवीना टंडन फिर भी उनसे कहीं आगे हैं.

 

‘रेड’ एक बेहद कसी हुई फिल्म है, तकनीकी तौर पर भी और अभिनय की नज़र से भी. महज़ दो घंटे की फिल्म में, बंधी-बंधाई लोकेशन पर, बिना किसी तड़क-भड़क वाले ड्रामा के, लगातार मनोरंजक बने रहना, वो भी ऐसे कथानक के साथ जो किसी को भी आसानी से नाराज़ या अपमानित न करता हो; अपने आप में ही सफल होने के काफी आयाम छू लेता है. ये फिल्म सबूत है कि सौरभ शुक्ला कितने काबिल अदाकार हैं...और अजय देवगन कितने अच्छे हो सकते हैं, अगर गोलमाल जैसी फिल्मों के प्रभाव से दूर रह पाने का लोभ-संवरण कर पायें तो. जरूर देखिये...(3.5/5)        

Friday, 14 July 2017

जग्गा जासूस: गलतियों वालीं 'म्यूजिकल', रनबीर 'मैजिकल'! [4/5]

खलनायक का पीछा करते-करते अचानक से खेतों में खड़ा प्लेन मिल जाये, और आपको इत्तेफाक़न चलाना आता भी हो क्यूंकि आपने लाइब्रेरी में पढ़ा था; सामने गुण्डे बन्दूक ताने खड़े हों और आप नाचने लग जाएँ, इतना कि फर्श टूट जाये और आप निकल भागें; या फिर कि आप लकड़ी के बड़े से डार्टबोर्ड पर बंधे हों, ख़ूनी कातिल आप पर चाक़ू से निशाना साध रहा हो, और पहिये की तरह लुढ़कते-लुढ़कते वही डार्टबोर्ड नदी में नाव की तरह बहने लग जाये, जिंदगी इतनी आसान तो दादी-नानी की परी-कथाओं में ही होती है, या फिर कॉमिक बुक्स किरदारों के साथ. अनुराग बासु की 'जग्गा जासूस' इन दोनों ही खांचों में फिट बैठती है, पर इतनी ही आसान होते हुए भी, इतनी भी आसान फिल्म नहीं है. खास कर तब, जब उसके तकरीबन सारे ख़ास कलाकार अपनी बात गा कर कहते हों. 

हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में 'म्यूजिकल' फिल्में उन्हीं को कही जाती हैं, जिनमें 8-10 प्लेबैक गाने हों; पूरी फिल्म गीतों में और गीतों के जरिये ही बयान की जाये, हिंदी फिल्मों में कम आजमाया हुआ नुस्खा है. अनुराग इस तरह का प्रयोग करने की हिम्मत पूरे जोश-ओ-ख़रोश से दिखाते हैं, और इन हिस्सों में ख़ासा कामयाब भी रहते हैं, पर फिल्म की भटकाऊ कहानी और थकाऊ लम्बाई उनके इस जोश-ओ-ख़रोश को ठंडा कर देती है. देखने और सुनने में 'जग्गा जासूस' अनुराग की पिछली फिल्म 'बर्फी' की तरह ही बेहद खूबसूरत तो है, पर मिठास में कहीं न कहीं कम पड़ जाती है. 

जग्गा (रणबीर कपूर) अनाथ है, हकलाता है. बचपन में एक दिन उसने एक घायल आदमी को मरने से बचाया था, तब से वही (शाश्वत चैटर्जी) उसके पिता हैं. उन्होंने ही जग्गा को गा-गा कर अपनी बात कहना सिखाया. फिर एक दिन वो जग्गा को छोड़कर चले जाते हैं. अब साल-दर-साल जग्गा के जन्मदिन पर एक विडियो कैसेट भेजते रहते हैं, जिसमें जग्गा से कहने के लिए ढेर सारी बातें होतीं हैं और दुनिया भर की जानकारी. जग्गा अपने कॉलेज का जासूस है, शहर की छोटी-मोटी वारदातों में अपना दिमाग चलाता रहता है, ऐसे में जब एक दिन उसे उसके पिता के मौत की खबर मिलती है, साथ ही मिलती है उसे अपने पिता को खोजने की वजह भी. इस सफ़र में उसके साथ है श्रुति (कटरीना कैफ़)- एक ऐसी 'बैड-लकी' लड़की, जो कुछ ख़ास हालातों में ठीक जग्गा के पापा की तरह ही पेश आती है.  

जहाँ तक फिल्म को खूबसूरत दिखाने की बात है, सिनेमेटोग्राफर रवि वर्मन के साथ मिलकर अनुराग हरेक फ्रेम को एक तस्वीर की तरह पेश करते हैं, एक ऐसी तस्वीर जिसमें रंग जैसे छलक के बाहर आ गिर पड़ेंगे. तकरीबन 3 घंटे की फिल्म में शायद ही कभी आप फिल्म की ख़ूबसूरती को एक पल के लिए भी नज़रअंदाज़ कर पायेंगे. ऐसा ही कुछ रोमांच फिल्म की एडिटिंग भी दिखाती है, जब एक दृश्य से दूसरे दृश्य में जाने के लिए कई तरह के सफल प्रयोग बार-बार, लगातार किये जाते हैं. फिल्म को सही और सच्चे मायनों में 'म्यूजिकल' बनाने के लिए अनुराग की तमाम कोशिशों में 'सब खाना खाके दारू पी के चले गए', जग्गा का उसके पिता के साथ पहला दृश्य और 'तुक्का लगा-तुक्का लगा' जैसे दृश्य बेहतरीन हैं. दिक्कत तब आती है, जब फिल्म के दूसरे भाग में इस तरह के मजेदार (गाने में बातचीत) प्रयोग कम हो जाते हैं, और कहानी में भटकाव ज्यादा आ जाता है. इस हिस्से में इमोशन्स भी दूर-दूर ही मिलते हैं. 

अभिनय में, 'जग्गा जासूस' बिना शक रणबीर कपूर की सबसे मजेदार, मनोरंजक और बढ़िया अदाकारी वाली फिल्मों में शामिल होती है. गिनती में 'बर्फी' और 'रॉकस्टार' के ठीक बाद. हालाँकि उनके किरदार में एक वक़्त बाद एकरसता आने लगती है, पर परदे पर उनका करिश्मा तनिक भी कम नहीं पड़ता. एक-दो डबिंग की गलतियों को छोड़ दें, तो कटरीना यहाँ कम ही शिकायत का मौका देती हैं. जग्गा के पिता की भूमिका में शाश्वत चैटर्जी फिल्म में जरूरी ठहराव लेकर आते हैं और हर दृश्य में अपनी छाप छोड़ जाते हैं. सौरभ शुक्ला के तो कहने ही क्या! इस तरह की भूमिकाओं में एक तरह से महारत ही हासिल है उन्हें. 

आखिर में; 'जग्गा जासूस' को वेस एंडरसन और टिम बर्टन की फंतासी फिल्मों से अलग रखकर देख पायें, तो आपको बॉलीवुड में 'म्यूजिकल' बनाने की एक ईमानदार और दिलेर कोशिश नज़र आएगी, हालाँकि फिल्म कमियों से परे नहीं है. बच्चों की फिल्म में बड़ों के मुद्दे (अंतर्राष्ट्रीय हथियार व्यापार एवं तस्करी), बड़ों की फिल्म में बचकानी हरकतें; 'जग्गा जासूस' अगर दोनों का मनोरंजन भी बराबरी से करती है, तो दोनों को थोड़ा-थोड़ा निराश भी. [4/5]

Friday, 28 October 2016

शिवाय: एक्शन आहा, इमोशन स्वाहा! [1.5/5]

शिवाय’ में अजय देवगन एक ऐसे पिता बने हैं, जो अपनी बेटी के लिए कुछ भी कर सकता है. पहाड़ों से छलांग लगा सकता है. बुल्गारिया की पुलिस फ़ोर्स और रशियन माफिया से अकेले लड़ सकता है. मौत को भी पीछे छोड़ सकता है. इस पिता के प्यार पर अनुष्का (सायेशा सहगल, सुमीत सहगल की बेटी) इतनी फ़िदा है कि अजय के किरदार में अपने पिता को देखने लगती है, हालाँकि वो शिवाय में अपने पति को तलाश रही है. फिल्म के सबसे आख़िरी और जरूरी पलों में अनुष्का शिवाय के सामने है, “जिन लड़कियों को अच्छे पिता मिलते हैं. उनके लिए अच्छे लड़कों की तलाश लम्बी हो जाती है. ऐसा नहीं है कि लड़के मिलते नहीं, पर उन्हें तलाश किसी और की होती है.” इस पूरे वाहियात वाकिये का फिल्म के किसी इमोशन से कुछ लेना देना नहीं है, शायद इसीलिए अनुष्का आखिर में बात साफ़ भी कर देती है, “मुझे खुद नहीं पता, मैं क्या कह रही हूँ?” फिल्म का सबसे ईमानदार पल है ये. वाकई में किसी को कुछ भी पता नहीं, क्या हो रहा है? क्यूँ हो रहा है? जो हो रहा है, बस हो रहा है.

हाथ में चिलम पकड़े शिवाय (अजय देवगन) नंगे बदन बर्फ पर लेटा है. सैलानियों को बर्फीली चोटियों की सैर कराना काम है उसका. रोब-रुआब ऐसा, जैसे पूरा हिमालय उसी का है. खुद को भगवान् शिव से कम नहीं समझता. एक सैलानी जब पूछती है, “सिर्फ नाम ही है, या शिव जैसा और भी कुछ है?”, वो एक के बाद एक अपने बदन के सारे टैटू दिखाने लगता है. सैलानी बुल्गारिया की है. दोनों में प्यार होने की खानापूर्ति बर्फ़ खिसकने की एक दुर्घटना के बाद होती है. वोल्गा (एरिका कार) प्रेग्नेंट है, पर उसे बच्चा नहीं चाहिए. उसे बुल्गारिया लौटना है. शिवाय उसे जिस अंदाज़ में डिलीवरी तक रुकने और बच्चा दे कर जाने को कहता है, वो बहुत खौफनाक लगता है. वोल्गा जा चुकी है. गौरा (अबीगेल ईम्स) अपने पिता शिवाय के पास ही रहती है. घटनाएं तब करवट लेती हैं, जब गौरा को माँ के बारे में पता चलता है और वो बुल्गारिया जाने की जिद कर बैठती है.

गौरा बोल नहीं सकती, मुझे नहीं पता उसका बोल न पाना उसके किरदार को किस तरह प्रभावित करता है? ‘बजरंगी भाईजान’ में मुन्नी बोल नहीं सकती, इसलिए अपने बारे में ज्यादा कुछ बता नहीं सकती. यहाँ कहानी में इस तरह की कोई बंदिश नहीं है. वजह सिर्फ दो ही हो सकती हैं, एक तो क्यूंकि अबीगेल विदेशी हैं, उनकी हिंदी शायद इतनी अच्छी न हो, पर ऐसा होता तो कटरीना कैफ हर फिल्म में गूंगी ही होतीं. बची दूसरी वजह, दर्शकों को इमोशनली जोड़े रखने के लिये. 2 घंटे 52 मिनट में आखिर हर हथकंडा तो अपनाना ही है.

फिल्म में एक्शन देखने लायक है. बर्फीली चोटियों पर ट्रैकिंग के शॉट्स, बर्फ खिसकने का रोमांच और लम्बे-लम्बे ‘चेजिंग सीक्वेंस’! जिस जिस को भी हिंदी फिल्मों के एक्शन में ‘गुरुत्वाकर्षण’ के नियम की अनदेखी दिखती है, उनका इस फिल्म में पूरा ख्याल रखा गया है. यहाँ अजय गुंडों को मार कर हवा में तैराते नज़र नहीं आते, बल्कि यहाँ सब कुछ नीचे की ओर ही गिरता दिखाई देता है, किरदारों से लेकर कहानी में लॉजिक के इस्तेमाल तक. पहाड़ियों से छलांग लगाने में शिवाय को कोई झिझक या झंझट महसूस नहीं होती. वो कूदता है, गिरता चला जाता है, बीच-बीच में कलाबाजियां भी खा लेता है और नीचे पहुँचते पहुँचते खुद को संभाल भी लेता है. एक दृश्य में तो हेलीकाप्टर से गोलियों की बारिश हो रही है और शिवाय अपनी बेटी के साथ खुली सड़क पर आराम से भागा जा रहा है. चिलम की जरूरत अब हमें है.

अजय देवगन गंभीर अभिनेता माने जाते हैं. अपनी आँखों से ही वो काफी कुछ कर और कह जाते हैं. इस बार भी उनकी आँखें पूरी स्क्रीन पर कई बार ‘टाइट क्लोज-अप’ में खुलती-बंद होती हैं. एक बार तो उनकी आँखों का इस्तेमाल ‘INTERMISSION’ में ‘I’ की जगह पे भी हो जाता है, पर काश इतने से ही काम चल जाता! हाँ, एक्शन में वो पूरी जान लड़ा देते हैं. एरिका और सायेशा दोनों अपने-अपने तरीके से आपको कुढ़ने-चिढ़ने पर मजबूर करती रहती हैं. मुझे पता है, बच्चों को हमेशा ‘क्यूट और स्वीट’ कहना चाहिए, चाहे वो कितने भी बद्तमीज़ और आक्रामक क्यूँ न हो. अबीगेल परदे पर ‘‘क्यूट और स्वीट’ ही लगती हैं. उनका बोल न पाना उनके लगातार चिल्लाने का बहाना बन जाता है. सायेशा अपने पिता के नक्शेकदम पर ही हैं. सिर्फ डायलाग बोल देना, दो लाइनों के बीच एक ‘पॉज’ दे देना और काम ख़तम!

अंत में, ‘शिवाय’ आपके पैसे की बर्बादी नहीं है. आपका तो कुछ भी नहीं गया. बड़ा सोचिये, पॉजिटिव सोचिये. 120 करोड़ के साथ खिलवाड़ होते देखना भी अपने आप में कोई कम मजेदार खेल नहीं है. 300 रूपये खर्च कर के 3 घंटे ‘वातानुकूलित’ मल्टीप्लेक्स में बिताना भी किसी किसी के लिये फायदे का सौदा हो सकता है. [1.5.5]              

Friday, 14 August 2015

गौर हरी दास्तान- द फ्रीडम फ़ाइल: अच्छे-बुरे से परे, एक बेहद जरूरी फिल्म! [3/5]

कुछ कहानियों का कहा जाना ज्यादा जरूरी है, भले ही उनमें नाटकीयता की कमी साफ़ झलकती हो या फिर जिनमें जटिलता बिलकुल ही न के बराबर हो. अनंत नारायण महादेवन की ‘गौर हरी दास्तान’ ऐसी ही चुनिन्दा फिल्मों में से एक है जो अच्छे-बुरे से परे, एक बेहद जरूरी फिल्म है.  

आजादी के ६८ साल पूरे हो गए हैं, और इसमें तनिक संदेह नहीं कि आज हम इस आजादी का मोल आंकने में अक्सर चूक जाते हैं. फिल्म के शुरूआत में ही जब नायक [८० साल का एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी] एक सरकारी दफ्तर की धीमी लिफ्ट पे टिप्पणी करता है, “हम बहुत देर से नीचे नहीं जा रहे?”, सरकारी अफसर समझाता है, “अँधेरे में अक्सर दूरी ज्यादा लगती है”. देश की रुकी-रेंगती ढुलमुल व्यवस्था पर इससे अच्छा कटाक्ष नहीं हो सकता. वही अफसर अगले दृश्य में सहमते-झिझकते कह ही बैठता है, “कभी-कभी लगता है अंग्रेजों को वापस भेज के कहीं कोई गलती...”.

सत्य घटना पर आधारित ‘गौर हरी दास्तान’ एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के संघर्ष की कहानी है, जो अपने वजूद को साबित करने के लिए ३० साल से देश की लचर दफ्तरशाही से एक खामोश लड़ाई लड़ रहा है. बिना रुके, बिना थके. देश की आजादी की लड़ाई में अपनी भागेदारी साबित करने के लिए जिसे आज एक अदद सरकारी प्रमाणपत्र की दरकार है, पर सच की पहचान इतनी आसान कहाँ रही है? बचपन में ‘वानर सेना’ का सदस्य बनकर गुप्त सूचनाएं इधर-उधर पहुँचाने का काम कर चुके गौर हरी दास आज खुद एक दफ्तर से दुसरे दफ्तर चक्कर काट रहे हैं, और इज्जत करना तो छोडिये लोगों में हमदर्दी का रत्ती भर भी एहसास नहीं दिखता. क्या हो गया है हमारी संवेदनाओं को? कहाँ खर्च हो गयी हैं हमारे सामाजिक, मानवीय सरोकार की समझ?

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है इसकी सच्चाई और भोलापन, जो न सिर्फ गौर हरी दास के चरित्र में दिखता है बल्कि फिल्म की कहानी का भी अभिन्न हिस्सा है. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें [एक में गौर हरी दास गांधीजी से बात करते दिखाई देते हैं], तो फिल्म में बेवजह का ड्रामा ठूंसने की प्रवृत्ति से अनंत बखूबी बचते नज़र आये हैं. फिल्म का सबसे कमज़ोर पहलू भी दर्शकों के लिए शायद यही बने. फिल्म एक सधी, पर धीमी गति से आगे बढती है. बिलकुल साधारण से दिखने वाले दास की इस संघर्ष-गाथा में अटूट हौसले का रंग तो गहरा गाढ़ा है, पर इसे एक असाधारण प्रसंग बनाने में विश्वास की कमी साफ़ नज़र आती है.

मुख्य भूमिका में विनय पाठक कुछ ज्यादा ही कोशिश करते नज़र आते हैं. उनका हद से ज्यादा सीधा-सादा-सच्चा होना दिल को छूते-छूते रह जाता है. हालाँकि इस भूमिका को आत्मसात करने में पाठक कोई कसर नहीं छोड़ते. कोंकना सेन शर्मा ज्यादा देर परदे पर नहीं रहतीं, पर पूरी तरह प्रभावित करती हैं. दो टूक तीखे बोल बोलने वाले पत्रकार की भूमिका में रणवीर शौरी जमे हैं. तनिष्ठा चटर्जी एक आज़ाद ख्याल मॉडर्न पत्रकार के किरदार में अपनी दूसरी फिल्मों से अलग ही दिखती हैं. फिल्म के हर हिस्से में आपको छोटी-छोटी भूमिकाओं में ढेर सारे नामचीन कलाकार दिखेंगे, जैसे रजित कपूर, सौरभ शुक्ला, अचिंत कौर, मुरली शर्मा, मोहन कपूर और भरत दाभोलकर.

अंत में, अनंत महादेवन की ‘गौर हरी दास्तान’ आज के भारत में आजादी के मायने भूलती पीढ़ियों के लिए एक ऐसी फिल्म है जो न सिर्फ देश की चरमराती, सोई-सुन्न व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि एक ८५ साल के बूढ़े आम आदमी की अपने अस्तित्व को बचाए रखने की सतत कोशिश के साथ उम्मीद का एक सूरज भी जलता छोड़ जाती है.      

Friday, 19 December 2014

PK: Oh, My God! Year’s most entertaining Film! [5/5]

You can’t question religion. You can’t ask for logical explanations when it comes to one’s faith. We are not supposed to do that. We are not taught to do that. You have to be either an alien or an escapee from the nearest mental asylum. PK [played by the calculative risk-taker & a game-changer in many cases Aamir Khan] is one such rare genus. His level of indulgence with our worldly Gods is absolutely ‘out of this world’. His child-like innocence can bombard questions of all kind without giving you much time to think and react. He can also make you thunderstruck with his logical demonstrations about things you never bothered or rather apprehended to ask about. No doubt, he looks like a distant and conscientiously more intuitive cousin to Fungshuk Wangdu of 3 IDIOTS.  

‘PK’ is another gem of Rajkumar Hirani’s school of film-making where success can also be formulated by assimilating an unfussy entertainment of dramatic but simple nature & a ‘never gets preachy’ social message weaved in good humor and honest emotions. So when PK- the untainted innocent soul discovers people buying goods of their needs simply by exchanging a piece of paper with an old man’s picture [our very own ‘father of the nation] printed on it, he starts collecting every single poster & newspaper-cutting carrying his image. Next, we are made realize how we only respect the ‘financial’ worth and not the ‘moral’ values the man lived his life for.

‘PK’ also dares to question your blind-faith on forged Godmen from all religions. It’s high time we turn to humanity as our primary religious conviction rather than wasting our hard-money and the gifted wisdom to differentiate right from wrong on someone else’s phony tactics. As PK says in the film, the God who created us is very different from the ones we created. And the prayers we make through these age-old practices are nothing more than a ‘wrong number’ call.

The biggest strength of ‘PK’ is that it talks less and speaks more. There is hardly a scene where you don’t get thrashed by one or other social issues or expected human behavioral flaws in us; in a very subtle, explicable, logical and entertaining manner. The Bhojpuri texture to the lingo adds to it fervently and freely. It is one of the most sugary languages spoken across country; still very misinterpreted and wrongly portrayed and performed for Bollywood films. ‘PK’ also doesn’t do it flawlessly but certainly the respect is there. For a change, I am not offended this time!

Hirani and Abhijat Joshi’s taut and an almost flawless screenplay gives you ample hilarious as well as heartwarming moments. Anushka Sharma impresses with her sparkling presence very well translated into a lovely & lively character on screen. Saurabh Shukla and Boman Irani are efficiently likeable. Sushant Singh Rajput is charming and plays it cool, though is only for a shorter role. And who wouldn’t agree? The leading man leads like no one does better. Aamir is known to reinvent his acting abilities as well as the commercial cinema in India. This one takes his efforts to the next level. He gives us a multicolored paan-chewing character you will take home immediately.

And if could give you more about the film, I would be writing it hours in row. There is so much to cheer-so much to cherish; you wouldn’t mind it going twice in its first week. I am ready for the evening show. Till then; my only reaction to the film is if Bollywood is meant to follow the latest formula for recreating similar box-office success, are we going to see many more ‘PK’s in coming years? I am sure, the answer is negative. PK is outstanding! PK doesn’t come to us too often! Go; get a slice of it…NOW! [5/5]