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Friday, 16 September 2016

पिंक: इसको ‘ना’ कहने का सवाल ही नहीं! [4/5]

पिंक’ कोई नई बात नहीं कह रही. ‘पिंक’ में हो रहा सब कुछ, खास कर लड़कियों के साथ कुछ बहुत नया नहीं है. हालांकि फिल्म की कहानी दिल्ली और दिल्ली के आस-पास ही डरी-सहमी घूमती रहती है, पर ये सिर्फ देश के उसी एक ख़ास हिस्से की कहानी भी नहीं है. इस फिल्म की खासियत ही शायद यही है कि इसकी हद और ज़द में सब बेरोक-टोक चले आते हैं. गाँव के पुलियों पर बैठे, साइकिल चलाकर स्कूल जाती लड़कियों पर आँख गड़ाये आवारों के जमघट से लेकर बड़े शहरों की बड़ी इमारतों में ख़ूनी लाल रंग की लिपस्टिक लगाने वाली, अपनी ही ऑफिस की लड़की को ‘अवेलेबल’ समझने की समझदारी दिखाते पढ़े-लिखों तक, ‘पिंक’ किसी को नहीं छोड़ती.

अक्सर देर रात को घर लौटने वाली ‘प्रिया’ ज़रूर किसी ग़लत धंधे में होगी. सबसे हंस-हंस कर बातें करने वाली ‘अंजुम’ को बिस्तर तक लाना कोई मुश्किल काम नहीं. 30 से ऊपर की हो चली ‘रेशम’ के कमरे पर आने वाले लड़के सिर्फ दोस्त तो नहीं हो सकते. ‘कोमल’ तो शराब भी पीती है, और शॉर्ट स्कर्ट पहनती है. ये ‘नार्थ-ईस्ट’ वाले तो होते ही हैं ऐसे. हमारे यहाँ लड़कियों को ‘करैक्टर-सर्टिफिकेट’ देने में कोई पीछे नहीं रहना चाहता. सब अपनी-अपनी सोच के साथ राय बना लेने में माहिर हैं, और वक़्त पड़ने पर अपने फायदे के लिए उनका इस्तेमाल करने से भी चूकते नहीं. मर्दों की यौन-कुंठा इस कदर प्रबल हो चली है कि उन्हें लड़कियों/औरतों के छोटे-छोटे हाव-भाव भी ‘सेक्सुअल हिंट’ की तरह नज़र आने लगते हैं. ब्रा-स्ट्रैप दिख जाना, बात करते-करते हाथ लगा देना, कमर का टैटू और पेट पे ‘पिएर्सिंग’; कुछ भी और सब कुछ बस एक ‘हिंट’ है. ‘ना’ का यहाँ कोई मतलब नहीं है. ‘पिंक’ बड़ी बेबाकी से और पूरी ईमानदारी से महिलाओं के प्रति मर्दों के इस घिनौने रवैये को कटघरे में खड़ी करती है.

दिल्ली में अकेले रहने वाली तीन लड़कियां [तापसी पुन्नू, कीर्ति कुल्हारी, एंड्रिया] एक रॉक-शो में तीन लड़कों से मिलती हैं. थोड़ी सी जान-पहचान के बाद लड़के जब उनके ‘फ्रेंडली’ होने का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं, लड़कियों में से एक उनपे हमला कर देती है. राजवीर [अंगद बेदी] हमले में घायल हो जाता है. लड़कियां भाग निकलती हैं. चार दिन बाद भी, लड़कियां सदमे में हैं. राजवीर ऊँचे रसूख वाला है. पुलिस अब लड़कियों के ही पीछे पड़ी है. बचाने के लिए आगे भी कोई आया है, तो अपने बुढ़ापे और ‘बाइपोलर डिसऑर्डर’ से जूझता एक रिटायर्ड वकील [अमिताभ बच्चन].

अनिरुद्ध रॉय चौधरी की ‘पिंक’ शुरुआत से ही आपको झकझोरने लगती है. हालाँकि पहले भाग में फिल्म का पूरा फोकस लड़कियों के डरे-सहमे चेहरों और उनकी डांवाडोल होती हिम्मत और हौसलों पर ही टिका होता है, पर ये वो हिस्सा है जो आपको सोचने पर मजबूर करता है. अगले भाग में कोर्ट की जिरह में अमिताभ लड़कियों की सुरक्षा, उनकी पसंद-नापसंद, उनके अधिकारों जैसे हर मसले पर मर्दों की सोच पर मजबूती से प्रहार करते हैं. इस हिस्से में फिल्म कहीं-कहीं नाटकीय भी होने लगती है, पर अंत तक पहुँचते-पहुँचते ‘पिंक’ अपनी बात रखने-कहने में बिना हिचकिचाहट सफल होती है.

पहले ही दृश्य में, घबराई हुई मीनल [तापसी] कैब ड्राईवर को डांटते हुए पूछती है, “नींद आ रही है क्या? रुको, आगे बैठकर बातें करती हूँ”. मेरे लिए, तापसी के इस किरदार में धार उसी दम से महसूस होनी शुरू हो जाती है. उसके बाद, बच्चन साब को उसका पलट कर घूरना. निश्चित तौर पर, तापसी इस फिल्म की सबसे मज़बूत कड़ी हैं. अपने से बड़ी उम्र के आदमी के साथ कभी रिश्ते में रही, फलक के किरदार में कीर्ति और ‘नार्थ-ईस्ट’ से होने का दर्द चेहरे पे लिए एंड्रिया; फिल्म के अलग-अलग हिस्सों में अपनी मौजूदगी बार-बार और लगातार दर्ज कराती रहती हैं. अपने ही मुवक्किलों को कटघरे में सवाल दागते उम्रदराज़ वकील की भूमिका में अमिताभ बच्चन बेहतरीन हैं, ख़ास कर उन मौकों पर, जब वो बोलने की जेहमत भी नहीं उठा रहे होते.

अंत में; ‘पिंक’ उन सभी महिलाओं के लिए एक दमदार, जोरदार आवाज़ है, जो हर रोज चुपचाप घरों, दफ्तरों, बाजारों में मर्दों की दकियानूसी सोच, गन्दी नज़र और घिनौनी हवस का शिकार बनती रहती हैं. साथ ही, मर्दों के लिए भी ये उतनी ही जरूरी फिल्म है. देखिये और सोचिये. कहीं आप के अन्दर भी कुछ बहुत तेज़ी से सड़ तो नहीं रहा? [4/5] 

Friday, 19 August 2016

हैप्पी भाग जायेगी: पाकिस्तानी ‘तनु वेड्स मनु’! [2/5]

हैप्पी करोड़ो में एक लड़की है. फिल्म में अली फज़ल का किरदार हैप्पी के किरदार को बयान करते हुए वैसी ही शिद्दत दिखाता है, जिस शिद्दत से शायद फिल्म के निर्देशक मुदस्सर अज़ीज़ ने फिल्म के निर्माताओं के सामने हैप्पी का किरदार बढ़ा-चढ़ा के पेश किया होगा. पर सच तो ये है कि हैप्पी जैसी नायिकायें बॉलीवुड की पसंदीदा हमेशा से रही हैं. स्वभाव से दबंग, जबान से मुंहफट, दिल से साफ़, कद-काठी से बेहद खूबसूरत! अब सारा दारोमदार सिर्फ इस एक बात पर आकर टिक जाता है कि उसे गढ़ने में कितनी अच्छी और कितनी ‘वाटरटाइट’ स्क्रिप्ट का इस्तेमाल होता है. सब कुछ सही रहा तो वो ‘तनु वेड्स मनु’ की तनु भी बन सकती है, वरना थोड़ी सी भी झोल-झाल उसे वैसी ही ‘हैप्पी’ बना के छोड़ेगा, जैसी हम हर दूसरी-तीसरी रोमांटिक कॉमेडी फिल्मों में देखते सुनते आये हैं. हालाँकि फिल्म के साथ आनंद एल राय [निर्देशक, तनु वेड्स मनु और राँझणा] और हिमांशु शर्मा [संवाद लेखक, तनु वेड्स मनु और राँझणा] जैसे बेहतरीन नाम जुड़े है, पर ‘हैप्पी भाग जायेगी’ हैप्पी को ‘तनु’ बनने का मौका नहीं देती.

हैप्पी [डायना पेंटी] एक तेज-तर्रार लड़की है. उसके पैर कहीं रुकते नहीं. बाप की पसंद के लड़के बग्गा [जिम्मी शेरगिल] से शादी न करनी पड़े, इसलिए शादी के दिन ही घर से भाग जाती है. हालात कुछ ऐसे बनते हैं कि वो अपने बॉयफ्रेंड गुड्डू [अली फज़ल] के पास न पहुँच कर अमृतसर से लाहौर पहुँच जाती है. लाहौर में उसकी मदद करने को तैयार बैठे हैं पाकिस्तानी सियासत के मुस्तकबिल बिलाल अहमद [अभय देओल]. बिलाल अपने वालिद की सियासी ख्वाहिशों को चुपचाप ख़ामोशी से पूरा करने में लगा है, जबकि उसकी अपनी मर्ज़ी कभी क्रिकेट के मैदान में झंडे गाड़ने की थी. कहने की जरूरत नहीं पड़नी चाहिए कि हैप्पी से मिलकर उसे अपनी खोई शख्सियत हैप्पी में दिखने लगती है. बहरहाल, घटनायें और फिल्म के लेखक-निर्देशक खींच-खांच के सारे ख़ास किरदारों को प्रियदर्शन की फिल्मों की तरह, उनके तमाम सह-कलाकारों के साथ हिन्दुस्तान से पाकिस्तान में ला पटकते हैं. शायद इसलिए भी कि स्क्रीन पर पाकिस्तान का ‘सब चलता है’ हिंदुस्तान के ‘सब चलता है’ से ज्यादा मजाकिया लगता हो.

फिल्म के मजेदार किरदार हों, उनके रसीले संवाद या फिर काफी हद तक कहानी में जिस तरह के हालातों का बनना और बुना जाना, ‘हैप्पी भाग जायेगी’ वास्तव में ‘तनु वेड्स मनु’ बनने की राह पर  ही भागती नज़र आती है. फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार उन किरदारों में आपको बनावटीपन और घटनाओं में बेवजह की भागा-दौड़ी ज्यादा शामिल दिखाई देती है. हैप्पी लाहौर से वापस अमृतसर क्यूँ नहीं आना चाहती? हैप्पी अगर इतनी ही निडर और निर्भीक है कि पूरा लाहौर उससे परेशान हो जाए, वहाँ की पुलिस, वहाँ के गुंडे सब उसके सामने घुटने टेक दें तो उसे अपने बाप के सामने शादी की मुखालफत करने में क्या दिक्कत हो जाती है? कहानी की घिसी-पिटी सूरत यहाँ किरदारों की भली सी-भोली सी सीरत पर बुरी तरह हावी हो जाती है. नतीज़ा? फिल्म कुल मिलाकर एक औसत दर्जे की कोशिश भर दिखाई देती है.

जिम्मी शेरगिल यहाँ भी नाकाम प्रेमी की भूमिका को जीते नज़र आते हैं, जिसे फिल्म के अंत में ‘पति’ बनने का सुख नहीं मिलता, पर दर्शकों की ‘सिम्पैथी’ मिलने का हौसला ज़रूर दिया जाता है. फिल्म के असरदार पलों में पाकिस्तान पर गढ़े गए सीधे-सादे, साफ़-सुथरे जोक्स आपके चेहरे पे हर बार मुस्कान लाने में कामयाब रहते हैं. पीयूष मिश्रा साब का औघड़पन, उनकी अहमकाना हरकतें और खालिस उर्दू के इस्तेमाल से बनने वाला हास्य आपको थोड़ी तो राहत देते हैं. अली फज़ल और अभय देओल अपनी करिश्माई मौजूदगी भर से परदे को एक हद तक जिंदा रखते हैं. डायना काबिले-तारीफ हैं. जिस तरह की झिझक और झंझट उनके अभिनय में एक वक़्त दिखाई देता था, उससे वो काफी दूर निकल आई हैं.

आखिर में; मुदस्सर अज़ीज़ की ‘हैप्पी भाग जाएगी’ में एक किरदार कहता है, “काश! ऐसी लव-स्टोरीज़ पाकिस्तान में होतीं.” सच मानिए, कुछ मामलों में ये ‘तनु वेड्स मनु’ बनाने की चाह में भटकी हुई कोई अच्छे बजट की, पर सस्ती सी पाकिस्तानी फिल्म ही नज़र आती है. यहाँ सब कुछ मिलेगा, पर सब आधा-अधूरा, अधपका और जल्दबाजी से भरा हुआ! [2/5]         

Friday, 6 May 2016

ट्रैफिक: बैठे रहिये, बाजपेयी हैं ना! [3/5]

दिवंगत राजेश पिल्लै की मलयालम सुपरहिट थ्रिलर ‘ट्रैफिक’ का हिंदी रीमेक आपको थिएटर की कुर्सी से बांधे रखने के लिए गिने-चुने विकल्प ही सामने रखता है, जिनमें से एक तो है फिल्म की हद इमोशनल स्टोरीलाइन, और मनोज बाजपेयी का बेहद सटीक, संजीदा और समर्पित अभिनय. तकनीकी दृष्टि से फिल्म के कमज़ोर पल हों या कथानक को रोमांचक बनाये रखने के लिए नाटकीयता भरे उतार-चढ़ाव, मनोज बड़ी मुस्तैदी, ख़ामोशी और शिद्दत से ड्राइविंग सीट पर बैठे-बैठे पूरी फिल्म को अकेले खींच ले जाते हैं. हालाँकि अच्छे और नामचीन अभिनेताओं की एक पूरी जमात आपको इस फिल्म का हिस्सा बनते दिखाई देती है, पर एक मनोज ही हैं जिनसे, जिनके अभिनय से और जिनकी कोशिशों से आप लगातार जुड़े रहते हैं...हमेशा!

सच्ची घटनाओं को आधार बना कर, ‘ट्रैफिक’ मानवीय संवेदनाओं से ओत-प्रोत एक ऐसी दिलचस्प और रोमांचक कहानी आप तक पहुंचाती है, जहां जिंदगी तमाम मुश्किलों और मायूसियों के बावज़ूद आखिर में जीत ही जाती है. कभी न हार मानने वाले इसी इंसानी जज़्बे को सलाम करती है ‘ट्रैफिक’! फिल्मस्टार देव कपूर (प्रोसेनजीत चटर्जी] की बेटी को पुणे में जल्द से जल्द हार्ट ट्रांसप्लांट की दरकार है. पता चला है कि मुंबई के एक अस्पताल में एक ऐसा ‘पॉसिबल डोनर’ है जिसके जिंदा रहने की उम्मीद अब लगभग दम तोड़ चुकी है. माँ-बाप (किटू गिडवानी और सचिन खेड़ेकर) अपने बेटे को ‘दी बेस्ट गुडबाई गिफ्ट’ देने का मन बना चुके हैं पर मुंबई से पुणे तक १६० किलोमीटर की दूरी को ढाई घंटे में पूरा करने का बीड़ा कौन उठाये? ट्रैफिक हवलदार रामदास गोडबोले (मनोज बाजपेयी) के लिए ये सिर्फ ड्यूटी बजाने का मौका नहीं है. मिशन पर जाने से पहले वो अपनी बीवी से कहता है, “पता नहीं कर पायेगा या नहीं, पर घूसखोर का लांछन लेके नहीं जीना”.

फिल्म पहले हिस्से में कई बार अपनी ढीली पकड़ और सुस्त निर्देशन से आपको निराश करती है, खास कर जब किरदार एक-एक कर आपके सामने बड़ी जल्दी-जल्दी में परोस दिए जाते हैं. फिल्म को तेज़ रफ़्तार देने के लिए, घटनाओं को घड़ी की टिक-टिक के बीच बाँट कर दिखाने का चलन भी बहुत घिसा पिटा लगता है. हालाँकि इंटरवल आपको हल्का सा असहज महसूस कराने में कामयाब होता है. दूसरे हिस्से में फिल्म जैसे एकाएक सोते हुए जग जाती है और बड़ी तेज़ी से आगे बढ़ने लगती है, पर फिर ड्रामा के नाम पर जिस तरह के उतार-चढ़ाव शामिल होने लगते हैं, उनमें गढ़े होने की बू दूर से ही नज़र आने लगती है. ऐसा लगता है मानो जिंदगी की ये दौड़ अब कोई सस्ती सी विडियो गेम बन कर रह गई है, जहाँ मुश्किलें जानबूझ के हर मोड़ पे और बड़ी होती जा रही हैं. मलयालम फिल्मों में वैसे भी ये कोई नया चलन नहीं.

पियूष मिश्रा जैसे वजनी नामों के बाद भी ‘ट्रैफिक’ के संवाद उतने ही फीके और उबाऊ हैं, जितने उसके नामचीन कलाकारों के बंधे-बंधे बासी अभिनय. प्रोसेनजीत दा का किरदार जाने-अनजाने अनिल कपूर के इतना इर्द-गिर्द बुना गया है कि उससे बाहर उन्हें देख पाना मुश्किल हो जाता है. दिव्या दत्ता, किटू गिडवानी, जिम्मी शेरगिल, सचिन खेड़ेकरपरमब्रता चटर्जी  सभी को हम पहले भी इस खूंटे से बंधे देख चुके हैं. सब अपने घेरे अच्छी तरह पहचानते हैं और उसे तोड़ने की पहल से बचते नज़र आते हैं.

इतने सब के बाद भी, ‘ट्रैफिक’ अपने जिंदा जज़्बे, सच्ची कहानी के तमगे, कुछेक गिनती के ही सही सचमुच के रोमांचक पलों और मनोज बाजपेयी के मजबूत कन्धों के सहारे एक अच्छी फिल्म कहलाने की खुशकिस्मती हासिल कर लेती है. मनोज मिसाल हैं, संवाद अभिनय का एक अभिन्न अंग है, मात्र एक अभिन्न अंग...पूरे का पूरा अभिनय नहीं. देखिये, अगर उनके जरिये अभिनय के बाकी रंग भी देखने हों! देखिये, अगर एक थ्रिलर देखनी हो जिसमें दिल हो, एकदम जिंदा ‘धक-धक’ धड़कता हुआ! [3/5] 

Friday, 26 February 2016

TERE BIN LADEN: DEAD OR ALIVE : Sequel or a Spoof? [2/5]

Satires backfire if not handled seriously. The characters can look goofy on screen to any extent but the writing should always be smart and considerate. TERE BIN LADEN (2010) followed it all as basic principles and the code of conduct. No wonder, it was unanimously loved and tagged as year’s one of the sleeper hits. The sequel too was expected, though never this late. 6 years later, the team is back with TERE BIN LADEN: DEAD OR ALIVE. Nothing has changed eventually except the writing has imbibed the goofiness and the characters have become smarter than you think. So much to change the end results in a bad sense! Abhishek Sharma’s TERE BIN LADEN: DEAD OR ALIVE is plenty dry, partly funny and largely a disappointment that works less as a sequel and more as a spoof to its previous part.

The film establishes its original franchise as a film itself that has become hugely successful in Bollywood and the beneficiaries include dimwit Punjabi lad Paddi Singh [Pradhuman Singh] as the doppelganger of Osama Bin Laden; Ali Zafar plays himself and so are the rest of the cast. Manish Paul joins the cast as Sharma- the director of TERE BIN LADEN ‘film’ in the film. Riding high on the success, Sharma announces the sequel of the film but to his bad luck, Osama gets eliminated in Abbottabad operation by US Army.

Plot thickens when everyone from US President Obama to a fading Jihadi-leader in Pakistan wants the Osama look-alike for their own good. Mr. President wants him dead in recreation of the operation Abbottabad to have concrete proof for the world to believe. Jihadi-leader [Piyush Mishra] wants him alive to rebuild the terrorist organization. Sharma doesn’t want to lose his road to success in him. And thus, starts the mayhem delivering some genuinely funny satirical takes far and away between silly, tasteless and repetitive jibes one after the other.

TERE BIN LADEN: DEAD OR ALIVE is not entirely unwatchable or vice-versa. The colorful characters make up for the most part even where the script starts sounding illogical, stupid and strained. Piyush Mishra in his seasoned avatar is seen organizing Olympics of Terror in Pakistan where relay race is performed with live bombs being passed on. Pradhuman Singh confidently revisits his author-backed role in the previous part but sadly doesn’t add up any more flavors to the part. Manish Paul makes constant efforts to entertain and gets successful in some too but the show-stealer without any doubt is Sikander Kher!

Sikander amazes you with his out-and-out double dose of comedy. While playing a manipulative confidante of Obama, he’s almost unrecognizable. It’s a part where he doesn’t lose his grip on it even for a second, and in due course, often reminds you of Jim Carrey in his style, presentation and efforts. In other act, he transforms himself into a paunchy Punjabi trying to lure Sharma & Paddi Singh in his evil plans. Sikander is definitely the surprise package of the film!

At the end, TERE BIN LADEN: DEAD OR ALIVE falls short of expectations. While the original was an honest, simple and refreshing satire in times of silly slapstick comedies, this one merely rises from the dust to meet the standard set by itself. In one of the few hilarious tracks, Obama is seen taking psychotherapy sessions after Osama’s dismissal and his remark says, “I see dead Osama!” So true for the franchise! The opportunity has been killed. [2/5]      

Sunday, 29 November 2015

TAMASHA: A Bioscope to life, and to your ‘self’ within! [3.5/5]

I dare not go any sentence further in approving Imtiaz Ali’s most personal artistic take on love, life and limitless conflicting conditions around the both, before having a word of strict advice for you that TAMASHA is not an easy watch. It neither is just another ‘boy-meets-girl’ love-story to write, shoot, edit and release. Only an Imtiaz Ali can helm the project of such risky, self-destructive and boomerang-like nature; and my suggestions here are heading towards Imtiaz Ali of today and not of pre-ROCKSTAR. If JAB WE MET and SOCHA NA THA were busy twisting the lighter side of love, if ROCKSTAR and HIGHWAY were falling for the darker region; TAMASHA is a multihued psychological exercise to reinvent, reestablish and renew your ‘self’ under mystically painful care and custody of love. TAMASHA is not an extravagant, star-studded, all flashy WIZCRAFT production of a celebrity world-tour but a cute, tiny, little bioscope which immediately transports you to the world of your dreams and your aspirations; where you’re the ‘Tamasha’ and not just a sitting idle spectator.  

In the very earliest scenes, Imtiaz makes Piyush Mishra playing an older than the old storyteller in the film mouth an exposition when he mixes up with two different stories of worlds poles apart, “toh pareshaani kya hai? The story is always the same. Do not fall for their names, places and other details. Just sit back and enjoy.” and that’s enough to hint you about the most predictable plot one can have for a love-story. Boy meets girl, on the beautiful locations in Corsica, France. They decide not to reveal their identities and be complete strangers to each other. Both part their ways. Four years down, the girl still in awe of the vibrant personality of the boy reaches to him. He is now succumbed to the all emotionless, motorized and mechanical race of the corporate world. The girl rejects the new bore. The dejected boy is now looking for a new end to his story. After all, it is never too late to start a fresh. Now as an easy entertainment seeker, you may voice a question that why always the same story, even the tagline on the posters suggests the same but then, I think TAMASHA was never about the story. It doesn’t take the easy route with over-simplified solutions to the monstrous-looking problems but decides to go on the ‘self-discovery’ mode to find some of the toughest answers only you and life can juice it out together.

There are more than a couple of reasons when I call Imtiaz the new-age ‘Yash Chopra’. The way he makes it happen, the way he breaks into the susceptible space of separation and the way he paints the pain, is meticulously relatable, unswerving and apt. He hardly creates a situation; he just opens up another unseen layer buried deep within his characters. Apart from the dialogues that rarely sound anything written, scrumptious camerawork, soul-pleasing soundtrack by A R Rahman and imaginatively decorated lyrics by Irshad Kamil, TAMASHA marks towering performances from both the leads. Though the film belongs more to Ranbir Kapoor’s character in the central role, let me honor Deepika Padukone first to talk about. The cranky, complaining independent girl of PIKU here shows off her complete different avatar in a more edgy, persuasive and in pain character of an anxious lover. You don’t have to make an extra effort to notice some of her atypical expressions you sure haven’t seen anywhere else. If she effortlessly makes your heart bleed in ‘Agar Tum Saath Ho’, she also steals it with her sparkling eyes even while being utterly there in playful conversations with Ranbir.  And now the boy himself! TAMASHA brings back Ranbir in the race. The inconsistent ‘velvet’y touch is forgiven and forgotten. The all new and fresh Kapoor shifts gears like a pro. The bathroom scene, the story-telling session at home, the apology scene; there are moments that will haunt you even after full night sleeps in the next couple of days. Undoubtedly, one of the best performances this year!

Despite going into a self-pleasing theatrical mode and uncommonly imprecise scenes of creative satisfaction, Imtiaz earns full marks on taking the risk most of the filmmakers today hesitate. Otherwise, who would dare to compose scenes with profile shots of the leads when they are busy sporting the most unforced yet intricate emotions on their face? TAMASHA is not flawless. TAMASHA is not regular. TAMASHA is inspiring. TAMASHA is mesmeric. TAMASHA is a journey you should take at least once in a lifetime to make it all right you couldn’t dare all these years. [3.5/5]     

Sunday, 9 November 2014

THE SHAUKEENS: A bad day for comedy! [1.5/5]

Indian men are trained to read between the lines in a way best suited for their ambitions, especially if it has anything to do with women & sex. If a girl throws a generous smile at you, there’s a definite ‘hidden chance’ there to try your dirty luck.

So, when a free-spirited girl living at her own says she will do anything to meet her Bollywood-crush Akshay Kumar, it is more than enough ‘signal’ for 3 true Indian-at-heart, lecherously sleazy old men to run a cut-throat competition between them. Obviously, the girl was nowhere near the ‘understood’ connotation of her enthusiastic announcement and one of the contestants could only get a peck on his bald head and the worth-dying for title of ‘Rockstor’ in return. In the very next scene, he’s seen sharing the all made-up juicy stories of his false-success in the act and getting paid with what she has promised. Finding it funny? Shameful, I would say!

TERE BIN LADEN fame Abhishek Sharma returns with remaking Basu Chatterji’s cutely titillating comedy SHAUKEEN. The new version is called THE SHAUKEENS and the Utpal Dutt-Ashok Kumar-A K Hangal trio is replaced with Anupam Kher-Annu Kapoor & Piyush Mishra. Undeniably, the cuteness is killed by the crudeness and the cheap sex-humor.

Story revolves around three aging licentious, lusty and sex-starving men from Delhi hitting girls of all ages around them. Lali [Anupam Kher] has a wife at home, clearly disinterested in sex and busy ensuring her place in heaven with heavy religious duties. Pinky [Piyush Mishra] is a masala-king having no spices in his life as his wife had already passed away. KD [Annu Kapoor] is a wild-untamable bachelor by choice. Together they plan a trip to Mauritius meant to calm their guilty pleasures and to their best; it is a gipsy-sexy-carefree girl Ahana [Lisa Haydon] who welcomes them as the caretaker of their rented accommodation.

Keeping these 3 extensively indecent, strong-minded & unshakable filthy men’s intentions in mind, I felt good for other girls on the beaches of Mauritius as they looked only focused to one. Film constantly carries scenes of forcefully hugging & caressing the girl and even literally begging her to wear bikni in one particular scene. Following the current statistics of rise in eve-teasing & sexual harassment of women in India, these men tick all the boxes to be considered for serious sentence but here, they are not only calculated funny but also deliberately get blessed with stupid justification of their insufferable behavior- the loneliness and a good harmless heart within. How ridiculous!

Thank God, the producer is here to save some of his film. Akshay Kumar plays himself and intrepidly jokes on himself ranging from doing same things in every film of his, being compared with wooden furniture in terms of his acting ability [Heartless Critics, I say] and his ‘not really’ but witty wish to win national awards someday. His tracks in the film are similarly intertwined like any parallel comedy tracks in South Indian Masala entertainers. On the performances, Annu Kapoor plays it cool and the most confident about his part. Piyush Mishra shows faith on his theatrics more. Anupam Kher is hammy for the most.

At the end, THE SHAUKEENS dies a regrettable death despite having promising names like Tigmanshu Dhulia as the writer and Abhishek Sharma as the director. Things do get worse on a bad day. It is one such for many, including the viewers and the reviewers. Avoid it! [1.5/5] 

Friday, 25 April 2014

REVOLVER RANI: Loud, laborious and lethargic desi-ode to Tarantino! [2/5]

In Sai kabir’s REVOLVER RANI- an underwhelming homage to Quentin Tarantino style Filmmaking, Sai often takes his narrative to a local TV News anchor who loves to connect and end every breaking news piece with some popular Bollywood songs. Her local flavor in the diction, interesting writing and primitiveness in the enactment never goes wrong, not even for a single time. This is probably one and only element in the film that is constantly entertaining, remarkable, convinced and believably relatable. For the rest, REVOLVER RANI is a loud, laborious and lethargic outing in search of pleasurable entertainment.

The daredevil dacoit of Chambal, Alka Singh [Kangana Ranaut in form] is a tigress with gun in her hands that can walk fearlessly into its rival’s den, shoot its mouth off, shower as much bullet in the stock and return back winning all the claps and whistles. ‘Fashion, fun and gun’ is what describes her ferociously wild flashy character the best but at the same time, she is a trapped soul in the hostile world of politics, power and position driven by bullet and ballot both. If not fighting back in stride with her rival gang the corrupt politician trio Tomar brothers [Zakir Hussain, Kumud Mishra & Pankaj Saraswat], Alka loves to explore the arena of love with her lover Rohan [Vir Das in a regular but meatier role], a struggling actor in Bollywood. Things go erratic when Alka gets pregnant and that could possibly turn into a serious threat to all the prospects her mentor [Piyush Mishra saving some grace] had eyed for.

Sai sets the mood perfectly with real locations, interesting characters, local dialect and the scheming political scenario everyone can relate to. Extended shootouts weaved in with gun-shots and music, satirical approach in the narrative and the stylized action sequences are clearly Tarantino effect but it’s the lifeless story and scattered screenplay that hardly do any better to the promising premise. Entertainment comes in bits and pieces and for the most, the whole 2 hour 15 minutes looks like a never ending journey in the tiring terrain of Chambal itself. Music is another letdown as it plays one of the most prominent parts in such film and can never be less than a driving force to the film.     

Kangana Ranout, after her super-delightful performance in QUEEN is back with a character that needs guts and a certain kind of spark to set the screen on fire. Sadly, Kangana puts her best but the writing doesn’t give her what she deserves. Vir Das is likeable in parts. Watch him explaining how his situation in the film at that time finds similarities with Hollywood actor Daniel Day-Lewis and it’s all about being a true actor. Funnier than you think! Piyush Mishra shows his mastery over the art and though he’s more visible in second half, he captures your attention in total effect. Zakir Hussain, Kumud Mishra and Pankaj Saraswat as witty villains are good to watch.

In nut shell, REVOLVER RANI is a sad victim of baffled screenplay that loses its steam way before the end. Even good performances and fascinating characters aren’t good enough to make your day. Avoid this messy ride of bullet, ballot and bizarre ballet of love! [2/5]