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Friday, 16 June 2017

बैंक चोर: 'धूम' से धड़ाम, उबाऊ और नाकाम! [1.5/5]

बैंक में बाबा, हाथी और घोड़े घुस आये हैं. ठीक वैसे ही, जैसे देश की राजनीति में योगी, गाय और भैंस. उथल-पुथल तो मचनी ही है; पर राजनीति की तरह ही यहाँ भी 'बैंक चोर' वादे तो बहुत सारे करती है, पर जब निभाने की बारी आती है तो बचाव की मुद्रा में इधर-उधर के बहाने ढूँढने लगती है, रोमांच के लिए झूठ-मूठ का जाल बुनने लगती है और अंत में 'जनता की भलाई' का स्वांग रचकर अपनी सारी गलतियों पर काला कपड़ा डाल देती है. चतुर, चालक और चौकन्ने चोरों पर यशराज फ़िल्म्स 'धूम' के साथ पहले ही काफी तगड़ी रिसर्च कर चुकी है. सरसरी तौर पर देखा जाये, तो 'बैंक चोर' उसी रिसर्च मैटेरियल की खुरचन है, जो उन तमाम 'चोरी' वाली फ़िल्मों का स्पूफ़ ज्यादा लगती है, ट्रिब्यूट कम. 

चम्पक (रितेश देशमुख) अपने दो दोस्तों के साथ बैंक लूटने आ तो गया है, पर अब उसके लिए ये खेल इतना आसान रह नहीं गया है, ख़ास कर तब, जब बैंक के बाहर सीबीआई का एनकाउंटर स्पेशलिस्ट अमजद खान (विवेक ओबेरॉय) खुद कमान थामे खड़ा हो. खान को शक है कि शहर की दूसरी बड़ी चोरियों के पीछे भी इन्हीं चोरों का हाथ है, हालाँकि इन मसखरे चोरों की बेवकूफ़ाना हरकतों से ऐसा लगता तो नहीं. चोर-पुलिस और सीबीआई की इस पूरी गुत्थम-गुत्थी में, गिरना-पड़ना, दौड़ना, चीखना-चिल्लाना इतना ज्यादा है कि हंसने के लिए भी मुनासिब जगह और वक़्त नहीं मिलता. साथ में, उल-जलूल हरकतों का ऐसा ताना-बाना कि बोरियत आपको अपनी गिरफ्त में लेने लगती है. और तभी कुछ ऐसा होता है, जो आपकी सुस्त पड़ती बोझिल आंखों और कुर्सी में धंसते शरीर को वापस एक जोर का झटका देती है, परदे पर इंटरवल के साथ ही साहिल वैद्य की एंट्री. बैंक में मौजूद असली चोर के रूप में. 

फिल्म के निर्देशक बम्पी कहानी का सारा ट्विस्ट फिल्म के आखिरी हिस्से के लिए बचा के रखते हैं, मगर वहाँ तक पहुँचने का पूरा सफ़र अपने नाम की तरह ही उबड़-खाबड़ बनाये रखते हैं. फिल्म में सस्पेंस का पुट डालने के लिए वो जितने भी तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, वो सारे के सारे आजमाए हुए और पुराने ढर्रे के हैं. साहिल वैद्य की एंट्री इस हिसाब से और भी कारगर दिखने लगती है, जब इशिता मोइत्रा के संवाद अब फिल्म के बाकी हिस्सों के मुकाबले ज्यादा सटीक, मजेदार और रोचक सुनाई देने लगते हैं. साहिल फैजाबाद, उत्तर प्रदेश के एक ऐसे चोर की भूमिका में हैं, जो लखनवी अदब और आदाब का लिहाज़ करना और कराना बखूबी जानता है. तू-तड़ाक उसे जरा भी पसंद नहीं, और दादरा का ताल उसे गोली लगे बदन से रिसते लहू में भी साफ़ सुनाई देता है. 'नए-नए बिस्मिल बने हो, तुम्हें रस्म-ऐ-शहादत क्या मालूम?' जैसी लाइनें और इन्हें चेहरे पर मढ़ते-जड़ते वक़्त, जिस तेवर, जिस लहजे का इस्तेमाल साहिल अपनी अदाकारी में करते हैं, उन्हें फिल्म के दूसरे सभी कलाकारों से आगे निकलने में देर नहीं लगती. फिल्म अगर देखी जा सकती है, तो सिर्फ उनके लिए.

विवेक तो चलो अपने रोबदार किरदार के लम्बे-चौड़े साये में बच-छुप के निकल लेते हैं, पर 'बैंक चोर' रितेश देशमुख के लिए एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा कर जाती है, "क्या कॉमेडी में रितेश का जलवा सिर्फ सेक्स-कॉमेडी तक ही सीमित है?" साफ़-सुथरी कॉमेडी होते हुए भी, रितेश यहाँ भी वही आड़े-टेढ़े एक्सप्रेशन चेहरे पर बनाते रहते हैं, जो 'क्या कूल हैं हम' जैसी फिल्मों में उनका ट्रेडमार्क मानी जाती हैं. फिल्म के एक बड़े हिस्से तक उनका किरदार न तो हंसाने में ही कामयाब साबित होता है, न ही इमोशनली जोड़े रखने में. आखिर तक आते-आते उनके लिए स्क्रिप्ट में सब कुछ ठीक जरूर कर दिया जाता है, पर तब तक देर बहुत हो चुकी होती है. बाबा सहगल अपनी मेहमान भूमिका से फिल्म में थोड़ी और दिलचस्पी बनाये रखते हैं, पर बेहद कम वक़्त के लिए. 

आखिर में; 'बैंक चोर' उन बदनसीब फिल्मों में से है जो पन्नों पर लिखते वक़्त जरूर मजेदार लगती रही होगी, पर परदे पर उतनी ही उबाऊ और पूरी तरह नाकाम. मशहूर शेफ हरपाल सिंह सोखी फिल्म में बैंक-कैशियर को सलाह देते हुए अपनी चिर-परिचित लाइन दोहराते हैं, "स्वाद के लिए थोड़ा नमक-शमक डाल लीजिये'; इस फ़ीकी फिल्म के लिए भी मेरी सलाह वही रहेगी. [1.5/5] 

Friday, 15 July 2016

ग्रेट ग्रैंड मस्ती (A): एक बचकानी एडल्ट कॉमेडी, आपके ‘उस’ व्हाट्स ऐप ग्रुप के लिए! [1/5]

बॉलीवुड में फिल्म-प्रमोशन का दौर एक ऐसा जादुई वक़्त होता है, जब फिल्म से जुड़े तमाम लोगों में अचानक ‘दैवीय ज्ञान’ का संचार होने लगता है. अपनी फिल्म को अच्छी बताने और बता कर बेचने में मैंने अक्सर बड़े-बड़े ‘सिनेमा-विशेषज्ञों’ को गिरते देखा है. खैर, ‘इट्स ऑल पार्ट ऑफ़ द जॉब’. हालाँकि ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ को बेचते हुए निर्माता-निर्देशक इन्द्र कुमार काफी हद तक सच के साथ खड़े दिखते हैं. उनका कहना है, “अगर हम एडल्ट जोक्स आपस में कह-सुन सकते हैं तो परदे पर एडल्ट कॉमेडी क्यूँ नहीं”. दुरुस्त, पर दुर्भाग्य ये है कि इन्द्र कुमार साब एडल्ट कॉमेडी के नाम पर उन्हीं बासी, घिसे-पिटे एडल्ट जोक्स को बार-बार हमारे सामने परोसते हैं, जिन्हें हम और आप अपने ‘व्हाट्स ऐप ग्रुप’ में पढ़ते ही डिलीट कर देते हैं. सिनेमा डिलीट नहीं होता. और अगर ये सिनेमा है तो काश सिनेमा डिलीट हो सकता! ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ एक उबाऊ, पकाऊ और झेलाऊ फिल्म है, जहां हंसाने के नाम पर बद्तमीजियां ज्यादा होती हैं और फूहड़पन हर तरफ बिखरा पड़ा है.

मस्ती’ अगर बॉलीवुड में एडल्ट कॉमेडी के एक नए दौर की शुरुआत थी तो ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ को अंत मान लेना चाहिए, क्यूंकि इसके आगे अब बस ‘पोर्न’ ही बचता है. ऐसा नहीं है कि मैं पोर्न फिल्मों के खिलाफ़ हूँ पर तब वो खांटी तौर पर एक नया मुद्दा होगा बहसबाजी और अवलोकन के लिये. एडल्ट कॉमेडी में अक्सर द्विअर्थी कहावतों और ‘वन-लाइनर्स’ की भरमार होती है. ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ में द्विअर्थी कुछ भी नहीं. यहाँ सबका मतलब साफ़ और एक ही है. फिल्म में अगर ‘मेरा खड़ा है’, ‘इसका छोटा है’, ‘मुझे करना है’ जैसे संवाद बोले जाते हैं, तो दादा कोंडके साब की तरह उन संवादों के आगे-पीछे किसी तरह को कोई एक्सप्लेनेशन जोड़ कर आपको चौंकाया नहीं जाता, बल्कि उनका सीधा मतलब आपके शारीरिक अंगों और यौन-क्रियाकलापों की तरफ ही होता है. जाहिर है, इसमें हँसी आने की कहीं कोई गुंजाईश नहीं बचती. बात सिर्फ संवादों तक ही रुक जाती तो गनीमत होती, यहाँ तो लेखक और निर्देशक उन तमाम अंगों-प्रत्यंगों को ‘कुचलने, काटने, कूटने’ तक पर उतर आते हैं. और हम लोग अनुराग कश्यप को सबसे ‘हिंसक’ फिल्म-निर्देशक का तमगा देने पर आमादा है, कैसी विडंबना है!

अमर, प्रेम और मीत [रितेश, विवेक और आफ़ताब; मुझे फर्क नहीं पड़ा कि किसका क्या नाम है] अपने-अपने वैवाहिक जीवन में ‘सेक्स-सुख’ न मिलने की वजह से ‘बाहर की बिरयानी’ खाने का मन बना चुके हैं. प्लान के मुताबिक तीनों रितेश के गाँव उसके वीरान बंगले को बेचने की नीयत से आते हैं. इस वीरान बंगले में एक भूत का कब्ज़ा है, भूत वो भी हद्द खूबसूरत [उर्वशी रौतेला] और 50 साल से मर्दों के लिए प्यासी. आप सोच रहे होंगे, टेंशन क्या है? पर नहीं, पहले तो ये तीनों भूखे भेड़िये (उनकी एक्टिंग देख कर तो कम से कम ऐसा ही लगता है) आपस में ‘मे बेस्ट मैन विन’ की रेस लगाने लगते हैं और बाद में भूत की शर्त. कुल मिलाकर आपको 2 घंटे 10 मिनट तक बेवकूफ बनाये रखने का पूरा इंतज़ाम यहाँ मौजूद है. कहने की बात नहीं है कि अंत में सारे मर्द ‘लौट के बुद्धू घर को आये’ और ‘सुबह का भूला शाम को घर आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते’ जैसे कहावतों की बिला पर साफ़ बरी हो जाते हैं.

अभिनय की नज़र से ‘ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ एक बहुत जरूरी फिल्म है, उन लोगों के लिए ख़ास जिन्हें परदे पर कभी न कभी इंसानों के पूर्वजों की भूमिका करने में दिलचस्पी रही हो. ‘फैरेक्स-बेबी’ आफ़ताब इस लिहाज़ से काफी मजबूत कलाकार हैं. उनकी उछल-कूद देखकर मन में कोई दुविधा नहीं रह जाती. विवेक थोड़े पीछे रह जाते हैं. रितेश इस तरह की भूमिकाओं में ‘पदमश्री’ लेकर ही मानेंगे. उर्वशी रौतेला गानों में अपना जौहर ज्यादा बखूबी से पेश करती हैं, अभिनय में उनका सफ़र अभी काफी लम्बा और काटों भरा है. उषा नाडकर्णी और संजय मिश्रा पर हँसी कम, तरस ज्यादा आता है. फिल्म का सबसे दमदार दृश्य मेहमान भूमिका में सुदेश लाहिरी के हिस्से आता है, जहां वो रामसे ब्रदर्स और उनकी तमाम भूतिया फिल्मों पर छींटाकशी करते नज़र आते हैं. दिलचस्प बात ये है कि वो खुद उन्हीं फिल्मों के ‘लालटेन वाले चौकीदार’ की भूमिका में हैं.

ग्रेट ग्रैंड मस्ती’ के एक मार-धाड़ वाले दृश्य में एक आदमी उड़ता हुआ मशहूर पेंटर Vincent van Gogh की पेंटिंग के ऊपर आ गिरता है. कला और सिनेमा पर ये फिल्म उसी तरह का एक निर्मम प्रहार है. इनका बंद होना तो नाजायज़ और नामुमकिन है; उम्मीद करता हूँ इन पर हंसने वालों की तादात थोड़ी कम हो. बहरहाल, मस्ती के नाम पर ये है एक गन्दी, सस्ती और बचकानी फिल्म! [1/5]    

Friday, 3 June 2016

हाउसफुल 3: कॉमेडी कोमा में है..! [1/5]

‘कॉमेडी’ कोमा में चली गयी है. अब उसका हॉस्पिटल के बिस्तर से उठना और आपको जी भर के गुदगुदाना न जाने कब होगा? बॉलीवुड की ज़बान में कहें तो, “अब दवा की नहीं, दुआ की जरूरत है”. हँसी के नाम पर रंग, लिंग और नस्ल-भेद को कोंचती टीका-टिप्पणी के बाद, इस बार ‘कॉमेडी’ को शारीरिक अपंगता पर गढ़े गए भौंडे और भद्दे प्रहार झेलने पड़े हैं. घाव गहरे हैं, पर ऐसा नहीं कि सिर्फ ‘कॉमेडी’ को ही मिले हैं. फ़रहाद-साज़िद की ‘हाउसफुल 3’ आपकी सोच, समझ और संवेदनाओं का भी बड़ी बेशर्मी से मज़ाक उड़ाती है, वरना कौन भलामानस होगा जिसे व्हील चेयर पर बैठे ‘दिव्यांग’ की सच्चाई का पता लगाने के लिए उसकी पैंट में चीटियाँ छोड़े जाने पर हँसी आती हो? शादी न हो इसके लिए बेटियों के पेट से थैली (ovary) निकलवा देने के सुझाव के बाद ‘आय एम जोकिंग’ बोल भर देने से क्या सब सिर्फ मज़ाक की हद तक ही रह जाता है?

लन्दन में कहीं एक बहुत पैसे वाला बाप है बटुक पटेल [बोमन ईरानी] जिनका मानना है, “आदमी को सीधा होना चाहिए, उल्टा तो तारक मेहता का चश्मा भी है”. उसकी तीनों बेटियाँ [जैकलीन फर्नान्डीज़, नरगिस फाखरी, लीज़ा हेडन] भी कम नहीं. एक कहती है, “पापा, मैं बच्चा नहीं कर रही.” आपको लग रहा होगा, लड़की प्रेगनेंसी के खिलाफ है? जी नहीं, उसका मतलब है, “आय एम नॉट किडिंग”. बिहार बोर्ड की टॉपर रूबी राय का विडियो खासा वायरल हुआ है आजकल. फिल्म की पृष्ठभूमि लन्दन न होकर बिहार होती तो ये तीनों बड़ी आसानी से खप जातीं. बहरहाल, तीनों के बॉयफ्रेंड्स भी हैं [अक्षय कुमार, अभिषेक बच्चन, रितेश देशमुख] जो लड़कियों से कम, उनकी दौलत से ज्यादा प्यार करते हैं. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि तीनों को अँधा, गूंगा और अपाहिज़ बनने का नाटक करना पड़ता है. और फिर जो एक बार नाटक शुरू होता है, वो नाटक कम आपके दिल-ओ-दिमाग के साथ खिलवाड़ ज्यादा लगता है.

विकलांगों के प्रति बॉलीवुड पहले भी इस तरह की असंवेदनशीलता दिखा चुका है. दीपक तिजोरी की ‘टॉम, डिक एंड हैरी’ और इंदर कुमार की ‘प्यारे मोहन’ भूलने लायक ही फिल्में थीं. पर ‘हाउसफुल 3’ में फ़रहाद-साजिद सारी हदें लांघ जाते हैं. सस्ते मज़ाक के लिए घिसे-पिटे जोक्स का पूरा बोरा उड़ेल दिया है दोनों ने. हर किरदार जैसे कॉमनसेंस की स्पेल्लिंग भूल कर उल-जलूल हरकतें करने में लगा रहता है. अक्षय का किरदार स्प्लिट पर्सनालिटी डिसऑर्डर का शिकार है. ‘इंडियन’ शब्द सुनते ही उसके भीतर से एक और किरदार बाहर आने लगता है, पहले वाले से ज्यादा खूंखार. देश का जैसा माहौल है, ये एकदम फिट बैठता है. ‘भारत माता’ ‘गाय’ या ‘लता मंगेशकर और सचिन’ सुनते ही अकसर देश के लोगों में इस तरह के बदलाव आजकल खूब देखे जा रहे हैं. रितेश का किरदार शब्दों के चयन में हमेशा मात खा जाता है. ‘विरोध’ की जगह ‘निरोध’, ‘वाइफ’ की जगह ‘तवायफ़’, ‘खिलाड़ी’ की जगह ‘कबाड़ी’; इसलिए कोई हैरत नहीं अगर उसकी ‘कॉमेडी’ आपको ‘ट्रेजेडी’ लगे तो. अभिषेक का किरदार ‘बच्चन-परिवार’ के इर्द-गिर्द ही घूमता है. कभी बड़े बच्चन साब के पुतले के साथ सेल्फी, तो कभी बहू बच्चन [ऐश्वर्या] के पुतले के साथ रोमान्स!

फिल्म में अगर कुछ भी झेल जाने लायक है, तो वो है अक्षय का सब पर हावी हो जाने का अंदाज़. स्क्रिप्ट से बढ़कर सीन में कुछ न कुछ करते रहने का दुस्साहस ही उन्हें इस तरह की फिल्मों में कामयाब बनाता है. और दूसरा, फिल्म का ‘फ़ेक इश्क़’ गाना जिसमें तीनों नायकों को पैसे के पीछे भागना खलने लगता है और सच्चे प्यार का इमोशन हलके-हलके छू रहा होता है. एक यही वक़्त है फिल्म में जब हँसी हलकी-फुलकी ही सही, साफ़-सुथरी, उजली-उजली दिखती है. अंत में, अगर जैकलीन के किरदार के अंदाज़ में कहूं तो, “फ़रहाद-साजिद, जल्दी कुएं में जाओ (गेट वेल सून)!” और आप के लिए, “ठंडी दवाई लो (टेक अ चिल पिल)!...नहीं तो सरदर्द की गोली तो लेनी ही पड़ेगी! [1/5]    

Friday, 7 August 2015

BANGISTAN: Satire turns sad, silly and superficial! [1.5/5]

Handling satire on current social, political and religious sentiments is never an easy job, at least not as easy as reviewing (bashing; in other word) other’s films. With BANGISTAN, noted film critic Karan Anshuman sneaks into the other side of the business now where he’s all open to face the shots he’s been taking at till now. And I stand in full salutation for him choosing a subject which is more than relevant in today’s times. We desperately need to develop our abilities to laugh at some of the most serious issues in our lives. Satires act like catalysts in trial of that exercise. Sadly, BANGISTAN promises a lot on that front but misses the target by large. Some serious smart writing, sincere efforts and unambiguous intention are all you need and not a buffoonery plot, chaotic climax and pretentious performances to save the day. Here Mr Critic disregards what he’s been preaching all his life.

The film finds its base in a fictional land where two religious radical groups are at warfare to gain supremacy. You don’t need those visible hints to guess that we are looking at our popular Hindu-Muslim extremists. Smartly, both the group-heads are being played on screen by the same actor [the dependable Kumud Mishra in double role]. Two sides of the same coin? Get it? Meanwhile, there are Shankaracharya [Shiv Subramanium] and Imam Saab [Tom Alter] secretly working towards peace, love and harmony between the two communities. Now, the radicals are planning to make a big shout at the international religious summit to be held in somewhere in Poland. The hardcore halfwits chosen to bomb the Peace convention are Praveen Chaturvedi [Pulkit Samrat] and Hafiz Bin Ali [Riteish Deshmukh].

BANGISTAN starts with a bang and showers hints of satire in almost every scene, dialogue and frame but runs out of impressive ideas and additions soon after the successful take-off. The Islamic extremists are seen cursing America’s policies against them sitting in an American fast food joint named FcDonalds. Well and good! The two chosen activists with switched religious identities and orientations for a fool-proof operation fights for each-other’s religious convictions is too quite exciting but soon, it gets stretched over its limits. And then comes, the all preachy, pretentious and predictable climax where all this ‘laugh and think, and laugh again’ satirical efforts ends in the melodramatic way of finishing it off so that you can go home and not die there.

Another big letdowns are the performances; Riteish Deshmukh is some relief and considerably ‘at it’ for the most parts. Pulkit Samrat doesn’t even try to get out of the impression that he is acting only to impress or imitate Salman Khan. Jacqueline Fernandez is credited here as ‘in a special appearance’ and that doesn’t mean she is doing anything special to the film. Chandan Roy Sanyal is good. Aarya Babbar is funny at places. Veterans Kumud Mishra, Shiv Subramanium and Tom Alter don’t disappoint, though are there only for few scenes.

At best, BANGISTAN is one of those incalculable films in which good cinematography, better production-design and scenic locations lure you to stay idle in your seats till the lights go on. Otherwise; even in its 2 hours of modest duration, there are times when you start questioning your sense of judgment about the film, and not about the extreme religious sentiments the film supposed to hit on. Sad, silly and superficial! [1.5/5] 

Friday, 27 June 2014

EK VILLAIN: An intense love-story or unintentionally funny thriller? [2/5]

Negative attracts. Villains get most of the claps. Well, mostly. So in case, if you make it to resist yourself from falling over your current heartthrobs on screen; Shraddha Kapoor riding high on AASHIQUI 2’s success and the cute-faced, no-nonsense and impressively the most sincere looking student of Kjo’s school Sidharth Malhotra respectively for boys & girls; you have also on board one of the most deliciously mystified villain played by Riteish Deshmukh. A perfect casting, quite enticing in this case is a fool-proof strategy to bring big numbers in theatres and at the box-office both. Half battle is won.  

Now, let’s have some crisp, meaty, tense, on the edge plot that could have the audience seated for longer than interval at least. Plot? Really? Aren’t we asking for much, especially in Bollywood? But why to worry if there are plenty of inspirations floating all over the cinema-world! And the team chooses South Korean revenge thriller I SAW THE DEVIL.  With added melodic music that includes an item number too, anyone would have predicted ages before going on the floor that the film will be a success in all respects. It looks. It sounds. It appears but sadly and only on paper. It’s time to face some reality. Mohit Suri’s EK VILLAIN is a mishmash of a love-story that tries hard to be intense and an unintentional revenge drama that thrills only at one occasion or two.

Ethically, there is not much to unravel in the plot as it being a suspense thriller, though you can easily predict it from a mile away. So, let’s stick to the characters and not the major events. Shraddha Kapoor plays Ayesha- a girl in high spirits with her bucket-list of dreamy wishes like watching peacocks dancing in the ‘first’ rain of the season, catching a butterfly and you can go on & on with a wide-eyed expression of ‘How romantic!’ on your face. She also loves to talk in a manner tried & tested well before by all prominent Bollywood heroines from Hema Malini in ‘SHOLAY’ to Asin in ‘GHAZNI’. She comes last in the list of ‘who performed well’.

In execution of one of these silliest wishes, she seeks help of a cold-blooded murderous henchman Guru, played by yours truly Sidharth wearing a grumpy look on face from the acting rulebook. What happens next? Any guesses? No, he doesn’t kill the girl. No, the girl doesn’t kill him for what he’s done but they both fall in love. I bet you haven’t had it in your weirdest dream. Enters Riteish playing Rakesh, a simple-sober-soft spoken regular guy who doesn’t want much in life but to be a hero for his son and wife! With a nagging, beating & harassing wife [played by Aamna Sharif], it is quite an impossible task. So, the constantly piling anger, frustration and rage arouse the violent streak in the guy. How the three cross each other’s path is better left unspoken.

At best, EK VILLAIN is a melodramatic average Bollywood thriller with predictably ridiculous storyline that barely imposes any sense of emotional connect to any of the characters. They are loud screaming hard to make themselves noticed. The twists and turns are some relief in order to infuse some excitement. In one of scenes, Kamaal Rashid Khan of ‘DESHDROHI’ is seen justifying domestic violence on women as a part of common middle-class men’s stress-release process. If a writer could come up with such character on screen that too without giving him a proper lesson at the end, I mourn the death of sensibility in such creative area of work. Even my anger is piling up for obvious reasons! Let’s end it here and here! [2/5]

Friday, 20 June 2014

HUMSHAKALS: Leave Entertainment, this is an insult to Cinema! [0.0/5]

Disclaimer: The fact that I had admired Sajid khan long back for being literally an encyclopedia to 70s-80’s Bollywood, especially with all the lesser known junior artists, character actors and the inside out gossips from every corner of the Bombay Film Industry, now hardly there to exist. Sajid Khan as a filmmaker has completely lost the respect even for being the tiniest part of this creative medium. So if in this review of mine, I sound unapologetically personal and too harsh sometimes, it’s purely intentional. Follows the review…

HUMSHAKALS is as illogical, as weird as its title. Neither there is a word like it in any of the dictionaries in the world, nor does this maddening world exist anywhere in this universe. Since it is supposedly a comedy of errors, I am going to try my best to make you laugh, or smile for that matter with some of its jokes. While working at a food-joint, one ‘Ashok & Kumar’ of the 3 look-alikes [Saif & Riteish; don’t bother who are the others] serves parathas made with cocaine and everyone around starts moving as either zombies or more like bhangra-lovers. Save yourself to witness them making ‘Vodka ke Parathe’. Don’t try this at your home!

The next ‘Ashok & Kumar’, escapees from mental asylum are seen playing with the life-supportive ventilator of an old man in coma [Akash Khurana as if he’s more comfortable there than being in the main league] as if it is some video game. Insensitive? Wait, there is more. The warden at the so called ‘CRAY G. Hospital’ [Played by Satish Shah] keeps torturing the patients with his favorite electric treatment performed with naked wires. Now, where on earth one uses that technique is barely matters if you are in a Sajid Khan World. This is the world where drops of a drug can turn you in dogs. People still apply Chloroform on hankies to make their targets passed out. A lollypop can heal the mental stroke.

Even all these can be overlooked if the very idea of entertainment is right, seriously, but it’s always like asking for too much from a Sajid Khan Film. Actually, it is an insult to your intellect and sensitivity as a human being. Homosexual men are again and again being portrayed as ‘always aroused’, moaning sex-starving guys. Characters cross-dress to seduce their look-alikes and fall into hysterically annoying love-cum-rape scenes. Songs come out of nowhere to just make it a loo-break in every 20-min or something. Considering the degree of stupidity Sajid throws at you, this is one nice & smartest move to keep viewers fresh like new from scratch. You should better take each one of them to survive the whole film.

Bipasha had earlier made it clear that she wasn’t happy with the outcome and that’s why she kept herself away from the film promotions. I wonder what made Saif not go for that option. Watching him suffer as an actor who can’t even crack a joke properly or deliver an ordinary piece of dialogue without hamming is a terrible experience! Riteish and Ram are not so bad comparatively. We better not discuss the girls. They are hardly there to impress with their acting skills.

At the end, I hope it is the end. Let’s just not take cinema for granted in the name of entertainment. Leave Entertainment alone, this is an insult to Cinema! I just can’t throw my precious stars on such waste of time, money and efforts of thousands of people on a film-set. Stay away, or else you might release your anger, aggression and distress caused by the film upon your friends and family! [0.0/5]         

Friday, 13 September 2013

GRAND MASTI: Cheap, disgusting, offensive, insensitive & a must if you think from your lower abdominal parts [0/5]

Why on earth do Bollywood adult-comedies have to have double-meaning dialogues that fall only for one intended meaning? And why on earth do writers for such sleazy entertainers have to use their boneless part of lower-abdomen area to think and not the obvious upper part primarily called as mind?
Well, if sex-comedies are like classic ALIEN series, Indra Kumar’s adult-comedy GRAND MASTI is Shirish Kunder’s JOKER. Both have common ingredients to offer viewers a good platter of entertainment but are still very divergent in recipe and in taste. The former is cheap, shameful, lousy, crappy, distasteful, disgusting, mean, offensive and everything else but funny.

Sequel to MASTI- the 2004’s surprise hit, GRAND MASTI revisits the dull, boring & ‘suck sex’ful married lives of Meet (Vivek Oberoi), Prem (Aftab Shivdasani) and Amar (Ritesh Deshmukh). Their wives are busy in everything around; from serving extended families non-stop like an adarsh- bahu to working late at boss’s place for better future & also in baby-sitting but all they ignore unpretentiously is the sexual desires [I can use the term ‘lost love in marital lives’ to be sober but trust me the film itself didn’t talk of it even in suggestion] of their husbands, as if that is the last thing on earth to stay alive. So, the trio seeks the alternate means of pleasure in their college reunion with barely clad sex-sirens sickeningly named as Rose, Mary & Marlow to be pronounced later in exact order for at least 60-70 times till you start hating such beautiful names.

I widely understand the need of below-the-belt jokes in any adult-comedy but the situation goes horribly wrong, monotonous & unbearable after a while when makers decide to stay there and there only to tickle I don’t know what bones of yours but certainly not the tickling one. So, you have weird sex-driven word-plays in every second sentences characters speak, old tasteless adult jokes getting re-enacted, forceful body-show and sequences literally hitting on every private part of human body. It goes on and on like the flat, flavorless rubber in your mouth [Chewing gum, I mean].

Also, there are times when it turns so absurd-so ridiculous you don’t want to look at the screen. Well, even these things you can take for granted in the name of entertainment but how can you not be sensitive or apologetic about offensive sequences where women & kids are being treated as a substance of pleasure without showing any love, respect or care for that matter. In one of scenes, Amar (Ritesh Deshmukh) blatantly curses his cutely adorable kid with a gesture like ‘kaash maine uss din nirodh ka virodh na kiya hota!’ and later offers him to a burglar to get rid of him. Painful!

There are no reasons that can justify its viewing except you are a sex-starved, low-IQed, male chauvinist who sees women as sex-object & doesn’t love/care/respect even their ladies at home. I regret watching it and very sorry as I didn’t think I would be also reviewing a soft-porn someday. Watch it at your own risk! [0/5]