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Friday, 24 November 2017

कड़वी हवा: एक जरूरी फिल्म, कड़वी दवा की तरह! [3.5/5]

किसानों की आत्महत्याएं अब अखबारों और समाचारों की सुर्खियाँ नहीं बटोर पातीं. खबर देने की गरज़ से किसी कोने-किनारे में जगह मिल भी जाती है, तो हम उसे पढ़ कर संवेदनाएं व्यक्त करने के नाम पर जीभ को उपरी तलुवे से तीन बार गिन कर चिपकाते हैं, छुड़ाते हैं और 'च्च, च्च, च्च' करने से ज़्यादे की ज़ेहमत भी नहीं उठाते. 'क्लाइमेट चेंज' की तो पूछिए ही मत! इस मुद्दे पर तो हमारा चिंतन, मनन और ज्ञान इतना सीमित है कि अप्रैल-मई में बेडरूम का एयर-कंडीशनर काम न करे, 'ग्लोबल वार्मिंग' के प्रभाव तभी याद आते हैं. इन दोनों ही लिहाज़ से नील माधव पंडा की 'कड़वी हवा' एक निहायत ही अच्छी और जरूरी फिल्म है. बंजर हो चले किसानों के रूंधे, सूखे गलों में घुटती चीखों, कराहों को सुन्न पड़ते कानों तक पहुंचाने में, 'कड़वी हवा' किसी कड़वी दवा की तरह ही पुरजोर असर करती है. 

बूढ़े बाबा (संजय मिश्रा) देख नहीं सकते, लेकिन हवा की खूब परख है उनको. कहते हैं, "आजकल हवा कुछ बीमार चल रही है". स्कूल में मास्टरजी पूछते हैं, "मौसम कितने होते हैं?"; बच्चे को दो ही पता हैं, सर्दी और गर्मी. बरसात तो वैसे भी कभी कभी ही होती है, कभी कभार सर्दी में, तो कभी गर्मी में. यहाँ खेतों में फसल कम उगती है, सरकारी कर्जों पर ब्याज़ अनचाही, मनमौजी बेल की तरह बढती ही रहती है. मोपेड पर बैंक का सरकारी एजेंट गन्नू (रनवीर शौरी) यमराज की तरह सबके हिसाब-किताब लेकर घूमता रहता है. बाबा के बेटे मुकुंद के सर का क़र्ज़ भी 25 हज़ार से बढ़कर 42 हज़ार तक पहुँच गया है. बाबा डरते हैं, कहीं रामसरन जैसे दूसरे किसानों की तरह ही उनका बेटा भी...!

सूखे, बंजर और रेतीले ज़मीनी समन्दर में लाठी टेकते-टेकते भटकते हुए बूढ़े बाबा के किरदार में संजय मिश्रा बहुत कम बोलते हैं, और सिर्फ जरूरत का ही बोलते हैं, पर उनके अन्दर की कराह, बदलते मौसम और कर्जे में डूबे परिवार की परवाह आपको हर वक़्त, हर फ्रेम में सुनाई देती है. बाप-बेटे में बातचीत नहीं होती, ऐसे में एक दिन बेटा बाबा को घर से बिना बताये बाहर जाने के लिए डांटता है, और बाप सिर्फ इतने से खुश कि इसी बहाने आज मुकुंद ने उनसे बात तो की. संजय मिश्रा इस भूमिका को कुछ इस हद तक परदे पर जीवंत रखते हैं कि आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं, आखिरकार एक नेत्रहीन किरदार के रूप में इतना सजीव अभिनय आपने आखिरी बार किसका, कब और कहाँ देखा था? 'चौरंगा' के धृतिमान चटर्जी मेरे ज़ेहन में तुरंत आ जाते हैं. 

कुछ ऐसा ही कमाल रनवीर शौरी भी कर गुजरते हैं. हालाँकि उनके किरदार की बोलचाल पहले पहल आपको अटपटी सी लगती है, पर धीरे-धीरे जब आप पर उनके उड़िया होने का खुलासा ज़ाहिर होता है, आप उनके किरदार के साथ बेपरवाह जुड़ने लगते हैं. तिलोत्तमा शोम चौंकाती हैं. कुछेक दृश्यों में उनका अभिनय चेहरे के भावों का मोहताज़ भी नहीं रहता और अपना लोहा बड़ी मजबूती से मनवा जाता है. 

'कड़वी हवा' जिस ठहराव के साथ आपको खेतिहर किसानों की जिंदगी में उठते-बनते झंझावातों की तरफ धकेलती है, आप चाह कर भी उन ज़ज्बातों से अछूते नहीं रह पायेंगे. दृश्यों को सच्चाई के एकदम आसपास तक लाकर छोड़ जाने में नील माधव पंडा बखूबी सफल रहते हैं. गर्मी से बदहाल सरकारी बैंक के कर्मचारी बनियान में ही अपना काम निपटा रहे हैं. पैसों की वसूली के लिए यमराज बने घूमते गन्नू पर भी दूधवाले का दो महीने से पैसा उधार है. इसी संजीदगी के साथ 'कड़वी हवा' पहले तो आपको किरदारों से जोड़ती है, फिर उनकी कहानी का हिस्सा बनने का पूरा-पूरा मौका देती है, ताकि अंत तक आते-आते जब एक नाटकीय मोड़ के सहारे आपको फिल्म और कहानी के मुख्य खलनायक (क्लाइमेट चेंज) से रूबरू होना पड़े, तो न सिर्फ आप सिहर उठें, बल्कि थिएटर छोड़ते-छोड़ते इस बेहद जरूरी मुद्दे को कम आंकने की भूल से भी बचें. [3.5/5]                

Friday, 22 September 2017

न्यूटन: लोकतंत्र का तमाशा! सिनेमा का जश्न! [4.5/5]

चुनावों के वक़्त टीवी चैनलों और अखबारों में, नाखूनों पे लगी स्याही दिखाते जोशीले चेहरों की तस्वीरें कितने फ़क्र से भारत में लोकतंत्र की बहाली, चुनावों की कामयाबी और जनता के प्रतिनिधित्व का सामूहिक जश्न बयाँ करतीं हैं. ऐसा ही एक दृश्य अमित मासुरकर की 'न्यूटन' में भी है, मगर जब तक फिल्म में ये दृश्य आता है, आँखों के आगे से सारे परदे गिर चुके होते हैं, आसमान से झूठ के बादल छंट चुके होते हैं और अब उन्हीं चेहरों से भारत में लोकतंत्र की खोखली इमारत का सच टुकुर-टुकुर झाँक रहा होता है. ठीक वैसे ही, जैसे किसी बच्चे को खिलौना दिखाकर उसके हाथ में सिर्फ खाली पैकेट थमा दिया गया हो. 'न्यूटन' बिना शक आज के राजनीतिक माहौल और सरकारी तंत्र की खामियों पर एक सही, सीधी और सटीक टिप्पणी है.  

सोते हुओं को जगाने के लिए, 'न्यूटन' छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्र दंडकारण्य को अपनी प्रयोगशाला बनाती है. स्थानीय प्रत्याशी की हत्या के बाद क्षेत्र में दुबारा चुनाव कराये जा रहे हैं, सेना की देखरेख में. नौजवान चुनाव अधिकारी (राजकुमार राव) अपने नाम की तरह ही अजीब है, अजब है, अकडू है. अपना नाम न्यूटन उसने खुद ही रखा था, नूतन कुमार से बदल कर. 'आई वांट टू मेक अ डिफरेंस' वाली फैक्ट्री से निकला है, घोर ईमानदारी का पुतला है. सिर्फ 76 मतदाताओं वाले पोलिंग बूथ पे चुनाव कराना कौन सी बड़ी बात है, मगर आर्मी अफसर आत्मा सिंह (पंकज त्रिपाठी) का डरना-डराना भी जायज़ है. ये वो इलाका है, जहां के बारे में टीवी स्टूडियोज में बैठे सूट-बूट वाले न्यूज़ एंकर्स को ज्यादा पता है, और उनकी चीख-चिल्लाहट में हमने भी काफी कुछ सुन (ही) रखा है. "अपने ही लोग हैं, अपने ही लोगों के खिलाफ हैं", "देशद्रोही हैं स्साले, देश बांटने की मांग करते हैं", "चींटी की चटनी खाते हैं, बताओ!", वगैरह, वगैरह. 

खैर, 'न्यूटन' किसी भी तरह और तरीके से नक्सल की समस्या पर पक्ष-विपक्ष का पाला चुनकर बैठ जाने की कोशिश नहीं करती, बल्कि फिल्म के समझदार और ईमानदार नजरिये की वजह से आप जरूर अपने आप को इस दुविधा में अक्सर लड़खड़ाते हुए पाते हैं. लोकल बूथ लेवल ऑफिसर मलको (अंजलि पाटिल) जब भी बातों-बातों में वहाँ के लोगों की बात सामने रखती है, आपके नजरिये को एक ठेस, एक धक्का जरूर लगता है. आत्मा सिंह जब बन्दूक न्यूटन के हाथ में थमा कर कहता है, 'ये देश का भार है, और हमारे कंधे पर है'; या फिर जब विदेशी रिपोर्टर पूछती है, 'चुनाव सुचारू रूप से चलाने के लिए आपको क्या चाहिए?" और उसका जवाब होता है, "मोर वेपन (और हथियार)!"; वो आपको खलनायक नहीं लगता, बल्कि आपको उसकी हालत और उसके हालात पर दया ज्यादा आती है. वो भी उसी सिस्टम का मारा है, और महंगा जैतून का तेल खरीदते वक़्त उसके माथे पर भी शिकन आती है.  

फिल्म के एक दृश्य में गाँवों से लोग मतदान के लिए जुटाए जा रहे हैं, और बराबर के दृश्य में एक महिला काटने-पकाने के लिए मुर्गियां पकड़ रही है. 'न्यूटन' इस तरह के संकेतों और ब्लैक ह्यूमर की दूसरी ढेर सारी मिसालों के जरिये आपका मनोरंजन भी खूब करती है, और आपको सोचने पे मजबूर भी. आत्मा सिंह नाश्ता करते हुए कहता है, "बड़ी इंटेंरोगेशन के बाद मुर्गियों ने अंडे दिये हैं". न्यूटन के पूछने पर कि क्या वो भी निराशावादी है?, मलको टन्न से बोल पड़ती है, "मैं आदिवासी हूँ'. खंडहर पड़े प्राइमरी स्कूल में बने बूथ में सब अपनी-अपनी कुर्सियों पर बैठे-बैठे लोगों के आने का इंतज़ार कर रहे हैं, माहौल शांत है, पर धीरे-धीरे आपको सरकारी तंत्र और खोखले दावों की चरमराहट सुनाई देनी शुरू हो जाती है.

इतने सब उथल-पुथल और खामियों के बावज़ूद, 'न्यूटन' एक आशावादी फिल्म बने रहने का दम-ख़म दिखाने में सफल रहती है. न्यूटन की ईमानदारी, उसकी साफगोई, बदलाव के लिए उसकी ललक कहीं न कहीं आपको उसकी तरफ खींच कर ले जाती है. ऐसे न्यूटन अक्सर सरकारी दफ्तरों में किसी अनजाने टेबल के पीछे दफ़न भले ही हो जाते हों, उनकी कोशिशों का दायरा भले ही बहुत छोटा रह जाता है, पर समाज में बदलाव की जो थोड़ी बहुत रौशनी बाकी है, उन्हीं से है. ठीक 9 बजे ऑफिस आ जाने वालों पर हँसते तो हम सभी हैं, पर शायद ऐसे न्यूटन भी उन्हीं में से एक होते हैं. फिल्म में ट्रेनर की भूमिका में संजय मिश्रा फरमाते हैं, "ईमानदार होके आप कोई एहसान नहीं कर रहे, ऐसा आपसे एक्सपेक्टेड है'. कम से कम फिल्म इस कसौटी पर सौ फीसदी सही साबित होती है.

राजकुमार राव और पंकज त्रिपाठी की बेहतरीन अदाकारी, रघुवीर यादव, अंजलि पाटिल और संजय मिश्रा के सटीक अभिनय और मयंक तिवारी के मजेदार संवादों से लबालब भरी 'न्यूटन' साल की सबसे अच्छी फिल्म तो है ही, अपने विषय-वस्तु की वजह से बेहद जरूरी भी, और 'उड़ान', 'आँखों-देखी', 'मसान' जैसी नए भारत के नए सिनेमा की श्रेणी और शैली की मेरी पसंदीदा, चुनिन्दा फिल्मों में से एक. [4.5/5]       

Saturday, 18 June 2016

धनक: मासूम, मजेदार, मनोरंजक!! [3.5/5]

एक सच की दुनिया है जो हमारे आस-पास चारों तरफ पसरी है, और एक दुनिया है जैसी हम अपने लिये तलाशते हैं, जिसके होने में हम यकीन करना चाहते हैं. अपने देश के साथ भी ऐसा ही कुछ कनेक्शन है हमारा. एक, जैसी हम देखना चाहते हैं, मानना चाहते हैं और दूसरा जो वाकई में है. नागेश कुकूनूर की ‘धनक’ हमारी परिकल्पना और सच्चाई की इन्हीं दो दुनियाओं के बीचोंबीच कहीं बसी है. अगर आप अच्छे हैं, दिल के सच्चे हैं तो आपके साथ बुरा कैसे हो सकता है? परीकथाओं में अक्सर इस तरह के मनोबल बढ़ाने और नेकी की राह पर चलते रहने के लिए हिम्मत बंधाने वाली उक्तियाँ आपने भी पढ़ी या सुनी होंगी. ‘धनक’ किसी एक प्यारी और मजेदार परी-कथा जैसी ही है, जिसमें बहुत सारे अच्छे लोग हैं और जो बुरे भी हैं वो सदियों पुराने, जाने-पहचाने जैसे हमेशा कोसते रहने वाली ‘डायन’ चाची और बच्चे उठाने वाला दुष्ट गिरोह.

बड़ी फिल्मों में अपनी बात का लोहा मनवाने के लिए कई तरह के हथकंडे आजमाए जाते हैं. अभिनय जगत के बड़े-बड़े नाम, पब्लिसिटी का ज़ोर-शोर, शानदार सेट्स की चकाचौंध और खूबसूरत विदेशी लोकेशन्स, पर ‘धनक’ जैसी छोटी फिल्मों के पास सिर्फ एक ही रामबाण होता है...बड़ी ही सादगी से कही गयी एक जादुई कहानी, जो दिल छू जाए! राजस्थान के एक छोटे से गाँव में छोटू [कृष छाबड़िया] अपनी बहन परी [हेतल गडा] और चाचा-चाची के साथ रहता है. छोटू देख नहीं सकता. एक बीमारी ने उसकी आँखें लील लीं. पर चार साल पहले उसने ‘दबंग’ देखी थी और आज तक सलमान ‘भाई’ का फैन है, जबकि उसकी बहन ‘सारुक खान’ को पसंद करती है. ‘नेत्रदान महादान’ के पोस्टर में शाहरुख़ खान को देख कर परी मान बैठी है कि उसके भाई की आँखें अब वो ही ला सकता है. ऐसे में, एक दिन खबर मिलती है शाहरुख़ खान जैसलमेर से कहीं शूटिंग कर रहा है. बस, परी छोटू को लेकर निकल पड़ती है उसकी आँखें दिलाने.

धनक’ एक ऐसी फिल्म है जो अपनी मासूमियत कभी खोने नहीं देती. रिश्तों में अपनापन, प्यार और मीठी तकरार का भरपूर लुत्फ़ आपको देती है. होशियार परी 2-3 साल से लगातार फ़ेल हो रही है, ताकि वो अपने छोटे भाई की क्लास में आ जाये. तालाब से पानी भरने जाती है तो छोटू को अपने साथ-साथ दुपट्टे से बांधे रखती है. छोटू हालाँकि बहुत चंट है. गलतियों के लिये डांट पड़ने पर बड़ी चालाकी से अपने अंधेपन की दुहाई देकर बच जाता है. और चटोर भी बहुत. बहरहाल, फिल्म ऐसे पलों से पटी पड़ी है, जहां छोटू का बडबोलापन और उसकी साफगोई आपको ठहाके लगाने पर मजबूर कर देते हैं. मसलन, एक दृश्य में छोटू से उसका एक दोस्त शमशेर बड़ी संजीदगी से पूछता है, “तेरी बहन की शादी के बाद तू क्या करेगा?” “तो भी मैं उसके साथ ही रहूँगा, उसके आदमी को तकलीफ़ नहीं हुई तो?” शमशेर थोड़ा रुक कर कहता है, “मैं अगर उसका पति होता तो मुझे कोई दिक्कत नहीं होती” “तुझे पसंद है वो?” “सोणी है छोरी” “ठीक है, कल मैं रिश्ते की बात करता हूँ”, 8 साल का छोटू बेबाकी से बोल देता है.         

धनक’ की ख़ूबसूरती राजस्थान के रंग-रंगीले परिवेश और उससे भी रंगीन किरदारों में छुपी हुई है. तुनकमिजाज़, पर मासूमियत से भरे छोटू और पूरी शिद्दत से उसे चाहने, उसका ध्यान रखने वाली परी के अलावा इस फिल्म में आधा दर्जन से ज्यादा और अजब-अनोखे किरदार हैं जो आपका मनोरंजन करने के लिए हमेशा एक पैर पर खड़े रहते हैं. शाहरुख़ से अपनी दोस्ती जताने वाला छैल-छबीला [राजीव लक्ष्मण, ‘रोडीज़’ वाले], राजस्थानी लोकगायक [विजय मौर्या], हवा में स्टेयरिंग पकड़े ट्रक चलाने वाला पागल [सुरेश मेनन], शाहरुख़ के साथ अपनी सेल्फी के साथ गाँव वालों की सेल्फी खिंचाने के लिए पैसे उगाही करने वाला [निनाद कामत], गोल-चिकने पत्थरों से भविष्य बताने वाली जादूगरनी बुढ़िया [भारती अर्चेकर] और चमत्कारी माता के भेष में भक्तों को ठगती एक थिएटर आर्टिस्ट [विभा छिब्बर]. यकीन मानिए, इनमें से हर किरदार आपको गुदगुदाने में कामयाब साबित होता है.

अंत में, नागेश कुकूनूर की ‘धनक’ बारिश में इन्द्रधनुष की तरह ही है. देखते ही दिल छोटे बच्चे जैसा खिल उठता है. कृष छाबड़िया और हेतल गडा का अभिनय आपको पूरी फिल्म में बांधे रखता है. ‘धनक’ शायद साल की सबसे मनोरंजक फिल्म है. सौ करोड़ की दौड़ में मनोरंजन के मायने अपने अपने मतलब से तोड़-मरोड़ कर पेश करने वाली तमाम ‘फूहड़’ फिल्मों से आज़िज आ गए हों तो इस पते पर दरवाजा खटखटाइये, आप बिलकुल निराश नहीं होंगे! [3.5/5]     

Friday, 27 May 2016

वेटिंग (A): नसीर-कल्कि का अभिनय ही काफी है! [3/5]

अस्पताल के ‘वेटिंग रूम’ में खाली कैनवस जैसी बेदाग़-बेरंग दीवार पे टंगी घड़ी में सिर्फ छोटी-बड़ी दो सुईयां ही नज़र आ रही हैं. सही, सटीक और तय वक़्त जानने के लिए घंटों की गिनती और उनके बीच के मिनटों के फ़ासले जैसे किसी ने रबर से मिटा दिए हों. यहाँ इनकी कोई ख़ास जरूरत भी नहीं है. जब इंतज़ार का रास्ता लम्बा हो तो घंटे-मिनट-सेकंड वाले छोटे-छोटे मील के पत्थरों को नज़रअंदाज़ करना ही पड़ता है. कुछ ने इस फ़लसफ़े को अच्छी तरह समझ लिया है, जैसे प्रोफेसर शिव नटराज [नसीर साब] जिनकी पत्नी पिछले आठ महीनों से कोमा में हैं. तारा देशपांडे [कल्की] के लिए अभी थोड़ा मुश्किल है. शादी को अभी 6 महीने ही हुए थे और आज तारा का पति [अर्जुन माथुर] एक रोड-एक्सीडेंट के चलते आईसीयू में भर्ती है. दुःख को झेलने-सहने और समझने के अलग-अलग पड़ाव होते हैं, प्रोफेसर अगर आख़िरी पड़ाव पर हैं तो तारा के लिए अभी शुरुआत ही है.

अनु मेनन की ‘वेटिंग’ ज़िन्दगी और मौत के बीच के खालीपन से जूझते दो ऐसे अनजान लोगों के इर्द-गिर्द घूमती है जिनमें कहने-सुनने-देखने में कुछ भी एक जैसा नहीं है, पर एक पीड़ा, एक व्यथा, एक दुविधा है जो दोनों को एक दूसरे से बांधे रखती है. प्रोफ़ेसर शिव धीर-गंभीर और शांत हैं, जबकि तारा अपनी झुंझलाहट-अपना गुस्सा दिखाने में कोई शर्म-लिहाज़ नहीं रखती. तारा को मलाल है कि ट्विटर पर उसके पांच हज़ार फ़ॉलोवर्स में से आज उसके पास-उसके साथ कोई भी नहीं, जबकि प्रोफ़ेसर को अंदाज़ा ही नहीं ट्विटर क्या बला है? इसके बावज़ूद, अपने अपनों को खो देने का डर कहिये या फिर वापस पा लेने की उम्मीद, दोनों एक-दूसरे से न सिर्फ जुड़े रहते हैं, अपना असर भी एक-दूसरे पर छोड़ने लगे हैं. ‘नम्यो हो रेंगे क्यों का जाप करने वाली तारा कभी खुद को नास्तिक कहलाना पसंद करती थी, कौन मानेगा? वहीँ प्रोफ़ेसर को आज ‘एफ़-वर्ड’ कहने में भी कोई दिक्कत पेश नहीं आती.

वेटिंग’ बड़ी ईमानदारी से और बहुत ही इमोशनल तरीके से इन दो किरदारों के साथ आपको ज़िन्दगी के बहुत करीब लेकर जाती है. हालाँकि अस्पताल जैसा नीरस-उदास और बेबस माहौल हो तो फिल्म के भी उसी सांचे में ढल जाने का डर हमेशा बना रहता है, पर अतिका चौहान के मजेदार संवाद हमेशा इस नीरसता को तोड़ने में कामयाब रहते हैं. फिल्म जहां एक तरफ बड़ी संजीदगी से आपको लगातार ज़िन्दगी और मौत से जुड़े कुछ अहम् सवालों के आस-पास खींचती रहती है, दूसरी ओर वो इस कोशिश में भी लगी रहती है कि आपका दिल नम रहे, चेहरे पर मुस्कराहट बराबर बनी रहे और आप बड़ी तसल्ली से तकरीबन सौ मिनट की इस फिल्म का पूरा लुत्फ़ लें.

अभिनय में नसीर साब और कल्कि एक दूसरे को पूरी तरह कम्पलीट और कॉम्प्लीमेंट करते नज़र आते हैं. नसीर साब के साथ एक ख़ास सीन में, जहां दोनों एक-दूसरे पर बरबस बरस रहे होते हैं, कल्कि अपनी एक  अलग छाप छोड़ने में सफल रहती हैं. नसीर साब के तो कहने ही क्या! मतलबी से दिखने वाले डॉक्टर की भूमिका में रजत कपूर, बनावटी दोस्त की भूमिका में रत्नाबली भट्टाचार्जी और बेबाक, दो-टूक सहकर्मी बने राजीव रविन्द्रनाथन जंचते हैं.

सिनेमा बदल रहा है. सिनेमा से ‘अति’ विलुप्त होता जा रहा है. अनु मेनन की ‘वेटिंग’ भी इसी अहम् बदलाव का एक हिस्सा है. (इस तरह की) फिल्मों में नाटकीयता के लिए अब शायद ही कहीं कोई जगह बची है. कथानक से अब बेमतलब के ज़ज्बाती रंग हटने लगे हैं. जिसे जो कहना है, उसी लहजे से कह रहा है जिसमें उस किरदार की पैठ हो. तैयार रहिये, कई बार ये आपको विचलित भी कर सकता है. [3/5]

Friday, 8 January 2016

चौरंगा (A): नाटकीयता से परे, वास्तविकता का सिनेमा! [4/5]

जातिगत विसंगतियों के दुष्प्रभाव, छूत-अछूत के लाग-लपेट और धर्म के नाम पर विकलांग मानसिकता का परिचय देते भारतीय समाज को हमने पहले भी श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलाणी के सिनेमा में तार-तार होते देखा है. ‘चौरंगा’ भी काफी हद तक इसी दायरे में फैलती-सिमटती दिखाई देती है, इसीलिए एक मूल प्रश्न बार-बार दिमाग में कौंधता रहता है. ‘क्या कुछ भी नहीं बदला है?’ उत्तर फिल्म ख़तम होने के तुरंत बाद कुछ सरकारी तथ्यों के परदे पर उभरने के साथ ही मिलने शुरू हो जाते हैं. सच में, कुछ भी नहीं बदला है. और अगर नहीं बदला है तो सिर्फ सिनेमा में बदलाव दिखा देने भर से क्या सचमुच बदलाव आ जायेगा? ‘चौरंगा’ की पृष्ठभूमि, ‘चौरंगा’ के कथानक और ‘चौरंगा’ के पात्रों से पुराने होने की गंध भले ही आती हो, पर ‘चौरंगा’ के प्रासंगिकता की चमक पर कहीं कोई धूल जमी दिखाई नहीं देती. ‘चौरंगा’ एक सार्थक कोशिश है भारतीय समाज के उस एक वर्ग को टटोलने में, जिसे हम शहरी चकाचौंध के लिए कहीं अँधेरे में छोड़ आये हैं.

साहब (संजय सूरी) गाँव वालों के लिए हैंडपंप लगवा रहे हैं. पंचायत के पैसों से ही सही, लेकिन साहब ने आज पूरे गाँव के लिए भोज और सिनेमा का प्रबंध कराया है. साहब दलितों को लात मार सकते हैं पर दलित अगर साहब का पैर छूने जाएँ, तो साहब छिटक पड़ते हैं. रात के अँधेरे में तो साहब और भी दयालु हो उठते हैं, सूअर पालने वाली धनिया (तनिष्ठा चैटर्जी) से ऐसे लिपटते हैं जैसे चन्दन के पेड़ से सांप. धनिया भी क्या करे? मौका देख के साहब से बेटों की पढाई-लिखाई का इंतज़ाम करवा ही लेती है. बड़ा बेटा बजरंगिया (रिद्धि सेन) खप गया है. पढ़ाई के साथ साथ इस विकृत सामाजिक ढाँचे को जानने-समझने लगा है पर छोटा बेटा संतू (सोहम मैत्रा) अभी भी सवालों का टेपरिकॉर्डर लिए घूमता रहता है. साहब की बेटी से प्यार होने लगा है उसे, और उसकी मानें तो लड़की भी कभी-कभी देख लेती है उसकी ओर.

‘चौरंगा’ का संसार सिनेमा के प्रभाव में फंसने की गलती नहीं करता. वास्तविकता के चित्रण में नाटकीयता का थोड़ा भी दखल महसूस नहीं होने देता. बिकाश रंजन मिश्रा अपनी पहली ही फिल्म में इस उंचाई को बड़ी सहजता से छू जाते हैं, देख कर ख़ुशी भी होती है और हैरानी भी. बजरंगिया और संतू के बीच के दृश्य फिल्म को बांधे रखते हैं. ये वो दृश्य हैं जहां कच्ची उम्र की मासूमियत भी है, बन्धनों में जकड़े रहने की पीड़ा भी है और सब कुछ तोड़, भाग निकलने की उमंगें भी हैं. फिल्म के कुछ किरदार अँधेरे में बहुत भयावह लगने लगते हैं, जैसे यौन कुंठा से ग्रस्त अंधे पुजारी बाबा [धृतिमान चैटर्जी]. पर मिश्रा कहीं भी फिल्म को सनसनीखेज बना कर बेचने की भूल नहीं करते.

अभिनय की दृष्टि से संजय सूरी सबसे ज्यादा हैरान करते हैं. उन्हें इस तरह के ठेठ गंवई किरदार में देखने का तजुर्बा किसी को भी नहीं रहा है, और वो बखूबी जंचते हैं. ‘माय ब्रदर निखिल’ के बाद ये उनकी सबसे बेहतरीन अदाकारी है. तनिष्ठा को हम पहले भी इस तरह के किरदारों में देखते आये हैं. उन्हें तो एक तरह से महारत हासिल है. धृतिमान चैटर्जी का अभिनय किसी सपने जैसा है, आपको बार बार खुद को एहसास दिलाना पड़ता है कि आप सिनेमा ही देख रहे हैं. और अंत में दोनों बाल कलाकार, अभिनय में जिनकी सहजता और सरलता लाजवाब है.

‘चौरंगा’ उन सभी लोगों के लिए है, जिन्हें अक्सर शिकायत रहती है कि अच्छी फिल्में अब कहाँ बनती हैं? ‘आँखों देखी’, ‘मसान’, ‘अमरीका’ और ‘चौरंगा’ जैसी ‘भारतीय’ फिल्मों के साथ नए भारत का सिनेमा अब अपने मानक खुद तय करने लगा है. थोड़ी पहल आपको भी करनी होगी. जरूर देखिये! [4/5]