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Friday, 14 September 2018

मनमर्ज़ियाँ: प्यार का लेटेस्ट वाला वर्जन! [3.5/5]


ये दौर है फेसबुक, व्हाट्स एप्प, टिंडर, ट्वीटर का, और इन जैसे तमाम एप्प्स को धड़ल्ले से इस्तेमाल करने वाली नई पीढ़ी का, जो अपने आप को लगातार बदलते रहने, अपडेट रखने में कतई कोताही नहीं बरतती. फिर प्यार क्यूँ अपने पुराने ढर्रे पर ही घिसटता रहे? फिर बॉलीवुड की प्रेम-कहानियों को भी क्यूँ कर ठोक-पीट उनके पुराने दड़बे में ही कैद रखा जाये? तो, अब प्यार का नया संस्करण बाज़ार में आ गया है. प्यार 2.0 यानी ‘फ़्यार’- सिमरनें अब राज से ‘शादी से पहले वो नहीं’ का वादा नहीं लेतीं, राज ‘हिन्दुस्तानी लड़की की इज्ज़त क्या होती है जानने का दम नहीं भरता. जबरदस्ती शादी के लिए माँ-बाप, परिवार की दुहाई देने पर लड़की भावुक होकर चुपचाप मेहंदी की डिज़ाइन पसंद करने नहीं बैठ जाती. मंडप तक जाने का फैसला अब सिर्फ उसका है, चाहे ऐसा करते उसकी अपने साथ ही, अपने अन्दर ही कितनी ज़ज्बाती लड़ाई क्यूँ न चल रही हो? समाज का रवैया भले नहीं बदल रहा हो, किरदार चुपके चुपके ही सही, बदल रहे हैं. उनकी कहानियाँ बदल रही हैं. और ‘मनमर्ज़ियाँ’ के साथ अनुराग कश्यप भी. ‘काले’ सैयां के इश्क़ का रंग अब ‘ग्रे’ हो गया है. बदलाव के नाम पर इतना बहुत है, अब पूरा सफ़ेद होने की उम्मीद मत लगा बैठियेगा. ज्यादा हो जायेगा.

‘मनमर्ज़ियाँ अपने आप में बहुत ढीठ लफ्ज़ है. गलत-सही सोचने और समझ आने से बहुत पहले मन जो कहे, कर जाना. रूमी (तापसी पन्नू) का किरदार इस लफ्ज़ के बिलकुल पास बैठता है. एकदम घेर के. ठीक सट के. ‘एक बार बोल दिया तो पीछे नहीं हटती के ग़रूर में अपने सच्चे प्यार विक्की (विक्की कौशल) को अल्टीमेटम दे आई है. ‘कल अगर घर पे हाथ मांगने नहीं आया, तो अगले दिन घर वाले जहां कहेंगे, शादी कर लूंगी. तैश में सोचती भी नहीं, पर ऐसा नहीं कि समझती भी नहीं. विक्की जिम्मेदारियों के नाम पर टें बोल जाता है. बनना तो ‘यो यो हनी सिंह है, पर अभी तक दूसरों के गानों का ही रीमिक्स बजाता रहता है. रूमी के कहने पर साथ भाग तो आया है, पर कोई ठोस प्लान नहीं. पहले भी कर चुका है, रूमी एबॉर्शन के बाद रिक्शे पर बैठ कर अकेले घर गयी थी. रॉबी (अभिषेक बच्चन) को कोई जल्दी नहीं. हनीमून के वक़्त भी, शादी के बाद भी. ‘रामजी टाइप का आदमी है. न कुछ पूछता है, न ही रूमी पर मर्दाना हक़ जताने की कोई तलब है उसको. तेज़ आवाज में बोलने को भी, उसको चार पैग लगते हैं. बैंकर है, तो जानता है कि इस इन्वेस्टमेंट में रीटर्न की कोई गारंटी नहीं.

‘मनमर्ज़ियाँ’ फिल्म की लेखिका कनिका ढिल्लों के अपने अनुभवों का साझा है, इसलिए गिनती के दो-चार दृश्यों को छोड़ कर, फिल्म की घटनाओं से जुड़ाव में किसी तरह की कोई फांस आड़े नहीं आती. रूमी का अक्खड़पन, विक्की का लापरवाह रवैया और रॉबी के किरदार में सुन्न कर देने वाला ठहराव; मनमर्ज़ियाँ’ अपने बनावट में ‘वो सात दिन, ‘धड़कन’, ‘हम दिल दे चुके सनम’ और ‘तनु वेड्स मनु जैसी तकरीबन आधी दर्जन हिंदी फिल्मों की याद जरूर दिला सकता है, पर फिल्म देखने के बाद आप जो नहीं भूलते, उनमें इन किरदारों को लिखने में कनिका की गहरी समझ शामिल है.  दृश्यों में नाटकीयता कलम से कहीं ज्यादा, किरदारों के अपने मिजाज़ से निकलती और बनती है. अमित त्रिवेदी का संगीत और शैलीजी के गीत फिल्म पर हमेशा और हर वक़्त छाये रहते हैं. कश्यप की दाद देनी होगी, जिस बाकमाल तरीके से म्यूजिक को वो अपने दृश्यों में, और दृश्यों को अपने म्यूजिक में पिरोते हैं.

‘मनमर्ज़ियाँ’ शर्तिया तौर पर अपने तीन ख़ास कलाकारों में पूरी की पूरी बंट जाती है. तापसी का रूमी होना ‘मनमर्ज़ियाँ’ के लिए किसी तोहफे से कम नहीं. परदे पर उसका छिटकना, बिगड़ना, गुस्से में तपना, भड़कना और टूटना; रूमी के अन्दर से तापसी एक पल को बाहर नहीं आती. विक्की को उसकी गैर-जिम्मेदाराना रवैये के लिए कोसते और डांटते हुए परदे पर जिस तरह वो फटती हैं, आवाक् कर देती हैं. फिल्म के आखिरी पलों में कैमरे की तरफ दौड़ते हुए उनके चेहरे की मुस्कुराती चमक में जैसे एक पल को पूरी फिल्म उनकी हो के रह जाती है. विक्की फिल्म दर फिल्म चौंका रहे हैं. ‘संजू के शराबी दृश्य के बाद, इस फिल्म में भी उनके हिस्से एक ऐसा ही दृश्य आया है. इस बार सिर्फ उनका चेहरा नहीं बोल रहा, पूरे का पूरा बॉडी लैंग्वेज प्रभावित करता है. गानों के डांस-स्टेप्स और लिप-सिंक में उनकी वो क़ाबलियत खुल कर सामने आती है, जो उन्हें अच्छे एक्टर से ‘स्टार मैटेरियल’ बनने की तरफ बढ़ने में मदद करेगी. विक्की में कॉमिक की संभावनायें भी और प्रबल हो रही हैं.

अभिषेक बच्चन दो साल बाद परदे पर हैं. एक ऐसे किरदार में, जिसे आप कतई मजेदार नहीं कह पायेंगे. जिसके साथ होते हुए शायद आप खिलखिलाएं नहीं, झूमें-गायें नहीं, पर ऐसा नहीं करते हुए भी परदे पर उसकी मौजूदगी बहुत ठोस है. उसकी शख्सीयत में इतनी परतें हैं, कि खोलते-खोलते फिल्म कम पड़ जाती है. उसकी नेकनीयती, उसकी संजीदगी कहीं भी उसे लाचार नहीं बनाती, बल्कि हर वक़्त पहाड़ की तरह अडिग और बर्फ की तरह ठंडा रखती है, और शायद यहीं, इसी पल में अभिषेक अपने सबसे मुश्किल किरदार में सबसे आसानी से ढल रहे होते हैं, पिघल रहे होते हैं.

आखिर में; ‘मनमर्ज़ियाँ’ लव और अरेंज्ड मैरिज के बीच हिचकोले खाती इस नई ‘ज़िम्मेदार, समझदार और तैयार’ पीढ़ी की उनकी अपनी एक ‘मेच्योर’ लव-स्टोरी है, जहाँ किरदार सपनों में जीने से कहीं ज्यादा, अपने आप को जानते-पहचानते हैं. अपनी खामियों का जश्न मनाते हैं. अपनी चाहतों के लिए लड़ते-भिड़ते हैं, और ‘डिस्कशन’ को अच्छा मानते हैं. प्यार का लेटेस्ट वाला वर्जन है, आप भी अपडेट कीजिये. [3.5/5]  

Friday, 3 August 2018

मुल्क: ‘इस्लामोफ़ोबिया’ से ग्रस्त हैं? आज ही देखें. [3.5/5]


तेज़-तर्रार पुलिस ऑफिसर दानिश जावेद (रजत कपूर) शहर के मुस्लिम-बहुल इलाके में छिपे एक आतंकवादी को मार गिराने की नीयत से अपनी टीम के साथ आगे बढ़ रहा है. साथ ही, मुस्लिमों की आबादी पर तंज कस रहा है, “इतने बच्चे क्यूँ पैदा कर लेते हो?”. उसी रौ में बहते हुए एक सिपाही बोल पड़ता है, “अरे, साहब! इन लोगों का ऐसा ही रहता है.”, ये भूलते हुए कि उसके साहब खुद भी एक मुसलमान हैं. ऐसे ही एक पूर्वाग्रह से ग्रस्त दानिश खुद भी है, जब बात आतंकवाद को मुस्लिमों से जोड़ कर देखने की आती है. अनुभव सिन्हा की मुल्क देश में बढ़ते धार्मिक उन्माद, साम्प्रदायिकता और आम जन के मन में पल-बढ़ रहे पूर्वाग्रहों, कुतार्किक अवधारणाओं और आपसी भेदभाव को कटघरे में खड़े करते हुए, कुछ बेहद जरूरी और कड़े सवाल सामने रखती है. हालाँकि अपनी बनावट में फिल्म थोड़ी पुराने ज़माने और ढर्रे की जरूर जान पड़ती है, पर मुल्क अपनी बात जोरदार तरीके से कहने में ना ही कमज़ोर पड़ती है, ना ही डरती-सहमती है.

कैसे साबित करेंगे आप, अपने मुल्क के प्रति अपनी वफ़ादारी? खास तौर पर, जब आपका नाम मुराद अली (ऋषि कपूर) हो, या फिर बिलाल अली (मनोज पाहवा), जिसका बेटा शाहिद (प्रतीक स्मिता बब्बर) आतंकवादी गतिविधियों में लिप्त पाया गया है. कैसे साबित करेंगे कि 1927 में बना मुराद-मंजिल आपका घर नहीं, देश-विरोधी गतिविधियों का अड्डा है? ...और ये और भी मुश्किल हो जाता है, जब आप की देशभक्ति पर सवाल उठाने वालों की आँखों पर पहले से ही धर्म-विरोधी काला चश्मा चढ़ा हो. हम ऐसे हैं और वो ऐसे; अलगाव की इस गन्दी राजनीति का हिस्सा धीरे-धीरे ही सही हम सब बनते जा रहे हैं. मुल्क कम से कम हमें झकझोर कर जगाने की कोशिश तो करती ही है.

मुल्क अपने पहले हिस्से में बहुत सारा वक़्त बनारस की जानी-पहचानी गलियों में धार्मिक सहिष्णुता के ठहाके लगाने में बिताती है, जहां वकील मुराद अली अपनी 65वीं सालगिरह पर परिवार और दोस्तों के लिए खुद मटन-कोरमा बना रहे हैं. पड़ोसियों में शामिल घोर शाकाहारी मित्र भी कबाब चख रहे हैं, हालाँकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि ये सारा सेट-अप जल्द ही टूटने वाला है और तनाव का माहौल पलक झपकते ही सारे रिश्ते चकनाचूर कर जाएगा. हम और वो की न दिखने वाली खाई जल्द दिखाई भी देगी, साथ ही और गहरी भी होती जायेगी. पाकिस्तान भेजने की पेशकश दीवारों पे इश्तेहार की तरह छपेगी और माता के जागरण का लाऊडस्पीकर जानबूझकर मुराद-मंजिल की ओर ही मोड़ दिया जाएगा.

एक लिहाज़ से पुराने ढर्रे का ये ड्रामा फिल्म के हक में ही काम करता है, क्यूंकि दूसरे हिस्से में आप को कोर्ट की उस अहम कार्यवाही का गवाह बनना है, जहां किरदारों के आरोप-प्रत्यारोप के बीच अक्सर आप खुद को, इन तमाम सवालों पर अपनी सोच के साथ कटघरे में खड़ा पायेंगे. मुराद अली की बहू (तापसी पन्नू) का नाम लेने में खुद जज साब (कुमुद मिश्रा) एक बार को अचकचा जाते हैं, मोहम्मद आरती या आरती मोहम्मद’? हिन्दू है, और मुराद अली की वकील भी. सरकारी वकील संतोष आनंद (आशुतोष राणा) जनमानस को संतुष्ट और खुश करने वाली मुस्लिम-विरोधी दलीलों से खेलना ख़ूब अच्छी तरह जानता है. उकसाने, भड़काने और तालियाँ बटोरने में माहिर है.

मुख्य किरदारों के तौर पर ऋषि कपूर और तापसी पन्नू की अच्छी अदाकारी के साथ, फिल्म में उनकी मौजूदगी भले ही ज्यादा वक़्त के लिए हो, पर अपनी छोटी सी भूमिका में ही आपको मन भर द्रवित कर देते हैं अभिनेता मनोज पाहवा. फिल्म के आधे हिस्से तक तो लगता है, मानो पूरी की पूरी फिल्म उनकी ही हो, उनपे ही हो. बड़े भाई मुराद अली के सामने अपनी गलतियां बयान करते वक़्त, पुलिस स्टेशन में ज्यादतियां सहते वक़्त, शाम की दावत के लिए 10 किलो और मटन को लेकर भाई से मोल-भाव करते वक़्त, मनोज अपने पूरे शबाब पर होते हैं. रजत कपूर, कुमुद मिश्रा और आशुतोष राणा अपने किरदारों के साथ बखूबी इन्साफ करते हैं. राणा अपनी भाषाशैली के दम पर एक अति-राष्ट्रवादी वकील की भूमिका में आपकी नफरत हासिल करने में खासे कामयाब रहते हैं.

अंत में, मुल्क के जरिये अनुभव सिन्हा आतंकवाद, साम्प्रदायिकता और असहिष्णुता जैसे मुद्दों पर खुल कर बोलते हैं. कुछ इस बेबाकी से कि फिल्म के आखिर में निर्णय सुनाते वक़्त जज साब की आवाज़ में उनकी अपनी बेचैनी, तल्खी और विचारधारा साफ़ सुनाई देती है. मुराद अली को सलाह देते वक़्त जज साब कहते हैं,अगली बार कोई अगर आपको आपकी दाढ़ी के लिए सवालों के घेरे में खड़ा करे, तो उन्हें चुप कराने के लिए भारत के संविधान का पहला ही पन्ना ज़ेरॉक्स करा कर रख लीजिये, काफी है.” अगर आप भी इस्लामोफ़ोबिया जैसी बीमारी से ग्रस्त हैं, तो आपको मुल्क हफ्ते में कम से कम दो बार देखनी चाहिए. दवा थोड़ी महंगी जरूर है, पर घोर असरदार!  

Friday, 29 September 2017

जुड़वा 2: सिनेमा के साथ कॉमेडी; कॉमेडी के साथ ट्रेजेडी! [1/5]

डेविड धवन की 'जुड़वा 2' देखते वक़्त, दो लोगों पर बेहद तरस आता है. एक तो विवान भटेना पर, जो फिल्म में खलनायक के तौर पर सिर्फ पिटने के लिए रखे गए हैं. शरीर के बाकी हिस्सों को नज़रंदाज़ कर भी दें, तो फिल्म में विवान के सर पर ही, कभी नारियल से, तो कभी फुटबाल से इतनी बार प्रहार किया जाता है, कि उन्हें दो-दो बार अपनी याददाश्त खोनी पड़ती है. इतनी ही बुरी हालत से मैं भी खुद को गुजरता हुआ पाता हूँ, जब मनोरंजन के नाम पर डेविड धवन मुझे वापस वही 20 साल पुरानी फिल्म चिपका डालते हैं, उन्हीं पुराने 'जोक्स' के साथ और उसी सड़ी-गली वाहियात कहानी के साथ. डेविड की मानें तो 'ऐसा केस 8 मिलियन में सिर्फ एक होता है', हम 80 के दशक में पैदा हुए बदनसीबों के साथ 'जुड़वा' जैसा केस 20 साल में दो-दो बार हुआ है; मुझे नहीं पता इन दोनों फिल्मों से सही-सलामत जिंदा बच जाने का जश्न मनाऊँ या झेलने का मातम? 

बॉलीवुड का एक ख़ास हिस्सा बार-बार बड़ा होने से और समझदार होने से इनकार करता आ रहा है. डेविड धवन भी उनमें शामिल हो चले हैं. डेविड के लिए मनोरंजन के मायने और तौर-तरीके अभी भी वही हैं, जो 20-25 साल पहले थे. हंसी के लिए ऐसी फिल्में मज़ाक करने से ज्यादा, किसी का भी मज़ाक बनाने और उड़ाने में ख़ासा यकीन रखती हैं. तुतलाने वाला एक दोस्त, 'तोतला-तोतला' कहकर जिस पे कभी भी हंसा जा सके. 'पप्पू पासपोर्ट' जैसे नाम वाले किरदार जो अपने रंगभेदी, नस्लभेदी टिप्पणी को ही हंसी का हथियार बना लेते हैं. लड़कियों को जबरदस्ती चूमने, छेड़ने और इधर-उधर हाथ मारने को ही जहां नायक की खूबी समझ कर अपना लिया जाता हो, अधेड़ उम्र की महिलाओं को 'बुढ़िया' और 'खटारा गाड़ी' कह के बुलाया जाता हो. मनोरंजन का इतना बिगड़ा हुआ और भयावह चेहरा आज के दौर में भी अगर 'चलता है', तो मुझे हिंदी सिनेमा के इस हिस्से पर बेहद अफ़सोस है.

प्रेम और राजा (वरुण धवन) बचपन में बिछड़े हुए जुड़वा भाई हैं. एक मुंबई के वर्सोवा इलाके में पला-बढ़ा टपोरी, तो दूसरा लन्दन का शर्मीला, कमज़ोर पढ़ाकू टाइप. फिल्म मेडिकल साइंस के उस दुर्लभ किंवदंती पर पनपती है, जहां दोनों भाई एक-दूसरे के साथ अपने दिमाग़ी और शारीरिक प्रतिक्रियाएं आपस में बांटते हैं. एक जैसा करेगा, दूसरा भी बिलकुल वैसा ही. फिल्म अपनी सुविधा से इस फ़ॉर्मूले को बड़ी बेशर्मी से जब चाहे इस्तेमाल करती है, जब चाहे भूल जाती है. जो हाथ किसी को मारते वक़्त एक साथ उठते हैं, वही रोजमर्रा के काम करते वक़्त एक साथ क्यूँ नहीं हिलते-डुलते? पर फिर डेविड धवन की फिल्म से इस तरह के तार्किक प्रश्नों के जवाब माँगना अपने साथ बेवकूफी और उनके के साथ ज्यादती ही होगी. जिन फिल्मों में टाइम-बम अपने आखिरी 10 सेकंड में फटने वाला हो, और हीरो लाल तार (क्यूंकि लाल रंग गणपति बप्पा का रंग है) काट के अपने लोगों को बचा ले; ऐसी फिल्मों को पूरी तरह 'बाय-बाय' करने का सुख आखिर हमें कब मिलेगा?

थोड़ा सोच कर देखें, तो 'जुड़वा 2' भद्दे हंसी-मज़ाक के लिए हमारे पुराने, दकियानूसी स्वभाव को ही परदे पर दुबारा जिंदा करती है. रंग, बोली, लिंग और शारीरिक बनावट के इर्द-गिर्द सीमित हास्य की परिभाषा को हमने ही अपनी निज़ी जिंदगी में बढ़ावा दिया है और देते आये हैं, फिर डेविड या उन जैसों की फिल्में ही क्यूँ कटघरे में खड़ी हों? नायक अगर नायिका की माँ से फ़्लर्ट करे, उनको गलती से किस कर ले और नायिका की माँ अगर उस पल को मजे से याद करके इठलाये, तो इसे डेविड का उपकार मानिए और एक प्रयोग की तरह देखिये. अगर आपको इस इकलौते दृश्य पर ठहाके के साथ हंसी आ जाये, तो समझिये कुछ बहुत गलत चल रहा है आपके भीतर, वरना आप अभी भी स्वस्थ हैं, सुरक्षित हैं. 

अभिनय में वरुण बेहद उत्साहित दिखते हैं. 'जुड़वा' के सलमान खान की झलक उनमें साफ़ नज़र आती है. उनमें एक ख़ास तरह का करिश्मा, एक ख़ास तरह की जिंदादिली है, जो बुरे से बुरे दृश्य में भी आपको उनसे कभी उबने नहीं देती, पर इस तरह की खराब फिल्म में सिर्फ इतने से ही बचा नहीं जा सकता. तापसी पन्नू और जैकलीन फ़र्नान्डीस अदाकारी में महज़ दिखावे के लिए हैं, वरना तो उनकी अदाकारी उनके 'फिगर' जितनी ही है, 'जीरो'. यूँ तो हंसी के लिए राजपाल यादव, अली असगर, उपासना सिंह, अनुपम खेर जैसे आधे दर्जन नाम फिल्म में मौजूद रहते हैं, पर उन पर भी कुढ़ने और चिढ़ने से ज्यादा फुर्सत नहीं मिलती. 'सुनो गणपति बप्पा मोरया' गाने के 'सिग्नेचर स्टेप' में वरुण के ठीक बायीं ओर डांस करने वाली 'एक्स्ट्रा' कलाकार अपने हाव-भाव से, आपके चेहरे पे मुस्कान लाने में कहीं ज्यादा कामयाब होती है, बजाय इस बेमतलब उछलने-कूदने वाले 'ब्रिगेड' के.     

कुल मिला कर, 'जुड़वा 2' को मनोरंजन के साथ किसी भी तरह से जोड़ कर देखना सिनेमा के लिए बड़ा शर्मनाक होगा. कुछ मजेदार 'जोक्स' को परदे पर एक के बाद एक चला देना, अपने आप में कॉमेडी के लिए ही एक ट्रेजेडी है. आने वाले दिनों में बॉक्सऑफिस कलेक्शन के भारी-भरकम आंकड़ों से आपको भरमाने की कोशिश होगी, मनोरंजन की गारंटी का वादा किया जाएगा; आपको बहकना चाहते हैं तो बेशक बहकिये, पर कम से कम बच्चों को तो दूर ही रखियेगा. एक 'जुड़वा' से हमें उबरने में सालों-साल लग गए, इस 'जुड़वा 2' का न जाने क्या असर होगा नयी पीढ़ी पर? [1/5]                 

Friday, 31 March 2017

नाम शबाना: ‘पुअर बेबी’! [2/5]

देश की सुरक्षा का ज़िम्मा जितना सीमा पर तैनात सेना के जाबांजों का है, उतना या उससे थोड़ा सा ज्यादा ही ऐसी गुप्तचर सुरक्षा एजेंसियों का भी, जिन्हें गुमनामी के अँधेरे में रहकर हर पल खतरे के साये में जीना और मरना मंजूर होता है. नीरज पाण्डेय की ‘बेबी’ अगर आपने देखी हो, तो इन ‘अंडरकवर’ लड़ाकों के काम करने के तरीकों को तो अब तक आप जान ही गए होंगे? ‘नाम शबाना’ थोड़ा पीछे जाने की कोशिश करती है, कहानी के साथ भी और इन सीक्रेट एजेंट्स को चुने जाने की कड़ी कार्यवाही को सामने रखने के साथ भी. बहुत हैरतअंगेज़ है सब कुछ, एक ऐसी रहस्यमयी दुनिया, जहां फिल्मों की मानें तो 5 साल से एक ऐसी लड़की (तापसी पन्नू) पर पल-पल नज़र रखी जा रही है, जो अपने शराबी बाप की गैर-इरादतन हत्या के अपराध में सज़ा भुगत चुकी है. नज़र रखने वाले ने लड़की के जाने कितने फोटोग्राफ्स खींचे होंगे इस दरमियान? ऐसी दुनिया में आपका उम्रदराज़ केबल वाला (वीरेंद्र सक्सेना) भी ‘रॉ’ का एक अच्छा-खासा सीनियर टाइप ट्रेनर निकल सकता है, इसीलिए जब वो फ़ोन पर कहे, “मैडम, नया स्कीम चाहिए?’ तो ‘हाँ’ या ‘ना’ बोलने में पूरा वक़्त लीजिये, क्यूंकि बात सिर्फ आपके केबल कनेक्शन की नहीं है, सवाल सीक्रेट एजेंट के तौर पर आपके कैरियर का भी है.   

हालाँकि चौबीसों घंटे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ का जाप करने वाली ये ‘एजेंसी’ अपनी एक उम्मीदवार और उसके साथी पर हो रहे जानलेवा हमले में सिर्फ इसलिए दखल नहीं देती क्यूंकि अभी तक वो उनकी ‘अपनी’ नहीं हुई है, पर उसी जानलेवा हमले का बदला लेने के लिए क़ानून की हद से आगे बढ़कर, उसे कातिल बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ती. जाहिर है, इस दुनिया के अपने कायदे क़ानून हैं, और इस फिल्म की स्क्रिप्ट में जरूरत से कहीं ज्यादा ‘कॉमन सेंस’ की कमी. ‘बेबी’ में तापसी की किरदार शबाना खान महज़ 20 मिनट के लिये परदे पर आती है, और अपने हाव-भाव-ताव से ताकतवर मर्दों से भरे उस फ्रेम में अपनी जगह बहुत दिलेरी से छीन लेती है, बना लेती है. ‘बेबी’ में शबाना के उस 20 मिनट वाले रुतबे तक पहुँचने में ‘नाम शबाना’ ढाई घंटे तक का वक़्त खर्च कर देती है, और फिर भी उसे छू पाने का दावा पेश नहीं कर पाती. जहां नीरज पाण्डेय की स्क्रिप्ट कहीं भी अपने आप को गंभीरता से नहीं लेती, वहीँ अपने ढीले-ढाले निर्देशन से शिवम् नायर पहले तो फिल्म का पूरा पहला हिस्सा सुरक्षा एजेंसी से दूर-दूर रह कर शबाना के निजी जिंदगी में झाँक-झांक कर निकाल देते हैं और उसके बाद, जब रोमांच का सारा खेल गढ़ने की बारी आती है तो बेवजह के ‘ट्विस्ट’ परोस कर (प्लास्टिक सर्जरी से चेहरे बदल लेने वाला विलेन, पृथ्वीराज सुकुमारन) और ‘बेबी’ के किरदारों का अधपका हवाला देकर (...और सर, ऑपरेशन बेबी कहाँ तक पहुंचा?) मनोरंजन की नैय्या पार लगाने की कोशिश करने लगते हैं.  

न चाहते हुए भी मानना पड़ता है कि फिल्म में तापसी स्क्रीन पर भले ही सबसे ज्यादा वक़्त के लिए दिखाई देती हों, भले ही उनकी मौजूदगी परदे पर जरूरी रोमांच बनाए रखने में सौ फीसदी सही साबित होती हो; नीरज पाण्डेय की चलताऊ स्क्रिप्ट उन्हें अक्षय कुमार के किरदार से आगे न निकलने देने के लिए बार-बार रोकती है. शबाना जब-जब मुसीबतों में घिरती नज़र आती है, अक्षय का किरदार उसे बांह पकड़ कर खींचता हुआ बाहर ले आता है. मुश्किलें जैसे जान-बूझकर आसान ही रखी गयी हों, क्योंकि फिल्म की हीरो तापसी हैं, अक्षय नहीं. शबाना को सुरक्षा एजेंसी तक लाने वाले अफसर की भूमिका में मनोज बाजपेई जंचते हैं, पर उनके किरदार की तह में जाने के लिए शायद एक और ‘स्पिन-ऑफ’ की जरूरत अलग से पड़े. कास्टिंग के नजरिये से फिल्म में दो अभिनेताओं को बड़ी चतुराई से उनके किरदार के लिए चुना गया है. शबाना के बॉयफ्रेंड की भूमिका में ताहेर शब्बीर जैसे मेहनती, पर कम तजुर्बे और सीमित अभिनय वाले नए कलाकार को, ताकि तापसी का किरदार उभर कर सामने आये...और विलेन के तौर पर, पृथ्वीराज सुकुमारन. पृथ्वीराज की मौजूदगी फिल्म के पोस्टर और कैनवस को जरूर बड़ा करती है, पर उन जैसे मंजे अभिनेता को इस तरह के वाहियात किरदारों में इस्तेमाल कर बॉलीवुड सिर्फ अपना ही नुक्सान कर रहा है.

आखिर में, ‘नाम शबाना’ अपनी अधपकी, कच्ची, बचकानी स्क्रिप्ट और दकियानूसी निर्देशन से सही मायनों में ‘बेबी’ की ‘प्रीक्वल’ ही लगती है. ऐसी ‘प्रीक्वल’ जो दो साल बाद नहीं आई हो, दो साल पहले आई हो. ऐसी ‘प्रीक्वल’ जो अपने इरादों में ही इतनी कमज़ोर, इतनी सुस्त लगती है कि उसमें ‘बेबी’ का बेंचमार्क छूने भर लेने तक का भी कोई जज़्बा नहीं बचता. फिल्म में एकाउंट्स पढ़ाने वाले मोहन कपूर की भाषा में कहें तो, “बेबी’ अगर संपत्ति (asset) है तो ‘नाम शबाना’ देनदारी (liability)”! [2/5] 

Friday, 16 September 2016

पिंक: इसको ‘ना’ कहने का सवाल ही नहीं! [4/5]

पिंक’ कोई नई बात नहीं कह रही. ‘पिंक’ में हो रहा सब कुछ, खास कर लड़कियों के साथ कुछ बहुत नया नहीं है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं. गाँव के पुलियों पर बैठे, साइकिल चलाकर स्कूल जाती लड़कियों पर आँख गड़ाये आवारों के जमघट से लेकर बड़े शहरों की बड़ी इमारतों में ख़ूनी लाल रंग की लिपस्टिक लगाने वाली, अपनी ही ऑफिस की लड़की को ‘अवेलेबल’ समझने की समझदारी दिखाते पढ़े-लिखों तक, ‘पिंक’ किसी को नहीं छोड़ती.

अक्सर देर रात को घर लौटने वाली ‘प्रिया’ ज़रूर किसी ग़लत धंधे में होगी. सबसे हंस-हंस कर बातें करने वाली ‘अंजुम’ को बिस्तर तक लाना कोई मुश्किल काम नहीं. 30 से ऊपर की हो चली ‘रेशम’ के कमरे पर आने वाले लड़के सिर्फ दोस्त तो नहीं हो सकते. ‘कोमल’ तो शराब भी पीती है, और शॉर्ट स्कर्ट पहनती है. ये ‘नार्थ-ईस्ट’ वाले तो होते ही हैं ऐसे. हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. ‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है.

दिल्ली में अकेले रहने वाली तीन लड़कियां [तापसी पुन्नू, कीर्ति कुल्हारी, एंड्रिया] एक रॉक-शो में तीन लड़कों से मिलती हैं. थोड़ी सी जान-पहचान के बाद लड़के जब उनके ‘फ्रेंडली’ होने का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं, लड़कियों में से एक उनपे हमला कर देती है. राजवीर [अंगद बेदी] हमले में घायल हो जाता है. लड़कियां भाग निकलती हैं. चार दिन बाद भी, लड़कियां सदमे में हैं. राजवीर ऊँचे रसूख वाला है. पुलिस अब लड़कियों के ही पीछे पड़ी है. बचाने के लिए आगे भी कोई आया है, तो अपने बुढ़ापे और ‘बाइपोलर डिसऑर्डर’ से जूझता एक रिटायर्ड वकील [अमिताभ बच्चन].

अनिरुद्ध रॉय चौधरी की ‘पिंक’ शुरुआत से ही आपको झकझोरने लगती है. हालाँकि पहले भाग में फिल्म का पूरा फोकस लड़कियों के डरे-सहमे चेहरों और उनकी डांवाडोल होती हिम्मत और हौसलों पर ही टिका होता है, पर ये वो हिस्सा है जो आपको सोचने पर मजबूर करता है. अगले भाग में कोर्ट की जिरह में अमिताभ लड़कियों की सुरक्षा, उनकी पसंद-नापसंद, उनके अधिकारों जैसे हर मसले पर मर्दों की सोच पर मजबूती से प्रहार करते हैं. इस हिस्से में फिल्म कहीं-कहीं नाटकीय भी होने लगती है, पर अंत तक पहुँचते-पहुँचते ‘पिंक’ अपनी बात रखने-कहने में बिना हिचकिचाहट सफल होती है.

पहले ही दृश्य में, घबराई हुई मीनल [तापसी] कैब ड्राईवर को डांटते हुए पूछती है, “नींद आ रही है क्या? रुको, आगे बैठकर बातें करती हूँ”. मेरे लिए, तापसी के इस किरदार में धार उसी दम से महसूस होनी शुरू हो जाती है. उसके बाद, बच्चन साब को उसका पलट कर घूरना. निश्चित तौर पर, तापसी इस फिल्म की सबसे मज़बूत कड़ी हैं. अपने से बड़ी उम्र के आदमी के साथ कभी रिश्ते में रही, फलक के किरदार में कीर्ति और ‘नार्थ-ईस्ट’ से होने का दर्द चेहरे पे लिए एंड्रिया; फिल्म के अलग-अलग हिस्सों में अपनी मौजूदगी बार-बार और लगातार दर्ज कराती रहती हैं. अपने ही मुवक्किलों को कटघरे में सवाल दागते उम्रदराज़ वकील की भूमिका में अमिताभ बच्चन बेहतरीन हैं, ख़ास कर उन मौकों पर, जब वो बोलने की जेहमत भी नहीं उठा रहे होते.

अंत में; ‘पिंक’ उन सभी महिलाओं के लिए एक दमदार, जोरदार आवाज़ है, जो हर रोज चुपचाप घरों, दफ्तरों, बाजारों में मर्दों की दकियानूसी सोच, गन्दी नज़र और घिनौनी हवस का शिकार बनती रहती हैं. साथ ही, मर्दों के लिए भी ये उतनी ही जरूरी फिल्म है. देखिये और सोचिये. कहीं आप के अन्दर भी कुछ बहुत तेज़ी से सड़ तो नहीं रहा? [4/5] 

Friday, 23 January 2015

BABY: Not so-smart but well-made! [3/5]

An anti-nationalist tries to intimidate our hero by making a declaration like, “Beware! We write MUSLIM as our religion in the column marked for so in all government forms”; and our hero-an undercover agent gives him an equal back, “We are more submissive towards our nation as we write INDIAN in the said column”. I am not sure how many times the officer in question would have faced rejection of his forms at the respective offices and counters but for the screen, it does create an impact; an impact more Bollywood-ish but substantial for a nationalistic film made for entertainment.

Writer-director Neeraj Pandey has proved himself earlier with his similar approach in A WEDNESDAY & in SPECIAL CHABBIS (26). His latest BABY is a gripping but easy espionage-thriller filled with fast-paced action, impossible-looking anti-terrorist missions, men under cover, race against time situations, mellowness in melodrama and more notably Akshay Kumar playing his age. So, you might miss him hitting the dance floor on some vodka & short-skirt girl obsessed Yo Yo Honey Singh number but I enjoyed it more.

Not many years passed when Bollywood has restrictions not to take ‘names’ while referring our neighboring country but now, we are liberated enough to come up with lines like, “+92 [country code of Pakistan] lagao, mujhe aazad karao”, a terrorist flounders in prison. Fondly christened for its short term, BABY is a 5-year trial program where 12 undercover agents are trained & unfastened to fight terrorism freely with a clause that Indian Government would never claim their identity as an Indian in worst case scenario. BABY- the film is the last mission of BABY-the program.

Headed by Feroze Ali [Danny in an identical role of his ATS chief in Mani Shankar’s 16 DECEMBER], Ajay [Played by Akshay Kumar] & his team [schemer Anupam Kher, muscle-man Rana Daggubati and the trained martial art expert in salwar-suit Taapsee Pannu] are chasing down the terrorist movements in various parts of India to terminate their lethal plots. Their prime targets are Bilal Khan [Kay Kay Menon in a shorter role] who wants proper attention & treatment at par Kasab would get, and Maulana- a Pakistan based religious leader-orator & mastermind modeled on Hafiz Muhammad Saeed and believably played by the Pakistani actor Rasheed Naz.

BABY acts immature as a juvenile when it comes to be a smart thriller. It never actually shocks you with a more feasible approach than being a tough nut-to-crack thriller but the pace, no non-sense songs, believable acting performances, brilliantly shot sequences and an underlay deadpan humor throughout. Though it is one such film that believes a mustache can make a hero look more real, BABY tries a lot to break the norms Bollywood is known to fall for. So no more ‘on-time’ wire-cuts while defusing a bomb! No more melodramatic cries over personal/professional losses! And more importantly, no breathing space for item numbers [one comes at the end-credits, you can ignore that easily].

As the final verdict, Neeraj Pandey’s BABY has his trademark patriotic touch with absolute mass appeal but lacks the punch in emotions he showed in ‘A WEDNESDAY’ and what’s also a miss is the smartness and the unquestionable precision in the screenplay as his SPECIAL CHABBIS (26) excelled in. Still, it’s a well-made thriller that doesn’t lose its steam despite being 2 hour 40 min long…and that says a lot! [3/5]