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Friday, 21 April 2017

नूर: ‘लाइक इट फॉर सोनाक्षी!’ [3/5]

नूर’ बॉलीवुड में किसी बहुत बड़े बदलाव का दावा नहीं करती, पर अपने देखने वालों को ऐसा न कर पाने का ग़म भी मनाने नहीं देती. कैसे आजकल की फिल्मों को जमीनी और ज़हीन होने की जरूरत है, इस कसौटी पर अक्सर हम दर्शक और फिल्म-समीक्षक उन्हें सिरे से खारिज़ करते या सर पर बैठाते आये हैं. ‘नूर’ इस मामले में हमसे कहीं ज्यादा समझदारी दिखाती है. हिंदी फिल्मों के लिए आज अगर ‘मेनस्ट्रीम सिनेमा’ का कोई ख़ाका मेरे दिमाग में बनता है, तो ‘नूर’ उसके बहुत आस-पास है. ‘नूर’ अपने मुख्य किरदार की ही तरह, एक ही वक़्त में भरोसेमंद भी है, और ढुलमुल भी; पर उसकी तरह बेतरतीब, बेपरवाह और बेढंगी बिलकुल नहीं.

नूर रॉय चौधरी (सोनाक्षी सिन्हा) की ज़िंदगी में शिकायतों की कोई कमी नहीं. घर के खराब गीज़र से लेकर टीआरपी खोजने वाली पत्रकारिता की दुनिया में मुर्दे की तरह ठंडा कैरियर; नूर हर बात पर रोने-धोने वाली कोई भी आम लड़की है. उसे सनी लियॉन के इंटरव्यू से ज्यादा असली लोगों की असली जिंदगी में झाँकने का शौक है. और हड़बड़ी कि कब उसे भी ‘इश्यू बेस्ड’ जर्नलिस्म में जौहर दिखाने का मौका मिले. यहाँ तक की फिल्म पूरी ताजगी और हलके-फुल्के पलों के साथ आपको कई सारी अच्छी हॉलीवुड ‘डेट’ फिल्मों की याद लगातार दिलाती रहती है, खासकर ‘ब्रिजेट जोंस’ सीरीज के फिल्मों की. घटनाएं इसके बाद संजीदा हो जाती हैं, जब नूर को एक ऐसा ही मौका मिलता है, पर अपने बचकाने रवैय्ये से वो सब कुछ गँवा बैठती है.

सनहिल सिप्पी के खाते में ‘स्निप!’ जैसी इंडी फिल्म पहले से है. ‘नूर’ के साथ वो 17 साल बाद बॉलीवुड में वापसी कर रहे हैं. पाकिस्तानी लेखिका सबा इम्तियाज़ की किताब ‘कराची, यू आर किलिंग मी’ पर आधारित, ‘नूर’ में सनहिल मेनस्ट्रीम हिंदी फिल्मों को एक नयी खुशबू में पिरो कर पेश करने का प्रयोग करते हैं, जो देखने में बहुत कुछ ‘डियर जिंदगी’ और ‘कपूर एंड संस’ जैसा ही लगता है. हालाँकि ‘नूर’ की कहानी में इन दोनों फिल्मों जैसी सच्चाई और ईमानदारी थोड़ी कम ही है, फिर भी फिल्म में 3 चीजें आपको एक पल के लिए भी निराश नहीं करतीं. सोनाक्षी को इस फिल्म में एक ‘न्यूकमर’ की तरह देखा जाना चाहिए, एक कॉंफिडेंट न्यूकमर की तरह. बड़ी-बड़ी नायक-प्रधान फिल्मों में अपनी बेबाकी और दिलेरी से वो भले ही जगह बनाए रखने में कामयाब दिखी हों, इस छोटी सी फिल्म के साथ अभिनेता के तौर पर, सोनाक्षी अपनी हर हद तोड़ने की कोशिश करती हैं, और कामयाबी कई बार महज़ कोशिशों में भी खोजी जानी चाहिए. ‘मुंबई, यू आर किलिंग मी’ के मोनोलॉग में सोनाक्षी को सराहते-सराहते, अचानक आप इशिता मोइत्रा उधवानी के लिखे संवादों की तारीफ़ के लिए सटीक शब्दों की खोज करने लगते हैं. पैने, तीखे, धारदार, बेतकल्लुफ़, नपे-तुले, मज़ेदार; मेरे जेहन में कुछ इतने ही आये हैं. इशिता की कलम वहाँ सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, जहां आप पहले से जानते हैं कि किरदार कुछ रटा-रटाया ही बोलने वाले हैं, जैसे कैमरे के सामने स्मिता ताम्बे के किरदार का बयान.

फिल्म में किको नाकाहारा का कैमरा बड़ी ख़ूबसूरती से मुंबई को परदे पर उकेरता है. किरदारों के हाव-भाव कैद करने में नाटकीयता का सहारा कम ही लेता है, और एक सपनीली दुनिया की तरह सब कुछ अच्छा-अच्छा दिखाने में ज्यादा मशगूल रहता है, मगर बहुत ही सधे हुए प्रयोगों के साथ. यही वजह है कि अक्सर किको अपने आप को दोहराते जरूर नज़र आते हैं, पर कहीं भी बोर नहीं करते. मशहूर स्टैंड-अप कॉमिक कनन गिल औसत राइटिंग की वजह से फिल्म में दिखते तो बहुत हैं, अच्छे भी लगते हैं पर बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाते. शिबानी दांडेकर, पूरब कोहली, स्मिता ताम्बे और मनीष चौधरी एक साथ मिलकर फिल्म को एक मज़बूत सपोर्ट सिस्टम की तरह संभालते हैं. फिल्म के छोटे से छोटे दृश्यों में भी इन कलाकारों की मौजूदगी आपकी दिलचस्पी कम नहीं पड़ने देती.

एक दृश्य में, नूर अपनी नाराज़ कामवाली बाई मालती (स्मिता ताम्बे) के बंद कमरे के सामने बैठी उसे फेसबुक पर फ्रेंड-रिक्वेस्ट भेजती है. नूर की बेवकूफी की वजह से मालती अपना भाई खो चुकी है. फिल्म के आखिरी दृश्यों में, मालती के लिए इन्साफ की लड़ाई लड़ते हुए नूर सोशल मीडिया का सहारा लेती है, और फिर कहीं जाकर एक दिन मालती उसका फ्रेंड-रिक्वेस्ट मान लेती है. ‘नूर’ एक फिल्म के तौर पर इतनी ही असली, इतनी ही कम महत्वाकांक्षी, इतनी ही भोली और इतनी ही फिल्मी है. फेसबुक और ट्विटर पर पोस्ट्स लिखने से क्रांति नहीं आती, ‘नूर’ अच्छी तरह जानती है, पर ‘लाइक्स’ तो आते हैं. ‘लाइक इट फॉर सोनाक्षी!’ [3/5]

Friday, 12 August 2016

मोहेंजो दारो: कहो ना ‘बोर’ है! [2/5]

इतिहास के पन्नों में झांकना अपने आप में मनोरंजन से कम नहीं है. हज़ारों कहानियां, और हर कहानी में विस्मयाधिबोधक घटनाओं की भरमार; बशर्ते आपमें तथ्यों को नज़रअंदाज़ करने और घटनाओं की सत्यता पर प्रश्नवाचक चिन्ह न लगाने की सहनशीलता भारी मात्रा में हो. और फिर आशुतोष गोवारिकर की ‘मोहेंजो दारो’ तो बस एक आम सी बॉलीवुड फिल्म है जिसका वास्तविक इतिहास से उतना ही लेना देना है, जितना आपका और हमारे जैसे कम-पढ़ाकू जानकारों का, जिनको बात-बात में गूगल-देव की सेवाएं लेने में रत्ती भर भी झिझक नहीं होती. अगर आपने स्कूल की इतिहास की किताब में सिन्धु घाटी सभ्यता के बारे में वो एक 6-8 पन्नों वाला चैप्टर भी ध्यान से पढ़ा होगा, तो आपको अंदाजा हो जायेगा कि ‘मोहेंजो दारो’’ के साथ, गोवारिकर आपको 2016 से 2016 ईसापूर्व में ले तो गए हैं, पर बॉलीवुड के घिसी-पिटी और बेरस कहानी कहने के फार्मूले को यहीं छोड़ना भूल गए.

नगर बुरे लोगों के चंगुल में है. कभी खुशहाली बसती थी यहाँ, मोहेंजो दारो में, अब झूठ, छल और ठगी का व्यापार होता है. आम लोगों पर मनमाने करों का बोझ लादा जा रहा है. ऐसे में, एक बाहरी साहसी नवयुवक सरमन [ह्रितिक रोशन] नगर में आता है. उसे लगता है उसका कोई पुराना रिश्ता है इस नगर से. यहीं उसे अपनी संगिनी भी मिलती है, चानी [पूजा हेगड़े], जिसे पाने की कोशिश उसे नगर के प्रधान महम [कबीर बेदी] और उसके बेटे मूंजा [अरुणोदय सिंह] के सामने ला खड़ी करती है. सरमन अब जन-जन की आवाज़ बन चुका है. पर अभी और भी कुछ राज हैं, जो उसके सामने खुलने बाकी हैं. उसका इस नगर से क्या वास्ता है? उसका अपना अतीत और नगर का भविष्य दोनों एक ही धागे के दो छोर हैं, पर उलझे हुए. फिल्म का अंत सब सवालों का हल लेकर आता है, पर अहम् सवाल ये है कि इस औसत दर्जे की कहानी को मोहेंजो दारो के ऐतिहासिक चमक-दमक का चोला पहनाने की जरूरत क्या थी?

पीरियड फिल्मों में ‘मोहेंजो दारो’ गोवारिकर की सबसे कमज़ोर फिल्म है. ऐसा नहीं है कि आशुतोष आपको सिंघु घाटी के नज़दीक ले जाने में कोई चूक करते हैं, पर इस बार न तो उनके पास ‘लगान’ जैसा ड्रामा है, न ही ‘जोधा-अकबर’ जैसा शानदार स्केल. फिल्म अपने रोचक, पर बनावटी और कुछ ज्यादा ही अलबेले कॉस्टयूम डिज़ाइन से आपका ध्यान कहानी की गंभीरता (?) से भटकाती रहती है. फिल्म में इस्तेमाल हुए विजुअल ग्राफ़िक्स का औसत स्तर भी फिल्म का एक बहुत बड़ा कमज़ोर पक्ष है. ‘सपने’ को ‘सपीने’, ‘सवाल’ को ‘सुवाल’ जैसे उच्चारण के साथ, आशुतोष उस वक़्त की बोलचाल की भाषा के लिए जिस तरह का प्रयोग करते हैं, वो हास्य उत्पन्न करने के लिए तो सटीक लगता है, पर वास्तविकता से उसको जोड़ने में भरोसेमंद साबित नहीं होता. आर रहमान का संगीत ही है, जो एक पल के लिए भी अपने आपको शक के घेरे में खड़ा नहीं होने देता. उनके संगीत में एक तरह का कबायली ‘टच’ है, जो आपको बांधे भी रखता है, और उनसे और उम्मीद करने की छूट भी देता ही.

अभिनय में, नितीश भारद्वाज [बी आर चोपड़ा की ‘महाभारत’ के कृष्ण] एक बिलकुल नए रूप में आपको बहुत अरसे बाद परदे पर देखने को मिलते हैं. ताज्जुब होता है, भारतीय सिनेमा उनसे इतने दिन तक दूर कैसे रह पाया? उन जैसे ही अभिनय-प्रतिभा के कुछ और धनी नरेन्द्र झा और मनीष चौधरी भी फिल्म में दिखाई तो पड़ते हैं, पर महज़ खानापूर्ति के लिए बनी भूमिकाओं में. अरुणोदय सिंह अपनी कद-काठी के साथ अच्छा प्रभाव डालते हैं, अच्छे लगते हैं. कबीर बेदी इस तरह की भूमिकाओं में हमेशा सहज रहे हैं, हालाँकि उनसे बहुत कुछ की उम्मीद करना भूल ही जाईये. पूजा हेगड़े बहुत अलग सी दिखती हैं. उनकी अगली फिल्मों का चयन काफी हद तक उनकी पहचान बनाने में अहम साबित होगा. ह्रितिक पूरी फिल्म अपने कन्धों पर ढोते नज़र आते हैं, पर इस मुकाम पर इस तरह की औसत फिल्मों में उनका होना उनकी सारी मेहनत, कवायद और शख्सियत के लिए शायद एक उल्टा खेल साबित हो.

आखिर में; ‘मोहेंजो दारो’ ऐतिहासिक स्थलों के उस टूर की तरह है, जहां लोकेशन्स अपनी एक अलग कहानी बयां करने की कोशिश कर रहे हैं, पर आपका टूर गाइड रटे-रटाये तरीके से, अपनी सहूलियत के हिसाब से, आपको अपनी गढ़ी हुई एक अलग ही कहानी बताये जा रहा है, जो न तो सच है, न ही रोचक...और कभी-कभी तो बहुत बोर!! [2/5]       

Friday, 4 March 2016

ज़ुबान: दिल, दुनिया और म्यूजिक! [3/5]

सपनों के पीछे भागते-भागते आप मंजिल तक पहुँच जाएँ, और वहाँ पहुँच कर आपको लगे कि ये तो वो मंजिल नहीं, जिसके लिए अब तक आपने इतनी जद्दोजेहद की. ऐसा अक्सर नहीं होता. ऐसा सबके साथ भी नहीं होता. या अगर होता भी है तो इतनी देर से कि आपका पीछे लौटना मुमकिन ही न हो. पहली बार निर्देशन की बागडोर सँभालते मोज़ेज सिंह की ‘ज़ुबान’ एक ऐसे नौजवान की कहानी है, जो अपने सपनों के लिए किसी भी हद तक जा सकता है पर, एक दिन जब उसके चाहतों की दुनिया उसके क़दमों में बिछी दिखाई देती है, उसे एहसास होता है इस पूरे सफ़र में उसने अपनी पहचान ही खो दी है, अपनी जुबान ही खो दी है.

गुरदासपुर के दिलशेर [विक्की कौशल] को अपने रोल मॉडल गुरुशरण सिकंद [मनीष चौधरी] जैसा ही एक अमीर और कामयाब बिज़नसमैन बनना है. सिकंद उसी के गाँव से आते हैं, शायद इसीलिए दिलशेर सिकंद ही बनना चाहता है. हालाँकि हमेशा से ऐसा नहीं था. दिलशेर को अपने पिता के साथ गुरबानी गाना बहुत भाता था पर एक हादसे में पिता नहीं रहे. और अब दिलशेर हकलाता भी है. सिकंद तक पहुँचने के लिए, दूसरा सिकंद बनने के लिए दिलशेर कोई मौके नहीं छोड़ता पर जब अपनी सारी कोशिशों के बाद उसे अपनी मंजिल तय नज़र आती है, अचानक उसे सब कुछ बेमानी लगने लगता है. जैसे कस्तूरी उसके अन्दर ही रची-बसी थी और वो पागलों की तरफ इधर-उधर भटक रहा था. उसकी ज़ुबान ही उसकी पहचान है...और उसे इसका एहसास दिलाने में मदद करती है, अमाईरा [सारा जेन डायस]!

‘जुबान’ उन चंद खूबसूरत फिल्मों में से है, जो आपसे कुछ कहने की कोशिश करती हैं (यकीन मानिये, ऐसा हर फिल्म के साथ नहीं होता. मेरी याददाश्त में शायद ‘तमाशा’ इस तरह की आखिरी फिल्म रही है) ये बात दीगर है कि कई बार ये कोशिश सटीक बैठती है, कई बार नहीं. फिल्म को गहराई देने के लिए मोजेज़ अक्सर गीतों और संगीत को अपना जरिया बनाते हैं, जो कहीं से भी आपको निराश नहीं करते और फिल्म को नयेपन का चोला पहनाने में भी बखूबी कामयाबी हासिल करते हैं. फिल्म एक ठहराव के साथ आगे बढती है, जहां कहानी के बहुत से हिस्से पहले रोमांचक तरीके से छिपाने और बाद में सामने लाने के सांचे में पिरोये गए हैं.

खूबसूरत सिनेमेटोग्राफी के साथ-साथ, ‘ज़ुबान’ को देखने लायक फिल्म बनाते हैं तो वो हैं उसके किरदार और उन किरदारों में ढले कलाकार. हालाँकि विक्की कौशल को हम ‘मसान’ में पहले भी देख चुके हैं, मगर तकनीकी तौर पर ये उनकी पहली फिल्म है. उनके अभिनय में एक ख़ास तरह का कसाव है जो आपको कभी भी उनसे ऊबने नहीं देता. मनीष चौधरी मंजे हुए अदाकार माने जाते हैं, और यहाँ भी वो अपना लोहा खूब मनवाते हैं. सारा जेन डायस फिल्म में एक अलग ही रंग भरती हैं. सिकंद के बेटे की भूमिका में राघव चानना प्रभावित करते हैं.

आखिर में; ‘ज़ुबान’ में सब कुछ अच्छा है, ऐसा नहीं है. कहानी की पकड़ अक्सर आप पर बनती-छूटती रहती है. फिल्म की रफ़्तार भी कुछ इस तरह की है कि आप इसे एक ‘स्लो’ फिल्म कहने से गुरेज नहीं करते, पर इन सबके बावजूद ‘ज़ुबान’ एक आम फिल्म नहीं है, एक आसान फिल्म नहीं है. दिल, दुनिया और दिमाग के बीच झूलते-जूझते नौजवानों को आवाज देती एक ऐसी ज़बान, जिसे सुनने-समझने के लिए आपको भी थोड़ी मेहनत तो करनी होगी. [3/5]