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Friday, 16 June 2017

बैंक चोर: 'धूम' से धड़ाम, उबाऊ और नाकाम! [1.5/5]

बैंक में बाबा, हाथी और घोड़े घुस आये हैं. ठीक वैसे ही, जैसे देश की राजनीति में योगी, गाय और भैंस. उथल-पुथल तो मचनी ही है; पर राजनीति की तरह ही यहाँ भी 'बैंक चोर' वादे तो बहुत सारे करती है, पर जब निभाने की बारी आती है तो बचाव की मुद्रा में इधर-उधर के बहाने ढूँढने लगती है, रोमांच के लिए झूठ-मूठ का जाल बुनने लगती है और अंत में 'जनता की भलाई' का स्वांग रचकर अपनी सारी गलतियों पर काला कपड़ा डाल देती है. चतुर, चालक और चौकन्ने चोरों पर यशराज फ़िल्म्स 'धूम' के साथ पहले ही काफी तगड़ी रिसर्च कर चुकी है. सरसरी तौर पर देखा जाये, तो 'बैंक चोर' उसी रिसर्च मैटेरियल की खुरचन है, जो उन तमाम 'चोरी' वाली फ़िल्मों का स्पूफ़ ज्यादा लगती है, ट्रिब्यूट कम. 

चम्पक (रितेश देशमुख) अपने दो दोस्तों के साथ बैंक लूटने आ तो गया है, पर अब उसके लिए ये खेल इतना आसान रह नहीं गया है, ख़ास कर तब, जब बैंक के बाहर सीबीआई का एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अमजद खान (विवेक ओबेरॉय) खुद कमान थामे खड़ा हो. खान को शक है कि शहर की दूसरी बड़ी चोरियों के पीछे भी इन्हीं चोरों का हाथ है, हालाँकि इन मसखरे चोरों की बेवकूफ़ाना हरकतों से ऐसा लगता तो नहीं. चोर-पुलिस और सीबीआई की इस पूरी गुत्थम-गुत्थी में, गिरना-पड़ना, दौड़ना, चीखना-चिल्लाना इतना ज्यादा है कि हंसने के लिए भी मुनासिब जगह और वक़्त नहीं मिलता. साथ में, उल-जलूल हरकतों का ऐसा ताना-बाना कि बोरियत आपको अपनी गिरफ्त में लेने लगती है. और तभी कुछ ऐसा होता है, जो आपकी सुस्त पड़ती बोझिल आंखों और कुर्सी में धंसते शरीर को वापस एक जोर का झटका देती है, परदे पर इंटरवल के साथ ही साहिल वैद्य की एंट्री. बैंक में मौजूद असली चोर के रूप में. 

फिल्म के निर्देशक बम्पी कहानी का सारा ट्विस्ट फिल्म के आखिरी हिस्से के लिए बचा के रखते हैं, मगर वहाँ तक पहुँचने का पूरा सफ़र अपने नाम की तरह ही उबड़-खाबड़ बनाये रखते हैं. फिल्म में सस्पेंस का पुट डालने के लिए वो जितने भी तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, वो सारे के सारे आजमाए हुए और पुराने ढर्रे के हैं. साहिल वैद्य की एंट्री इस हिसाब से और भी कारगर दिखने लगती है, जब इशिता मोइत्रा के संवाद अब फिल्म के बाकी हिस्सों के मुकाबले ज्यादा सटीक, मजेदार और रोचक सुनाई देने लगते हैं. साहिल फैजाबाद, उत्तर प्रदेश के एक ऐसे चोर की भूमिका में हैं, जो लखनवी अदब और आदाब का लिहाज़ करना और कराना बखूबी जानता है. तू-तड़ाक उसे जरा भी पसंद नहीं, और दादरा का ताल उसे गोली लगे बदन से रिसते लहू में भी साफ़ सुनाई देता है. 'नए-नए बिस्मिल बने हो, तुम्हें रस्म-ऐ-शहादत क्या मालूम?' जैसी लाइनें और इन्हें चेहरे पर मढ़ते-जड़ते वक़्त, जिस तेवर, जिस लहजे का इस्तेमाल साहिल अपनी अदाकारी में करते हैं, उन्हें फिल्म के दूसरे सभी कलाकारों से आगे निकलने में देर नहीं लगती. फिल्म अगर देखी जा सकती है, तो सिर्फ उनके लिए.

विवेक तो चलो अपने रोबदार किरदार के लम्बे-चौड़े साये में बच-छुप के निकल लेते हैं, पर 'बैंक चोर' रितेश देशमुख के लिए एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर जाती है, "क्या कॉमेडी में रितेश का जलवा सिर्फ सेक्स-कॉमेडी तक ही सीमित है?" साफ़-सुथरी कॉमेडी होते हुए भी, रितेश यहाँ भी वही आड़े-टेढ़े एक्सप्रेशन चेहरे पर बनाते रहते हैं, जो 'क्या कूल हैं हम' जैसी फिल्मों में उनका ट्रेडमार्क मानी जाती हैं. फिल्म के एक बड़े हिस्से तक उनका किरदार न तो हंसाने में ही कामयाब साबित होता है, न ही इमोशनली जोड़े रखने में. आखिर तक आते-आते उनके लिए स्क्रिप्ट में सब कुछ ठीक जरूर कर दिया जाता है, पर तब तक देर बहुत हो चुकी होती है. बाबा सहगल अपनी मेहमान भूमिका से फिल्म में थोड़ी और दिलचस्पी बनाये रखते हैं, पर बेहद कम वक़्त के लिए. 

आखिर में; 'बैंक चोर' उन बदनसीब फिल्मों में से है जो पन्नों पर लिखते वक़्त जरूर मजेदार लगती रही होगी, पर परदे पर उतनी ही उबाऊ और पूरी तरह नाकाम. मशहूर शेफ हरपाल सिंह सोखी फिल्म में बैंक-कैशियर को सलाह देते हुए अपनी चिर-परिचित लाइन दोहराते हैं, "स्वाद के लिए थोड़ा नमक-शमक डाल लीजिये'; इस फ़ीकी फिल्म के लिए भी मेरी सलाह वही रहेगी. [1.5/5] 

Friday, 15 July 2016

ग्रेट ग्रैंड मस्ती (A): एक बचकानी एडल्ट कॉमेडी, आपके ‘उस’ व्हाट्स ऐप ग्रुप के लिए! [1/5]

बॉलीवुड में फिल्म-प्रमोशन का दौर एक ऐसा जादुई वक़्त होता है, जब फिल्म से जुड़े तमाम लोगों में अचानक ‘दैवीय ज्ञान’ का संचार होने लगता है. अपनी फिल्म को अच्छी बताने और बता कर बेचने में मैंने अक्सर बड़े-बड़े ‘सिनेमा-विशेषज्ञों’ को गिरते देखा है. खैर, ‘इट्स ऑल पार्ट ऑफ़ द जॉब’. हालाँकि ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ को बेचते हुए निर्माता-निर्देशक इन्द्र कुमार काफी हद तक सच के साथ खड़े दिखते हैं. उनका कहना है, “अगर हम एडल्ट जोक्स आपस में कह-सुन सकते हैं तो परदे पर एडल्ट कॉमेडी क्यूँ नहीं”. दुरुस्त, पर दुर्भाग्य ये है कि इन्द्र कुमार साब एडल्ट कॉमेडी के नाम पर उन्हीं बासी, घिसे-पिटे एडल्ट जोक्स को बार-बार हमारे सामने परोसते हैं, जिन्हें हम और आप अपने ‘व्हाट्स ऐप ग्रुप’ में पढ़ते ही डिलीट कर देते हैं. सिनेमा डिलीट नहीं होता. और अगर ये सिनेमा है तो काश सिनेमा डिलीट हो सकता! ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ एक उबाऊ, पकाऊ और झेलाऊ फिल्म है, जहां हंसाने के नाम पर बद्तमीजियां ज्यादा होती हैं और फूहड़पन हर तरफ बिखरा पड़ा है.

मस्ती’ अगर बॉलीवुड में एडल्ट कॉमेडी के एक नए दौर की शुरुआत थी तो ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ को अंत मान लेना चाहिए, क्यूंकि इसके आगे अब बस ‘पोर्न’ ही बचता है. ऐसा नहीं है कि मैं पोर्न फिल्मों के खिलाफ़ हूँ पर तब वो खांटी तौर पर एक नया मुद्दा होगा बहसबाजी और अवलोकन के लिये. एडल्ट कॉमेडी में अक्सर द्विअर्थी कहावतों और ‘वन-लाइनर्स’ की भरमार होती है. ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ में द्विअर्थी कुछ भी नहीं. यहाँ सबका मतलब साफ़ और एक ही है. फिल्म में अगर ‘मेरा खड़ा है’, ‘इसका छोटा है’, ‘मुझे करना है’ जैसे संवाद बोले जाते हैं, तो दादा कोंडके साब की तरह उन संवादों के आगे-पीछे किसी तरह को कोई एक्सप्लेनेशन जोड़ कर आपको चौंकाया नहीं जाता, बल्कि उनका सीधा मतलब आपके शारीरिक अंगों और यौन-क्रियाकलापों की तरफ ही होता है. जाहिर है, इसमें हँसी आने की कहीं कोई गुंजाईश नहीं बचती. बात सिर्फ संवादों तक ही रुक जाती तो गनीमत होती, यहाँ तो लेखक और निर्देशक उन तमाम अंगों-प्रत्यंगों को ‘कुचलने, काटने, कूटने’ तक पर उतर आते हैं. और हम लोग अनुराग कश्यप को सबसे ‘हिंसक’ फिल्म-निर्देशक का तमगा देने पर आमादा है, कैसी विडंबना है!

अमर, प्रेम और मीत [रितेश, विवेक और आफ़ताब; मुझे फर्क नहीं पड़ा कि किसका क्या नाम है] अपने-अपने वैवाहिक जीवन में ‘सेक्स-सुख’ न मिलने की वजह से ‘बाहर की बिरयानी’ खाने का मन बना चुके हैं. प्लान के मुताबिक तीनों रितेश के गाँव उसके वीरान बंगले को बेचने की नीयत से आते हैं. इस वीरान बंगले में एक भूत का कब्ज़ा है, भूत वो भी हद्द खूबसूरत [उर्वशी रौतेला] और 50 साल से मर्दों के लिए प्यासी. आप सोच रहे होंगे, टेंशन क्या है? पर नहीं, पहले तो ये तीनों भूखे भेड़िये (उनकी एक्टिंग देख कर तो कम से कम ऐसा ही लगता है) आपस में ‘मे बेस्ट मैन विन’ की रेस लगाने लगते हैं और बाद में भूत की शर्त. कुल मिलाकर आपको 2 घंटे 10 मिनट तक बेवकूफ बनाये रखने का पूरा इंतज़ाम यहाँ मौजूद है. कहने की बात नहीं है कि अंत में सारे मर्द ‘लौट के बुद्धू घर को आये’ और ‘सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते’ जैसे कहावतों की बिला पर साफ़ बरी हो जाते हैं.

अभिनय की नज़र से ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ एक बहुत जरूरी फिल्म है, उन लोगों के लिए ख़ास जिन्हें परदे पर कभी न कभी इंसानों के पूर्वजों की भूमिका करने में दिलचस्पी रही हो. ‘फैरेक्स-बेबी’ आफ़ताब इस लिहाज़ से काफी मजबूत कलाकार हैं. उनकी उछल-कूद देखकर मन में कोई दुविधा नहीं रह जाती. विवेक थोड़े पीछे रह जाते हैं. रितेश इस तरह की भूमिकाओं में ‘पदमश्री’ लेकर ही मानेंगे. उर्वशी रौतेला गानों में अपना जौहर ज्यादा बखूबी से पेश करती हैं, अभिनय में उनका सफ़र अभी काफी लम्बा और काटों भरा है. उषा नाडकर्णी और संजय मिश्रा पर हँसी कम, तरस ज्यादा आता है. फिल्म का सबसे दमदार दृश्य मेहमान भूमिका में सुदेश लाहिरी के हिस्से आता है, जहां वो रामसे ब्रदर्स और उनकी तमाम भूतिया फिल्मों पर छींटाकशी करते नज़र आते हैं. दिलचस्प बात ये है कि वो खुद उन्हीं फिल्मों के ‘लालटेन वाले चौकीदार’ की भूमिका में हैं.

ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ के एक मार-धाड़ वाले दृश्य में एक आदमी उड़ता हुआ मशहूर पेंटर Vincent van Gogh की पेंटिंग के ऊपर आ गिरता है. कला और सिनेमा पर ये फिल्म उसी तरह का एक निर्मम प्रहार है. इनका बंद होना तो नाजायज़ और नामुमकिन है; उम्मीद करता हूँ इन पर हंसने वालों की तादात थोड़ी कम हो. बहरहाल, मस्ती के नाम पर ये है एक गन्दी, सस्ती और बचकानी फिल्म! [1/5]    

Friday, 1 November 2013

KRRISH 3: Unimaginative, unoriginal, borrowed and a bigger disappointment! [2/5]

If you heard something like, “agar mera yeh experiment kaamyaab ho gaya, main yeh-main woh…” you should never be in doubts that you are watching a science-fiction movie (…from Bollywood ofcourse). But thrice?...in the whole 2 hour 33 min of duration filled with inspired yet uninspiring visual effects?? Really?? Then sure you ought to have your uncertainties on gravity of the skilled writing.

In other scene, when a superhero supposedly killed by the evil returns inexplicably or rather in a scientific breakthrough too suitable to sound plausible, a kid confronts the shocked & shaken baddie played by Vivek Oberoi as, “kyun? Phat gayi kya?”. Well, the audience laughed but I couldn’t as if we really want our kids to grow in such shape. Though eventually it is a family entertainer, Rakesh Roshan’s KRRISH 3 can’t be declared sole responsible for that but definitely for being least original, least entertaining & for shamelessly taking cues from the past hits of the west. On one hand, Sr. Roshan tries to woo you with extensive visual effects never seen before in India, but also never lets his gluttony go off to encash the Indian sentimental spree. So, the plot goes for the toss in order to swing aimlessly between the both!

Krishna (Hrithik Roshan in a tailor-made role) is trying his hard to balance his life in Mumbai with his father Rohit (Jr. Roshan again in a comparatively more charming role) & wife Priya (Priyanka Chopra in a regular), between his normal routine and the disappearing ‘superhero’ acts as Krrish to save people’s lives. Meanwhile, an evil mind named Kaal (Vivek Oberoi in a menacing character interestingly modeled on the similar lines of Sir Juda in Subhash Ghai’s KARZ) is busy creating an army of MAANVARs (Mutants from the fusion of humans with animals) to rule the world and regain his powers. Rest is all about how the two clash & collide with their own set of intentions to destroy buildings, demolish towers and make people (especially viewers more than the ones on screen) suffer not only physically but mentally and emotionally too.

Theoretically, a superhero movie needs an upper hand on the VFX front. KRRISH 3 fulfills that basic rule by creating some of the unseen effects in Indian cinema but ‘is that enough’ is the biggest question. There is not one single action/ VFX sequence in the film that comes with an ‘original’ tag…and I bet if you can show me at least one! I wish if the team of writers would have sit more on the plot to make it inspiring rather than deciding on what all effects we can borrow from Hollywood Hits to thrill the audience! KOI MIL GAYA has proved in the past that if incorporated smartly in the plot, even the emotional quotient would work as a strong share of interest, but sadly here in KRRISH 3 it was all done just for the sake of it. Novelty is gone already and now the sensibility too.

On the performance side, there is no second thought on Hrithik being the crowd puller. He maintains the level he has achieved. He charms you with his intensity, his ability and his skills as a complete performer. Vivek as Kaal is strictly average. Kangna as his one of the mutants has an interesting role to pull out. She is poised. She is confident. She is promising. Priyanka Chopra incidentally has nothing new to surprise.

In an advanced world of technology, where even kids have opened all the possible windows to access latest landmarks in the said field, I am not very sure if KRRISH 3 would be able to make it to their appreciation. It only makes you believe in an unsaid rule that medium can never rule out the message, especially if it is borrowed, clichéd, corny, tacky and unimaginative. Think twice before buying your tickets! [2/5]  

Friday, 13 September 2013

GRAND MASTI: Cheap, disgusting, offensive, insensitive & a must if you think from your lower abdominal parts [0/5]

Why on earth do Bollywood adult-comedies have to have double-meaning dialogues that fall only for one intended meaning? And why on earth do writers for such sleazy entertainers have to use their boneless part of lower-abdomen area to think and not the obvious upper part primarily called as mind?
Well, if sex-comedies are like classic ALIEN series, Indra Kumar’s adult-comedy GRAND MASTI is Shirish Kunder’s JOKER. Both have common ingredients to offer viewers a good platter of entertainment but are still very divergent in recipe and in taste. The former is cheap, shameful, lousy, crappy, distasteful, disgusting, mean, offensive and everything else but funny.

Sequel to MASTI- the 2004’s surprise hit, GRAND MASTI revisits the dull, boring & ‘suck sex’ful married lives of Meet (Vivek Oberoi), Prem (Aftab Shivdasani) and Amar (Ritesh Deshmukh). Their wives are busy in everything around; from serving extended families non-stop like an adarsh- bahu to working late at boss’s place for better future & also in baby-sitting but all they ignore unpretentiously is the sexual desires [I can use the term ‘lost love in marital lives’ to be sober but trust me the film itself didn’t talk of it even in suggestion] of their husbands, as if that is the last thing on earth to stay alive. So, the trio seeks the alternate means of pleasure in their college reunion with barely clad sex-sirens sickeningly named as Rose, Mary & Marlow to be pronounced later in exact order for at least 60-70 times till you start hating such beautiful names.

I widely understand the need of below-the-belt jokes in any adult-comedy but the situation goes horribly wrong, monotonous & unbearable after a while when makers decide to stay there and there only to tickle I don’t know what bones of yours but certainly not the tickling one. So, you have weird sex-driven word-plays in every second sentences characters speak, old tasteless adult jokes getting re-enacted, forceful body-show and sequences literally hitting on every private part of human body. It goes on and on like the flat, flavorless rubber in your mouth [Chewing gum, I mean].

Also, there are times when it turns so absurd-so ridiculous you don’t want to look at the screen. Well, even these things you can take for granted in the name of entertainment but how can you not be sensitive or apologetic about offensive sequences where women & kids are being treated as a substance of pleasure without showing any love, respect or care for that matter. In one of scenes, Amar (Ritesh Deshmukh) blatantly curses his cutely adorable kid with a gesture like ‘kaash maine uss din nirodh ka virodh na kiya hota!’ and later offers him to a burglar to get rid of him. Painful!

There are no reasons that can justify its viewing except you are a sex-starved, low-IQed, male chauvinist who sees women as sex-object & doesn’t love/care/respect even their ladies at home. I regret watching it and very sorry as I didn’t think I would be also reviewing a soft-porn someday. Watch it at your own risk! [0/5]