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Friday, 7 September 2018

लैला मजनू: परदे पर जूनूनी इश्क़ के दौर की वापसी! [3.5/5]


इश्क़ में हद से गुजर जाने वाले आशिक़ अब कहाँ ही मिलते हैं? विछोह में पगला जाने वाले, इबादत में माशूक को ख़ुदा के बराबर बिठा देने वाले अहमकों की जमात लगातार कम होती जा रही है. ऐसे में, सदियों से सुनते-देखते आये मोहब्बतों के क़िस्से आज भी कुछ कम सुकून नहीं देते, शर्त बस ये है कि उन्हें पेश करने में थोड़ी सी समझदारी और सुनने में आपकी हिस्सेदारी ज़रा दिल से होनी चाहिए. साजिद अली की लैला मजनू फिल्मों में प्रेम-कहानियों के उस दौर को जिंदा करती है, जहां जूनूनी किरदारों के बग़ावती तेवर बेरहम दुनिया के जुल्म-ओ-सितम के आगे दम भले ही तोड़ दे, घुटने कभी नहीं टेकते. हालाँकि वक़्त-बेवक्त हीर-राँझा, रोमियो-जूलिएट और मिर्ज़ा-साहिबां जैसी अमर प्रेम-कथाओं पर तमाम हिंदी फिल्मों ने पूरे हक से अपनी दावेदारी दिखाते हुए दर्शकों को लुभाने की कोशिश की है, पर हालिया दौर में लैला मजनू शर्तिया तौर पर सबसे ईमानदार और यकीन करने लायक कोशिश कही जा सकती है. सदियों पुरानी कहानी को आज के सूरते-हाल में ढाल कर पेश करने में लैला-मजनू अगर पूरी तरह नहीं, तो ज्यादातर वक़्त तो कामयाब रहती ही है.        

कश्मीर के एक हिस्से में लैला (तृप्ति डिमरी) की ख़ूबसूरती के चर्चे आम हैं. लड़के ताक में रहते हैं कि कब लैला टिश्यू पेपर पर अपने होठों की लगी लिपस्टिक का निशान चस्पा करके, कार की खिड़की से बाहर फेंके और वो उसे लेने को जान की बाज़ी लगा दें. लैला के बारे में मशहूर है कि वो लड़कों को घुमाती है. एक नंबर की फ़्लर्ट है, पर असलियत तो ये है कि क्लास के बाद सहेली से पहले किस का हाल बड़ी बेसब्री से लिया जा रहा है. मजनू बनने से पहले हमारे मजनू को लोग कैस बट (अविनाश तिवारी) के नाम से जानते हैं. कैस भी कम नहीं है. एक नंबर का बिगडैल. अफवाह है कि उसके चक्कर में एक लड़की ने तो प्रेग्नेंट हो जाने पर दुबई जा कर जान दे दी थी. दोनों में कुछ तो है. पिछले जनम का न सही, बचपन का ही, मगर है कुछ तो. और उनके परिवारों में भी. दोनों के बापों में एक छटांक भी बनती नहीं. अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है कि दोनों की किस्मतों में इश्क़ का मुकम्मल होना शामिल नहीं है. लेकिन फिर, दुनिया की सबसे मशहूर प्रेम-कहानियाँ का अंजाम आखिर ख़ुशगवार कब रहा है!

लैला मजनू पर इम्तियाज़ अली की छाप साफ़ देखी जा सकती है. ऐसा होना लाजमी भी है, जब फिल्म इम्तियाज़ की कलम से ही निकली हो, और फिल्म के निर्देशक इम्तियाज़ के ही भाई हों. इम्तियाज़ जिस तरह फिल्म के मुख्य किरदारों को, अपने दिलचस्प संवादों से उनके ख़ास ताव और तेवर बख्शते हैं, किरदार एक अलग ही रौशनी में उभर कर आते हैं. लैला का पहली बार कैस से आमना-सामना हो, लैला का तेज़तर्रार बाग़ी रवैया या फिर फिल्म के आखिरी हिस्से में कैस का सूफ़ियाना लहजा; इम्तियाज़ हर दृश्य में अपनी बात जाना-पहचाना तरीका होने के बावजूद, एक नये-नवेले तौर से सामने रखते हैं. कैस के किरदार में अविनाश तिवारी को परंपरागत तौर पर नायक की छवि में देखना दर्शकों के लिए आसान नहीं होगा, इम्तियाज़ जान लेते हैं और शायद इसीलिए पहले ही दृश्य में उनके किरदार से साफ़ कहलवा देते हैं. “मेरी सूरत अच्छी नहीं है ना, इसीलिए मुझे स्मार्ट लगने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है. देखो, स्टेबल (हलकी दाढ़ी) भी रखा है. उनका ये डिफेंसिव मैकेनिज्म अविनाश के लिए सटीक बैठता है, फिल्म के आखिर तक आते-आते आप उनके, उनकी अदाकारी, उनकी दमदार आवाज़ के मुरीद हुए बिना रह नहीं पाते. मेरी ही तरह अब आपको भी याद आने लगा होगा कि अविनाश को पहले भी आप तू है मेरा संडे में सराह चुके हैं.   

लैला के किरदार में तृप्ति डिमरी के साथ भी ऐसा ही कुछ होता है. शुरू शुरू में आपको तृप्ति की लैला इम्तियाज़ की ही फिल्मों की दूसरी नायिकाओं, खास कर रॉकस्टार की नर्गिस फाखरी की याद दिलाती है. शायद इसलिए भी क्यूंकि दोनों के तेवर और लहजे में एक खास तरह की साझा बनावट है. नर्गिस की संवाद-अदायगी में अगर उनका हिंदीभाषी न होना हावी था, तो यहाँ तृप्ति को कश्मीरी लहज़े में बात करने की शर्त से गुजरना था. बहरहाल, तृप्ति रॉकस्टार में होतीं तो नर्गिस की हीर में कुछ इज़ाफा ही करतीं! सुमित कौल का किरदार शायद फिल्म का सबसे मेलोड्रमेटिक पहलू रहा, बावजूद इसके उनके अभिनय की तारीफ़ करनी होगी. बेंजामिन गिलानी और परमीत सेठी अच्छे हैं.  

लैला मजनू कश्मीर में अपनी कहानी गढ़ती है, और कश्मीर भी इस कहानी में ख़ूब रच-बस जाता है; सिर्फ बर्फीले मौसम, हरे घास की चादरों या चिनार के पत्तों तक नहीं, बल्कि फिल्म की पृष्ठभूमि से लेकर गीत-संगीत और कहानी की खुशबू तक में. हालाँकि इस कश्मीर से आतंकवाद, सेना के जवान और डर का माहौल बड़ी सफाई से नदारद हैं, पर बात जब मोहब्बत की हो रही हो, ऐसी चीजों को नज़रंदाज़ भी करना बेहतर ही है. हर तस्वीर में ग़ुरबत के रंग हों, जरूरी तो नहीं.

खैर, बॉलीवुड ने एक अरसे तक लैलाओं को बार-गर्ल और आइटम-गर्ल बना रख छोड़ा था, समाज और सरकारों ने मजनुओं को वैसे ही बदनाम कर रखा है; ऐसे में साजिद अली की लैला मजनू मुकम्मल तौर पर प्रेम-कहानियों की गिरती साख को ऊपर उठाती है. नाकाम इश्क़, ग़मगीन अंजाम और जूनूनी आशिक़; ये कहानी पुरानी ही सही, आज भी उतनी ही असर रखती है, बशर्ते आप दिली तौर पर तैयार हों. [3.5/5]               

Friday, 4 August 2017

जब हैरी मेट सेजल: पुराने इम्तियाज़- नए शाहरुख़ [3/5]

बॉलीवुड में रोमांटिक फिल्मों का एक आख़िरी बेंचमार्क तकरीबन 22 साल पहले आया था. तब से मुंबई के मराठा मंदिर में 'दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे' आज तक चल रही है. इस बीच 'चेन्नई एक्सप्रेस' और 'बेफ़िक्रे' जैसी बहुत सारी फिल्मों ने गाहे-बगाहे इस 'भारतीय फिल्म इतिहास की शायद सबसे चहेती रोमांटिक फिल्म' को अपने-अपने तरीके से परदे पर दोबारा जिंदा करने की कोशिश की है. कहना ग़लत नहीं होगा कि कमोबेश सभी ने फिल्म की रूह को समझने से ज्यादा, उसकी बाहरी चमक-दमक को ही अपना केंद्र-बिंदु बनाये रक्खा. 'जब हैरी मेट सेजल' के साथ, इम्तियाज़ अली अपना जाना-पहचाना, जांचा-परखा, सूफ़ियाना असर फिल्म की रूमानियत में घोल देते हैं, साथ ही वापस ले कर आते हैं रोमांस के बादशाह शाहरुख़ खान को उनकी अपनी ही दुनिया में, मगर इस बार एक अलग नए अंदाज़ में. 'दिलवाले दुल्हनियां ले जायेंगे' अगर इन 22 सालों में और बालिग़, और उम्रदराज़, और परिपक्व होने की किस्मत पा सकती, तो बेशक 'जब हैरी मेट सेजल' के आस-पास ही होती...सीरत में न सही, सूरत में जरूर! 

लन्दन के नौजवान मसखरे, दिलफेंक राज की जगह अब यूरोप के रूख़े, तुनकमिजाज़ और मुंहफट ट्रेवल-गाइड हैरी (शाहरुख खान) ने ले ली है. टूर ख़तम होने के साथ ही, उसके रंग बदलने लगते हैं. मीठा-मीठा बोलने वाला हैरी झल्लाहट में पंजाबी गालियाँ भुनभुनाता रहता है. अपनी बेपरवाही को चाशनी में लपेट कर लड़कियां पटाने की कोशिश नहीं करता, बल्कि पूरी अकड़ और तेवर से अपने 'गंदे' होने का ढिंढोरा पीट-पीट कर पहले ही आगाह कर देता है. और तब भी, अगर लड़की नज़दीक आने की कोशिश करे तो 'मत कर, मुश्किल हो जायेगी!' कहकर पीछे हट जाता है. हालाँकि देसी और विदेशी लड़कियों में उसका ये फ़र्क अब भी समझ से परे है, बावजूद इस वाहियात 'पुरुषवादी' सफाई कि 'तू चाइना वास की तरह है, एक जगह रख के देखते रहने के लिए'.

सेजल (अनुष्का शर्मा) भी सिमरन की ही तरह साफ़ कर देती है, 'मैं वैसी लड़की नहीं हूँ', पर इस बार उसे भारी दिक्कत 'स्वीट, क्यूट, ब्यूटीफुल, सिस्टर-लाइक' समझे जाने से है. सेजल सगाई की अंगूठी खोजने के बहाने कुछ और ही खोज रही है. शायद आज़ादी की सांस, जो अपनी ही फॅमिली बिज़नेस का लीगल एडवाइजर बन के नसीब नहीं हो रहा या फिर शादी के बाद जिसके खो जाने का डर बना हुआ है. हालाँकि यूरोप का 'यहाँ अंगूठी नहीं है, वहाँ चलो' वाला अबकी बार का ट्रिप, 'मैं इस बार ट्रेन मिस नहीं करना चाहती' वाले ट्रिप जितना मजेदार नहीं है, बल्कि कहीं ज्यादा झेला और झल्ला देने वाला है, इसमें कोई शक़ नहीं. 

शाहरुख़ के लिए रोमांस नया नहीं है, पर इस बार शाहरुख़ ज़रूर नए हैं. उम्र का असर सिर्फ परदे पर नज़र नहीं आता, एक गहराई के साथ उनके किरदार में भी समाया हुआ दिखता है. 'डियर जिंदगी' की तरह एकदम चौंकाने वाला तो नहीं, पर हैरी में शाहरुख़ के अन्दर का अदाकार काफी हद तक ज़मीनी और कम बनावटी नज़र आता है. अनुष्का भी बड़ी आसानी से और ख़ूबसूरती से अपनी भाव-भंगिमाएं बदल लेती हैं. तो फिर परेशानी क्या है? परेशानी है, कहानी. फिल्म की कहानी पानी के उस एक बुलबुले की तरह है, जिसके फूटने का इंतज़ार दर्शकों को ढाई घंटे तक कराना ही अपने आप में एक चुनौती है. उस पर से वही जानी-पहचानी, जांची-परखी इम्तियाज़ अली की दुनिया, जो एक तरफ तो फिल्म को अपने सूफियाना फलसफों से ठहराव भी बहुत देती है, पर इधर-उधर के तमाम दृश्यों की बनावट और सजावट में 'लव आजकल', 'रॉकस्टार' जैसी अपनी ही फिल्मों से उधार ली हुई लगती है. 

इम्तियाज़ अगर कहीं अपने आप को बेहतरी के लिये दोहराते हैं तो उस वक़्त जब उन्हें हैरी और सेजल के दरमियान आपसी नज़दीकियों के दृश्यों में कुछ बेहद खूबसूरत लम्हें कैद करने का मौका मिलता है, और ऐसे मौके फिल्म में दूर-दूर ही सही, मगर बहुत सारे हैं. खूबसूरत लोकेशन्स, बेहतरीन कैमरावर्क, गानों और बैकग्राउंड म्यूजिक के अलावा एक बात और जो काबिल-ऐ-तारीफ़ है, वो हैं फिल्म के संवाद. कुछ बातें मायनों के साथ कही जाती हैं, कुछ बातें कहने के बाद अपने मायने तलाशती हैं. 'जब हैरी मेट सेजल' लगातार बोलती रहती है पर जो कहना चाहती है, बड़ी समझदारी से अधूरा ही छोड़ देती है. 

आखिर में; 'जब हैरी मेट सेजल' की पूरी कोशिश परदे पर शाहरुख के उस करिश्माई शख्सियत को इम्तियाज़ अली की दुनिया से मिलाने की है, जिसे कभी यश चोपड़ा जी ने अपनी फिल्मों में निखारा-संवारा था. इम्तियाज़ आज के ज़माने के 'यश चोपड़ा' माने जाते हैं, पर एक अदद कमज़ोर कहानी की वजह से 'जब हैरी मेट सेजल' इस पूरी कोशिश को भले ही नज़रंदाज़ कर दे, शाहरुख़ को इस फिल्म में नज़रअंदाज़ करना मुश्किल है. [3/5]   

Sunday, 29 November 2015

TAMASHA: A Bioscope to life, and to your ‘self’ within! [3.5/5]

I dare not go any sentence further in approving Imtiaz Ali’s most personal artistic take on love, life and limitless conflicting conditions around the both, before having a word of strict advice for you that TAMASHA is not an easy watch. It neither is just another ‘boy-meets-girl’ love-story to write, shoot, edit and release. Only an Imtiaz Ali can helm the project of such risky, self-destructive and boomerang-like nature; and my suggestions here are heading towards Imtiaz Ali of today and not of pre-ROCKSTAR. If JAB WE MET and SOCHA NA THA were busy twisting the lighter side of love, if ROCKSTAR and HIGHWAY were falling for the darker region; TAMASHA is a multihued psychological exercise to reinvent, reestablish and renew your ‘self’ under mystically painful care and custody of love. TAMASHA is not an extravagant, star-studded, all flashy WIZCRAFT production of a celebrity world-tour but a cute, tiny, little bioscope which immediately transports you to the world of your dreams and your aspirations; where you’re the ‘Tamasha’ and not just a sitting idle spectator.  

In the very earliest scenes, Imtiaz makes Piyush Mishra playing an older than the old storyteller in the film mouth an exposition when he mixes up with two different stories of worlds poles apart, “toh pareshaani kya hai? The story is always the same. Do not fall for their names, places and other details. Just sit back and enjoy.” and that’s enough to hint you about the most predictable plot one can have for a love-story. Boy meets girl, on the beautiful locations in Corsica, France. They decide not to reveal their identities and be complete strangers to each other. Both part their ways. Four years down, the girl still in awe of the vibrant personality of the boy reaches to him. He is now succumbed to the all emotionless, motorized and mechanical race of the corporate world. The girl rejects the new bore. The dejected boy is now looking for a new end to his story. After all, it is never too late to start a fresh. Now as an easy entertainment seeker, you may voice a question that why always the same story, even the tagline on the posters suggests the same but then, I think TAMASHA was never about the story. It doesn’t take the easy route with over-simplified solutions to the monstrous-looking problems but decides to go on the ‘self-discovery’ mode to find some of the toughest answers only you and life can juice it out together.

There are more than a couple of reasons when I call Imtiaz the new-age ‘Yash Chopra’. The way he makes it happen, the way he breaks into the susceptible space of separation and the way he paints the pain, is meticulously relatable, unswerving and apt. He hardly creates a situation; he just opens up another unseen layer buried deep within his characters. Apart from the dialogues that rarely sound anything written, scrumptious camerawork, soul-pleasing soundtrack by A R Rahman and imaginatively decorated lyrics by Irshad Kamil, TAMASHA marks towering performances from both the leads. Though the film belongs more to Ranbir Kapoor’s character in the central role, let me honor Deepika Padukone first to talk about. The cranky, complaining independent girl of PIKU here shows off her complete different avatar in a more edgy, persuasive and in pain character of an anxious lover. You don’t have to make an extra effort to notice some of her atypical expressions you sure haven’t seen anywhere else. If she effortlessly makes your heart bleed in ‘Agar Tum Saath Ho’, she also steals it with her sparkling eyes even while being utterly there in playful conversations with Ranbir.  And now the boy himself! TAMASHA brings back Ranbir in the race. The inconsistent ‘velvet’y touch is forgiven and forgotten. The all new and fresh Kapoor shifts gears like a pro. The bathroom scene, the story-telling session at home, the apology scene; there are moments that will haunt you even after full night sleeps in the next couple of days. Undoubtedly, one of the best performances this year!

Despite going into a self-pleasing theatrical mode and uncommonly imprecise scenes of creative satisfaction, Imtiaz earns full marks on taking the risk most of the filmmakers today hesitate. Otherwise, who would dare to compose scenes with profile shots of the leads when they are busy sporting the most unforced yet intricate emotions on their face? TAMASHA is not flawless. TAMASHA is not regular. TAMASHA is inspiring. TAMASHA is mesmeric. TAMASHA is a journey you should take at least once in a lifetime to make it all right you couldn’t dare all these years. [3.5/5]     

Friday, 4 July 2014

LEKAR HUM DEEWANA DIL: Escape this downgraded version of SOCHA NA THA! [1.5/5]

If Bollywood films are to be believed, everyone in love is predestined to elope from their wedding-mandaps at the very last moment when Pheras are to be performed. Events of similar nature do happen in real life, it’s just I haven’t been lucky enough to witness any such in my whole life of more than 30 years. But one thing I am very sure about…I have seen romantic comedies like Arif Ali’s LEKAR HUM DEEWANA DIL for more than I could remember. One prominent inspiration here is SOCHA NA THA, the launch-pad of writer-director Imtiaz Ali who incidentally also happens to be Arif’s brother. The similarities and likenesses are so evident; LEKAR HUM DEEWANA DIL could & should be tagged as a SOCHA NA THA rip-off, but an awful one. It’s an extremely long-boring-escapable journey no one will like to hop on.

The ‘BFF (Best Friends Forever)’ duo Karisma & Dino [Newcomers Deeksha Seth & the Kapoor-clan Arman Jain] are often teased as a couple by their common friends. In a hasty & impulsive pronouncement of love and the passion of being together, they decide to elope as Karisma’s hardcore traditional father would marry her off to any boring guy of his choice and for Dino’s father; Dino is nothing but a plain nobody. Together, they take a ride that is hardly any exciting and too superfluous to find a place in your heart. Much later, just on the verge of interval; they realize the honeymoon period is over and the romantic fairytale is nowhere to be found. Follows the process of annulment of their marriage, parental participation to make things even bitter and finally, the weirdly convenient realization of love for each other! Oh, not again!

Romantic comedies are the safest options to mark a début in Bollywood, and probably the hardest ones too. What one expects from any such effort are a thicken chemistry between leads, freshness in the plot and relatable drama to clinch your emotions at its place. Sadly, Arif as a writer-director doesn’t even try to look any different and gets hugely dependent on his brother’s flicks like SOCHA NA THA [parental angle], JAB WE MET [Stopover at small city] & even COCKTAIL [For most of styling and dialogues] for so-called inspirations. Only addition here that had slightest of promises was their accidental encounter with naxalites of Bastar & Dantewada. Disheartening to say that even this sequence ends up mocking their fight to justice & freedom in a completely ham-fisted item number!

Arman and Deeksha both look confident and do succeed in creating some very good moments to rejoice but the staleness in writing kills it all. Of the supporting cast, most are just wasted and that included veterans like Kumud Mishra, Rohini Hattangadi and Varun Vadola. A R Rehman’s music soothes the soul in between all the baffling scenes haphazardly coming one after the other but it never rules the heart. You’ll find it hard to remember all the ‘Khaleefas’ and ‘Tu Shinings’ sooner or later.

To sum up, LEKAR HUM DEEWANA DIL suffers from a time-lapse syndrome. Had it come in late 90’s when uber urban generation was gaining the spot with a certain lingo full of slangs, strong urge to reinvent new dimensions to the term ‘new-age’ and a demand of change in cinema, it would have made a clean mark. As of now, it is just another forgettable love-story! Escape it! [1.5/5]

Friday, 21 February 2014

HIGHWAY: An Imtiaz Ali film that is so not Imtiaz Ali Film! It’s different!! [3.5/5]

Expectations lead us to disappointments, by and large. But with Imtiaz Ali’s HIGHWAY, it is us who fall short of what to expect from this modern-age master of romance. Imtiaz is known to dig up diverse human relationships in order to drench us in the most vigorous and spirited emotions one can feel. HIGHWAY is no exception in substance but definitely in its approach. Through this journey of love, longings & togetherness in just not-so-feasible settings, Imtiaz dares to push his boundaries as a filmmaker and comes up with a love-story much darker, edgier and better than his bests.

Loosely based on ‘Stockholm syndrome’ where victim starts feeling compassionate, concerned, considerate and connected to offender’s sufferings that come as baggage from times of yore and drive him to perform such crimes, HIGHWAY brings two damaged souls troubled with their respective haunting pasts closer. Just a couple of hours before her wedding, Veera [Alia Bhatt as a revelation] accidently gets abducted by a murderous gang of goons largely dealing in petty illegal practices of land-grabbing & mugging on highways. Realizing the fact that the father is a hot-shot industrialist having his connections rooted in powerful politics and that their unplanned abduction could turn things on their own; they, especially the leading man here cold-hearted Mahavir Bhati [Randeep Hooda proving his comfort, ability and confidence in playing the character] decides to stick with the plan. Not knowing where it could get them both, starts the road-trip through scenic, rustic, mystic locales of North India.

Fans would agree that Imtiaz’s films have always been loud about life’s very existence despite its own flaws and imperfections but here silence speaks more. So, most of the times all you hear is submissive background score by AR Rahman filling in to the subjective road-shots captured from behind the front glass of the truck. Characters here have deeper secrets from pasts. Veera is a victim of incestuous child abuse. Mahavir has seen a tormented childhood where his father would throw his mother into sexual favors to his rich & powerful master. Sure you haven’t expected all that in an easygoing Imtiaz Film. Sure you wanted to get entertained with all candy floss romance and not some harsh reality that speaks how women are unsafe even if they are in considerably the most secured place for them called home. So, disappointment comes easy for you.

What you can not have any iota of uncertainty on is the performances. Alia Bhatt is a surprise packet of the film. The presence, effortlessness, confidence she shows is extremely rare for anyone who’s just one film old in the line of work. She’s beautiful and she acts the same way. Randeep Hooda sinks his teeth into the rugged, rigid, vigorously ferocious character of Mahavir. Watch him in his final outburst as he hesitates to go on the crossroad that could either take him to a better world filled with love & affection or could throw him back in the pit of crime and hatred.

Breathtaking visuals, grasping soundtrack, juicy dialogues and performances that will never leave you alone even after leaving the theatre; HIGHWAY has it all but not for all. With the portions with docu-drama style of shooting, extended shots, rhythmic travelling footage, reduced usage of dialogues; it is not an easy film to watch. It’s different. It’s dark. It’s one of those that add up your expectations. I am all excited to see what next Imtiaz Ali could come with! Recommended! [3.5/5]