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Friday, 12 July 2019

सुपर 30: हृतिक की मेहनत को ‘जीरो’ करता फिल्मी फ़ार्मूला [2/5]


दिहाड़ी में 3 रूपये रोज बढ़ाने की मांग करने वाली दलित लड़कियों की बलात्कार के बाद हत्या होते हम पिछले हफ्ते ही ‘आर्टिकल 15’ में देख चुके हैं. जातिगत भेदभाव के बाद, इस हफ्ते बॉलीवुड के निशाने पर है शिक्षा के क्षेत्र में आर्थिक रूप से पिछड़े होनहार छात्रों के साथ हो रही नाइंसाफ़ी. ऊंची जात और नीची जात के बीच की खाई से कम गहरा नहीं है अमीर और गरीब के बीच का फ़र्क. दोनों फ़िल्में अपना कथानक अखबारों की सुर्खियों और असल ज़िंदगी की घटनाओं से उधार लेती हैं, पर एक बड़ा अंतर जो इन दोनों को लकीर के बिलकुल आर-पार, आमने-सामने खड़ा कर देता है, वो है फ़िल्म बनाते वक़्त कहानी और उसके कहे जाने के पीछे के मकसद के साथ बरती जाने वाली ईमानदारी. ‘आर्टिकल 15’ कहानी में कोई एक नायक खोजने या बनाने के फ़िज़ूल चक्करों में नहीं फंसती, जबकि ‘सुपर 30 एक ख़ालिस दमदार नायक होने के बावज़ूद, कहानी में नायक गढ़ने के लिए जबरदस्ती के ताने-बाने बुनने में अपनी सारी अक्ल खर्च कर देती है. ये कुछ उतना ही बड़ा जुर्म है, जैसा राजकुमार हिरानी ‘संजू बनाते वक़्त कर बैठते हैं. ‘सुपर 30 में ड्रामा है, एक्शन है, इमोशन है, गीत-संगीत भरपूर है, पर सब का सब बड़ी सफाई और सहूलियत से कहानी में ठूंसा हुआ. ठीक वैसे ही जैसे फिल्म में हृतिक का किरदार अपनी गर्लफ्रेंड के चेहरे को ख़ूबसूरती के गणितीय-सूत्र से मापता फिरता है.


आर्थिक स्तर पर तंगी से जूझता आनंद कुमार (हृतिक रोशन) अप्रत्याशित तौर से मेधावी है. पैसों की कमी ने न सिर्फ कैंब्रिज यूनिवर्सिटी जाने का सपना उससे छीन लिया है, उसके पिता (वीरेंद्र सक्सेना) भी नहीं रहे. शिक्षा-माफिया लल्लन सिंह (आदित्य श्रीवास्तव) को आनंद साइकिल पर पापड़ बेचता हुआ मिलता है. अब आनंद लल्लन सिंह के कोचिंग इंस्टिट्यूट का ‘प्रीमियम टीचर है. पैसों ने उसका हाल बदल दिया है, उसकी चाल बदल दी है. जिदंगी के साइकिल की चेन उतर गयी थी, मगर वापस चढ़ने में बहुत देर नहीं लगती. गुरु द्रोणाचार्य को राजाओं के बेटों को राजा बनाने से बेहतर लगने लगा है, प्रतिभा से धनी-साधनों से हीन एकलव्यों को उनकी शिक्षा का हक़ देना/दिलाना.         

बिहार के मशहूर गणितज्ञ आनंद कुमार और उनके मेधावी छात्रों पर बनी ‘सुपर 30 के साथ सबसे बड़ी विडम्बना ये है कि फिल्म जिस मुद्दे के खिलाफ़ पूरे जोश से नारे लगाती है, उसी चक्रव्यूह में खुद अन्दर तक फंसी नज़र आती है. ‘राजा का बेटा राजा नहीं बनेगा, राजा वही बनेगा जो हक़दार होगा का परचम बुलंद करते हुए परदे पर ‘ग्रीक गॉड’ कहे जाने वाले हृतिक रोशन आनंद कुमार कम, ब्रांडेड फेयरनेस क्रीम के विज्ञापन में अपनी रंगत के लिए लगातार शर्मिंदगी झेलने वाले संभावित ग्राहक ज्यादा दिखते हैं. एक दृश्य में एक अमीर छात्र पूछ लेता है, ‘सर, मैं अमीर हूँ तो इसमें मेरी क्या गलती है?’. जवाब देने के लिये, सामने फिर हृतिक ही खड़े मिलते हैं, फिल्म में अपने आप के ही अस्तित्व को खारिज़ करते हुए. हालाँकि फिल्म में उनका अभिनय आप पर चढ़ते-चढ़ते चढ़ ही जाता है, पर कहीं न कहीं उसके पीछे हृतिक के अभिनय कौशल से ज्यादा उनकी जी-तोड़ मेहनत और साफ़ नीयत हावी रहती है.

आनंद कुमार हर साल 30 गरीब छात्रों को आई.आई.टी. जैसे प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों की प्रवेश-परीक्षाओं के लिए तैयार करते हैं. उनके रहने-खाने से लेकर पढ़ाई की दूसरी जरूरतों तक, सब मुफ़्त में मुहैय्या कराते हैं, और अपने आम से दिखने वाले व्यक्तित्व और अध्यापन में अपनी ख़ास ठेठ शैली के लिए सराहे जाते हैं. गणित के भारी-भरकम सूत्रों को असल जिंदगी के आसान उदाहरणों से जोड़ कर पढ़ाई को मनोरंजक बनाने की उनकी पहल फिल्म में दिखती तो है, पर उसका अंत कुछ इस नाटकीयता तक पहुँच जाता है, जो आपको सच्चाई से कोसों परे लगती है और आप धीरे-धीरे फिल्म से कटने लगते हैं. बच्चे हथियारबंद गुंडों का मुकाबला कर रहे हैं, गणित के सूत्रों का इस्तेमाल करके. इस मुकाम पर आकर ‘गैंग्स ऑफ़ वास्सेपुर और ‘चिल्लर पार्टी एक ही फ्रेम का हिस्सा हो जाते हैं. अंग्रेजी से डरकर भागने वाले बच्चे बीच चौराहे पर टूटी-फूटी अंग्रेजी में गीत गा रहे हैं, ‘बसंती! डोंट डांस’, और देखते ही देखते पूरी की पूरी भीड़ उनके साथ उन्हीं के राग में रम जाती है. फिल्म के लेखक-निर्देशक अब अपना दिमाग़ चलाने लगे हैं. उन्हें शायद आनंद कुमार की शख्सियत और उनकी कहानी में दम दिखना बंद हो चुका है.

‘सुपर 30 का सबसे तगड़ा पहलू है, गरीब बच्चे-बच्चियों के किरदार में अभिनेताओं का सटीक चयन. फिल्म में जितने भी पल आपको द्रवित कर पाते हैं (गिनती के ही सही, पर यकीनन फिल्म में ऐसे दृश्य हैं), सब के सब इन्हीं बच्चों के हिस्से. आदित्य श्रीवास्तव और वीरेंद्र सक्सेना की सहज अदाकारी ही है, जो फिल्म के बैकड्राप में बिहार को स्थापित कर पाती है वरना तो पंकज त्रिपाठी भी कुछ नया पेश करने की कोशिश में असफल ही नज़र आते हैं. दो ख़ास दृश्यों में साधना सिंह और मृणाल ठाकुर बेहतरीन हैं. एक दृश्य में साधना जी अपने आप को ‘हॉट’ कह कर शर्माती हैं, दूसरे में मृणाल ‘मर्दों में मेरी चॉइस हमेशा अच्छी रहती है कहकर मानव गोहिल को गुदगुदाती हैं.

आखिर में; ‘सुपर 30 आनंद कुमार को सुपर-नायक बनाने की कोशिशों में गरीब बच्चों को लेकर उनके ईमानदार प्रयासों और प्रयोगों को कमतर आंकने की भूल कर बैठती है. हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की कहानी में फ़ार्मूला ढूँढने की भूख ने एक और फिल्म को बेहतर होने से काफी पहले रोक लिया है. आनंद कुमार को जानने-सराहने के लिए उनके साथ एक घंटे का इंटरव्यू ही ज्यादा माकूल होता. [2/5]     


Wednesday, 25 January 2017

काबिल: ना‘काबिल’-ऐ-बरदाश्त! [2/5]

संजय गुप्ता की ‘काबिल’ देखते वक़्त अक्सर मिथुन चक्रवर्ती और उनकी कुछ बहुत बेहतरीन फिल्मों की याद बरबस आ जाती है. लगता है, जैसे अभी भी मिथुन दा का ज़माना पूरी तरह गया नहीं. ‘आदमी’, ‘जनता की अदालत’, ‘फूल और अंगार’ जैसी फिल्मों को परदे पर धूम मचाते देखते हुए अभी गिन-चुन के सिर्फ 24-25 साल ही तो गुजरे हैं. भ्रष्ट राजनेताओं और उनके तलवे चाटते पुलिस महकमे से तमाम जुल्म-ओ-सितम का बदला लेने के लिए जब मिथुन दा कमर कस के खड़े होते थे, अचानक जैसे बलात्कार की शिकार उनकी बहन अपनी बहन लगने लगती थी, और अर्जुन, गुलशन ग्रोवर, हरीश पटेल जैसे गुंडे अपने ही जानी दुश्मन. सिनेमा की ताक़त ही यही होती है. पर सवाल सिर्फ इतना है कि अगर उन तमाम फिल्मों को घोर लोकप्रियता के बावजूद आज हम ‘बी-ग्रेड सिनेमा’ की श्रेणी में रखते हैं, तो ‘काबिल’ को भी इस काबिल क्यूँ नहीं समझा जाना चाहिए? या फिर शायद हमें इसके लिये 24-25 साल और इंतज़ार करना होगा.

संजय गुप्ता कोरियाई फिल्मों के मुरीद रहे हैं. गाहे-बगाहे कभी चुरा कर, तो कभी 56 इंची सीने के साथ रीमेक अधिकार खरीद कर उन्हीं फिल्मों को हिंदी में ज्यों का त्यों परोसते रहे हैं. ऐसे में विजय कुमार मिश्रा की तथाकथित ‘ओरिजिनल’ स्क्रिप्ट पर फिल्म बनाने का उनका फैसला ऐतिहासिक माना जाना चाहिए. रोहन भटनागर (हृतिक रोशन) देख नहीं सकता, पर वो सुन सकता है, सूंघ सकता है, स्टूडियो में बिना देखे कार्टून शोज़ की परफेक्ट डबिंग कर सकता है. सुप्रिया (यामी गौतम) भी देख नहीं सकती, पर लिपस्टिक और ऑयलाइनर इस्तेमाल करने में कभी कोई गलती नहीं करती. दोनों एक-दूसरे से बात करते हुए बगल में रखे गमले को एकटक, बिना पलक झपकाए, चौड़ी खुली आँखें से देखते रहते हैं, ताकि आपको उनका ‘न देख पाना’ हमेशा याद रहे. दोनों की हंसती-खेलती जिंदगी में भूचाल तब आता है, जब एक लोकल गुंडा (रोहित रॉय) अपने बाहुबली नेता भाई (रोनित रॉय) की शह पर सुप्रिया का बलात्कार कर देता है. भ्रष्ट सिस्टम के सामने बेबस, लाचार रोहन के पास अपनी बीवी पर हुए अत्याचार का बदला लेने के लिए अब सिर्फ एक ही रास्ता है, कानून अपने हाथ में ले लेना.

बलात्कार जैसा घिनौना और ज्वलंत मुद्दा हो या ‘नेत्रहीनों’ के प्रति सही रवैया रखने-दिखाने की कवायद, ‘काबिल’ निहायत ही उदासीनता का परिचय देती है. फिल्म अपनी ओर से तनिक भी कोशिश नहीं करती कि आप इन दोनों मुद्दों से जुड़ने का साहस दिखाएं. सब कुछ बस आपकी अपनी संवेदनशीलता पर टिका रहता है. कहाँ तो आपको इन दोनों किरदारों के लिए ज़ज्बाती होने की सुविधा मिलनी चाहिए थी, पर होता उल्टा है. ऐसा लगता है जैसे संजय गुप्ता की सारी कवायद सिर्फ इस एक बात में लगी रहती है कि ‘नेत्रहीन’ भी फ़िल्मी नायक-नायिकाओं की तरह हर वक़्त सजे-धजे हो सकते हैं. फिल्म अपने पहले हिस्से में अगर आपको किरदारों से जोड़ने में चूक जाती है, तो भी आपको इंटरवल के बाद ये उम्मीद रहती है कि फिल्म अब रोमांचक होने के साथ-साथ थोड़ी समझदार होने की भी हिम्मत दिखायेगी, पर धीरे-धीरे आपको हृतिक में मिथुन की छवि दिखने लगती है, तो ये रही-सही उम्मीद भी टूटती जाती है.

हृतिक रोशन किरदारों में ढल जाने के लिए जाने जाते हैं, और हालाँकि फिल्म में बस वही हैं जो अपनी मौजूदगी दर्ज कराने में अव्वल रहते हैं (रोनित रॉय ऐसे दूसरे एकलौते कलाकार हैं), पर फिर भी एक साधारण एक्शन हीरो से ज्यादा कुछ कर गुजरने से बचते फिरते हैं. एक अच्छी कहानी होने के बावजूद, अत्यंत सामान्य स्क्रीनप्ले के साथ उनसे इससे ज्यादा की उम्मीद करनी भी नहीं चाहिए. मराठी कार्पोरेटर की भूमिका में रोनित न सिर्फ भयावह लगे हैं, बल्कि एकदम सधे हुए भी. बोल-चाल हो या हाव-भाव, वो अपने किरदार से तनिक भी अलग-थलग नहीं पड़ते. यामी गौतम खूबसूरत लगने के अलावा कुछ और नहीं करतीं. रोहित रॉय ठीक-ठाक हैं, तो नरेन्द्र झा और गिरीश कुलकर्णी प्रभावी.

अंत में, ‘काबिल’ हृतिक के काबिल कन्धों पर टिके होने बावजूद एक इतनी आम फिल्म है, जो न ही आपको इमोशनली जोड़े रखने में कामयाब होती है, न ही इतनी स्मार्ट कि आप अपनी सीट से अंत तक चिपके रहें. मिथुन दा साइकिल की आड़ में छुपकर दुश्मनों की गोलीबारी से बचते रहें? चलता है, पर दुश्मन की थाह पाने के लिए हृतिक पूरे फ्लोर पर चिप्स और पॉपकोर्न बिखेर कर अँधेरे में दुश्मन का इंतज़ार करें? नहीं चलता, बॉस! आप तो कोरियाई ‘रीमेक’ ही बनाओ...ओरिजिनल के नाम पर हमें बस और मत बनाओ! [2/5]          

Friday, 12 August 2016

मोहेंजो दारो: कहो ना ‘बोर’ है! [2/5]

इतिहास के पन्नों में झांकना अपने आप में मनोरंजन से कम नहीं है. हज़ारों कहानियां, और हर कहानी में विस्मयाधिबोधक घटनाओं की भरमार; बशर्ते आपमें तथ्यों को नज़रअंदाज़ करने और घटनाओं की सत्यता पर प्रश्नवाचक चिन्ह न लगाने की सहनशीलता भारी मात्रा में हो. और फिर आशुतोष गोवारिकर की ‘मोहेंजो दारो’ तो बस एक आम सी बॉलीवुड फिल्म है जिसका वास्तविक इतिहास से उतना ही लेना देना है, जितना आपका और हमारे जैसे कम-पढ़ाकू जानकारों का, जिनको बात-बात में गूगल-देव की सेवाएं लेने में रत्ती भर भी झिझक नहीं होती. अगर आपने स्कूल की इतिहास की किताब में सिन्धु घाटी सभ्यता के बारे में वो एक 6-8 पन्नों वाला चैप्टर भी ध्यान से पढ़ा होगा, तो आपको अंदाजा हो जायेगा कि ‘मोहेंजो दारो’’ के साथ, गोवारिकर आपको 2016 से 2016 ईसापूर्व में ले तो गए हैं, पर बॉलीवुड के घिसी-पिटी और बेरस कहानी कहने के फार्मूले को यहीं छोड़ना भूल गए.

नगर बुरे लोगों के चंगुल में है. कभी खुशहाली बसती थी यहाँ, मोहेंजो दारो में, अब झूठ, छल और ठगी का व्यापार होता है. आम लोगों पर मनमाने करों का बोझ लादा जा रहा है. ऐसे में, एक बाहरी साहसी नवयुवक सरमन [ह्रितिक रोशन] नगर में आता है. उसे लगता है उसका कोई पुराना रिश्ता है इस नगर से. यहीं उसे अपनी संगिनी भी मिलती है, चानी [पूजा हेगड़े], जिसे पाने की कोशिश उसे नगर के प्रधान महम [कबीर बेदी] और उसके बेटे मूंजा [अरुणोदय सिंह] के सामने ला खड़ी करती है. सरमन अब जन-जन की आवाज़ बन चुका है. पर अभी और भी कुछ राज हैं, जो उसके सामने खुलने बाकी हैं. उसका इस नगर से क्या वास्ता है? उसका अपना अतीत और नगर का भविष्य दोनों एक ही धागे के दो छोर हैं, पर उलझे हुए. फिल्म का अंत सब सवालों का हल लेकर आता है, पर अहम् सवाल ये है कि इस औसत दर्जे की कहानी को मोहेंजो दारो के ऐतिहासिक चमक-दमक का चोला पहनाने की जरूरत क्या थी?

पीरियड फिल्मों में ‘मोहेंजो दारो’ गोवारिकर की सबसे कमज़ोर फिल्म है. ऐसा नहीं है कि आशुतोष आपको सिंघु घाटी के नज़दीक ले जाने में कोई चूक करते हैं, पर इस बार न तो उनके पास ‘लगान’ जैसा ड्रामा है, न ही ‘जोधा-अकबर’ जैसा शानदार स्केल. फिल्म अपने रोचक, पर बनावटी और कुछ ज्यादा ही अलबेले कॉस्टयूम डिज़ाइन से आपका ध्यान कहानी की गंभीरता (?) से भटकाती रहती है. फिल्म में इस्तेमाल हुए विजुअल ग्राफ़िक्स का औसत स्तर भी फिल्म का एक बहुत बड़ा कमज़ोर पक्ष है. ‘सपने’ को ‘सपीने’, ‘सवाल’ को ‘सुवाल’ जैसे उच्चारण के साथ, आशुतोष उस वक़्त की बोलचाल की भाषा के लिए जिस तरह का प्रयोग करते हैं, वो हास्य उत्पन्न करने के लिए तो सटीक लगता है, पर वास्तविकता से उसको जोड़ने में भरोसेमंद साबित नहीं होता. आर रहमान का संगीत ही है, जो एक पल के लिए भी अपने आपको शक के घेरे में खड़ा नहीं होने देता. उनके संगीत में एक तरह का कबायली ‘टच’ है, जो आपको बांधे भी रखता है, और उनसे और उम्मीद करने की छूट भी देता ही.

अभिनय में, नितीश भारद्वाज [बी आर चोपड़ा की ‘महाभारत’ के कृष्ण] एक बिलकुल नए रूप में आपको बहुत अरसे बाद परदे पर देखने को मिलते हैं. ताज्जुब होता है, भारतीय सिनेमा उनसे इतने दिन तक दूर कैसे रह पाया? उन जैसे ही अभिनय-प्रतिभा के कुछ और धनी नरेन्द्र झा और मनीष चौधरी भी फिल्म में दिखाई तो पड़ते हैं, पर महज़ खानापूर्ति के लिए बनी भूमिकाओं में. अरुणोदय सिंह अपनी कद-काठी के साथ अच्छा प्रभाव डालते हैं, अच्छे लगते हैं. कबीर बेदी इस तरह की भूमिकाओं में हमेशा सहज रहे हैं, हालाँकि उनसे बहुत कुछ की उम्मीद करना भूल ही जाईये. पूजा हेगड़े बहुत अलग सी दिखती हैं. उनकी अगली फिल्मों का चयन काफी हद तक उनकी पहचान बनाने में अहम साबित होगा. ह्रितिक पूरी फिल्म अपने कन्धों पर ढोते नज़र आते हैं, पर इस मुकाम पर इस तरह की औसत फिल्मों में उनका होना उनकी सारी मेहनत, कवायद और शख्सियत के लिए शायद एक उल्टा खेल साबित हो.

आखिर में; ‘मोहेंजो दारो’ ऐतिहासिक स्थलों के उस टूर की तरह है, जहां लोकेशन्स अपनी एक अलग कहानी बयां करने की कोशिश कर रहे हैं, पर आपका टूर गाइड रटे-रटाये तरीके से, अपनी सहूलियत के हिसाब से, आपको अपनी गढ़ी हुई एक अलग ही कहानी बताये जा रहा है, जो न तो सच है, न ही रोचक...और कभी-कभी तो बहुत बोर!! [2/5]       

Thursday, 2 October 2014

BANG BANG: Mission Entertainment, Failed! [2/5]

Tom Cruise-Cameron Diaz starrer KNIGHT AND DAY wasn’t an extraordinary action movie outing at the first place; so when Bollywood has come up with an idea to officially remake it, expecting anything better to come out of it is surely our fault and not of the makers. Since Bollywood has now become quite an expert with remaking their own classics into the most forgettable ones, you can only imagine what would have they done with an average Hollywood action thriller. Siddharth Anand’s BANG BANG is a regular bollywood junk suitable only to those who crave for quick, forgettable and mindless adrenaline rush for their dose of entertainment.

Rajveer [Played by the delectably charming Hrithik] is a daredevil wanted for stealing the historical Kohinoor Diamond from a museum in London and can frequently be seen in Shimla roaming with the ‘diamond’ in his pocket. In a ‘written as in the script’ incident, he meets a middle-class desperate girl [Katrina, of course] with starry dreams to tour the world someday. And now the both should be together in the hide & seek game with cops [Pavan Malhotra, wasted] & the international crime syndicates [Danny Denzongpa & Javed Jaffrey] to save each other’s lives. But there is a twist, Rajveer is hardly who he pretends to be.

Problems with BANG BANG never really end. Where the original Hollywood flick had its own share of logic behind every action and plot developments, this Bollywood version hardly tries to be imaginative or logical. One action sequence leads to an abrupt song & dance number followed by another action sequence and another song & dance number! This goes on & on until the intermission. You take the loo-break, join the movie and it starts all over again. The most irritating transitions between scenes are Katrina waking up in the bed, in a new location, in a new country. 2 hours 35 minutes and you hardly see a smart espionage moment. Yes, there are brilliantly performed action thrills but no moment of shock even in the climax. If you could not see it coming, that’s never because of their excellence but your inattentiveness.  

Siddharth actually doesn’t leave any stone unturned to make it a proper Bollywood film. A bollywood film that never doubts on the moves of its hero, in fact it tries to cover him up. BANG BANG does exactly the same…with all of the film. So, more than 25 films in her name and we still have to give reasons [read: excuses] for Katrina’s accented vocal presentation. So she might possess ‘Harleen’ as her name, she is a Canada born child whose parents are dead in a terrible road accident [as convenient as swimming is to a fish] and now she is living with her grandmother in Shimla from last 10 years or more. Established in first half an hour, now do not you dare to ask why she can’t talk in proper accent?

My two favorite moments are probably the only moment I had an effortless smile on my face. When press asks the grandmother about Harleen’s whereabouts, she tells them that she had to consult her lawyer first and one media-person reacts, “Dadi, American serials dekhna band karo!” In other, Hrithik makes faces and pun about Katrina’s boring single life and her search for boyfriend on dating sites. Genuinely funny and natural!

On the performances, Hrithik manages to keep everyone hooked with his ease at action, silkiness in dance and the big screen charisma of the heroic chiseled-oiled body muscles. Deepti Naval & Kanwaljeet mark their presence felt. Rests in the supporting cast are either wasted completely or extremely regular. Watch out if breathtaking locales, hard to imitate dance moves, some good action sequences and your favorite stars are enough to make you spend [read: waste] your precious time and hard-earned money. It deserves nothing less than a place in the list of AAP MUJHE ACHCHE LAGNE LAGE and KITES! [2/5].

Friday, 1 November 2013

KRRISH 3: Unimaginative, unoriginal, borrowed and a bigger disappointment! [2/5]

If you heard something like, “agar mera yeh experiment kaamyaab ho gaya, main yeh-main woh…” you should never be in doubts that you are watching a science-fiction movie (…from Bollywood ofcourse). But thrice?...in the whole 2 hour 33 min of duration filled with inspired yet uninspiring visual effects?? Really?? Then sure you ought to have your uncertainties on gravity of the skilled writing.

In other scene, when a superhero supposedly killed by the evil returns inexplicably or rather in a scientific breakthrough too suitable to sound plausible, a kid confronts the shocked & shaken baddie played by Vivek Oberoi as, “kyun? Phat gayi kya?”. Well, the audience laughed but I couldn’t as if we really want our kids to grow in such shape. Though eventually it is a family entertainer, Rakesh Roshan’s KRRISH 3 can’t be declared sole responsible for that but definitely for being least original, least entertaining & for shamelessly taking cues from the past hits of the west. On one hand, Sr. Roshan tries to woo you with extensive visual effects never seen before in India, but also never lets his gluttony go off to encash the Indian sentimental spree. So, the plot goes for the toss in order to swing aimlessly between the both!

Krishna (Hrithik Roshan in a tailor-made role) is trying his hard to balance his life in Mumbai with his father Rohit (Jr. Roshan again in a comparatively more charming role) & wife Priya (Priyanka Chopra in a regular), between his normal routine and the disappearing ‘superhero’ acts as Krrish to save people’s lives. Meanwhile, an evil mind named Kaal (Vivek Oberoi in a menacing character interestingly modeled on the similar lines of Sir Juda in Subhash Ghai’s KARZ) is busy creating an army of MAANVARs (Mutants from the fusion of humans with animals) to rule the world and regain his powers. Rest is all about how the two clash & collide with their own set of intentions to destroy buildings, demolish towers and make people (especially viewers more than the ones on screen) suffer not only physically but mentally and emotionally too.

Theoretically, a superhero movie needs an upper hand on the VFX front. KRRISH 3 fulfills that basic rule by creating some of the unseen effects in Indian cinema but ‘is that enough’ is the biggest question. There is not one single action/ VFX sequence in the film that comes with an ‘original’ tag…and I bet if you can show me at least one! I wish if the team of writers would have sit more on the plot to make it inspiring rather than deciding on what all effects we can borrow from Hollywood Hits to thrill the audience! KOI MIL GAYA has proved in the past that if incorporated smartly in the plot, even the emotional quotient would work as a strong share of interest, but sadly here in KRRISH 3 it was all done just for the sake of it. Novelty is gone already and now the sensibility too.

On the performance side, there is no second thought on Hrithik being the crowd puller. He maintains the level he has achieved. He charms you with his intensity, his ability and his skills as a complete performer. Vivek as Kaal is strictly average. Kangna as his one of the mutants has an interesting role to pull out. She is poised. She is confident. She is promising. Priyanka Chopra incidentally has nothing new to surprise.

In an advanced world of technology, where even kids have opened all the possible windows to access latest landmarks in the said field, I am not very sure if KRRISH 3 would be able to make it to their appreciation. It only makes you believe in an unsaid rule that medium can never rule out the message, especially if it is borrowed, clichéd, corny, tacky and unimaginative. Think twice before buying your tickets! [2/5]