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Friday, 23 September 2016

पार्च्ड (A): हम सब ‘बोल्ड’ हैं! [3.5/5]

हाव-भाव और ताव में लीना यादव की ‘पार्च्ड’ पिछले साल रिलीज़ हुई पैन नलिन की ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेज’ से बहुत कुछ मिलती-जुलती है, और अपने रंग-रूप में केतन मेहता की ‘मिर्च मसाला’ जैसी तमाम भारतीय सिनेमा के मील के पत्थरों से भी. जाहिर है, इस तरह का ‘पहले बहुत कुछ देख लेने’ की ऐंठ आप में भी उठेगी, पर जिस तरह की बेबाकी, दिलेरी और दबंगई ‘पार्च्ड’ दिखाने की हिमाकत करती है, वो कुछ अलग ही है. यहाँ ‘आय ऍम व्हाट आय ऍम’ का जुमला बेडरूम के झगड़ों और कॉफ़ी-टेबल पर होने वाली अनबन में सिर्फ जीत भर जाने के लिए इस्तेमाल नहीं किया जाता. ‘पार्च्ड’ अपने किरदारों को उनके तय मुकाम तक छोड़ आने तक की पूरी लड़ाई का हिस्सा बन कर एक ऐसा सफ़रनामा पेश करती है, जो हमारी ‘घर-ऑफिस, ऑफिस-घर’ की रट्टामार जिन्दगी से अलग तो है, पर बहुत दूर और अनछुई नहीं.   

लम्बे वक्त से दबी-कुचली, गरियाई-लतियाई और सताई जा रही गंवई औरतों के सर पर पहाड़ जैसा भारी हो चला घूंघट अब मिट्टी के ढूहे सा भरभराकर सरकने लगा है. सारी की सारी घुटन, चुभन, सहन अब धरती के आँचल में दबे लावे की तरह फूटने की हद तक आ पहुंची है. धागे जैसे भी हों, मोह के, लाज के, समाज के, सब के सब टूटने लगे हैं. रानी [तनिष्ठा चैटर्जी] विधवा है, जो अपने ही जवान बेटे की खरी-खोटी सुनती है. शायद इसीलिए क्यूँकि 15-16 साल का ही सही, वो भी एक मर्द है और रानी जैसियों को मर्दों की सुननी पड़ती है. लज्जो [राधिका आप्टे] बाँझ हैं, जिसे कोई अंदाज़ा भी नहीं कि मर्द भी बाँझ हो सकते हैं. बिजली [सुरवीन चावला] मर्दों के मनोरंजन का सामान है. गाँव की डांस कंपनी में ‘खटिया पे भूकंप’ जैसे गानों पर मर्दों को जिस्म दिखाती भी है और परोसती भी है, पर अपनी मर्ज़ी से! जानकी [लहर खान] बालिका-वधू है, जिसे रानी अपने बेटे के लिए शादी के नाम पर खरीद लायी थी.

पार्च्ड’ इन सबके और दूसरे कई और छोटे-छोटे किरदारों के साथ औरतों के साथ होने वाले हर तरह के अमानवीय कृत्यों का कच्चा-चिट्ठा खोल के सामने रखती है. ‘पढ़-लिख कर कौन सा इंदिरा गाँधी बनना है?’ जैसे उलाहनों से लेकर मणिपुर से आई बहू को ‘विदेशी’ कहने और शादी में सामूहिक घरेलू यौन-उत्पीड़न जैसी घिनौनी कुरीतियों तक, फिल्म एक सिरे से बहुत कुछ और सब कुछ एक साथ कहने की कोशिश करती है. गनीमत है कि इस बार घटनाक्रम पुराने ढर्रे के सही, पर ‘एंग्री इंडियन गॉडेसेस’ की तरह जल्दबाजी भरे और बनावटी नहीं लगते. बिना किसी शर्म, झिझक और लिहाज़ की परवाह करते गंवई संवाद जिनमें गाली-गलौज के साथ-साथ यौन-संबंधों से जुड़े कई खांटी शब्दों की भरमार दिखती है, और कुछ बहुत संवेदनशील दृश्य जिनके खुलेपन में लीना का (एक औरत का) निर्देशक होना ज़रूर मददगार साबित हुआ होगा, फिल्म को एक आज़ाद ख्याल और अलग अंदाज़ दे जाते हैं.

कई मामलों में फिल्म एक खालिस ‘औरतों की फिल्म’ कही जा सकती है. कैमरा सामने होने की झिझक कई बार झलकियों में भी नहीं दिखती. फिल्म मजेदार पलों से पटी पड़ी है. बिजली का ‘मर्दों वाली गालियाँ’ ईजाद करना, ‘वाइब्रेशन मोड’ पर मोबाइल के साथ लज्जो का ‘वाइब्रेटर-एक्सपीरियंस’, रानी का फ़ोन पर अनजान ‘लवर’ से बातचीत, फिल्म बड़ी बेहयाई से आपका भरपूर मनोरंजन करती है. फिल्म का तडकता-भड़कता संगीत एक और पहलू है, जो संजीदा कहानी के बावजूद आपके मूड को हर वक़्त फिल्म में दिलचस्प बनाये रखता है. कैमरे के पीछे जब ‘टाइटैनिक’ के रसेल कारपेंटर और एडिटिंग टेबल पर ‘नेबरास्का’ के केविन टेंट जैसे दिग्गजों की फौज हो, तो फिल्म के टेक्निकल साज़-ओ-सज्जा पर कौन ऊँगली उठा सकता है?

अभिनय में सुरवीन चावला सबसे ज्यादा चौंकाती हैं. उनके किरदार में जिस तरह की बोल्डनेस दिखती है, और दूसरे हिस्सों में उनका इमोशनली टूटना, सुरवीन कहीं भी डांवाडोल नहीं होतीं. राधिका और तनिष्ठा दोनों के लिए इन किरदारों में कुछ बहुत नया न होते हुए भी, दोनों बहुत सधे तरीके से अपने किरदारों को जिंदा रखती हैं. अन्तरंग दृश्यों में राधिका का समर्पण काबिले-तारीफ है. तनिष्ठा तो शबाना आज़मी हैं ही आजकल के ‘अर्थपूर्ण सिनेमा’ के दौर की. अन्य भूमिकाओं में सुमित व्यास और बिजली के मतलबी आशिक़ की भूमिका में राज  शांडिल्य सटीक चुनाव हैं.

अंत में; ‘पार्च्ड’ औरतों को देह-सुख का सामान और बिस्तर पर बिछौना मात्र मानने वाली पुरुष-सत्ता के खिलाफ ‘पिंक’ की तरह कोई तेज-तर्रार आवाज़ भले ही न उठाती हो, औरतों की आज़ादी के हक़ में एक ऐसी हवा तो ज़रूर बनाती है, जहां मर्दों की तरफ से लाग-लपेट, लाज-लिहाज़ का कोई बंधन मंजूर नहीं. प्रिय महिलाएं, ‘सास-बहू और नागिन’ जैसे सीरियलों की गिरफ्त से अगर छूट पाएं, तो ज़रूर देखने जाएँ! [3.5/5]  

Friday, 8 January 2016

चौरंगा (A): नाटकीयता से परे, वास्तविकता का सिनेमा! [4/5]

जातिगत विसंगतियों के दुष्प्रभाव, छूत-अछूत के लाग-लपेट और धर्म के नाम पर विकलांग मानसिकता का परिचय देते भारतीय समाज को हमने पहले भी श्याम बेनेगल और गोविन्द निहलाणी के सिनेमा में तार-तार होते देखा है. ‘चौरंगा’ भी काफी हद तक इसी दायरे में फैलती-सिमटती दिखाई देती है, इसीलिए एक मूल प्रश्न बार-बार दिमाग में कौंधता रहता है. ‘क्या कुछ भी नहीं बदला है?’ उत्तर फिल्म ख़तम होने के तुरंत बाद कुछ सरकारी तथ्यों के परदे पर उभरने के साथ ही मिलने शुरू हो जाते हैं. सच में, कुछ भी नहीं बदला है. और अगर नहीं बदला है तो सिर्फ सिनेमा में बदलाव दिखा देने भर से क्या सचमुच बदलाव आ जायेगा? ‘चौरंगा’ की पृष्ठभूमि, ‘चौरंगा’ के कथानक और ‘चौरंगा’ के पात्रों से पुराने होने की गंध भले ही आती हो, पर ‘चौरंगा’ के प्रासंगिकता की चमक पर कहीं कोई धूल जमी दिखाई नहीं देती. ‘चौरंगा’ एक सार्थक कोशिश है भारतीय समाज के उस एक वर्ग को टटोलने में, जिसे हम शहरी चकाचौंध के लिए कहीं अँधेरे में छोड़ आये हैं.

साहब (संजय सूरी) गाँव वालों के लिए हैंडपंप लगवा रहे हैं. पंचायत के पैसों से ही सही, लेकिन साहब ने आज पूरे गाँव के लिए भोज और सिनेमा का प्रबंध कराया है. साहब दलितों को लात मार सकते हैं पर दलित अगर साहब का पैर छूने जाएँ, तो साहब छिटक पड़ते हैं. रात के अँधेरे में तो साहब और भी दयालु हो उठते हैं, सूअर पालने वाली धनिया (तनिष्ठा चैटर्जी) से ऐसे लिपटते हैं जैसे चन्दन के पेड़ से सांप. धनिया भी क्या करे? मौका देख के साहब से बेटों की पढाई-लिखाई का इंतज़ाम करवा ही लेती है. बड़ा बेटा बजरंगिया (रिद्धि सेन) खप गया है. पढ़ाई के साथ साथ इस विकृत सामाजिक ढाँचे को जानने-समझने लगा है पर छोटा बेटा संतू (सोहम मैत्रा) अभी भी सवालों का टेपरिकॉर्डर लिए घूमता रहता है. साहब की बेटी से प्यार होने लगा है उसे, और उसकी मानें तो लड़की भी कभी-कभी देख लेती है उसकी ओर.

‘चौरंगा’ का संसार सिनेमा के प्रभाव में फंसने की गलती नहीं करता. वास्तविकता के चित्रण में नाटकीयता का थोड़ा भी दखल महसूस नहीं होने देता. बिकाश रंजन मिश्रा अपनी पहली ही फिल्म में इस उंचाई को बड़ी सहजता से छू जाते हैं, देख कर ख़ुशी भी होती है और हैरानी भी. बजरंगिया और संतू के बीच के दृश्य फिल्म को बांधे रखते हैं. ये वो दृश्य हैं जहां कच्ची उम्र की मासूमियत भी है, बन्धनों में जकड़े रहने की पीड़ा भी है और सब कुछ तोड़, भाग निकलने की उमंगें भी हैं. फिल्म के कुछ किरदार अँधेरे में बहुत भयावह लगने लगते हैं, जैसे यौन कुंठा से ग्रस्त अंधे पुजारी बाबा [धृतिमान चैटर्जी]. पर मिश्रा कहीं भी फिल्म को सनसनीखेज बना कर बेचने की भूल नहीं करते.

अभिनय की दृष्टि से संजय सूरी सबसे ज्यादा हैरान करते हैं. उन्हें इस तरह के ठेठ गंवई किरदार में देखने का तजुर्बा किसी को भी नहीं रहा है, और वो बखूबी जंचते हैं. ‘माय ब्रदर निखिल’ के बाद ये उनकी सबसे बेहतरीन अदाकारी है. तनिष्ठा को हम पहले भी इस तरह के किरदारों में देखते आये हैं. उन्हें तो एक तरह से महारत हासिल है. धृतिमान चैटर्जी का अभिनय किसी सपने जैसा है, आपको बार बार खुद को एहसास दिलाना पड़ता है कि आप सिनेमा ही देख रहे हैं. और अंत में दोनों बाल कलाकार, अभिनय में जिनकी सहजता और सरलता लाजवाब है.

‘चौरंगा’ उन सभी लोगों के लिए है, जिन्हें अक्सर शिकायत रहती है कि अच्छी फिल्में अब कहाँ बनती हैं? ‘आँखों देखी’, ‘मसान’, ‘अमरीका’ और ‘चौरंगा’ जैसी ‘भारतीय’ फिल्मों के साथ नए भारत का सिनेमा अब अपने मानक खुद तय करने लगा है. थोड़ी पहल आपको भी करनी होगी. जरूर देखिये! [4/5]   

Saturday, 5 December 2015

ANGRY INDIAN GODDESSES: Awe my Goddesses! [3/5]

As a cinema-lover largely all ears for the Hindi film Industry’s progressive inclinations for a change, there is always a sense of pride, surprise and triumph floating in my mind while watching celebrated filmmaker Pan Nalin’s bracing, pulsating and unforeseen new film ANGRY INDIAN GODDESSES. Films on male-bonding look so archaic, parched and superfluous now. ANGRY INDIAN GODDESSES marks the amazing arrival of Glocal [An amalgamated term for the new gene with Global & Local both the aspirations and establishments] Indian women in Bollywood. We all have been scrutinizing this cautious and careful movement for quite some time now, through the convinced characterizations and the confident and carefree performances by Deepika, Priyanka and Kangana in their deliberate choice of films but in only bits and pieces.

Here, in ANGRY INDIAN GODDESSES, it all looks like an out in the open protest against the pigeonhole portrayal of Indian female in films. Watching as many as seven sensibly scintillating leading ladies of ANGRY INDIAN GODDESSES smash every formula-fitting approach, erect a brand new attitude and establish a much-needed representation of the new, contemporary and modern breed of the other ‘equally-deserving’ half of the human race, is definitely one of the most satisfying moments Bollywood has seen this year, and in recent times. Had the writer-director been more alert, firm and uncompromising with the plot especially towards the invented end and more in-synced with the convincingly real performances of the ladies; the film would have gone beyond just being a trying path-breaker to a confirmed pacesetter.

The story brings women hailing from varied fields of life, stuck in their own crisis and now finding solace, support and strength in each other’s comradeship under one roof in Goa. Freida (Sarah Jane-Dias) is getting married. She has just left her latest photography assignment for a phony fairness brand. Mad (Anushka Manchanda) is trying her hard to impress the world with her kind of music. Suranjana (Sandhya Mridul) is strict and a street smart business-woman trapped in a land-dispute with an NGO runner, on same lines as the Singur land acquisition controversy. Pammi (Pavleen Gujral) is your typical rich housewife who has sold all her dreams to please the standard well-off family of her husband. Joanna (Amrit Maghera) is an aspiring actress forced to just wear cleavage-showing Cholis and call for help to ensure a tensed situation for Hero’s clap-generating entry in the name of acting. Then there are Lakshmi (Rajshree Deshpande) - the overtly fashionable maid and the simply-dressed yet strong-headed Nargis (Tannishtha Chatterjee)- an unexpected entry with lots of new revelations to take place.

The best from ANGRY INDIAN GODDESSES comes in form of lightening moments where the girls share their experiences with the world outside those walls, where they recall their young-age aspirations to rock and shock the world now resting somewhere beneath the new responsibilities tossed upon them. The natural-‘no camera around’-freely flowing performances make ANGRY INDIAN GODDESSES an amazing journey to watch. In one of the scenes, the girls are shown falling for a bare-chest handsome hunk unknowingly being watched and whistled at as the object of desire. This is not a regular sight in a Bollywood film. In another, the Sanskari housewife friend asks [spoiler alert] her lesbian friends, “woh toh theek hai, par tum log karte kaise ho?” ANGRY INDIAN GODDESSES is packed with such rare pleasures, but only till it doesn’t get up to hold the flag in opposition to all the possible discriminations, crimes and intolerances against women in one film. The film drastically gets derailed from being naturally good to melodramatically substandard. Rape, murder, gender discrimination; you name it you’ll have it tackled here in the most hurried and comfortable manner. Till the time you reach the crowd-pleasing climax, you only wish Pan Nalin had stopped it exactly where he decided to start it. You can’t settle for what you are fighting against.

On the whole, ANGRY INDIAN GODDESSES is amazingly real, relatable and something you don’t see very often on Indian screens. Out of these seven fiery, fearless and ferociously real leading ladies, each one will have her own share of approval and admiration in your heart. The film is not the reason to watch them; they are the reason to watch the film. [3/5]         

Friday, 14 August 2015

गौर हरी दास्तान- द फ्रीडम फ़ाइल: अच्छे-बुरे से परे, एक बेहद जरूरी फिल्म! [3/5]

कुछ कहानियों का कहा जाना ज्यादा जरूरी है, भले ही उनमें नाटकीयता की कमी साफ़ झलकती हो या फिर जिनमें जटिलता बिलकुल ही न के बराबर हो. अनंत नारायण महादेवन की ‘गौर हरी दास्तान’ ऐसी ही चुनिन्दा फिल्मों में से एक है जो अच्छे-बुरे से परे, एक बेहद जरूरी फिल्म है.  

आजादी के ६८ साल पूरे हो गए हैं, और इसमें तनिक संदेह नहीं कि आज हम इस आजादी का मोल आंकने में अक्सर चूक जाते हैं. फिल्म के शुरूआत में ही जब नायक [८० साल का एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी] एक सरकारी दफ्तर की धीमी लिफ्ट पे टिप्पणी करता है, “हम बहुत देर से नीचे नहीं जा रहे?”, सरकारी अफसर समझाता है, “अँधेरे में अक्सर दूरी ज्यादा लगती है”. देश की रुकी-रेंगती ढुलमुल व्यवस्था पर इससे अच्छा कटाक्ष नहीं हो सकता. वही अफसर अगले दृश्य में सहमते-झिझकते कह ही बैठता है, “कभी-कभी लगता है अंग्रेजों को वापस भेज के कहीं कोई गलती...”.

सत्य घटना पर आधारित ‘गौर हरी दास्तान’ एक ऐसे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के संघर्ष की कहानी है, जो अपने वजूद को साबित करने के लिए ३० साल से देश की लचर दफ्तरशाही से एक खामोश लड़ाई लड़ रहा है. बिना रुके, बिना थके. देश की आजादी की लड़ाई में अपनी भागेदारी साबित करने के लिए जिसे आज एक अदद सरकारी प्रमाणपत्र की दरकार है, पर सच की पहचान इतनी आसान कहाँ रही है? बचपन में ‘वानर सेना’ का सदस्य बनकर गुप्त सूचनाएं इधर-उधर पहुँचाने का काम कर चुके गौर हरी दास आज खुद एक दफ्तर से दुसरे दफ्तर चक्कर काट रहे हैं, और इज्जत करना तो छोडिये लोगों में हमदर्दी का रत्ती भर भी एहसास नहीं दिखता. क्या हो गया है हमारी संवेदनाओं को? कहाँ खर्च हो गयी हैं हमारे सामाजिक, मानवीय सरोकार की समझ?

फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष है इसकी सच्चाई और भोलापन, जो न सिर्फ गौर हरी दास के चरित्र में दिखता है बल्कि फिल्म की कहानी का भी अभिन्न हिस्सा है. एक-दो दृश्यों को छोड़ दें [एक में गौर हरी दास गांधीजी से बात करते दिखाई देते हैं], तो फिल्म में बेवजह का ड्रामा ठूंसने की प्रवृत्ति से अनंत बखूबी बचते नज़र आये हैं. फिल्म का सबसे कमज़ोर पहलू भी दर्शकों के लिए शायद यही बने. फिल्म एक सधी, पर धीमी गति से आगे बढती है. बिलकुल साधारण से दिखने वाले दास की इस संघर्ष-गाथा में अटूट हौसले का रंग तो गहरा गाढ़ा है, पर इसे एक असाधारण प्रसंग बनाने में विश्वास की कमी साफ़ नज़र आती है.

मुख्य भूमिका में विनय पाठक कुछ ज्यादा ही कोशिश करते नज़र आते हैं. उनका हद से ज्यादा सीधा-सादा-सच्चा होना दिल को छूते-छूते रह जाता है. हालाँकि इस भूमिका को आत्मसात करने में पाठक कोई कसर नहीं छोड़ते. कोंकना सेन शर्मा ज्यादा देर परदे पर नहीं रहतीं, पर पूरी तरह प्रभावित करती हैं. दो टूक तीखे बोल बोलने वाले पत्रकार की भूमिका में रणवीर शौरी जमे हैं. तनिष्ठा चटर्जी एक आज़ाद ख्याल मॉडर्न पत्रकार के किरदार में अपनी दूसरी फिल्मों से अलग ही दिखती हैं. फिल्म के हर हिस्से में आपको छोटी-छोटी भूमिकाओं में ढेर सारे नामचीन कलाकार दिखेंगे, जैसे रजित कपूर, सौरभ शुक्ला, अचिंत कौर, मुरली शर्मा, मोहन कपूर और भरत दाभोलकर.

अंत में, अनंत महादेवन की ‘गौर हरी दास्तान’ आज के भारत में आजादी के मायने भूलती पीढ़ियों के लिए एक ऐसी फिल्म है जो न सिर्फ देश की चरमराती, सोई-सुन्न व्यवस्था पर सवाल खड़े करती है, बल्कि एक ८५ साल के बूढ़े आम आदमी की अपने अस्तित्व को बचाए रखने की सतत कोशिश के साथ उम्मीद का एक सूरज भी जलता छोड़ जाती है.      

Friday, 7 March 2014

GULAAB GANG: Good old ‘Good vs. Evil’ clash in a new plastic bottle! Better not taste!! [2/5]

There were times when a Bollywood film didn’t necessarily need much in the name of content and plot but definitely superstars of ‘larger than life’ stature and in numbers. The era of multi-starrers, then, was measured by how big and how many stars one could bring under one roof, supported by an impressive face of villain. You must have encountered some of those on the bygone VHS viewing. Saumik Sen’s GULAAB GANG brings back memories of the same but in a bad bad taste. It is nothing more than two great actresses of their times coming together for the first time to share the screen. That’s it.  

Rajjo [Played by ravishing Madhuri in quite a typical role] leads a group of women, deprived by destiny, dressed in pink and dogged to fight. Together they can make things work in the system. From fighting for basic necessities like education, electricity, food to standing out as a powerful judiciary system of their own, they play cool until enters a mean, wicked, heartless menace Sumitra Devi [Juhi Chawla stealing the show as her first strive in negative role]. Sumitra is a self-centered power-hungry politician who barely has left any signs of humanity and sympathy against suppressed in her, though the kind of creepy smile on her face never really goes missing even when things aren’t much in favor. The clash can’t be averted. It’s just a matter of how, where and when.

Despite the fact that the makers are in complete denial, film clearly finds indisputable similarities with the real life Gulabi Gang led by Sampat Pal of Chhatisgarh, in look, intent and in functioning too. This is a shameless dark side of the profession but that’s actually nothing in facade of the lack of earnestness while making the film. Rajjo’s obsessive dream to open a school in the village often looks melodramatic. Performing on well-choreographed songs is like the only other activity this gang is occupied with. And if it is not over, there are gravity-defying action sequences too where you witness Rajjo turning heroically into ‘Singham’ ‘Dabangg’ ‘Rowdy Rathore’ kind of mass-entertainers who could fly, jump and kick anyone from anywhere.

Saumik Sen directs well especially while creating drama [Watch out for the abduction scene of a rapist in the village pond] and even shows an impressive hand in an overall look of the film but once the gimmicky ‘Madhuri comes opposite Juhi’ factor enters the scene, the rest gets carried away. In other mentionable part, Divya Jagdale and Priyanka Bose strike and provide delightful moments as members of the gang. Their chemistry together has sometimes more sparks than the leads. Tannishtha Chatterjee is wasted. She definitely needed a better support from writing.

Subject could have been the hero but sadly it’s always the Madhuri Vs Juhi. Madhuri dons the role of Rajjo with total ease, looks smashing, acts flawless and dances to win hearts but for me, it is Juhi Chawla who beats everyone with her bravura performance. I wasn’t expecting this from her at all. Definitely writers have worked on her part well and she has done full justice. What a comeback!

At the end; if you really want to celebrate ‘Women’s Day’ and the sentiments of Women empowerment, I will leave you with two choices. Try to catch Nishtha Jain’s honest, real and an eye-opener documentary ‘GULABI GANG’ or if not anything else, go for Kangana Ranaut’s QUEEN. Saumik Sen's ‘GULAAB GANG’ is a must for only Juhi Chawla Fans! [2/5]